पञ्चम सुमन · प्रकरण 70

स्पृश्ता - विज्ञान

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583मनोविज्ञानवेत्ता भी मानस- विचारतरङ्गोंका वायुमण्डल - द्वारा दूसरों में संक्रमण मानते हैं; भौतिक विज्ञानके आचार्य भी विद्युत्- शक्तिका दूसरों पर संक्रमण मानते हैं; वैसे ही वैदिक - विज्ञानमें भी प्राणशक्तिकी एक - दूसरे पर संक्रमणकी बात भी निर्मूल नहीं । स्थूल - तत्त्वों तक निर्भर आधुनिक भौतिक विज्ञान कीटाणु - संक्रमणों तक ही सीमित रहा है, परन्तु सूक्ष्म - अतिसूक्ष्म तत्त्वोंका विश्लेषण करने वाला वैदिक - विज्ञान रजोगुण तथा तमोगुण के भावोंका मन, बुद्धि तथा महदादिका भी संक्रमण अन्य पर मानता है । तमोगुणी शरीरमें रज - वीर्यके भी तामस एवं अपवित्र होनेसे तथा देवता- सम्बन्ध न होनेसे चाण्डालादि - अन्त्यजोंको वह अस्पृश्य मानता है ।

मद्य - मांसादिके परित्याग वा स्नानमात्र वा स्वच्छ वस्त्रपरिधान से उनकी अस्पृश्यता दूर नहीं हो सकती । जो लोग अस्पृश्यताको सर्वथा निर्मूल मानते हैं; वे जरा बिच्छूके डंकको तो छुएँ, बिजलीकी तारको तो छुएँ; आगको तो छुएँ, हैजा वा राजयक्ष्माके रोगीको तो छूकर देखें । यदि उनके मत में मनुष्य- स्पर्शमें कुछ भी हानि नहीं; तो वह संक्रामक रोगी मनुष्यको क्यों नहीं छूते? एक चित्र में आया था कि एक लड़की राजयक्ष्माकी बीमारी वाली अपनी माताके पास जाया करती थी, उससे कुछ दूर रहकर ही उससे बातचीत करती थी; उसकी मातासे निकले हुए रोग - कीटाणु जिसे उस चित्रमें बहुत स्थूल दिखलाया गया था - उस लड़की में संक्रान्त होगये; वह लड़की भी उसी रोगकी रोगिणी होगई । वैसे ही 584तमोगुणीके स्पर्शसे भी उसकी विद्युत् सत्त्व- गुण वालेमें भी संक्रान्त होकर उसे विकृत कर देती है - इससे उसकी हानि स्पष्ट है ।

जो अन्त्यज मल - आदिके परमाणुओं से ओत - प्रोत हैं; उनके स्पर्शसे उनके रोमकूपोंसे उनकी विद्युत् हममें संक्रान्त हो जाती है, जो हानिप्रद हुआ करती है । इस कारण शास्त्रोंने उनकी अस्पृश्यता बताई है । स्पर्श तो दूर, जब कि संगतिमात्र से भी वे कीटाणु हममें संक्रान्त हो जाते हैं; वल्कि एक घर में पृथक - पृथक कमरोंमें बैठे हुए पुरुषोंका भी एक - दूसरेपर प्रभाव पड़ता है; तब स्पर्शका प्रभाव भला क्यों न पड़ेगा? किसी अस्पृश्यको शासन आदिके मदसे बलात् स्पृश्य कराना, दूसरेकी धार्मिक स्वतन्त्रताका, संविधानके प्रतिकूल अपहरण है । यह शास्त्रपर वा प्राचीन ऋषि - मुनियों पर सीधा आक्रमण है । जो छुवाछूतको नहीं मानते वे हैज़ेकी मक्खीको छूनेका आर्डर दें; प्लेग के चूहेको स्पर्श करनेका भी कानून बनवाएँ । गन्दी नालीका पानी फिल्टर करवाकर उसे पीनेका नियमन करके लोगों में पीलिया उत्पन्न करवायें । पुरीषकी सब्जी बनवाकर उसका प्रयोग नियमित करें । यदि वे उनमें स्थूल - अस्पृश्यता मानें तो शास्त्रीय अस्पृश्यता में उन्हें सूक्ष्म - अस्पृश्यता अवश्य माननी पड़ेगी; जो अन्दर तो प्रभाव करती है; परन्तु उसका स्थूल अनुभव नहीं होता । मिस हेलन नामकी पाश्चात्य रमणीने यन्त्र द्वारा प्रमाणित किया है कि पारस्परिक - स्पर्शं द्वारा एक - दूसरे के परमाणु अथवा एक - दूसरेकी विद्युत्, वा एक - दूसरेके कीटाणु, वा परस्परके रोग - बीज परस्परमें 585संक्रान्त हो जाते हैं । केवल रोगादि नहीं; बल्कि स्पर्शसे शारीरिक और मानसिक वृत्तियोंका भी परिवर्तन हो जाता है ।

स्पर्शका विज्ञान हमारे पूर्वज जानते थे- इस विषय में बृहत्पराशरस्मृतिका एक प्रमाण द्रष्टव्य है- ' आतुरे स्नान उत्पन्ने दशकृत्वो ह्यनातुरः । स्नात्वा स्नात्वा स्पृशेदेनं ततः शुध्येत् स आतुरः ' ( ६।२ ९ ) इसका यह अर्थ है कि एक पुरुष अशुद्ध हो, इधर बीमार हो, ' और उसे शुद्ध करना हो, तो शुद्ध करनेके लिए स्नान की अपेक्षा रहती है । पर वह बीमार है, स्नान करनेसे उसकी हानिकी आशङ्का है; और उसे शुद्ध करना है; तो उसकी शुद्धिका प्रकार यह बताया गया है कि कोई स्वस्थ शुद्ध - पुरुष उस अशुद्धको छुए; छूकर वह स्नान कर ले । फिर दूसरी बार उस बीमार अशुद्ध को छुए । वह अशुद्ध हो जावेगा; अतः स्वयं स्नान करे । इस प्रकार स्वस्थ - पुरुष अशुद्ध आतुरको क्रमशः दस बार छुए; और क्रमशः स्नान करता आवे; इस प्रकार करनेपर वह आतुर, बिना भी स्नानके शुद्ध हो जायगा । यह है. अस्पृश्यताका विज्ञान । इसी कारण वैखानसधर्मसूत्र में भी कहां है - ' आतुरस्य स्नाने नैमित्तिके दशकृत्वो द्वादशकृत्वो वा, तमनातुरो जलेऽवगाह्य स्पृशेत्; ततः स पूतो भवति ' ( २ | १४ | ६ )

इससे स्पष्ट हो रहा है कि एककी अशुद्धि स्पर्शसे दूसरेमें संक्रान्त हो जाती है, स्नान करने से ही फिर वह दूर होती है । ' इसी प्रकारका पराशरमाधवीय में औशनसका वचन भी मिलता है - ' ज्वराभिभूता या नारी रजसा च परिप्लुता । कथं तस्या भवेत् 586शौचं शुद्धिः स्यात् केन कर्मणा '? यहां रजस्वला, परन्तु बीमार होने से स्नान न कर सकनेसे स्त्रीकी शुद्धिका प्रकार पूछा गया है । उसपर उत्तर यही दिया गया है - ' चतुर्थेऽहनि संप्राप्ते स्पृशेद् अन्या तु तां स्त्रियम् । सा सचेलावगाह्याऽपः स्नात्वा चैव पुनः स्पृशेत् । दशद्वादशकृत्वो वा आचामेच्च पुनः पुनः । अन्ते च वाससां त्याग- स्ततः शुद्धा भवेतु सा ' अर्थात् जब उस वीमार रजस्वलाका चौथा दिन हो; तो दूसरी शुद्ध स्त्री उसे छुए; और स्वयं स्नान करे; और वह रजस्वला आचमन करे - इस प्रकार १०-१२ वार किया जावे; उन कपड़ोंको रजस्वला गिरा दे; तो वह बीमार - रजस्वला शुद्ध हो जाती है । इससे अस्पृश्यताका दूसरे पर कैसा प्रभाव तथा संक्रमण होता है - वह बहुत स्पष्ट हो रहा है ।

इसीलिए प्रत्यक्षशास्त्र - उपवेद आयुर्वेद में कहा है- ' प्रसङ्गाद् गात्रसंस्पर्शाद् निःश्वासात् सह - भोजनात् । सहशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् । कुष्ठ ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिस्यन्द एव च । औपसगिंकरोगाश्च संक्रामन्ति नरान्नरम् ' ( निदानस्थान ५।२६-३० ) यहां स्पर्श, निःश्वास तथा सहभोजन, सहशय्या, सहवास तथा सहोपवेशनसे दूसरोंके विकारोंका दूसरे में संक्रमण बताया गया है ।

फिर स्नानसे अस्पृश्यस्पर्शजन्य दोषोंका निवारण हो जाता है । पर जन्मतः अस्पृश्यकी स्नानसे शुद्धि भी नहीं होती । क्योंकि स्नानकी ऊष्मासे स्थूल शरीरस्थ कीटाणु तो दग्ध हो जाते हैं; सूक्ष्म - शरीरके नहीं; क्योंकि अग्नि स्थूलको जला सकती है, 587सूक्ष्मको नहीं । इससे स्वभाव से अस्पृश्योंके स्थूल कीटाणुओं

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के स्नानमूलक ऊष्मासे जल जानेपर भी उनके सूक्ष्म - वाह्य परमाणुओंका दाह नहीं होता; क्योंकि स्नानसे उनकी थोड़े समय के लिए बाह्यशुद्धि तो हो जाती है । पर स्नान - समाप्तिके बाद पुनः सूक्ष्म - शरीरागत आभ्यन्तरिक परमाणुओं का वाह्यशरीरके साथ पुनः सम्बन्ध प्रारम्भ हो जाता है, जिससे उनका शरीर फिर दूषित हो जाता है । इसलिए उनका बाह्य शरीर एक - चार किये हुए स्नान से शुद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि उनका सूक्ष्म शरीर ही अशुद्ध है । और वह मरनेसे, बल्कि पुनर्जन्म से पूर्व परिवर्तित नहीं हो सकता । इसलिए उनकी अस्पृश्यता अनिवार्य ही रहती है । इससे सिद्ध है कि स्नान तात्कालिकी अशुद्धिको दूर करता है; जन्ममूलक वा पारम्परिक अशुद्धिको नहीं ।

यदि स्नानसे सबकी अशुद्धि दूर हो जाती; तो जिसका सम्बन्धी मरता है, तो वह शवदहनके अनन्तर स्नान तो करता ही है; तब उसको शुद्ध हो गया हुआ माना जावे; पर शास्त्रकारोंने उसके लिए दस दिन, वा बारह, पन्द्रह दिन वा एक मास तक शुद्धि क्यों कही? वह इसलिए कि जिसकी जितनी अशुद्धिकी सीमा है; वह बहुत बार स्नानसे भी दूर नहीं होती । इस प्रकार चाण्डलादिकी तथा ‘ अङ्गादङ्गात् सम्भवसि.. आत्मा वै पुत्रनामासि ' ( निरुक्त ३ | ४ | २ ) इस प्रमाणानुसार उनके अङ्गभूत सन्तानोंकी अस्पृश्यता मृत्युपर्यन्त धर्मशास्त्रोंसे नियमित है ।

स्पर्श तो दूर, बल्कि पारस्परिक भाषण और निश्वाससे भी 588दूसरों के परमाणु हम पर आक्रमण करते हैं । ऐसा राजयक्ष्माके चित्रों में देखा जा सकता है । यदि आप प्रत्यक्ष देखना चाहें तो अपने श्वासोंको शीतकाल में देखिये कि वे कैसे स्थूल रूप से दूर तक आते दीख पड़ते हैं । स्वामी दयानन्दजीने भी लिखा है— ' आर्योंके घर में जब [ शूद्र स्त्री - पुरुष ] रसोई बनावें; तब मुख बाँधके बनायें; क्योंकि उनके मुखसे उच्छिष्ट और उनका मुखसे निकला श्वास भी अन्न में न पड़े, ( सत्यार्थप्रकाश १० पृ ० १६६ ) यहाँ स्वामीजीने शूद्रके श्वासकी शुद्धि बताकर उनकी अस्पृश्यता सूचित की है, पर यह ध्यान नहीं दिया कि जब उनके भीतरसे आये हुए श्वास इतने अशुद्ध हैं; तो जो उनके वे अशुद्ध परमाणु उनके हाथों तथा रोमकूपोंसे निकल रहे हैं- -क्या वे अन्नको दूषित न करेंगे? यहाँ उन्होंने सूक्ष्मता पर ध्यान नहीं दिया कि स्थूल - श्वासोंसे उनके साढ़े तीन करोड़ रोमकूपों से निकले हुए सूक्ष्म - परमाणु कितनी हानि कर सकते हैं? यह वे नहीं सोच सके कि सूक्ष्म, स्थूलकी अपेक्षा हानि अधिक पहुँचाता है । बमसे युद्धों में कितनी हानि हुई, और परमाणु - बससे कितनी –यह वे अब होते तो स्वयं जान जाते । यह बातें स्थूल - बुद्धि से पता नहीं लगती, किन्तु सूक्ष्म - बुद्धिसे ।

यह तो हुई शूद्रकी बात । शूद्र तो स्पृश्य है; पर चाण्डालादिको अस्पृश्य तो स्वा ० दयानन्दजी भी मानते थे । यों तो उनके एतद्वि- षयक उद्धरण बहुत अधिक हैं; जिन्हें हम अन्य पुष्पमें

करेंगे, पर यहाँ हम उनके एक - दो उद्धरण उद्धृत करते ' उदुधृत 589प्रसिद्ध ग्रन्थ ' सत्यार्थप्रकाश ' के ११ वें समुल्लास में वे लिखते हैं- ' जिन नीच स्त्रियोंको [ शास्त्रों में ] छूना नहीं [ लिखा ] उनको अतिपवित्र उन्होंने [ वाममार्गियोंने ] माना है । जैसे - शास्त्रों में रजस्वला [ रजस्वला, चाण्डाली, ` चर्मकारी, रजकी, पुक्कसी ] आदि स्त्रियोंके स्पर्शका निषेध है, उनको वाममागियोंने अतिपवित्र माना है ' ( पृ ० १७७ ) ' रजस्वला आदि ' यहाँ आदि पदसे स्वा ० दयानन्दजी अस्पृश्य - स्त्रियों को निम्न पद्यसे बताते हैं — ' रजस्थला पुष्करं तीर्थं, चाण्डाली तु स्वयं काशी । चर्मकारी प्रयागः स्याद्, रजकी मथुरा मता । अयोध्या पुकसी प्रोक्ता ' ( पृ ० १७७ ) यहाँ स्वामीजीने रजस्वला, चाण्डाल आदिका स्पर्श - निषेध शास्त्रीय माना है । अब उन्हींको स्पृश्य मानते हुए उनके अनुयायी वाममार्गी सिद्ध होते हैं । पर वाममार्गियों के पद्यका स्वामीजी अर्थ नहीं जान सके; उनका उन्होंने उल्टा अर्थ लगा लिया है । वहाँ तो यह आशय था कि जहाँ तान्त्रिक - पुस्तकोंमें रजस्वला - गमनसे सद्गति लिखी हो; वहाँ पुष्कर - तीर्थ के गमनसे वैसा फल इष्ट होता है । जहाँ चाण्डाली - गमनसे मुक्ति लिखी हो; वहाँ काशीगमन से उक्त फल - लाभ समझना । यह वहाँ परिभाषा - विशड़ीकरण था; जिसको वे समझ न सके ।

अस्तु । अब उनके वेदभाष्यसे एक उद्धरण देकर इस निबन्धको हम समाप्त करते हैं- ' वायवे चाण्डालम् ' ( यजुः ३०।२१ ) इस मन्त्र के अन्वय, पदार्थ, भावार्थ स्वामीजीने इस प्रकार लिखे हैं - ' वायुस्पर्शाय चाण्डालं परासुव । चाण्डालस्य शरीरागतो वायुदु - र्गन्धत्वान्न सेवनीयः । वायुके स्पर्शके अर्थ भंगीको दूर कीजिये । भंगीके

590श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

शरीरमेंसे आाया वायु दुर्गन्धयुक्त होनेसे सेवने योग्य नहीं होता ' । यहाँ स्वामीजीने ' चाण्डाल ' का अर्थ ' भंगी ' किया है, उसके शरीरकी वायुको सेवनके - अयोग्य माना है, शरीरका भाव उसके रोमकूपोंसे आया वायु है | इस प्रकार उनके अन्य भी वहुतसे उद्धरण हैं— यहाँ विस्तारवश नहीं लिखे गये ।

फलतः अस्पृश्यता जहाँ वेदादिशास्त्र सम्मत है; वहाँ विज्ञान- सिद्ध भी है ।

( ७४ ) हिन्दुधर्ममें परलोकवाद ।

हिन्दुधर्ममें जो इतनी सूक्ष्मताएँ हैं उसका यह भी कारण है कि - उसमें परलोकवाद भी है । मुनियोंकी केवल स्थूल दृष्टि इस लोक तक सीमित नहीं; उनकी सूक्ष्म दृष्टि सूक्ष्म परलोकमें भी पहुँच गई । हम जहाँ इस समय हैं; वह इहलोक है । जहाँ मरकर कुछ समय रहेंगे, वह परलोक है । इस ब्रह्माण्ड में मुख्य लोक १४ हैं । ऊपर के लोकोंमें देवता रहते हैं; नीचेके लोकोंमें दैत्य; मध्य में है मनुष्य - लोक । ऊर्ध्व - लोकोंमें स्वर्गादि - लोक अन्तभूत हैं । वही परलोक है । भूलोक में सात द्वीप हैं; उनमें जम्बूद्वीप भारतवर्षं है, पहले परलोक में पाप - पुण्योंका फल भोगकर अवशिष्ट कर्मों से मनुष्य - लोकमें प्राप्त हो जाता है । द्युलोकमें जो सूर्य, चन्द्र, वा तारे दीखते हैं- यह सभी परलोक हैं । कर्मानुसार मृतक पुरुष उनमें पहुँचता है I

। परलोकमें सूक्ष्मतावश उनकी शक्ति मनुष्यसे अधिक रहती है । इसका कारण यह है कि जीवात्मा जब तक इस लोकके स्थूल - शरीरसे युक्त रहता है; तब तक उसमें शक्ति भी 591सीमित रहती है । पर जब वह स्थूल शरीरको छोड़कर सूक्ष्म होकर पितृलोक में जाता है; उसकी शक्ति बढ़ जाया करती है । जैसे- दीपक जब घड़े में रखा रहता है, तब तक उसका प्रकाश स्थगित रहता है । घड़ेसे दीपकको बाहर निकालने पर उसकी प्रकाश - शक्ति बढ़ जाया करती है । वैसे ही परलोकमें प्राप्त पितर हमारी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होते हैं । तभी आजकल परलोक- विद्या निकली है । उससे असाध्य रोगियोंका उपचार उन परलोक- प्राप्तों से पूछा जाता है । वे अपनी अधिक शक्तिवश वह उपचार हमें बताते हैं - जिससे वे असाध्य रोगी ठीक हो जाते हुए देखे जाते हैं ।

इन पितरोंसे भी उच्चकोटि में रहनेवाले देवता अधिक - शक्ति- शाली हुआ करते हैं । उनसे हम और भी अधिक लाभ ले सकते हैं । इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ' चतुर्थपुप्प हमसे मँगाकर ' परलोक विद्या ' विषय देखें ।

अस्तु, जब परलोक भी है; और हमारा आत्मा परलोक के स्वर्गादि उच्च स्तरों में भी जा सकता है, नरक- आदि निम्न स्तरों में भी; तब हमें अपने सब कर्म शुद्धतासे करने पड़ते हैं । तभी हिन्दुधर्म में छुवाछूत भी है, कर्मकाण्डका अविज्ञेय प्रवाह भी है, जिसे लोग बड़ा लम्बा गोरखधन्धा अथवा जगड्वाल कहते हैं । दूसरे सम्प्रदायोंमें सूक्ष्म दृष्टि न होने से केवल स्थूल दृष्टि ही होने से पुनर्जन्मवाद, वा गतजन्मवाद नहीं माना जाता है । किन्हीं में नाम- मात्र से माना जाता है । पर अपने यहाँ ऋषि - मुनियोंने सूक्ष्मदृष्टि- वश कुछ भी नहीं छोड़ा, सब ज्ञातव्य ज्ञात कर लिया है; अतः हमें उनके उपदेशानुसार चलने से ही परम कल्याण प्राप्त होगा ।

592( c ) विविध पर्वोका विज्ञान

( १ ) संवत्सरका आरम्भ ।

पहले हम हिन्दुधर्म - सनातनधर्मके श्रीगणेश - मङ्गलपर लिख- कर, फिर हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध विषय शिखा, यज्ञोपवीतादिके रहस्य बताकर, उसके बाद षोडशसंस्कारोंका रहस्य और फिर ' हिन्दुधर्मके आचार - विचारोंका वैज्ञानिक रहस्य ' भी बता चुके; इससे आजकलकी जनताकी एतद्विपयक जिज्ञासा सम्भवतः पूर्ण होगई होगी । अब हम हिन्दुधर्मके विविध पर्वोका विज्ञान बताना आरम्भ करते हुए पहले संवत्सरके आरम्भपर लिखते हैं, इसमें सृष्टिसंवत्सर के विषय में बताया जायगा । 14

विविधपर्व होते हुए भी हमने इसमें प्रसिद्ध पर्व ही लिये हैं; नहीं तो यह ग्रन्थ बहुत विशाल हो जाता । इसमें चैत्रमासमें हमने १ संवत्सरका आरम्भ, उसीके प्रकरणसे २ मास और वारोंके नामोंके रहस्य तथा ३ श्रीरामनवमी लिखे हैं । फिर आषाढ़ मासमें ४ श्रीव्यासपूर्णिमाको लिया है । श्रावण - मासमें ५ श्रावणी एवं रक्षाबन्धनको लिया है । भाद्रपद मास में ६ श्रीकृष्ण- जन्माष्टमीको लिया है । आश्विन - मासमें ७ पितृपक्ष तथा ८ विजयदशमीको लिया है । कार्तिक मासमें 8 दीपावली, १० गोपाष्टमीको और मार्गशीर्ष मास में ११ गीताजयन्तीको और माघ मास में १२ गणेशचतुर्थी एवं १३ वसन्तपञ्चमीको लिया है ।

593संवत्सरका प्रारम्भ

२३३ फाल्गुन मासमें १४ शिवरात्रि तथा १५ होलीको

लिया है । इनमें कई पर्वोंसे सम्बद्ध अन्य विषयोंपर भी लिखा

गया है, आशा है — इससे ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के पाठकोंको

कुछ लाभ हो प्राप्त होगा ।

अब संवत्सरपर लिखते हैं । ब्रह्मपुराणमें

कहा है — ' चैत्रे मासे जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि ' अर्थात् चैत्र शुक्ला प्रतिपद्को ब्रह्माने सृष्टिका आरम्भ किया । तब जब यह सृष्टिके आरम्भका दिन है; तब प्रजाका नये कार्यारम्भका दिन भी हुआ; इसीलिए इसको उत्साहसे मनाया भी जाता है । इस दिन ब्राह्मणगण नये संवत्सरका भविष्यफल पंचांगोंसे सुनाते हैं, जिससे सृष्टि- संवत्सरका ज्ञान भी हो जाता है । वेदके ब्राह्मणभाग में संवत्सरको प्रजापतिकी प्रतिमा बताया गया है - ' स [ प्रजापतिः ] इमं ( संवत्सरं ) वा आत्मनः प्रतिमामसृति, यत् - संवत्सरमिति, तस्माद् आहुः - प्रजा- पतिः संवत्सरः इति, आत्मनो हि एतं [ संवत्सरं ] प्रतिमामसृजत, यद्वेदेव चतुरक्षरः संवत्सरः, चतुरक्षरः प्रजापतिः, तेन उ ह एव अस्य [ प्रजापतेः ] एष ( संवत्सरः ) प्रतिमा ' ( ११ | १ | ६ | १३ ) यहां संवत्सरको प्रजापतिकी प्रतिमा ( मूर्ति ) बताया गया है । यह ठीक भी है; क्योंकि इसी दिन प्रजापतिने सृष्टिका नवनिर्माण किया । इसीदिन नवरात्रों का आरम्भ भी होता है, अष्टमीको दुर्गाष्टमी मनाई जाती है । हमें भी धार्मिक, सामाजिक, एवं राजनीतिक नवनिर्माणके कार्य में लग जाना चाहिये, जिससे देशकी उन्नति हो ।

इस देशमें संवत् बहुत से जारी हुए; पर आजकल विक्रमका 594संवत् २०१३ है, और शालिवाहनीय शक १८८ तथा ईसवी संवत् १६५६ है, यह अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । महाभारतके युद्धके बादसे युधिष्ठिर संवत्का भी प्रचलन रहा । श्राजकल कलियुग — जो महाभारत के युद्ध से प्रारम्भ हुआ था, उसका ५०५६ संवत्सर है । इस कल्पका सृष्टिसंवत्सर १,६७,२६,४६, ०५६ है; इससे यह सिद्ध हो रहा है कि -- हिन्दुजाति तथा उसका सनातन - धर्म अत्यन्त प्राचीन है ।

हमने एक जैनीकी पुस्तकपर सम्भवतः महावीर - संवत् लिखा हुआ देखा था; जिसके अङ्क चार - पांच पंक्तियोंमें जाकर समाप्त हुए थे; यह हमें देखकर बहुत हँसी आई । इससे उनका यह भाव प्रतीत हुआ कि - जैनधर्म सबसे प्राचीन है; पर ऐसी बात नहीं । सबसे प्राचीनतम धर्म सनातन हिन्दुधर्म ही है । उसके आरम्भ बतानेमें संख्या भी समाप्त हो जाती है । आर्यसमाजी भी आर्यसृष्टि - संवत्सर ऊपर कहा ही लिखते हैं; पर यह याद रखना चाहिये कि - यह इस कल्पका सृष्टि - संवत्सर है । कल्पोंकी संख्या भी नियत नहीं है कि इतने हैं, और आगे इतने होने हैं; अतः हमारा यह सनातनधर्म अनादि तथा अनन्त है । हमें एतद्विषयक ज्ञान अवश्य रखना चाहिये; तदनुसार लिखा जाता है-

इस कल्पका सृष्टि - संवत्सर ।

जहां पुराणोंने प्राचीन इतिहास बताकर हमारी जाति तथा हमारे धर्मकी प्राचीनता बताई है, वहां कल्प और सृष्टि- संवत्सर की गणना बताकर भी इस हिन्दुजातिकी अत्यन्त प्राचीनता, अर्थात्

595कल्प एवं सृष्टि - संवत्सर

इसे सारे संसारकी जातियों वा धर्मोका आदिम - उद्गम, आदि - मूल सिद्ध कर दिया है । केवल बिना हिसावके पंक्तियां भरनेके लिए अंक लिख नहीं मारे, किन्तु उसका पूरा - पूरा हिसाव दिया है । स्वा ० दयानन्दजीने भी वह हिसाव पुराणोंसे ही लिया है, पर पुराणोंके पूर्ण ज्ञान न होने से उनके हिसावमें कुछ भूल रह गई है; पर उनकी पुस्तकोंके आरम्भ में आर्यसृष्टि - संवत्सर लिखते हुए वह भूल ठीक कर डाली गई है; बल्कि हमने ऋग्वेदादि- भाष्यभूमिकाका एक संस्करण निकला हुआ देखा था; जिसमें स्वा ० दयानन्दजीकी वह भूल निकाल दी गई थी । अस्तु ।

सनातनधर्मके प्रत्येक कर्म में एक संकल्प पढ़ा जाता है, वह यह है-

ॐ तत्सदद्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशान्तर्गते कुमारिकानामक्षेत्रे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे बौद्धावतारे ' ।

इसीके द्वारा सृष्टिसंवत्सर सरलता तथा संक्षेपसे प्राप्त हो जाता है । इसमें वर्तमान श्वेतवाराहकल्प और उसमें भी वैवस्वत- मन्वन्तर बताया गया है; और ब्रह्माका द्वितीयपरार्ध बताया गया है । इसकी स्पष्टता की जाती है-

इस पर यह जानना चाहिये कि - ब्रह्माजी की अपने परिमाण से सौ वर्षकी आयु होती है ॥ ब्रह्माण्डकी सृष्टिसे लेकर महाप्रलय तक इतना समय व्यतीत होता है । ब्रह्माजीका प्रथम - परार्ध बीत चुका है; अर्थात् उनकी आयु पचास साल बीत चुकी । अब द्वितीय परार्धका 596प्रथम कल्प उनके ५१ वें वर्षका प्रथम दिन यह वर्तमान है, जिसका नाम श्वेतवाराहकल्प है । उसकी भी १३ घड़ियाँ, ४२ पल, ३ विपल, ४३ प्रतिविपल बीत चुके हैं । यही श्रीमद्भागवत में लिखा है- ' एवं विधेरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः । अपक्षितमिवास्यापि ( ब्रह्मणः ) परमायुर्वयः - शतम् । यदर्धमायुषस्तस्य परार्धमभिधीयते । पूर्वः परार्धोपक्रान्तो ह्यपरोऽद्य प्रवर्तते ' ( ३।११।३२-३३ ) अयं तु कथितः कल्पो द्वितीयस्यापि भारत! वाराह इति विख्यातः ' ( ३।११।३६ ) इसी प्रकार मार्कण्डेयपुराण ( ४६।४२-४३-४४ ) में भी कहा है ।

एक कल्पमें एक हजार चतुर्युग होते हैं । उन एक हज़ार चतुर्युगों में चौदह मन्वन्तर होते हैं । १ सत्य, २ नेता, ३ द्वापर, ४ कलि - ये चार युग हैं । १४ मन्वन्तरोंके नाम यह हैं -

– १ स्वा- ७ वैवस्वत, सावर्णिक, ६ दक्षसावर्णिक, १० ब्रह्मसावर्णिक, यम्भुव, २ स्वारोचिष, ३ उत्तम, ४ तामस, ५ रैवत, ६ चाक्षुष, ११ धर्मसावर्णिक, १२ रुद्रसावर्णिक, १३ देवसावर्णिक, १४ इन्द्र- सावर्णिक | यह वर्णन श्रीमद्भागवत ( ८ स्कं ० १, ५, १३ अध्याय ), मनुस्मृति ( १।६१-६२-६३ ), विष्णुपुराण ( ३।२ ) तथा हरिवंशपुराण ( १७ ) में देखा जा सकता है । स्वा ० दयानन्दजीने भी यह नाम पुराणोंसे ही उद्धृत करके अपनी ऋ. भा. भू. ( २१ पृष्ठ ) में लिखे हैं । मनुस्मृति में भी केवल ७ मन्वन्तरोंके ही नाम हैं, सभी के नहीं । पुराण मनुस्मृति से अर्वाचीन नहीं हैं । वेद और पुराण समानकालीन हैं । जैसे वेदोंको अग्नि, वायु, रवि आदिसे दुहा गया, वैसे पुराणोंके वक्ता भी अग्नि, वायु, रवि आदि हैं । प्रति-

597कल्प एवं सृष्टि - संवत्सरं IIII द्वापरमें उत्पन्न व्यास इनका संस्करण करते हैं । याधुनिक ( २ वां ) संस्करण श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने किया है । व्यास यह उपाधि है; उत्पत्ति तो पुराणोंकी भी वेदोंके साथ ही है । इसी कारण वेद में पुराणोंका नाम और पुराण में वेदों का नाम मिलता है । व्यास तो पुराणोंके वेदकी तरह विभागकर्ता ही हैं, निर्माता नहीं । इसलिए मनुस्मृति, रामायणादि प्राचीन ग्रन्थों में पुराणोंका नाम देखनेसे हैरान न होजाना चाहिये । इसलिए मनुस्मृति में भी मन्वन्तर आदि का वर्णन पुराण- मूलक ही है । तभी मनुस्मृति में ' पुराणानि खिलानि च ' ( ३।२३२ ) यहां पुराणों का वर्णन भी है, और मनुस्मृति भी सृष्टिके आदि में बनी हुई है । यह स्वामी दयानन्द भी मानते हैं- देखिये सत्यार्थप्रकाशमें ११ वें समुल्लास का आरम्भ ।.

पुराणोंका ही आश्रय लेकर ' सूर्य - सिद्धान्त ' ( १।१३, १४, १५, १६, १८, १ ९, २०, २१, २२, २३ पद्यों ) में भी कल्पका वर्णन आया है । तदनुसार वर्तमान ( श्वेतवाराह ) कल्पके स्वायम्भुव यादि छः मन्वन्तर अपनी - अपनी सन्ध्याओं समेत बीत चुके हैं । कल्पकी सन्ध्यासमेत सात सन्ध्याएं बीत चुकी हैं । वैवस्वत मन्वन्तरके ( जो आजकल चालू है ) ७१ महायुगों में २८ सत्ययुग, २८ त्रेता, २८ द्वापर, और २७ कलियुग बीत चुके हैं । अब अट्ठाइसवां कलियुग, उसका भी प्रथम चरण चालू है, जिसे आज ( सं ० २०१२ वि ० में ) ५०५६ वर्ष बीत चुके हैं । कलियुग के आरम्भमें ३६००० वर्षकी सन्ध्या हुआ करती है, अभी उस सन्ध्याकालके बीतने में ३०,६४४ वर्ष शेष हैं ।

598एक मन्वन्तरमें ७१ चतुर्युग ( महायुग ) होते हैं; प्रत्येक - युगमें सन्ध्या तथा सन्ध्यांश हुआ करता है । एक कल्पका वर्षसमूह ब्रह्माजीका एक दिन हुआ करता है I

। कल्पके वर्ष ४,३२,००,००,००० होते हैं । आज सं ० ( २०१२ ) तक इस कल्पके १,६७,२६,४६, ०५६ वर्ष बीत चुके हैं, तथा २,३४,७०,५०,६४४ वर्ष शेष हैं । यह विषय श्रीमद्भागवतपुराण आदिमें स्पष्ट है । इस विषय में कुछ प्रसारण द्रष्टव्य हैं-

' कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्विधम् । दिव्यैर्द्वादशभिर्वर्षैः

* यहांपर युगोंके वर्ष ' दिव्य ' ( देवताओं के ) कहे गये हैं । देवता तथा मनुष्योंकी वर्षव्यवस्था भिन्न - भिन्न हुआ करती है । जैसे कि - '

रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः । ग्रहस्तनोदगयनं रात्रिः स्याद, दक्षिणायनम् ' ( मनुस्मृति १।६७ ) । यहां पर स्पष्ट कहा है कि मनुष्योंका साल ( ३६० दिन ) देवताओंका एक दिन - रात होता है । ऐसा ही ' सूर्य- सिद्धान्त ' ( १।१३ ) में भी कहा है । तब ' श्रीमद्भागवत ' के ' दिव्यैर्द्वादश- भिर्वर्षैः ' ( ३।११।१८ ) तथा मनुस्मृतिके ' एतद् द्वादशसाहस्रं देवानां युगम् ' ( १।७१ ) के कहे हुए चारों - युगों के १२ हज़ार वर्ष देवताओंके हैं । इनके मनुष्य - वर्ष बनानेकेलिए ३६० से गुणा करना पड़ेगा । तब १२,००० × ३६० इनका गुणनफल ४३,२०,००० यह चतुर्युग मनुष्य- वर्ष बनेंगे ।

यदि उक्त बारह हज़ार वर्ष देवताओंके न मानकर मनुष्योंके माने जावें, तब तो कलियुग समाप्त हो चुका हुआ माना जावेगा, और सत्ययुग को भी समाप्तप्राय मानना पड़ेगा । क्योंकि — कलियुगकी दिव्यवर्ष -संख्या १२०० है, और सत्ययुग ४८०० दिव्यवर्षोंका है । महाभारत युद्धकालसे प्रारम्भ हुए कलियुगको २०५६ साल बीत चुके हैं - यह सर्वसम्मत बात

599कल्प एवं सृष्टि - संवत्सर

सावधानं निरूपितम् ॥ चत्वारि, त्रीणि, द्वे, चैकं कृतादिषु यथा- क्रमम् । संख्यातानि सहस्राणि द्विगुणानि शतानि च ॥ सन्ध्यां- शयोरन्तरेण यः कालः शतसंख्ययोः । तमेवाहुर्युगं तज्ज्ञा यत्र धर्मो विधीयते ' ( ३।११।२० ) त्रिलोक्या युगसाहस्र वहिः आ ब्रह्मणो- दिनम् । तावत्येव निशा तात! यन्निमीलति विश्वसृक् ( ३ । ११ । २२ ) निशावसाने आरब्धो लोककल्पोनुवर्तते । यावद् दिनं भगवतो मनून् भुञ्ज श्चतुर्दश । स्वं स्वं कालं मनुर्भुक्त साधिकां ह्यक- सप्ततिम् ' ( ३।११।१८-२०, २२-२४ ) । यही बात मनुस्मृति ( १।६८-७४, ७६-८० ) में तथा महाभारत ( वनपर्व १८८ / २२-२४,२६ ) तथा शान्तिपर्व मोक्षधर्मपर्व ( २३१।१६-१७,१६-२१, २६-३१ ) में भी स्पष्ट की गई है ।

है | अतः दिव्य वर्षोंको मनुष्यवर्ष मानना ठीक न होकर देववर्ष ही मानना ठीक है । कलियुगके ४८०० वर्ष तथा सत्ययुगके १२०० वर्ष मानना भी गलत है । क्योंकि — कलियुग सब युगोंले सब बातों में छोटा होता है । कलियुगसे दुगुना द्वापर, तिगुना ग्रेता, और चौगुना सत्य युग होता है — यह सर्वशास्त्रसम्मत बात है । मनुस्मृति व्यादिके अनुसार सत्य- युगके ४८००, त्रेताके ३६००, द्वापरके २४००, और कलिके १२०० -दिव्य वर्ष होते हैं । इन्हें जोड़ने पर १२,००० यह चतुर्युगोंके दिव्य वर्ष होते हैं । इन्हें ३६० से गुणा करनेपर ४३,२०,००० मनुष्य वर्ष होते हैं ।

देववर्ष और मनुष्य की भिन्नतामें यह प्रमाण हैं— ' मासेन स्याद अहोरात्रः पैत्रः, वर्षेण दैवतः ' ( अमर ० १।७।२१ ) अर्थात् मनुष्योंका एक मास पितरोंका एक दिन - रात होता है । मनुष्यों का एक साल देवताओंका एक दिन - रात होता है । बोधायनगृह्यपरिभाषासूत्र में भी कहा है - ' संवत्सरो वै देवानामहोरात्रम् । तस्य एतद उदगयनम् अहः,

600अव हम इनका विवरण लिखते हैं । ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के विज्ञ - पाठक सावधानता से देखें-

( सं ० २०१२ वि ०, कलियुग ५०५६ सन् १ ९ ५६ )

गत छः मन्वन्तरोंके वर्ष १,८४,०३,२०,०००

कल्पके मानुषी - वर्णोंका विवरण ।

इनकी सात सन्धियों के वर्ष १,२०,६६,०००

७ वें मन्वन्तरके गत २७ चतुर्युगों वर्ष ११,६६,४०,०००

२८ त्रियुगोंके भुक्त वर्ष ३८,८५,०००

वर्तमान २८ वें कलिके मुक्त वर्ष ५,०५६

भुक्त कल्पके वर्षोंका योग १,६७,२६,४६,०५६ दक्षिणायनं रात्रिः ' ( १।२।१३ ) । तैत्तिरीयब्राह्मण में भी -

— ' एकं वै एतद देवानामहः, यत् संवत्लरः ' ( ३।६।२२ ( १ ) यही कहा है । इसकी ध्वनि ऋग्वेदसं ० में भी मिलती है- ' मानुषाणि युगानि पान्ति मर्त्यम् ' ( २४ ) यहां पर मय के साथ मानुष - युगों का सम्बन्ध बताया गया है । महाभारत शान्तिपर्व ( २३१।१६ - १७-१६ ) में भी मनुष्यवर्ष और दिव्य- वर्षोंका भेद स्पष्ट दिखलाया गया है । इससे जो लोग मानते हैं कि— २००० विक्रमी संवत् में कलियुग समाप्त होगया- उन श्रीराजनारायण आदि का पक्ष खण्डित हो गया । इस विषय में हम किसी अन्य पुष्पमें प्रकाश डालेंगे । इससे देवता और मनुष्योंका भेद भी सिद्ध होगया । आर्यसमाजी आदि देवता और मनुष्योंका भेद नहीं मानते, पर यह बात शास्त्रविरुद्ध है - इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' का चतुर्थ- पुप्प देखें । उसमें ' क्या विद्वान् मनुष्य ही देव हैं '? ' देवता और मनुष्योंकी भिन्नता ' यह दो निबन्ध पढ़ लेनेसे सब संशय दूर हो जायेंगे ।

In English

The Science of Untouchability and Contagion

This chapter explains untouchability through the lens of spiritual and physical contagion. It argues that impurities are transmitted via touch, breath, and proximity, affecting both the gross and subtle bodies.

This chapter answers

  • Why is untouchability practiced in hinduism?
  • How does contagion work according to vedic science?
  • Can bathing remove ritual impurity?
  • What is the difference between gross and subtle impurities?

Also written: Sprishta, Vigyana, Sprishta Vigyana, स्पृश्ता - विज्ञान

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 583–600 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

पृष्ठ 583 से मूल ग्रन्थ पढ़ें →