अग्नि पुराण — पृष्ठ 171–180

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 171–180

पृष्ठ 171

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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः स्नपयेन्मूलमन्त्रेण देवं पञ्चामृतैरपि । कलशान्निःसृतं तोयं दूर्वाग्रं संस्पृशेन्नरः । परिमृज्य पटेनाङ्गं सवस्त्रं मण्डलं नयेत् । प्रक्षाल्य हस्तौ रेखाश्च तिस्रः पूर्वाग्रगामिनीः । अर्थ्योदकेन सम्प्रोक्ष्य योनिमुद्रां प्रदर्शयेत् । पात्राण्यासदयेत्पश्चाद् दर्भस्रुक्स्रुवकादिभिः । प्रणीतां प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थालीघृतादिकम् । प्रणीता प्रोक्षणीपात्रे न्यसेत्प्रागग्रगं कुशम् । प्रणीतां स्थापयेदग्नेर्द्रव्याणां चैव मध्यतः । चरुं च श्रपयेदग्नौ बह्माणं दक्षिणे न्यसेत् । वैष्णवीकरणं कुर्याद्गर्भाधानादिना ततः " । नामादिसमावर्तनान्तं जुहुयादष्ट चाऽऽहुतीः । १६७ शुद्धोदं मध्यकुम्भेन देवमूर्ध्नि विनिक्षिपेत् ॥२२ ॥

शुद्धोदकेन पाद्यं च अर्घ्यमाचमनं ददेत् ॥ २३ ॥

तत्राभ्यर्च्याचरेद् होमं कुण्डादौ प्राणसंयमी ॥ २४ ॥

दक्षिणादुत्तरान्ताश्च तिस्रश्चैवोत्तराग्रगाः ॥२५ ॥

ध्यात्वात्मरूपं चाग्नि तु योन्या कुण्डे क्षिपेन्नरः ॥ २६ ॥

बाहुमात्राः परिधय प्रस्थद्वयं तण्डुलानां अद्भिः पूर्य प्रणीतां तु प्रोक्षणीमद्भिः सम्पूर्य कुशानास्तीर्य पूर्वादौ गर्भाधानं पुंसवनं पूर्णाहुतिं प्रतिकर्म इध्मव्रश्चनमेव च ॥२७ ॥

युग्मं युग्ममधोमुखम् ॥ २८ ॥

ध्यात्वा देवं प्रपूज्य च ॥२९ ॥

प्रार्च्य दक्षे तु विन्यसेत् ॥ ३० ॥

परिधीन् स्थापयेत्ततः ॥ ३१ ॥

सीमन्तोन्नयनं जनिः ॥ ३२ ॥

स्रुचा स्रुवसुयुक्तया ॥ ३३ ॥

द्वारा पञ्चामृत से विष्णु को स्नान कराना चाहिए । मध्य कलश से शुद्ध जल को निकालकर देवता के सिर पर छिड़के ॥२२ ॥ स्वयं यजमान कलश से निकले हुए जल एवं दूर्वाग्र का स्पर्श करे । तत्पश्चात् देवता को शुद्ध जल का पाद्य, अर्घ्य

और आचमन दे ॥२३ ॥ किसी वस्त्र से हरि का अंग सुखाकर वस्त्र आदि पहनाकर मण्डल में ले जाय । वहाँ भलीभाँति पूजा

करके वह प्राण - संयमी व्यक्ति अग्नि में हवन करे || २४ || दोनों हाथ धोकर कुण्ड में या वेदी पर तीन पूर्वाग्र रेखाएँ खींचे । ये रेखाएँ दक्षिण की ओर आरम्भ करके क्रमशः उत्तर की ओर से खींची जायँ । फिर इन्हीं के ऊपर तीन उत्तराग्र रेखाएँ खींचे । ( ये भी दाहिने से आरम्भ करके क्रमशः बायें खींची जायँ । ) ॥२५ ॥ अर्ध्य जल से सम्प्रोक्षण ( जल छिड़क ) कर योनिमुद्रा

दिखलाये । आत्मरूप का ध्यान करके कुण्डयोनि से कुण्ड में अग्नि छोड़े ॥२६ ॥ तत्पश्चात् कुशा, स्रुक् और स्रुवा आदि से

पात्रों का स्पर्श करे । भुजा के बराबर लम्बी परिधियाँ, कुठार, प्रणीता, प्रोक्षणीपात्र, आज्यस्थाली, घी, दूध आदि, दो पसेरी चावल, दो पात्रों में भरकर औंधा करके रख दे ॥ २७-२८ ॥ प्रणीता और प्रोक्षणीपात्र पर पूर्व की ओर आगे का हिस्सा करके कुशों को रख दे । प्रणीता को जल से भरकर अग्नि देवता का आह्वान करके विधिवत् पूजन करना चाहिए । प्रणीतापात्र को अग्नि तथा यज्ञार्थ रक्षित द्रव्यों के मध्य में रखना चाहिए । प्रोक्षणी को जल से भरकर उसे दक्षिण भाग में रखे ॥२९ -३० ॥ अग्नि पर चरु को रख दे । ब्रह्मा को अग्नि से दक्षिण दिशा में रखे । पूर्व की ओर कुशा फैलाकर उस पर परिधियों को रख दे ॥३१ ॥

इतनी क्रिया के अनन्तर गर्भाधान आदि से वैष्णवीकरण करे । गर्भाधान, पुंसवन, समीन्तोन्नयन, जन्म, नामकरण, चूड़ाकरण, व्रतबन्ध और समावर्तन संस्कार के लिए आठ आहुतियाँ दे । प्रत्येक हवन कर्म में स्रुक् और खुवा में संयुक्त कर अर्थात् स्रुक् और स्रुवा से स्पर्श करते हुए पूर्णाहुति दे ॥३२-३३ ॥ कुण्ड के मध्य में ऋतुमती लक्ष्मी का ध्यान करके हवन करना चाहिए । १ क. घ. ङ. च. कूर्चाग्रं । २ ख. त्वान्नरु ' । घ. ' त्वाग्निरु ' । ३ ख. घ. योन्यां । ४ क. ' दग्रे द्र ' । ५ क. घ. ङ. च. नरः । ६ ख. घ. ङ. च. पूर्णाहुतीः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 172

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१६८ अग्निपुराणम् कुण्डमध्ये ऋतुमतीं लक्ष्मीं सञ्चिन्त्य होमयेत् ।

सा योनिः सर्वभूतानां विद्यामन्त्रगणस्य च ।

प्राच्यां शिरः समाख्यातं बाहू कोणे व्यवस्थितौ ॥

उदरं कुण्डमित्युक्तं योनिर्योनिर्विधीयते । पञ्चाधिकास्तु जुहुयात् प्रणवान् मुष्टिमुद्रया । ईशान्तं मूलमन्त्रेण आज्यभागौ तु होमयेत् व्याहृत्या पद्ममध्यस्थं ध्यायेद् वह्निं तु संस्कृतम् ' चन्द्रवक्त्रं च सूर्याक्षं ' जुहुयाच्छतमष्ट च कुण्डलक्ष्मीः समाख्याता प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका ॥ ३४ ॥

विमुक्तेः कारणं वह्निः परमात्मा तु मुक्तिदः १ ॥ ३५ ॥

I ईशानाग्नेयकोणे तु जङ्घे वायव्यनैर्ऋते ॥ ३६ ॥

गुणत्रयं मेखलाः स्युर्ध्यात्वैवं समिधो दश ॥३७ ॥

पुनराधारौ जुहुयाद् वाय्वग्न्यन्तं ततः श्रयेत् ॥ ३८ ॥

। उत्तरे द्वादशान्तेन दक्षिणे तेन मध्यतः ॥ ३ ९ ॥ । वैष्णवं सप्तजिह्वं च सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥४० ॥

। तदर्थं ' चाष्टमूलेन अङ्गानां च दशांशतः ॥४१ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये पवित्रकारोपणसम्बन्धिपूजाहोमादिविधिकथनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३४ ॥

विज्ञों ने कुण्डलक्ष्मी को त्रिगुणात्मक प्रकृति रूप माना है || ३४ || वह सब प्राणियों, विद्याओं और मन्त्रगणों की जननी है । अग्निदेव मुक्ति के एकमात्र कारण तथा परमात्मा मुक्ति के दाता हैं ॥ ३५ ॥ ऋतुमती लक्ष्मी का सिर पूर्व की

ओर रहता है । दोनों कोणों ( ईशान और नैर्ऋत ) में दोनों भुजाएँ, ईशान और अग्निकोण में दोनों जङ्घाएँ । कुण्ड उदर है और कुण्डयोनि योनि है । तीनों ( सत्त्व, रज और तमस् ) गुण उसकी मेखला हैं । इस प्रकार लक्ष्मी का ध्यान करके पन्द्रह समिधाओं का मुष्टिमुद्रा से हवन करे । तदनन्तर आधार हवन करे । वायु से अग्नि- पर्यन्त प्रत्येक लोकपाल के उद्देश्य से आहुतियाँ दे ॥ ३६-३८ ॥ मूलमन्त्र से ईशानान्त तक आज्यभागों की आहुति करे । उत्तर में द्वादशान्त में, दक्षिण में और मध्य में व्याहृति से हवन करे । कमल - दल के मध्य में स्थित, कोटि सूर्य के समान कान्तिमान्, सात जीभवाले, चन्द्ररूपी मुख और सूर्यरूपी नेत्रवाले विष्णु रूप ( विष्णु देवता का ) अग्नि का ध्यान कर एक सौ आठ बार हवन करके उसके आधे से आठ बार अधिक और सम्पूर्ण अंगों के दशम भाग के बराबर आहुतियाँ दे ॥३९ -४१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पवित्रारोपणसम्बन्धी पूजाहोमादिविधिकथन नामक चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३४ ॥

१ ख. च. भुक्तिदः । २ क. ङ. च. ' वात्स्वस्तिमुद्रया । ३ क. ङ. च. पञ्चवक्त्रं । ४ क. ङ. च. सूर्याख्यं । ५ ख. चार्घम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 173

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः १६ ९ अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः पवित्राधिवासनविधिः अग्निरुवाच सम्पाताहुतिनासिच्य पवित्राण्यधिवासयेत् । नृसिंहमन्त्रजप्तानि गुप्तान्यस्त्रेण तानि तु ॥ १ ॥

वस्त्रसंवेष्टितान्येव पात्रस्थान्यभिमन्त्रयेत् । ( बिल्वाद्यद्भिः प्रोक्षितानि मन्त्रेण चैकधा द्विधा ) ॥२ ॥

कुम्भपात्रे तु संस्थाप्य रक्षां विज्ञाप्य देशिकः । दन्तकाष्ठं चामलकं पूर्वे सङ्कर्षणेन

प्रद्युम्नेन भस्मतिलान् दक्षे गोमयमृत्तिकाम् । वारुणे चानिरुद्धेन तु ॥३ ॥

सौम्ये नारायणेन च ॥४ ॥

दर्भोदकं चाथ हृदा अग्नौ कुङ्कुमरोचनम् । ऐशान्यां शिरसा धूपं शिखया नैर्ऋतेऽप्यथ ॥५ ॥

मूलपुष्पाणि दिव्यानि कवचेनाथ वायवे । ' चन्दनाम्ब्वक्षतदधिदूर्वाश्च पुटिकास्थिताः ॥ ६ ॥

गृहं त्रिसूत्रेणाऽऽवेष्ट्य पुनः सिद्धार्थकान् क्षिपेत् । दद्यात् पूजाक्रमेणाथ स्वैः स्वैर्गन्धपवित्रकम् ॥७ ॥

मन्त्रैर्वै द्वारपादिभ्यो विष्णुं कुम्भे त्वनेन च । विष्णुतेजोद्भवं रम्यं सर्वपातकनाशनम् ॥८ ॥

सर्वकामप्रदं देव तवाङ्गे धारयाम्यहम् । ( ' सम्पूज्य धूपदीपाद्यैर्व्रजेद् द्वारसमीपतः ॥९ ॥

अध्याय ३५ पवित्राधिवासन - विधि अग्निदेव बोले - इस प्रकार उपर्युक्त विधि से पवित्रकारोपण और हवन करने के अनन्तर पवित्रक का अधिवासन करना चाहिए । नृसिंह का जप करके अस्त्र से अभिमन्त्रित करके उन पवित्रकों को गुप्त रूप से वस्त्रों से आच्छादित करके किसी पात्र में रखकर अभिमन्त्रित करे । पहले मन्त्रोच्चारण करके बिल्व - पत्र आदि से उस पात्र पर दो बार जल छिड़क दे । तत्पश्चात् गुरु उसको एक कलश में रखकर मन्त्र से रक्षित कर दे । संकर्षणमन्त्र से दातून और आँवला पूर्व दिशा में, प्रद्युम्न - मन्त्र में भस्म और तिल को दक्षिण दिशा में, गोबर और मिट्टी पश्चिम दिशा में अनिरुद्ध मन्त्र से, नारायण मन्त्र से उत्तर में कुश और जल को फेंक दे ॥१४ ॥ हृदय से अग्निकोण में कुंकुम और रोली छिड़के । सिर से ईशानकोण

में धूप, शिखा से नैर्ऋतकोण में दिव्य मूल पुष्पों को, कवच से वायव्यकोण में एक पुड़िये में चन्दन, जल, अक्षत, दधि और दूध रखकर फेंक दे ॥५-६ ॥ गृह को तीन सूत से आवेष्टित करके फिर पीले सरसों को चारों ओर फेंक दे । इस विधि से रक्षा - व्यवस्था करने के अनन्तर पूजन - क्रम से यथाविधि वेद - मन्त्रों से गन्ध और पवित्रक चढ़ाये । अपने - अपने मन्त्रों से द्वारपाल देवों को और कुम्भस्थ विष्णु को आगे कहे हुए मन्त्र से पूजा - सामग्री चढ़ावे । मन्त्र यह है- " देव, विष्णु-तेज से उत्पन्न, सब पापों को नष्ट करनेवाले और सब मनोरथों को देनेवाले इस सामग्री ( गन्ध - पुष्प आदि ) को तुम्हारे अंगों पर चढ़ा रहा हूँ । इस मन्त्र द्वारा धूप - दीप आदि से पूजन करके द्वार - देश से आगे बढ़े ॥ ७ - ९ ॥ स्वयं अपने अंगों १ बिल्वाद्यद्भिद्विधा क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । २ क. ङ. च. सङ्घर्षणेन । ३ क. ङ. च. ' नान्यक्ष ' । ४ सम्पूज्य'धारयाम्यहम् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 174

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१७० अग्निपुराणम् गन्धपुष्पाक्षतोपेतं पवित्रं चाऽऽत्मनोऽर्पयेत् । धर्मकामार्थसिद्ध्यर्थं स्वकेऽङ्गे धारयाम्यहम् ) । गन्धादिधिः समभ्यर्च्य गन्धपुष्पाक्षतादिभिः । वह्निस्थाय ततो दत्त्वा देवं सम्प्रार्थयेत्ततः । प्रातस्त्वां पूजयिष्यामि सन्निधौ भव केशव । ततो देवाग्रतः कुम्भं वासोयुगसमन्वितम् । गन्धपुष्पादिनाऽऽभूष्य मूलमन्त्रेण पूजयेत् । पञ्चगव्यं चरुं दन्तकाष्ठं चैव क्रमाद् भजेत् । परप्रेषकबालानां स्त्रीणां भोगभुजां तथा पवित्रं वैष्णवं तेजो महापातकनाशनम् ॥१० ॥

( ' आसने परिवारादौ गुरौ दद्यात्पवित्रकम् ) ॥११ ॥

विष्णुतेजोद्भवेत्यादिमूलेन हरयेऽर्पयेत् ॥१२ ॥

क्षीरोदधिमहानागशय्यावस्थितविग्रह ॥१३ ॥

इन्द्रादिभ्यस्ततो दत्त्वा विष्णुपार्षदके बलिम् ॥१४ ॥

रोचनाचन्द्रकाश्मीरगन्धाद्युदकसंयुतम् ॥१५ ॥

मण्डपाद् बहिरागत्य विलिप्ते मण्डलये ॥ १६ ॥

पुराणश्रवणं स्तोत्रं पठञ्जागरणं निशि ॥ १७ ॥

। सद्योऽधिवासनं कुर्याद्विना गन्धपवित्रकम् ॥१८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये पवित्राधिवासनविधिवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

पर भी गन्ध, पुष्प, अक्षत से युक्त पवित्रक धारण करना चाहिए । पवित्रक धारण करने का मन्त्र यह है - " मैं धर्म, काम और अर्थ की सिद्धि के लिए महापापों को नष्ट करनेवाले और पवित्र विष्णु तेज को अपने अंगों पर धारण कर रहा हूँ । अपने आसन, परिवार और गुरु आदि को भी पवित्रक अर्पित करे । गन्ध, अक्षत, पुष्प आदि से पूजन करके ' विष्णुतेजोद्भव ' - आदि मन्त्र से विष्णु को सारी पूजा अर्पित कर दे ॥ १०-१२ ॥ तदनन्तर अग्निस्थ ब्रह्म की पूजन - सामग्री से पूजा करके देवता की प्रार्थना करे । प्रार्थना मन्त्र यह है - " क्षीरोदधिमहानागशय्यावस्थित विग्रह । प्रातस्त्वां पूजयिष्यामि सन्निधौ भव केशव । ” इन्द्र आदि और विष्णु - पार्षदों को भी विधिपूर्वक बलि देनी चाहिए ॥१३-१४ ॥ तदनन्तर देवता के सम्मुख युग्म - वस्त्रों से कुम्भ को आवेष्टित करके स्थापित करना चाहिए और फिर उन्हें रोचना, कपूर, केसर आदि सुगन्धित - पदार्थों से मिले हुए जल से भर देना चाहिए । फिर गन्ध, पुष्प आदि के द्वारा अलङ्कृत करके मूल - मन्त्र से पूजा करनी चाहिए । पूजनानन्तर मण्डप से बाहर आकर लिपे - पुते तीन मण्डलों में क्रमशः पञ्चगव्य, चरु और दातून रखे । पुराण सुने, स्तोत्र पाठ करे और रात्रि में जागरण करे ॥१५-१७ ॥ दूसरों के भेजे हुए बालकों, स्त्री और भोगपरायण व्यक्तियों का अधिवासन बिना गन्ध और पवित्रक के ही करना चाहिए ॥१८ ॥

श्री अग्निमहापुराण में पवित्राधिवासनविधिवर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३५ ॥

१ आसने " पवित्रकम् CC - 0. JK क. Sanskrit ङ. च. Academy पुस्तकेषु , Jammmu नास्ति . Digitized । २ ख. by गु S3. Foundation घ. द्विसत् । वि । ३ ख. घ. ` द्भवेत् ।

पृष्ठ 175

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प्रातः स्नानादिकं कृत्वा पूर्वाधिवासितं द्रव्यं पञ्चामृतैः कषायैश्च अग्नौ हुत्वा नित्यवच्च द्वारपालविष्णुकुम्भवर्धनीः षट्त्रिंशोऽध्यायः अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः विष्णुपवित्रारोपणविधिः अग्निरुवाच द्वारपालान् प्रपूज्य च । प्रविश्य गुप्ते देशे च समाकृष्याथ वस्त्राभरणगन्धकम् । निरस्य सर्वं निर्माल्यं देवं संस्नाप्य शुद्धगन्धोदकैस्ततः । पूर्वाधिवासितं दद्याद् वस्त्रं गन्धं च १७१ धारयेत् ॥१ ॥

पूजयेत् ॥२ ॥

पुष्पकम् ॥३ ॥

देवं सम्प्रार्थयेन्नमेत् । समर्प्य कर्म देवाय पूजां नैमित्तिकीं चरेत् ॥४ ॥

प्रार्थयेद्धरिम् । अतो देवेति मन्त्रेण मूलमन्त्रेण कुम्भके ॥ ५ ॥

कृष्ण कृष्ण नमस्तुभ्यं गृह्णीष्वेदं पवित्रकम् । पवित्रीकरणार्थाय वर्षपूजाफलप्रदम् ॥६ ॥

पवित्रकं कुरुष्वाद्य यन्मया दुष्कृतं कृतम् । शुद्धो भवाम्यहं देव त्वत्प्रसादात्सुरेश्वर ॥७ ॥

पवित्रं च हृदाद्यैस्तु आत्मानमभिषिच्य च । विष्णुकुम्भं च सम्प्रोक्ष्य व्रजेद् देवसमीपतः ॥८ ॥

पवित्रमात्मने दद्याद्रक्षाबन्धं विसृज्य च । गृहाण ब्रह्मसूत्रं च यन्मया कल्पितं प्रभो ॥ ९ ॥

अध्याय ३६ विष्णुपवित्रारोपणविधि अग्निदेव बोले- भक्त प्रात: काल स्नान आदि से निवृत्त होकर द्वारपालों की पूजा करके गुप्त पूजा - मण्डप में जाय और पूर्व की रखी हुई वस्तुओं - वस्त्र, आभूषण, गन्ध, चन्दन तथा पहले की संस्कृत सामग्रियों को धारण करे । सभी निर्माल्य पदार्थों को दूर हटाकर देवता को स्नान कराये और विधिपूर्वक पूजन करे ॥१-२ ॥ पहले पञ्चामृत से स्नान करावे, फिर कषाय जल और सुगन्धित जल से स्नान कराकर इष्टदेव को पहले से संस्कृत किये हुए वस्त्र, गन्ध और पुष्प आदि अर्पित करे || ३ || नित्य की भाँति अग्नि में हवन करके देव की प्रार्थना और नमस्कार करे । सारे पूजन - कर्म को भगवान् के चरणों में अर्पित करके नैमित्तिक पूजा प्रारम्भ करे ॥४ ॥ सबसे पहले द्वारपाल, विष्णु,

कुम्भ, वर्धनी और हरि की ' अतो देव ' इत्यादि मन्त्र से प्रार्थना करे । आगे कहे गये मूल मन्त्र से कुम्भ पर पवित्रक चढ़ाये ॥५ ॥ मन्त्र इस प्रकार है- “ कृष्ण! कृष्ण! तुमको नमस्कार है । मुझे पवित्र करने के लिए वर्ष - पूजा के फल

को देनेवाले इस पवित्रक को ग्रहण करें । जो कुछ दुष्कर्म मैंने किये हैं उन्हें दूर करके मुझको आज पवित्र कर दें । सुरेश्वर! तुम्हारी कृपा से मैं शुद्ध हो रहा हूँ ' ॥६-७ । इस मन्त्र से भगवान् को पवित्रक अर्पित करके हृद् आदि ( मन्त्रों ) से अपने ऊपर जल छिड़के और विष्णु - कुम्भ को भी सींचकर देवता के समीप जाय ॥८ ॥ स्वयं भी पवित्रक

धारण करे और रक्षाबन्धन को हटाकर प्रार्थना करे, “ प्रभो! मैंने जो यह ब्रह्मसूत्र ( यज्ञोपवीत ) बनाया है उसको १ ख. नमस्कृत्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 176

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१७२ अग्निपुराणम् कर्मणां पूरसार्थाय यथा दोषो न मे भवेत् कनिष्ठादि च देवाय वनमालां च मूलतः वह्नौ हुत्वा वह्निगेभ्यो विश्वादिभ्यः पवित्रकम् अष्टोत्तरशतं वापि पञ्चोपनिषदैस्ततः इयं सांवत्सरी पूजा तवास्तु गरुडध्वज तद्वत्पवित्रतन्तूंश्च पूजां च हृदये वह विधिना विघ्नलोपेन परिपूर्णं तदस्तु मे दत्त्वा बलिं दक्षिणाभिर्वैष्णवं तोषयेद् गुरुम् पवित्रं स्नानकाले वा अवतार्य समर्चयेत् ' विसर्जनेऽह्नि सम्पूज्य पवित्राणि विसर्जयेत् व्रज पवित्रकेदानीं विष्णुलोकं विसर्जितः पवित्राणि समभ्यर्च्य ब्राह्मणाय समर्पयेत् । द्वारपालासनगुरुमुख्याणां च पवित्रकम् ॥१० ॥

। हृदादिविष्वक्सेनान्ते पवित्राणि समर्पयेत् ॥ ११ ॥

1 । प्रार्च्य ' पूर्णाहुतिं दद्यात् प्रायश्चित्ताय मूलतः ॥ १२ ॥

। मणिविद्रुममालाभिर्मन्दारकुसुमादिभिः ॥१३ ॥

। वनमाला यथा देव कौस्तुभं सततं हृदि ॥ १४ ॥

। कामतोऽकामतो वापि यत्कृतं नियमार्चने ॥ १५ ॥

। प्रार्थ्यं नत्वा क्षमाप्याथ पवित्र मस्तकेऽर्पयेत् ॥१६ ॥

। विप्रान् भोजनवस्त्राद्यैर्दिवसं पक्षमेव वा ॥ १७ ॥

। अनिवारितमन्त्राद्यं दद्याद् भुङ्क्तेऽथ केवलम् ॥१८ ॥

। सांवत्सरीमिमां पूजां सम्पाद्य विधिवन्मम ॥ १ ९ ॥ । मध्ये सोमेशयोः प्रार्च्य विष्वक्सेनं हि तस्य च ॥ २० ॥

। यावन्तस्तन्तवस्तस्मिन् पवित्रे परिकल्पिताः ॥ २१ ॥

ग्रहण कीजिये जिससे कि इस कर्म की पूर्ति हो जाय और मैं किसी दोष का भागी न बनूँ । द्वारपाल और आसनासीन गुरुजनों को पवित्रक अर्पित करे । मूलमन्त्र से वनमाला और हृद् से लेकर विष्वक्सेन तक को पवित्रक समर्पित करे ॥९ -११ ॥ वह्निग देवों के निमित्त अग्नि में हवन करके विश्वादि देवों को पवित्रक प्रदान करे और उनकी भली-भाँति पूजा करके मूलमन्त्र से प्रायश्चित्त के लिए पूर्णाहुति दे || १२ || एक सौ आठ मन्त्र जप करे । मणि, विद्रुम की मालाओं से, मदार के फूलों से और पञ्चोपनिषद् - मन्त्रों से पूजन करे । “ हे गरुड़ध्वज! यह आपकी वार्षिकी पूजा आपको ही समर्पित है । जिस प्रकार आपके हृदय पर सर्वदा कौस्तुभमणि और वनमाला शोभित रहती है उसी प्रकार अपने हृदय पर इन पवित्र तन्तुओं और पूजा को धारण करें । चाहे इच्छापूर्वक या अनिच्छा से अर्चना में जो कुछ त्रुटियाँ या विधिहीनता हुई हैं वे सब कुछ दूर हो जायँ और पूर्णफल प्राप्त हो । " - इस प्रकार प्रार्थना करके नमस्कार करे और क्षमा - याचना करके पवित्रक को मस्तक पर धारण करे ॥१३-१६ ॥ देवों को बलि देकर एक या पन्द्रह दिन तक दक्षिणा द्वारा वैष्णव गुरु को और विप्रों को भोजन और वस्त्र आदि से सन्तुष्ट करता रहे ॥१७ ॥ प्रतिदिन

स्नान के समय पवित्रक को उतारकर पूजा करे, पवित्र अन्न का भोग लगावे और स्वयं भी भोजन करे || १८ || विसर्जन के दिन भगवान् की पूजा करके पवित्रक का विसर्जन कर देना चाहिए । विसर्जन का मन्त्र यह है- “ हे पवित्रक! मेरी इस वार्षिक पूजा को विधिपूर्वक सम्पन्न करके अब विष्णुलोक को जाओ । मैं तुम्हें विदा कर रहा हूँ । ” सोम और ईश के मध्य में विष्वक्सेन की पूजा करके और उनके पवित्रक की पूजा करके ब्राह्मण को अर्पित कर देना चाहिए । उस पवित्रक में १ ख. ग. प्राच्यां । च. प्रार्थ्य । २ क. ख. ङ. च. ' त्र ' पुस्तके । ३ ख. ग. घ. च. समर्पयेत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 177

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः तावद्युगसहस्त्राणि विष्णुलोके विष्णुलोके १७३ विष्णुलोके महीयते । कुलानां शतमुद्धृत्य दशपूर्वान् दशापरान् ॥२२ तु संस्थाप्य स्वयं मुक्तिमवाप्नुयात् ॥ इत्यादिमहापुराण आग्नेये विष्णुपवित्रारोपणविधिनिरूपणं ॥२३ ॥

नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः अथ संक्षेपतः सर्वदेवपवित्रारोपणविधिः अग्निरुवाच संक्षेपात्सर्वदेवानां पवित्रारोपणं शृणु!! पवित्रं पूर्वलक्ष्म ' स्यात् स्वरसानलगं त्वयि ॥१ ॥

जगद्यो समागच्छ परिवारगणैः सह । निमन्त्रयाम्यहं प्रातर्दद्यां तुभ्यं पवित्रकम्॥२ ॥

जगत्सृजे नमस्तुभ्यं गृह्णीष्वेदं पवित्रकम् । पवित्रीकरणार्थाय वर्षपूजाफलप्रदम्॥३ ॥

( शिवदेव नमस्तुभ्यं गृह्णीष्वेदं पवित्रकम् ) । मणिविद्रुममालाभिर्मन्दारकुसुमादिभिः ॥४ ॥

इयं सांवत्सरी पूजा तवास्तु वेदवित्पते । सांवत्सरीमिमां पूजां सम्पाद्य विधिवन्मम ॥५ ॥

व्रज पवित्रकेदानीं स्वर्गलोकं विसर्जितः । सूर्यदेव नमस्तुभ्यं गृह्णीष्वेदं पवित्रकम् ॥६ ॥

जितने धागे होते हैं, उतने हजार युगों तक वह व्यक्ति विष्णुलोक में पूजित होता है और अपने सौ कुलों का उद्धार करके और आगे - पीछे की दस - दस पीढ़ियों को विष्णुलोक में स्थान दिलाकर स्वयं मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ॥१९ - २३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में विष्णुपवित्रारोपण विधिनिरूपण नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३६ ॥

अध्याय ३७ सर्वदेवपवित्रारोपण - विधि अग्निदेव बोले- संक्षेप में सब देवताओं की पवित्रारोपण विधि को सुनो! पवित्रक पूर्वोक्त सभी लक्षणों से सम्पन्न होना चाहिए || १ || हे जगदादिकारण! अपने परिवार के सहित यहाँ आओ । मैं तुम्हें निमन्त्रित कर रहा हूँ । प्रात: काल तुमको पवित्रक अर्पित करूँगा ॥२ ॥ “ जगत् की सृष्टि करनेवाले! तुमको नमस्कार है । सांवत्सर-पूजा के फल को देनेवाले इस पवित्रक को ( मुझे ) पवित्र करने के लिए ग्रहण करो! ” -इस मन्त्र से जगत् - स्रष्टा

भगवान् को पवित्रक अर्पित करे || ३ || “ शिव देव! तुमको नमस्कार है । इस पवित्रक को ग्रहण करो! ” इस मन्त्र से शिव को पवित्रक अर्पित करना चाहिए । अर्पण मन्त्र यह है- “ हे वेदज्ञपति! मणि, विद्रुम, माला और मदार- र - पुष्पों की माला के द्वारा सम्पन्न की हुई यह वर्ष - पूजा आपको अर्पित है । " विसर्जन - मन्त्र यह है- " हे पवित्रक! आपने इस सांवत्सरी पूजा को विधिपूर्वक सम्पन्न किया है । अब मैं आपको विसर्जित कर रहा हूँ । आप स्वर्गलोक को प्रस्थान कीजिये! ” सूर्य को पवित्रक प्रदान करने का मन्त्र यह है- " हे सूर्यदेव! आपको नमस्कार है । इस पवित्रक को १ घ. सर्वलक्ष्म । २ क. स्यात् खर " । ३ क. ख. ग. ङ. च. ' र्दद्यात्तुभ्यं । ४ शिव " पवित्रकम् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१७४ पवित्रीकरणार्थाय पवित्रीकरणार्थाय पवित्रीकरणार्थाय पवित्रीकरणार्थाय धनधान्यायुरारोग्यप्रदं * ( ' विद्यासन्ततिसौभाग्यप्रदं संसारसागरोत्तारकारणं अतीतानागतकुलसमुद्धारं अग्निपुराणम् वर्षपूजाफलप्रदम् । वर्षपूजाफलप्रदम् । वर्षपूजाफलप्रदम् ) । वर्षपूजाफलप्रदम् । सम्प्रददामि ते । सम्प्रददामि ते । प्रददामि ते

ते ।

( ' शिव देव नमस्तुभ्यं गृह्णीष्वेदं पवित्रकम् ) ॥७ ॥

( गणेश्वर ' नमस्तुभ्यं गृह्णीष्वेदं पवित्रकम् ॥८ ॥

शक्तिदेवि! नमस्तुभ्यं गृह्णीष्वेदं पवित्रकम् ॥९ ॥

नारायणमयं सूत्रमनिरुद्धमयं परम् ॥१० ॥

कामदेवमयं सूत्रं संकर्षणमयं वरम् ॥११ ॥

वासुदेवमयं सूत्रं धर्मकामार्थमोक्षदम् ॥१२ ॥

। विश्वरूपमयं सूत्रं सर्वदं पापनाशनम् ) ॥१३ ॥

कनिष्ठादीनि चत्वारि मनुभिस्तु क्रमाद्ददे ॥१४ ॥

इत्यादि महापुराण आग्नेये संक्षेपतः सर्वदेवसाधारणपवित्रारोपणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

अथाष्टत्रिंशोऽध्यायः देवालयनिर्माणफलादिवर्णनम् अग्निरुवाच वासुदेवाद्यालयस्य कृतौ वक्ष्ये फलादिकम् । चिकीर्षोर्दिवधामादि सहस्त्रजनिपापनुत ॥ १ ॥

ग्रहण कीजिये! वर्ष - पूजा के फल को देनेवाले इस पवित्रक के द्वारा हमें पवित्र कीजिये! " शिव को पवित्रक अर्पण करने का मन्त्र यह है- " हे शिव देव! आपको नमस्कार है । मुझे पवित्र करने के लिए वर्ष - पूजा के फल को देनेवाले इस पवित्रक को ग्रहण कीजिये । ” गणेश्वर को पवित्रक चढ़ाने का मन्त्र यह है- “ हे गणेश्वर! आपको नमस्कार है । मैं पवित्रीकरण के लिए इस वर्ष - पूजा के फल को देनेवाले पवित्रक को प्रदान कर रहा हूँ । इसे स्वीकार कीजिये! ” शक्ति मन्त्र यह है - " शक्तिदेवि! आपको नमस्कार है । पवित्र करने के लिए आप इस वर्ष - पूजा के फल को देनेवाले पवित्रक को स्वीकार कीजिये! ” इस पवित्रक के तन्तु ( धागे ) नारायणमय, अनिरुद्धमय और उत्कृष्ट हैं । कामदेवमय, सङ्कर्षणमय और श्रेष्ठ हैं । ये धन - धान्य और आरोग्य को देनेवाले और मोक्ष, विद्या, सन्तान व सौभाग्य प्रदान करनेवाले हैं । इन्हें आप ( देवताओं ) को अर्पित कर रहा हूँ । पापनाशन, विश्वरूपमय, सर्वाभीष्टदाता और संसार - सागर को पार करने के कारणभूत इन सूत्रों से युक्त; भूत और भविष्य के कुलों का उद्धार करनेवाले इस पवित्रक को मैं समर्पित कर रहा हूँ । इन उपर्युक्त मन्त्रों से क्रमशः कनिष्ठादि चारों को अर्पित करे ॥४-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सर्वदेवसाधारणपवित्रारोपण - विधि वर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३७ ॥

अध्याय ३८ देवालयनिर्माण के फल का वर्णन अग्निदेव बोले - अब मैं वासुदेव आदि देवताओं के मन्दिरों के निर्माण से प्राप्त होनेवाले फलों को बतला १ शिव " पवित्रकम् ड. पुस्तके नास्ति । २ गणेश्वर वर्षपूजाफलप्रदम् क. पुस्तके नास्ति । ३ ख. घ. बाणेश्वर । ४ च. “ ग्यप्रवंशं प्र ’ । ५ क. ङ. च. ' त्रं सर्वदं पापनाशनम् । ६ विद्यासन्तति " पापनाशनम् ग्रन्थः क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अष्टत्रिंशोऽध्यायः मनसा सद्मकर्तॄणां शतजन्माघनाशनम् तेऽपि पापैर्विनिर्मुक्ताः प्रयान्त्यच्युतलोकताम् विष्णुलोकं नयत्याशु कारयित्वा हरेर्गृहम् विमुक्ता नारकैर्दुःखैः कर्तुः कृष्णस्य मन्दिरम् फलं यन्नाप्यते यज्ञैर्धाम कृत्वा तदाप्यते । देवाद्यर्थे ' हतानां च रणे यत्तत्फलादिकम् ।

एकायतनकृत्स्वर्गी त्र्यगारी ब्रह्मलोकभाक् ।

षोडशालयकारी तु भुक्ति मुक्तिमवाप्नुयात् ॥

स्वर्गं च वैष्णवं लोकं मोक्षमाप्नोति च क्रमात् । कनिष्ठेनैव तत्पुण्यं प्राप्नोत्यधनवान्नरः । कारयित्वा हरेः पुण्यं प्राप्नोत्यभ्यधिकं वरान् । कारयन्भवनं याति यत्रास्ते गरुडध्वजः । १७५ । येऽनुमोदन्ति कृष्णस्य क्रियमाणं नरा गृहम् ॥२ ॥

। समतीतं भविष्यञ्च कुलानामयुतं नरः ॥३ ॥

। वसन्ति पितरो हृष्टा विष्णुलोके ह्यलङ्कृताः ॥४ ॥

। ब्रह्महत्यादिपापौघघातकं देवतालयम् ॥५ ॥

देवागारे कृ सर्वतीर्थस्नानफलं लभेत् ॥६ ॥

शाठ्येन पांसुना वापि कृतं धाम च नाकदम् ॥७ ॥

पञ्चागारी शम्भु - लोकमष्टागाराद्धरौ स्थितिः ॥८ ॥

कनिष्ठं मध्यमं श्रेष्ठं कारयित्वा हरेर्गृहम् ॥ ॥९ ९ ॥ ॥ श्रेष्ठमायतनं विष्णोः कृत्वा यद्धनवांल्लभेत् ॥१० ॥

समुत्पाद्य धनं कृत्वा स्वल्पेनापि सुरालयम् ॥११ ॥

लक्षेणाथ सहस्त्रेण शतेनार्थेन वा हरेः ॥ १२ ॥

बाल्ये तु क्रीडमाना ये पांसुभिर्भवनं हरेः ॥ १३ ॥

रहा हूँ । देवालय - निर्माण कराने की इच्छा करनेवाले भक्त के सहस्र जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १ ॥ मन में देव-गृह - निर्माण का विचार करनेवाले के सौ जन्मों के पाप क्षीण हो जाते हैं । जो कृष्ण मन्दिर के निर्माण का समर्थन

हैं वे भी अपने पापों से मुक्त होकर अच्युत - लोक को प्राप्त करते हैं । विष्णु मन्दिर का निर्माण करा करते दस हजार अतीत और भविष्य की पीढ़ियों को विष्णु - लोक में पहुँचा देता है और उसके पितर देने से मनुष्य अपने विष्णु - लोक में सम्मानपूर्वक निवास करते हैं ॥२-४ ॥ कृष्ण मन्दिर के निर्माणकर्त्ता सम्पूर्ण नारकीय दुःखों से विमुक्त हो जाते हैं और उनके ब्रह्म-हत्या आदि पाप - समूह नष्ट हो जाते हैं || ५ || जो फल यज्ञों के द्वारा नहीं प्राप्त होते हैं वे फल देवालय के निर्माण से अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं । मन्दिर का निर्माण करने पर सब तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त हो जाता है ॥६ ॥ देवता,

ब्राह्मण आदि के लिए रणभूमि में मारे जानेवाले धर्मात्मा शूर - वीरों को जिस फल आदि की प्राप्ति होती है, वही देवालय के निर्माण से भी सुलभ होता है । कोई शठता ( कंजूसी ) के कारण धूल - मिट्टी से भी देवालय बनवा दे तो वह उसे स्वर्गलोक प्रदान करनेवाला होता है ॥७ ॥ एक मन्दिर के बनवाने से स्वर्ग मिलता है, तीन से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती

है और पाँच से शिवलोक की तथा आठ मन्दिर बनवाने से निर्माता साक्षात् हरिरूप हो जाता है । सोलह मन्दिरों का निर्माणकर्त्ता तो भुक्ति और मुक्ति दोनों का अधिकार प्राप्त कर लेता है । छोटा, बड़ा और श्रेष्ठ देवायतन बनवाने से क्रमश: स्वर्ग, विष्णुलोक और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥८ - ९ ३ ॥ धनी व्यक्ति श्रेष्ठ देव - मन्दिर बनवाकर जो फल प्राप्त करता है वही फल निर्धन व्यक्ति छोटा - सा मन्दिर बनवाकर पा जाता है || १०- १०३ ॥ जो व्यक्ति स्वयं अपने श्रम से उपार्जित धन के थोड़े से अंश से भी हरि - मन्दिर का निर्माण करता है वह अत्यधिक पुण्य और अनेक शुभ वरों को प्राप्त करता है ॥११-११ ३ ॥ एक लाख, हजार, सौ या पचास रुपये की लागत से भी जो भगवान् का मन्दिर बनवाता है वह गरुड़ध्वज के लोक में स्थान पाता है ॥१२- १२३ ॥ जो लोग बचपन में खेलते समय धूलि से भगवान् विष्णु का १ क. ङ. च. नन्दन्ति । २ ङ. देवतीर्थे । च. देवतार्थ । ३ क. घ. ङ. च. पांशुना । ४ क. ख. ग. ङ. च. ' नवान्भवेत् । ५ घ. वरम् । ६ घ. क्रीडमाणा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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१७६ अग्निपुराणम् वासुदेवस्य कुर्वन्ति तेऽपि तल्लोकगामिनः । कर्तुरायतनं विष्णोर्यथोक्तात्त्रिगुणं फलम् । ये विलिम्पन्ति भवनं ते यान्ति भगवत्पुरम् । समुद्धृत्य हरेर्धाम प्राप्नोति द्विगुणं फलम् । विष्णोरायतनस्येह स नरो विष्णुरूपभाक् । सकुलस्तस्य वै कर्ता विष्णुलोके महीयते । कृष्णस्य वासुदेवस्य यः कारयति केतनम् । विष्णुरुद्रार्कदेव्यादेर्गृहकर्ता स कीर्तिभाक् दुःखार्जितै यः कृष्णस्य न कारयति केतनम् । नोपभोगाय बन्धूनां व्यर्थस्तस्य धनागमः मूढस्तत्रानुबध्नाति जीवितेऽथ चले धने नापि कार्त्यै न धर्मार्थं तस्य स्वाम्येऽथ को गुणः दद्यात्सम्यग् द्विजाग्र्येभ्यः कीर्तनानि च कारयेत् मन्दिर बनाते हैं वे भी उनके धाम को प्राप्त होते हैं तीर्थे चायतने पुण्ये सिद्धक्षेत्रे तथाश्रमे ॥ १४ ॥

बन्धूकपुष्पविन्यासैः सुधापङ्केन वैष्णवम् ॥ १५ ॥

पतितं पतमानं तु तथार्धपतितं नरः ॥ १६ ॥

पतितस्य तु यः कर्ता पतितस्य च रक्षिता ॥ १७ ॥

इष्टकानिचयस्तिष्ठेद्यावादायतनं हरेः ॥१८ ॥

स एव पुण्यवान् पूज्य इहलोके परत्र च ॥ १ ९ ॥ जातः स एव सुकृती कुलं तेनैव पालितम् ॥२० ॥

। किं तस्य वित्तनिचयैर्मूढस्य परिरक्षिणः ॥ २१ ॥

नोपभोग्यं धनं यस्य पितृविप्रदिवौकसाम् ॥२२ ॥

। यथा ध्रुवो नृणां मृत्युर्वित्तनाशस्तथा ध्रुवः ॥ २३ ॥

। यदा वित्तं न दानाय नोपभोगाय देहिनाम् ॥ २४ ॥

। तस्माद्वित्तं समासाद्य दैवाद्वा पौरुषादथ ॥२५ ॥

। दानेभ्यश्चाधिकं यस्मात्कीर्तनेभ्यो वरं यतः ॥ २६ ॥

॥ १३ - १३३ ॥ तीर्थ में, पुण्य - स्थान पर, सिद्ध - क्षेत्र में या मुनि-आश्रम में विष्णु - मन्दिर बनवाने से पूर्वोक्त फल से तिगुना फल मिलता है ॥१४- १४३ ॥ जो दीवारों पर बन्धूक पुष्प का चित्र बनाकर चूने से मन्दिर को पुतवाते हैं वे अन्त में भगवान् के धाम में पहुँच जाते हैं ॥ १५-१५३ ॥ गिरे हुए या गिरते हुए या आधा गिरे हुए मन्दिर का जीर्णोद्धार करानेवाला व्यक्ति दुगुना फल प्राप्त करता है ॥१६-१६३ ॥ जो गिरे हुए विष्णु- मन्दिर का उद्धार करता है या गिरते हुए मन्दिर की रक्षा करता है वह मनुष्य विष्णु का रूप है ॥१७-१७ ॥ जब तक उस विष्णु - मन्दिर की ईंटें रहती हैं तब तक वह व्यक्ति परिवार के सहित विष्णुलोक में सम्मानपूर्वक निवास करता है ॥१८-१८३ ॥ वही व्यक्ति पुण्यशाली और इहलोक तथा परलोक में पूज्य होता है जो कृष्ण - वासुदेव का मन्दिर बनवाता है ॥१९ -१ ९ ३ ॥ वही व्यक्ति सुकृती है, उसी ने अपने कुल का पालन किया है और वही यशस्वी है जिसने विष्णु, रुद्र, सूर्य या देवी का मन्दिर बनवा दिया है ॥२०-२० ०३ ॥ जिस मूर्ख ने बड़े कष्ट से धन जोड़ा और उसकी रक्षा करता रहा परन्तु उस धन से कृष्ण का मन्दिर नहीं बनवाया; जिसके धन का उपयोग देव, पितर और ब्राह्मणों ने नहीं किया और न तो जिसका धन भाई - बन्धुओं के ही उपयोग में आया उसका धनोपार्जन व्यर्थ है ॥२१-२२३ ॥ जिस प्रकार मनुष्य की मृत्यु निश्चित है उसी प्रकार धन का नाश भी । तो वह व्यक्ति मूर्ख है जो धन और जीवन के मोह में बँधा रहता है ॥२३-२३ ॥ जिस धन का उपयोग न तो दान में हुआ, न वह प्राणी के स्वयं उपभोग में आया और न उसका व्यय कीर्ति या धर्म - कार्य में ही हुआ उस धन का स्वामित्व प्राप्त करने से क्या लाभ? ॥२४-२४ ॥ इसलिए अपने पौरुष या भाग्यवश यदि धन प्राप्त हो जाय तो शुद्ध ब्राह्मणों को यथाविधि दान कर देना चाहिए और उस धन से कीर्त्तन कराना चाहिए ॥२५-२५३ ॥ मन्दिर निर्माण दान और कीर्त्तन से श्रेष्ठ है । अतः बुद्धिमान् मनुष्य को विष्णु १ ख. ग. च. बले । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA