अग्नि पुराण — पृष्ठ 241–250
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 241–250
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षष्टितमोऽध्यायः २३७ नारसिंहेन हुत्वाऽथ रत्नन्यासं च तेन वै पूर्वादिनवगर्तेषु न्यसेन्मध्ये यथारुचि रत्नन्यासविधिं कृत्वा कृत्वा प्रतिमामालभेद्गुरुः सबाह्यान्तैश्च संस्कृत्य पञ्चगव्येन शोधयेत् होमार्थे स्थण्डिलं कुर्यात्सिकताभिः समन्ततः अष्टदिक्षु यथान्यासं कलशानपि विन्यसेत् त्वमग्ने छुभिरिति च गायत्र्या समिधो हुनेत् शान्त्युदकं ताम्रपत्रे मूलेन शतमन्त्रितम् ब्रह्मयानेन चोद्धृत्य उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते शिविकायां हरिं स्थाप्य भ्रामयीत पुरादिकम् स्त्रीभिर्विप्रैर्मङ्गलाष्टघटैः संस्नापयेद्धरिम् अतो देवेति वस्त्राद्यमष्टाङ्गार्घ्य निवेद्य च ॐ त्रैलोक्यविक्रान्ताय नमस्तेऽस्तु त्रिविक्रम मन्त्र से रत्नन्यास भी करे । व्रीहि ( धान्य ), रत्न, धातु नौ गड्ढों में रुचि के अनुसार छोड़ दे । तदनन्तर इन्द्र इस प्रकार आचार्य के रत्नन्यास विधि को पूरा करके । व्रीहीरत्नानि धातूंश्च लोहान्वै चन्दनादिकम् ॥४ ॥
। अथ चेन्द्रादिमन्त्रैश्च गर्तगुग्गुलनाऽऽवृतम् ॥५ ॥
। सशलाकैर्दर्भपुजैः । प्रोक्षयेद्दर्भतोयेन । सार्धहस्तप्रमाणं तु । पूर्वाद्यानष्ट वर्णेन । अष्टार्णेनाष्टशतकमाज्यं । सिञ्चेदेवस्य तन्मूर्ध्नि । तद्विष्णोरिति मन्त्रेण । गीतवेदादिशब्दैश्च सहदेवैः समन्वितैः ॥६ ॥
नदीतीर्थोदकेन च ॥७ ॥
चतुरस्त्रं सुशोभनम् ॥ ८ ॥
अग्निमानीय संस्कृतम् ॥९ ॥
पूर्णां प्रदापयेत् ॥१० ॥
श्रीश्च ते ह्यनया ऋचा ॥११ ॥
प्रासादाभिमुखं नयेत् ॥१२ ॥
प्रासादद्वारि धारयेत् ॥१३ ॥
। ततो गन्धादिनाऽभ्यर्च्य मूलमन्त्रेण देशिकः ॥ १४ ॥
। स्थिरे लग्ने पिण्डिकायां देवस्य त्वेति धारयेत् ॥१५ ॥
। संस्थाप्य पिण्डिकायां तु स्थिरं कुर्याद्विचक्षणः ॥ १६ ॥
, लोहा और चन्दन आदि को पूर्वोक्त पूर्व आदि दिशाओं में बने हुए आदि के मन्त्रों का उच्चारण करके उन्हें गुग्गुल से भर दे ॥४-५ ॥ प्रतिमालम्भन कराना चाहिए । पहले शलाका, कुश और सहदेवी से उस प्रतिमा के चारों ओर भलीभाँति स्वच्छ करके उसे पञ्चगव्य से शुद्ध करे, फिर कुश के जल और तीर्थ के जल से उसको स्नान करावे ॥६-७ ॥ हवन के लिए, डेढ़ हाथ लम्बी और उतनी ही चौड़ी सुन्दर वर्गाकार वेदी बालुका से बनावे । आठों दिशाओं में यथाविधि कलशों को स्थापित करे ॥८-८३ ॥ उन पूर्वादि कलशों को आठ प्रकार के रंगों से सुसज्जित करे । सुसंस्कृत अग्नि को लाकर हवन - कुण्ड में स्थापित करे ॥ ९ ॥ उसमें ' त्वमग्ने द्युभि ' इत्यादि गायत्री छन्द से समिधा
का तदनन्तर हवन करे । अष्टार्ण मन्त्र से एक सौ आठ घी की आहुति दे ॥१० ॥ तत्पश्चात् मूल मन्त्र से सौ बार अभिमन्त्रित किये
हुए शान्ति जल को आम्र पल्लवों के द्वारा ' श्रीश्च ते लक्ष्मी ' इत्यादि मन्त्र से प्रतिमा के सिर पर अभिषेक करे ॥११ ॥ ' उत्तिष्ठ
ब्रह्मणस्पते ' इत्यादि मन्त्र से प्रतिमा को उठाकर ब्रह्मयान पर रखे तथा ' तद् विष्णो ' इस मन्त्र से ब्रह्मयान पर आरूढ़ प्रतिमा मन्दिर की ओर ले जाय ॥१२ ॥ वहाँ पर शिविका में हरि को प्रतिष्ठित कर, नगर में समारोह के साथ घुमावे । साथ-को और वेद का उच्चारण होता रहे । फिर मन्दिर के द्वार पर भगवान् को शिविका से उतारे ॥१३ ॥ वहाँ स्त्रियों
साथ मंगल गीत के द्वारा आठ मंगल - कलशों से उनको स्नान कराना चाहिए । स्नान के पश्चात् गुरु मूल मन्त्र का उच्चारण करते और ब्राह्मणों करे ॥१४ ॥ ' अतो देव ' इत्यादि मन्त्र से वस्त्रादि पहनाकर अष्टाङ्ग अर्घ्य अर्पण करे । स्थिर
हुए गन्ध आदि से उसका पूजन मन्त्र से प्रतिमा को स्थापित कर दे ॥ १५ ॥ विद्वान् आचार्य ' ॐ त्रैलोक्यविक्रान्ताय
लग्न में पिण्डिका के मध्य में ' देवस्य त्वा ' इस ' इत्यादि मन्त्र से उसको पिण्डिका में भलीभाँति स्थिर कर दे || १६ || ' ध्रुवा द्यौः ' इस मन्त्र से तथा नमस्तेऽस्तु त्रिविक्रम १ क. ङ. च. येन्दान्धतो । २ क. ङ. च. ' ष्टान्तेना ' । ३ ख. घ. दकमाम्रपत्रैर्मूले । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २३८ ध्रुवाद्यौरिति मन्त्रेण विश्वतश्चक्षुरित्यपि ॥ पूजयेत्सकलीकृत्य साङ्गं सावरणं हरिम् । कल्पयेद्विग्रहं तस्य तैजसैः परमाणुभिः । चैतन्यं परमानन्दं जाग्रत्स्वप्नविवर्जितम् । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं हृदयेषु व्यवस्थितम् । सजीवं कुरु बिम्बं त्वं सबाह्याभ्यन्तरस्थितः ज्योतिर्ज्ञानं परं ब्रह्म एकमेवाद्वितीयकम् सांनिध्यकरणं नाम हृदयं स्पृश्य वै जपेत् नमस्तेऽस्तु सुरेशाय संतोषविभवात्मने गुणातिक्रान्तरूपाय * पुरुषाय महात्मने यच्च ते परमं तत्त्वं यच्चज्ञानमयं वपुः आत्मानं संनिधीकृत्य ब्रह्मादिपरिवारकान् ' विश्वतश्चक्षुः ' इत्यादि मन्त्र से पञ्चगव्य से स्नान पञ्चगव्येन संस्नाप्य क्षाल्य गन्धोदकेन च ॥१७ ॥
ध्यायेत्खं तत्र मूर्ति तु पृथिवी तस्य पीठिका ॥१८ ॥
जीवमावाहयिष्यामि पञ्चविंशतितत्त्वगम् ॥१९ ॥
देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्राणाहंकारवर्जितम् ॥२० ॥
हृदयात्प्रतिमाबिम्बे स्थिरो भव परमेश्वर ॥ २१ ॥
। अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो देहोपाधिषु संस्थितः ॥ २२ ॥
। सजीवीकरणं कृत्वा प्रणवेन निबोधयेत् ॥ २३ ॥
। सूक्तं तु पौरुषं ध्यायन्निदं गुह्यमनुं जपेत् ॥ २४ ॥
। ज्ञानविज्ञानरूपाय ब्रह्मतेजोऽनुयायिने ॥ २५ ॥
। अक्षयाय पुराणाय विष्णो संनिहितो भव ॥ २६ ॥
। तत्सर्वमेकतो ' नीतमस्मिन्देहे विबुध्यताम् ॥२७ ॥
। स्वनाम्ना स्थापयेदन्यानायुधादीन्समुद्रया ॥ २८ ॥
कराकर गन्धोदक से प्रक्षालन करे || १७ || सकलीकरण करने के पश्चात् साङ्ग और सावरण हरि का पूजन करे और इस प्रकार ध्यान रहे कि आकाश भगवान् का विग्रह है और पृथिवी उसकी पीठिका ( सिंहासन ) है । तैजस परमाणुओं से उसके शरीर की रचना की कल्पना करे और कहे कि मैं उस तैजस देह में पचीसों तत्त्वों में व्याप्त रहनेवाले, चैतन्य, परमानन्द, जाग्रत स्वप्न से रहित, देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण और अहंकार से विवर्जित ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त प्रत्येक वस्तुओं के हृदय में वर्तमान रहनेवाले जीव ( परमात्मा ) का आवाहन कर रहा हूँ । हे परमेश्वर! तुम हृदय से निकलकर इस प्रतिमा बिम्ब में स्थिर हो जाओ ॥१८-२१ ॥ तुम इस बिम्ब के बाहर और भीतर स्थित होकर उसको सजीव कर दो, तुम जीवों के देहों में स्थिर रहनेवाले अङ्गुष्ठमात्र पुरुष हो ॥ २२ ॥ ' तुम ज्योति, ज्ञान, परब्रह्म और अद्वितीय ब्रह्म हो ', इत्यादि कहकर मूर्ति का सजीवीकरण सम्पन्न करे । सजीवीकरण
के अनन्तर ओङ्कार से उसको जगावे || २३ || भगवान् के हृदय का स्पर्श कर पुरुष सूक्त का जप करे । इसे सांनिध्यकरण नामक कर्म कहा गया है । इसके लिए भगवान् का ध्यान करते हुए निम्न गुह्य मन्त्र का जप करे ॥२४ ॥ प्रभो! आप देवताओं
के स्वामी हैं । सन्तोष वैभव रूप हैं । आपको नमस्कार है । ज्ञान और विज्ञान आपके रूप हैं । आप ब्रह्मतेज के अनुगामी हैं । आपको नमस्कार है ॥२५ ॥ गुणों से अतिक्रान्त रूपवाले महात्मा पुरुष को नमस्कार है । हे विष्णो! इस प्रतिमा को अक्षय
और सनातन बनाने के लिए इसमें सन्निविष्ट होइये ॥ २६॥ आपका जो परमतत्त्व और ज्ञानमय शरीर है, उस सबको मैंने
इस मूर्ति में एकांश रूप से एकत्र किया है, इसमें अब अपने को प्रकाशित कीजिये ॥२७ ॥ इस प्रकार परमात्मा को उस
मूर्ति में आहूत करके तथा संयुक्त करके ब्रह्मा आदि देवों को सपरिवार उनके मन्त्रों से स्थापित करे । समीप में ही उनके १ क. ङ. च. ' येत्खातस्य मूर्तिस्तु पृ ' । २ ख. ङ. च. ' स्थितम् । अ ' । ३ ख. यमोम् । स ' । ४ क. ख. ङ. च. ' न्तदेशाय । घ ' न्तवेशाय । ५ घ. ' तो लीनम ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षष्टितमोऽध्यायः यात्रावर्षादिकं दृष्ट्वा ' ज्ञेयः संनिहितो हरिः । चण्डप्रचण्डौ द्वारस्थौ निर्गत्याभ्यर्चयेद् गुरुः । दिगीशान्दिशि देवांश्च स्थाप्य संपूज्य देशिकः । सर्वपार्षदकेभ्यश्च बलिं भूतेभ्य अर्पयेत् । यागोपयोगिद्रव्याद्यमाचार्याय नरोऽर्पयेत् । अन्येभ्यो दक्षिणां दद्याद्भोजयेद्ब्राह्मणांस्ततः । विष्णुं नयेत्प्रतिष्ठाता चाऽऽत्मना सकलं कुलम् । मूलमन्त्राः पृथक्तेषां शेषं कार्यं समानकम् २३ ९ नत्वा ' स्तुत्वा स्तवाद्यैश्च जप्त्वा चाष्टाक्षरादिकम् ॥२९ ॥
अथ मण्डपमासाद्य गरुडं स्थाप्य पूजयेत् ॥ ३० ॥
विष्वक्सेनं तु संस्थाप्य शङ्खचक्रादि पूजयेत् ॥३१ ॥
ग्रामवस्त्रसुवर्णादि गुरवे दक्षिणां ददेत् ॥ ३२ ॥
आचार्यदक्षिणार्थं तु ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां ददेत् ॥३३ ॥
अवारितान्फलं दद्याद्यजमानाय वै गुरुः ॥ ३४ ॥
सर्वेषामेव देवानामेष साधारणो विधिः ॥३५ ॥
॥३६ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये वासुदेवादिदेवताप्रतिष्ठासामान्यविधिकथनं नाम षष्टितमोऽध्यायः ॥६० ॥
अस्त्रों को भी मुद्रा के साथ स्थापित करे ॥ २८ ॥ यात्रा और वर्ष आदि का विचार करके हरि को सन्निहित करना चाहिए ।
स्तुति, प्रार्थना आदि से स्तुति करके अष्टाक्षर मन्त्रों का जप करके भगवान् को प्रसन्न करना चाहिए ॥ २ ९ ॥ तदनन्तर आचार्य मन्दिर से निकलकर द्वार पर चण्ड और प्रचण्ड की पूजा करे, फिर मण्डप में जाकर गरुड़ की स्थापना करके पूजा करे ॥३० ॥ दिशाओं में दिक्पालों, विष्वक्सेन और शङ्ख, चक्रादि को स्थापित करके उनकी पूजा करे । सब पार्षदों
और भूतों को बलि प्रदान करे । तत्पश्चात् गुरु को ग्राम, वस्त्र और स्वर्ण दक्षिणा में दे और यज्ञोपवीती द्रव्य आचार्य को अर्पित करे । आचार्य की दक्षिणा से आधी दक्षिणा ऋत्विकों को दे ॥३१-३३ ॥ अन्य ब्राह्मणों को भी दक्षिणा देकर आगत ब्राह्मणों को भोजन कराये, किसी को रोके नहीं । इस कार्य के अनन्तर गुरु यजमान को फल प्रदान करे || ३४ || प्रतिष्ठाता पुरुष अपने पूरे परिवार को अपने साथ विष्णुलोक को ले जाता है । सब देवों की यही प्रतिष्ठा - विधि है । केवल
मूल मन्त्र ही पृथक् - पृथक् हैं । शेष विधियाँ समान हैं ॥३५-३६ ॥
श्री अग्निमहापुराण में वासुदेवादि प्रतिष्ठासामान्यविधिवर्णन नामक साठवाँ अध्याय समाप्त ॥६० ॥
१ क. ङ. च. कृत्वा । २ ख. गत्वा । ३ घ. ' न्फलान्दद्या ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २४० अथैकषष्टितमोऽध्यायः अवभृथस्नानद्वारप्रतिष्ठाध्वजारोपणादिविधिः श्रीभगवानुवाच वक्ष्ये चावभृथस्नानं विष्णोर्नत्वेति ' होमयेत् । पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैर्बलिं दत्त्वा गुरुं यजेत् । अष्टभिः कलशैः स्थाप्य शाखोदुम्बरकौ गुरुः । कुण्डेषु होमयेवह्निं समिदाज्यतिलादिभिः । शाखयोर्विन्यसेन्मूले देवौ चण्डप्रचण्डकौ । न्यस्याभ्यर्च्य यथान्यायं श्रीसूक्तेन चतुर्मुखम् । प्रतिष्ठासिद्धद्वारस्य त्वाचार्यः स्थापयेद्धरिम् समाप्तौ शुकनासाया वेद्याः प्राग्गर्भमस्तके अष्टरत्नौषधीधातुबीजलौहान्वितं शुभम् सपल्लवं नृसिंहेन हुत्वा संपातसंचितम् एकाशीतिपदे कुम्भान्संस्थाप्य स्नापयेद्धरिम् ॥१ ॥
द्वारप्रतिष्ठां वक्ष्यामि द्वाराधो हेम वै ददेत् ॥ २ ॥
गन्धादिभिः समभ्यर्च्य मन्त्रैर्वेदादिभिर्गुरुः ॥३ ॥
दत्त्वा शय्यादिकं चाधो दद्यादाधारशक्तिकाम् ॥४ ॥
ऊर्ध्वोदुम्बरके देवीं लक्ष्मीं सुरगणार्चिताम् ॥५ ॥
हुत्वा तु श्रीफलादीनि आचार्यादेस्तु दक्षिणाम् ॥६ ॥
। प्रासादस्य प्रतिष्ठां तु हृत्प्रतिष्ठेति तां शृणु ॥७ ॥
। सौवर्णं राजतं कुम्भमथवा शुक्लनिर्मितम् ॥ ८ ॥
। सवस्त्रपूरितं चाद्भिर्मण्डले चाधिवासयेत् ॥९ ॥
। नारायणाख्यतत्त्वेन प्राणभूतं न्यसेत्ततः ॥ १० ॥
अध्याय ६१ अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठादि विधि - वर्णन श्री भगवान् बोले- अब मैं अवभृथ स्नान की विधि बता रहा हूँ । ' विष्णोर्नत्वा ' इत्यादि मन्त्र से हवन करे । इक्यासी पदवाले वर्गाकार क्षेत्र में कलशों को स्थापित करके हरि को स्नान कराकर गन्ध - पुष्प आदि चढ़ाकर बलि प्रदान करे और गुरु का पूजन करे । द्वार प्रतिष्ठा विधि यह है कि द्वार के नीचे सोना रखे ॥१-२ ॥ गुरु गूलर की दो शाखाओं को समीप में गाड़कर आठ कलशों को स्थापित करके वेदमन्त्रों से गन्ध आदि से पूजा करके कुण्ड में समिधा, घी और तिल आदि की अग्नि में आहुतियाँ दे । भूमि पर शय्या रखकर उसे आधार शक्ति को प्रदान करे ॥ ३-४ ॥ उदुम्बर की शाखाओं के मूल में चण्ड और प्रचण्ड की प्रतिष्ठा करे । देवगणों से पूजित लक्ष्मी को शाखाओं के ऊपर स्थापित करे । तत्पश्चात् यथाविधि ब्रह्मा की भी स्थापना करके श्रीसूक्त से उसकी पूजा करे । श्रीफल आदि से पूजन कर आचार्य को दक्षिणा दे ॥५-६ ॥ तदनन्तर आचार्य उस प्रतिष्ठासिद्ध द्वार पर हरि की स्थापना करे । प्रासाद की प्रतिष्ठा की जो हृदय - प्रतिष्ठा है, उसकी प्रतिष्ठा की विधि सुनो ॥७ ॥ शुक नासिका के समान आकारवाली वेदिका के
अन्त में, पूर्वगर्भमस्तक पर सोने और चाँदी के कलशों को स्थापित करे ॥८ ॥ उस कलश को वस्त्र से आच्छादित
करके अष्टरत्न, ओषधि, धातु, बीज और लोहे को उसमें छोड़ दे । पुनः उस कलश की विधिवत् पूजा करे । नृसिंहमन्त्र से उस कलश को जल से सींचकर उस पर पल्लव रखे । नारायण तत्त्व से प्राणभूत तत्त्व का न्यास करे ॥९ -१० ॥ १ क. ङ. च. ' ष्णोर्नुकेति । ख. ' ष्णोर्नामेति । २ घ म्भान्स्थाप्य संस्थाप्य ' । ३ क. घ. ङ. च. मिल्लाजति । ४ च. ' निर्मलम् । ५ ख. संपातसिञ्चितम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकषष्टितमोऽध्यायः २४१ वैराजरूपं तं ध्यायेत्प्रासादस्य सुरेश्वर । अधोदत्त्वा सुवर्णं तु तत्त्वभूतं घटं न्यसेत् । ततः पश्चाद्वेदिबन्धं तदूर्ध्वं कण्ठबन्धनम् । तदूर्ध्वं वृकलं कुर्याच्चक्रं चाद्यं सुदर्शनम् । कलशं वाऽथ कुर्वीत तदूर्ध्वं चक्रमुत्तमम् । चत्वारो वा चतुर्दिक्षु स्थापनीया गरुत्मतः । प्रासादबिम्बद्रव्याणां यावन्तः परमाणवः । कुम्भाण्डवेदिबिम्बानां ' भ्रमणाद्वायुनाऽनघ । पताकां प्रकृतिं विद्धि दण्डं पुरुषरूपिणम् । धारणाद्धरणीं विद्धि आकाशं सुषिरात्मक । पाषाणादिष्वेवजलं पार्थिवं पृथिवीगुणम् ।
शुक्लादिकं भवेद्रूपं रसमाह्लाद ' दर्शकम् ।
ततः पुरुषवत्सर्वं प्रासादं चिन्तयेद्बुधः ॥ ११ ॥
गुर्वादौ दक्षिणां दद्याद्ब्राह्मणादेश्च भोजनम् ॥१२ ॥
कण्ठोपरिष्टात्कर्तव्यं विमलामलसारकम् ॥१३ ॥
मूर्ति श्रीवासुदेवस्य ग्रहगुप्तां निवेदयेत् ॥१४ ॥
वेद्याश्च परितः स्थाप्या अष्टौ ' विघ्नेश्वरास्त्वज ॥१५ ॥
ध्वजारोहं प्रवक्ष्यामि येन भूतादि नश्यति ॥ १६ ॥
तावद्वर्षसहस्राणि तत्कर्ता विष्णुलोकभाक् ॥१७ ॥
कण्ठस्याऽऽवेष्टनाज्ज्ञेयं फलं कोटिगुणं ध्वजात् ॥१८ ॥
प्रासादो वासुदेवस्य मूर्तिरूपो निबोध मे ॥ १ ९ ॥
तेजस्तत्पावकं विद्धि वायुं स्पर्शगतं तथा ॥ २० ॥
प्रतिशब्दोद्भवं शब्दं स्पर्शं स्यात्कर्कशादिकम् ॥ २१ ॥
धूपादिगन्धं गन्धं तु वाग्भेर्यादिषु संस्थिता ॥ २२ ॥
अये सुरेश्वर! उस कलश में प्रासाद के वैराजरूप का ध्यान कर सम्पूर्ण प्रासाद की कल्पना पुरुष के रूप में करे । तदनन्तर नीचे सुवर्ण देकर तत्त्वभूत कलश की स्थापना करे । गुरु आदि को दक्षिणा देकर और ब्राह्मण भोजन कराकर यह विधि समाप्त करे ॥११-१२ ॥ इसके बाद वेदि - बन्धन और तत्पश्चात् कण्ठ - बन्धन करे । कण्ठ के ऊपर विमलामल सारक, उसके ऊपर वृकल और उसके ऊपर सुदर्शनचक्र को निहित करे । यहीं ग्रहों से सुरक्षित श्री वासुदेव की मूर्ति निवेदित करे ॥१३-१४ ॥ इसके अनन्तर पृथक् कलश स्थापित करे । उसके ऊपर सुदर्शन - चक्र बनावे । वेदी के चारों ओर आठ विघ्नेश्वरों की स्थापना करनी चाहिए ॥१५ ॥ अथवा चारों दिशाओं में चार ही विघ्नेश्वर स्थापित करे । अब मैं ध्वजारोहण की विधि बतला रहा
हूँ जिससे भूतप्रेतादि का विनाश हो जाता है ॥ १६ ॥ इस विधि को पूर्ण करने से प्रासादबिम्ब बनाने में जितनी सामग्री काम
में लायी गयी है और उन सामग्रियों में जितने परमाणु हैं, उतने वर्षों तक प्रासाद ( मन्दिर ) का निर्माता विष्णुलोक में निवास करता है ॥१७ ॥ निष्पाप ब्रह्मा जी! जब वायु से ध्वज फहराता है और कलश, वेदी, प्रासादबिम्ब के कण्ठ को आवेष्टित
कर लेता है, तब प्रासादकर्त्ता को ध्वजारोपण से प्रासादबिम्बादि की अपेक्षा कोटि गुना अधिक फल प्राप्त होता है ॥१८ ॥
पताका को प्रकृति और दण्ड को पुरुष समझो । देवता के मन्दिर को देवमूर्ति समझो ॥१ ९ ॥ वह मन्दिर देवता को धारण करता है अत: उसकी धरणी ( पृथ्वी ) समझो । उसमें छिद्र रहता है, वह स्वयं पोला है, अतः उसको आकाश समझो, उसकी प्रभा अग्नितत्त्व है ( स्पर्श ) के कारण उसको वायु भी समझो || २० || पत्थर आदि में भी जलतत्त्व और पार्थिव तत्त्व होते हैं, उनमें प्रतिध्वनि शब्दतत्त्व होते हैं, उनकी कठोरता स्पर्श गुण है ॥२१ ॥ शुक्ल आदि उसका रूप और उस मन्दिर के दर्शन से
जो आनन्द मिलता है, वह रस है । धूप आदि का गन्ध, गुण और वाणी ( ध्वनि ) भेरी आदि में है ॥२२ ॥ शुकनासा,
१ ख. घ. वैराजभूतं । २ घ. तद्वद्भूतं । ३ ख. चुबुकं । ङ. च. चलकं । ४ ख. ङ. च. विद्येश्व । ५ ख. दिद्रव्याणां भ्र ' । ङ. च. ' दिविद्यानां । ६ क. ङ. च. मूर्तिभूतं । ७ च. ' रणी ' वा ' । ८ घ. ग. ङ. च. स्पर्श । ९ क. ङ. च. ' समाम्लादिदर्श ' । घ. " समन्नादिदं । १६ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २४२ शुकनासाश्रिता नासा बाहू भद्रात्मकौ ' स्मृतौ । कण्ठं कण्ठमितिज्ञेयं स्कन्धो वेदी निगद्यते । मुखं द्वारं भवेदस्य प्रतिमा जीव उच्यते । निश्चलत्वं च गर्भोऽस्या अधिष्ठाता तु केशवः । जङ्ङ्घा त्वस्य शिवो ज्ञेयः स्कन्धे धाता व्यवस्थितः । प्रासादस्य प्रतिष्ठां तु ध्वजरूपेण मे शृणु । अण्डोर्ध्व ' कलशं न्यस्य तदूर्ध्वं विन्यसेद्ध्वजम् । अष्टारं द्वादशारं वा मध्ये मूर्तिमताऽन्वितम् प्रासादस्य तु विस्तारो मानं दण्डस्य कीर्तितम् द्वारस्य दैर्ध्यादिगुणं दण्डं वा परिकल्पयेत् क्षौमाद्यैश्च ध्वजं कुर्याद्विचित्रं वैकवर्णकम् दण्डाग्राद्धरणीं यावद्वस्त्रैक्यं विस्तरेण तु ध्वजे चार्थेन विज्ञेया पताका मानवर्जिता शिरस्त्वण्डं निगदितं कलशो मूर्धजाः स्मृताः ॥ २३ ॥
पायूपस्थे प्रणाले तु त्वक्सुधा परिकीर्तिता ॥ २४ ॥
तच्छक्ति पिण्डिकां विद्धि प्रकृतिं च तदाकृतिम् ॥२५ ॥
एवमेष हरिः साक्षात्प्रासादत्वेन संस्थितः ॥ २६ ॥
ऊर्ध्वभागे स्थितौ विष्णुरेवं तस्य स्थितस्य हि ॥ २७ ॥
ध्वजं कृत्वा सुरैर्दैत्या जितः शस्त्रादिचिह्नितम् ॥२८ ॥
बिम्बार्धमानं दण्डस्य त्रिभागेणाथ कारयेत् ॥ २ ९ ॥ । नारसिंहेन तार्येण ध्वजदण्डस्तु निर्व्रणः ॥ ३० ॥
। शिखरार्धेन वा कुर्यात्तृतीयार्धेन वा पुनः ॥ ३१ ॥
। ध्वजयष्टिर्देवगृहे ऐशान्यां वायवेऽथवा ॥ ३२ ॥
॥ घण्टचामरकिङ्किण्या भूषितं पापनाशनम् ॥ ३३ ॥
। महाध्वजः सर्वदः स्यात्तूर्यांशाद्धीनतोऽर्चितः ॥ ३४ ॥
। विस्तारेण ध्वजः कार्यो विंशदङ्गुलसंनिभः ॥३५ ॥
वेदिकानासा और भद्रात्मक भुजाएँ, अण्ड सिर और कलश केश है ॥२३ ॥ कण्ठ, कण्ठ और वेदी कन्धे हैं । जल निकालने
के लिए बनी हुई नालियाँ मल - मूत्र द्वार और सुधा ( चूना ) त्वचा है || २४ || द्वार मुख और प्रतिमा जीव है, पिण्डिका को उसकी शक्ति और आकृति समझो ॥ २५ ॥ इसकी स्थिरता गर्भ और अधिष्ठाता स्वयं हरि हैं । इस प्रकार साक्षात् हरि मन्दिर
रूप में स्थित रहते हैं ॥२६ ॥ प्रासाद की जङ्घा पर शिव और कन्धे पर ब्रह्मा विराजित रहते हैं, ऊपर के भाग को स्वयं
विष्णु सुशोभित करते हैं । इस प्रकार विष्णु देवरूप में स्थित मन्दिर के ऊपर ध्वज - प्रतिष्ठा की विधि और फल को सुनो । शस्त्र आदि से चिह्नित ध्वजा के कारण ही देवता दानवों को परास्त करने में सफल हुए ॥२७-२८ ॥ पहले अण्ड ( मन्दिर का ऊपरी गोल भाग, गुम्बज ) के ऊपर कलश स्थापित करके उसके ऊपर बिम्ब के आधे भाग के बराबर ध्वजा को रखे । वह ध्वज दण्ड के तृतीय भाग के बराबर हो और आठ या बारह पंखुड़ियोंवाले कमल या अन्य मूर्ति उस पर बनी हुई हो । नरसिंह अथवा तार्क्ष्य मन्त्र से ध्वजा के बाँस की गाँठें काटकर अलग कर दे ॥२९ -३० ॥ प्रासाद का विस्तार ध्वज दण्ड के बराबर हो अथवा शिखर के आधे या तृतीयांश के बराबर हो || ३१ || अथवा उसे द्वार की ऊँचाई से दूना होना चाहिए । ध्वज दण्ड देवगृह के ईशानकोण में या वायव्यकोण में स्थापित करना चाहिए || ३२ || ध्वजा रेशम या किसी अच्छे वस्त्र का हो । यह चितकबरा अथवा कोई एक रंग का हो । घण्टा, चामर और किङ्किणी से भूषित ध्वज सम्पूर्ण पापों का नाशक होता है ॥३३ ॥ दण्ड के अग्रभाग से लेकर पृथिवी तक एक वस्त्र लपेट देने से वह महाध्वज सब कामनाओं को देनेवाला
होता है । चतुर्थांश कम होने पर वह ध्वज इष्टप्रद होता है । ध्वज पर लगानेवाली पताका के मान का कोई परिमाण नहीं होता है, परन्तु ध्वजा का परिमाण बीस अंगुल से कम नहीं होता है ॥३४-३५ ॥ साधिवास विधि के अनुसार चक्र, दण्ड तथा १ घ. तद्रथकौ । २ ख. अतोर्ध्व । ३ ख. ग. घ. ' बद्धस्तैकं वि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकषष्टितमोऽध्यायः २४३ अधिवासविधानेन चक्रं दण्डं ध्वजं तथा । नेत्रोन्मीलनकं त्यक्त्वा पूर्वोक्तं सर्वमाचरेत् । ततः सहस्रशीर्षेति सूक्तं चक्रे न्यसेद्बुधः । मनोरूपेण तस्यैव सजीवकरणं स्मृतम् । नाभ्यब्जप्रतिनेमीषु न्यसेत्तत्त्वानि देशिकः । सकलं विन्यसेद्दण्डे सूत्रात्मानं सजीवकम् तच्छक्ति व्यापिनीं ध्यायेद् ध्वजरूपां बलाबलाम् । कलशे स्वर्णकलशं न्यस्य रत्नानि पञ्च च । पारदेन तु संप्लाव्य नेत्रपट्टेन छादयेत् ॐ क्षौ नृसिंहाय नमः पूजयेत्स्थापयेद्धरिम् । दधिभक्तयुते पात्रे ध्वजस्याग्रं निवेशयेत् । शिरस्याधाय तत्पात्रं नारायणमनुस्मरन् ।
ततो निवेशयेद्दण्डं मन्त्रेणाष्टाक्षरेण तु ।
देववत्सकलं कृत्वा मण्डपस्नपनादिकम् ॥ ३६ ॥
अधिवासयेद्विधिना ' शय्यायां स्थाप्य देशिकः ॥ ३७ ॥
तथा सुदर्शनं मन्त्रं मनस्तत्त्वं निवेशयेत् ॥ ३८ ॥
अरेषु मूर्तयो न्यस्याः केशवाद्याः सुरोत्तम ॥ ३ ९ ॥
नृसिंहं विश्वरूपं वा अब्जमध्ये निवेशयेत् ॥ ४० ॥
। निष्कलं परमात्मानं ध्वजे ध्यायन्यसेद्धरिम् ॥ ४१ ॥
मण्डले ' स्थाप्य चाभ्यर्च्य होमं कुण्डेषु कारयेत् ॥ ४२ ॥
स्थापयेच्चक्रमन्त्रेण स्वर्णंचक्रमधस्ततः ॥४३ ॥
। ततो निवेशयेच्चक्रं तन्मध्ये तु हरिं स्मरेत् ॥४४ ॥
ततो ध्वजं गृहीत्वा तु यजमानः सबान्धवः ॥ ४५ ॥
ध्रुवाद्येन फडन्तेन ध्वजं मन्त्रेण पूजयेत् ॥ ४६ ॥
प्रदक्षिणं तु कुर्वीत तूर्यमंगलनिःस्वनैः ॥४७ ॥
मुञ्चामि त्वेतिसूक्तेन ध्वजं मुञ्चेद्विचक्षणः ॥४८ ॥
ध्वज का देवता की भाँति मण्डप स्नान आदि कराना चाहिए । नेत्रोन्मीलन को छोड़कर ये उपर्युक्त सारी विधियाँ एकाग्र भाव से सम्पन्न होनी चाहिए । आचार्य पताका को शय्या पर रखकर उसकी विधिवत् पूजा करे ॥ ३६-३७ ॥ तत्पश्चात् ' सहस्रशीर्षा ' इत्यादि सूक्त को उस पताका पर बने हुए चक्र पर लिख दे तथा उसके ऊपर सुदर्शन मन्त्र और मनस्तत्त्व का न्यास करे ॥३८ ॥ उसका मन रूप से सजीवीकरण शास्त्रों द्वारा समर्थित है । अये सुरोत्तम! उस कमलचक्र
के प्रत्येक अरे पर केशव आदि की मूर्तियाँ न्यस्त होनी चाहिए ॥ ३ ९ ॥ आचार्य नाभि और प्रत्येक नेमि पर तत्त्वों का न्यास करे, कमल के मध्य में नृसिंह अथवा विश्वरूप का न्यास करे ॥ ४० ॥ उस दण्ड पर सकलीभूत जीवात्मा
सहित सूत्रात्मा का न्यास करे । निष्कल परमात्मा हरि का ध्यान करके ध्वज पर हरि का न्यास करे ॥४१ ॥ उस
परमात्मा की व्यापक ध्वज रूप बलाबल शक्ति का ध्यान करके उसको मण्डप में स्थापित करके उसकी पूजा करे । तदनन्तर कुण्ड में हवन करे ॥ ४२ ॥ कलश पर एक सोने का कलश रखकर उसमें पञ्चरत्न छोड़े । उसके नीचे चक्रमन्त्र
से एक स्वर्ण चक्र रखे || ४३ || उस कलश को पारद ( पारा ) से सींचकर उसे नेत्रपट्ट से ढक दे । उसके मध्य में हरि का स्मरण करते हुए चक्र को स्थापित करे ॥ ४४ ॥ ' ॐ क्षौं नृसिंहाय नमः ' इत्यादि मन्त्र से हरि की स्थापना और अर्चना करे ।
तदनन्तर बन्धु - बान्धवों सहित उस ध्वज को उठाकर एक पात्र में दही और भात रखकर उसमें निचले सिरे को रख दे । ध्रुव को आदि में और फट् को अन्त में रखकर अर्थात् ' ॐ फट् ' इत्यादि मन्त्र से ध्वज की पूजा करे ॥४५-४६ ॥ सिर पर उस पात्र को रखकर नारायण को स्मरण करता हुआ बाजे और मङ्गलगान के साथ मन्दिर की प्रदक्षिणा करे ॥४७ । पुनः ध्वजदण्ड अष्टाक्षर मन्त्र से स्थापित करे तथा ' मुञ्चामि त्वा ' इत्यादि सूक्त से ध्वज को छोड़ दे ॥४८ ॥
१ ख. घ. ' सयेच्च विधि । २ घ. मण्डपे । ३ क. ख. ङ. च. सम्प्राप्य । ४ ङ. च. ह्यौं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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अग्निपुराणम् २४४ द्विजः । एष साधारणः प्रोक्तो ध्वजस्याऽऽरोहणे विधिः ॥ ४ ९ ॥ पात्रं ध्वजं कुञ्जरादिं दद्यादाचार्यके भुवि राजा बली भवेत् ॥ ५० ॥
यस्य देवस्य यच्चिह्नं तन्मन्त्रेण स्थिरं चरेत् । स्वर्गच्छेद्ध्वजदानात्तु नामैकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽवभृथस्नानद्वारप्रतिष्ठाध्वजारोपणादिविधिकथनं अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः लक्ष्म्यादिदेवताप्रतिष्ठासामान्यविधिः श्रीभगवानुवाच समुदायेन देवादेः प्रतिष्ठां प्रवदामि ते । लक्ष्म्याः प्रतिष्ठां प्रथमं तथा देवीगणस्य च ॥ १ ॥
पूर्ववत्सकलं कुर्यान्मण्डपस्नपनादिकम् । भद्रपीठे श्रियं न्यस्य स्थापयेदष्ट वै घटान् ॥२ ॥
घृतेनाभ्यज्य मूलेन स्नापयेत्पञ्चगव्यकैः । हिरण्यवर्णां हरिणीं नेत्रे चोन्मीलयेच्छ्रियाः २ || ३ || तां म आवह इत्येवं प्रदद्यान्मधुरत्रयम् । अश्वपूर्णेति पूर्वेण तां कुम्भेनाभिषेचयेत् ॥४ ॥
कांसोऽस्मितेति ' याम्येन ' पश्चिमेनाभिषेचयेत् । चन्द्रां प्रभासामुच्चार्याऽऽदित्यवर्णेति चोत्तराम् ॥५ ॥
द्विज आचार्य को पात्र, ध्वज, हाथी आदि दक्षिणा में दे । यह ध्वजारोहण की साधारण विधि है ॥४९ ॥ जिस देव का
जो चिह्न है, उस मन्त्र से ध्वजा को स्थिर करना चाहिए । मनुष्य ध्वज - दान से स्वर्ग प्राप्त करता है और इस पृथिवी पर बलवान् राजा बनता है ॥५० ॥
श्री अग्निमहापुराण में अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा ध्वजारोपणादि विधि वर्णन नामक इकसठवाँ अध्याय समाप्त ॥६१ ॥
अध्याय ६२ लक्ष्मी आदि की प्रतिष्ठा विधि श्री भगवान् बोले - अब मैं तुमसे सामूहिक रूप से देवों की प्रतिष्ठा के विषय में बतला रहा हूँ । पहले लक्ष्मी और देवियों की प्रतिष्ठा विधि को सुनो, पूर्व की भाँति मण्डप - स्नान आदि सब विधियाँ सम्पन्न कर भद्रपीठ पर लक्ष्मी का न्यास करे और आठ कलशों को स्थापित कर पूजन करे ॥१-२ ॥ घी से नहलाकर मूलमन्त्र से पञ्चगव्य से स्नान कराये । ' हिरण्यवर्णा हरिणी ' इत्यादि मन्त्र से लक्ष्मी का नेत्रोन्मीलन करे ॥३ ॥ ' तां म आवह ' इत्यादि मन्त्र
से तीन प्रकार के मधुर पदार्थ अर्पित करे । ' अश्वपूर्वा ' इत्यादि मन्त्र से पूर्व की ओर स्थापित किये हुए कलश के जल से स्नान कराये || ४ || ' कांसोऽस्मि ' इत्यादि मन्त्र से दक्षिण दिशावाले कलश से ' चन्द्रांप्रभासां ' इत्यादि मन्त्र से पश्चिम घट और ‘ आदित्यवर्णे इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्तर दिशावाले कलश से नहलावे || ५ || १ ख. ‘ नाभ्युक्ष्य मू ' । २ क. ङ ' या । तस्मादावाह ' । घ. ' या ' । तन्म आ ' । च. याः । श्रियामावाह ' । ३ घ. अश्वपूर्वेति । ४ ख. पूर्णेन । ५ घ. कामोऽस्मितेति । ६ घ. चन्द्रं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्विषष्टितमोऽध्यायः २४५ उपैतु मेति चाऽऽग्नेयात्क्षुत्पिपासेति नैऋतात् । ईशानकलशेनैव शिरः सौवर्णकर्दमात् । आर्द्रा पुष्करिणीं गन्धैरार्द्रामित्यादिपुष्पकैः । श्रायन्तीयेन शय्यायां श्रीसूक्तेन च संनिधिम् । श्रीसूक्तेन मण्डपेऽथ कुण्डेष्वब्जानि होमयेत् । गृहोपकरणान्तादि श्री सूक्तेनैव चार्पयेत् । ( “ मात्रार्थे ' पिण्डिकां कृत्वा प्रतिष्ठानं ततः श्रियाः ) । चिच्छक्ति बोधयित्वा तु मूलात्सांनिध्यकं चरेत् । एवं देव्योऽखिलाः स्थाप्य ' राज्यस्वर्गादिभाग्भवेत् गन्धद्वारेति वायव्यान्मनसः काममाकृतिम् ॥६ ॥
एकाशीतिघटैः स्नानं मन्त्रेणायं सृजन्क्षितम् ॥७ ॥
तां म आवह मन्त्रेण आनन्द इति चाखिलम् ॥८ ॥
लक्ष्मीबीजेन चिच्छक्ति विन्यस्याभ्यर्चयेत्पुनः ॥ ९ ॥
करवीराणि वा हुत्वा सहस्त्रं शतमेव वा ॥ १० ॥
ततः प्रासादसंस्कारं सर्वं कृत्वा तु पूर्ववत् ॥ ११ ॥
श्रीसूक्तेन च सांनिध्यं पूर्ववत्प्रत्यृचं " जपेत्॥१२ ॥
भूस्वर्णवस्त्रगोन्नादि गुरवे ब्रह्मणेऽर्पयेत् ॥१३ ॥
॥१४ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये लक्ष्म्यादिदेवताप्रतिष्ठासामान्यविधिकथनं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
' उपैतु मां ' इत्यादि मन्त्र से आग्नेय घट से, ' क्षुत्पिपासा ' इत्यादि मन्त्र से नैर्ऋत्य कलश से, ' गन्धद्वारा ' इत्यादि मन्त्र से वायव्य से तथा ‘ मनस: काममाकृतिं ' इस मन्त्र से ईशान कलश के जल से अभिषेक करना चाहिए । ' कर्दमेन प्रजाभूता ' इत्यादि मन्त्र से सुवर्णमय कलश के यव और इक्यासी कलशों के जल से ' आपः सृजन्तु ' इस मन्त्र से नहलाये, ‘ आर्द्रा पुष्करिणी ' इत्यादि मन्त्र से गन्ध अर्पण करे । ' आर्द्रा यः करिणी ' इत्यादि मन्त्र से पुष्प चढ़ावे । ' तां म आवह ' इत्यादि मन्त्र से तथा ' आनन्द ' इत्यादि श्लोक से अखिल सामग्रियों को चढ़ावे ॥ ६-८ ॥ श्रायन्तीय सूक्त से शा पर लिटावे, श्रीसूक्त से सन्निधीकरण करे और लक्ष्मीबीज से चिच्छक्ति का विन्यास करके पुनः अर्चन करे || ९ || तदनन्तर मण्डप के मध्य में कुण्ड में श्रीसूक्त से कमल का हवन करे अथवा सौ या हजार करवीर के फूलों का हवन करे ॥१० ॥ गृहोपयोगी वस्तुओं को श्रीसूक्त से अर्पित करे । तत्पश्चात् पूर्व की भाँति मन्दिर का तथा पिण्डिका
का संस्कार करके लक्ष्मी की प्रतिष्ठा करे । पहले की ही भाँति श्रीसूक्त से सन्निधीकरण करके प्रत्येक ऋचा का पाठ ॥११-१२ ॥ मूल मन्त्र से चिच्छक्ति को उबुद्ध करके सन्निधीकरण करे । पूजा समाप्त करके गुरु को भूमि, स्वर्ण, करे और अन्न आदि अर्पित करे । इस प्रकार अखिल देवियों की स्थापना करने से मनुष्य राज्य और स्वर्ग का वस्त्र, गाय अधिकारी होता है ॥१३-१४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में लक्ष्मी आदि देवताओं की प्रतिष्ठाविधिवर्णन नामक बासठवाँ अध्याय समाप्त ॥६२ ॥
१ घ. ‘ णापः सृ ° । २ ‘ कैः । तन्म आ ° । ३ घ. शायन्तीयेन । ४ ख णाशादि । ५ मात्रार्थे " श्रियाः घ पुस्तके नास्ति । ६ घ. मन्त्रेण । ७ ङ यजेत् । ८ घ. स्थाप्याऽऽवाह्य स्वर्गादि भावयेत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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२४६ अग्निपुराणम् अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः विष्ण्वादिदेवताप्रतिष्ठासामान्यविधिः पुस्तकलेखनविधिश्च श्रीभगवानुवाच एवं तार्क्ष्यस्य चक्रस्य ब्रह्मणो नृहरेस्तथा । प्रतिष्ठा विष्णुवत्कार्या स्वस्वमन्त्रेण तां शृणु ॥ | १ || सुदर्शन महाचक्र शान्त दुष्टभयङ्कर, छिन्धि च्छिन्धि भिन्धि भिन्धि विदारय विदारय परमन्त्रान्ग्रेस ग्रस भक्षय भक्षय भूतांस्त्रासय त्रासय हुं फट् सुदर्शनाय नमः ॥२ ॥
अभ्यर्च्य चक्रं चानेन रणे दारयते रिपून् ॥३ ॥
क्षौं नरसिंह उग्ररूप ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्वाहा ॥४ ॥
नरसिंहस्य मन्त्रोऽयं पातालाख्यस्य ' वच्मि ते 11411 ॐ क्षौं नमो भगवते नरसिंहाय प्रदीप्तसूर्यकोटिसहस्त्रसमतेजसे वज्रनखदंष्ट्रायुधाय स्फुटविकटविकीर्णकेशरसटाप्रक्षुभितमहार्णवाम्भोदुन्दुभिनिर्घोषाय सर्वमन्त्रोत्तारणाय एह्येहि भगवन्नरसिंह पुरुष परापरब्रह्म सत्येन स्फुर स्फुर विजृम्भ विजृम्भ आक्रम आक्रम गर्ज गर्ज मुञ्च मुञ्च सिंहनादं विदारय विदारय विद्रावय विद्रावयाऽऽविशाऽविश सर्वमन्त्ररूपाणि मन्त्रजातीश्च हन हन च्छिन्द च्छिन्द संक्षिप संक्षिप दर दर दारय दारय स्फुट स्फुट स्फोटय स्फोटय ज्वालामालासंघातमयसर्वतोऽनन्तज्वाला-वज्राशनिचक्रेणसर्वपातालानुत्सादयोत्सादय सर्वतोऽनन्तज्वालावज्रशरपञ्जरेण सर्वपातालान्परिवारय परिवारय सर्वपातालासुरवासिनां हृदयान्याकर्षयाकर्षय शीघ्रं दह दह पच पच मथ मथ शोषय शोषय निकृन्तय निकृन्तय तावद्यावन्मे वशमागताः पातालेभ्यः ( ' फडसुरेभ्यः फण्मन्त्ररूपेभ्यः फण्मन्त्रजातिभ्यः फट् संशयान्मां भगवन्नरसिंहरूप विष्णो सर्वापद्भ्यः ) सर्वमन्त्ररूपेभ्यो रक्ष रक्ष हुं फण्नमो नमस्ते ॥६ ॥
अध्याय ६३ विष्णु आदि देवताओं की प्रतिष्ठाविधि एवं पुस्तकलेखन विधि श्री भगवान् बोले - इसी प्रकार गरुड़, चक्र, ब्रह्मा और नृसिंहदेव की प्रतिष्ठा भी विष्णु की भाँति उन - उन देवों के मन्त्रों से करनी चाहिए । अब उसे ( मुझसे ) सुनिये ॥१ ॥ सुदर्शन महाचक्र, शान्त, दुष्ट, भयङ्कर, छिन्धि,
छिन्धि, भिन्धि, भिन्धि, विदारय, विदारय, परमन्त्रान् ग्रस ग्रस, भक्षय, भक्षय, भूतांस्त्रासय, त्रासय हुं फट् सुदर्शनाय नम: -इस मन्त्र से चक्र की पूजा करने से रण में शत्रुओं का नाश होता है ॥ २-३ ॥ ' ॐ क्षौं नरसिंह उग्र रूप ज्वल-· ज्वल प्रज्वल - प्रज्वल स्वाहा ' । यह नरसिंह भगवान् का मन्त्र है । अब मैं तुमको पाताल नृसिंह मन्त्र का उपदेश करता हूँ । ॐ क्षौँ नमो भगवते नरसिंहाय प्रदीप्तसूर्यकोटिसहस्रसमतेजसे नमो नमस्ते । यह श्रीहरिस्वरूपिणी नृसिंह विद्या १ ङ ' लाक्षस्य । CC २ - 0 क . JK. घ Sanskrit . च. Academy स्भोददुभि , Jammmu । ३. क Digitized . ङ. च by. ' S3 नादान्विद्रा Foundation । घ. सर सर । ५ फडसुरेभ्य " सर्वापद्भ्यः ।