अग्नि पुराण — पृष्ठ 371–380

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

अग्नि पुराण, पृष्ठ 371 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षण्णवतितमोऽध्यायः नाभिकन्दात्समुच्चार्य घण्टानादविसर्पणम् । मन्त्रं च मनसाऽभिन्नं प्राप्तानन्दरसोपमम् । अष्ट ( ष्टा ) त्रिंशत्कलोपेतं सहस्रकिरणोज्ज्वलम् । जीवन्यासो भवेदेवं लिङ्गे सर्वार्थसाधकः । पिण्डिको च कृतस्नानां विलिप्तां चन्दनादिभिः । पञ्चरत्नादिसंयुक्तां लिङ्गस्योत्तरतः स्थिताम् । कृतस्नानादिकां तत्र लिङ्गमूले शिलां न्यसेत् । प्रणवपूर्वं हुं पूं ह्रीं मध्यादन्यतयेन च । भस्मदर्भतिलैः कुर्यात्प्राकारत्रितयं ततः । ॐ हूं ह्वां क्रियाशक्तये नमः । ॐ हूं ह्रां हः, महागौरी ( रि ) रुद्रदयिते स्वाहेति च पिण्डिकायाम् । ॐ हामाधारशक्तये नमः । ॐ हां वृषभाय नमः ३६७ ब्रह्मादिकारणत्यागाद्द्वादशान्तसमाश्रितम् ॥९ २ ॥ द्वादशान्तात्समानीय निष्कलं व्यापकं शिवम् ॥ ९ ३ ॥ सर्वशक्तिमयं सांगं ध्यात्वा लिङ्गे निवेशयेत् ॥९ ४ ॥ पिण्डिकादिषु ' तु न्यासः प्रोच्यते साम्प्रतं यथा ॥९ ५ ॥ सवस्त्रैश्च समाच्छाद्य रन्ध्रे च भगलक्षणे ॥९ ६ ॥ लिङ्गवत्कृतविन्यासां विधिवत्सम्प्रपूजयेत् ॥९ ७ ॥ कृतस्नानादिसंस्कारं शक्त्यन्तं वृषभं तथा ॥९ ८ ॥ क्रियाशक्तियुतां पिण्डीं शिलामाधाररूपिणीम् ॥९९ ॥

रक्षायै लोकपालांश्च सायुधान्योजयेद्बहिः ॥ १०० ॥

॥१०१ ॥

उच्चारण करना चाहिए । इन मन्त्रों के उच्चारण की ध्वनि घण्टानाद से मिश्रित हो जाती है । मन्त्रों को हृद् देश में ले जाकर द्वादश - दल - कमल मण्डल में स्थापित शिवलिङ्ग में विलीन कर देना चाहिए । वहाँ पर अड़तीस कलाओं से युक्त, सहस्र किरणों से उज्ज्वल तथा सर्वशक्तिमय शिव का अङ्गदेवताओं सहित ध्यान करके शिवलिङ्ग में इस रूप का न्यास करे । इस प्रकार सकल कामनाओं को सिद्ध करनेवाला जीवन्यास शिवलिङ्ग में सम्पन्न होता है ॥९ १ - ९ ४३ ॥ अब मैं पिण्डिका ( ताँबे आदि की बनी हुई पीढ़ी ), जिस पर शिवलिङ्ग स्थापित किया जाता है, आदि में न्यास की विधि बतला रहा हूँ । पिण्डिका को नहलाकर उसके ऊपर चन्दन आदि का लेप करना चाहिए । फिर उसे उत्तम वस्त्र से ढँककर शिवलिङ्ग की भाँति न्यास करके विधिपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिए । पिण्डिका का छिद्र भगाकार होना चाहिए । उसमें पाँच रत्न जड़े होने चाहिए तथा उसे शिवलिङ्ग से उत्तर दिशा में रखना चाहिए । इसके बाद उसे पुनः नहलाकर उसके ऊपर शिवलिङ्ग की जड़ में शिला का न्यास करे । तदनन्तर ' ॐ हूं ह्रां क्रियाशक्तये नमः ', ' ॐ हूं ह्रां हः महागौरी रुद्रदयिते स्वाहा ', ‘ ॐ हामाधारशक्तये नमः ', ' ॐ हां वृषभाय नमः ' - इन मन्त्रों से शक्ति, वृषभ, क्रियाशक्ति से युक्त पिण्डी तथा आधाररूपिणी शिला का स्नान आदि संस्कारपूर्वक पूजन करके भस्म, कुश तथा तिल से तीन प्राकारों की रचना करे और रक्षा के लिए बाहर आयुध सहित लोकपालों को स्थापित करे दे ॥ ९५-१०१ ॥ तत्पश्चात् धारिका, १ ख. ग. ' षु भून्या " । २ ख. शक्त्या तं वृ । ३ क. ङ. च. हूं । ख. ग. हूं । ४ ख. ग. ॐ हूं हं क्रि । ५ क. ङ. च. ॐ ह्रीं सः म । ६ ख. हं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 372

अग्नि पुराण, पृष्ठ 372 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ३६८ धारिकादीप्तिमत्युग्रा ज्योत्स्ना चैता बलोत्कटाः । वामा ज्येष्ठा क्रिया ज्ञाना वेधा ' त्रिस्रोऽथ वा न्यसेत् । तमी मोहा क्षमी निष्ठा मृत्युर्मायाभवज्वराः तिस्त्रोऽथ वा क्रिया ज्ञाना तथा बाधादिनायिका अत्रापि पिण्डिका ब्रह्मशिलादिषु यथाविधि एवं विधाय विन्यासं गत्वा कुण्डान्तिकं ततः क्रियाशक्तिं तथाऽन्यासु नादमोष्ठे च विन्यसेत् पद्मतन्तुसमां शक्तिमुद्वातेन * समुद्यताम् पुनश्च शून्यमार्गेण विशन्तीं स्वस्य चिन्तयेत् सम्पूज्य धारिकां शक्तिं कुण्डे सन्तर्प्य च क्रमात् सम्पूज्य तर्पयित्वा तु सन्निधौ संहिताणुभिः तथा धात्री विधात्री च न्येसद्वा पञ्चनायिकाः ॥१०२ ॥

क्रिया ज्ञाना तथेच्छा च पूर्ववच्छान्तिमूर्तिषु ॥१०३ ॥

। पञ्च चाथ महामोहा घोरा ` रात्रिमयाज्वराः ॥१०४ ॥

। आत्मादित्रिषु तत्त्वेषु तीव्रमूर्तिषु विन्यसेत् ॥ १०५ ॥

। गौर्यादिसंवरैरेव पूर्ववत्सर्वमाचरेत् ॥ १०६ ॥

। कुण्डमध्ये महेशानं मेखलासु महेश्वरम् ॥१०७ ॥

। घटं स्थण्डिलवह्नीशैर्नाडीसंधानकं ततः ॥ १०८ ॥

। विशन्ती ' ( न्तीं ) सूर्यमार्गेण निःसरन्तीं समुद्गताम् ॥१०९ ॥

। एवं सर्वत्र सन्धेयं मूर्तिपैश्च परस्परम् ॥ ११० ॥

। तत्त्वतत्त्वेश्वरान्मूर्तिमूर्तीशांश्च घृतादिभिः ॥१११ ॥

। शतं सहस्रमर्थं वा पूर्णया सह होमयेत् ॥ ११२ ॥

तत्त्वतत्त्वेश्वरान्मूर्ति मूर्तीशांश्च करेणुकान् । तथा संतर्प्य सांनिध्ये जुहुयुर्मूर्तिपा अपि ॥ ११३ ॥

ततो ब्रह्ममिरङ्गैश्च द्रव्यकालानुरोधतः । सन्तर्प्य शान्तिकुम्भाम्भः प्रोक्षिते कुशमूलतः ॥ ११४ ॥

दीप्तिमती, उग्रा, ज्योत्स्ना, बलोत्कटा, धात्री तथा विधात्री का अथवा वामा, ज्येष्ठा, क्रिया, ज्ञाना, वेधा इन पाँच नायिकाओं का अथवा क्रिया, ज्ञाना, इच्छा - इन तीन नायिकाओं का पूर्ववत् शान्तिमूर्तियों में न्यास करना चाहिए । इसी प्रकार तमी, मोहा, क्षमी, निष्ठा, मृत्यु, माया तथा भवज्वरा का अथवा महामोहा, घोरा, रात्रिमया - इन तीन नायिकाओं का अथवा क्रिया, ज्ञाना, बाधाविनायिका - इन तीन नायिकाओं का आत्मा आदि तीन तत्त्वों में तथा तीव्र मूर्तियों में न्यास करे । यहाँ भी पिण्डिका तथा ब्रह्मशिला आदि में गौरी आदि के साथ शिव की पूजा करनी चाहिए । इस प्रकार का न्यास करके कुण्ड के समीप जाकर कुण्ड के मध्य में महेशान का, अन्य स्थानों पर क्रियाशक्ति का और ओष्ठ पर नाद का न्यास करना चाहिए । तदनन्तर गुरु घट, स्थण्डिल, अग्नि तथा ईश के साथ नाड़ियों का सन्धान करके अपनी शक्ति का इस प्रकार ध्यान करे कि पद्म तन्तु के समान स्वरूपवाली शक्ति वायुलोक तथा सूर्यलोक में प्रवेश करके पुनः वहाँ से निकलकर शून्य मार्ग से अपने स्वरूप में प्रवेश कर रही है ॥१०२-१०९ ३ ॥ इसी प्रकार मूर्तिरक्षक पुजारी भी सर्वत्र सन्धान करे । तदनन्तर गुरु कुण्ड में धारिका शक्ति का पूजन तथा तर्पण करके उसके समीप संहिता मन्त्रों द्वारा क्रमशः तत्त्व, तत्त्वेश्वर, मूर्ति और मूर्तीशों का घृत आदि से पूजा और तर्पण करे तथा एक हजार या पाँच सौ बार हवन करके पूर्णाहुति दे । गुरु की भाँति मूर्तिरक्षक इतर ब्राह्मण भी कुण्ड के समीप अपने - अपने तत्त्व, तत्त्वेश, मूर्ति, मूर्तीशों का पूजन - तर्पण करके हवन करे । तदनन्तर गुरु द्रव्य, काल के अनुसार पंथ ब्रह्ममन्त्रों और अङ्गमन्त्रों से पुन: पूजन- न - तर्पण करके शान्तिकुम्भ के जल से नहलाये शिवलिङ्ग के मूल को कुश के मूल से स्पर्श करे । तत्पश्चात् जितनी आहुतियाँ १ क. ख. ग. ङ. च. रोधा । २ घ. रा. च. त्रितयज्व ' । ३ ख. ग. ' धा विनायका । ४ ख. ' मुद्धाते । ५ क. ख. ग. ङ. च. ' ती शून्यमा ' । ६ घ. र्घ्य शक्तिं कु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 373

अग्नि पुराण, पृष्ठ 373 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षण्णवतितमोऽध्यायः लिङ्गमूलं च संस्पृश्य जपेयुर्होमसंख्यया । एवं संशोध्य ब्रह्मादिविष्ण्वन्तादिविशुद्धये । कुशामध्याग्रयोगेन ( ण ) लिङ्गमध्याग्रकं स्पृशेत् । ' ॐ हां हम् ', ओम् ', ओम्, ओम्, एम्, ॐ भू भुं बाह्यमूर्तये नमः । ॐ ' हां वाम् ', आम्, ओम्, आं षाम् ॐ भुं भूं वां वह्निमूर्तये नमः एवं च यजमानादिमूर्तिभिरभिसंधेयम् । मूलेन स्वीयबीजैर्वा ज्ञेयं तत्त्वत्रयात्मके 1 । भागाभागविशुद्ध्यर्थं होमं कुर्याच्छतादिकम् । हुत्वाऽथ यत्कृतं कर्म शिवश्रोत्रे निवेदयेत् । ॐ नमो भगवते रुद्राय रुद्र नमोऽस्तु ते । ॐ ह्रीं शांकरि पूरय स्वाहा, इति पिण्डिकायाम् अथ लिङ्गे न्यसेज्ज्ञानी क्रियाख्यं पीठविग्रहे । ३६ ९ संनिधानं हृदा कुर्युर्वर्मणा चावगुण्ठनम् ॥ ११५ ॥

विधाय पूर्ववत्सर्वं होमसंख्याजपादिकम् ॥११६ ॥

यथा यथा च सन्धानं तदिदानीमिहोच्यते ॥११७ ॥

॥११८ ॥

पञ्चमूर्त्यात्मकेऽप्येवं सन्धानं हृदयादिभिः ॥ ११ ९ ॥ शिलापिण्डी वृषेष्वेवं पूर्णाछिन्नं सुसंवरै ॥ १२० ॥

न्यूनादिदोषमोक्षाय शिवेनाष्टाधिकं शतम् ॥ १२१ ॥

एतत्समन्वितं कर्म त्वच्छक्तौ च मया प्रभो ॥ १२२ ॥

विधिपूर्णमपूर्णं वा स्वशक्त्याऽऽपूर्य गृह्यताम् ॥१२३ ॥

॥१२४ ॥

आधाररूपिणीं शक्तिं न्यसेद्ब्रह्मशिलोपरि ॥१२५ ॥

दी गयी हों, उतनी बार मन्त्र का जाप करके हृदय - मन्त्र से शिव का आवाहन और कवच - मन्त्र से उनकी अवगुण्ठन क्रिया सम्पन्न करे । पुनः प्रारम्भ में ब्रह्मा और अन्त में विष्णु युक्त शिवलिङ्ग की शुद्धि के लिए पूर्ववत् हवन तथा जप आदि करके कुश के मध्य अग्रभाग से शिवलिङ्ग के मध्य तथा अग्रभाग का स्पर्श करे । उसके बाद जिस प्रकार से सन्धान करना चाहिए, उसे अब मैं बता रहा हूँ ॥११०-११७ ॥ ' ॐ हां हम्, ओम्, ओम्, ओम्, एम्, ओम् धूं धूं ब्राह्ममूर्तये नमः ’ और ‘ ॐ हां वाम् आं ॐ आम्, षां ॐ भुं भूं वह्निमूर्तये नमः ' - इन मन्त्रों से शिव की यजमान आदि मूर्तियों के साथ शिवलिङ्ग का अभिसन्धान करना चाहिए । इसी प्रकार पाँच मूर्ति रूप शिवलिङ्ग में भी हृदय - मन्त्रों से सन्धान करना चाहिए । तीन तत्त्व रूप शिवलिङ्ग में मूलमन्त्र या बीजमन्त्रों से सन्धान करके इसी प्रकार शिलापिण्डिका और वृषभ में भी अपने - अपने मन्त्रों से सन्धान करना चाहिए । तदनन्तर शिवलिङ्ग के भिन्न - भिन्न भागों की शुद्धि के लिए शिव मन्त्र से एक सौ आठ बार आहुतियाँ देकर न्यूनाधिक्य दोषों का निराकरण कर देना चाहिए । हवन के पश्चात् जो कुछ कर्म किया जा चुका है, उसे शिव के कान में यह कहकर निवेदन करे कि “ हे प्रभो! भगवान् रुद्र को ( मेरा ) नमस्कार है । हे रुद्र! आपको नमस्कार है । मैंने जो कुछ कर्म विधिपूर्वक अथवा बिना विधान के किया है, उसे आप अपनी शक्ति से पूरा करके ग्रहण कर लीजिये । ” इसके बाद गुरु पिण्डिका का स्पर्श करते हुए यह मन्त्र पढ़े- ' ॐ ह्रीं शांकरि पूरय स्वाहा । ' तदनन्तर ज्ञानी गुरु पीठविग्रह शिवलिङ्ग में क्रिया का न्यास करके ब्रह्मशिला के ऊपर आधाररूपिणी शक्ति का न्यास करे । इतनी क्रिया सम्पन्न कर लेने के बाद सात १. क. ङ. च. ॐ हाम्, ओम्, ओम्, वाम्, ओ भू भुवो रवम् । २ ख. हाम् । ३ ख. ग. ' म् ए । ४ ख. ग. भूं ब्र । ५ क. ङ. च. ॐ हम्, ओम्, ओम्, ओम्, वाम्, ॐ भुं । ६ ख. ' भू, ओम्, ओम्, ओम्, वाम्, ॐ भुं । ७ क. ङ. च. ' तन्मयाऽर्पित ' । २४ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 374

अग्नि पुराण, पृष्ठ 374 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ३७० निबध्य सप्तरात्रं वा पञ्चरात्रं त्रिरात्रकम् । एकरात्रमथो वाऽपि यद्वा सद्योऽधिवासनम् ॥१२६ ॥

विनाऽधिवासनं यागः कृतोऽपि न फलप्रदः । स्वमन्त्रैः प्रत्यहं देयमाहुतीनां शतं शतम् ॥ १२७ ॥

शिवकुम्भादि पूजां च दिग्बलिं च निवेदयेत् । गुर्वादिसहितो वासो रात्रौ नियमपूर्वकम् ॥ अधिवासः ' स वसतेरधेर्भावे ' घ ईरितः ॥१२८ ॥

महापुराण आग्नेये प्रतिष्ठायामधिवासन विधिकथनं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ६ ॥ इत्यादि अथ सप्तनवतितमोऽध्यायः शिवप्रतिष्ठाविधिः ईश्वर उवाच प्रातर्नित्यविधिं कृत्वा द्वारपालप्रपूजनम् । प्रविश्य प्राग्विधानेन देहशुद्ध्यादिमाचरेत् ॥१ ॥

दिक्पतींश्च समभ्यर्च्य शिवकुम्भं च वर्धनीम् । अष्टमुष्टिकया लिङ्गं वह्निं सन्तर्प्य च क्रमात् || २ || शिवाज्ञातस्ततो गच्छेत्प्रासादं शस्त्रमुच्चरन् । तद्गतान्प्रक्षिपेद्विघ्नान्हुंफडन्तशराणुना ॥३ ॥

तन्मध्ये स्थापयेल्लिङ्गं वेधदोषविशङ्कया । तस्मान्मध्यं परित्यज्य यवार्धेन यवेन वा ॥४ ॥

रात, पाँच रात या तीन रात या एक रात इस स्थान में अधिवास करना चाहिए । क्योंकि बिना अधिवासन के किया हुआ यज्ञ कार्य फलदायक नहीं होता है । प्रत्येक दिन अपने मन्त्रों से सौ - सौ बार आहुतियाँ देकर शिवकुम्भ आदि का पूजन और दिशाओं को बलि समर्पण भी करना चाहिए । रात्रि में गुरु आदि के साथ नियमपूर्वक वास करने को अधिवास कहते हैं । यह शब्द अधि पूर्वक ' वस् ' धातु से भाव में घञ् प्रत्यय लगाने से सिद्ध होता है ॥ ११८-१२८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में प्रतिष्ठान्तर्गत अधिवास- विधिवर्णन नामक छानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥९ ६ ॥ अध्याय ९ ७ शिवप्रतिष्ठा - विधि महादेव बोले - गुरु प्रात: कालीन नित्य कर्म सम्पन्न कर द्वारपालों का पूजन तथा पूर्वोक्त रीति से मन्दिर में प्रवेश करके देहशुद्धि आदि कर्म करे । दिक्पालों तथा शिवकुम्भ और वर्धनी का पूजन करके, अष्टपुष्पिका से शिवलिङ्ग की अर्चना कर क्रमशः आहुति देकर अग्निदेव को तृप्त करे । तदनन्तर शिव की आज्ञा प्राप्त करके, शस्त्र - मन्त्र का उच्चारण करते हुए मन्दिर में प्रवेश करे और वहाँ के सकल विघ्नों को ' हुं फट् ' से अन्त होनेवाले शर मन्त्र से दूर करके मन्दिर के मध्य में शिवलिङ्ग की स्थापना करे । किन्तु वेध दोष न लग जाय इसलिए एक या आधे यव १ अधिवास ईरितः क. ङ. च. नास्ति । २ घ. ' र्भावः समीरि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 375

अग्नि पुराण, पृष्ठ 375 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तनवतितमोऽध्यायः किञ्चिदीशानमाश्रित्य शिलामध्ये निवेशयेत् सर्वगां सृष्टियोगेन ' विन्यसेदचलां शिलाम् ॐ नमो व्यापिनि भगवति ' स्थिरेऽचले ध्रुवे त्वया शिवाज्ञया शक्ते स्थातव्यमिह संततम् वज्रादीनि च रत्नानि तथोशीरादिकौषधीः । धान्यप्रभृतिसस्यांश्च पूर्वमुक्ताननुक्रमात् भावयन्नेकचित्तस्तु लोकपालेशसंवरैः हेमजं तारजं कूर्मं वृषं वा द्वारसम्मुखम् प्रक्षिपेन्मध्यगर्तादौ यद्वा मेरुं सुवर्णजम् पृथिवीं राजतीं यद्वा यद्वा हेमसमुद्भवाम् । स्वर्णजं राजतं वाऽपि सर्वलोहसमुद्भवम् । देवदेवस्य शक्त्यादिमूर्तिपर्यन्तमासनम् । श्वभ्रमाच्छाद्य वस्त्रेण तनुत्रेणास्त्ररक्षितम् । ३७१ । मूलेन तामनन्ताख्यं सर्वाधारस्वरूपिणीम् ॥५ ॥

। अथवाऽनेन मन्त्रेण शिवस्याऽऽसनरूपिणीम् ॥६ ॥

। ह्री ' लं ह्रीं स्वाहा ॥७ ॥

। इत्युक्त्वा स समभ्यर्च्य निरुध्याद्रोधमुद्रया ं ॥८ ॥

लोहान्हेमादिकांस्यान्तान्हरितालादिकांस्तथा ॥९ ॥

। प्रभारागत्वदेहत्ववीर्यशक्तिमयानिभान् ॥१० ॥

। पूर्वादिषु च गर्तेषु न्यसेदेकैकशः क्रमात् ॥११ ॥

। सरित्तटमृदा युक्तं पर्वताग्रमृदाऽथ वा ॥१२ ॥

। मधूकाक्षतसंयुक्तमञ्जनेन समन्वितम् ॥१३ ॥

सर्वबीजसुवर्णाभ्यां समायुक्तां विनिक्षिपेत् ॥१४ ॥

सुवर्णं कृशरायुक्तं पद्मनालं ततो न्यसेत् ॥१५ ॥

प्रकल्प्य पायसेनाथ लिप्त्वा गुग्गुलुनाऽथ वा ॥१६ ॥

दिक्पतिभ्यो बलिं दत्वा समाचान्तोऽथ देशिकः ॥१७ ॥

के बराबर मध्य भाग को छोड़कर किञ्चित् ईशानकोण की तरफ आकर शिला को प्रतिष्ठित करना चाहिए । ‘ अनन्ता ’ नाम की, सबकी आधारस्वरूपा, सर्वगामिनी तथा अचलाशिला को मूल मन्त्र से स्थापित कर लेना चाहिए । अथवा ‘ ॐ नमो व्यापिनि भगवति स्थिरेऽचले ध्रुवे । ह्रीं लं ह्रीं स्वाहा ' - इस मन्त्र से शिव की आसनरूप शिला को स्थापित करके ' हे शक्ते! तुम शिव की आज्ञा से यहाँ सतत स्थापित रहना ' कहकर उसकी पूजा करके रोधमुद्रा से उसे रोक दे ॥१-८ ॥ तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर लोकपाल तथा शिव के मन्त्रों को पढ़कर पूर्वोक्त वज्र आदि रत्नों, उशीर आदि वनस्पतियों, लोहा, सोना, काँसा आदि धातुओं, हरिताल आदि खनिजों और धान्य आदि सस्यों तथा अन्य वस्तुओं में क्रमशः प्रभा, रागत्व, देहत्व तथा वीर्य शक्ति की भावना करके लोकपालों के मन्त्रों से मन्दिर की पूर्व आदि दिशाओं में खोदे हुए गड्ढों में एक - एक करके सभी वस्तुओं को डाल दे । द्वार की ओर मुँह करके सोने या चाँदी के बने हुए कछुए या बैल को स्थापित करके बीच के गड्ढे में महुआ, अक्षत, अञ्जन तथा नदी के किनारे की मिट्टी या पर्वत की शिखर की मिट्टी से युक्त सोने का बना हुआ मेरु डाल दे । तत्पश्चात् सर्वबीज और सुवर्ण से युक्त सोने या चाँदी की बनी पृथिवी और सोने या चाँदी का या सब प्रकार के लोहों से बना पद्मनाल सोने तथा खिचड़ी के साथ डाल दे । उसके बाद शिव तथा शक्ति आदि की मूर्तियों के लिए आसनों की रचना करके गड्ढे को खीर या गुग्गुल से लीप दे और फिर अस्त्र - मन्त्र से उसकी रक्षा करके कवच-मन्त्र पढ़ते हुए वस्त्र से उसे ढँक दे ॥९ - १६ ६३॥ तत्पश्चात् दिक्पालों को बलि समर्पण कर, आचमन करके १ ख. “ ष्टिघोषेण वि ' । २ क. ङ. च. ' ति स्वा । ३ ख. रे ध्रु । ४ ६. हूं । ५ क. ङ. च. ध्यात्क्रोधं । घ. ध्याद्रौद्रमु ° । ६ क. ङ. च. ' र्तार्यां य । ख. ग. र्तानां ' य ' । ७ क. ख. ग. ङ. च. ' मवालं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 376

अग्नि पुराण, पृष्ठ 376 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् 3 ३७२ शिवेन वा शिलाश्वभ्रसङ्गदोषनिवृत्तये ।

एकैकाहुतिदानेन संतर्प्य वास्तुदेवताः ।

गुरुर्देवाग्रतो गच्छेन्मूर्तिपैश्च दिशि स्थितैः ॥

प्रासादादि परिभ्रम्य भद्राख्यद्वारसंमुखम् । द्वारेण द्वारबन्धेन द्वारदेशेन तद्विच्छि ( तच्छि (? ) ला: । वर्जयन्द्वारसंस्पर्शं द्वारेणैव महेश्वरम् । अयमेव विधिर्ज्ञेयोऽव्यक्तलिङ्गेऽपि सर्वतः । अपद्वारप्रवेशेन विदुर्गोत्रक्षयं गृहम् तूर्यमङ्गलनिर्घोषैर्दूर्वाक्षतसमन्वितम् अपनीय घटं श्वभ्राद्देशिको मूर्तिपैः सह शक्तिशक्तिमतोरैक्यं ध्यात्वा चैव तु रक्षितम् अंशेन ब्रह्मभागस्य यद्वा अंशद्वयेन च शस्त्रेण वा शतं सम्यग्जुहुयात्पूर्णया सह ॥ १८ ॥

समुत्थाप्य हृदा देवमासनं मङ्गलादिभिः ॥१९ ॥

चतुर्भिः सह कर्ता च देवयानस्य पृष्ठतः ॥२० ॥

लिङ्गं संस्थाप्य दत्त्वार्यं प्रासादं संनिवेशयेत् ॥ २१ ॥

द्वारबन्धे शिखाशून्ये तदर्धेनाथ तदृते (? ) ॥ २२ ॥

देवगृहसमारम्भे प्रवेशयेत् ॥२३ ॥

गृहे प्रवेशनं द्वारे लोकैरपि समीरिता ( त ) म् ॥ २४ ॥

। अथ पीठे च संस्थाप्य लिङ्गं द्वारस्य सम्मुखम् ॥२५ ॥

। समुत्तिष्ठ हृदेत्युत्वा महापाशुपतं पठेत् ॥२६ ॥

। मन्त्रं संधारयित्वा तु विलिप्तं कुङ्कुमादिभिः ॥२७ ॥

। ( लयान्तं मूलमुच्चार्य स्पष्ट्वा श्वभ्रे निवेशयेत् ॥२८ ॥

। अर्धेन वाऽष्टमांशेन सर्वस्याथ प्रवेशनम् ॥२९ ॥

गुरु को शिला तथा गड्ढे का सङ्गदोष दूर करने के लिए शिवमन्त्र या अस्त्रमन्त्र से पूर्णाहुति के साथ सौ बार हवन करना चाहिए । तदनन्तर एक - एक आहुति देकर वास्तुदेवताओं को तृप्त करे तथा मांगलिक पदार्थों के साथ हृदय-मन्त्र से देवता और आसन को उठाकर गुरु को शिवलिङ्ग के आगे जाना चाहिए; जहाँ चारों दिशाओं में चार मूर्तिपूजक ब्राह्मण पहले से उपस्थित रहते हैं । तब मन्दिर की परिक्रमा करके भद्रद्वार के सामने शिवलिङ्ग को रखकर अर्घ्य प्रदान करके मन्दिर में प्रवेश कराना चाहिए, किन्तु उसे द्वार का स्पर्श न होने पावे । देवमन्दिर के समारम्भ में कोने से भी प्रवेश करा सकते हैं ॥१७-२३ ॥ व्यक्त लिङ्ग की स्थापना में यही विधि समझनी चाहिए । जनश्रुति भी यही है कि गृह - प्रवेश मुख्य द्वार से ही करना चाहिए । अपद्वार से प्रवेश करने से वंश का नाश हो जाता है । उपर्युक्त विधि से ढोलक तथा अन्य माङ्गलिक वाद्य - ध्वनियों के साथ दूर्वा और अक्षत से द्वार के सम्मुख शिवलिङ्ग को पीठ पर स्थापित करके हृदय - मन्त्र से ‘ उठिये ' कहकर महापाशुपत स्तोत्र का पाठ करे । तदनन्तर गुरु को मूर्तिपूजक ब्राह्मणों के साथ घट को गड्ढे से निकालकर शिवलिङ्ग को अभिमन्त्रित करके उस पर केसर आदि का लेप करना चाहिए । फिर शक्ति और शक्तिमान् ( शिव ) की एकता तथा रक्षा का ध्यान करते हुए अन्त तक मूलमन्त्र का उच्चारण करके उसे गड्ढे में रख दे ॥२४-२८ ॥ ब्रह्मभाग नाम से प्रसिद्ध शिवलिङ्ग का एक भाग या दो भाग या आधा भाग या अष्टमांश गड्ढे के अन्दर रहना चाहिए । अत्यन्त सावधानी से लिङ्ग को कटिपर्यन्त गहरी भूमि में गड़े हुए सीसे १ क. ङ. च. बन्धुभिः । २ घ. कर्त्तव्या देवयज्ञस्य । ३ क. ङ. च. ' वपालस्य । ४ क. ख. ग. ङ. च. तद्विना । द्वा । ५ क. ङ. च. ' थ घातयेत् । तक्षय ' । ६ ल्यबभाव आर्षः । ७ लयान्तं निवेशयेत् नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 377

अग्नि पुराण, पृष्ठ 377 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तनवतितमोऽध्यायः पिधाय सीसकं नाभिर्दीर्घाभिः सुसमाहितः ततो लिङ्गे स्थिरीभूते ध्यात्वा सकलरूपिणम् स्थाप्यमानं ` यदा लिङ्गे यामीं दिशमथाऽऽश्रयेत् सव्यस्थाने च वक्रे च चलिते स्फुटितेऽथ वा किं चान्येष्वपि दोषेषु शिवशान्तिं समाश्रयेत् पीठबन्धमतः कृत्वा लक्षणस्यांशलक्षणम् संपूर्य पार्श्वसंधिं च बालुकावज्रलेपतः १० संस्नाप्य कलशैरन्यैस्तद्वत्पञ्चामृतादिभिः उमामहेशमन्त्राभ्यां तौ स्पृशेल्लिङ्गमुद्रया कृत्वा मूर्तिं तदीशानामङ्गानां ब्रह्मणामथ गन्धैर्विलिप्य संधूप्य व्यापित्वेन शिवे न्यसेत् विनिवेद्य यथाशक्ति समाचम्य महेश्वरम् । ३७३ । श्वभ्रं ' बालुकयाऽऽपूर्व ब्रूयात्स्थिरी भवेति च ) ॥ ३० ॥

। मूलमुच्चार्य शक्त्यन्तं स्पृष्ट्या ' चं निष्कलं न्यसेत् ॥३१ ॥

। तत्तद्दिगीशमन्त्रेण पूर्णान्तं दक्षिणान्वितम् ॥३२ ॥

। जुहुयान्मूलमन्त्रेण बहुरूपेण वा शतम् ॥३३ ॥

। उक्तन्यासविधिं लिङ्गे कुर्यादेवं न दोषभाक् ॥३४ ॥

। गौरीमन्त्रं लयं नीत्वा सृष्ट्या पिण्डीं च विन्यसेत् ॥ ३५ ॥

। ततो मूर्तिधरैः सार्धं गुरुः ' शान्तिपटोर्ध्वतः ' ॥ ३६ ॥

। विलिप्य चन्दनाद्यैश्च सम्पूज्य जगदीश्वरम् ॥ ३७ ॥

। ततस्त्रितत्त्वविन्यासं षडर्घादिपुरःसरम् " ॥३८ ॥

। ज्ञानलिङ्गे १२ क्रियापीठे विन्यस्य स्नापयेत्ततः ॥३९ ॥

। स्त्रग्धूपदीपनैवेद्यैर्हृदयेन फलानि च ॥४० ॥

दत्त्वाऽर्घ्यं च जपं कृत्वा निवेद्य वरदे करे ॥४१ ॥

के फलक पर स्थापित करके गड्ढे के रिक्त भाग को बालू से भर देना चाहिए । उस समय शिवलिङ्ग से यह भी निवेदन करना चाहिए कि ' स्थिर हो जाइये ' । तदनन्तर शिवलिङ्ग के स्थिर हो जाने पर ऐसा ध्यान करे कि वह ' सकल ' रूप है । फिर उच्च स्वर से मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए शिवलिङ्ग का स्पर्श करके ' निष्कल ' का न्यास करे । यदि स्थापना - काल में शिवलिङ्ग दक्षिण की ओर झुक जाय तो दिक्पाल के मन्त्र से हवन करके ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए । यदि शिवलिङ्ग वाम भाग की ओर झुक जाय या टेढ़ा हो जाय या विचलित हो जाय या टूट जाय तो मूलमन्त्र से बहुरूप मन्त्र से सौ बार हवन करना चाहिए तथा अन्य प्रकार की दोष - निवृत्ति के लिए भी शिवशान्ति-मन्त्र का पाठ करना चाहिए । शिवलिङ्ग में उक्त न्यास की विधि करनेवाला व्यक्ति दोषों से मुक्त हो जाता है ॥२९-३४ ॥ इसके बाद लिङ्ग के अंशरूप पीठ - बन्ध - न्यास करके शिवलिङ्ग में गौरीमन्त्र का लय करके तथा सृष्टि - मन्त्र का लय करके सृष्टि - मन्त्र से पिण्डी का न्यास करे । शिवलिङ्ग की पार्श्व - सन्धि को बालू तथा वज्र लेप से भरकर मूर्तिपूजक ब्राह्मणों के साथ गुरु को शिवलिङ्ग के ऊपर शान्ति वस्त्र रखकर कलशों के जल से तथा पञ्चामृत ( दूध, घी, मधु, शक्कर ) आदि से भी स्नान कराना चाहिए । अनन्तर उमा और महेश के मन्त्रों को पढ़कर चन्दन आदि से जगदीश्वर ( शिव ) की पूजा करके लिङ्ग - मुद्रा से शिवलिङ्ग के दोनों पार्श्वों का स्पर्श करे । तत्पश्चात् छह प्रकार के अर्घ्य देकर तीन तत्त्वों ( आत्म, विद्या और शिव ) का न्यास करे । फिर अङ्ग देवता के सहित शिव की मूर्ति को क्रियापीठ पर स्थापित करके उसे स्नान कराये ॥३५-३९ ॥ तदनन्तर चन्दन आदि का लेप तथा धूपदान करके उसमें व्यापक शिवतत्त्व का न्यास करे और उसके बाद हृदय - मन्त्र से यथाशक्ति पुष्पमाला, धूप, दीप और नैवेद्य समर्पण करके स्वयं आचमन करे । महेश्वर को अर्घ्य देकर मन्त्र जप करके मूर्तिपूजक ब्राह्मणों के साथ मिलकर १ ख. ग. अथ । २ ख. स्पृष्ट्वा । ३ ख. यथा । ४ घ. ' तेऽपि वा । ५ घ. त् । युक्तन्यासादिभिर्लिङ्ग कुर्वन्नेव । ६ घ. ' पूर्वसंसिद्धिं वा । ७ ख. ग. घ. ' पनम् । त ' । ८ घ. शान्तिं घटो ' । ९ ख. ग. न्तिघटो । १० ग. संस्थाप्य । ११ घ. ' डर्चादि । १२ घ. ज्ञानी लि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 378

अग्नि पुराण, पृष्ठ 378 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अग्निपुराणम् ३७४ चन्द्रार्कतारकं यावन्मन्त्रेण शैवमूर्तिपैः । प्रणम्यैवं बहिर्गत्वा हृदा वा प्रणवेन वा । न्यूनादिदोषमोक्षाय ततो मृत्युजिता शतम् । ज्ञानाज्ञानकृतं यच्च तत्पूरय महाविभो । अम्बिकेशाय तद्भक्त्या शक्त्या सर्वं निवेदयेत् । त्रिसन्ध्यं त्रिदिनं मन्त्री होमयेन्मूर्तिपैः सह निवेद्य सर्वकुण्डेषु सम्पाताहुतिशोधितम् निर्माल्यापनयं कृत्वा स्नापयित्वा तु पूजयेत् विहाय लिङ्गचैतन्यं कुर्यात्स्थाणुविसर्जनम् आवाहनमभिव्यक्तिर्विसर्गः शक्तिरूपता स्थिरस्तथाऽप्रमेयश्चानादिबोधस्तथैव च एते गुणा महेशस्य संनिधानाय कीर्तिताः स्वेच्छयैव त्वया नाथ स्थातव्यमिह मन्दिरे ॥ ४२ ॥

संस्थाप्य वृषभं पश्चात्पूर्ववद्बलिमाचरेत् ॥४३ ॥

शिवेन सशिवो हुत्वा शान्त्यर्थं पायसेन च ॥ ४४ ॥

हिरण्यपशुभूम्यादिगीतवाद्यादिहेतवे ॥४५ ॥

दानं महोत्सवं पश्चात्कुर्याद्दिनचतुष्टयम् ॥४६ ॥

। चतुर्थेऽहनि पूर्णां च चरुकं बहुरूपिणा ॥४७ ॥

॥ दिनचतुष्टयं यावन्न निर्माल्यं तदूर्ध्वतः ॥४८ ॥ ॥

। पूजा सामान्यलिङ्गेषु कार्या साधारणाणुभिः ॥४९ ॥

॥ असाधारणलिङ्गेषु क्षमस्वेति विसर्जनम् ॥५० ॥

। प्रतिष्ठान्ते क्वचित्प्रोक्तं स्थिराद्याहुतिसप्तकम् ॥५१ ॥

। नित्योऽथ सर्वगश्चैवाविनाशी दृष्ट एव च ॥ ५२ ॥

। ॐ नमः शिवाय स्थिरो भवेत्याहुतीनां क्रमः ॥५३ ॥

एवमेतच्च सम्पाद्य विधाय शिवकुम्भवत् । कुम्भद्वयं च तन्मध्यादेककुम्भाम्भसा भवम् || ५४ ॥ संस्नाप्य तद्द्वितीयं च कर्तृस्नानाय धारयेत् । दत्त्वा बलिं समाचम्य बहिर्गच्छेच्छिवाज्ञया ' ॥५५ ॥

शिव से प्रार्थना करे कि ' हे नाथ! जब तक सूर्य और चन्द्र रहेंगे, तब तक आप अपनी इच्छा से ही इस मन्दिर में निवास कीजिये । ' इस प्रकार प्रणाम करके बाहर जाकर हृदय - मन्त्र से या प्रणव - मन्त्र से वृषभ की मूर्ति को मन्दिर के द्वार के समक्ष स्थापित करे और न्यूनाधिक दोषों को दूर करने के लिए मृत्युञ्जय मन्त्र से पहले की भाँति सौ बार बलि चढ़ाकर शान्ति के लिए खीर से सौ आहुतियाँ दे । तदनन्तर यह कहते हुए कि ' हे महाविभो! मैंने ज्ञान या अज्ञान से जो कुछ किया है, उसे पूर्ण कीजिये - सुवर्ण, पशु, भूमि, गीत, वाद्य आदि के कारण अम्बिका - पति शिव को भक्तिपूर्वक सब - कुछ समर्पित कर दे ॥४०-४५३ ॥ तत्पश्चात् चार दिनों तक दान तथा महोत्सव करता रहे । तीन दिनों तक तीनों सन्ध्याओं में मूर्तिपूजक ब्राह्मणों के साथ हवन करके, चौथे दिन बहुरूप मन्त्र से चरु से पूर्णाहुति दे । इस प्रकार समस्त कुण्डों को सम्पात नामक आहुतियों से शुद्ध करके चार दिनों तक निर्माल्य सुरक्षित रखे । तत्पश्चात् निर्माल्य फेंककर स्नान कराकर पूजा करे । लिङ्ग - चैतन्य को छोड़कर साधारण शिवलिङ्ग के पूजन में सामान्य मन्त्रों का व्यवहार करना चाहिए । तदनन्तर शिवलिङ्ग का विसर्जन करना चाहिए, परन्तु असाधारण शिवलिङ्ग के विसर्जन में ' क्षमा कीजिये ' ऐसा कहना चाहिए ॥४६-५० ॥ कहीं तो ऐसा कहा गया है कि प्रतिष्ठा के अन्त में स्थिर, अप्रमेय, अनादिबोध, नित्य, सर्वगामी, अविनाशी तथा दृष्ट - इन सात नाम की आहुतियाँ और आवाहन, अभिव्यक्ति, विसर्जन और शक्ति के अनुकूल कर्म करना चाहिए । उपर्युक्त सात गुण महेश का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए कहे गये हैं । ‘ ॐ नमः शिवाय स्थिरो भव ' - इस प्रकार कहकर आहुतियाँ देनी चाहिए । तदनन्तर जल से परिपूर्ण दो कलशों में से एक यज्ञकर्त्ता के स्नान के लिए रख देना चाहिए और दूसरे से शिव को नहलाकर बलि १ घ. ' वत्तन्निर्मा CC - 0. ' JK । Sanskrit २ ख. Academy ग. तृप्त, । Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 379

अग्नि पुराण, पृष्ठ 379 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तनवतितमोऽध्यायः

जगती बाह्यतश्चण्डमैशान्यां दिशि मन्दिरे ।

पूर्ववन्न्यासहोमादि विधाय ध्यानपूर्वकम् ॥

अङ्गानि पूर्वमुक्तानि ब्रह्माणि त्वणुना यथा * ए ( ॐ ) वं सद्योजाताय ह्रूं फट् नमः । ॐ ६ वुम् अघोराय ह्रूं फट् नम: । ओम् एवं वोमीशानाय च हरूं फट् नमः जपं निवेद्य सन्तर्प्य विज्ञाप्य नतिपूर्वकम् । न्यूनाधिकं च यत्किञ्चित्कृतमज्ञानतो मया । बाणलिङ्गे बाणरोहे सिद्धलिङ्गे स्वयंभुवि । अद्वैतभावनायुक्ते स्थण्डिलेशविधावपि । पूर्वस्थापितकुम्भेन स्नापयेत्स्नापकः स्वयम् । वित्तशाठ्यं विना दद्याद्भूहिरण्यादिदक्षिणाम् । दैवज्ञं शिल्पिनं प्रार्च्य दीनानाथादि भोजयेत् । क्षमस्व नाथ तत्सर्वं कारुण्याम्बुनिधे मम । धामगर्भप्रमाणे च संस्थाप्य विधिवत्तत्र ॐ ५ विं वामदेवाय हरूं ( एवम्, ॐ ) चें ( वें ३७५ सुपीठे कल्पितासने ॥ ५६ ॥

ब्रह्माङ्गैः पूजयेत्ततः ॥५७ ॥ ५७ ॥ ॥

॥५८ ॥

फट् नमः । ) तत्पुरुषाय ' ॥५९ ॥

देवः सन्निहितो यावत्तावत्त्वं संनिधो भव ॥६० ॥

त्वत्प्रसादेन चण्डेश तत्सर्वं परिपूरय ॥ ६१ ॥

प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत् ॥६२ ॥

अभ्यर्च्य चण्डं ससुतं यजमानं हि भार्यया ॥ ६३ ॥

स्थापकं " यजमानोऽपि सम्पूज्य च महेशवत् ॥६४ ॥

मूर्तिपान्विधिवत्पश्चाज्जापकान्ब्राह्मणांस्तथा ॥६५ ॥

यदत्र सम्मुखीभावे खेदितो भगवन्मया ॥ ६६ ॥

इति विज्ञप्तियुक्ताय यजमानाय सद्गुरुः ॥ ६७ ॥

देकर आचमन करके शिव की आज्ञा से बाहर जाय ॥५१-५५ ॥ तत्पश्चात् यज्ञ - कुण्ड के घेरे से बाहर मन्दिर के ईशानकोण में एक सुन्दर आसन पर चण्डदेव की स्थापना करके पहले की भाँति न्यास, होम, ध्यान आदि करके ‘ ए ( ॐ ) वं सद्योजाताय हूं फट् नमः ', ' ॐ विं वामदेवाय हूं फट् नमः ', ' ॐ वुं अघोराय हूं फट् नमः ', ' ॐ एवं ( एवम्, ओं ) चें ( वें ) तत्पुरुषाय वोमीशानाय च हूं फट् नम: ' - इन मन्त्रों से अङ्गदेवताओं के साथ उनकी पूजा तथा जप और तर्पण करके नम्रतापूर्वक उनसे निवेदन करे कि " हे चण्ड! जब तक शिव यहाँ रहेंगे, तब तक आप भी रहिये । मैंने अज्ञान से जो कुछ न्यूनाधिक कर्म किया है, उसे आप कृपा करके परिपूर्ण कर दीजिये । " बाणलिङ्ग, चललोहसुवर्णादि लिङ्ग, सिद्धलिङ्ग, स्वयम्भूलिङ्ग तथा अन्य प्रतिमाओं की स्थापना में चण्डदेव का आवाहन नहीं करना चाहिए ॥५६-६२ ॥ अद्वैत की भावना से युक्त स्थण्डिलेश की स्थापना में भी चण्ड का आवाहन निषिद्ध है । तदनन्तर स्त्री - पुत्र के साथ यजमान को पूर्व स्थापित कलश के जल से स्नान कराये । यजमान भी स्नान करानेवाले का महेश की पूजा की भाँति, पूजन करके उदारता से उसे भूमि और सुवर्ण आदि दक्षिणा प्रदान करे । पश्चात् विधिवत् मूर्तिपूजक ब्राह्मणों, जप करनेवालों, ज्योतिषी और शिल्पी की पूजा कर दीनों और अनाथों को भोजन कराये । तदनन्तर गुरु से प्रार्थना करे कि “ हे करुणासागर! भगवान्! नाथ! मैंने इस कार्य में आपको जो कष्ट दिया है, उसे क्षमा कीजिये । ” १ क. ङ. च. बहिः कुम्भे शिवा । २ क. ङ. च. ' नि ब्राह्मणत्वर्चना । ३ ङ. ' ह्याणी त्वर्चना । ४ क. ङ. च. ' था । ॐ स ° । ५ क. ङ. च. ॐ वा । ६ क. ङ. च. ॐ ॐ । ७ क. ङ. च. ' मः । एवं चे । घ. ' मः । ॐ त । ८ ख. ग. ' य नमः । ओ मी । ९ क. घ. ङ. च. ' ट् । ज ' । १० ख. स्नापकं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 380

अग्नि पुराण, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३७६ अग्निपुराणम् प्रतिष्ठापुण्यसद्भावं स्फुरत्तारकसप्रभम् । ततः पाशुपतं जप्त्वा प्रणम्य परमेश्वरम् । स्थातव्यं भवता तावद्यावत्संनिहितो हरः । सर्वोपकरणं शिल्पी तथा स्नापनमण्डपम् ) । आदिवर्णस्य भेदाद्वा सुतत्त्वव्याप्तिभाविताः । क्षेत्रपाः किन्नराद्याश्च पृथिवीतत्त्वमाश्रिताः । भुवनाधिपतीनां च स्थानं ' यत्र व्यवस्थितिः । तन्मात्रादिप्रधानान्तं पदमेतत्त्रिकं हरेः । अण्डजाः शुद्धविद्यान्तं पदं गणपतेस्तथा । पदमीश्वरपर्यन्तं व्यक्तार्चासु च कीर्तितम् । प्रक्षिपेत्पीठगर्तायां पञ्चब्रह्मशिलां विना ।

स्थापनं पञ्चमांशे च यदि वा वसुभाजिते ।

कुशपुष्पाक्षतोपेतं स्वरेण समर्पयेत् ॥६८ ॥

ततोऽपि बलिभिर्भूतान्संनिधाय निबोधयेत् ।६

। ६ ९ ९ ॥ ॥

( गुरुर्वस्त्रादिसंयुक्तं गृह्णीयाद्यागमण्डपम् ॥७० ॥

अन्ये देवादयः स्थाप्या मन्त्रैरागमसंभवैः ॥७१ ॥

साध्यप्रमुखदेवाश्च सरिदोषधयस्तथा ॥७२ ॥

' स्थानं ' सरस्वती लक्ष्मीनदीनामम्भसि क्वचित् ॥७३ ॥

अण्डवृद्धिप्रधानान्तं त्रितत्त्वं ब्रह्मणः पदम् ॥७४ ॥

नाट्येशगणमातृणां यक्षेशशरजन्मनाम् ॥७५ ॥

मायांशदेशशक्त्यन्तं शिवाशिवोत्परोचिषाम् ॥ ७६ ॥

कूर्माद्यं कीर्तितं यच्च यच्च रत्नादिपञ्चकम् ॥ ७७ ॥

षड्भिर्विभाजिते गर्ते त्यक्त्वा भागं च पृष्ठतः ॥७८ ॥

स्थापनं सप्तमे भागे प्रतिमासु सुखावहम् ॥ ७ ९ ॥

इसके बाद गुरु अपने हाथ से शिवलिङ्ग - स्थापना के पुण्य से युक्त और तारा के समान चमकती हुई कान्तिवाले कुश, पुष्प तथा अक्षत यजमान को प्रदान करे ॥६३-६८ ॥ तदनन्तर पाशुपत - मन्त्र का जप करते हुए परमेश्वर को प्रणाम करके भूतों को बलि देते हुए निवेदन करे कि “ जब तक शिव रहेंगे तब तक आप भी रहिये । वस्त्र आदि सहित यज्ञमण्डप गुरु को मिलना चाहिए और समस्त उपकरणों के साथ स्नान - मण्डप कारीगर को प्रदान करना चाहिए । अन्य देवताओं की स्थापना आगम - मन्त्रों से या देवताओं के नामों के प्रथम अक्षर के भेद से करनी चाहिए । ( अर्थात् पूर्वोक्त मन्त्रों में ही देवनामों के प्रथम अक्षर जोड़कर काम चलाना चाहिए ) अन्य देवता जैसे - पृथ्वी तत्त्व के आश्रित साध्यगण, सरिताएँ, ओषधियाँ, क्षेत्रपाल और किन्नर आदि; जल तत्त्व के आश्रित सरस्वती, लक्ष्मी और नदियाँ; ब्रह्म के आश्रित भुवनपति, अण्डकटाह तथा प्रधान; हरि के आश्रित तन्मात्राएँ तथा प्रधान; गणपति के आश्रित नाट्येश, गण, मातृकाएँ, यक्षेश, कार्तिकेय, अण्डज तथा शुद्धविद्या और आश्रित माया, अंश, देश, शक्ति, शिवा, शिव तथा सूर्य - इन देवताओं की स्थापना में व्यक्त ईश्वर के पूर्व की भाँति कछुए आदि की मूर्तियाँ तथा पाँच रत्न आदि वस्तुएँ बिना पाँच ब्रह्मशिलाओं पूजा करनी चाहिए । के पीठ के गड्ढे में डाल देनी चाहिए ॥६९ -७७ ॥ यदि गड्ढा छह भागों में विभक्त कर दिया जाय तो पृष्ठ भाग को छोड़कर पाँचवें भाग में मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए, जो प्रतिमा के लिए सुखावह माना गया है । जहाँ देवताका चित्र ५ क. ङ १. घ च.. ' पतोपेतं ' स्य शेषत्वात्स्वत प्र । २ ख. भावतां । ३ गुरुर्वस्त्रादि मण्डपम् नास्ति क. ङ. च. पुस्तकेषु । ४ ख. ' था स्थाप ' । ९ ख. ग. मेकं त्रिकं । ' । ६ स्थानं क्वचित् क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । ७ घ. स्नानं । ८ ख. ग. नं त्रयव्य । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA