अग्नि पुराण — पृष्ठ 651–660
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 651–660
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एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ६४७ हैमीं प्रतिकृतिं कृत्वा दत्त्वा स्वर्गस्तथाऽऽत्मनः । गृहं मठं सभां स्वर्गी दत्त्वा स्याच्च प्रतिश्रयम् । ( ' यममाहिषदानात्तु निष्पापः स्वर्गमाप्नुयात् । पार्शी तस्य शिरश्छित्त्वा तं दद्यात्स्वर्गभाग्भवेत् । ) ` चन्द्रं रूपमयं कृत्वा ' के धृत्वा तत्प्रदापयेत् ' । आत्मतुल्यं तु यो लौहं ददेन्न नरकं व्रजेत् । वस्त्रेणाऽऽच्छाद्य विप्राय यमदण्डो न विद्यते । मृत्युञ्जयं समुद्दिश्य दद्यादायुर्विवृद्धये । खड्गोद्यतकरो दीर्घो जपाकुसुममण्डलः । उपानद्युगयुक्ताङ्घ्रिः ‘ कृष्णकम्बलपार्श्वकः । सम्पूज्य तं च गन्धाद्यैर्ब्राह्मणायोपपादयेत् ।
गोवृष तु द्विजे दत्त्वा भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् ' ।
विपुलं तु गृहं कृत्वा दत्त्वा स्याद्भुक्तिमुक्तिभाक् ॥१७ ॥
दत्त्वा कृत्वा गोगृहं च निष्पापः स्वर्गमाप्नुयात् ॥१८ ॥
ब्रह्मा हरो हरिर्देवैर्मध्ये च यमदूतकः ॥१९ ॥
त्रिमुखाख्यमिदं दान गृहीत्वा तु द्विजोऽघभाक् ॥२० ॥
होमयुक्तं द्विजायैतत्कालचक्रमिदं महत् ॥ २१ ॥
पञ्चाप ( श ) त्पलसंयुक्तं लौहदण्डं तु योऽर्पयेत् ॥२२ ॥
मूलं फलादि वा द्रव्यं संहतं वाऽथ चैकशः ॥२३ ॥
पुमान्कृष्णतिलैः कार्यो रौप्यदन्तः सुवर्णदृक् ॥। २४ ॥
रक्ताम्बरधरः स्रग्वी शङ्खमालाविभूषितः ॥ २५ ॥
गृहीतमांसपिण्डश्च वामे वै कालपूरुषः ॥ २६ ॥
मरणव्याधिहीनः स्याद्राजराजेश्वरो भवेत् ॥ २७ ॥
हेमन्ताधिष्ठितं चाश्वं हैमं दत्त्वा न मृत्युभाक् ॥२८ ॥
से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । बड़ा - सा घर बनाकर उसका दान करने से तथा धर्मशाला और गोशाला बनवाने से मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्ग चला जाता है ॥१७-१८ ॥ भैंसा दान करने से मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है । ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु के मध्य में यमदूत की प्रतिमा रखकर उसका सिर काटकर दान करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । इस दान को त्रिमुखाख्य दान कहते हैं । इसको लेनेवाला द्विज पाप का भागी होता है ॥ १ ९ -२० ॥ चाँदी का चन्द्रमा बनाकर उसे जल में रखकर सोने के साथ ब्राह्मण को देना चाहिए, इसका नाम कालचक्र है । यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है । जो अपने बराबर लौहदान करता है, उसे नरक नहीं जाना पड़ता है । जो पचास पल लौहदण्ड को वस्त्र से ढँककर ब्राह्मण को दान करता है, उसे यमदण्ड का भय नहीं रह जाता है । जो फल, मूल आदि द्रव्यों को एक साथ या अलग - अलग मृत्युञ्जय ( शिव ) के उद्देश्य से दान करता है, उसकी आयु बढ़ती है ॥२१-२३३ ॥ काले तिलों की एक पुरुष प्रतिमा बनानी चाहिए । उसके दाँत चाँदी के और नेत्र सोने के होने चाहिए । उसके हाथ में एक तलवार होनी चाहिए, उसका आकार लम्बा तथा मण्डल जपाकुसुम से सुशोभित होना चाहिए । उस लाल वस्त्र, पुष्पमाला तथा शंखमाला से विभूषित होना चाहिए । वह पैरों में जूते पहने हुए हो । उसके पार्श्व में काला कम्बल पड़ा होना चाहिए । उसे मांसपिण्ड लिये हुए होना चाहिए । सुगन्धित पदार्थों से उसका पूजन करके ब्राह्मण को दे देना चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य मृत्यु और व्याधि से रहित होकर राजराजेश्वर बन जाता है ॥ २४-२७ ॥ ब्राह्मण को गाय तथा बैल देने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । हेमन्त ऋतु में अश्व की स्वर्ण प्रतिमा का दान करने १ ' यममाहिषदानात्तु " स्वर्गभाग्भवेत् ' पुस्तके नास्ति । २ घ. चक्रं । ३ च. ' त्वा व्यापकत्वात् प्र ' । ४ ग. भृत्वा । ५ च. ' त् । हेम ' । ६ क. ख. ग. ङ. ' विवर्धते । पु ० । ७ क. ङ. ' दण्डः सु ° । ८ ख. ग. कृष्णः कमलपा ' । ९ ग. घ. च. ' त् । रेवन्ता ' । १० क. ङ. ' क् । जप्यादि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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६४८ अग्निपुराणम् घण्टादिपूर्णमप्येकं दत्त्वा स्याद् भुक्तिमुक्तिभाक् । सुवर्णे दीयमाने तु रजतं दक्षिणेष्यते । सुवर्णं रजतं ताम्रं तण्डुलं धान्यमेव च । रजतं दक्षिणा पित्रे ( त्र्ये ) धर्मकामार्थसाधनम् । सर्वमेतन्महाप्राज्ञो ददाति वसुधां ददत् । सन्तर्पयति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम् । निवर्तनशतं वाऽपि तदर्थं वा गृहादिकम् । तैलबिन्दुर्यथा चाप्सु प्रसर्पेद्भूगतं तथा । हाटकक्षितिगौरीणां सप्तजन्मानुगं फलम् । गजं सदक्षिणं दत्त्वा निर्मलः स्वर्गभाग्भवेत् । दासीं दत्त्वा द्विजेन्द्राय अप्सरोलोकमाप्नुयात् । अर्धैस्तदर्धैरधैर्वा भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् ।
वस्त्रदानाल्लभेदायुरारोग्यं स्वर्गमक्षयम् ।
सर्वान्कामानवाप्नोति यः प्रयच्छति काञ्चनम् ॥२९ ॥
अन्येषामपि दानानां सुवर्णं दक्षिणा स्मृता ॥ ३० ॥
नित्यश्राद्धं देवपूजा सर्वमेतददक्षिणम् ॥३१ ॥
सुवर्णं रजतं ताम्रं मणिमुक्तावसूनि च ॥ ३२ ॥
पितृश्च पितृलोकस्थान्देवस्थाने च देवताः ॥ ३३ ॥
खर्वटं खेटकं वाऽपि ग्रामं वा ' सस्यशालिनाम् ॥ ३४ ॥
अपि गोचर्ममात्रां वा दत्त्वोर्वी सर्वभाग्भवेत् ॥३५ ॥
सर्वेषामेव दानानामेकजन्मानुगं फलम् ॥३६ ॥
त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य कन्यादो ब्रह्मलोकभाक् ॥ ३७ ॥
अश्वं दत्त्वाऽयुरारोग्यसौभाग्यस्वर्गमाप्नुयात् ॥ ३८ ॥
दत्त्वा ताम्रमयीं स्थालीं पलानां पञ्चभिः शतैः ' ॥३९ ॥
शकटं वृषसंयुक्तं दत्त्वा यानेन नाकभाक् ॥ ४० ॥
धान्यगोधूमकलमयवादीन्स्वर्गभाग्ददत् ॥४१ ॥
से अपमृत्यु नहीं होती है । जो घण्टा आदि से युक्त एक भी ( अश्व की ) स्वर्ण प्रतिमा का दान करता है, उसे भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है । सुवर्ण दान करने से सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ २८-२९ ॥ सुवर्ण का दान करने पर चाँदी की दक्षिणा देनी चाहिए तथा अन्य ( वस्तुओं ) का दान करने से भी सोने की ही दक्षिणा देनी चाहिए । सोना, चाँदी, ताँबा, चावल तथा ( अन्य ) धान्य के दान और नित्य श्राद्ध तथा देवपूजन दक्षिणा के बिना ही होने चाहिए ॥३०-३१ ॥ पितृकर्म में चाँदी की दक्षिणा देने से धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति होती है । पृथ्वी के दान में बुद्धिमान् मनुष्य को सोना, चाँदी, ताँबा, मणि, मुक्ता तथा धन की दक्षिणा देनी चाहिए । जो शान्तात्मा व्यक्ति वसुन्धरा का दान करता है वह पितृलोक में पितरों को तथा देवलोक में देवताओं को तृप्त कर देता है ॥३२-३३३ ॥ खर्वट, खेटक, सस्यसम्पन्न गाँव, सौ - पचास निवर्तन, परिमित गृह आदि और एक गोचर्म परिमित पृथ्वी का दान करने से सभी वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती है ॥३४-३५ ॥ तेल की बूँद जैसे जल में गिरने से फैलने लगती है ( उसी तरह कहीं भी किया गया दान अवश्य ही फल प्रदान करता है ) । सब दानों का फल तो एक जन्म तक ही मिलता है, प्रन्तु सुवर्ण, पृथ्वी तथा कन्यादान का फल सात जन्मों तक प्राप्त होता रहता है । कन्यादान करनेवाला अपनी इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करके ब्रह्मलोक को चला जाता है ॥३६-३७ ॥ दक्षिणा के साथ गजदान करनेवाला व्यक्ति निर्मल होकर स्वर्ग को चला जाता है । अश्वदान करने से आयु, आरोग्य, सौभाग्य और स्वर्ग की प्राप्ति होती है । किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दासी का दान करने से अप्सरालोक की प्राप्ति होती है । पाँच सौ, ढाई सौ या सवा सौ पल ताँबे की बनी हुई थाली का दान करने से भोग और मोक्ष मिलता है । बैल से युक्त गाड़ी का दान करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥३८-४० ॥ वस्त्र के दान से आयु, आरोग्य तथा अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है । ( कोई भी ) धान्य ( जैसे ) गेहूँ, कलम ( धान्य- -भेद ) और यव आदि का दान करने से स्वर्ग १ क. ङ. ' स्यमालि ' । २ ख. “ तैः । अर्धस्तदर्थैर्युक्ता वा भु ° । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ६४ ९ आसनं तैजसं पात्रं लवणं गन्धचन्दनम् ( दिव्यानि नानाद्रव्याणि दत्त्वा स्याद्भुक्तिमुक्तिभाक् अन्नदानात्परं नास्ति न भूतं न भविष्यति अन्नदानस्य सर्वाणि कलां नार्हन्ति षोडशीम् सर्वपापविनिर्मुक्तो लोकानाप्नोति चाक्षयान् अग्निं काष्ठं च मार्गादौ दत्त्वा दीप्त्यादिमाप्नुयात् ) घृतं तैलं च लवणं दत्त्वा सर्वमवाप्नुयात् प्रतिपत्तिथिमुख्येषु विष्कम्भादिषु योगके ब्रह्माणं लोकपालादीन्प्रार्च्य दानं महाफलम् पादाभ्यङ्गादिकं दत्त्वा भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् ब्राह्मीं सरस्वतीं दत्त्वा निर्मलो ब्रह्मलोकभाक् अभयं सर्वभूतेभ्यो यो दद्यात्सर्वभाङ्नरः लिखित्वा पुस्तकं दत्त्वा भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् । धूपं दीपं च ताम्बूलं लोहं रूप्यं च रत्नकम् ' ॥४२ ॥
। तिलांश्च तिलपात्रं च दत्त्वा स्वर्गमवाप्नुयात् ॥४३ ॥
। हस्त्यश्वरथदानानि दासीदासगृहाणि च ॥ ४४ ॥
। कृत्वाऽपि सुमहत्पापं यः पश्चादन्नदो भवेत् ॥४५ ॥
। ( रेपानीयं च प्रपां दत्वा भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् ॥४६ ॥
। देवगन्धर्वनारीभिर्विमाने सेव्यते दिवि ॥ ४७ ॥
। क्षत्रोपानहकाष्ठादि दत्त्वा स्वर्गे सुखी वसेत् ॥४८ ॥
1 । चैत्रादौ वत्सरादौ च अश्विन्यादौ हरिं हरम् ॥ ४ ९ ॥ । वृक्षारामान्भोजनादीन्मार्गसंवाहनादिकान् ॥५० ॥
। त्रीणि तुल्यफलानीह गावः पृथ्वी सरस्वती ॥५१ ॥
। सप्तद्वीपमहीदः स ब्रह्मज्ञानं ददाति यः ॥ ५२ ॥
। पुराणं भारतं वाऽपि रामायणमथाऽपि वा ॥ ५३ ॥
। वेदशास्त्रं नृत्यगीतं योऽध्यापयति नाकभाक् ॥५४ ॥
की प्राप्ति होती है । आसन, घी, पात्र, लवण, गन्ध, चन्दन, धूप, दीप, ताम्बूल, लोहा, चाँदी, रत्न तथा विविध प्रकार के सुन्दर द्रव्यों का दान करने से भुक्ति - मुक्ति की प्राप्ति होती है । तिल तथा तिलपात्र दान करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥४१-४३ ॥ अन्नदान से बढ़कर कोई दान न हुआ है, न होगा । हाथी, घोड़े, रथ, दासी, दास तथा गृह का दान अन्नदान की सोलहवीं कला की भी समता नहीं कर सकता । महापाप करनेवाला भी अन्नदान कर देने से समस्त पापों से मुक्त होकर अक्षय लोक को चला जाता है । जल तथा प्याऊ का दान करने से भोग और मोक्ष मिलता है ॥४४-४६ ॥ अग्नि और लकड़ी का दान करने से तथा मार्ग आदि में दीपक जलाने से मनुष्य स्वर्गलोक को चला जाता है, जहाँ देवता तथा गन्धर्वों की स्त्रियाँ उसकी परिचर्या किया करती हैं । घी, तेल तथा लवण दान करने से सब - कुछ प्राप्त हो जाता है । छाता, जूता और खड़ाऊँ आदि का दान करने से स्वर्गलाभ होता है ॥ ४७-४८ ॥ प्रतिपदा आदि तिथियों में, विष्कम्भ आदि योगों में, चैत्र आदि मासों में और अश्विनी आदि नक्षत्रों में हरि, हर, ब्रह्मा तथा लोकपाल आदि देवताओं का पूजन करके, दान देने से महाफल प्राप्त होता है । वृक्ष, उपवन, भोजन, मार्ग - संवाहन ( पाथेय ) तथा पादाभ्यङ्ग ( जूता ) आदि का दान करने से भुक्ति - मुक्ति प्राप्ति होती है ॥४९ -५०३ ॥ गौ, पृथ्वी तथा विद्या - इन तीनों के दान का फल समान हुआ करता है । विद्यादान करनेवाला व्यक्ति निर्मल होकर ब्रह्मलोक को चला जाता है । जो ब्रह्मविद्या का दान करता है उसे सातों द्वीप की पृथ्वी दान करने का फल प्राप्त होता है । जो समस्त प्राणियों को अभयदान देता है उसे सभी पदार्थ प्राप्त हो जाते हैं ॥५१-५२३ ॥ जो व्यक्ति पुराण, महाभारत या रामायण लिखकर दान करता है, वह भुक्ति - मुक्ति का भागी होता है । वेदशास्त्र तथा नृत्यगीत का अध्ययन करानेवाला स्वर्गगामी होता है ॥५३-५४ ॥ धर्म, काम आदि का १ क. ख. ग. ' म् । विद्यादिनां । २ ' दिव्यानि स्वर्गमवाप्नुयात् ' पुस्तके नास्ति । ३ ' पानीयं दीप्त्यादिमाप्नुयात् ' नास्ति च. पुस्तके । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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६५० अग्निपुराणम् वृत्तिं दद्यादुपाध्याये छात्राणां भोजनादिकम् वाजपेयसहस्त्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् शिवालये विष्णुगृहे सूर्यस्य भवने तथा त्रैलोक्येचतु ( त्वा ) रोवर्णाश्चत्वारश्चाऽऽश्रमाः पृथक् विद्याकामदुधा धेनुर्विद्या चक्षुरनुत्तमम् वेदाङ्गानां च दानेन स्वर्गलोकमवाप्नुयात् सिद्धान्तानां प्रदानेन मोक्षमाप्नोत्यसंशयम् शास्त्राणि च पुराणानि दत्त्वा सर्वमवाप्नुयात् येन जीवति तद्दत्त्वा फलस्यान्तो न विद्यते सर्वं पितॄणां दातव्यं तेषामेवाक्षयार्थिना पूजयित्वा प्रदद्याद्यः पूजाद्रव्यं स सर्वभाक् संमार्जनं चोपलेपं कुर्वन्स्यान्निर्मलः पुमान् । किमदत्तं भवेत्तेन धर्मकामादिदर्शिना ॥ ५५ ॥
। तत्फलं सर्वमाप्नोति विद्यादानान्न संशयः ॥ ५६ ॥
। सर्वदानप्रदः स स्यात्पुस्तकं वाचयेत्तु यः ॥५७ ॥
। ब्रह्माद्या देवताः सर्वा विद्यादाने प्रतिष्ठिताः ॥ ५८ ॥
। उपवेदप्रदानेन गन्धर्वैः सह मोदते ॥५९ ॥
। धर्मशास्त्रप्रदानेन धर्मेण सह भोदते ॥ ६० ॥
। विद्यादानमवाप्नोति प्रदानात्पुस्तकस्य तु ॥ ६१ ॥
। शिष्यांश्च शिक्षयेद्यस्तु पुण्डरीकफलं लभेत् ॥६२ ॥
। लोके श्रेष्ठतमं सर्वमात्मनश्चापि यत्प्रियम् ॥ ६३ ॥
। विष्णुं रुद्रं पद्मयोनिं देवी विघ्नेश्वरादिकान् ॥६४ ॥
। देवालयं च प्रतिमां कारयन्सर्वमाप्नुयात् ॥६५ ॥
। नानामण्डलकार्यग्रे मण्डलाधिपतिर्भवेत् ॥६६ ॥
गन्धं पुष्पं धूपदीपं नैवेद्यं च प्रदक्षिणम् । घण्टाध्वजवितानं च प्रोक्षणं वाद्यगीतकम् ॥६७ ॥
मर्म समझनेवाले जिस व्यक्ति ने आचार्य को वृत्ति दी और छात्रों को भोजन आदि दिया, उसने सब - कुछ दे डाला । सम्यक् प्रकार से एक हजार वाजपेय यज्ञ करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल विद्यादान करने से प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं ॥५५-५६ ॥ शिवालय, विष्णुमन्दिर तथा सूर्यमन्दिर में पुस्तक का पाठ करवानेवाला, सब-कुछ दान करनेवाला ( माना जाता है । त्रैलोक्य में जो कुछ भी है - चार वर्ण, चार आश्रम तथा ब्रह्मा आदि देवता-यह विद्यादान में ही प्रतिष्ठित हैं । विद्या कामधेनु है, वही सर्वोत्तम नेत्र है । उपवेदों का दान करने से गन्धर्वों के साथ आनन्दोपभोग का अवसर मिलता है ॥५७-५९ ॥ वेदाङ्ग के दान से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । धर्मशास्त्र का दाता धर्म के साथ आनन्दित होता रहता है । सिद्धान्तों का दाता मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है । पुस्तक दान करने से विद्यादान का फल मिलता है । शास्त्र और पुराणों का दान करने से सभी पदार्थों की प्राप्ति होती है । जो शिष्यों को शिक्षा देता है, उसको वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है ॥६०-६२ ॥ अपनी जीविका के साधन को दान कर देनेवाले के फलों का अन्त ही नहीं होता है । लोक में जो वस्तु सबसे उत्तम तथा अपनी प्रिय हो, उसे पितरों को दान करना चाहिए । इससे वे वस्तुएँ अक्षय होकर ( पुनः दाता को ) प्राप्त होती हैं । विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा,, देवी, गणेश आदि का पूजन करके पूजा की वस्तु ब्राह्मण को समर्पित कर देनेवाला सब - कुछ प्राप्त कर लेता है । देवालय बनवाने तथा प्रतिमा स्थापित कराने से सभी कामनाएँ पूरी होती हैं ॥ ६३-६५ ॥ देवमन्दिरों में झाडू लगाने तथा लीपने से मनुष्य ( स्वयं ) निर्मल हो जाता है । देवालय के आगे विविध प्रकार के मण्डलों का निर्माण करानेवाला मनुष्य मण्डलाधिपति हो जाता है ॥६६ ॥ देवता को गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, प्रदक्षिणा. घण्टा, पताका, वितान, दर्पण,
१ ख. ग. कामोद्वहा घे ' । २. क. ङ. ' मं यच्च आत्म ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ६५१ वस्त्रादि दत्त्वा देवाय भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् । कस्तूरिकां सिंहलकं च श्रीखण्डमगुरुं तथा ॥६८ ॥
कर्पूरं च तथा मुस्तं गुग्गुलं विजयं ' ददेत् । घृतप्रस्थेन संस्नाप्य संक्रान्त्यादौ स सर्वभाक् ॥६९ ॥
स्नानं पलशतं ज्ञेयमभ्यङ्गं पञ्चविंशतिः । पलानां तु सहस्रेण महास्नानं प्रकीर्तितम् ॥७० ॥
दशापराधास्तोयेन क्षीरेण स्नापनाच्छतम् । सहस्रं पयसा दध्ना घृतेनायुतमिष्यते ॥७१ ॥
दासीदासमलङ्कारं गोभूमश्वगजादिकम् । देवाय दत्त्वा सौभाग्यं धनायुष्मान्व्रजेद्दिवम् ॥७२ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नानादानमहिमवर्णनं नामैकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २११ ॥
अथ द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः मेरुदानानि अग्निरुवाच काम्यदानानि वक्ष्यामि सर्वकामप्रदानि ते । नित्यपूजां मासि मासि कृत्वाऽथो काम्यपूजनम् ॥१ ॥
व्रतार्हणं गुरोः पूजा वत्सरान्ते महार्चनम् । अश्वं वै मार्गशीर्षे तु कमलं पिष्टसम्भवम् ॥२ ॥
शिवाय पूज्य दद्यात् सूर्यलोके चिरं वसेत् । गजं पौषे पिष्टमयं त्रिसप्तकुलमुद्धरेत् ॥३ ॥
वाद्य, गीत, वस्त्र आदि समर्पण करने से भुक्ति - मुक्ति की प्राप्ति होती है । कस्तूरी, सिंहलक ( सुगन्धित द्रव्य ), श्रीखण्ड, अगर, कपूर, मुस्ता तथा गुग्गुल समर्पित करने से विजय लाभ होता है । संक्रान्ति आदि में घी से देवता को स्नान कराने से सब - कुछ प्राप्त हो जाता है ॥ ६७-६९ ॥ एक पल परिमित घी का स्नान, स्नान होता है । पचीस पल से अभ्यङ्ग और एक हजार पल से महास्नान कहा गया है ॥७० ॥ देवताओं को जल के स्नान कराने से दस पापों की
शान्ति होती है, दुग्धस्नान से सौ पापों की, दूध - दही से हजार पापों की और घृत से दस हजार पापों की शान्ति होती है । जो देवता को दासी, दास, आभूषण, गाय, भूमि, घोड़े, हाथी आदि का दान करता है वह सौभाग्य, धन तथा आयु प्राप्त करके स्वर्ग को जाता है ॥७१-७२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नाना दान - वर्णन नामक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥२११ ॥
अध्याय २१२ मेरुदान अग्निदेव बोले - अब मैं कामनाओं को पूर्ण करनेवाले काम्यदानों के सम्बन्ध में कहूँगा । इष्ट देवता अथवा गुरु की पूजा नित्यपूजा हुआ करती है और व्रत आदि का अनुष्ठान प्रतिमास हुआ करता है । मार्गशीर्ष में शिवपूजन करके पिष्ट ( तण्डुल चूर्ण ) का बना अश्व तथा कमल दान करनेवाला व्यक्ति चिरकाल तक सूर्यलोक में निवास करता है ॥१-२ ॥ पौष मास में पिष्टमय गज दान करने से इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार होता है । माघ मास में पिष्ट का बना हुआ १ क. ङ. दहेत् । २ ग. ज्ञेयं मङ्गलं प ' । ३ क. ङ. कृत्यार्थे का । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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६५२ अग्निपुराणम् माधे चाश्वरथं पैष्टं दत्त्वा न नरकं व्रजेत् । चैत्रे ' चेक्षुमयागारं दासदासीसमन्विनम् । सप्तव्रीहींश्च वैशाखे दत्त्वा शिवमयो भवेत् । विमानं श्रावणे पौष्पं दत्त्वा स्वर्गी ततो नृपः । गुग्गुलादि दहेद्भाद्रे स्वर्गी स स्यात्ततो नृपः । कार्तिके गुडखण्डाज्यं दत्त्वा स्वर्गी ततो नृपः । तु कार्तिक्यां रत्नमेरुं ददेद्विजे । वज्रपद्ममहानीलनीलस्फटिकसंज्ञितः । मध्योऽर्धः स्यात्तदर्धोऽधो वित्तशाठ्यं विवर्जयेत् माल्यवान्पूर्वतः पूज्यस्तत्पूर्वे भद्रसंज्ञितः । हेमकूटोऽथ हिमवांस्त्रयं सौम्ये तथा त्रयम् फाल्गुने तु वृषं पैष्टं स्वर्गभुक्त्यान्महीपतिः ॥४ ॥
दत्त्वा स्वर्गे चिरं स्थित्वा तदन्ते स्यान्महीपतिः ॥५ ॥
वलिमण्डलकं ' चान्नैः कृत्वाऽऽषाढे शिवो भवेत् ॥६ ॥
शतद्वयं फलानां तु दत्त्वोद्धृत्य कुलं नृपः ॥७ ॥
क्षीरसर्पिर्भृतं पात्रमाश्विने स्वर्गदं भवेत् ॥ ८ ॥
मेरुदानं द्वादशकं वक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्तिदम् ॥९ ॥
सर्वेषां चैव मेरूणां प्रमाणं क्रमशः शृणु ॥१० ॥
पुष्पं मरकतं मुक्ता प्रस्थमात्रेण चोत्तमः ॥ ११ ॥
। कर्णिकायां न्यसेन्मेरु ब्रह्मविष्ण्वीशदैवतम् ॥१२ ॥
अश्वरक्षस्ततः प्रोक्तो निषधो मेरुदक्षिणे ॥ १३ ॥
। नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च पश्चिमे गन्धमादनः ॥१४ ॥
अश्व और रथ दान करने से नरक में नहीं जाना पड़ता है । फाल्गुन में पिष्टमय ( पीठ के ) बैल का दान करने से मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करके ( अन्त में ) राजा होकर जन्म लेता है ॥ ३-४ ॥ चैत्र में ईख का बना हुआ घर तथा दास - दासियाँ दान करने से मनुष्य स्वर्ग में चिरकाल तक निवास करके अन्त में महीपति होता है । वैशाख में सप्तधान दान करने से दाता शिवमय हो जाता है । आषाढ़ में अन्न का बलि मण्डल बनाकर दान करने से मनुष्य शिव ( ही ) हो जाता है ॥५-६ ॥ श्रावण मास में पुष्पविमान दान करने से मनुष्य स्वर्ग - लाभ करके अन्त में नृपति होता है । उसी मास में सौ फलों का दान करने से ( दाता अपनी ) इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करके अन्त में भूपति होता है । भाद्रपद में ( देवता के सम्मुख ) गुग्गुल आदि सुलगाने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । आश्विन में घी से भरा पात्र दान करनेवाला स्वर्ग को चला जाता है । कार्तिक मास में गुड़, खाँड़, घी से भरा पात्र दान करनेवाला स्वर्ग को चला जाता है तथा ( कालान्तर में ) राजा होता है । अब मैं बारह प्रकार का मेरुदान बतलाता हूँ; जो भोग और मोक्ष दिलानेवाला हुआ करता है ॥७ - ९ ॥ कार्तिकी पूर्णिमा में मेरुव्रत में ब्राह्मण को रत्न का मेरुपर्वत देना चाहिए । अब क्रमशः सभी मेरुओं का प्रमाण सुनो ॥१० ॥ वज्र, पद्म,
महानील, नील, स्फटिक, पुखराज, मरकत, मुक्ता- इन सबसे मेरु बनता है । सेर भर द्रव्य से बना मेरु उत्तम होता है । आधे सेर से बना मध्यम और पाव भर से बना हुआ मेरु अधम हुआ करता है । ( मेरुदान में धन की शठता ( कृपणता ) का परित्याग कर देना चाहिए । ( पूर्ववर्णित कमल चक्र की ) कर्णिका के ऊपर ब्रह्मा, विष्णु, महेश देवताओं से सम्बद्ध मेरु का न्यास करना चाहिए ॥११-१२ ॥ उसकी पूर्व दिशा में माल्यवान् और मल्यवान् के पूर्व की ओर भद्र और अश्वरक्ष पर्वतों की पूजा करनी चाहिए । मेरु के दक्षिण की ओर हेमकूट, हिमवान् तथा निषध, उत्तर की ओर नील, श्वेत, शृंगी तथा पश्चिम की ओर गन्धमादन, केतुमाल और वैकङ्क नामक पर्वतों की पूजा करनी चाहिए । उस दिन उपवास करते १ घ. च. “ मयी ° गावं दा ” । २ ख. ग. " कं रात्रौ कृ " । ३ ग. ' वान्पर्व ' । ४ क. ङ. ' नः । वौषट्कंके " । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ६५३ वैकङ्कः केतुमालः स्यान्मेरुर्द्वादशसंयुतः देवाग्रे प्रार्च्य मेरुं च मंत्रैर्विप्राय वै ददेत् भुक्त्यै मुक्त्यै निर्मलत्वे विष्णुदैवं ददामि ते कुलमुद्धृत्य क्रीडेत विमाने ' देवपूजितः पलानां तु सहस्त्रेण ' महामेरुं प्रकाल्पयेत् एकैकं पर्वतं तस्य शतैकैकेन कारयेत् अयने ग्रहणादौ च विष्ण्वग्रे हरिमर्च्य च परमाणवो यावन्त इह राजा भवेच्चिरम् प्रागुक्तं च फलं तस्य विष्णुं विप्रं प्रपूज्य च परिकल्प्याष्टमांशेन शेषांशाः पूर्ववत्फलम् ददेत्त्रिपुरुषैर्युक्तं दत्त्वाऽनन्तफलं लभेत् विष्ण्वादीन्पूज्य तं दत्त्वा भुक्तभोगो नृपो भवेत् पट्टवस्त्रैर्भारमात्रैर्वस्त्रमेरुश्च मध्यतः । सोपवासोऽर्चयेद्विष्णुं शिवं वा स्नानपूर्वकम् ॥ १५ ॥
। विप्रायामुकगोत्राय मेरुं द्रव्यमयं परम् ॥१६ ॥
। इन्द्रलोके ब्रह्मलोके शिवलोके हरेः पुरे ॥ १७ ॥
। अन्येष्वपि च कालेषु संक्रान्त्यादौ प्रदापयेत् ॥१८ ॥
। शृङ्गत्रयसमायुक्तं ब्रह्मविष्णुहरान्वितम् ॥१९ ॥
। मेरुणा सह शैलास्तु ख्यातास्तत्र त्रयोदश ॥२० ॥
। स्वर्णमेरुं द्विजायाऽऽर्ण्य विष्णुलोके चिरं वसेत् ॥ २१ ॥
1 । रौप्यमेरुं द्वादशाद्रियुतं संकल्पतो ददेत् ॥ २२ ॥
। भूमिमेरुं च विषयं मण्डलं ग्राममेव च ॥ २३ ॥
। द्वादशाद्रिसमायुक्तं हस्तिमेरुस्वरूपिणम् ॥२४ ॥
। त्रिपञ्चाश्वैरश्वमेरुं हयद्वादशसंयुतम् ॥२५ ॥
। अश्वसंख्याप्रमाणेन गोमेरुं पूर्ववद्ददेत् ॥२६ ॥
। शैलैर्द्वादशवस्त्रैश्च दत्त्वा तं चाक्षयं फलम् ॥२७ ॥
हुस्नानपूर्वक विष्णु अथवा शिव का पूजन करना चाहिए ॥१३-१५ ॥ तदनन्तर देवताओं के सम्मुख मन्त्रों से मेरु की पूजा करके उसे ब्राह्मण को दे देना चाहिए । “ मैं निष्पाप होकर भुक्ति - मुक्ति प्राप्त करने के लिए विष्णु देवता से सम्बद्ध यह द्रव्यमय मेरु अमुक गोत्रवाले विप्र को समर्पण कर रहा हूँ । " इस प्रकार मेरुदान करनेवाला व्यक्ति अपने कुल का उद्धार कर देवताओं का पूज्य हो जाता है तथा इन्द्रलोक, ब्रह्मलोक, शिवलोक और गोलोक में विमान पर क्रीड़ा करता है । संक्रान्ति आदि अन्य कालों में भी मेरुदान करना चाहिए ॥ १६-१८ ॥ सहस्र पल परिमित सोने का बड़ा - सा मेरु बनाना चाहिए । उसके तीनों शिखरों को ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर से युक्त होना चाहिए । उस महामेरु का एक - एक पर्वत सौ - सौ पल का होना चाहिए । मेरु को मिलाकर उन पर्वतों की संख्या तेरह होनी चाहिए । अयनों में तथा ग्रहण आदि में विष्णु के आगे पूजा करके स्वर्णमेरु ब्राह्मण को दे देना चाहिए । ऐसा करनेवाला चिरकाल तक विष्णुलोक में निवास करता है ॥ १ ९ -२१ ॥ तदनन्तर इस लोक में उतने वर्षों तक राज्य करता है, जितने यहाँ परमाणु हैं । विष्णु तथा विप्र की पूजा कर चाँदी के बारह पर्वतों के साथ एक रजतमेरु दान करने से भी पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है । आठ राज्य मण्डल ( जिला ) तथा नगरों से युक्त भूमिमेरु का दान करने से भी उक्त फल प्राप्त होता है । बारह पर्वतों से युक्त हस्तिमेरु दान करने से मनुष्य तीन पीढ़ियों का उद्धार करके अनन्त फल प्राप्त कर लेता है ॥२२-२४३ ॥ विष्णु आदि देवताओं की पूजा करके बारह अश्वों के साथ पन्द्रह अश्वों का बना अश्वमेरु दान करनेवाला व्यक्ति सम्पूर्ण भोगों का उपभोग करता हुआ ( अनेक जन्मों में ) राजा होता है । अश्वमेरु ( दान में दिये गये अश्वों ) की संख्या के अनुसार गोमेरु दान करना चाहिए ॥ २५-२६ ॥ भारमात्र रेशमी वस्त्रों का वस्त्रमेरु का दान मध्यम कोटि का होता है । बारह वस्त्रों के साथ वस्त्रमेरु दान करने से अक्षयफल प्राप्त होता है । पाँच हजार १ क. ङ. देवपूजिते । २ घ. ' ण हेममे ' । ३ ' पट्टवस्त्रै मध्यतः ' इत्यत्र क. ङ. पुस्तकयोरेतद्दृश्यते - ' यद्भवेद्भारगात्रैस्तु वसुमेरुं च मध्यतः । ' इति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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६५४ अग्निपुराणम् घृतपञ्चसहस्त्रैश्च पलानामाज्यपर्वतः । विष्ण्वग्रे ब्रह्मणायाऽऽर्प्य सर्वं प्राप्य हरिं ब्रजेत् । धान्यमेरुः पञ्चखारोऽपर एकैकखारकाः । सर्वेषु पूज्य विष्णुं वा विशेषादक्षयं फलम् । शृङ्गाणि पूर्ववत्तस्य तथैवान्यनगेषु च । नमो विष्णुस्वरूपाय धराधराय वै नमः । नगद्वादशनाथाय सर्वपापापहारिणे । निष्पापः पितृभिः सार्धं विष्णुं गच्छामि ॐ नमः । निवेदयामि भक्त्या तु भुक्तिमुक्त्यर्थहेतवे इत्यादिमहापुराण आग्नेये मेरुदानवर्णनं शतैः पञ्चभिरेकैकः पर्वतेऽस्मिन्हरिं यजेत् ॥ २८ ॥
एवं च खण्डमेरुं च कृत्वा दत्त्वाऽऽप्नुयात्फलम् ॥२९ ॥
स्वर्णत्रिशृङ्गकाः सर्वे ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ॥ ३० ॥
एवं दशांशमानेन तिलमेरुं प्रकल्पयेत् ॥ ३१ ॥
तिलमेरुं प्रदायाथ ' बन्धुभिर्विष्णुलोकभाक् ॥ ३२ ॥
ब्रह्मविष्ण्वीशशृङ्गाय धरानाभिस्थिताय च ॥ ३३ ॥
विष्णुभक्ताय शान्ताय त्राणं मे कुरु सर्वदा ॥ ३४ ॥
त्वं हरिस्तु हरेरग्रे अहं विष्णुश्च विष्णवे ॥ ॥३५ ॥
नाम द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥११२ ॥
पल घी का आज्यपर्वत होता है । उसका प्रत्येक उपपर्वत पाँच - पाँच सौ पल घी का होना चाहिए । उसके ऊपर भगवान् विष्णु की पूजा करके और भगवान् विष्णु के सामने ही ब्राह्मण को यह पर्वत दान कर देने से विष्णु ( लोक ) की प्राप्ति होती है ॥२७-२८ ॥ इसी प्रकार खाँड़ का मेरु बनाकर उसका दान करने से ( अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है । पाँच खार ( मन ) का धान्यमेरु हुआ करता है । उसका प्रत्येक उपपर्वत एक - एक मन का होना चाहिए । उन सब के तीन-तीन सोने के शिखर होने चाहिए जिनके ऊपर ब्रह्मा, विष्णु, महेश की पूजा करनी चाहिए । ऐसा करने से अक्षय फल प्राप्त होता है । धान्यमेरु के दशांश परिमाण से तिलमेरु की रचना करनी चाहिए ॥ २ ९ -३१ ॥ उसके शिखर पूर्ववत् हों, जिनके ऊपर पूर्ववत् विष्णु आदि देवताओं की पूजा करनी चाहिए । तिलमेरु का दान करने से मनुष्य अपने बन्धुओं के साथ विष्णुलोक को जाता है ॥ ३२ ॥ मेरुओं की प्रार्थना इस प्रकार से करनी चाहिए - ' विष्णुरूप
मेरु को नमस्कार है । भूधर को नमस्कार है । ब्रह्मा, विष्णु, महेश को, शिखरों पर धारण करनेवाले ( पर्वतों ) को नमस्कार है । बारह पर्वतों के स्वामी ( इन पर्वतों ) को नमस्कार है । सफल पापों को अपहरण करनेवाले को नमस्कार है । मैं विष्णुभक्त तथा शान्त हूँ । सब प्रकार से मेरी रक्षा कीजिये । मैं निष्पाप होकर पितरों के साथ विष्णुलोक को जा रहा हूँ, ॐ को नमस्कार है । तुम विष्णु हो, मैं विष्णु के समक्ष विष्णु हूँ और भुक्ति - मुक्ति पाने के लिए मैं भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णु को नमस्कार कर रहा हूँ ॥ ३३-३५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में मेरुदान वर्णन नामक दो सौ बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥२१२ ॥
१ क. ङ. च. भिर्ब्रह्मलो । २ क. ङ. च । दशद्वा ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ६५५ अथ त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः पृथ्वीदानानि अग्निरुवाच पृथ्वीदानं प्रवक्ष्यामि पृथिवी त्रिविधा मता । शतकोटिर्योजनानां सप्तद्वीपा ' ससागरा ॥१ ॥
जम्बुद्वीपावधिः सा च उत्तमा ' मेदिनीरिता । उत्तमा पञ्चभिर्भारैः काञ्चनैश्च प्रकल्पयेत् ॥ २ ॥
तदर्धान्तरजं कूर्मं तथा पद्मं समादिशेत् । उत्तमा कथिता पृथ्वी द्वयंशेनैव तु मध्यमा ॥ ३ ॥
कन्यसा च त्रिभागेन ( ण ) त्रिहान्या कूर्मपङ्कजे । पलानां तु सहस्त्रेण कल्पयेत्कल्पपादपम् ॥४ ॥
मूलदण्डं सपत्रं च फलपुष्पसमन्वितम् । पञ्चस्कन्धं तु संकल्प्य पञ्चानां दापयेत्सुधीः ॥ ५ ॥
एतद्दाता ब्रह्मलोके पितृभिमादते चिरम् । विष्ण्वग्रे कामधेनुं तु पलानां पञ्चभिः शतैः ॥६ ॥
ब्रह्मविष्णुमहेशाद्या देवा धेनौ व्यवस्थिताः । धेनुदानं सर्वदानं सर्वदम् ब्रह्मलोकदम् ॥७ ॥
विष्ण्वग्रे कपिलां दत्त्वा तारयेत्सकलं कुलम् । अलंकृत्य स्त्रियं दद्यादश्वमेधफलं लभेत् ॥८ ॥
भूमिं दत्वा सर्वभाक्स्यात्सर्वसस्यप्ररोहिणीम् । ग्रामं वाऽथ पुरं वाऽपि खेटकं च ददत्सुखी ॥९ ॥
कार्तिक्यादौ वृषोत्सर्गं कुर्वस्तारयते कुलम् ॥१० ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये पृथ्वीदानवर्णनं नाम त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
अध्याय २१३ पृथ्वीदान अग्निदेव बोले - अब मैं पृथ्वीदान के सम्बन्ध में कहूँगा । सौ करोड़ योजनों में विस्तृत पृथ्वी, जिसमें सातों द्वीप और सागर भी आ जाते हैं, तीन प्रकार की कही गयी है । उनमें जम्बूद्वीप तक सीमित पृथ्वी उत्तमा पृथ्वी है । ( दान करने के लिए ) उत्तमा पृथ्वी को पाँच भार सुवर्ण से बनाना चाहिए । इस प्रकार निर्मित पृथ्वी उत्तम हुआ करती है ॥१-२ ॥। इसके आधे से बनी हुई पृथ्वी मध्यम होती है तथा उसके भी तिहाई भाग से बनी हुई पृथ्वी अधम कोटि की होती है जिस पर तिहाई भाग से कूर्म और पद्म बने रहते हैं । एक हजार पल ( सुवर्ण ) से कल्पवृक्ष की रचना करनी चाहिए ॥३-४ ॥ उसमें मूल, दण्ड, पत्र, पुष्प तथा पाँच शाखाएँ होनी चाहिए । इस प्रकार की पृथ्वी दान करनेवाला बुद्धिमान् पितरों के साथ चिरकाल तक ब्रह्मलोक में आनन्द प्राप्त करता है ॥५-५३ ॥ विष्णु के समक्ष पाँच सौ पल सुवर्ण की बनी हुई कामधेनु का दान करना चाहिए । ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता गाय में निवास किया करते हैं । वह सब - कुछ देनेवाला और ब्रह्मलोक को प्रदान करनेवाला है ॥६-७ ॥ भगवान् विष्णु के समक्ष कपिला गौ दान करनेवाला व्यक्ति अपने सम्पूर्ण कुल का उद्धार कर देता है । अलङ्कारों से अलङ्कृत स्त्री का दान करने से अश्वमेघ का फल प्राप्त होता है || ८ || सब प्रकार के अन्न से युक्त भूमि का दान करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं । गाँव, नगर तथा खेटक ( छोटा गाँव ) दान करनेवाला सुखी रहता है । कार्तिकी पूर्णिमा आदि में साँड़ छोड़नेवाला अपने कुल का उद्धार कर देता है ॥९ -१० ॥ श्री अग्निमहापुराण में पृथ्वीदान - वर्णन नामक दो सौ तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥२१३ ॥
१ ख. च. पावसानतः ज ' । २ ख. ' माद्रिः समीरि । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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६५६ अग्निपुराणम् अथ चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः नाडीचक्रकथनम् अग्निरुवाच नाडीचक्रं प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञानाज्ज्ञायते हरिः । द्वासप्ततिसहस्राणि नाभिमध्ये व्यवस्थिताः । चक्रवत्संस्थिता ह्येताः प्रधाना दश नाडयः । गान्धारी हस्तिजिह्वा च पृथा ' चैव यशा तथा । दशप्राणवहा ह्येता नाडयः परिकीर्तिताः नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः । प्राणः प्राणायते प्राणं विसर्गात्पूरणं प्रति निःश्वासोच्छ्वासकासैस्तु ' प्राणो जीवसमाश्रितः अधो नयत्यपानस्तु आहारस्तु नृणामधः नाभेरधस्ताद्यत्कन्दमङ्कुरास्तत्र निर्गताः ॥१ ॥
तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव व्याप्तं ताभिः समन्ततः ॥ २ ॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तथैव च ॥ ३ ॥
अलम्बुषा ' हुहुश्चैव शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥ ४ ॥
। प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥५ ॥
प्राणस्तु प्रथमो वायुर्दशानामपि स प्रभुः ॥ ६ ॥
। नित्यमापूरयत्येष प्राणिनामुरसि स्थितः ॥७ ॥
। ( " प्रयाणं कुरुते यस्मात्तस्मात्प्राणः प्रकीर्तितः ॥ ८ ॥
। मूत्रशुक्रवहो वायुरपान कीर्तितः ॥९ ॥
अध्याय २१४ नाड़ीचक्र - कथन अग्निदेव बोले - अब मैं नाड़ीचक्र को बतलाऊँगा, जिसे जान लेने से भगवान् विष्णु का ज्ञान प्राप्त हो जाता है । नाभि के नीचे जो कन्द है, उससे अंकुर निकलते हैं || १ || नाभि के मध्य में बहत्तर हजार नाड़ियाँ स्थित हैं जो ऊपर, नीचे तथा तिरछे फैलकर चारों ओर व्याप्त हो गयी हैं । उनकी स्थिति चक्राकार है । उनमें प्रधान दस नाड़ियाँ हैं जिनका नाम - इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पृथा, यशा, अलम्बुषा, हुहु तथा शङ्खिनी है ॥२-४ ॥ उन नाड़ियों में दस प्राणों का संचार होता रहता है, जिनके नाम हैं - प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त तथा धनञ्जय । उन दसों में प्राणवायु सर्वप्रथम है और सबका स्वामी है ॥५-६ ॥ प्राणवायु प्राण को विसर्ग ( त्याग = अपान वायु ) से हटाकर पूर्णता की ओर ले जाता है । अर्थात् वह प्राणियों के उर ( हृदय ) में नित्य रहता हुआ ( श्वास को ) पूर्ण करता है । नि: श्वासोच्छ्वास के द्वारा प्राण जीव से मिलता है । क्योंकि यह ( एक निश्चित अवधि के बाद शरीर से ) प्रयाण करता है इसलिए इसका नाम ' प्राण ' पड़ा है ॥ ७-८ ॥ अपान वायु मनुष्यों के आहार को नीचे ले जाता है और सूत्र तथा वीर्य को प्रवाहित करता है; इसलिए उसका नाम अपान पड़ा है । समान वायु पिये हुए, खाये हुए तथा सूँघे हुए पदार्थों को और रक्त, पित्त, कफ तथा वायु को समान रूप से शरीर के अङ्गों १ क. ङ. पूषा । २ क. ख. ङ. ' षाकुहूश्चै ' । ३ क. ङ. ' स्तु जीवनो नाममारुतः । ४ प्रयाणं मारुतः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA