अग्नि पुराण — पृष्ठ 901–910

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 901–910

पृष्ठ 901

अग्नि पुराण, पृष्ठ 901 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः विडङ्गेन्द्रयवौ हिङ्ग ' सरलं रजनीद्वयम् प्रधानभोजने तेषां षष्टिकव्रीहिशालयः यवश्चैव तथैवेक्षुर्नागानां बलवर्धनः मदक्षीणस्य नागस्य पयःपानं प्रशस्यते वायसः कुक्कुरश्चोभौ काकोलूककुलं हरिः । कटुमत्स्यविडङ्गानि क्षारः कोषातकीपयः । पिप्पलीतण्डुलीतैलं माध्वीकं माक्षिकं तथा । पुरीषं चटकायाश्च तथा पारावतस्य च । अनेनाञ्जितनेत्रस्तु करोति कदनं रणे । तण्डुलोदकपिष्टानि नेत्रनिर्वापणं परम् । शय्यास्थानं भवेच्चास्य करीषैः पांसुभिस्तथा । ८ ९ ७ । पूर्वाह्णे दापयेत्पिण्डान्सर्वशूलोपशान्तये॥२३ ॥

। मध्यमौ यवगोधूमौ शेषा दन्तिनि चाधमाः । २४ ॥ । नागानां यवसं शुष्कं तथा धातुप्रकोपणः ॥२५ ॥

। दीपनीयैस्तथा द्रव्यैः शृतो मांसरसः शुभः ॥ २६ ॥

भवेत्क्षौद्रेण संयुक्तः पिण्डोद्रेकगदापहः ॥२७ ॥

हरिद्रा चेति धूपोऽयं कुञ्जरस्य जयावहः ॥ २८ ॥

नेत्रयोः परिषेकोऽयं दीपनीयः प्रशस्यते ॥ २ ९ ॥ क्षीरवृक्षः करीषश्च प्रसन्ना चेष्टमञ्जनम् ॥ ३० ॥

उत्पलानि च नीलानि मुस्तं तगरमेव च ॥ ३१ ॥

नखवृद्धौ नखच्छेदस्तैलसेकश्च मास्यपि ॥३२ ॥

शरन्निदाघयोः सेकः सर्पिषा च तथेष्यते ॥ ३३ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये गजचिकित्साकथनं नाम सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२८७ ॥

इन्द्रजौ, हींग, बरिअरा, हरदी तथा आमा हरदी का पिण्ड बनाकर खिलावे तो शूल शान्त हो जाता है । हाथियों मुख्य भोजन साठी या अन्य चावल का भात है और मध्यम भोजन जवा तथा गेहूँ है और अन्य भोजन अधम माने का गये हैं । जौ और गन्ना हाथियों के बल को बढ़ाता है । हाथियों को सूखी जई ( जव का भेद अन्न ) खिलाने से का प्रकोप होता है । मद से क्षीण हाथी को दूध पिलाना चाहिए तथा दीपनीय द्रव्यों के रस में मांसरस पकाकर धातुओं चाहिए ॥२२-२६ ॥ कौआ और कुत्ता, कौआ और उल्लू और बन्दर के मांस का रस मधु मिलाकर देने से हाथियों देना का पिण्डोद्रेक रोग दूर हो जाता है । कडुई मछली, वायविडंग, यवक्षार, तर्रोई का रस और हरदी का धुआँ देने से हाथियों की जीत होती है । नेत्रों के सींचने के लिए पीपरि के दाने, मुलहठी और मधु का प्रयोग करे, इससे दीप्ति बढ़ती है ॥२७-२९ ॥ चटका पक्षी और कबूतर की टट्टी, बरगद आदि का दूध और करसा गोबर का ( करीष ) को मदिरा में अंजन बनाकर हाथियों के आँख में अञ्जित कर दिया जाय तो रण में बहुतों को मार देता है । नीलकमल, नागरमोथा और तगर को चावल के पानी में पीसकर नेत्र पर लगाने से नेत्र को शान्ति मिलती है । नख बढ़ने पर माह - माह पर नख कटवा दे तथा तेल से सेंक दे । हाथियों के सोने का स्थान करसा और धूल से युक्त होना चाहिए । शरद् और ग्रीष्म में घी का सेंक उत्तम है ॥३०-३३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गजचिकित्सा - कथन नामक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय समाप्त ॥२८७ ॥

१ ख. सबलं । २ क. ° हो पायसे पिण्डा ' । छ. ' हे पायये । २.छ. पडो युद्धे महापदि । क । ५७ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized

पृष्ठ 902

अग्नि पुराण, पृष्ठ 902 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८ ९ ८ अग्निपुराणम् अथाष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अश्ववाहनसार: ' धन्वन्तरिरुवाच अश्ववाहनसारं च वक्ष्येचाश्वचिकित्सनम् । वाजिनां संग्रहः कार्यो धर्मकर्मार्थसिद्धये ॥१ ॥

अश्विनी श्रवणं हस्तमुत्तरात्रितयं तथा । नक्षत्राणि प्रशस्तानि हयानामादिवाहने ॥२ ॥

हेमन्तः शिशिरश्चैव वसन्तश्चाश्ववाहने । ग्रीष्मे शरदि वर्षासु निषिद्धं वाहनं हये ॥३ ॥

तीनैर्नचपलैर्दण्डैर्वदने न च ताडयेत् । कीलास्थिसंकुले चैव विषमे कण्टकान्विते ॥४ ॥

बालुकापङ्कसंछन्ने गर्तागर्तप्रदूषिते । अचित्तज्ञो विनोपायैर्वाहनं कुरुते तु यः ॥। ५ ॥ स वाह्यते हयेनैव पृष्ठस्थः कटिकां विना । छन्दं विज्ञापयेत्कोऽपि सुकृती धीमतां वरः ॥ ६ ॥

अभ्यासादभियोगाच्च विना शास्त्रं स्ववाहकः । स्नातस्य प्राङ्मुखस्याथ ' देवान्वपुषि योजयेत् ॥७ ॥

प्रणवादिनमोन्तेन स्वबीजेन यथाक्रमम् । ब्रह्मा चित्ते बले विष्णुर्वैनतेयः पराक्रमे ॥८ ॥

पार्श्वे रुद्रा गुरुर्बुद्धौ विश्वेदेवाश्च मर्मसु । दृगावर्ते दृशीन्द्वर्कौ कर्णयोरश्विनौ तथा ॥ ९ ॥

अध्याय २८८ अश्ववाहन - सार धन्वन्तरि बोले - घोड़ों की सवारी का तत्त्व तथा घोड़ों की चिकित्सा कहूँगा । घोड़ों का संग्रह धर्म, अर्थ और कार्य के लिए करना चाहिए । अश्विनी, श्रवण, हस्त और तीनों उत्तरा घोड़ों की प्रथम सवारी करने के लिए उत्तम माने गये हैं । इसी तरह हेमन्त, शिशिर और वसन्त ऋतुएँ घोड़ों की सवारी के लिए उत्तम हैं । ग्रीष्म, शरद् और वर्षा घोड़ों की सवारी के लिए निषिद्ध कहा है ॥१-३ ॥ तीव्र और चोखे दण्डों से घोड़ों के मुख पर न मारे । जहाँ पर कील, हड्डी और काँटे अधिक हों वहाँ पर तथा बालू, कीचड़ से युक्त एवं ऊँची - नीची जमीन पर जो सवारी करता है एवं जो घोड़े के मन को नहीं जानता है एवं साज - सज्जा से रहित घोड़ा होता है, उस पर सवारी करता है तो वह घोड़े पर अपना अधिकार नहीं रख सकता अपितु वह घोड़े के वश में ही रहता है अर्थात् घोड़े से वह वाहित होता है । इसी तरह जीन के बिना जो सवारी करता है वह भी घोड़े द्वारा वाहित होता है । घोड़ों की इच्छा को कोई ही सुकृती धीमान् व्यक्ति जानता है । शास्त्रज्ञान के बिना भी अभ्यास और मनोयोग से घोड़ों के चित्त को जानता है । घोड़े को स्नान कराकर पूर्व मुख करके देवों की योजना अश्व के शरीर में करे ॥४-७ ॥ घोड़े के चित्त में ब्रह्मा को लगावे ‘ ॐ ब्रह्मणे नमः चित्तें ', बल में विष्णु को, पराक्रम में गरुड़ को, पार्श्व में इन्द्र को, बुद्धि में बृहस्पति को, मर्म स्थानों में विश्वेदेवों को, शरीर के भँवरी ( आवर्त ) में दस दिक्पालों को, दृष्टि में चन्द्र और सूर्य को, कानों में अश्विनीकुमारों को, उदर १ क. ङ. अग्निरुवाच । २ क. ङ. ' वान्विधिषु यो ० ° । ३ क. ङ. च. दशावर्ते । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 903

अग्नि पुराण, पृष्ठ 903 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः जठरेऽग्निः स्वधा स्वेदे वाग्जिह्वायां जवेऽनिलः । ताराश्च रोमकूपेषु हृदि चान्द्रमसी कला । ग्रहाश्च हेषिते चैव तथैवोरसि वासुकिः । हय गन्धर्वराजस्त्वं ) शृणुष्व वचनं मम । द्विजानां सत्यवाक्येन सोमस्य गरुडस्य च । हुताशनस्य दीप्त्या च स्मर जातिं तुरंगम । स्मर त्वं वारुणीं कन्यां स्मर त्वं कौस्तुभं मणिम् । तत्र देवकुले जातः स्ववाक्यं परिपालय । शृणु मित्र त्वमेतच्च सिद्धो मे भव वाहन । तव पृष्ठं समारुह्य हता दैत्याः सुरैः पुरा । कर्णजापं तपः कृत्वा विमुह्य च तथाऽप्यरीन् । संजाताः स्वशरीरेण दोषाः प्रायेण वाजिनाम् । सहजा इव दृश्यन्ते गुणाः सादिवरोद्भवाः । में अग्नि को, पसीने में स्वधा को, जिह्वा में वाग्देवता ८ ९९ पृष्ठतो नाकपृष्ठस्तु ( ' खुराग्रे सर्वपर्वताः ॥ १० ॥

तेजस्यग्नी रतिः श्रोण्यां ललाटे च जगत्पतिः ॥११ ॥

उपोषितोऽर्चयेत्सादी हयं दक्षश्रुतौ जपेत् ॥१२ ॥

गन्धर्वकुलजातस्त्वं मा भूस्त्वं कुलदूषकः ॥ १३ ॥

रुद्रस्य वरुणस्यैव पवनस्य बलेन च ॥१४ ॥

स्मर राजेन्द्रपुत्रस्त्वं सत्यवाक्यमनुस्मर ॥१५ । क्षीरोदसागरे चैव मध्यमाने सुरासुरैः ॥१६ ॥

कुले जातस्त्वमश्वानां मित्रं मे भव शाश्वतम् ॥१७ ॥

विजयं रक्ष मां चैव समरे सिद्धिमाह ॥ १८ ॥

अधुना त्वां समारुह्य जेष्यामि रिपुवाहिनीम् ॥१९ ॥

पर्यानयेद्धयं सादी वाहयेद्युद्धगो जयम् ॥२० ॥

हन्यन्तेऽतिप्रयत्नेन गुणाः सादिवरैः पुनः ॥ २१ ॥

नाशयन्ति गुणानन्ये सादिनः सहजानपि ॥२२ ॥

को, वेग में वायु को, पृष्ठ पर स्वर्गपृष्ठ को, खुरों के अग्रभाग में सभी पर्वतों को, रोमकूपों में तारागणों को, हृदय में चन्द्रमा की कला को, तेज में अग्नि को, चूतड़ों में रति को, ललाट में जगत् के स्वामी परमात्मा को, घोड़े के हिनहिनाने में ग्रहों को, उर में वासुकि को, दाहिने कान में उपवासी होकर सवारी करनेवाला जपे ॥८-१२ ॥ हे घोड़े! तुम गन्धर्वराज हो मेरे वचन को सुनो । तुम गन्धर्व कुल में उत्पन्न हुए हो अतः कुलदूषक मत बनो । ब्राह्मणों के सत्य वचन से तथा सोम, गरुड़, रुद्र, वरुण और वायु के बल से, अग्नि के तेज से हे घोड़े! तुम अपने पूर्व - - जन्म ज का स्मरण करो । तुम राजेन्द्र पुत्र हो यह स्मरण करो तथा सत्यवाक्य का स्मरण करो । तुम वरुणदेव से उत्पन्न कन्या का स्मरण करो, कौस्तुभ मणि का स्मरण करो । जब क्षीरसमुद्र को देव तथा दानव मथ रहे थे तब तुम उस देवकुल ( समुद्र ) से उत्पन्न हुए । अपने वचनों का प्रतिपालन करो । तुम घोड़ों के कुल में उत्पन्न हुए हो मेरा शाश्वत मित्र बनो ॥ १३ - १७ ॥ हे मित्र! तुम इस बात को सुनो । हे वाहन! तुम सिद्ध होवो, तुम मेरी और मेरे विजय की रक्षा करो और समर में सिद्धि प्राप्त करो । तुम्हारे पीठ पर बैठकर देवताओं ने पूर्वकाल में असुरों का संहार किया । इस समय तुम्हारे पीठ पर बैठकर शत्रु की सेना पर विजय प्राप्त करूँगा । इस प्रकार घोड़े के कान में कहकर घुड़सवार शत्रुओं को मोहित करके घोड़े को ले आवे और युद्ध में जाकर जय प्राप्त करे ॥१८-२० ॥ प्रायः घोड़े में उनके शरीर पर दोष उत्पन्न होते हैं । किन्तु घुड़सवारों द्वारा अति प्रयत्न से वे दोष नष्ट किये जाते हैं और गुण हो जाते हैं । घुड़सवारों द्वारा घोड़े में उत्पन्न किये गये गुण सहज गुण की भाँति दीख पड़ते हैं । बहुत - से घुड़सवार ऐसे भी होते हैं जो घोड़ों के उत्पन्न सहज गुणों को भी नष्ट कर देते हैं । कोई घुड़सवार घोड़े के १ खुराग्रे गन्धर्वराजस्त्वं च. पुस्तके नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 904

अग्नि पुराण, पृष्ठ 904 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ ०० अग्निपुराणम् गुणानेको विजानाति वेत्ति दोषांस्तथाऽपरः । अकर्मज्ञोऽनुपायज्ञो वेगासक्तोऽपि कोपनः ' । उपायज्ञोऽथ चित्तज्ञो विशुद्धो दोषनाशनः । प्रग्रहेण गृहीत्वाऽथ प्रविष्टो वाहभूतलम् । आरुह्य सहसा नैव ताडनीयो हयोत्तमः । प्रातः सादी प्लुतेनैव बल्गामुद्धृत्य चालयेत् । प्रोक्तमाश्वासनं सामभेदोऽश्वेन नियोज्यते । पूर्वपूर्वविशुद्धौ तु विदध्यादुत्तरोत्तरम् । ' गुणोत्तरशतां वल्गां सृक्कण्या सह गाहयेत् हयजिह्वाङ्गमाहीने जिह्वाग्रन्थिं विमोचयेत् कुर्याच्छतमुरस्त्राणमविलालं च मुञ्चति मुञ्चति धन्यो धीमान्हयं वेत्ति नोभयं वेत्ति मन्दधीः ॥२३ ॥

जयदण्डरतिश्चित्रो ' यः शस्तोऽपि न शस्यते ॥२४ ॥

गुणार्जनपरो नित्यं सर्वकर्मविशारदः ॥२५ ॥

सव्यापसव्यभेदेन वाहनीयः सुसादिना ॥ २६ ॥

ताडनाद्भयमाप्नोति भयान्मोहश्च जायते ॥ २७ ॥

मन्दं मन्दं विना नालं धृतवल्गो दिनान्तरे ॥ २८ ॥

कशादिताडनं दण्डो दानं कालसहिष्णुता ॥ २ ९ ॥ जिह्वातले विना योगं विदध्याद्वाहने हये ॥ ३० ॥

। विस्मार्य वाहनं कुर्याच्छिथिलानां शनैः शनैः ॥ ३१ ॥

। गाढतां मोचयेत्तावद्यावत्स्तोभं न मुञ्चति ॥ ३२ ॥

॥ ऊर्ध्वाननः ऊर्ध्वाननः स्वभावाद्यस्तस्योरस्त्राणमश्लथम् ॥३३ ॥

गुणों को जानता है और कोई दोषों को । वह बुद्धिमान् धन्य है जो दोनों बातों को जानकर घोड़े को जानता है । मन्द बुद्धिवाला तो न गुण जानता है न दोष ही ॥ २१-२३ ॥ जो घुड़सवार कर्म और उपाय को नहीं जानता, वेग में आसक्त है, क्रोधी है, जय में और दण्ड देने में ही अनुरागी है, ऐसा विचित्र घुड़सवार घोड़ों के गुण - दोष को जाननेवाला भी प्रशस्त नहीं माना जाता । जो उपाय को जानता है, घोड़े की चित्तवृत्ति को पहचानता है, किसी प्रकार का उसमें अवगुण नहीं है और वह दोषों को नष्ट करनेवाला है । नित्य ही गुणों को प्राप्त करने में तत्पर रहता है, सम्पूर्ण अश्व के कर्मों का पण्डित है, वही अच्छा घोड़े का सवार माना जाता है । घुड़शाला में जाकर घोड़े के पगहे ( रस्सी ) को पकड़कर, दाहिने और बायें के भेद को जानता हुआ अच्छा घुड़सवार घोड़े पर बैठकर एकाएक घोड़े को कोड़ा न मारे क्योंकि ताड़न से घोड़ा डर जाता है और डर जाने से घबड़ा जाता है ॥२४-२७ ॥ घुड़सवार को चाहिए कि प्रात: काल घोड़े की लगाम को ढीला कर दे और घोड़े को कदम ( प्लुत ) की चाल से टहलावे । सायंकाल तथा घोड़े को जब नाल न लगाया हुआ हो तो लगाम को पकड़कर मन्दगति से टहलावे । घोड़े को पुचकारकर आश्वासन दिया जाता है, उसे साम कहते हैं । भेद-नीति घोड़े में नहीं प्रयुक्त की जाती है । कोड़ा जो घोड़े को मारा जाता है, उसे दण्ड कहते हैं और समय - समय पर सेवा, विश्राम तथा भोजन दिया जाता है उसे दान कहते हैं । पूर्व - पूर्व प्रयोग के असफल होने पर उत्तरोत्तर का विधान करे ( जैसे पुचकारने से कार्य न चलने पर कोड़ा मारे और इससे भी काम न चलने पर कुछ काल विश्राम दे ) घोड़े की सवारी में उसकी पीठ पर जीन ( वितान इस पाठ भेद से अर्थ निकलता है ) और जिह्वा तल में लगाम लगावे ॥२८-३० ॥ दोनों तरफ डोरी में बँधी हुई ( गुणोत्तरशतां ) लगाम को जीभ के नीचे लगा दे और शिथिल अश्वों को भुलावा दे - देकर धीरे-धीरे सवारी करे । लगाम से घोड़े की जिह्वा का भाग कस उठे तो लगाम की गाँठ को ढीला कर दे । गाढ़ेपन को तब तक ढीला करे जब तक घोड़े का क्षोभ दूर न हो जाय । सौ उरस्त्राण ( छाती की रक्षा करनेवाला कवच ) घोड़े को लगावे, पीठ पर रेकाब रखे । जो घोड़ा स्वभाव से सिर ऊँचा रखता है उसका उरस्त्राण कसकर लगा होना चाहिए ॥३१-३३ ॥ १ छ. “ नः । घनद ' CC । २ - 0. छ JK. Sanskrit “ तिच्छिद्रे Academy यः समोऽपि , Jammmu ।. ३ Digitized क. ङ. by वितानं S3 Foundation यो वि USA । ४ क. ङ. गुणेन रसतावृद्धिः सृ * ।

पृष्ठ 905

अग्नि पुराण, पृष्ठ 905 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः विधाय वाहयेद्दृष्ट्या लीलया सादिसत्तमः यः कुर्यात्पश्चिमं पादं गृहीतस्तेन दक्षिणः । पादौ तेनापि पादः स्याद्गृहीतो वाम एव हि यौ हृतौ दुष्करे चैव मोटके नाटकायनम् स्वभावं हि तुरंगस्य मुखव्यावर्तनं पुनः । विश्वस्तं हयमालोक्य गाढमापीड्य चाऽऽसनम् गाढमापीड्य रागाभ्यां वल्गामाकृष्य गृह्यते । संयोज्य वल्गया पादान्वल्गामालोच्य वाञ्छितम् । प्रलयाविप्लवे ज्ञात्वा क्रमेणानेन बुद्धिमान् । नाऽऽधत्तेऽधश्च यः पादं योऽश्वो ' लङ्घनमण्डले । वण्टयित्वाऽऽसने गाढं मन्दमादाय यो व्रजेत् । उत्तम घुड़सवार को चाहिए कि लीलापूर्वक दृष्टि के ९ ०१ । तस्य सव्येन पूर्वेण संयुक्तं सव्यवल्गया ॥३४ ॥

क्रमेणानेन यो वामे कुरुते वामवल्गया ॥ ३५ ॥

। अग्रे चेच्चरणे त्यक्ते जायते सुदृढासनम् ॥ ३६ ॥

। सव्यहीनं खलीकारो हनने गुणने तथा ॥ ३७ ॥

न चैवेत्थं तुरंगाणां पादग्रहणहेतवः ॥३८ ॥

। ' रोधयित्वा मुखे पादं ग्राह्यतो लोकनं हितम् ॥३९ ॥

तद्द्बन्धनाद्युग्मपादं ` तद्वद्वल्गनमुच्यते ॥४० ॥

बाह्यपाष्णिप्रयोगात्तु यत्र तन्मोटनं मतम् ॥४१ ॥

मोटनेन चतुर्थेन विधिरेष विधीयते ॥४२ ॥

मोटनोद्वक्कनाभ्यां तु ग्राहयेत्पादमीदृशम् ॥४३ ॥

ग्राह्यते संग्रहाद्यत्र तत्संग्रहणमुच्यते ॥४४ ॥

संकेतमात्र से घोड़े को चलावे । जो घोड़े की पीठ पर पहले दाहिना पैर रखता है वह घोड़े की लगाम बायें तरफ खींचकर चलावे । जो घोड़े की पीठ पर बायाँ पैर पहले रखता है, उसे चाहिए कि पहले दाहिने तरफ लगाम खींचे । इस क्रम से जो बायें तरफ की लगाम से घोड़े को बायें तरफ मोड़ता है उसको दोनों तरफ से पैरों को घोड़े पर रखने का अभ्यास होता है । वह वाम पैर को ही पहले घोड़े पर रखता है । घोड़े पर पहले पैर उछालकर घुड़सवार सुदृढ़ आसन बना लेता है । कठिन पायदान में जो पैर रखा जाता है वह ठीक है किन्तु घोड़े को यदि दण्ड देना हो तो दाहिने तरफ से दे और यदि कोई गुण सिखाना हो तो भी दाहिने ही तरफ से दे । घोड़े का स्वभाव है कि मुख फैलाते हैं किन्तु वे पैर पकड़ने के लिए नहीं ॥ ३४-३८ || विश्वस्त अश्व को देखकर तथा उसकी पीठ पर आसन ( जीन ) को खूब कसकर बाँध दे । इसके बाद मुख में लगाम ( पाद ) को लगावे इस प्रकार जो घोड़े को ग्रहण किया जाता है उसे लोकन कहते हैं । रस्सी से अच्छी तरह कसकर और लगाम पकड़कर जो घोड़े के दोनों पैर बाँधे जाते हैं उसे वल्गन कहते हैं ॥ ३ ९ -४० ॥ लगाम की रस्सी से लगाम को जोड़कर इच्छानुसार जो लगाम को घोड़े के मुख में लगाते हैं और उसे चलाने में एड़ी से चलाते हैं उस स्थिति का नाम मोटन है । चंचलतावश घोड़े को सरपट भागने को तैयार देखकर बुद्धिमान् सवार को चाहिए कि उसे मोटन विधि से ही चलावे ( इस गति को कदम कहते हैं ) । जो अश्व तेजी से दौड़ते समय पैरों को भूमि पर न रखे ( पैर जमीन पर रखता दीख न पड़े ) उसे मोड़ने और लगाम को खींचने से वश में लाये और पैर को जमीन पर रखवाकर कदम ले चले । जो सवार आसन पर बैठकर और अपने पैरों से अश्व के पीठ को मन्दरूप से कस लेता है तथा उसे कदम के रूप में चलने के लिए ग्रहण करता है उस क्रिया को संग्रहण कहते हैं ॥४१-४४ ॥ १ छ. रोकयि । २ छ. ह्रक्कत छ लघुनि म mhmu Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 906

अग्नि पुराण, पृष्ठ 906 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ ०२ अग्निपुराणम् हत्वा पार्श्वप्रहारेण स्थानस्थो व्यग्रमानसम् उल्केणा ( ना ) योङ्घ्रिणाऽनेन पाणिघातांस्तुरंगमः गतित्रये प्रियः पादमादत्ते नैव वाञ्छितः खलीकृत्य चतुष्केण तुरङ्गो वल्गयाऽन्यया स्वभावाद्बहिरस्यन्तं तस्यां दिशि तदाननम् ग्राहयित्वा ततः पादं त्रिविधासु यथाक्रमम् ( ' आजानूर्ध्वाननं वाहं शिथिलं वाहयेत्सुधीः मृदुः स्कन्धे लघुर्वक्त्रे शिथिलः सर्वसन्धिषु न त्यजेत्पश्चिमं पादं यदा साधु भवेत्तदा एकाङ्घ्रिको यथा तिष्ठेदुद्ग्रीवोऽश्वः समाननः तदा संधारणं कुर्याद्गाढवाहं च मुष्टिना शरीरं विक्षिपन्तं च साधयेन्मण्डलभ्रमैः पीठ पर बैठकर जो सवार घोड़े के पार्श्व में कोड़े । वल्गामाकृष्य पादेन ग्राह्यकण्टकपायनम् (? ) ॥४५ ॥

। गृह्यते यत्खलीकृत्य खलीकारः स चेष्यते ॥ ४६ ॥

। हत्वा तु यत्र दण्डेन गृह्यते हननं हि तत् ॥ ४७ ॥

। उच्छ्वास्य ग्राह्यतेऽन्यत्र तत्स्यादुच्छा ( च्छ्वा ) सनंपुनः ॥४८ ॥

। नियोज्य ग्राहयेत्तत्तु मुखव्यावर्तनं मतम् ॥४९ ॥

। साधयेत्पञ्चधारासु क्रमशो मण्डलादिषु ॥ ५० ॥

। अंगेषु लाघवं यावत्तावत्तं वाहयेद्धयम् ॥५१ ॥

। सदा स सादिनो वश्यः संगृह्णीयत्तदा हयम् ) ॥५२ ॥

। तदाऽऽकृष्टिर्विधातव्या पाणिभ्यामिह वल्गया ॥ ५३ ॥

। धरायां पश्चिमौ पादावन्तरी ( रि ) क्षे यदाश्रयौ ॥ ५४ ॥

। सहसैवं समाकृष्टो यस्तुरंगो न तिष्ठति ॥ ५५ ॥

। क्षिपेत्स्कन्धं च यो वाहः स च स्थाप्यो हि वल्गया ॥५६ ॥

से ताड़ना देकर चलाता है और इस बीच आसन तितर - बितर हो जाता है तो लगाम की रस्सी से लगाम को खींचकर जो वश में किया जाता है उसे कण्टकपायन कहते हैं । उत्कट रूप से रेकाब में पैर डालकर एड़ी से जो ताड़न किया जाता है उस ताड़न को जो अश्व सहन करता है उसे खलीकार कहते हैं । तीनों गतियों में से अभीप्सित और प्रिय गति को जो अश्व नहीं ग्रहण करता और लगाम को धारण करता है इस स्थिति में जो चाबुक से घोड़े को ताड़न प्रदान करता है उसे हनन कहते हैं । चौकड़ी मारता हुआ अश्व जब अन्य रस्सी से वश में किया जाता है तथा जब अश्व उच्छ्वास लेकर पकड़ा जाता है, उसे उच्छ्वासन कहते हैं । अश्व अपने स्वभाव से बाहर उसी दिशा में जब खिंचाव करता है तब उसे बन्धन में करके उसके मुख को खींचा जाता है उसे मुखव्यावर्तन कहते हैं ॥ ४५-४९ ॥ घोड़ों की तीन प्रकार की गतियों में पैर स्थिर करने के पश्चात् क्रमशः मण्डलादि पञ्चधारा में घोड़े की गति बढ़ावे । घुटने से लेकर ऊपर मुखपर्यन्त जब घोड़ा शिथिल अवस्था में रहे तब उस पर सवारी करनी चाहिए । बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिए कि जब तक घोड़े में हल्कापन रहे तभी तक उस पर चढ़कर दौड़ावे । जब अश्व स्कन्ध को मृदु बना लेता है, मुख को हल्का कर लेता है एवं सम्पूर्ण सन्धियों में शिथिलता आ जाती है तब वह अश्व सवार के वश में हो जाता है, उस समय घोड़े को ग्रहण करे ॥५०-५२ ॥ जब तक घोड़ा ठीक स्थिति में रहे तब सवार को चाहिए कि अपने लगाम के पिछले भाग को न छोड़े, आवश्यकतानुसार लगाम की डोरी से घोड़े को खींचा करे । जिस समय अश्व ऊपर गर्दन करके एक पैर से खड़ा हो जाय अर्थात् आगे के दोनों पैर उठा ले, पिछले दोनों पैर पृथ्वी पर रह जायँ तब सवार अपनी मूँठी से घोड़े की गर्दन पकड़कर चिपक जाय । इस प्रकार रोकने पर भी जो अश्व एकाएक न रुके और शरीर को फेंकता हो तो उसे सरपट की दौड़ से दौड़ाना चाहिए । जो अश्व बार - बार अपने स्कन्ध को नीचे की तरफ बार - बार झटका देता हो उसे लगाम के द्वारा स्थिर करे ॥५३-५६ ॥ १ आजानूर्ध्वाननं यम् च. पुस्तके नास्ति । ३ छ, या edby त्रिको Foundation USA

पृष्ठ 907

अग्नि पुराण, पृष्ठ 907 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ ०३ गोमयं लवणं मूत्रं क्वथितं मृत्समन्वितम् । मध्ये भद्रादिजातीनां मण्डो देयो हि सादिना । यथा वश्यस्तथा शिक्षा विनश्यन्त्यतिवाहिताः संपीड्य जानुयुग्मेन स्थिरमुष्टिस्तुरंगमम् ( ' पञ्चोलूखलिकाः कार्ये गर्वितास्तेऽतिकीर्तिताः । वल्गितावल्गितौ चैव षोढा चेत्थमुदाहृतम् भद्रः सुसाध्यो वाजी स्यान्मन्दो दण्डैकमानसः । शर्करामधुलाजादः सुगन्धोऽश्वः शुचिर्द्विजः ) शूद्रोऽशुचिश्चलो मन्दो विरूपो विमतिः खलः ।

भारेषु योजनीयोऽसौ प्रग्रहग्रहमोक्षणैः ।

अङ्गलेपो मक्षिकादिदंश श्रमविनाशनः ॥५७ ॥

दंशनं सूक्ष्मकीटस्य निरुत्साहः क्षुधा हयः ॥ ५८ ॥

। अवाहिता न सिध्यन्ति तुङ्गवक्त्रांश्च वाहयेत् ॥५९ ॥

। गोमूत्राः कुटिला वेणी पद्ममण्डलमालिकाः ॥६० ॥

संक्षिप्तं चैव विक्षिप्तं कुञ्चितं च यथाचितम् ॥६१ ॥

। वीथौ धनुः शतं यावदशीतिर्नवतिस्तथा ॥६२ ॥

मृगजङ्ङ्घो मृगो वाजी संकीर्णस्तत्समन्वयात् ॥६३ ॥

। तेजस्वी क्षत्रियश्चाश्वो विनीतो बुद्धिमांश्च यः ॥६४ ॥

वल्गया धार्यमाणोऽश्वो ' लालकं यश्च ` दर्शयेत् ॥६५ ॥

अश्वादिलक्षणं वक्ष्ये शालिहोत्रो यथाऽवदत् ॥६६ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेयेऽश्ववाहनसारवर्णनं नामाष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८८ ॥

अश्व को जब मक्खी आदि काटे तथा थक गया हो जो उसे दूर करने के लिए गोबर, नमक, मिट्टी और मूत्र का काढ़ा करके उसका घोड़े के शरीर पर लेप करे । बीच - बीच में हरसिंगार के जाति के वृक्षों के पत्तों के काढ़े में चावल आदि का मण्ड बनाकर देना चाहिए, इससे छोटे कृमि आदि के काटने से तथा भूख से अश्व निरुत्साह न हो जाय । जितना घोड़ा वश में होता जाय उतनी ही शिक्षा देता जाय । घोड़े को अधिक चलाने से वे नष्ट हो जाते हैं इसी प्रकार न चलाने से भी खराब हो जाते हैं, सिद्ध नहीं होते, उन्हें ऊपर मुख करके चलावे ॥ ५७-५९ ॥ घोड़े की दोनों जानु पर्यन्त मालिश करे एवं हल्की - हल्की मुट्ठी को पीठ पर थपकी देकर मालिश करे और गोमूत्राकार टेढ़ी वेणी सिर पर सँवारे या कमल के आकार की वेणी सँवारे । घोड़े के सिखाने के कार्य में पाँच उलूखलिक नामक ( ओखरी के समान ) क्रियाएँ होती हैं, वे अति गर्वित कही जाती हैं । उनके छह भेद होते हैं - संक्षिप्त, विक्षिप्त, कुञ्चित, यथाचित, वल्गित और अवल्गित । एक सौ या नब्बे या अस्सी धनुषपर्यन्त दूरी तक भद्र अश्व को खेलावे यह सुखसाध्य अश्व होता है । मन्द अश्व केवल दण्डसाध्य होता हैं । मृग - जंघ और मृग अश्व मन्द के समान दण्डसाध्य होता है ॥६०-६३ ॥ धान का लावा, मिश्री और मधु खानेवाला सुगन्धित और पवित्र अश्व द्विज कहा जाता है । तेजस्वी अश्व क्षत्रिय तथा विनीत एवं बुद्धिमान् अश्व को वैश्य कहते हैं । अपवित्र, चंचल, मन्द, रूपरहित और बुद्धिहीन अश्व को खल कहते हैं । लगाम लगाने पर जो अश्व फेन को अधिक मुख से छोड़े उसे भार ढोने में लगावे । इस पगहे से घोड़ा बाँधा जा सकता है । इस प्रकार शालिहोत्र के अनुसार अश्वादि का लक्षण कहूँगा ॥६४-६६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में अश्ववाहनसार - वर्णन नामक दो सौ अठासीवाँ अध्याय समाप्त ॥२८८ ॥

१ पञ्चोलूखलिकाः शुचिर्द्विजः च. पुस्तके नास्ति । २ क. ङ. तालकं । ३ क. ङ. दापयेत् । ४ छ. धारासु । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 908

अग्नि पुराण, पृष्ठ 908 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ ०४ अग्निपुराणम् अथैकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अश्वचिकित्सा शालिहोत्र उवाच अश्वानां लक्षणं वक्ष्ये चिकित्सां चैव सुश्रुत ' । हीरदन्तो विदन्तश्च कृष्णजिह्वश्च यमजोऽजातमुष्कश्च यस्तथा । द्विशफश्च तथा शृङ्गी खरवर्णो भस्मवर्णो जातवर्णश्च काकुदी । श्वित्री च काकसादी वानराक्षः कृष्णसटः कृष्णगुह्यस्तथैव च । कृष्णप्रोथश्च शूकश्च विषमः श्वेतपादश्च ध्रुवावर्तविवर्जितः । अशुभावर्तसंयुक्तो करालः कृष्णतालुकः ॥ १ ॥

त्रिवर्णो व्याघ्रवर्णकः ॥ २ ॥

च खरसारस्तथैव च || ३ || यश्च तित्तिरिसंनिभः ॥४ ॥

वर्जनीयस्तुरंगमः ॥ ५ ॥

रन्ध्रोपरन्ध्रयोर्गौ द्वौ द्वौ द्वौ मस्तकवक्षसोः । प्रायेण च ललाटस्थकण्ठावर्ताः शुभा दश ॥ ६ ॥

सृक्कण्यां च ललाटे च कर्णमूले निगालके । बाहुमूले गले श्रेष्ठा आवर्तास्त्वशुभाः परे ॥७ ॥

शुकेन्द्रगोपचन्द्राभा ये च वायससंनिभाः । सुवर्णवर्णाः स्निग्धाश्च प्रशस्तास्तु सदैव हि || ८ || दीर्घग्रीवाक्षिकूटाश्च ह्रस्वकर्णाश्च शोभनाः । राज्ञां तुरंगमा यत्र विजयं वर्जयेत्ततः ॥९ ॥

अध्याय २८ ९ अश्व - चिकित्सा शालिहोत्र बोले - हे सुश्रुत! अश्वों के लक्षण तथा चिकित्सा कहूँगा । हीरे के समान दाँतवाला, बिना दाँतवाला, भयानक दाँतवाला, काले तालुवाला, काली जीभवाला, जुड़वाँ उत्पन्न हुआ, अण्डकोष न आया हुआ, दो खुरवाला, सींगवाला, तीन वर्णवाला, बाघ के वर्णवाला, गदहे के वर्णवाला, राख के समान वर्णवाला, सोने के वर्णवाला, डीलवाला, सफेद दागवाला, काकसादी, गदहे के समान बलवाला, वानर के समान आँखवाला, काली जटावाला, काले लिंगवाला, काले ओंठवाला, काले शूकवाला, तिमिर के वर्णवाला, विषम एवं सफेद पैरवाला, लक्षण और भँवर से रहित, अशुभ भँवर से युक्त अश्व वर्जनीय है ॥१-५ ॥ दोनों नासिका के छिद्र में और नासिका के पार्श्व में दो - दो भँवरी, मस्तक और छाती में दो - दो भँवरी और प्रायः मस्तक और कण्ठ में दस - दस भँवरी शुभ मानी गयी है । जितना मस्तक, कान की जड़ में; निगलने के स्थान में, बाहु की जड़ में और गले में भँवरी अशुभ मानी गयी है । जो अश्व सुग्गे की आकृति के समान वर्णवाला हो, इन्द्रवधूटी के समान लालवर्ण का हो और जो कौए के समान काले वर्ण का हो एवं जो सुवर्ण के वर्ण का हो तथा चिकना हो वह प्रशस्त माना गया है ॥६-८ ॥ जो लम्बी गर्दनवाला हो, लम्बे आँख के कोटरे हों और छोटे कानवाला हो वह उत्तम अश्व है । इस प्रकार के अश्व जहाँ पर राजाओं के होते हैं वहाँ उनसे विजय की आशा छोड़ दे । जो अश्व संग्राम में अन्य अश्वों और हाथी को १ च. सुश्रुतात । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 909

अग्नि पुराण, पृष्ठ 909 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ ०५ पातितस्तु हयो दन्ती शुभदो दुःखदोऽन्यथा । अश्वमेधे तु तुरगः पवित्रत्वात्तु हूयते । ' सिङ्ङ्घाणकहरी पिण्डी स्वेदश्च शिरसस्तथा । पिप्पलीसैन्धवयुतं शूलघ्नं चोष्णवारिणा । क्वाथमेषां पिबेद्वाजी सर्वातीसारनाशनम् । पर्याप्तशर्करं पीत्वा श्रमाद्वाजी विमुच्यते । कोष्ठजा वा शिरा वेध्यास्तेन तस्य सुखं भवेत् । पिण्डमेतत्प्रदातव्यमश्वानां कार्श्यनाशनम् ' । क्षीरं वा पञ्चकोलाद्यं कासनाद्धि प्रमुच्यते । अभ्यङ्गोद्वर्तनस्नेहस्यवर्तिक्रमः स्मृतः । लोध्रकरञ्जयोर्मूलं मातुलुङ्गाग्निनागराः । मञ्जिष्ठा मधुकं द्राक्षा बृहत्यैौ रक्तचन्दनम् ।

अजापयः शृतमिदं सुशीतं शर्करान्वितम् ।

श्रियः पुत्रास्तु गन्धर्वा वाजिनो रत्नमुत्तमम् ॥१० ॥

वृषो निम्बबृहत्यौ च गुडूची च समाक्षिका ॥११ ॥

हिङ्गु पुष्करमूलं च नागरं साम्लवेतसम् ॥१२ ॥

नागरातिविषा मुस्ता सानन्ता बिल्वमालिका ॥१३ ॥

प्रियंगुसारिवाभ्यां च युक्तमाजं शृतं पयः ॥१४ ॥

द्रोणिकायां तु दातव्या तैलवस्तिस्तुरंगमे ॥१५ ॥

दाडिमं त्रिफला व्योषं गुडश्च समभावितः ॥ १६ ॥

प्रियंगुलोध्रमधुभिः पिबेद्वृषरसं हयः ॥१७ ॥

प्रस्कन्धेषु च सर्वेषु श्रेय आदौ विशोधनम् ॥१८ ॥

ज्वरितानां तुरंगाणां पयसैव क्रियाक्रमः ॥१९ ॥

कुष्ठं हिङ्गु वचा रास्ना लेपोऽयं शोथनाशनः ॥ २० ॥

त्रपुषीबीजमूलानि शृङ्गाटककशेरुकम् ॥२१ ॥

पीत्वा निरशनो वाजी रक्तमेहात्प्रमुच्यते ॥२२ ॥

गिरा दे वह सुखदाता है एवं अन्य प्रकार का दुःखदाता है । उत्तम अश्वरत्न जो गन्धर्व अश्व कहा जाता है उससे लक्ष्मी और पुत्र होते हैं ॥ ९ -१० ॥ अश्वमेध यज्ञ में पवित्र होने के कारण उसका हवन होता है । अडूसा, नीम, भटकैया, वनभाँटा, गुरुचि और मधु कफनाशक हैं । ( घोड़े के शीत लगने पर इन्हीं का काढ़ा पिलावे । काढ़ा में मधु न डाले, काढ़ा के ठण्डा होने पर मधु डालकर पिलावे ) घोड़े के सिर पर बालू आदि की पोटरी बनाकर स्वेद दे । हींग, पोहकर मूल, सोंठ, अम्लवेत, पीपरि, सेंधानमक के चूर्ण को उष्ण जल से देने पर घोड़े का उदर शूल शान्त हो जाता है ॥११-१२ ॥ सोंठ, अतीस, नागरमोथा, अनन्तमूल, कच्चे बेल का काढ़ा घोड़ों को पिलाने से उसका अतिसार ठीक हो जाता है । लता प्रियंगु और अनन्तमूल के साथ बकरी का दूध पकाकर उसमें पर्याप्त चीनी मिलाकर पिलाने से घोड़े की थकावट दूर हो जाती है ॥१३-१४३ ॥ घोड़े की वस्ति देनी हो तो बड़े पात्र ( द्रोणी ) में तैल रखकर उससे नली को युक्त कर वस्ति दे अथवा कोष्ठ में जानेवाली सिरा को वेध करे । उससे घोड़े को सुख होता है । अनार, त्रिफला, त्रिकटु और गुड़ को सम भाग में पिण्ड बनाकर देने से घोड़े की दुर्बलता दूर होती है । अडूसे के स्वरस या काढ़े को लता प्रियंगु, लोध्र और मधु के साथ देने से या पञ्चकोल से सिद्ध दुग्ध पिलाने से कासना ठीक हो जाता है ॥१५-१७३ ॥ पेट के सभी प्रकार के रोगों में पहले शोधन दे उसके पश्चात् अभ्यंग उपटन, स्नेह, नस्य और वर्ती लगावे । घोड़े के ज्वर होने पर दूध से ही उपचार करे ॥१८-१९ ॥ लोध्र, कंजे की जड़, बिजौरा नींबू, चित्रक, सोंठ, कूट, हींग, वच और रास्ना को पीसकर लेप करने से शोथ नष्ट हो जाता है । मजीठ, मुलहठी, मुनक्का, वनभाँटा और भटकैया, लाल चन्दन. , खीरे } का बीज और जड़, सिंघाड़ा तथा कसेरू को बकरी के दूध में पकाकर और उपवास रखे तो घोड़े के पेशाब से रक्त जाना बन्द हो जाता है ॥ २०-२२ ॥ मन्या, हनु और कवल लीलने के स्थान की सिरा का शोथ एवं गलग्रह १ छ. सिंहा गन्धकरी । २ क. ख. ङ. छ. कासना । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 910

अग्नि पुराण, पृष्ठ 910 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९ ०६ अग्निपुराणम् मन्याहनुनिगालस्थशिराशोथो गलग्रहः । गलग्रहगदः शोथः प्रायशो गलदेशके । कृष्णाहिङ्गुयुतैरेभिः कृत्वा नस्यं न सीदति । जिह्वास्तम्भे च लेपोऽयं गुडमूत्रयुतो हितः । क्षौद्रेण शोधनी पिण्डी सर्पिषा व्रणरोपणी । परिषेकक्रिया तेषां तैलेनाऽऽशु रुजापहा । शान्तिर्मत्स्यण्डिवृद्धाभ्यां पक्वभिन्ने व्रणक्रमः । प्रभूतसलिलक्वाथः सुखोष्णो व्रणशोधनः । देवदारुवचायुग्मरजनीरक्तचन्दनैः प्रक्षणे वस्तिनस्ये च योज्यं सर्वत्र लिङ्गिते । खदिरोदुम्बराश्वत्थकषायेण च साधनम् । गुडूच्या च कृतः कल्को हितो युक्तावलम्बिने क्षिप्रकारिणि दोषे च सद्योवेधनमिष्यते ।

गवां मूत्रेण पिष्टैश्च मर्दनं कण्डुनाशनम् ।

अभ्यङ्गः कटुतैलेन तत्र तेष्वेव शस्यते ॥२३ ॥

प्रत्यक्पुष्पी तथा वह्निः सैन्धवं सौरसो रसः ॥२४ ॥

निशे ज्योतिष्मती पाठा कुष्णा कुष्ठं वचा मधु ॥२५ ॥

तिलैर्यष्ट्या रजन्या च निम्बपत्रैश्च योजिता ॥२६ ॥

अभिघातेन खञ्जन्ति ये ह्यश्वास्तीव्रवेदनाः ॥२७ ॥

दोषो कोपाभिघाताभ्यां तलजे लिङ्गिते तथा ॥ २८ ॥

अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षमधूकवटबिल्वकैः ॥२९ ॥

शताह्वानागरं रास्नामञ्जिष्टः कुष्ठसैन्धवैः ॥ ३० ॥

। तैलं सिद्धं कषायेण गुडूच्याः पयसा सह ॥ ३१ ॥

रक्तस्त्रावो जलौकाभिर्नेत्रान्ते नेत्ररोगिणः ॥ ३२ ॥

धात्रीदुरालभातिक्ताप्रियंगुकुङ्कुमैः समैः ॥३३ ॥

। उत्पाते च शिले श्राव्ये शुष्कशोफे तथैव च ॥ ३४ ॥

गोशकृन्मञ्जिकाकुष्ठरजनीतिलसर्षपैः ॥३५ ॥

शीतो मधुयुतः क्वाथो नासिकायां सशर्करः ॥ ३६ ॥

में कडुवे तेल की मालिश ठीक होती है । गलग्रह का रोग प्राय: गले प्रदेश में शोथ कहा जाता है । चिचिडी ( अपामार्ग ), चित्रक, तुलसी के पत्ते का रस, सैन्धव, पीपरि और हींग मिलाकर नस्य देने से गलग्रह ठीक हो जाता है ॥२३-२४३ ॥ हरदी, दारुहरदी, मालकागुन, पाठा, पीपरि, कूट, वच और मधु में गुड़ और गोमूत्र मिलाकर उसका जिह्वास्तम्भ में लेप करना लाभकर होता है । तिल, मुलहठी, हरदी, नीम की पत्ती और मधु से बनायी हुई पिण्डी व्रण का शोधन एवं रोपण करनेवाली है । चोट लगने से जो घोड़े लँगड़ाते हैं और उनमें तीव्र वेदना होती है, उनकी तेल से सेंकाई करनी चाहिए जिससे पीड़ा शान्त हो जाती है ॥ २५-२७३ ॥ दोषों के कोप से या चोट लगने से पैर के नीचे फोड़ा हो जाय तो विधारा और चीनी को पकाकर बाँधे जब पककर फूट जाय तो व्रण के समान चिकित्सा करनी चाहिए । पीपरि, गूलर, पाकरि, मुलहठी, वट, बिल्व का अधिक जल में बनाया हुआ काढ़ा व्रण का शोधन करनेवाला है । सौंफ, सोंठ, रास्ना, मजीठ, कूट, सेंधानमक, देवदारु, वच ( कडुआ और मीठा ), हरदी एवं लाल चन्दन ( अर्थात् इन द्रव्यों का कल्क बनावे ) तथा गुरुचि का काढ़ा और दूध मिलाकर पकावे । इस प्रकार सिद्ध किया हुआ तेल फोड़े में, वस्ति में, नस्य में और पट्टी बाँधने में उपयुक्त होता है । नेत्र के रोगी को जोंक से नेत्र के अन्त में रक्तस्राव करावे । और खैर, गूलर और पीपरि के काढ़े से धोवे ॥२८-३२३ ॥ आँवला, घमासा, कुटकी, लता प्रियंगु, कुंकुम तथा गुरुचि का कल्क, अण्डकोष के लटकने, उसमें पीड़ा होने से उसमें पत्थर के समान कड़ा होने पर, या फोड़ा हो जाय तो उसका स्राव कराने में तथा अण्डकोष के सूख जाने पर लेप करने के लिए उत्तम होता है ॥३३-३४ ॥ दोष यदि शीघ्रकारी हो तो, उसका वेध कर देना चाहिए । गौ का गोबर, मजीठ, कूठ, हरदी, तिल तथा सर्षप को गोमूत्र से पीसकर मर्दन करने से घोड़े की खुजली शान्त हो जाती है । घोड़े के, रक्त, पित्त में काढ़े को दण्ड़ा करके उसमें मधु तथा शर्करा मिलाकर पिलाने से