देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 331–340
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340
पृष्ठ 331
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२२ विसर्गबिन्दुमात्रासु यदधिष्ठानमेव यदधिष्ठानमेव च तदधिष्ठात्री या देवी तस्यै नित्यै नमो नमः व्याख्यास्वरूपा सा देवी व्याख्याधिष्ठातृरूपिणी यया विना प्रसंख्यावान् संख्यां कर्तुं न शक्यते कालसंख्यास्वरूपा या तस्यै देव्यै नमो नमः भ्रमसिद्धान्तरूपा या तस्यै देव्यै नमो नमः स्मृतिशक्तिज्ञानशक्तिबुद्धिशक्तिस्वरूपिणी प्रतिभाकल्पनाशक्तिर्या च तस्यै नमो नमः सनत्कुमारो ब्रह्माणं ज्ञानं पप्रच्छ यत्र वै बभूव मूकवत्सोऽपि सिद्धान्तं कर्तुमक्षमः तदाजगाम भगवानात्मा श्रीकृष्ण ईश्वरः उवाच स तां स्तौहि वाणीमिष्टां प्रजापते । स च तुष्टाव तां ब्रह्मा चाज्ञया परमात्मनः
चकार तत्प्रसादेन तदा सिद्धान्तमुत्तमम् ।
यदाप्यनन्तं पप्रच्छ ज्ञानमेकं वसुन्धरा ॥
बभूव मूकवत्सोऽपि सिद्धान्तं कर्तुमक्षमः तदा तां स च तुष्टाव संत्रस्तः कश्यपाज्ञया
ततश्चकार सिद्धान्तं निर्मलं भ्रमभञ्जनम् ।
व्यासः पुराणसूत्रं च पप्रच्छ वाल्मिकिं यदा ॥
मौनीभूतश्च सस्मार तामेव जगदम्बिकाम् ।
तदा चकार सिद्धान्तं तद्वरेण मुनीश्वरः ॥
सम्प्राप्य निर्मलं ज्ञानं भ्रमान्धध्वंसदीपकम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५ ॥१० विसर्ग, बिन्दु तथा मात्रा - इन तीनोंमें जो अधिष्ठान - रूपसे विद्यमान हैं तथा जो उनकी अधिष्ठात्री । देवी हैं; उन नित्या देवीको बार - बार नमस्कार है । वे भगवती सरस्वती व्याख्यास्वरूपिणी तथा व्याख्याकी ॥ ११ अधिष्ठातृ भी हैं॥१०-११ ॥ जिनके बिना सुप्रसिद्ध गणक भी गणनाकार्य । नहीं कर सकते तथा जो साक्षात् कालसंख्यास्वरूपिणी ॥ १२ हैं; उन देवीको बार- बार नमस्कार है ॥ १२ ॥
जो भ्रमसिद्धान्तस्वरूपा हैं, उन देवीको । बार - बार नमस्कार है । जो स्मरणशक्ति, ज्ञानशक्ति, बुद्धिशक्ति, प्रतिभाशक्ति तथा कल्पनाशक्तिस्वरूपिणी ॥ १३ हैं; उन देवीको बार - बार नमस्कार है ॥ १३३ ॥
एक बार जब सनत्कुमारने ब्रह्माजीसे ब्रह्मज्ञानके । विषयमें पूछा था, उस समय ब्रह्मसिद्धान्तकी ॥ १४ व्याख्या करनेमें वे ब्रह्मा मूककी भाँति अक्षम हो गये थे । उसी समय स्वयं परमात्मा श्रीकृष्ण वहाँ आ । गये और उन्होंने कहा- हे प्रजापते! आप भगवती सरस्वतीको अपनी इष्ट देवी बनाकर उनकी स्तुति ॥ १५ कीजिये ॥ १४-१५३ ॥ परमात्मा श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर ब्रह्माजीने उन सरस्वतीकी स्तुति की । उसके बाद वे सरस्वतीकी ॥ १६ कृपासे उत्तम सिद्धान्तका विवेचन करनेमें सफल हो गये ॥ १६३ ॥
इसी तरह जब पृथ्वीने शेषनागसे ज्ञानका एक रहस्य पूछा था, तब वे शेष भी मूक- जैसे बन गये १७ और सिद्धान्तका विवेचन करनेमें असमर्थ रहे । तब अत्यन्त व्यथितहृदय शेषने कश्यपकी आज्ञाके अनुसार । उन सरस्वतीकी स्तुति की । तदनन्तर वे भ्रमका नाश ॥ १८ । करनेवाले उस पवित्र सिद्धान्तका विवेचन कर सके ॥ १७-१८३ ॥ ऐसे ही जब व्यासने वाल्मीकिसे पुराणसूत्र १ ९ पूछा, तब वे मौन हो गये और तब उन्होंने उन्हीं जगदम्बा सरस्वतीका स्मरण किया । तत्पश्चात् उनके वरसे भ्रमरूपी अन्धकारको मिटानेवाला ज्योतिसदृश निर्मल ज्ञान प्राप्त करके मुनीश्वर २० वाल्मीकि पुराण - सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेमें समर्थ हो सके ॥ १ ९ -२०३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –11 B
पृष्ठ 332
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ०५ ] नवम पुराणसूत्रं श्रुत्वा च व्यासः कृष्णकलोद्भवः ॥ २१
तां शिवां वेद दध्यौ च शतवर्षं च पुष्करे ।
तदा त्वत्तो वरं प्राप्य सत्कवीन्द्रो बभूव ह ॥ २२
तदा वेदविभागं च पुराणं च चकार सः ।
यदा महेन्द्रः पप्रच्छ तत्त्वज्ञानं सदाशिवम् ॥ २३
क्षणं तामेव सञ्चिन्त्य तस्मै ज्ञानं ददौ विभुः ।
पप्रच्छ शब्दशास्त्रं च महेन्द्रश्च बृहस्पतिम् ॥ २४
दिव्यं वर्षसहस्रं च स त्वां दध्यौ च पुष्करे ।
तदा त्वत्तो वरं प्राप्य दिव्यवर्षसहस्रकम् ॥ २५
उवाच शब्दशास्त्रं च तदर्थं च सुरेश्वरम् ।
अध्यापिताश्च ये शिष्या यैरधीतं मुनीश्वरैः ॥ २६
ते च तां परिसञ्चिन्त्य प्रवर्तन्ते सुरेश्वरीम् ।
त्वं संस्तुता पूजिता च मुनीन्द्रैर्मनुमानवैः ॥ २७
दैत्येन्द्रैश्च सुरैश्चापि ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः ।
जडीभूतः सहस्रास्यः पञ्चवक्त्रश्चतुर्मुखः ॥ २८
यां स्तोतुं किमहं स्तौमि तामेकास्येन मानवः ।
इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यश्च भक्तिनम्रात्मकन्धरः ॥ २ ९
प्रणनाम निराहारो रुरोद च मुहुर्मुहुः ।
ज्योतीरूपा महामाया तेन दृष्टाप्युवाच तम् ॥ ३०
सुकवीन्द्रो भवेत्युक्त्वा वैकुण्ठं च जगाम ह । 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –11 C स्कन्ध ३२३ भगवान् कृष्णके अंशसे उत्पन्न व्यासजीने उस पुराणसूत्रको सुनकर उन कल्याणमयी सरस्वतीको जाना और पुष्करक्षेत्रमें सौ वर्षोंतक उनकी उपासना की । [ हे माता! ] तत्पश्चात् आपसे वर प्राप्त करके वे श्रेष्ठ कवीन्द्र हुए और उसके बाद उन्होंने वेदोंका विभाजन तथा पुराणोंकी रचना की ॥ २१-२२३ ॥ जब इन्द्रने भगवान् शंकरसे तत्त्वज्ञानके सम्बन्धमें पूछा, तब क्षणभर उन सरस्वतीका ध्यान करके ही शिवजीने उन इन्द्रको ज्ञानोपदेश दिया ॥ २३३ ॥
[ हे माता! ] जब इन्द्रने शब्दशास्त्र के विषयमें बृहस्पतिसे पूछा था, तब उन्होंने पुष्करक्षेत्रमें दिव्य एक हजार वर्षोंतक आपकी आराधना की । तदुपरान्त आपसे वर प्राप्त करके वे एक हजार दिव्य वर्षोंतक देवपति इन्द्रको शब्दशास्त्रका उपदेश करते रहे । इसी तरह बृहस्पतिने जिन शिष्योंको पढ़ाया तथा अन्य जिन मुनीश्वरोंने उनसे अध्ययन किया, वे सब - के-सब उन भगवती सुरेश्वरीकी सम्यक् आराधना करके | ही सफल हुए हैं ॥ २४–२६३ ॥ मुनीश्वरों, मनुगणों, मनुष्यों, दैत्येश्वरों तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवताओंके द्वारा भी सम्यक् रूपसे आपकी स्तुति तथा पूजा की गयी है । हजार मुखवाले शेषनाग, पाँच मुखवाले शिव तथा चार मुखवाले ब्रह्मा भी जिनकी स्तुति करनेमें जड़वत् हो जाते हैं, तब मैं साधारण - सा मनुष्य एक मुखसे उन आपकी स्तुति कैसे कर सकता हूँ? ॥ २७- १-२८३ ॥ [ हे नारद! ] इस प्रकार स्तुति करके याज्ञवल्क्यमुनि भगवती सरस्वतीको प्रणाम करने लगे । उस समय | भक्तिभावसे उनका कन्धा झुक गया था, वे आहाररहित थे तथा बार - बार रो रहे थे ॥ २ ९ ३ ॥ इसी बीच ज्योतिस्वरूपिणी महामाया सरस्वतीने उन्हें दर्शन दिया और वे मुनिसे बोलीं- ' तुम महान् कवीन्द्र हो जाओ ' - ऐसा कहकर वे वैकुण्ठ चली गयीं ॥ ३०३ ॥
पृष्ठ 333
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२४ याज्ञवल्क्यकृतं वाणीस्तोत्रमेतत्तु यः स कवीन्द्रो महावाग्मी बृहस्पतिसमो महामूर्खश्च दुर्बुद्धिर्वर्षमेकं यदा श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ पठेत् ॥ ३१
भवेत् ।
पठेत् ॥ ३२
[ हे नारद! ] जो मनुष्य याज्ञवल्क्यके द्वारा रचित इस सरस्वतीस्तोत्रका पाठ करता है, वह कवीन्द्र तथा बृहस्पतिके समान महान् वक्ता हो जाता है । यदि कोई महान् मूर्ख तथा दुर्बुद्धि भी इस स्तोत्रका एक वर्षतक नियमपूर्वक पाठ करे, तो वह निश्चय ही पण्डित, मेधावी तथा श्रेष्ठ कवि
स पण्डितश्च मेधावी सुकवीन्द्रो भवेद् ध्रुवम् ॥ ३३ । हो जाता है ॥ ३१–३३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे याज्ञवल्क्यकृतं सरस्वतीस्तोत्रवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः लक्ष्मी, सरस्वती तथा गंगाका श्रीनारायण उवाच
सरस्वती तु वैकुण्ठे स्वयं नारायणान्तिके ।
गङ्गाशापेन कलहात्कलया भारते सरित् ॥
पुण्यदा पुण्यरूपा च पुण्यतीर्थस्वरूपिणी ।
पुण्यवद्भिर्निषेव्या च स्थितिः पुण्यवतां मुने ॥
तपस्विनां तपोरूपा तपसः फलरूपिणी ।
कृतपापेधमदाहाय ज्वलदग्निस्वरूपिणी ॥
ज्ञानात्सरस्वतीतोये मृता ये मानवा भुवि ।
तेषां स्थितिश्च वैकुण्ठे सुचिरं हरिसंसदि ॥
भारते कृतपापश्च स्नात्वा तत्र च लीलया ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके वसेच्चिरम् ॥
चातुर्मास्यां पौर्णमास्यामक्षयायां दिनक्षये । परस्पर शापवश भारतवर्षमें पधारना श्रीनारायण बोले- हे मुने! साक्षात् भगवान् विष्णुके पास वैकुण्ठमें रहनेवाली सरस्वती कलहके कारण गंगाजीके द्वारा दिये गये शापसे भारतवर्षमें १ अपनी एक कलासे नदीरूपमें प्रतिष्ठित हैं । ये सरस्वती पुण्यदायिनी, पुण्यरूपिणी, पुण्यतीर्थस्वरूपिणी तथा पुण्यवान् मनुष्योंकी आश्रय हैं, अतः पुण्यात्मा २ लोगोंको इनका सेवन करना चाहिये॥१-२ ॥ ये सरस्वती तपस्वियोंके लिये तपरूपिणी हैं और उनकी तपस्याका फल भी वे ही हैं । ये मनुष्यके द्वारा किये गये पापरूप ईंधनको दग्ध करनेके लिये ३ प्रज्वलित अग्निस्वरूपा हैं ॥३ ॥
सरस्वतीकी महिमाको जानते हुए जो मनुष्य इनके जलमें अपना प्राण त्याग करते हैं, वे वैकुण्ठमें ४ वास करते हुए दीर्घकालतक भगवान् श्रीहरिकी सन्निधि प्राप्त करते हैं ॥ ४ ॥
भारतमें रहनेवाला कोई मनुष्य पाप कर लेनेके बाद खेल - खेल में भी सरस्वतीमें स्नान कर लेनेमात्रसे ५ सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और दीर्घकालतक विष्णुलोक में निवास करता है ॥५ ॥
जो मनुष्य चातुर्मास्यमें, पूर्णिमा तिथिपर, अक्षय व्यतीपाते च ग्रहणेऽन्यस्मिन्पुण्यदिनेऽपि च ॥६ नवमीके दिन, क्षयतिथिको तथा व्यतीपात या ग्रहणके अवसर अथवा अन्य किसी भी पुण्य दिन किसी हेतुसे अनुषङ्गेण यः स्नातो हेतुना श्रद्धयापि वा । अथवा श्रद्धापूर्वक सरस्वतीमें स्नान करता है, वह निश्चय ही वैकुण्ठलोकमें भगवान् विष्णुका सारूप्य सारूप्यं लभते नूनं वैकुण्ठे स हरेरपि ॥ ७ प्राप्त कर लेता है ॥ ६-७ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –11 D
पृष्ठ 334
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ६ ]
सरस्वतीमनुं तत्र मासमेकं च यो जपेत् ।
महामूर्खः कवीन्द्रश्च स भवेन्नात्र संशयः ॥
नित्यं सरस्वतीतोये यः स्नायान्मुण्डयन्नरः ।
न गर्भवासं कुरुते पुनरेव स मानवः ॥
इत्येवं कथितं किञ्चिद्भारतीगुणकीर्तनम् ।
सुखदं कामदं सारं भूयः किं श्रोतुमिच्छसि ॥
सूत उवाच
नारायणवचः श्रुत्वा नारदो मुनिसत्तमः ।
पुनः पप्रच्छ सन्देहमिमं शौनक सत्वरम् ॥
नारद उवाच
कथं सरस्वती देवी गङ्गाशापेन भारते ।
कलया कलहेनैव बभूव पुण्यदा सरित् ॥
श्रवणे श्रुतिसाराणां वर्धते कौतुकं मम ।
कथामृतेन मे तृप्तिः केन श्रेयसि तृप्यते ॥
कथं शशाप सा गङ्गा पूजितां तां सरस्वतीम् ।
सा तु सत्त्वस्वरूपा या पुण्यदा शुभदा सदा ॥
तेजस्विनोर्द्वयोर्वादकारणं श्रुतिसुन्दरम् ।
सुदुर्लभं पुराणेषु तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
श्रीनारायण उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि कथामेतां पुरातनीम् । नवम स्कन्ध ३२५ जो मनुष्य एक महीनेतक प्रतिदिन सरस्वतीनदीके ८ तटपर इनके मन्त्रका जप करता है, वह महान् मूर्ख होते हुए भी कवीश्वर हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥८ ॥
जो मनुष्य मुण्डन कराकर प्रतिदिन सरस्वतीके ९ जलमें स्नान करता है, वह मनुष्य फिरसे माताके गर्भमें वास नहीं करता है ॥ ९ ॥
[ हे नारद! ] इस प्रकार मैंने सुख देनेवाले, १० मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा सारस्वरूप भगवती कीर्तनावर्णन आपसे कर दिया । अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥१० ॥
सूतजी बोले - हे शौनक! भगवान् नारायणकी ११ बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद अपनी इस शंकाके विषयमें पुनः शीघ्र उनसे पूछने लगे - ॥ ११ ॥
नारदजी बोले -- – ये भगवती सरस्वती कलहके कारण गंगाजीके शापसे भारतवर्षमें अपनी १२ कलासे पुण्यदायिनी नदीके रूपमें कैसे प्रकट हो गयीं? ॥१२ ॥
वेदोंके सारस्वरूप कथानकों को सुनने हेतु मेरा १३ कौतूहल बढ़ गया है, इस कथामृतको सुनकर ही मुझे तृप्ति होगी । अपने कल्याणके विषयमें कौन सन्तुष्ट होता है? ॥१३ ॥
१४ जो सर्वदा पुण्य तथा कल्याण प्रदान करनेवाली हैं, उन सत्त्वस्वरूपा गंगाने पूज्य सरस्वतीको शाप क्यों दे दिया? इन दोनों तेजस्विनी देवियोंके विवादका १५ कारण निश्चय ही कानोंके लिये सुखकर होगा । पुराणोंमें अत्यन्त दुर्लभ उस वृत्तान्तको आप मुझे बतलाइये ॥ १४-१५ ॥ श्रीनारायण बोले – हे नारद! मैं यह प्राचीन कथा कह रहा हूँ, जिसके सुननेमात्र से मनुष्य सभी यस्याः श्रवणमात्रेण सर्वपापात्प्रमुच्यते ॥ १६ पापोंसे मुक्त हो जाता है; आप इसे सुनिये ॥१६ ॥
लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा - ये तीनों ही विष्णुकी लक्ष्मीः सरस्वती गङ्गा तिस्रो भार्या हरेरपि । भार्याएँ हैं । ये बड़े प्रेमके साथ सर्वदा भगवान् प्रेम्णा समास्तास्तिष्ठन्ति सततं हरिसन्निधौ ॥ १७ विष्णुके समीप विराजमान रहती हैं ॥१७ ॥
एक बार गंगा कामातुर होकर मुसकराती चकार सैकदा गङ्गा विष्णोर्मुखनिरीक्षणम् । हुई कटाक्षपूर्वक भगवान् विष्णुका मुख निहार सस्मिता च सकामा च सकटाक्षं पुनः पुनः ॥ १८ । रही थीं ॥ १८ ॥
पृष्ठ 335
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२६ विभुर्जहास तद्वक्त्रं निरीक्ष्य च क्षणं तदा क्षमां चकार तद् दृष्ट्वा लक्ष्मीर्नैव सरस्वती बोधयामास पद्मा तां सत्त्वरूपा च सस्मिता क्रोधाविष्टा च सा वाणी न च शान्ता बभूव ह उवाच वाणी भर्तारं रक्तास्या रक्तलोचना कुपिता कामवेगेन शश्वत्प्रस्फुरिताधरा सरस्वत्युवाच सर्वत्र समताबुद्धिः सद्भर्तुः कामिनीं प्रति धर्मिष्ठस्य वरिष्ठस्य विपरीता खलस्य च ज्ञातं सौभाग्यमधिकं गङ्गायां ते गदाधर कमलायां च तत्तुल्यं न च किञ्चिन्मयि प्रभो गङ्गायाः पद्मया सार्धं प्रीतिश्चास्ति सुसम्मता क्षमां चकार तेनेदं विपरीतं हरिप्रिया किं जीवनेन मेऽत्रैव दुर्भगायाश्च साम्प्रतम् निष्फलं जीवनं तस्या या पत्युः प्रेमवञ्चिता त्वां सर्वे सत्त्वरूपं च ये वदन्ति मनीषिणः ते च मूर्खा न वेदज्ञा न जानन्ति मतिं तव
सरस्वतीवचः श्रुत्वा दृष्ट्वा तां कोपसंयुताम् ।
मनसा च समालोच्य स जगाम बहिः सभाम् ॥
गते नारायणे गङ्गामुवाच निर्भयं रुषा ।
वागधिष्ठातृदेवी सा वाक्यं श्रवणदुष्करम् ॥
हे निर्लज्जे हे सकामे स्वामिगर्वं करोषि किम् । अधिकं स्वामिसौभाग्यं विज्ञापयितुमिच्छसि श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ । तब भगवान् विष्णु क्षणभर उनके मुखकी ओर ॥ १ ९ देखकर मुसकराने लगे । उसे देखकर लक्ष्मीने तो सहन कर लिया, किंतु सरस्वतीने नहीं ॥ १ ९ ॥ । उदारताकी मूर्ति लक्ष्मीने हँसकर उन सरस्वतीको समझाया, किंतु अत्यन्त कोपाविष्ट वे सरस्वती शान्त ॥ २० नहीं हुईं ॥ २० ॥
उस समय लाल नेत्रों तथा मुखमण्डलवाली । और कुपित तथा कामवेगके कारण निरन्तर काँपते ॥ २१ हुए ओठोंवाली सरस्वती अपने पति भगवान् विष्णुसे कहने लगीं ॥ २१ ॥
सरस्वती बोलीं- एक धर्मनिष्ठ, श्रेष्ठ तथा । उत्तम पतिकी बुद्धि अपनी सभी पत्नियोंके प्रति समान हुआ करती है, किंतु दुष्ट पतिकी बुद्धि इसके विपरीत ॥ २२ होती है ॥ २२ ॥
हे गदाधर! मुझे ज्ञात हो गया कि गंगापर । आपका अधिक प्रेम रहता है और लक्ष्मीपर भी ॥ २३ उसीके समान प्रेम रहता है । किंतु हे प्रभो! मुझपर आपका थोड़ा भी प्रेम नहीं है ॥ २३ ॥
। गंगा और लक्ष्मीके साथ आपकी प्रीति समान ॥ २४ है, इसीलिये [ गंगाके ] इस विपरीत व्यवहारको भी लक्ष्मीने क्षमा कर दिया ॥ २४ ॥
। अब यहाँपर मुझ अभागिनीके जीवित रहनेसे क्या लाभ? क्योंकि जो स्त्री अपने पतिके प्रेमसे ॥ २५ वंचित है, उसका जीवन व्यर्थ है ॥२५ ॥
जो विद्वान् लोग आपको सात्त्विक स्वरूपवाला । कहते हैं, वे सब वेदज्ञ नहीं हैं अपितु मूर्ख हैं; वे ॥ २६ आपकी बुद्धिको नहीं जानते हैं ॥२६ ॥
सरस्वतीकी यह बात सुनकर और उन्हें कोपाविष्ट देखकर भगवान्ने मन - ही - मन कुछ सोचा और इसके २७ बाद वे वहाँसे बाहर निकलकर सभामें चले गये ॥ २७ ॥
भगवान् नारायणके चले जानेपर वाणीकी अधिष्ठातृ देवी उन सरस्वतीने कुपित होकर निर्भीकतापूर्वक गंगासे सुननेमें अत्यन्त कटु वचन २८ कहा- ॥ २८ ॥
हे निर्लज्ज! हे सकाम! तुम अपने पतिपर इतना गर्व क्यों कर रही हो? ' मेरे ऊपर पतिका अधिक प्रेम । २ ९ । रहता है ' - ऐसा तुम प्रदर्शित करना चाहती हो ॥ २ ९ ॥
पृष्ठ 336
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ६ ] नवम स्कन्ध ३२७
मानचूर्णं करिष्यामि तवाद्य हरिसन्निधौ ।
किं करिष्यति ते कान्तो ममैवं कान्तवल्लभे ॥
इत्येवमुक्त्वा गङ्गायाः केशं ग्रहीतुमुद्यता ।
वारयामास तां पद्मा मध्यदेशं समाश्रिता ॥
शशाप वाणी तां पद्मां महाबलवती सती ।
वृक्षरूपा सरिद्रूपा भविष्यसि न संशयः ॥
विपरीतं ततो दृष्ट्वा किञ्चिन्नो वक्तुमर्हसि ।
सन्तिष्ठति सभामध्ये यथा वृक्षो यथा सरित् ॥
शापं श्रुत्वा तु सा देवी न शशाप चुकोप ह ।
तत्रैव दुःखिता तस्थौ वाणीं धृत्वा करेण च ॥
असन्तुष्टां तु तां दृष्ट्वा कोपप्रस्फुरिताधराम् ।
उवाच गङ्गा तां देवीं पद्मां चारक्तलोचनाम् ॥
गङ्गोवाच
त्वमुत्सृज महोग्रां च पद्मे किं मे करिष्यति ।
दुःशीला मुखरा नष्टा नित्यं वाचालरूपिणी ॥
वागधिष्ठात्री देवीयं सततं कलहप्रिया ।
यावती योग्यता चास्या यावती शक्तिरेव च ॥
तथा करोतु वादं च मया सार्धं च दुर्मुखी ।
स्वबलं यन्मम बलं विज्ञापयितुमिच्छति ॥
जानन्तु सर्वे ह्युभयोः प्रभावं विक्रमं सति ।
इत्येवमुक्त्वा सा देवी वाण्यै शापं ददाविति ॥
सरित्स्वरूपा भवतु सा या त्वां च शशाप ह ।
अधोमर्त्यं सा प्रयातु सन्ति यत्रैव पापिनः ॥
कलौ तेषां च पापानि ग्रहीष्यति न संशयः । हे कान्तवल्लभे! आज मैं भगवान् विष्णुके ३० सामने ही तुम्हारा अभिमान चूर्ण कर दूँगी; तुम्हारा वह पति मेरा क्या कर लेगा? ॥ ३० ॥
ऐसा कहकर वे गंगाके बाल खींचनेके लिये ३१ उद्यत हुईं; तब लक्ष्मीने दोनोंके बीचमें आकर उन सरस्वतीको ऐसा करनेसे रोक दिया ॥ ३१ ॥
इससे महान् बलवती तथा सतीत्वमयी सरस्वतीने उन लक्ष्मीको शाप दे दिया कि तुम ३२ नदी और वृक्षके रूपवाली हो जाओगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ३२ ॥
गंगाका विपरीत आचरण देखकर भी तुमने कुछ ३३ | नहीं कहा और सभा बीचमें वृक्ष तथा नदीकी भाँति तुम जड़वत् बन गयी थी; इसलिये तुम वही हो जाओ ॥ ३३ ॥
३४ यह शाप सुनकर भी लक्ष्मीने न तो शाप दिया और न क्रोध ही किया । वे सरस्वतीका हाथ पकड़कर दुःखित हो वहीं पर बैठी रह गयीं ॥ ३४ ॥
३५ कोपके कारण काँपते हुए ओठों तथा लाल नेत्रोंवाली और अत्यन्त असन्तुष्ट उस सरस्वतीको देखकर गंगा लक्ष्मीसे कहने लगीं ॥ ३५ ॥
गंगा बोलीं- हे पद्मे! तुम अत्यन्त उग्र स्वभाववाली इस सरस्वतीको छोड़ दो । यह शीलरहित, ३६ मुखर, विनाशिनी तथा नित्य वाचाल रहनेवाली सरस्वती मेरा क्या कर लेगी ॥ ३६ ॥
वाणीकी अधिष्ठात्री देवी यह सरस्वती सर्वदा ३७ कलहप्रिय है । इसमें जितनी योग्यता तथा शक्ति हो, वह सब लगाकर यह आज मेरे साथ विवाद कर ले । यह दुर्मुखी अपने तथा मेरे बलका प्रदर्शन करना ३८ चाहती है तो सभी लोग आज दोनोंके प्रभाव तथा पराक्रमको जान लें ॥ ३७-३८३ ॥ ऐसा कहकर गंगाने सरस्वतीको शाप दे दिया । [ और उन्होंने लक्ष्मीसे कहा- ] जिस सरस्वतीने ३ ९ तुम्हें शाप दिया है, वह भी नदीरूप हो जाय । यह नीचे मृत्युलोकमें चली जाय, जहाँ पापीलोग निवास करते हैं । [ वहाँ ] यह कलियुगमें उन ४० पापियोंके पाप ग्रहण करेगी; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ९ -४०६ ॥
पृष्ठ 337
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ इत्येवं वचनं श्रुत्वा तां शशाप सरस्वती ॥४१ गंगाकी यह बात सुनकर सरस्वतीने भी उसे शाप दे दिया कि तुम्हें भी धरातलपर जाना होगा और वहाँ त्वमेव यास्यसि महीं पापिपापं लभिष्यसि । पापियोंके पापको अंगीकार करना होगा ॥ ४११/२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र भगवानाजगाम ह ॥ ४२ इसी बीच चार भुजाओंवाले भगवान् विष्णु चार चतुर्भुजश्चतुर्भिश्च पार्षदैश्च चतुर्भुजैः सरस्वतीं करे धृत्वा वासयामास वक्षसि बोधयामास सर्वज्ञः सर्वज्ञानं पुरातनम् । श्रुत्वा रहस्यं तासां च शापस्य कलहस्य च उवाच दुःखितास्ताश्च वाचं सामयिकीं विभुः । श्रीभगवानुवाच लक्ष्मि त्वं कलया गच्छ धर्मध्वजगृहं शुभे अयोनिसम्भवा भूमौ तस्य कन्या भविष्यसि तत्रैव दैवदोषेण वृक्षत्वं च लभिष्यसि ॥ मदंशस्यासुरस्यैव शङ्खचूडस्य कामिनी । भूत्वा पश्चाच्च मत्पत्नी भविष्यसि न संशयः
त्रैलोक्यपावनी नाम्ना तुलसीति च भारते ।
कलया च सरिद्भावं शीघ्रं गच्छ वरानने ॥
भारतं भारतीशापान्नाम्ना पद्मावती भव ।
गङ्गे यास्यसि पश्चात्त्वमंशेन विश्वपावनी ॥
भारतं भारतीशापात्पापदाहाय पापिनाम् ।
भगीरथस्य तपसा तेन नीता सुकल्पिते ॥
नाम्ना भागीरथी पूता भविष्यसि महीतले ।
मदंशस्य समुद्रस्य जाया जायेर्ममाज्ञया ॥
मत्कलांशस्य भूपस्य शन्तनोश्च सुरेश्वरि ।
गङ्गाशापेन कलया भारतं गच्छ भारति ॥
भुजाओंवाले अपने चारों पार्षदोंके साथ वहाँ आ । गये ॥४२३ ॥
॥ ४३ सर्वज्ञ श्रीहरिने सरस्वतीका हाथ पकड़कर प्रेमपूर्वक उन्हें अपने वक्षसे लगा लिया और उन्हें शाश्वत तथा सर्वोत्कृष्ट ज्ञान प्रदान किया । ॥ ४४ उनके कलह तथा शापकी बात सुनकर प्रभु श्रीहरि उन दुःखित स्त्रियोंसे समयानुकूल बात कहने लगे॥४३-४४३ ॥ श्रीभगवान् बोले - हे लक्ष्मि! हे शुभे! तुम अपने अंशसे पृथ्वीपर राजा धर्मध्वजके घर जाओ । ॥ ४५ तुम अयोनिजके रूपमें उनकी कन्या होकर प्रकट होओगी । वहीं पर तुम दुर्भाग्यसे वृक्ष बन जाओगी ॥ मेरे ही अंशसे उत्पन्न शंखचूड नामक असुरकी ४६ भार्या होनेके बाद ही पुनः तुम मेरी पत्नी बनोगी; इसमें सन्देह नहीं है । उस समय तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली तुलसीके नामसे भारतवर्षमें तुम ॥ ४७ प्रसिद्ध होओगी । हे वरानने! अब तुम सरस्वतीके शापसे अपने अंशसे नदीरूपमें प्रकट होकर भारतवर्ष में शीघ्र जाओ और वहाँ ' पद्मावती ' नामसे प्रतिष्ठित ४८ होओ ॥ ४५ - ४८३ ॥ [ तत्पश्चात् उन्होंने गंगासे कहा - ] हे गंगे! लक्ष्मीके पश्चात् तुम भी सरस्वतीके शापवश पापियोंका ४ ९ पाप भस्म करनेके लिये अपने ही अंशसे विश्वपावनी नदी बनकर भारतवर्षमें जाओ । हे सुकल्पिते! राजा भगीरथकी तपस्यासे उनके द्वारा धरातलपर ले जायी गयी तुम पवित्र ' भागीरथी ' नामसे प्रसिद्ध होओगी । ५० हे सुरेश्वरि! मेरी आज्ञाके अनुसार तुम मेरे ही अंशसे उत्पन्न समुद्रकी पत्नी और मेरी कलाके अंशसे उत्पन्न राजा शन्तनुकी भी पत्नी होना स्वीकार कर ५१ लेना ॥ ४ ९ –५१३ ॥ [ तदनन्तर उन्होंने सरस्वतीसे कहा- ] हे भारति! गंगाके शापको स्वीकार करके तुम अपनी कलासे ५२ | भारतवर्षमें जाओ और दोनों सपत्नियों ( गंगा तथा
पृष्ठ 338
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ६ ] कलहस्य फलं भुंक्ष्व सपत्नीभ्यां सहाच्युते स्वयं च ब्रह्मसदने ब्रह्मणः कामिनी भव गङ्गा यातु शिवस्थानमत्र पद्यैव तिष्ठतु शान्ता च क्रोधरहिता मद्भक्ता सत्त्वरूपिणी महासाध्वी महाभागा सुशीला धर्मचारिणी यदंशकलया सर्वा धर्मिष्ठाश्च पतिव्रताः शान्तरूपाः सुशीलाश्च प्रतिविश्वेषु पूजिताः तिस्स्रो भार्यास्त्रिशीलाश्च त्रयो भृत्याश्च बान्धवाः ध्रुवं वेदविरुद्धाश्च न ह्येते मङ्गलप्रदाः स्त्रीपुंवच्च गृहे येषां गृहिणां स्त्रीवशः पुमान् निष्फलं च जन्म तेषामशुभं च पदे पदे । मुखे दुष्टा योनिदुष्टा यस्य स्त्री कलहप्रिया अरण्यं तेन गन्तव्यं महारण्यं गृहाद्वरम् जलानां च स्थलानां च फलानां प्राप्तिरेव च सततं सुलभा तत्र न तेषां गृह एव च वरमग्नौ स्थितिर्हिंस्रजन्तूनां सन्निधौ सुखम् ततोऽपि दुःखं पुंसां च दुष्टस्त्रीसन्निधौ ध्रुवम् । व्याधिज्वाला विषज्वाला वरं पुंसां वरानने दुष्टस्त्रीणां मुखज्वाला मरणादतिरिच्यते पुंसां च स्त्रीजितां चैव भस्मान्तं शौचमध्रुवम् नवम स्कन्ध ३२ ९ । लक्ष्मी ) - के साथ कलह करनेका फल भोगो । साथ ॥ ५३ ही हे अच्युते! अपने पूर्ण अंशसे ब्रह्मसदनमें ब्रह्माकी भार्या बन जाओ ॥ ५२-५३ ॥ गंगाजी शिवके स्थानपर चली जायँ । यहाँपर । केवल शान्त स्वभाववाली, क्रोधरहित, मेरी भक्त, ॥५४ सत्त्वस्वरूपा, महान् साध्वी, अत्यन्त सौभाग्यवती, सुशील तथा धर्मका आचरण करनेवाली लक्ष्मी ही विराजमान रहें । जिनके एक अंशकी कलासे समस्त । लोकोंमें सभी स्त्रियाँ धर्मनिष्ठ, पतिव्रता, शान्तरूपा ॥ ५५ तथा सुशील बनकर पूजित होती हैं ॥ ५४-५५३ ॥ [ भगवान् बोले ] विभिन्न स्वभाववाली तीन स्त्रियाँ, तीन नौकर तथा तीन बान्धवोंका एकत्र । रहना वेदविरुद्ध है । अतः ये मंगलदायक नहीं हो ॥ ५६ | सकते ॥ ५६३ ॥
जिन गृहस्थोंके घरमें स्त्री पुरुषकी भाँति व्यवहार करे और पुरुष स्त्रीके अधीन रहे, उनका जन्म । निष्फल हो जाता है और पग - पगपर उनका अमंगल ॥ ५७ होता है ॥५७३ ॥
जिसकी स्त्री मुखदुष्टा ( कुवचन बोलनेवाली ), योनिदुष्टा ( व्यभिचारमें लिप्त रहनेवाली ) तथा कलहप्रिया है, उस व्यक्तिको जंगलमें चले जाना चाहिये; क्योंकि ॥ ५८ उसके लिये बड़े - से - बड़ा जंगल भी घरसे बढ़कर श्रेयस्कर होता है; क्योंकि वहाँ उसे जल, स्थल और । फल आदिकी निरन्तर प्राप्ति होती रहती है, किंतु ॥ ५ ९ घरपर ये सब नहीं मिल पाते ॥ ५८-५९ ३ ॥ अग्निके पास रहना ठीक है अथवा हिंसक जन्तुओंके निकट रहनेपर भी सुख मिल सकता है, । किंतु दुष्ट स्त्रीके सान्निध्य में रहनेवाले पुरुषोंको ॥ ६० अवश्य ही उससे भी अधिक दुःख भोगना पड़ता है ॥ ६०३ ॥
हे वरानने! व्याधिज्वाला तथा विषज्वाला तो पुरुषोंके लिये ठीक हैं, किंतु दुष्ट स्त्रियोंके ॥ ६१ मुखकी ज्वाला मृत्युसे भी बढ़कर कष्टकारक होती है ॥ ६१३ ॥
स्त्रीके वशमें रहनेवाले पुरुषोंकी शुद्धि शरीरके । भस्म हो जानेपर भी निश्चित ही नहीं होती । ऐसा ॥ ६२ व्यक्ति दिनमें जो पुण्यकर्म करता है, उसके फलका
पृष्ठ 339
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
यदह्नि कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ।
निन्दितोऽत्र परत्रैव सर्वत्र नरकं व्रजेत् ॥ ६३
यशः कीर्तिविहीनो यो जीवन्नपि मृतो हि सः ।
बह्वीनां च सपत्नीनां नैकत्र श्रेयसे स्थितिः ॥ ६४
एकभार्यः सुखी नैव बहुभार्यः कदाचन ।
गच्छ गङ्गे शिवस्थानं ब्रह्मस्थानं सरस्वति ॥ ६५
अत्र तिष्ठतु मद्गेहे सुशीला कमलालया ।
सुसाध्या यस्य पत्नी च सुशीला च पतिव्रता ॥ ६६
इह स्वर्गे सुखं तस्य धर्मो मोक्षः परत्र च ।
पतिव्रता यस्य पत्नी स च मुक्तः शुचिः सुखी ।
जीवन्मृतोऽशुचिर्दुःखी दुःशीलापतिरेव च ॥ ६७
भागी नहीं होता है । वह इस लोक तथा परलोकमें सर्वत्र निन्दित होता है और नरक प्राप्त करता है । जो यश और कीर्तिसे रहित है, वह जीते हुए भी मृतकके समान है॥६२-६३३ ॥ किसी पुरुषकी बहुत - सी पत्नियोंका एक साथ । रहना कल्याणप्रद नहीं है । एक भार्यावाला तो सुखी है ही नहीं, फिर अनेक भार्याओंवाला कैसे सुखी रह सकता है? ॥६४३ ॥
हे गंगे! तुम शिवके स्थानपर जाओ और हे सरस्वति! तुम ब्रह्माके स्थानपर जाओ । यहाँ मेरे भवनमें उत्तम स्वभाववाली लक्ष्मी ही रहें ॥ ६५३ ॥
जिस पुरुषकी पत्नी सहजरूपसे अनुकूल हो जानेवाली, उत्तम स्वभाववाली तथा पतिव्रता होती है, उसे इस लोकमें तथा स्वर्गमें सुख तथा धर्म प्राप्त होते हैं और परलोकमें मोक्ष - पद प्राप्त होता है । जिसकी पत्नी पतिव्रता होती है, वह मुक्त, पवित्र तथा सुखी है । इसके विपरीत दुराचारिणी स्त्रीका पति जीते - जी मृतकके समान, अपवित्र तथा | दुःखी है ॥ ६६-६७ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे लक्ष्मीगङ्गासरस्वतीनां भूलोकेऽवतरणवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः भगवान् नारायणका गंगा, लक्ष्मी और सरस्वतीसे उनके शापकी अवधि बताना तथा अपने भक्तोंके महत्त्वका वर्णन करना श्रीनारायण उवाच
इत्युक्त्वा जगतां नाथो विरराम च नारद ।
अतीव रुरुदुर्देव्यः समालिङ्ग्य परस्परम् ॥ १
ताश्च सर्वाः समालोक्य क्रमेणोचुस्तदेश्वरम् ।
कम्पिताः साश्रुनेत्राश्च शोकेन च भयेन च ॥२
सरस्वत्युवाच
विशापं देहि हे नाथ दुष्टमाजन्मशोचनम् ।
सत्स्वामिना परित्यक्ताः कुतो जीवन्ति ताः स्त्रियः ॥ ३ ।
श्रीनारायण बोले- हे नारद! ऐसा कहकर जगत्के स्वामी भगवान् विष्णु चुप हो गये । तब वे तीनों देवियाँ एक - दूसरेका आलिंगन करके बहुत रोने लगीं ॥१ ॥
भगवान्की ओर देखकर भय तथा शोकसे काँपती हुई वे सभी देवियाँ अश्रुपूरित नेत्रोंसे उनसे बारी - बारीसे कहने लगीं ॥ २ ॥
सरस्वती बोलीं – हे नाथ! मुझे जीवनभर सन्ताप देनेवाला कोई भी कठोर शाप दे दें ( किंतु मेरा त्याग न करें ); क्योंकि श्रेष्ठ स्वामीके द्वारा परित्यक्त वे स्त्रियाँ कैसे जीवित रह सकती हैं । भारतवर्षमें जाकर
पृष्ठ 340
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ७ ] नवम
देहत्यागं करिष्यामि योगेन भारते ध्रुवम् ।
अत्युन्नतो हि नियतं पातुमर्हति निश्चितम् ॥ ४
गङ्गोवाच
अहं केनापराधेन त्वया त्यक्ता जगत्पते ।
देहत्यागं करिष्यामि निर्दोषाया वधं लभ ॥ ५
निर्दोषकामिनीत्यागं करोति यो नरो भुवि ।
स याति नरकं घोरं किन्तु सर्वेश्वरोऽपि वा ॥ ६
पद्मोवाच
नाथ सत्त्वस्वरूपस्त्वं कोपः कथमहो तव ।
प्रसादं कुरु भार्ये द्वे सदीशस्य क्षमा वरा ॥ ७
भारते भारतीशापाद्यास्यामि कलया ह्यहम् ।
कियत्कालं स्थितिस्तत्र कदा द्रक्ष्यामि ते पदम् ॥ ८
दास्यन्ति पापिनः पापं सद्यः स्नानावगाहनात् ।
केन तेन विमुक्ताहमागमिष्यामि ते पदम् ॥ ९
कलया तुलसीरूपं धर्मध्वजसुता सती । भुक्त्वा कदा लभिष्यामि त्वत्पादाम्बुजमच्युत । १०
वृक्षरूपा भविष्यामि त्वदधिष्ठातृदेवता ।
समुद्धरिष्यसि कदा तन्मे ब्रूहि कृपानिधे ॥ ११
गङ्गा सरस्वतीशापाद्यदि यास्यति भारते ।
शापेन मुक्ता पापाच्च कदा त्वां च लभिष्यति ॥ १२
गङ्गाशापेन वा वाणी यदि यास्यति भारतम् ।
कदा शापाद्विनिर्मुच्य लभिष्यति पदं तव ॥ १३
तां वाणीं ब्रह्मसदनं गङ्गां वा शिवमन्दिरम् ।
गन्तुं वदसि हे नाथ तत्क्षमस्व च ते वचः ॥ १४
स्कन्ध ३३१ मैं निश्चय ही योगके द्वारा देह त्याग कर दूँगी । | जिसकी भी अत्यधिक उन्नति होती है, उसका अधोपतन भी अवश्यम्भावी है ॥ ३-४ ॥ गंगा बोली- हे जगत्पते! आपने मेरे किस अपराधके कारण मेरा त्याग कर दिया । मैं तो अपने देहको त्याग दूँगी और इस प्रकार आपको एक निरपराध स्त्रीके वधका पाप लगेगा । जो मनुष्य इस पृथ्वीपर निर्दोष पत्नीका परित्याग कर देता है, वह घोर नरककी यात्रा करता है, चाहे वह सर्वेश्वर ही क्यों न हो ॥ ५-६ ॥ पद्मा बोलीं- हे नाथ! आप तो सत्त्वस्वरूप हैं । अहो, आपको ऐसा कोप कैसे हो गया! आप अपनी इन दोनों पत्नियोंको प्रसन्न कीजिये, क्योंकि एक उत्तम पतिके लिये क्षमा ही श्रेष्ठ है ॥७ ॥
मैं सरस्वतीका शाप स्वीकार करके अपनी एक कलासे भारतवर्षमें जाऊँगी, किंतु मैं वहाँ कितने समयतक रहूँगी और आपके चरणोंका दर्शन कब कर पाऊँगी? ॥ ८ ॥
पापीजन स्नान तथा अवगाहन करके शीघ्र ही अपना पाप मुझे दे देंगे । तब किस उपायके द्वारा उस पापसे मुक्त होकर आपके चरणों में मैं पुनः स्थान पाऊँगी? ॥ ९ ॥
हे अच्युत! अपनी एक कलासे धर्मध्वजकी साध्वी पुत्री होकर तुलसीरूप प्राप्त करके मैं आपके चरणकमल पुन: कब प्राप्त कर सकूँगी? ॥ १० ॥
आप जिसके अधिष्ठातृदेवता हैं, ऐसे वृक्षरूप तुलसीके रूपमें मैं प्रकट होऊँगी । किंतु हे कृपानिधान! आप मुझे यह बता दीजिये कि मेरा उद्धार कब करेंगे? ॥ ११ ॥
यदि गंगा सरस्वतीके शापसे भारतमें जायँगी, तब पुन: कब शाप तथा पापसे मुक्त होकर ये आपको प्राप्त करेंगी? ॥ १२ ॥
साथ ही, गंगाके शापसे ये सरस्वती भी यदि भारतमें जायँगी, तब पुन: कब शापसे मुक्त होकर ये आपके चरणोंका सांनिध्य प्राप्त कर सकेंगी?॥ १३ ॥
हे नाथ! आप जो उन सरस्वतीको ब्रह्माके तथा गंगाको शिवके भवन जानेके लिये कह रहे हैं, तो मैं । आपके इन वचनोंके लिये आपसे क्षमा चाहती हूँ ॥ १४ ॥