वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 1–10
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्या नमः ॥ 75 महर्षि वाल्मीकिप्रणीत श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण [ सचित्र, हिंदी - अनुवादसहित ] ( प्रथम खण्ड ) गीताप्रेस गोरखपुर गीताप्रेस, गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR
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75 75 ॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥ महर्षिवाल्मीकिप्रणीत श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण सचित्र, हिंदी - अनुवादसहित [ प्रथम खण्ड ] ( बालकाण्डसे किष्किन्धाकाण्डतक ) त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं. मम देवदेव ॥ गीताप्रेस, गोरखपुर 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_1_1_Front
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कारण TUTS प्रतिगी -किडी क ) सं ० २०७१ छियालीसवाँ पुनर्मुद्रण ५,५०० कुल मुद्रण ३,१ ९, ३०० मूल्य - I २२५ ( दो सौ पचीस रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक— गीताप्रेस, गोरखपुर - २७३००५ ( गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स: ( ०५५१ ) २३३६ ९९ ७ e - mail: booksales@gitapress.org website: www.gitapress.org 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_1_1_Back
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॥ श्रीहरिः ॥ नम्र निवेदन
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥
रामं रामानुजं सीतां भरतं भरतानुजम् ।
सुग्रीवं वायुसूनुं च प्रणमामि पुनः पुनः ॥
वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे ।
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद् रामायणात्मना ॥
वेद जिस परमतत्त्वका वर्णन करते हैं, वही श्रीमन्नारायण - तत्त्व श्रीमद्रामायणमें श्रीरामरूपसे निरूपित है । वेदवेद्य परमपुरुषोत्तमके दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण होनेपर साक्षात् वेद ही श्रीवाल्मीकिके मुखसे श्रीरामायणरूपमें प्रकट हुए, ऐसी आस्तिकोंकी चिरकालसे मान्यता है । इसलिये श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणकी वेदतुल्य ही प्रतिष्ठा है । यों भी महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं, अतः विश्वके समस्त कवियोंके गुरु हैं । उनका ' आदिकाव्य ' श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण भूतलका प्रथम काव्य है । वह सभीके लिये पूज्य वस्तु है । भारतके लिये तो वह परम गौरवकी वस्तु है और देशकी सच्ची बहुमूल्य राष्ट्रीय निधि है । इस नाते भी वह सबके लिये संग्रह, पठन, मनन एवं श्रवण करनेकी वस्तु है । इसका एक - एक अक्षर महापातकका नाश करनेवाला है— एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् । यह समस्त काव्योंका बीज है— ' काव्यबीजं सनातनम् । ' ( बृहद्धर्म ० १ । ३० । ४७ ) श्रीव्यासदेवादि सभी कवियोंने इसीका अध्ययन कर पुराण, महाभारतादिका निर्माण किया । ' ' बृहद्धर्मपुराण ' में यह बात विस्तारसे प्रतिपादित है । श्रीव्यासजीने अनेक । पुराणोंमें रामायणका माहात्म्य गाया है । स्कन्दपुराणका रामायणमाहात्म्य तो इस ग्रन्थके आरम्भमें दिया ही है, कई छिटपुट माहात्म्य अलग भी हैं । यह भी प्रसिद्ध है कि व्यासजीने युधिष्ठिरके अनुरोधसे एक व्याख्या वाल्मीकिरामायणपर लिखी थी और उसकी एक हस्तलिखित प्रति अब भी प्राप्य है । इसका नाम ' रामायणतात्पर्यदीपिका ' है । इसका उल्लेख दीवानबहादुर रामशास्त्रीने अपनी पुस्तक ' स्टडीज इन रामायण ' के द्वितीय खण्डमें किया है । यह पुस्तक १ ९ ४४ ई ० में बड़ौदासे प्रकाशित है । द्रोणपर्वके १४३ । ६६-६७
श्लोकोंमें महर्षि वाल्मीकिके युद्धकाण्डके ८१ । २८ को
नामोल्लेखपूर्वक श्लोक हवाला दिया गया है । रे
' अग्निपुराण ' के ५ से १३ तकके अध्यायोंमें ' वाल्मीकि'के नामोल्लेखपूर्वक रामायणसारका वर्णन है । गरुडपुराण, पूर्वखण्डके १४३ वें अध्यायमें भी ठीक इन्हीं श्लोकोंमें रामायणसार कथन है । इसी प्रकार हरिवंश ( विष्णुपर्व ९ ३ १६ – ३३ ) में भी यदुवंशियोंद्वारा वाल्मीकिरामायणके नाटक खेलनेका उल्लेख है— रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् । श्रीव्यासदेवजीने वाल्मीकिकी जीवनी भी बड़ी श्रद्धासे ' स्कन्दपुराण ' वैष्णवखण्ड, वैशाखमाहात्म्य १७ से २० अध्यायोंतक ( ' कल्याण ' सं ० स्कन्दपुराणाङ्क पृ ० ३७४ से ३८१ तक ), आवन्त्यखण्ड अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्यके २४ वें अध्यायमें ( ' कल्याण ' संक्षिप्त स्कन्दपुराणाङ्क पृ ० ७०८ - ९ ), प्रभासखण्डके २७८ वें अध्यायमें ( सं ० स्कन्दपुराणाङ्क पृ ० १०२५ – २७ ) तथा अध्यात्मरामायणके । अयोध्याकाण्डमें ( ६ । ६४ - ९ २ ) वर्णन किया है । १. ( क ) पठ रामायणं व्यास काव्यबीजं सनातनम् । यत्र रामचरित्रं स्यात् तदहं तत्र शक्तिमान् ॥ ( बृहद्धर्मपुराण, प्रथमखण्ड ३० । ४७, ५१ ) ( ख ) रामायणं पाठितं मे प्रसन्नोऽस्मि कृतस्त्वया । करिष्यामि पुराणानि महाभारतमेव च ॥ ( बृहद्धर्मपुराण १ । ३० । ५५ ) 2. A curious Ms. is that of ' RImIyaIatItparyadIpika which is said to have been an exposition of the meaning of the RImIyaIa ' by Vyasa at the request of Yudhisthira. ( ' Studies in RImIyana ', ' Riddles of RImIyana ' By K. S. RImaIIstrI, Book II, P. I. ) ३. यह श्लोक इस प्रकार है-अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । न हन्तव्याः स्त्रियश्चेति यद् ब्रवीषि प्लवङ्गम ।.......... पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव तत् ॥ ( महा ० उद्योग ० १४३ । ६७-६८ ) भट्टिकाव्यका १७ । २२ श्लोक भी इसीपर आधारित है । 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_1_2_Front
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( ४ ) मत्स्यपुराण १२ । ६१ में वे इन्हें ' भार्गवसत्तम'से स्मरण करते हैं? और भागवत ६ । १८।५ में ' महायोगी ' से । इसी प्रकार कविकुलतिलक कालिदासने रघुवंशमें आदिकविको दो बार स्मरण किया है । एक तो- ' कविः कुशेध्माहरणाय यातः । निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोक -त्वमापद्यत यस्य शोकः २ ॥ ' ( १४। ७० ) इस श्लोकमें, दूसरे २।४ के ' पूर्वसूरिभिः ' में । भवभूतिको करुणरसका आचार्य माना गया है, किंतु हम देखते हैं कि उन्हें इसकी शिक्षा आदिकविसे ही मिली है । वे भी उत्तररामचरितके दूसरे अङ्कमें ' वाल्मीकिपार्श्वादिह पर्यटामि ' ' मुनयस्तमेव हि पुराणब्रह्मवादिनं प्राचेतसमृषिं उपासते ' आदिसे उन्हींका स्मरण करते हैं । ' सुभाषितपद्धति ' के निर्माता शार्ङ्गधर उनके इस ऋणको स्पष्ट व्यक्त करते हुए लिखते हैं—
कवीन्द्रं नौमि वाल्मीकिं यस्य रामायणीकथाम् ।
चन्द्रिकामिव चिन्वन्ति चकोरा इव साधवः ॥
इसी तरह महाकवि भास, आचार्य शङ्कर, रामानुजादि सभी सम्प्रदायाचार्य, राजा भोज आदि परवर्ती विद्वानोंसे लेकर हिंदीसाहित्यके प्राण गोस्वामी तुलसीदासजीतकने ‘ बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ । ' ' जान आदिकबि नाम प्रतापू ', ' बालमीकि भे ब्रह्म समाना ' ( रामचरितमानस ), ' जहाँ बालमीकि भये ब्याधतें मुनिंदु साधु ' ' मरा मरा ' ' जपें सिख सुनि रिषि सातकी ' ( कवितावली, उत्तरकाण्ड १३८ से १४० ), ' कहत मुनीस महेस महातम उलटे सीधे नामको ' ' महिमा उलटे नामकी मुनि कियो किरातो । ' ( विनयपत्रिका १५१ ), ' उलटा जपत कोलते भए ऋषिराव ' ( बरवैरामा ० ५४ ), ' राम बिहाइ मरा जपते बिगरी सुधरी कबि कोकिलहू की ' ( कवि ० ७। ८८ ) इत्यादि पदोंसे इनका बार - बार श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है; कृतज्ञता ज्ञापन की है । १. ' वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः । ' संक्षिप्त जीवनी महर्षि वाल्मीकिजीको कुछ लोग निम्न जातिका बतलाते हैं । पर वाल्मीकिरामायण ७ । ९ ६ । १ ९, ७ । ९ ३ । १७ तथा अध्यात्मरामायण ७ । ७ । ३१ में इन्होंने स्वयं अपनेको प्रचेताका पुत्र कहा है । ३ मनुस्मृति १ । ३५ में ' प्रचेतसं वसिष्ठंच भृगुं नारदमेव च ' प्रचेताको वसिष्ठ, नारद, पुलस्त्य, कवि आदिका भाई लिखा है । स्कन्दपुराणके वैशाखमाहात्म्यमें इन्हें जन्मान्तरका व्याध बतलाया है । इससे सिद्ध है कि जन्मान्तरमें ये व्याध थे । व्याध - जन्मके पहले भी स्तम्भ नामके श्रीवत्सगोत्रीय ब्राह्मण थे । व्याध - जन्ममें शङ्ख ऋषिके सत्सङ्गसे, रामनामके जपसे ये दूसरे जन्ममें ' अग्निशर्मा ' ( मतान्तरसे रत्नाकर ) हुए । वहाँ भी व्याधोंके सङ्गसे कुछ दिन प्राक्तन संस्कारवश व्याध - कर्ममें लगे । फिर, सप्तर्षियोंके | सत्संगसे मरा - मरा जपकर - बाँबी पड़नेसे वाल्मीकि नामसे ख्यात हुए और वाल्मीकि रामायणकी रचना की । ( ' कल्याण ' सं ० स्कन्दपुराणाङ्क पृ ० ३८१; ७० ९; १०२४ ) बंगलाके कृत्तिवासरामायण, मानस, अध्यात्मरामा ० २ । ६ । ६४ से ९ २, आनन्दरामायण राज्यकाण्ड १४ । २१– ४ ९, भविष्यपुराण प्रतिसर्ग ० ४ । १० में भी यह कथा थोड़े हेर - फेरसे स्पष्ट है । गोस्वामी तुलसीदासजीने वस्तुतः यह कथा निराधार नहीं लिखी । अतएव इन्हें नीच जातिका मानना सर्वथा भ्रममूलक है । प्राचीन संस्कृत टीकाएँ वाल्मीकिरामायणपर अगणित प्राचीन टीकाएँ हैं, यथा -१ कतक टीका ( इसका नागोजीभट्ट तथा गोविन्द -राजादिने बहुत उल्लेख किया है ), २ – नागोजीभट्टकी तिलक या रामाभिरामी व्याख्या, ३- गोविन्दराजकी भूषण टीका, ४- शिवसहायकी रामायण - शिरोमणि व्याख्या, ( ये पूर्वोक्त तीनों टीकाएँ गुजराती प्रिंटिङ्ग प्रेस बम्बईसे एकमें ही छपी हैं । ) ५ - माहेश्वरतीर्थकी तीर्थव्याख्या या २. आदिकवि वाल्मीकि उस समय कुश, समिधा आदि लेने निकले थे । व्याधके द्वारा मारे गये क्रौञ्चको देखकर उन्हें बड़ा शोक हुआ और वही श्लोकरूपमें परिणत हो गया । ' ध्वन्यालोक ' कार श्रीआनन्दवर्धनने भी इसीसे मिलते-जुलते शब्दोंमें कहा है-' क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः । ' ( ध्वन्यालोक १।५ ) वस्तुतः इन दोनों ही पद्योंका मूल स्वयं आदिकवि ( वाल्मी ० १।२।४० ) का ही श्लोक है, जो इस प्रकार है-' सोऽनुव्याहरणाद् भूयः शोकः श्लोकत्वमागतः । ' ३.‘प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन । ' 75 Srimad Valmiki Ramayan ( 1 ) _Section_1_2_Back
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( ५ ) तत्त्वदीप, ६ – कन्दाल रामानुजकी रामानुजीयव्याख्या; ( ये । टीकाएँ वेंकटेश्वर प्रेस बम्बईसे छपी हैं । ) ७ - वरदराजकृत विवेकतिलक, ८ – त्र्यम्बकराज मखानीकी धर्माकूत व्याख्या ( यह खण्डशः मद्रास एवं श्रीरङ्गम्से छपी है ) और ९ – रामानन्दतीर्थकी रामायणकूट - व्याख्या । इसके अतिरिक्त चतुरर्थदीपिका, रामायणविरोधपरिहार, रामायणसेतु, तात्पर्यतरणि, शृङ्गारसुधाकर रामायणसप्तबिम्ब, मनोरमा आदि अनेक टीकाएँ हैं । ' रीडिंग्स इन रामायण ' के अनुसार इतनी टीकाएँ और हैं - १ अहोबलकी ' वाल्मीकि - हृदय ' ( तनिश्लोकी ) व्याख्या, उनके शिष्यकी विरोधभञ्जिनी टीका, माधवाचार्यकी रामायणतात्पर्यनिर्णय-व्याख्या, श्रीअप्पय दीक्षितेन्द्रकी भी इसी नामकी एक अन्य व्याख्या ( जिसमें उन्होंने रामायणको शिवपरक सिद्ध किया है ), प्रवालमुकुन्दसूरिकी रामायणभूषण व्याख्या एवं श्रीरामभद्राश्रमकी सुबोधिनी टीका । डाक्टर एम ० कृष्णमाचारीने अपनी पुस्तक ' हिस्ट्री ऑफ क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर ' में कई ऐसी टीकाओंका उल्लेख किया है, जिनके लेखकोंका पता नहीं है । उदाहरणार्थ - अमृतकतक, रामायणसारदीपिका, गुरुबाला चित्तरञ्जिनी, विद्वन्मनोरञ्जिनी आदि । उन्होंने वरदराजाचार्यके रामायणसारसंग्रह, देवरामभट्टकी विषयपदार्थव्याख्या, नृसिंह शास्त्रीकी कल्पवल्लिका, वेंकटाचार्यकी रामायणार्थप्रकाशिका, वेंकटाचार्यके रामायण-कथाविमर्श आदि व्याख्याग्रन्थोंका भी उल्लेख किया है । इसके अतिरिक्त कई टीकाएँ ' मध्वविलास ' वाली प्रतिमें संग्रहीत हैं । ज्ञात ये सब तो संस्कृत व्याख्याएँ हैं । अज्ञात संस्कृत व्याख्याओं, हिन्दीके अनेकानेक द्वैत, अद्वैत, शुद्धाद्वैत, विशिष्टाद्वैतादि मतावलम्बियों, आर्यसमाजकी व्याख्याओं, बंगला, मराठी, गुजराती आदि विभिन्न प्रान्तीय भाषाओं तथा फ्रेंच, अंग्रेजी आदि अन्य विदेशी भाषाओंमें किये गये अनुवाद, टीका - टिप्पणियोंकी तो यहाँ कोई बात ही नहीं छेड़नी है; क्योंकि उनका अन्त ही नहीं होना है । रामायणके काव्यगुण, अन्य विशेषताएँ कुछ लोगोंने तो यहाँतक कहा है कि रामायणके लक्षणोंके आधारपर ही दण्डी आदिने काव्योंकी परिभाषा बतलायी । त्र्यम्बकराज मखानीने सुन्दरकाण्डकी व्याख्यामें प्रायः सभी श्लोकोंको अलंकार, रसादियुक्त मानकर काण्डनामकी सार्थकता दिखलायी है । वास्तवमें बात भी ऐसी ही है । सुन्दरका ५ वाँ सर्ग तो नितान्त सुन्दर है ही । श्रीमखानीने सभीके उदाहरण भी दिये हैं । यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि आदिकविने किसी प्राचीन काव्यको बिना ही देखे, किसी ग्रन्थसे बिना ही सहारा लिये सर्वोत्तम काव्यका निर्माण किया । इनका प्राकृतिक चित्रण तो सुन्दर है ही, संवाद सर्वाधिक सुन्दर है । हनुमान्जीकी वार्तालापकुशलता सर्वत्र देखते बनती है । श्रीरामकी प्रतिपादनशैली, दशरथजीकी संभाषणपद्धति, ( अयोध्याकाण्ड २ रा सर्ग ) किमधिकं कहीं - कहीं रावणका भी कथन ( लंकाकाण्ड १६ वाँ सर्ग ) बहुत सुन्दर है । इन्होंने ज्योतिषशास्त्रको भी परम प्रमाण माना है । त्रिजटा स्वप्न, श्रीरामका यात्राकालिक मुहूर्तविचार, विभीषणद्वारा लंकाके अपशकुनोंका प्रतिपादन ( लंकाकाण्ड १० वाँ सर्ग ) आदि ज्योतिर्विज्ञानके ज्ञापक तथा समर्थक हैं । श्रीराम जब अयोध्यासे चलते हैं तो नौ ग्रह एकत्र हो जाते हैं? – इससे लंकायुद्ध होता है । दशरथजी श्रीरामसे ज्योतिषियोंद्वारा अपने अनिष्ट फलादेशकी बात बतलाते हैं । ( अयोध्या ० ४ । १८ ) २ । युद्धकाण्ड १०२ । ३२–३४ के श्लोकोंमें रावणमरणके समयकी ग्रहस्थिति भी ध्येय है । युद्धकाण्ड ९ १ वें सर्गमें आयुर्वेदविज्ञानकी बातें हैं । युद्ध १८ वें सर्ग तथा ६३ । २ से २५ श्लोकतक राजनीतिकी अत्यन्त सारभूत अद्भुत बातें हैं । युद्धकाण्ड ७३ । २४-२८ में तन्त्रशास्त्रकी भी प्रक्रियाएँ हैं । इसमें रावण तथा मेघनादको भारी तान्त्रिक दिखलाया गया है । मेघनादकी सब विजय तन्त्रमूलक है । जब वह जीवित कृष्णछागकी बलि देता है, तब तप्तकाञ्चनके तुल्य अग्निकी दक्षिणावर्त शिखाएँ उसे विजय सूचित करती हैं - ' प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तकाञ्चनसन्निभः । ' ( ६ । ७३ । २३ ) । रावण भी भारी तान्त्रिक है । उसकी ध्वजापर ( तान्त्रिकका चिह्न ) नरशिरकपाल - मनुष्यकी खोपड़ीका चिह्न था । ( ६ । १०० । १४ ) । किंतु उसके पराभव आदिद्वारा ऋषि वाममार्गके इन बलि - मांस - सुरादि क्रियाओंकी | असमीचीनता प्रदर्शित करते हैं ( गोस्वामी तुलसीदासजीने १. देखिये –'दारुणाः सोममभ्येत्य ग्रहाः सर्वे व्यवस्थिताः । ' ( अयोध्या ० ४१ । ११ ) पर तिलक तथा शिरोमणि - व्याख्या । २. ' अवष्टब्धं च मे राम नक्षत्रं दारुणग्रहैः । आवेदयन्ति दैवज्ञाः सूर्याङ्गारकराहुभिः ॥ '
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( ६ ) भी ' तजि श्रुति पंथ बाम मग चलहीं, ' ( अयोध्या ० १६८ । ७-८ ), ' कौल कामबस कृपन बिमूढा ' ( लंका ० ) आदिसे इसी बातका समर्थन किया है ) । इस तरह हमें महर्षिकी दृष्टिमें ज्यौतिष, तन्त्र, आयुर्वेद, शकुन आदि शास्त्रोंकी प्राचीनता एवं समीचीनता ज्ञात होती है । वस्तुतः यही परम आस्तिककी दृष्टि होती है । धर्मशास्त्रके लिये तो यह ग्रन्थ परम प्रमाण है ही, अन्य ऐतिहासिक कथाएँ भी बहुत हैं, अर्थशास्त्रकी भी पर्याप्त सामग्री है । व्यवहार तथा आचारकी भी बातें हैं, कुशलमार्गका भी प्रदर्शन है । पवित्र दार्शनिकता महर्षि वाल्मीकिकी अद्भुत कविता एवं अन्यान्य महत्तामें उनकी तपस्या ही हेतु है । इसमें वाल्मीकिरामायण ही साक्षी है । ' तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ' से इस काव्यका ' तप ' शब्दसे ही आरम्भ होता है और प्रथम अर्धालीमें ही दो बार ' तप ' शब्द आया और ' तपस्वी ' शब्दद्वारा महर्षिने एक प्रकारसे अपनी जीवनी भी लिख दी । तपद्वारा ही ब्रह्माजीका उन्होंने साक्षात् किया, रामायणकी दिव्यकाव्यताका आशीर्वाद लिया और रामचरित्रका दर्शन किया । बादमें विश्वामित्रके विचित्र तपका वर्णन, गङ्गाजीके आगमनमें भगीरथकी अद्भुत तपस्या, चूली ऋषिकी तपस्या, भृगुकी तपस्या आदिका भी वर्णन है । इनके मतसे स्वर्गादि सभी सुखभोगोंका हेतु तप है । किमधिकं; रावणादिके राज्य, सुख, शक्ति, आयु आदिका मूल भी तप है । श्रीराम तो शुद्ध तपस्वी हैं । वे तपस्वियोंके आश्रममें प्रवेश करते हैं । वहाँ वे वैखानस, बालखिल्य, सम्प्रक्षाल, मरीचिप ( केवल चन्द्र - किरण पान करनेवाले ), पत्राहारी, उन्मज्जक ( सदा कण्ठतक पानीमें डूबकर तपस्या करनेवाले ), पञ्चाग्निसेवी, वायुभक्षी, जलभक्षी, स्थण्डिलशायी, आकाशनिलयी एवं ऊर्ध्ववासी ( पर्वत, शिखर- र - वृक्ष, मचान आदिपर रहनेवाले ) तपस्वियोंको देखते हैं । ये सभी जपमें लीन थे । ( अरण्यकाण्ड ६ ठा सर्ग ) इनका जप सम्भवतः ' श्रीराम ' मन्त्र रहा हो, क्योंकि इनमेंसे अधिकांश श्रीरामको देखते ही योगाग्निमें शरीर छोड़ देते हैं । वस्तुतः काव्यविधिसे कान्तासम्मित मधुर वाणीमें । वाल्मीकिका यही दार्शनिक उपदेश है । उनका मूल तत्त्व इस प्रकार पवित्रतापूर्वक रहकर तपोऽनुष्ठान करते हुए ईश्वरकी आराधना करना एवं अधर्मसे सदा दूर रहना ही है । श्रीरामकी परब्रह्मता कुछ लोग रामायणमें नरचरित्र मानते हैं और श्रीरामके ईश्वरताप्रतिपादक ( देखिये, बालकाण्ड १५ से १८ सर्ग, पुनः ७६ । १७, १ ९, अयोध्या ० १।७, अरण्य ० ३ । ३७, सुन्दर ० २५ । २७, ३१; ५१ । ३८, युद्ध ० ५ ९ । ११०; ९ ५ । २५; पूरा १११ तथा ११७ वाँ सर्ग ११ ९ । १८, ११ ९ । ३२ में सुस्पष्ट ' ब्रह्म ' शब्द उत्तरका ० ८ । २६, ५१ ।१२ - २२; १०४ । ४ आदि । बङ्ग तथा पश्चिमी शाखामें भी ये सब श्लोक हैं, बल्कि कहीं-कहीं तो इससे भी अधिक हैं । ) हजारों वचनोंको प्रक्षिप्त मानते हैं । किंतु ध्यानसे पढ़नेपर श्रीरामकी ईश्वरता सर्वत्र दीखती है । गम्भीर चिन्तनके बाद तो प्रत्येकं
श्लोक ही श्रीरामकी अचिन्त्य शक्तिमत्ता, लोकोत्तर
धर्मप्रियता, आश्रितवत्सलता एवं ईश्वरताका प्रतिपादक दीखता है । विभीषणशरणागतिके समय यद्यपि कोई भी ऐश्वर्य प्रदर्शक वचन नहीं आया, पर श्रीरामके अप्रतिम मार्दव, कपोतके आतिथ्यसत्कारके उदाहरण देने, परमर्षि कण्डुकी गाथा पढ़ने एवं अपने शरणमें आये समस्त प्राणियोंको * समस्त प्राणियोंसे अभयदान देनेके स्वाभाविक नियमको घोषित करनेके बाद प्रतिवादी सुग्रीवको विवश होकर कहना ही पड़ा कि ' धर्मज्ञ! लोकनाथोंके शिरोमणि! आपके इस कथनमें कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि आप महान् शक्तिशाली एवं
सत्पथपर आरूढ़ हैं-किमत्र चित्रं धर्मज्ञ लोकनाथशिखामणे ।
यत् त्वमार्यं प्रभाषेथाः सत्त्ववान् सत्पथे स्थितः ॥
( ६ । १८ । ३६ ) इसी प्रकार हनुमान्जीने सीताजीके सामने और रावणके सामने जो श्रीरामके गुण कहे हैं, उनमें उन्हें ईश्वर तो नहीं बतलाया, किंतु ' श्रीराममें यह सामर्थ्य है कि वे एक ही क्षणमें समस्त स्थावर - जंगमात्मक विश्वको संहृत कर दूसरे ही क्षण पुनः इस संसारका ज्यों - का - त्यों * यहाँ ' सर्वभूतेभ्यः ' में प्रायः सभी प्राचीन टीकाकारोंने चतुर्थी और पञ्चमी दोनों मानकर इस पदका दो बार अर्थ किया है ।