वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 481–490
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490
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अयोध्याकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः ४६ ९
सब कुछ नष्ट हो गया! नष्ट हो गया!! ' ऐसा कहते ।
हुए मेरे पिताजी अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ १७ ॥
सिद्धार्थाः पितरं वृत्तं तस्मिन् काले ह्युपस्थिते ।
प्रेतकार्येषु सर्वेषु संस्करिष्यन्ति भूमिपम् ॥ १८ ॥
' उनकी उस मृत्युका समय उपस्थित होनेपर जो लोग वहाँ रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता महाराज दशरथका सभी प्रेतकार्योंमें संस्कार करेंगे, वे ही सफलमनोरथ और भाग्यशाली हैं ॥ १८ ॥
रम्यचत्वरसंस्थानां सुविभक्तमहापथाम् ।
हर्म्यप्रासादसम्पन्नां सर्वरत्नविभूषिताम् ॥ १ ९ ॥
गजाश्वरथसम्बाधां तूर्यनादविनादिताम् ।
सर्वकल्याणसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् ॥ २० ॥
आरामोद्यानसम्पूर्णां समाजोत्सवशालिनीम् ।
सुखिता विचरिष्यन्ति राजधानीं पितुर्मम ॥ २१ ॥
' ( यदि पिताजी जीवित रहे तो ) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक् - पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गोंसे अलंकृत, धनिकों की अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, हाथियों, घोड़ों और रथोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे व्याप्त, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे परिपूर्ण तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं ॥ १ ९ –२१ ॥
अपि सत्यप्रतिज्ञेन सार्धं कुशलिना वयम् ।
निवृत्ते समये ह्यस्मिन् सुखिताः प्रविशेमहि ॥ २२ ॥
' क्या वनवासकी इस अवधिके समाप्त होनेपर सकुशल लौटे हुए सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामके साथ हमलोग अयोध्यापुरीमें प्रवेश कर सकेंगे ' ॥ २२ ॥
परिदेवयमानस्य तस्यैवं हि महात्मनः ।
तिष्ठतो राजपुत्रस्य शर्वरी सात्यवर्तत ॥ २३ ॥
' इस प्रकार विलाप करते हुए महामनस्वी राजकुमार लक्ष्मणकी वह सारी रात जागते ही बीती ॥ २३ ॥
प्रभाते विमले सूर्ये कारयित्वा जटा उभौ ।
अस्मिन् भागीरथीतीरे सुखं संतारितौ मया ॥ २४ ॥
' प्रातःकाल निर्मल सूर्योदय होनेपर मैंने भागीरथीके तटपर ( वटके दूधसे ) उन दोनोंके केशोंको जटाका रूप दिलवाया और उन्हें सुखपूर्वक पार उतारा ॥ २४ ॥
| जटाधरौ तौ द्रुमचीरवासस महाबलौ कुञ्जरयूथपोपमौ । वरेषुधीचापधरौ परंतपौ व्यपेक्षमाणौ सह सीतया गतौ ॥ २५ ॥
' सिरपर जटा धारण करके वल्कल एवं चीर-वस्त्र पहने हुए, महाबली, शत्रुसंतापी श्रीराम और लक्ष्मण दो गजयूथपतियोंके समान शोभा पाते थे । वे सुन्दर तरकस और धनुष धारण किये इधर - उधर देखते हुए सीताके साथ चले गये'॥२५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रारामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे षडशीतितमः सर्गः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
सप्ताशीतितमः सर्गः भरतकी मूर्च्छासे गुह, शत्रुघ्न और माताओंका दुःखी होना, होशमें आनेपर भरतका गुहसे श्रीराम आदिके भोजन और शयन आदिके विषयमें पूछना और गुहका उन्हें सब बातें बताना
गुहस्य वचनं श्रुत्वा भरतो भृशमप्रियम् ।
ध्यानं जगाम तत्रैव यत्र तच्छुतमप्रियम् ॥ १ ॥
गुहका श्रीरामके जटाधारण आदिसे सम्बन्ध रखनेवाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये । जिन श्रीरामके विषयमें उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हींका वे चिन्तन करने लगे ( उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा । श्रीरामने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें ) ॥ १ ॥
सुकुमारो महासत्त्वः सिंहस्कन्धो महाभुजः ।
पुण्डरीकविशालाक्षस्तरुणः प्रियदर्शनः ॥ २ ॥
प्रत्याश्वस्य मुहूर्तं तु कालं परमदुर्मनाः ।
ससाद सहसा तोत्रैर्हृदि विद्ध इव द्विपः ॥ ३ ॥
भरत सुकुमार होनेके साथ ही महान् बलशाली थे, उनके कंधे सिंहके समान थे, भुजाएँ बड़ी - बड़ी और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे । उनकी अवस्था । तरुण थी और वे देखनेमें बड़े मनोरम थे । उन्होंने गुहकी
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४७० श्रीमद्वाल्मीकीयरामाय बात सुनकर दो घड़ीतक किसी प्रकार धैर्य धारण । किया, फिर उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ । वे अंकुशसे विद्ध हुए हाथीके समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दुःखसे शिथिल एवं मूच्छित हो गये ॥ २-३ ॥।
भरतं मूच्छितं दृष्ट्वा विवर्णवदनो गुहः ।
बभूव व्यथितस्तत्र भूमिकम्पे यथा द्रुमः ॥ ४॥ ।
भरतको मूर्च्छित हुआ देख गुहके चेहरेका रंग उड़ गया । वह भूकम्पके समय मथित हुए वृक्षकी भाँति वहाँ व्यथित हो उठा ॥४ ॥
तदवस्थं तु भरतं शत्रुघ्नोऽनन्तरस्थितः ।
परिष्वज्य रुरोदोच्चैर्विसंज्ञः शोककर्शितः ॥ ५ ॥
शत्रुघ्र भरतके पास ही बैठे थे । वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदयसे लगाकर जोर - जोरसे रोने लगे • और शोकसे पीड़ित हो अपनी सुध - बुध खो बैठे ॥ ५ ॥
ततः सर्वाः समापेतुर्मातरो भरतस्य ताः ।
उपवासकृशा दीना भर्तृव्यसनकर्शिताः ॥ ६ ॥
तदनन्तर भरतकी सभी माताएँ वहाँ आ पहुँचीं । वे पतिवियोगके दुःखसे दुःखी, उपवास करनेके कारण दुर्बल और दीन हो रही थीं ॥ ६ ॥
ताश्च तं पतितं भूमौ रुदत्यः पर्यवारयन् ।
कौसल्या त्वनुसृत्यैनं दुर्मनाः परिषस्वजे ॥ ७ ॥
भूमिपर पड़े हुए भरतको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया और सब - की - सब रोने लगीं । कौसल्याका हृदय तो दुःखसे और भी कातर हो उठा । उन्होंने भरतके पास जाकर उन्हें अपनी गोदमें चिपका लिया ॥ ७ ॥
वत्सला स्वं यथा वत्समुपगुह्य तपस्विनी ।
परिपप्रच्छ भरतं रुदती शोकलालसा ॥ ८ ॥
जैसे वत्सला गौ अपने बछड़ेको गलेसे लगाकर चाटती है, उसी तरह शोकसे व्याकुल हुई तपस्विनी कौसल्याने भरतको गोदमें लेकर रोते - रोते पूछा- ॥
पुत्र व्याधिर्न ते कच्चिच्छरीरं प्रति बाधते ।
अस्य राजकुलस्याद्य त्वदधीनं हि जीवितम् ॥ ९ ॥
' बेटा! तुम्हारे शरीरको कोई रोग तो कष्ट नहीं पहुँचा रहा है? अब इस राजवंशका जीवन तुम्हारे ही अधीन है ॥ ९ ॥
त्वां दृष्ट्वा पुत्र जीवामि रामे सभ्रातृके गते ।
वृत्ते दशरथे राज्ञि नाथ एकस्त्वमद्य नः ॥ १० ॥
' वत्स! मैं तुम्हींको देखकर जी रही हूँ । श्रीराम लक्ष्मणके साथ वनमें चले गये और महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गये; अब एकमात्र तुम्हीं हमलोगोंके रक्षक हो ॥ १० ॥ ।
कच्चिन्न लक्ष्मणे पुत्र श्रुतं ते किंचिदप्रियम् ।
पुत्रे वा ह्येकपुत्रायाः सहभार्ये वनं गते ॥ ११ ॥
' बेटा! सच बताओ, तुमने लक्ष्मणके सम्बन्धमें अथवा मुझ एक ही पुत्रवाली माके बेटे वनमें सीतासहित गये हुए श्रीरामके विषयमें कोई अप्रिय बात तो नहीं सुनी है? ' ॥ ११ ॥
स मुहूर्तं समाश्वस्य रुदन्नेव महायशाः ।
कौसल्यां परिसान्त्व्येदं गुहं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥
दो ही घड़ीमें जब महायशस्वी भरतका चित्त स्वस्थ हुआ, तब उन्होंने रोते - रोते ही कौसल्याको सान्त्वना दी ( और कहा -'मा! घबराओ मत, मैंने कोई अप्रिय बात नहीं सुनी है ) । फिर निषादराज गुहसे इस प्रकार पूछा- ॥ १२ ॥
भ्राता मे क्वावसद् रात्रौ क्व सीता क्व च लक्ष्मणः ।
अस्वपच्छयने कस्मिन् किं भुक्त्वा गुह शंस मे ॥ १३ ॥
' गुह! उस दिन रातमें मेरे भाई श्रीराम कहाँ ठहरे थे? सीता कहाँ थीं? और लक्ष्मण कहाँ रहे? उन्होंने क्या भोजन करके कैसे बिछौनेपर शयन किया था? ये सब बातें मुझे बताओ ' ॥ १३ ॥
सोऽब्रवीद् भरतं हृष्टो निषादाधिपतिर्गुहः ।
यद्विधं प्रतिपेदे च रामे प्रियहितेऽतिथौ ॥ १४ ॥
ये प्रश्न सुनकर निषादराज गुह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपने प्रिय एवं हितकारी अतिथि श्रीरामके आनेपर उनके प्रति जैसा बर्ताव किया था, वह सब बताते हुए भरतसे कहा— ॥ १४ ॥
अन्नमुच्चावचं भक्ष्याः फलानि विविधानि च ।
रामायाभ्यवहारार्थं बहुशो ऽपहृतं मया ॥ १५ ॥
' मैंने भाँति - भाँतिके अन्न, अनेक प्रकारके खाद्य-पदार्थ और कई तरहके फल श्रीरामचन्द्रजीके पास भोजनके लिये प्रचुर मात्रामें पहुँचाये ॥ १५ ॥
तत् सर्वं प्रत्यनुज्ञासीद् रामः सत्यपराक्रमः ।
न हि तत् प्रत्यगृह्णात् स क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ १६ ॥
‘ सत्यपराक्रमी श्रीरामने मेरी दी हुई सब वस्तुएँ स्वीकार तो कीं; किंतु क्षत्रियधर्मका स्मरण करते हुए उनको ग्रहण नहीं किया- मुझे आदरपूर्वक लौटा दिया ॥
नह्यस्माभिः प्रतिग्राह्यं सखे देयं तु सर्वदा ।
इति तेन वयं सर्वे अनुनीता महात्मना ॥ १७ ॥
' फिर उन महात्माने हम सब लोगोंको समझाते हुए कहा- ' सखे! हम जैसे क्षत्रियोंको किसीसे कुछ लेना नहीं चाहिये; अपितु सदा देना ही चाहिये ' ॥ १७ ॥
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अयोध्याकाण्डे अष्टाशीतितमः सर्गः ४७१
लक्ष्मणेन यदानीतं पीतं वारि महात्मना ।
औपवास्यं तदाकार्षीद् राघवः सह सीतया ॥ १८ ॥
' सीतासहित श्रीरामने उस रातमें उपवास ही किया । लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उसीको उन महात्माने पीया ॥ १८ ॥
ततस्तु जलशेषेण लक्ष्मणोऽप्यकरोत् तदा ।
वाग्यतास्ते त्रयः संध्यां समुपासन्त संहिताः ॥ १ ९ ॥
' उनके पीनेसे बचा हुआ जल लक्ष्मणने ग्रहण किया । ( जलपानके पहले ) उन तीनोंने मौन एवं एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना की थी ॥ १ ९ ॥
सौमित्रिस्तु ततः पश्चादकरोत् स्वास्तरं शुभम् ।
स्वयमानीय बहषि क्षिप्रं राघवकारणात् ॥ २० ॥
' तदनन्तर लक्ष्मणने स्वयं कुश लाकर श्रीरामचन्द्रजीके लिये शीघ्र ही सुन्दर बिछौना बिछाया ॥ २० ॥
तस्मिन् समाविशद् रामः स्वास्तरे सह सीतया ।
प्रक्षाल्य च तयोः पादौ व्यपाक्रामत् स लक्ष्मणः ॥ २१ ॥
' उस सुन्दर बिस्तरपर जब सीताके साथ श्रीराम विराजमान हुए, तब लक्ष्मण उन दोनोंके चरण पखारकर वहाँसे दूर हट आये ॥ २१ ॥
एतत् तदिङ्गुदीमूलमिदमेव च तत् तृणम् ।
यस्मिन् रामश्च सीता च रात्रिं तां शयितावुभौ ॥ २२ ॥
' यही वह इङ्गुदी - वृक्षकी जड़ है और यही वह तृण है, जहाँ श्रीराम और सीता - दोनोंने रात्रिमें शयन किया था ॥ २२ ॥
नियम्य पृष्ठे तु तलाङ्गुलित्रवान् शरैः सुपूर्णाविषुधी परंतपः । महद्धनुः सज्जमुपोह्य लक्ष्मणो निशामतिष्ठत् परितोऽस्य केवलम् ॥ २३ ॥
' शत्रुसंतापी लक्ष्मण अपनी पीठपर बाणोंसे भरे दो तरकस बाँधे, दोनों हाथोंकी अंगुलियोंमें दस्ताने पहने और महान् धनुष चढ़ाये श्रीरामके चारों ओर घूमकर केवल पहरा देते हुए रातभर खड़े रहे ॥ २३ ॥
ततस्त्वहं चोत्तमबाणचापभृत्
स्थितोऽभवं तत्र स यत्र लक्ष्मणः ।
अतन्द्रितैर्ज्ञातिभिरात्तकार्मुकै-महेन्द्रकल्पं परिपालयंस्तदा ॥ २४ ॥
' तदनन्तर मैं भी उत्तम बाण और धनुष लेकर वहीं आ खड़ा हुआ, जहाँ लक्ष्मण थे । उस समय अपने बन्धु- बान्धवोंके साथ, जो निद्रा और आलस्यका त्याग करके धनुष - बाण लिये सदा सावधान रहे, मैं देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी श्रीरामकी रक्षा | करता रहा ' ॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सतासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८७ ॥
अष्टाशीतितमः सर्गः श्रीरामकी कुश - शय्या देखकर भरतका और जटाधारण करके वनमें
तच्छ्रुत्वा निपुणं सर्वं भरतः सह मन्त्रिभिः ।
इङ्गुदीमूलमाय रामशय्यामवैक्षत ॥ १ ॥
निषादराजकी सारी बातें ध्यानसे सुनकर
मन्त्रियोंसहित भरतने इंगुदी - वृक्षकी जड़के पास आकर ।
श्रीरामचन्द्रजीकी शय्याका निरीक्षण किया ॥ १ ॥
अब्रवीज्जननीः सर्वा इह तस्य महात्मनः ।
शर्वरी शयिता भूमाविदमस्य विमर्दितम् ॥ २ ॥
फिर उन्होंने समस्त माताओंसे कहा- ' यहीं महात्मा श्रीरामने भूमिपर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी । यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गोंसे विमर्दित हुआ था ॥
महाराजकुलीनेन महाभागेन धीमता ।
जातो दशरथेनोर्व्यां न रामः स्वप्तुमर्हति ॥ ३ ॥
शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कल रहनेका विचार प्रकट करना ' महाराजोंके कुलमें उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमिपर शयन करनेके योग्य नहीं हैं ॥ ३ ॥
अजिनोत्तरसंस्तीर्णे वरास्तरणसंचये ।
शयित्वा पुरुषव्याघ्रः कथं शेते महीतले ॥४ ॥
' जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्मकी विशेष चादरसे ढके हुए तथा अच्छे - अच्छे बिछौनोंके समूहसे सजे हुए पलंगपर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वीपर कैसे शयन करते होंगे? ॥४ ॥
प्रासादाग्रविमानेषु वलभीषु च सर्वदा ।
। हैमराजतभौमेषु वरास्तरणशालिषु ॥ ५ ॥
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४७२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामाय
पुष्पसंचयचित्रेषु चन्दनागुरुगन्धिषु ।
पाण्डुराभ्रप्रकाशेषु शुकसंघतेषु च ॥ ६ ॥
प्रासादवरवर्येषु शीतवत्सु सुगन्धिषु ।
उषित्वा मेरुकल्पेषु कृतकाञ्चनभित्तिषु ॥ ७ ॥
' जो सदा विमानाकार प्रासादोंके श्रेष्ठ भवनों और अट्टालिकाओं में सोते आये हैं तथा जिनकी फर्श सोने और चाँदीकी बनी हुई है, जो अच्छे बिछौनोंसे सुशोभित हैं, पुष्पराशिसे विभूषित होनेके कारण जिनकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें चन्दन और अगुरुकी सुगन्ध फैली रहती है, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं, जिनमें शुकसमूहका कलरव होता रहता है, जो शीतल हैं एवं कपूर आदिकी सुगन्धसे व्याप्त होते हैं, जिनकी दीवारोंपर सुवर्णका काम किया गया है तथा जो ऊँचाईमें मेरु पर्वतके समान जान पड़ते हैं, ऐसे सर्वोत्तम राजमहलोंमें जो निवास कर चुके हैं, वे श्रीराम वनमें पृथ्वीपर कैसे सोते होंगे? ॥५–७ ॥ गीतवादित्रनिर्घोषैर्वराभरणनिःस्वनैः 1 मृदङ्गवरशब्दैश्च सततं प्रतिबोधितः ॥ ८ ॥
बन्दिभिर्वन्दितः काले बहुभिः सूतमागधैः ।
गाथाभिरनुरूपाभिः स्तुतिभिश्च परंतपः ॥ ९ ॥
' जो गीतों और वाद्योंकी ध्वनियोंसे, श्रेष्ठ आभूषणोंकी झनकारोंसे तथा मृदङ्गोंके उत्तम शब्दोंसे सदा जगाये जाते थे, बहुत - से वन्दीगण समय - समयपर जिनकी वन्दना करते थे, सूत और मागध अनुरूप गाथाओं और स्तुतियोंसे जिनको जगाते थे, वे शत्रुसंतापी श्रीराम अब भूमिपर कैसे शयन करते होंगे? ॥ ८ - ९ ॥
अश्रद्धेयमिदं लोके न सत्यं प्रतिभाति मा ।
मुह्यते खलु मे भावः स्वप्नोऽयमिति मे मतिः ॥ १० ॥
' यह बात जगत्में विश्वासके योग्य नहीं है । मुझे यह सत्य नहीं प्रतीत होती । मेरा अन्तःकरण अवश्य ही मोहित हो रहा है । मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह कोई स्वप्न है ॥ १० ॥
न नूनं दैवतं किंचित् कालेन बलवत्तरम् ।
यत्र दाशरथी रामो भूमावेवमशेत सः ॥ ११ ॥
' निश्चय ही कालके समान प्रबल कोई दूसरा देवता नहीं है, जिसके प्रभावसे दशरथनन्दन श्रीरामको भी इस प्रकार भूमिपर सोना पड़ा ॥ ११ ॥
यस्मिन् विदेहराजस्य सुता च प्रियदर्शना ।
दयिता शयिता भूमौ स्नुषा दशरथस्य च ॥ १२ ॥
' उस कालके ही प्रभावसे विदेहराजकी परम सुन्दरी पुत्री और महाराज दशरथकी प्यारी पुत्रवधू सीता भी पृथ्वीपर शयन करती हैं ॥१२ ॥
इयं शय्या मम भ्रातुरिदमावर्तितं शुभम् ।
स्थण्डिले कठिने सर्वं गात्रैर्विमृदितं तृणम् ॥ १३ ॥
' यही मेरे बड़े भाईकी शय्या है । यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं । इस कठोर वेदीपर उनका शुभ शयन हुआ था, जहाँ उनके अङ्गोंसे कुचला गया सारा तृण अभीतक पड़ा है ॥ १३ ॥
मन्ये साभरणा सुप्ता सीतास्मिन्शयने शुभा ।
तत्र तत्र हि दृश्यन्ते सक्ताः कनकबिन्दवः ॥ १४ ॥
' जान पड़ता है, शुभलक्षणा सीता शय्यापर आभूषण पहने ही सोयी थीं; क्योंकि यहाँ यत्र - तत्र सुवर्णके कण सटे दिखायी देते हैं ॥ १४ ॥
उत्तरीयमिहासक्तं सुव्यक्तं सीतया तदा ।
तथा ह्येते प्रकाशन्ते सक्ताः कौशेयतन्तवः ॥ १५ ॥
' यहाँ उस समय सीताकी चादर उलझ गयी थी, यह साफ दिखायी दे रहा है; क्योंकि यहाँ सटे हुए ये रेशमके तागे चमक रहे हैं ॥ १५ ॥
मन्ये भर्तुः सुखा शय्या येन बाला तपस्विनी ।
सुकुमारी सती दुःखं न विजानाति मैथिली ॥ १६ ॥
' मैं समझता हूँ कि पतिकी शय्या कोमल हो या कठोर, साध्वी स्त्रियोंके लिये वही सुखदायिनी होती है, तभी तो वह तपस्विनी एवं सुकुमारी बाला सती - साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता यहाँ दुःखका अनुभव नहीं कर रही हैं ॥ १६ ॥
हा हतोऽस्मि नृशंसोऽस्मि यत् सभार्यः कृते मम ।
ईदृशीं राघवः शय्यामधिशेते ह्यनाथवत् ॥ १७ ॥
' हाय! मैं मर गया - मेरा जीवन व्यर्थ है । मैं बड़ा क्रूर हूँ, जिसके कारण सीतासहित श्रीरामको अनाथकी भाँति ऐसी शय्यापर सोना पड़ता है ॥ १७ ॥
सार्वभौमकुले जातः सर्वलोकसुखावहः ।
सर्वप्रियकरस्त्यक्त्वा राज्यं प्रियमनुत्तमम् ॥ १८ ॥
कथमिन्दीवरश्यामो रक्ताक्षः प्रियदर्शनः ।
सुखभागी न दुःखार्हः शयितो भुवि राघवः ॥ १ ९ ॥
‘ जो चक्रवर्ती सम्राट्के कुलमें उत्पन्न हुए हैं, समस्त लोकोंको सुख देनेवाले हैं तथा सबका प्रिय करनेमें तत्पर रहते हैं, जिनका शरीर नीले कम समान श्याम, आँखें लाल और दर्शन सबको प्रिय
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अयोध्याकाण्डे अष्टाशीतितमः सर्गः ४७३ लगनेवाला है तथा जो सुख भोगनेके ही योग्य हैं, दुःख । भोगनेके कदापि योग्य नहीं हैं, वे ही श्रीरघुनाथजी परम उत्तम प्रिय राज्यका परित्याग करके इस समय पृथ्वीपर शयन करते हैं ॥ १८-१९ ॥
धन्यः खलु महाभागो लक्ष्मणः शुभलक्षणः ।
भ्रातरं विषमे काले यो राममनुवर्तते ॥ २० ॥
' उत्तम लक्षणोंवाले लक्ष्मण ही धन्य एवं बड़भागी हैं, जो संकटके समय बड़े भाई श्रीरामके साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं ॥ २० ॥
सिद्धार्था खलु वैदेही पतिं यानुगता वनम् ।
वयं संशयिताः सर्वे हीनास्तेन महात्मना ॥ २१ ॥
' निश्चय ही विदेहनन्दिनी सीता भी कृतार्थ हो गयीं, जिन्होंने पतिके साथ वनका अनुसरण किया है । हम सब लोग उन महात्मा श्रीरामसे बिछुड़कर संशयमें पड़ गये हैं ( हमें यह संदेह होने लगा है कि श्रीराम हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं ) ॥ २१ ॥
अकर्णधारा पृथिवी शून्येव प्रतिभाति मे ।
गते दशरथे स्वर्गं रामे चारण्यमाश्रिते ॥ २२ ॥
' महाराज दशरथ स्वर्गलोकको गये और श्रीराम वनवासी हो गये, ऐसी दशामें यह पृथ्वी बिना नाविककी नौकाके समान मुझे सूनी - सी प्रतीत हो रही है ॥ २२ ॥
न च प्रार्थयते कश्चिन्मनसापि वसुंधराम् ।
वने निवसतस्तस्य बाहुवीर्याभिरक्षिताम् ॥ २३ ॥
' वनमें निवास करनेपर भी उन्हीं श्रीरामके बाहुबलसे सुरक्षित हुई इस वसुन्धराको कोई शत्रु मनसे भी नहीं लेना चाहता है ॥ २३ ॥
शून्यसंवरणारक्षामयन्त्रितहयद्विपाम् I अनावृतपुरद्वारां राजधानीमरक्षिताम् ॥ २४ ॥
अप्रहृष्टबलां शून्यां विषमस्थामनावृताम् ।
शत्रवो नाभिमन्यन्ते भक्ष्यान् विषकृतानिव ॥ २५ ॥
' इस समय अयोध्याकी चहारदीवारीकी सब ओरसे रक्षाका कोई प्रबन्ध नहीं है, हाथी और घोड़े बँधे नहीं रहते हैं — खुले विचरते हैं, नगरद्वारका फाटक खुला ही रहता है, सारी राजधानी अरक्षित है, सेनामें हर्ष और उत्साहका अभाव है, समस्त नगरी रक्षकोंसे सूनी - सी जान पड़ती है, सङ्कटमें पड़ी हुई है, रक्षकोंके अभावसे आवरणरहित हो गयी है, तो भी शत्रु विषमिश्रित भोजनकी भाँति इसे ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं करते हैं । श्रीरामके बाहुबलसे ही इसकी रक्षा हो रही है ॥ २४-२५ ॥
अद्यप्रभृति भूमौ तु शयिष्येऽहं तृणेषु वा ।
फलमूलाशनो नित्यं जटाचीराणि धारयन् ॥ २६ ॥
' आजसे मैं भी पृथ्वीपर अथवा तिनकोंपर ही सोऊँगा, फल - मूलका ही भोजन करूँगा और सदा वल्कल वस्त्र तथा जटा धारण किये रहूँगा ॥ २६ ॥
तस्याहमुत्तरं कालं निवत्स्यामि सुखं वने ।
तत् प्रतिश्रुतमार्यस्य नैव मिथ्या भविष्यति ॥ २७ ॥
' वनवासके जितने दिन बाकी हैं, उतने दिनोंतक मैं ही वहाँ सुखपूर्वक निवास करूँगा, ऐसा होनेसे आर्य श्रीरामकी की हुई प्रतिज्ञा झूठी नहीं होगी ॥ २७ ॥
वसन्तं भ्रातुरर्थाय शत्रुघ्नो मानुवत्स्यति ।
लक्ष्मणेन सहायोध्यामार्यो मे पालयिष्यति ॥ २८ ॥
' भाईके लिये वनमें निवास करते समय शत्रुघ्र मेरे साथ रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम लक्ष्मणको साथ लेकर अयोध्याका पालन करेंगे ॥ २८ ॥
अभिषेक्ष्यन्ति काकुत्स्थमयोध्यायां द्विजातयः ।
अपि मे देवताः कुर्युरिमं सत्यं मनोरथम् ॥ २ ९ ॥
‘ अयोध्यामें ब्राह्मणलोग ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामका अभिषेक करेंगे । क्या देवता मेरे इस मनोरथको सत्य ( सफल ) करेंगे? ॥ २ ९ ॥ प्रसाद्यमानः शिरसा मया स्वयं बहुप्रकारं यदि न प्रपत्स्यते । ततोऽनुवत्स्यामि चिराय राघवं वनेचरं नार्हति मामुपेक्षितुम् ॥ ३० ॥
' मैं उनके चरणोंपर मस्तक रखकर उन्हें मनानेकी चेष्टा करूँगा । यदि मेरे बहुत कहनेपर भी वे लौटनेको राजी न होंगे तो उन वनवासी श्रीरामके साथ मैं भी दीर्घकालतक वहीं निवास करूँगा । वे मेरी उपेक्षा नहीं | करेंगे ' ॥ ३० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाशीतितमः सर्गः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
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४७४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एकोननवतितमः सर्गः भरतका सेनासहित गङ्गापार करके भरद्वाजके आश्रमपर जाना
व्युष्य रात्रिं तु तत्रैव गङ्गाकूले स राघवः ।
काल्यमुत्थाय शत्रुघ्नमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
शृङ्गवेरपुरमें ही गङ्गाके तटपर रात्रि बिताकर रघुकुलनन्दन भरत प्रात: काल उठे और शत्रुघ्नसे इस प्रकार बोले- ॥ १ ॥
शत्रुघ्नोत्तिष्ठ किं शेषे निषादाधिपतिं गुहम् ।
शीघ्रमानय भद्रं ते तारयिष्यति वाहिनीम् ॥ २ ॥
' शत्रुघ्न! उठो, क्या सो रहे हो । तुम्हारा कल्याण हो, तुम निषादराज गुहको शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गङ्गाके पार उतारेगा ' ॥ २ ॥
जागर्मि नाहं स्वपिमि तथैवार्यं विचिन्तयन् ।
इत्येवमब्रवीद् भ्राता शत्रुघ्नो विप्रचोदितः ॥ ३ ॥
उनसे इस प्रकार प्रेरित होनेपर शत्रुघ्नने कहा-' भैया! मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीरामका चिन्तन करता हुआ जाग रहा हूँ, सोता नहीं हूँ ' ॥ ३ ॥
इति संवदतोरेवमन्योन्यं नरसिंहयोः ।
आगम्य प्राञ्जलिः काले गुहो वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥
वे दोनों पुरुषसिंह जब इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय गुह उपयुक्त वेलामें आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला- ॥४ ॥
कच्चित् सुखं नदीतीरेऽवात्सीः काकुत्स्थ शर्वरीम् ।
कच्चिच्च सहसैन्यस्य तव नित्यमनामयम् ॥ ५ ॥
' ककुत्स्थकूलभूषण भरतजी! इस नदीके तटपर आप रातमें सुखसे रहे हैं न? सेनासहित आपको यहाँ कोई कष्ट तो नहीं हुआ है? आप सर्वथा नीरोग हैं न? ' ॥
गुहस्य तत् तु वचनं श्रुत्वा स्नेहादुदीरितम् ।
रामस्यानुवशो वाक्यं भरतोऽपीदमब्रवीत् ॥ ६ ॥
गुहके स्नेहपूर्वक कहे गये इस वचनको सुनकर श्रीरामके अधीन रहनेवाले भरतने यों कहा— ॥ ६ ॥
सुखा नः शर्वरी धीमन् पूजिताश्चापि ते वयम् ।
गङ्गां तु नौभिर्बह्वीभिर्दाशाः संतारयन्तु नः ॥ ७ ॥
' बुद्धिमान् निषादराज! हम सब लोगोंकी रात बड़े सुखसे बीती है । तुमने हमारा बड़ा सत्कार किया । अब ऐसी व्यवस्था करो, जिससे तुम्हारे मल्लाह बहुत - सी नौकाओंद्वारा हमें गङ्गाके पार उतार दें ' ॥ ७ ॥
ततो गुहः संत्वरितः श्रुत्वा भरतशासनम् ।
प्रतिप्रविश्य नगरं तं ज्ञातिजनमब्रवीत् ॥ ८ ॥ ।
भरतका यह आदेश सुनकर गुह तुरंत अपने नगरमें गया और भाई - बन्धुओंसे बोला- ॥ ८ ॥
उत्तिष्ठत प्रबुध्यध्वं भद्रमस्तु हि वः सदा ।
नावः समुपकर्षध्वं तारयिष्यामि वाहिनीम् ॥ ९ ॥
' उठो, जागो, सदा तुम्हारा कल्याण हो । नौकाओंको खींचकर घाटपर ले आओ । भरतकी सेनाको गङ्गाजीके पार उतारूँगा ' ॥ ९ ॥
ते तथोक्ताः समुत्थाय त्वरिता राजशासनात् ।
पञ्च नावां शतान्येव समानिन्युः समन्ततः ॥ १० ॥
गुहके इस प्रकार कहनेपर अपने राजाकी आज्ञासे सभी मल्लाह शीघ्र ही उठ खड़े हुए और चारों ओरसे पाँच सौ नौकाएँ एकत्र कर लाये ॥१० ॥
अन्याः स्वस्तिकविज्ञेया महाघण्टाधरावराः ।
शोभमानाः पताकिन्यो युक्तवाहाः सुसंहताः ॥ ११ ॥
इन सबके अतिरिक्त कुछ स्वस्तिक नामसे प्रसिद्ध नौकाएँ थीं; जो स्वस्तिकके चिह्नोंसे अलंकृत होनेके कारण उन्हीं चिह्नोंसे पहचानी जाती थीं । उनपर ऐसी पताकाएँ फहरा रही थीं, जिनमें बड़ी - बड़ी घण्टियाँ लटक रही थीं । स्वर्ण आदिके बने हुए चित्रोंसे उन नौकाओंकी विशेष शोभा हो रही थी । उनमें नौका खेनेके लिये बहुत - से डाँड़ लगे हुए थे तथा चतुर नाविक उन्हें चलानेके लिये तैयार बैठे थे । वे सभी नौकाएँ बड़ी मजबूत बनी थीं ॥११ ॥
ततः स्वस्तिकविज्ञेयां पाण्डुकम्बलसंवृताम् ।
सनन्दिघोषां कल्याणीं गुहो नावमुपाहरत् ॥ १२ ॥
उन्हींमेंसे एक कल्याणमयी नाव गुह स्वयं लेकर आया, जिसमें श्वेत कालीन बिछे हुए थे तथा उस स्वस्तिक नामवाली नावपर माङ्गलिक शब्द हो रहा था ॥ १२ ॥
तामारुरोह भरतः शत्रुघ्नश्च महाबलः ।
कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या राजयोषितः ॥ १३ ॥
पुरोहितश्च तत् पूर्वं गुरवो ब्राह्मणाश्च ये ।
अनन्तरं राजदारास्तथैव शकटापणाः ॥ १४ ॥
उसपर सबसे पहले पुरोहित, गुरु और ब्राह्मण बैठे । तत्पश्चात् उसपर भरत, महाबली शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी तथा राजा दशरथकी जो अन्य रानियाँ थीं, वे सब सवार हुईं । तदनन्तर राजपरिवारकी दूसरी स्त्रियाँ बैठीं । गाड़ियाँ तथा क्रय - विक्रयकी सामग्रियाँ दूसरी - दूसरी नावोंपर लादी गयीं ॥ १३-१४ ॥
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अयोध्याकाण्डे एकोननवतितमः सर्गः ४७५
आवासमादीपयतां तीर्थं चाप्यवगाहताम् ।
भाण्डानि चाददानानां घोषस्तु दिवमस्पृशत् ॥ १५ ॥
कुछ सैनिक बड़ी - बड़ी मशालें जलाकर अपने खेमोंमें छूटी हुई वस्तुओंको सँभालने लगे । कुछ लोग शीघ्रतापूर्वक घाटपर उतरने लगे तथा बहुत - से सैनिक अपने - अपने सामानको ‘ यह मेरा है, यह मेरा है ' इस ` तरह पहचानकर उठाने लगे । उस समय जो महान् कोलाहल मचा, वह आकाशमें गूँज उठा ॥ १५ ॥
पताकिन्यस्तु ता नावः स्वयं दाशैरधिष्ठिताः ।
वहन्त्यो जनमारूढं तदा सम्पेतुराशुगाः ॥ १६ ॥
उन सभी नावोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं । सबके ऊपर खेनेवाले कई मल्लाह बैठे थे । वे सब
नौकाएँ उस समय चढ़े हुए मनुष्योंको तीव्रगतिसे पार ।
ले जाने लगीं ॥१६ ॥
नारीणामभिपूर्णास्तु काश्चित् काश्चित् तु वाजिनाम् ।
काश्चित् तत्र वहन्ति स्म यानयुग्यं महाधनम् ॥ १७ ॥
कितनी ही नौकाएँ केवल स्त्रियोंसे भरी थीं, कुछ नावोंपर घोड़े थे तथा कुछ नौकाएँ गाड़ियों, उनमें जोते जानेवाले घोड़े, खच्चर, बैल आदि वाहनों तथा बहुमूल्य रत्न आदिको ढो रही थीं ॥ १७ ॥
तास्तु गत्वा परं तीरमवरोप्य च तं जनम् ।
निवृत्ता काण्डचित्राणि क्रियन्ते दाशबन्धुभिः ॥ १८ ॥
वे दूसरे तटपर पहुँचकर वहाँ लोगोंको उतारकर जब लौटीं, उस समय मल्लाहबन्धु जलमें उनकी विचित्र गतियोंका प्रदर्शन करने लगे ॥१८ ॥
सवैजयन्तास्तु गजा गजारोहैः प्रचोदिताः ।
तरन्तः स्म प्रकाशन्ते सपक्षा इव पर्वताः ॥ १ ९ ॥
वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित होनेवाले हाथी
महावतोंसे प्रेरित होकर स्वयं ही नदी पार करने लगे ।
उस समय वे पंखधारी पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥
नावश्चारुरुहुस्त्वन्ये प्लवैस्तेरुस्तथापरे ।
अन्ये कुम्भघटैस्तेरुरन्ये तेरुश्च बाहुभिः ॥ २० ॥
कितने ही मनुष्य नावोंपर बैठे थे और कितने ही बाँस तथा तिनकोंसे बने हुए बेड़ोंपर सवार थे । कुछ लोग बड़े - बड़े कलशों, कुछ छोटे घड़ों और कुछ अपनी बाहुओंसे ही तैरकर पार हो रहे थे ॥२० ॥
सा पुण्या ध्वजिनी गङ्गां दाशैः संतारिता स्वयम् ।
मैत्रे मुहूर्ते प्रययौ प्रयागवनमुत्तमम् ॥ २१ ॥
इस प्रकार मल्लाहोंकी सहायतासे वह सारी पवित्र सेना गङ्गाके पार उतारी गयी । फिर वह स्वयं मैत्र? नामक मुहूर्तमें उत्तम प्रयागवनकी ओर प्रस्थित हो गयी ॥ २१ ॥
आश्वासयित्वा च चमूं महात्मा
निवेशयित्वा च यथोपजोषम् ।
द्रष्टुं भरद्वाजमृषिप्रवर्य-मृत्विक्सदस्यैर्भरतः प्रतस्थे ॥ २२ ॥
वहाँ पहुँचकर महात्मा भरत सेनाको सुखपूर्वक विश्रामकी आज्ञा दे उसे प्रयागवनमें ठहराकर स्वयं ऋत्विजों तथा राजसभाके सदस्योंके साथ ऋषिश्रेष्ठ भरद्वाजका दर्शन करनेके लिये गये ॥ २२ ॥
स ब्राह्मणस्याश्रममभ्युपेत्य महात्मनो देवपुरोहितस्य । ददर्श रम्योटजवृक्षदेशं महद्वनं विप्रवरस्य रम्यम् ॥२३ ॥
देवपुरोहित महात्मा ब्राह्मण भरद्वाज मुनिके आश्रमपर पहुँचकर भरतने उन विप्रशिरोमणिके रमणीय एवं विशाल वनको देखा, जो मनोहर पर्णशालाओं तथा वृक्षावलियोंसे सुशोभित था ॥२३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोननवतितमः सर्गः ॥ ८ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ९ ॥ १. यहाँ ‘ आवासमादीपयताम् ' का अर्थ कुछ टीकाकारोंने यह किया है कि ' वे अपने आवासस्थानमें आग लगाने लगे । ‘ आवश्यक वस्तुओंको लाद लेनेके बाद जो मामूली झोंपड़े और नगण्य वस्तुएँ शेष रह जाती हैं, उनमें छावनी उखाड़ते समय आग लगा देना - यह सेनाका धर्म बताया गया है । इसके दो रहस्य हैं, किसी शत्रुपक्षीय व्यक्तिके लिये अपना कोई निशान न छोड़ना - यह सैनिक नीति है । दूसरा यह है कि इस तरह आग लगाकर जानेसे विजय - लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है — ऐसा उनका परम्परागत विश्वास है । तीसरे मुहूर्तको ‘ मैत्र ’ २. दो - दो घड़ी ( दण्ड ) का एक मुहूर्त होता है । दिनमें कुल पंद्रह मुहूर्त बीतते हैं । इनमेंसे कहते हैं । बृहस्पतिने पंद्रह मुहूर्तों के नाम इस प्रकार गिनाये हैं- रौद्र, सार्प, मैत्र, पैत्र, वासव, आप्य, वैश्व, ब्राह्म, प्राज,
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४७६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे नवतितमः सर्गः भरत और भरद्वाज मुनिकी भेंट एवं बातचीत तथा मुनिका अपने आश्रमपर ही ठहरनेका आदेश देना
भरद्वाजाश्रमं गत्वा क्रोशादेव नरर्षभः ।
जनं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभिः ॥ १ ॥
पद्भ्यामेव तु धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छदः ।
वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोहितम् ॥ २ ॥
धर्मके ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरतने भरद्वाज आश्रमके पास पहुँचकर अपने साथके सब लोगोंको आश्रमसे एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्र - शस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे । केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहितको आगे किये वे मन्त्रियोंके साथ पैदल ही वहाँ गये॥१-२ ॥
ततः संदर्शने तस्य भरद्वाजस्य राघवः ।
मन्त्रिणस्तानवस्थाप्य जगामानुपुरोहितम् ॥ ३ ॥
आश्रममें प्रवेश करके जहाँ दूरसे ही मुनिवर भरद्वाजका दर्शन होने लगा । वहीं उन्होंने उन मन्त्रियोंको
खड़ा कर दिया और पुरोहित वसिष्ठजीको आगे करके ।
वे पीछे - पीछे ऋषिके पास गये ॥ ३ ॥
वसिष्ठमथ दृष्ट्वैव भरद्वाजो महातपाः ।
संचचालासनात् तूर्णं शिष्यानर्घ्यमिति ब्रुवन् ॥ ४ ॥
महर्षि वसिष्ठको देखते ही महातपस्वी भरद्वाज आसनसे उठ खड़े हुए और शिष्योंसे शीघ्रतापूर्वक अर्घ्य ले आनेको कहा ॥ ४ ॥
समागम्य वसिष्ठेन भरतेनाभिवादितः ।
अबुध्यत महातेजाः सुतं दशरथस्य तम् ॥ ५ ॥
फिर वे वसिष्ठसे मिले । तत्पश्चात् भरतने उनके चरणोंमें प्रणाम किया । महातेजस्वी भरद्वाज समझ गये कि ये राजा दशरथके पुत्र हैं ॥५ ॥
ताभ्यामर्घ्यं च पाद्यं च दत्त्वा पश्चात् फलानि च ।
आनुपूर्व्याच्च धर्मज्ञः पप्रच्छ कुशलं कुले ॥ ६ ॥
धर्मज्ञ ऋषिने क्रमशः वसिष्ठ और भरतको अर्घ्य, पाद्य तथा फल आदि निवेदन करके उन दोनोंके कुलका कुशल- समाचार पूछा ॥ ६ ॥
अयोध्यायां बले कोशे मित्रेष्वपि च मन्त्रिषु ।
जानन् दशरथं वृत्तं न राजानमुदाहरत् ॥ ७ ॥
इसके बाद अयोध्या, सेना, खजाना, मित्रवर्ग तथा मन्त्रिमण्डलका हाल पूछा । राजा दशरथकी मृत्युका वृत्तान्त वे जानते थे; इसलिये उनके विषयमें उन्होंने कुछ नहीं पूछा ॥ ७ ॥
वसिष्ठो भरतश्चैनं शरीरेऽग्निषु शिष्येषु वसिष्ठ और भरतने शिष्यवर्ग, पेड़ - पत्ते तथा समाचार पूछा ॥ ८ ॥
तथेति तु प्रतिज्ञाय भरतं प्रत्युवाचेदं महायशस्वी भरद्वाज
पप्रच्छतुरनामयम् ।
वृक्षेषु मृगपक्षिषु ॥ ८ ॥
भी महर्षिके शरीर, अग्निहोत्र, मृग - पक्षी आदिका का कुशल
भरद्वाजो महायशाः ।
राघवस्नेहबन्धनात् ॥ ९ ॥
‘ सब ठीक है ' ऐसा कहकर श्रीरामके प्रति स्नेह होनेके कारण भरतसे इस प्रकार बोले- ॥ ९ ॥
किमिहागमने कार्यं तव राज्यं प्रशासतः ।
एतदाचक्ष्व सर्वं मे न हि मे शुध्यते मनः ॥ १० ॥
' तुम तो राज्य कर रहे हो न? तुम्हें यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ गयी? यह सब मुझे बताओ, क्योंकि मेरा मन तुम्हारी ओरसे शुद्ध नहीं हो रहा है— मेरा विश्वास तुमपर नहीं जमता है ॥ १० ॥
सुषुवे यममित्रघ्नं कौसल्याऽऽनन्दवर्धनम् ।
भ्रात्रा सह सभार्यौ यश्चिरं प्रव्राजितो वनम् ॥ ११ ॥
नियुक्तः स्त्रीनिमित्तेन पित्रा योऽसौ महायशाः ।
वनवासी भवेतीह समाः किल चतुर्दश ॥ १२ ॥
कच्चिन्न तस्यापापस्य पापं कर्तुमिहेच्छसि ।
अकण्टकं भोक्तुमना राज्यं तस्यानुजस्य च ॥ १३ ॥
' जो शत्रुओंका नाश करनेवाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्रको कौसल्याने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिताने स्त्रीके कारण जिस महायशस्वी पुत्रको चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेकी आज्ञा देकर उसे भाई और पत्नीके साथ ईश, ऐन्द्र, ऐन्द्राग्र, नैर्ऋत, वारुणार्यमण तथा भगी । जैसा कि वचन है— रौद्रः सार्पस्तथा मैत्रः पैत्रो वासव एव च । आप्यो वैश्वस्तथा ब्राह्यः प्राजेशैन्द्रास्तथैव च ॥ ऐन्द्राग्नो नैर्ऋतश्चैव वारुणार्यमणो भगी । एतेऽह्नि क्रमशो ज्ञेया मुहूर्ता दश पश्च च ॥
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अयोध्याकाण्डे नवतितमः सर्गः ४७७ दीर्घकालके लिये वनमें भेज दिया है, उस निरपराध । श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मणका तुम अकण्टक राज्य भोगनेकी इच्छासे कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो? ' ॥ ११ – १३ ॥
एवमुक्तो भरद्वाजं भरतः प्रत्युवाच ह ।
पर्यश्रुनयनो दुःखाद् वाचा संसज्जमानया ॥ १४ ॥
भरद्वाजजीके ऐसा कहनेपर दुःखके कारण भरतकी आँखें डबडबा आयीं । वे लड़खड़ाती हुई वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले - ॥१४ ॥
हतोऽस्मि यदि मामेवं भगवानपि मन्यते ।
मत्तो न दोषमाशङ्के मैवं मामनुशाधि हि ॥ १५ ॥
' भगवन्! यदि आप पूज्यपाद महर्षि भी मुझे ऐसा समझते हैं, तब तो मैं हर तरहसे मारा गया । यह मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ कि श्रीरामके वनवासमें मेरी ओरसे कोई अपराध नहीं हुआ है, अतः आप मुझसे ऐसी कठोर बात न कहें ॥ १५ ॥
न चैतदिष्टं माता मे यदवोचन्मदन्तरे ।
नाहमेन तुष्टश्च न तद्वचनमाददे ॥ १६ ॥
' मेरी आड़ लेकर मेरी माताने जो कुछ कहा या किया है, यह मुझे अभीष्ट नहीं है । मैं इससे संतुष्ट नहीं हूँ और न माताकी उस बातको स्वीकार ही करता हूँ ॥
अहं तु तं नरव्याघ्रमुपयातः प्रसादकः ।
प्रतिनेतुमयोध्यायां पादौ चास्याभिवन्दितुम् ॥ १७ ॥
' मैं तो उन पुरुषसिंह श्रीरामको प्रसन्न करके अयोध्यामें लौटा लाने और उनके चरणोंकी वन्दना करनेके लिये जा रहा हूँ ॥ १७ ॥
तं मामेवंगतं मत्वा प्रसादं कर्तुमर्हसि ।
शंस मे भगवन् रामः क्व सम्प्रति महीपतिः ॥ १८ ॥
' इसी उद्देश्यसे मैं यहाँ आया हूँ । ऐसा समझकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये । भगवन्! आप मुझे बताइये कि इस समय महाराज श्रीराम कहाँ हैं? ' ॥ १८ ॥
वसिष्ठादिभिऋत्विग्भिर्याचितो भगवांस्ततः ।
उवाच तं भरद्वाजः प्रसादाद् भरतं वचः ॥ १ ९ ॥
इसके बाद वसिष्ठ आदि ऋत्विजोंने भी यह प्रार्थना की कि भरतका कोई अपराध नहीं है । आप इनपर प्रसन्न हों । तब भगवान् भरद्वाजने प्रसन्न होकर भरतसे कहा- ॥ १ ९ ॥
त्वय्येतत् पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे ।
गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनां चानुयायिता ॥ २० ॥
' पुरुषसिंह! तुम रघुकुलमें उत्पन्न हुए हो । तुममें गुरुजनोंकी सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुसरणका भाव होना उचित ही है ॥ २० ॥
जाने चैतन्मनःस्थं ते दृढीकरणमस्त्विति ।
अपृच्छं त्वां तवात्यर्थं कीर्तिं समभिवर्धयन् ॥ २१ ॥
' तुम्हारे मनमें जो बात है, उसे मैं जानता हूँ; तथापि मैंने इसलिये पूछा है कि तुम्हारा यह भाव और भी दृढ़ हो जाय तथा तुम्हारी कीर्तिका अधिकाधिक विस्तार हो ॥ २१ ॥
जाने च रामं धर्मज्ञं ससीतं सहलक्ष्मणम् ।
अयं वसति ते भ्राता चित्रकूटे महागिरौ ॥ २२ ॥
' मैं सीता और लक्ष्मणसहित धर्मज्ञ श्रीरामका पता जानता हूँ । ये तुम्हारे भ्राता श्रीरामचन्द्र महापर्वत चित्रकूटपर निवास करते हैं ॥ २२ ॥
श्वस्तु गन्तासि तं देशं वसाद्य सह मन्त्रिभिः ।
एतं मे कुरु सुप्राज्ञ कामं कामार्थकोविद ॥ २३ ॥
' अब कल तुम उस स्थानकी यात्रा करना । आज अपने मन्त्रियोंके साथ इस आश्रममें ही रहो । महाबुद्धिमान् भरत! तुम मेरी इस अभीष्ट वस्तुको देनेमें समर्थ हो, अतः मेरी यह अभिलाषा पूर्ण करो ' ॥ २३ ॥
ततस्तथेत्येवमुदारदर्शनः प्रतीतरूपो भरतोऽब्रवीद् वचः । चकार बुद्धिं च तदाश्रमे तदा निशानिवासाय नराधिपात्मजः ॥ २४ ॥
तब जिनके स्वरूप एवं स्वभावका परिचय मिल गया था, उन उदार दृष्टिवाले भरतने ' तथास्तु ' कहकर मुनिकी आज्ञा शिरोधार्य की तथा उन राजकुमारने उस समय रातको उस आश्रममें ही निवास करनेका विचार किया ॥ २४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवतितमः सर्गः ॥ ९ ० ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ० ॥
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४७८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे एकनवतितमः सर्गः भरद्वाज मुनिके द्वारा सेनासहित भरतका दिव्य सत्कार
कृतबुद्धिं निवासाय तत्रैव स मुनिस्तदा ।
भरतं केकयीपुत्रमातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ॥ १ ॥
जब भरतने उस आश्रममें ही निवासका दृढ़ निश्चय कर लिया, तब मुनिने कैकेयीकुमार भरतको अपना आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये न्यौता दिया ॥ १ ॥
अब्रवीद् भरतस्त्वेनं नन्विदं भवता कृतम् ।
पाद्यमर्घ्यमथातिथ्यं वने यदुपपद्यते ॥ २ ॥
यह सुनकर भरतने उनसे कहा- ' मुने! वनमें जैसा आतिथ्य सत्कार सम्भव है, वह तो आप पाद्य, अर्घ्य और फल - मूल आदि देकर कर ही चुके ' ॥ २ ॥
अथोवाच भरद्वाजो भरतं प्रहसन्निव ।
जाने त्वां प्रीतिसंयुक्तं तुष्येस्त्वं येन केनचित् ॥ ३ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भरद्वाजजी भरतसे हँसते हुए - से बोले - ' भरत! मैं जानता हूँ, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है; अतः मैं तुम्हें जो कुछ दूँगा, उसीसे तुम संतुष्ट हो जाओगे ॥ ३ ॥
सेनायास्तु तवैवास्याः कर्तुमिच्छामि भोजनम् ।
मम प्रीतिर्यथारूपा त्वमर्हो मनुजर्षभ ॥ ४ ॥
' किंतु इस समय मैं तुम्हारी सेनाको भोजन कराना चाहता हूँ । नरश्रेष्ठ! इससे मुझे प्रसन्नता होगी और जिस तरह मुझे प्रसन्नता हो, वैसा कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिये ॥ ४ ॥
किमर्थं चापि निक्षिप्य दूरे बलमिहागतः ।
कस्मान्नेहोपयातोऽसि सबल: पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥
' पुरुषप्रवर! तुम अपनी सेनाको किसलिये इतनी दूर छोड़कर यहाँ आये हो, सेनासहित यहाँ क्यों नहीं आये? ' ॥ ५ ॥
भरतः प्रत्युवाचेदं प्राञ्जलिस्तं तपोधनम् ।
न सैन्येनोपयातोऽस्मि भगवन् भगवद्भयात् ॥ ६ ॥
तब भरतने हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनिको उत्तर दिया— ' भगवन्! मैं आपके ही भयसे सेनाके साथ यहाँ नहीं आया ॥ ६ ॥
राज्ञा हि भगवन् नित्यं राजपुत्रेण वा तथा ।
यत्नतः परिहर्तव्या विषयेषु तपस्विनः ॥ ७ ॥
' प्रभो! राजा और राजपुत्रको चाहिये कि वे सभी देशोंमें प्रयत्नपूर्वक तपस्वीजनोंको दूर छोड़कर रहें ( क्योंकि उनके द्वारा उन्हें कष्ट पहुँचनेकी सम्भावना रहती है ) ।
वाजिमुख्या मनुष्याश्च मत्ताश्च वरवारणाः ।
प्रच्छाद्य भगवन् भूमिं महतीमनुयान्ति माम् ॥ ८ ॥
' भगवन्! मेरे साथ बहुत - से अच्छे - अच्छे घोड़े, मनुष्य और मतवाले गजराज हैं, जो बहुत बड़े भूभागको ढककर मेरे पीछे - पीछे चलते हैं ॥ ८ ॥
ते वृक्षानुदकं भूमिमाश्रमेषूटजांस्तथा ।
न हिंस्युरिति तेनाहमेक एवागतस्ततः ॥ ९ ॥
' वे आश्रमके वृक्ष, जल, भूमि और पर्णशालाओंको हानि न पहुँचायें, इसलिये मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ ' ॥
आनीयतामितः सेनेत्याज्ञप्तः परमर्षिणा ।
तथानुचक्रे भरतः सेनायाः समुपागमम् ॥ १० ॥
तदनन्तर उन महर्षिने आज्ञा दी कि ' सेनाको यहीँ ले आओ । ' तब भरतने सेनाको वहीं बुलवा लिया ॥ १० ॥
अग्निशालां प्रविश्याथ पीत्वापः परिमृज्य च ।
आतिथ्यस्य क्रियाहेतोर्विश्वकर्माणमाह्वयत् ॥ ११ ॥
इसके बाद मुनिवर भरद्वाजने अग्निशालामें प्रवेश करके जलका आचमन किया और ओठ पोंछकर भरतके आतिथ्य सत्कारके लिये विश्वकर्मा आदिका आवाहन किया ॥ ११ ॥
आह्वये विश्वकर्माणमहं त्वष्टारमेव च ।
आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि तत्र मे संविधीयताम् ॥ १२ ॥
वे बोले - ' मैं विश्वकर्मा त्वष्टा देवताका आवाहन करता हूँ । मेरे मनमें सेनासहित भरतका आतिथ्य-सत्कार करनेकी इच्छा हुई है । इसमें मेरे लिये वे आवश्यक प्रबन्ध करें ॥ १२ ॥
आह्वये लोकपालांस्त्रीन् देवान् शक्रपुरोगमान् ।
आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि तत्र मे संविधीयताम् ॥ १३ ॥
' जिनके अगुआ इन्द्र हैं, उन तीन लोकपालोंका ( अर्थात् इन्द्रसहित यम, वरुण और कुबेर नामक देवताओंका ) मैं आवाहन करता हूँ । इस समय भरतका आतिथ्य सत्कार करना चाहता हूँ, इसमें मेरे लिये वे लोग आवश्यक प्रबन्ध करें ॥ १३ ॥
प्राक्स्त्रोतसश्च या नद्यस्तिर्यक्त्रोतस एव च ।
पृथिव्यामन्तरिक्षे च समायान्त्वद्य सर्वशः ॥ १४ ॥
' पृथिवी और आकाशमें जो पूर्व एवं पश्चिमकी ओर प्रवाहित होनेवाली नदियाँ हैं, उनका भी मैं । आवाहन करता हूँ; वे सब आज यहाँ पधारें ॥ १४ ॥