वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 511–520
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520
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अयोध्याकाण्डे नवनवतितमः सर्गः ४ ९९
दिखायी दिये, जो कुशों और चीरोंद्वारा तैयार करके ।
कहीं - कहीं वृक्षोंकी शाखाओंमें लटका दिये गये थे ॥ ६ ॥
ददर्श च वने तस्मिन् महतः संचयान् कृतान् ।
मृगाणां महिषाणां च करीषैः शीतकारणात् ॥ ७ ॥
उस वनमें शीत - निवारणके लिये मृगोंकी लेंडी और भैंसोंके सूखे हुए गोबरके ढेर एकत्र करके रखे गये थे, जिन्हें भरतने अपनी आँखों देखा ॥ ७ ॥
गच्छन्नेव महाबाहुर्द्युतिमान् भरतस्तदा ।
शत्रुघ्नं चाब्रवीद् हृष्टस्तानमात्यांश्च सर्वशः ॥ ८ ॥
उस समय चलते - चलते ही परम कान्तिमान् महाबाहु भरतने शत्रुघ्न तथा सम्पूर्ण मन्त्रियोंसे अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा- ॥ ८ ॥
मन्ये प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत् ।
नातिदूरे हि मन्येऽहं नदीं मन्दाकिनीमितः ॥ ९ ॥
' जान पड़ता है कि महर्षि भरद्वाजने जिस स्थानका पता बताया था, वहाँ हमलोग आ गये हैं । मैं समझता हूँ मन्दाकिनी नदी यहाँसे अधिक दूर नहीं है ॥ ९ ॥
उच्चैर्बद्धानि चीराणि लक्ष्मणेन भवेदयम् ।
अभिज्ञानकृतः पन्था विकाले गन्तुमिच्छता ॥ १० ॥
' वृक्षोंमें ऊँचे बँधे हुए ये चीर दिखायी दे रहे हैं । अतः समय - बेसमय जल आदि लानेके निमित्त बाहर जानेकी इच्छावाले लक्ष्मणने जिसकी पहचानके लिये यह चिह्न बनाया है, वह आश्रमको जानेवाला मार्ग यही हो सकता है ॥ १० ॥
इतश्चोदात्तदन्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम् ।
शैलपार्श्वे परिक्रान्तमन्योन्यमभिगर्जताम् ॥ ११ ॥
' इधरसे बड़े - बड़े दाँतवाले वेगशाली हाथी निकलकर एक - दूसरेके प्रति गर्जना करते हुए इस पर्वतके पार्श्वभागमें चक्कर लगाते रहते हैं ( अतः उधर जानेसे रोकनेके लिये लक्ष्मणने ये चिह्न बनाये होंगे ) ॥ ११ ॥
यमेवाधातुमिच्छन्ति तापसाः सततं वने ।
तस्यासौ दृश्यते धूमः संकुलः कृष्णवर्त्मनः ॥ १२ ॥
' वनमें तपस्वी मुनि सदा जिनका आधान करना चाहते हैं, उन अग्निदेवका यह अति सघन धूम दृष्टिगोचर हो रहा है ॥१२ ॥
अत्राहं पुरुषव्याघ्रं गुरुसत्कारकारिणम् ।
आर्यं द्रक्ष्यामि संहृष्टं महर्षिमिव राघवम् ॥ १३ ॥
' यहाँ मैं गुरुजनोंका सत्कार करनेवाले पुरुषसिंह आर्य रघुनन्दनका सदा आनन्दमग्न रहनेवाले महर्षिकी भाँति दर्शन करूँगा ' ॥ १३ ॥
अथ गत्वा मुहूर्तं तु चित्रकूटं स राघवः ।
मन्दाकिनीमनु प्राप्तस्तं जनं चेदमब्रवीत् ॥ १४ ॥
तदनन्तर रघुकुलभूषण भरत दो ही घड़ी में मन्दाकिनीके तटपर विराजमान चित्रकूटके पास जा पहुँचे और अपने साथवाले लोगोंसे इस प्रकार बोले— ॥
जगत्यां पुरुषव्याघ्र आस्ते वीरासने रतः ।
जनेन्द्रो निर्जनं प्राप्य धिङ्मे जन्म सजीवितम् ॥ १५ ॥
' अहो! मेरे ही कारण पुरुषसिंह महाराज श्रीरामचन्द्र इस निर्जन वनमें आकर खुली पृथ्वी ऊपर वीरासनसे बैठते हैं; अतः मेरे जन्म और जीवनको धिक्कार है ॥ १५ ॥
मत्कृते व्यसनं प्राप्तो लोकनाथो महाद्युतिः ।
सर्वान् कामान् परित्यज्य वने वसति राघवः ॥ १६ ॥
' मेरे ही कारण महातेजस्वी लोकनाथ रघुनाथ भारी संकटमें पड़कर समस्त कामनाओंका परित्याग करके वनमें निवास करते हैं ॥ १६ ॥
इति लोकसमाक्रुष्टः पादेष्वद्य प्रसादयन् ।
रामं तस्य पतिष्यामि सीताया लक्ष्मणस्य च ॥ १७ ॥
' इसलिये मैं सब लोगोंके द्वारा निन्दित हूँ, अतः मेरे जन्मको धिक्कार है! आज मैं श्रीरामको प्रसन्न करनेके लिये उनके चरणोंमें गिर जाऊँगा । सीता और लक्ष्मणके भी पैरों पहूँगा ' ॥ १७ ॥
एवं स विलपंस्तस्मिन् वने दशरथात्मजः ।
ददर्श महतीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम् ॥ १८ ॥
इस तरह विलाप करते हुए दशरथकुमार भरतने उस वनमें एक बड़ी पर्णशाला देखी, जो परम पवित्र और मनोरम थी ॥ १८ ॥
सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम् ।
विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ॥ १ ९ ॥
वह शाल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षोंके बहुत - से पत्तोंद्वारा छायी हुई थी; अतः यज्ञशालामें जिसपर कोमल कुश बिछाये गये हों, उस लंबी - चौड़ी । वेदीके समान शोभा पा रही थी ॥१ ९ ॥
शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकैर्भारसाधनैः ।
रुक्मपृष्ठैर्महासारैः शोभितां शत्रुबाधकैः ॥ २० ॥
वहाँ इन्द्रधनुषके समान बहुत - से धनुष रखे गये थे, जो गुरुतर कार्य - साधनमें समर्थ थे । जिनके पृष्ठभाग सोनेसे मढ़े गये थे और जो बहुत ही प्रबल तथा शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले थे । उनसे उस पर्णकुटीकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २० ॥
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५०० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
अर्करश्मिप्रतीकाशैर्घोरैस्तूणगतैः शरैः ।
शोभितां दीप्तवदनैः सर्पैर्भोगवतीमिव ॥ २१ ॥
वहाँ तरकसोंमें बहुत - से बाण भरे थे, जो सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले और भयङ्कर थे । उन बाणोंसे वह पर्णशाला उसी प्रकार सुशोभित होती थी, जैसे दीप्तिमान् मुखवाले सर्पोंसे भोगवती पुरी शोभित होती है ॥ २१ ॥
महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम् ।
रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम् ॥ २२ ॥
सोनेकी म्यानोंमें रखी हुई दो तलवारें और स्वर्णमय बिन्दुओंसे विभूषित दो विचित्र ढालें भी उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रही थीं ॥ २२ ॥
गोधाङ्गलित्रैरासक्तैश्चित्रकाञ्चनभूषितैः अरिसंघैरनाधृष्यां मृगैः सिंहगुहामिव ॥ २३ ॥
वहाँ गोहके चमड़ेके बने हुए बहुत - से सुवर्णजटित दस्ताने भी टँगे हुए थे । जैसे मृग सिंहकी गुफापर आक्रमण नहीं कर सकते, उसी प्रकार वह पर्णशाला शत्रुसमूहोंके लिये अगम्य एवं अजेय थी ॥ २३ ॥
प्रागुदक्प्रवणां वेदिं विशालां दीप्तपावकाम् ।
ददर्श भरतस्तत्र पुण्यां रामनिवेशने ॥ २४ ॥
श्रीरामके उस निवासस्थानमें भरतने एक पवित्र एवं विशाल वेदी भी देखी, जो ईशानकोणकी ओर कुछ नीची थी । उसपर अग्नि प्रज्वलित हो रही थी ॥ २४ ॥
निरीक्ष्य स मुहूर्तं तु ददर्श भरतो गुरुम् ।
उजे राममासीनं जटामण्डलधारिणम् ॥ २५ ॥
कृष्णाजिनधरं तं तु चीरवल्कलवाससम् ।
ददर्श राममासीनमभितः पावकोपमम् ॥ २६ ॥
पर्णशालाकी ओर थोड़ी देरतक देखकर भरतने कुटियामें बैठे हुए अपने पूजनीय भ्राता श्रीरामको देखा, जो सिरपर जटामण्डल धारण किये हुए थे । उन्होंने अपने अङ्गोंमें कृष्णमृगचर्म तथा चीर एवं वल्कल वस्त्र धारण कर रखे थे । भरतको दिखायी दिया कि श्रीराम पास ही बैठे हैं और प्रज्वलित अग्निके समान अपनी दिव्य प्रभा फैला रहे हैं ॥ २५-२६ ॥
सिंहस्कन्धं महाबाहुं पुण्डरीकनिभेक्षणम् ।
पृथिव्याः सागरान्ताया भर्तारं धर्मचारिणम् ॥ २७ ॥
उपविष्टं महाबाहुं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ।
स्थण्डिले दर्भसंस्तीर्णे सीतया लक्ष्मणेन च ॥ २८ ॥
समुद्रपर्यन्त पृथ्वीके स्वामी, धर्मात्मा, महाबाहु श्रीराम सनातन ब्रह्माकी भाँति कुश बिछी हुई वेदीपर बैठे थे । उनके कंधे सिंहके समान, भुजाएँ बड़ी - बड़ी और नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान थे । उस वेदीपर वे सीता और लक्ष्मणके साथ विराजमान थे ॥ २७-२८ ॥
तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् शोकमोहपरिप्लुतः ।
अभ्यधावत धर्मात्मा भरतः केकयीसुतः ॥२ ९ ॥
उन्हें इस अवस्थामें देख धर्मात्मा श्रीमान् कैकेयीकुमार भरत शोक और मोहमें डूब गये तथा बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े ॥२ ९ ॥
दृष्ट्वैव विललापार्तो बाष्पसंदिग्धया गिरा ।
अशक्नुवन् वारयितुं धैर्याद् वचनमब्रुवन् ॥३० ॥
भाईकी ओर दृष्टि पड़ते ही भरत आर्तभावसे विलाप करने लगे । वे अपने शोकके आवेगको धैर्यसे रोक न सके और आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले - ॥३० ॥
यः संसदि प्रकृतिभिर्भवेद् युक्त उपासितुम् ।
वन्यैर्मृगैरुपासीनः सोऽयमास्ते ममाग्रजः ॥ ३१ ॥
' हाय! जो राजसभामें बैठकर प्रजा और मन्त्रिवर्गके द्वारा सेवा तथा सम्मान पानेके योग्य हैं, वे ही ये मेरे बड़े भ्राता श्रीराम यहाँ जंगली पशुओंसे घिरे हुए बैठे हैं ।
वासोभिर्बहुसाहस्त्रैर्यो महात्मा पुरोचितः ।
मृगाजिने सोऽयमिह प्रवस्ते धर्ममाचरन् ॥ ३२ ॥
' जो महात्मा पहले कई सहस्र वस्त्रोंका उपयोग करते थे, वे अब धर्माचरण करते हुए यहाँ केवल दो मृगचर्म धारण करते हैं ॥ ३२ ॥
अधारयद् यो विविधाश्चित्राः सुमनसः सदा ।
सोऽयं जटाभारमिमं सहते राघवः कथम् ॥ ३३ ॥
' जो सदा नाना प्रकारके विचित्र फूलोंको अपने सिरपर धारण करते थे, वे ही ये श्रीरघुनाथजी इस समय इस जटाभारको कैसे सहन करते हैं? ॥ ३३ ॥
यस्य यज्ञैर्यथादिष्टैर्युक्तो धर्मस्य संचयः ।
शरीरक्लेशसम्भूतं स धर्मं परिमार्गते ॥ ३४ ॥
‘ जिनके लिये शास्त्रोक्त यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा धर्मका संग्रह करना उचित है, वे इस समय शरीरको कष्ट देनेसे प्राप्त होनेवाले धर्मका अनुसंधान कर रहे हैं ॥ ३४ ॥
चन्दन महार्हेण यस्याङ्गमुपसेवितम् ।
मलेन तस्याङ्गमिदं कथमार्यस्य सेव्यते ॥ ३५ ॥
' जिनके अङ्गोंकी बहुमूल्य चन्दनसे सेवा होती थी, उन्हीं मेरे पूज्य भ्राताका यह शरीर कैसे मलसे सेवित हो रहा है ॥ ३५ ॥
मन्निमित्तमिदं दुःखं प्राप्तो रामः सुखोचितः ।
धिग्जीवितं नृशंसस्य मम लोकविगर्हितम् ॥ ३६ ॥
' हाय! जो सर्वथा सुख भोगनेके योग्य हैं, वे
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अयोध्याकाण्डे श्रीराम मेरे ही कारण ऐसे दुःखमें पड़ गये हैं । ओह! । मैं कितना क्रूर हूँ? मेरे इस लोकनिन्दित जीवनको धिक्कार है! ' ॥ ३६ ॥
इत्येवं विलपन् दीनः प्रस्विन्नमुखपङ्कजः ।
पादावप्राप्य रामस्य पपात भरतो रुदन् ॥ ३७ ॥
इस प्रकार विलाप करते - करते भरत अत्यन्त दुःखी हो गये । उनके मुखारविन्दपर पसीनेकी बूँदें दिखायी देने लगीं । वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंतक पहुँचनेके पहले ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥३७ ॥
दुःखाभितप्तो भरतो राजपुत्रो महाबलः ।
उक्त्वाऽऽर्येति सकृद् दीनं पुनर्नोवाच किंचन ॥ ३८ ॥
अत्यन्त दुःखसे संतप्त होकर महाबली राजकुमार
भरतने एक बार दीनवाणीमें ' आर्य ' कहकर पुकारा ।
फिर वे कुछ न बोल सके ॥ ३८ ॥
बाष्पैः पिहितकण्ठश्च प्रेक्ष्य रामं यशस्विनम् ।
आर्येत्येवाभिसंक्रुश्य व्याहर्तुं नाशकत् ततः ॥ ३ ९ ॥
आँसुओंसे उनका गला रुँध गया था । यशस्वी
श्रीरामकी ओर देख वे ' हा! आर्य ' कहकर चीख उठे ।
इससे आगे उनसे कुछ बोला न जा सका ॥ ३ ९ ॥
शततमः सर्गः ५०१
शत्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदन् ।
तावुभौ च समालिङ्गय रामोऽप्यश्रूण्यवर्तयत् ॥ ४० ॥
फिर शत्रुघ्नने भी रोते - रोते श्रीरामके चरणों में प्रणाम
किया । श्रीरामने उन दोनोंको उठाकर छातीसे लगा लिया ।
फिर वे भी नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाने लगे ॥ ४० ॥
ततः सुमन्त्रेण गुहे चैव समय राजसुतावरण्ये । दिवाकरश्चैव निशाकरश्च यथाम्बरे शुक्रबृहस्पतिभ्याम् ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् राजकुमार श्रीराम तथा लक्ष्मण उस वनमें सुमन्त्र और निषादराज गुहसे मिले, मानो आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा, शुक्र और बृहस्पतिसे मिल रहे हों ॥ तान् पार्थिवान् वारणयूथपार्हान् समागतांस्तत्र महत्यरण्ये । वनौकसस्तेऽभिसमीक्ष्य सर्वे त्वश्रूण्यमुञ्चन् प्रविहाय हर्षम् ॥ ४२ ॥
यूथपति गजराजपर बैठकर यात्रा करनेयोग्य उन चारों राजकुमारोंको उस विशाल वनमें आया देख समस्त वनवासी हर्ष छोड़कर शोकके आँसू बहाने लगे ॥ ४२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवनवतितमः सर्गः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९९ ॥
शततमः श्रीरामका भरतको कुशल प्रश्नके
जटिलं चीरवसनं प्राञ्जलिं पतितं भुवि ।
ददर्श राम्रो दुर्दर्श युगान्ते भास्करं यथा ॥ १ ॥
कथंचिदभिविज्ञाय विवर्णवदनं कृशम् ।
भ्रातरं भरतं रामः परिजग्राह पाणिना ॥ २ ॥
आघ्राय रामस्तं मूर्ध्नि परिष्वज्य च राघवम् ।
अङ्के भरतमारोप्य पर्यपृच्छत सादरम् ॥ ३ ॥
जटा और चीर - वस्त्र धारण किये भरत हाथ जोड़कर पृथ्वीपर पड़े थे, मानो प्रलयकालमें सूर्यदेव धरतीपर गिर गये हों । उनको उस अवस्थामें देखना किसी भी स्नेही सुहृद्द्के लिये अत्यन्त कठिन था । श्रीरामने उन्हें देखा और जैसे - तैसे किसी तरह पहचाना । उनका मुख उदास हो गया था । वे बहुत दुर्बल हो गये थे । श्रीरामने भाई भरतको अपने हाथसे पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया । इसके बाद रघुकुलभूषण भरतको गोदमें बिठाकर । सर्गः बहाने राजनीतिका उपदेश करना श्रीरामने बड़े आदरसे पूछा- ॥१-३ ॥
क्व नु तेऽभूत् पिता तात यदरण्यं त्वमागतः ।
न हि त्वं जीवतस्तस्य वनमागन्तुमर्हसि ॥ ४ ॥
' तात! पिताजी कहाँ थे कि तुम इस वनमें आये हो? उनके जीते - जी तो तुम वनमें नहीं आ सकते थे ॥
चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम् ।
दुष्प्रतीकमरण्येऽस्मिन् किं तात वनमागतः ॥ ५ ॥
' मैं दीर्घकालके बाद दूरसे ( नानाके घरसे ) आये हुए भरतको आज इस वनमें देख रहा हूँ; परंतु इनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है । तात! तुम क्यों वनमें आये हो? ॥ ५ ॥
कच्चिन्नु धरते तात राजा यत् त्वमिहागतः ।
कच्चिन्न दीनः सहसा राजा लोकान्तरं गतः ॥ ६ ॥
' भाई! महाराज जीवित हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे अत्यन्त दुःखी होकर सहसा परलोकवासी हो
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५०२ ' श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे गये हों और इसीलिये तुम्हें स्वयं यहाँ आना पड़ा हो? ॥ ।
कच्चित् सौम्य न ते राज्यं भ्रष्टं बालस्य शाश्वतम् ।
कच्चिच्छुश्रूषसे तात पितुः सत्यपराक्रम ॥ ७ ॥
' सौम्य! तुम अभी बालक हो, इसलिये परम्परासे चला आता हुआ तुम्हारा राज्य नष्ट तो नहीं हो गया? सत्यपराक्रमी तात भरत! तुम पिताजीकी सेवा - शुश्रूषा तो करते हो न? ॥ ७ ॥
कच्चिद् दशरथो राजा कुशली सत्यसंगरः ।
राजसूयाश्वमेधानामाहर्ता धर्मनिश्चितः ॥ ८ ॥
' जो धर्मपर अटल रहनेवाले हैं तथा जिन्होंने राजसूय एवं अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, वे सत्यप्रतिज्ञ महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न? ॥ ८ ॥
स कच्चिद् ब्राह्मणो विद्वान् धर्मनित्यो महाद्युतिः ।
इक्ष्वाकूणामुपाध्यायो यथावत् तात पूज्यते ॥ ९ ॥
' तात! क्या तुम सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले, विद्वान्, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकुकुलके आचार्य महातेजस्वी वसिष्ठजीकी यथावत् पूजा करते हो? ॥९ ॥
तात कच्चिच्च कौसल्या सुमित्रा च प्रजावती ।
सुखिनी कच्चिदार्या च देवी नन्दति कैकयी ॥ १० ॥
' भाई! क्या माता कौसल्या सुखसे हैं? उत्तम संतानवाली सुमित्रा प्रसन्न हैं और आर्या कैकेयी देवी भी आनन्दित हैं? ॥१० ॥
कच्चिद् विनयसम्पन्नः कुलपुत्रो बहुश्रुतः ।
अनसूयुरनुद्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहितः ॥ ११ ॥
' जो उत्तम कुलमें उत्पन्न, विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, किसीके दोष न देखनेवाले तथा शास्त्रोक्त धर्मोपर निरन्तर दृष्टि रखनेवाले हैं, उन पुरोहितजीका तुमने पूर्णतः सत्कार किया है? ॥११ ॥
कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजुः ।
हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा ॥ १२ ॥
' हवनविधिके ज्ञाता, बुद्धिमान् और सरल स्वभाववाले जिन ब्राह्मण देवताको तुमने अग्निहोत्र - कार्यके लिये नियुक्त किया है, वे सदा ठीक समयपर आकर क्या तुम्हें यह सूचित करते हैं कि इस समय अग्निमें आहुति दे दी गयी और अब अमुक समयमें हवन करना है? ॥
कच्चिद् देवान् पितॄन् भृत्यान् गुरून् पितृसमानपि ।
वृद्धांश्च तात वैद्यांश्च ब्राह्मणांश्चाभिमन्यसे ॥ १३ ॥
' तात! क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिताके समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणोंका सम्मान करते हो? ॥ १३ ॥
इष्वस्त्रवरसम्पन्नमर्थशास्त्रविशारदम् सुधन्वानमुपाध्यायं कच्चित् त्वं तात मन्यसे ॥ १४ ॥
' भाई! जो मन्त्ररहित श्रेष्ठ बाणोंके प्रयोग तथा मन्त्रसहित उत्तम अस्त्रोंके प्रयोगके ज्ञानसे सम्पन्न और अर्थशास्त्र ( राजनीति ) के अच्छे पण्डित हैं, उन आचार्य सुधन्वाका क्या तुम समादर करते हो? ॥१४ ॥
कच्चिदात्मसमाः शूराः श्रुतवन्तो जितेन्द्रियाः ।
कुलीनाश्चेङ्गितज्ञाश्च कृतास्ते तात मन्त्रिणः ॥ १५ ॥
' तात! क्या तुमने अपने ही समान शूरवीर, शास्त्रज्ञ, जितेन्द्रिय, कुलीन तथा बाहरी चेष्टाओंसे ही मनकी बात समझ लेनेवाले सुयोग्य व्यक्तियोंको ही मन्त्री बनाया है? ॥१५ ॥
मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव ।
सुसंवृतो मन्त्रिधुरैरमात्यैः शास्त्रकोविदैः ॥ १६ ॥
' रघुनन्दन! अच्छी मन्त्रणा ही राजाओंकी विजयका मूलकारण है । वह भी तभी सफल होती है, जब नीति - शास्त्रनिपुण मन्त्रिशिरोमणि अमात्य उसे सर्वथा गुप्त रखें ॥ १६ ॥
कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित् कालेऽवबुध्यसे ।
कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थनैपुणम् ॥ १७ ॥
' भरत! तुम असमयमें ही निन्द्राके वशीभूत तो नहीं होते? समयपर जाग जाते हो न? रातके पिछले पहरमें अर्थसिद्धिके उपायपर विचार करते हो न? ॥ १७ ॥
कच्चिन्मन्त्रयसे नैकः कच्चिन्न बहुभिः सह ।
कच्चित् ते मन्त्रितो मन्त्रो राष्ट्रं न परिधावति ॥ १८ ॥
' ( कोई भी गुप्त मन्त्रणा दोसे चार कानोंतक ही गुप्त रहती है; छ: कानोंमें जाते ही वह फूट जाती है, अतः मैं पूछता हूँ— ) तुम किसी गूढ विषयपर अकेले ही तो विचार नहीं करते? अथवा बहुत लोगोंके साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुई गुप्त मन्त्रणा फूटकर शत्रुके राज्यतक फैल जाती हो? ॥ १८ ॥
कच्चिदर्थं विनिश्चित्य लघुमूलं महोदयम् ।
क्षिप्रमारभसे कर्म न दीर्घयसि राघव ॥ १ ९ ॥
' रघुनन्दन! जिसका साधन बहुत छोटा और फल बहुत बड़ा हो, ऐसे कार्यका निश्चय करनेके बाद तुम उसे शीघ्र प्रारम्भ कर देते हो न? उसमें विलम्ब तो नहीं करते? ॥ १ ९ ॥
कच्चिन्नु सुकृतान्येव कृतरूपाणि वा पुनः ।
विदुस्ते सर्वकार्याणि न कर्तव्यानि पार्थिवाः ॥ २० ॥
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अयोध्याकाण्डे ' तुम्हारे सब कार्य पूर्ण हो जानेपर अथवा पूरे होनेके समीप पहुँचनेपर ही दूसरे राजाओंको ज्ञात होते हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारे भावी कार्यक्रमको वे पहले ही जान लेते हों? ॥ २० ॥
कच्चिन्न तर्कैर्युक्त्या वा ये चाप्यपरिकीर्तिताः ।
त्वया वा तव वामात्यैर्बुध्यते तात मन्त्रितम् ॥ २१ ॥
' तात! तुम्हारे निश्चित किये हुए विचारोंको तुम्हारे या मन्त्रियोंके प्रकट न करनेपर भी दूसरे लोग तर्क और युक्तियोंके द्वारा जान तो नहीं लेते हैं? ( तथा तुमको और तुम्हारे अमात्योंको दूसरोंके गुप्त विचारोंका पता लगता रहता है न? ) ॥ २१ ॥
कच्चित् सहस्रैर्मूर्खाणामेकमिच्छसि पण्डितम् ।
पण्डितो ह्यर्थकृच्छ्रेषु कुर्यान्निःश्रेयसं महत् ॥ २२ ॥
' क्या तुम सहस्रों मूर्खोके बदले एक पण्डितको ही अपने पास रखनेकी इच्छा रखते हो? क्योंकि विद्वान् पुरुष ही अर्थसंकटके समय महान् कल्याण कर सकता है ॥ २२ ॥
सहस्त्राण्यपि मूर्खाणां यद्युपास्ते महीपतिः ।
अथवाप्ययुतान्येव नास्ति तेषु सहायता ॥ २३ ॥
' यदि राजा हजार या दस हजार मूर्खोको अपने पास रख ले तो भी उनसे अवसरपर कोई अच्छी सहायता नहीं मिलती ॥ २३ ॥
एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः ।
राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् ॥ २४ ॥
' यदि एक मन्त्री भी मेधावी, शूर - वीर, चतुर एवं नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमारको बहुत बड़ी सम्पत्तिकी प्राप्ति करा सकता है ॥ २४ ॥
कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः ।
जघन्याश्च जघन्येषु भृत्यास्ते तात योजिताः ॥ २५ ॥
' तात! तुमने प्रधान व्यक्तियोंको प्रधान, मध्यम श्रेणीके मनुष्योंको मध्यम और छोटी श्रेणीके लोगोंको छोटे ही कामोंमें नियुक्त किया है न? ॥ २५ ॥
अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहान् शुचीन् ।
श्रेष्ठान् श्रेष्ठेषु कच्चित् त्वं नियोजयसि कर्मसु ॥ २६ ॥
' जो घूस न लेते हों अथवा निश्छल हों, बाप-दादोंके समयसे ही काम करते आ रहे हों तथा बाहर-भीतरसे पवित्र एवं श्रेष्ठ हों, ऐसे अमात्योंको ही तुम उत्तम कार्योंमें नियुक्त करते हो न? ॥२६ ॥
कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्वेजिताः प्रजाः ।
राष्ट्रे तवावजानन्ति मन्त्रिणः कैकयीसुत ॥ २७ ॥
शततमः सर्गः ५०३ ' कैकेयीकुमार! तुम्हारे राज्यकी प्रजा कठोर दण्डसे अत्यन्त उद्विग्न होकर तुम्हारे मन्त्रियोंका तिरस्कार तो नहीं करती? ॥ २७ ॥
कच्चित् त्वां नावजानन्ति याजकाः पतितं यथा ।
उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रियः ॥ २८ ॥
' जैसे पवित्र याजक पतित यजमानका तथा स्त्रियाँ कामचारी पुरुषका तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरता पूर्वक अधिक कर लेनेके कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती? ॥ २८ ॥
उपायकुशलं वैद्यं भृत्यसंदूषणे रतम् ।
शूरमैश्वर्यकामं च यो हन्ति न स हन्यते ॥ २ ९ ॥
' जो साम - दाम आदि उपायोंके प्रयोगमें कुशल, राजनीतिशास्त्रका विद्वान्, विश्वासी भृत्योंको फोड़नेमें लगा हुआ, शूर ( मरनेसे न डरनेवाला ) तथा राजाके राज्यको हड़प लेनेकी इच्छा रखनेवाला है — ऐसे पुरुषको जो राजा नहीं मार डालता है, वह स्वयं उसके हाथसे मारा जाता है ॥ २ ९ ॥
कच्चिद् धृष्टश्च शूरश्च धृतिमान् मतिमान् शुचिः ।
कुलीनश्चानुरक्तश्च दक्षः सेनापतिः कृतः ॥ ३० ॥
' क्या तुमने सदा संतुष्ट रहनेवाले, शूर - वीर, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, पवित्र, कुलीन एवं अपनेमें अनुराग रखनेवाले, रणकर्मदक्ष पुरुषको ही सेनापति बनाया है? ॥ ३० ॥
बलवन्तश्च कच्चित् ते मुख्या युद्धविशारदाः ।
दृष्टापदाना विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिताः ॥ ३१ ॥
' तुम्हारे प्रधान - प्रधान योद्धा ( सेनापति ) बलवान्, युद्धकुशल और पराक्रमी तो हैं न? क्या तुमने उनके शौर्यकी परीक्षा कर ली है? तथा क्या वे तुम्हारे द्वारा सत्कारपूर्वक सम्मान पाते रहते हैं? ॥३१ ॥
कच्चिद् बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम् ।
सम्प्राप्तकालं दातव्यं ददासि न विलम्बसे ॥ ३२ ॥
' सैनिकोंको देनेके लिये नियत किया हुआ समुचित वेतन और भत्ता तुम समयपर दे देते हो न? देनेमें विलम्ब तो नहीं करते? ॥३२ ॥
कालातिक्रमणे ह्येव भक्तवेतनयोर्भृताः ।
भर्तुरप्यतिकुप्यन्ति सोऽनर्थः सुमहान् कृतः ॥३३ ॥
' यदि समय बिताकर भत्ता और वेतन दिये जाते हैं तो सैनिक अपने स्वामीपर भी अत्यन्त कुपित हो जाते हैं और इसके कारण बड़ा भारी अनर्थ घटित हो जाता है ॥
कच्चित् सर्वेऽनुरक्तास्त्वां कुलपुत्राः प्रधानतः ।
। कच्चित् प्राणांस्तवार्थेषु संत्यजन्ति समाहिताः ॥ ३४ ॥
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५०४ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' क्या उत्तम कुलमें उत्पन्न मन्त्री आदि समस्त प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे तुम्हारे लिये एकचित्त होकर अपने प्राणोंका त्याग करनेके लिये उद्यत रहते हैं? ॥ ३४ ॥
कच्चिज्जानपदो विद्वान् दक्षिणः प्रतिभानवान् ।
यथोक्तवादी दूतस्ते कृतो भरत पण्डितः ॥ ३५ ॥
' भरत! तुमने जिसे राजदूतके पदपर नियुक्त किया है, वह पुरुष अपने ही देशका निवासी, विद्वान्, कुशल, प्रतिभाशाली और जैसा कहा जाय, वैसी ही बात दूसरेके सामने कहनेवाला और सदसद्विवेकयुक्त है न? ॥ ३५ ॥
कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पञ्च च ।
त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ॥ ३६ ॥
' क्या तुम शत्रुपक्षके अठारह और अपने पक्षके पंद्रह तीर्थोंकी तीन - तीन अज्ञात गुप्तचरोंद्वारा देख - भाल या जाँच - पड़ताल करते रहते हो? ॥३६ ॥
कच्चिद् व्यपास्तानहितान् प्रतियातांश्च सर्वदा ।
दुर्बलाननवज्ञाय वर्त रिपुसूदन ॥ ३७ ॥
' शत्रुसूदन! जिन शत्रुओंको तुमने राज्यसे निकाल दिया है, वे यदि फिर लौटकर आते हैं तो तुम उन्हें दुर्बल समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते? ॥ ३७ ॥
कच्चिन्न लोकायतिकान् ब्राह्मणांस्तात सेवसे ।
अनर्थकुशला ह्येते बालाः पण्डितमानिनः ॥ ३८ ॥
' तात! तुम कभी नास्तिक ब्राह्मणोंका संग तो नहीं करते हो? क्योंकि वे बुद्धिको परमार्थकी ओरसे विचलित करनेमें कुशल होते हैं तथा वास्तवमें अज्ञानी होते हुए भी अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानते हैं ॥ ३८ ॥
धर्मशास्त्रेषु मुख्येषु विद्यमानेषु दुर्बुधाः ।
बुद्धिमान्वीक्षिकीं प्राप्य निरर्थं प्रवदन्ति ते ॥ ३ ९ ॥
' उनका ज्ञान वेदके विरुद्ध होनेके कारण दूषित होता है और वे प्रमाणभूत प्रधान- प्रधान धर्मशास्त्रोंके होते हुए १. शत्रुपक्षके मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनका व्यय करनेवाला ( कोतवाल ), कार्यनिर्माणकर्ता ( शिल्पियोंका परिचालक ), | भी तार्किक बुद्धिका आश्रय लेकर व्यर्थ बकवाद किया करते हैं ॥ ३ ९ ॥
वीरैरध्युषितां पूर्वमस्माकं तात पूर्वकैः ।
सत्यनामां दृढद्वारां हस्त्यश्वरथसंकुलाम् ॥ ४० ॥
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः स्वकर्मनिरतैः सदा ।
जितेन्द्रियैर्महोत्साहैर्वृतामार्यैः सहस्रशः ॥ ४१ ॥
प्रासादैर्विविधाकारैर्वृतां वैद्यजनाकुलाम् ।
कच्चित् समुदितां स्फीतामयोध्यां परिरक्षसे ॥ ४२ ॥
' तात! अयोध्या हमारे वीर पूर्वजोंकी निवासभूमि है; उसका जैसा नाम है, वैसा ही गुण है । उसके दरवाजे सब ओरसे सुदृढ़ हैं । वह हाथी, घोड़े और रथोंसे परिपूर्ण है । अपने - अपने कर्मोंमें लगे हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ सदा निवास करते हैं । वे सब - के - सब महान् उत्साही, जितेन्द्रिय और श्रेष्ठ हैं । नाना प्रकारके राजभवन और मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते हैं । वह नगरी बहुसंख्यक विद्वानोंसे भरी है । ऐसी अभ्युदयशील और समृद्धिशालिनी नगरी अयोध्याकी तुम भलीभाँति रक्षा तो कच्चिच्वैत्यशतैर्जुष्टः देवस्थानैः प्रपाभिश्च प्रहृष्टनरनारीकः सुकृष्टसीमापशुमान् अदेवमातृको रम्यः परित्यक्तो भयैः सर्वैः करते हो न? ॥ ४० – ४२ ॥
सुनिविष्टजनाकुलः ।
तटाकैश्चोपशोभितः ॥ ४३ ॥
समाजोत्सवशोभितः ।
हिंसाभिरभिवर्जितः ॥ ४४ ॥
श्वापदैः परिवर्जितः ।
खनिभिश्चोपशोभितः ॥ ४५ ॥
विवर्जितो नरैः पापैर्मम पूर्वैः सुरक्षितः ।
कच्चिज्जनपदः स्फीतः सुखं वसति राघव ॥ ४६ ॥
' रघुनन्दन भरत! जहाँ नाना प्रकारके अश्वमेध आदि महायज्ञोंके बहुत - से चयन- प्रदेश ( अनुष्ठानस्थल ) शोभा पाते हैं, जिसमें प्रतिष्ठित मनुष्य अधिक संख्या में । निवास करते हैं, अनेकानेक देवस्थान, पौंसले और द्वारपाल, अन्तर्वेशिक ( अन्तःपुरका अध्यक्ष ), कारागाराध्यक्ष, सचिव, प्रदेष्टा ( पहरेदारोंको काम बतानेवाला ), नगराध्यक्ष धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक — ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये । मतान्तरसे ये अठारह तीर्थ इस प्रकार हैं - मन्त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तःपुराध्यक्ष, कारागाराध्यक्ष, धनाध्यक्ष, राजाकी आज्ञासे सेवकोंको काम बतानेवाला, वादी-प्रतिवादीसे मामलेकी पूछताछ करनेवाला, प्राड्विवाक ( वकील ), धर्मासनाधिकारी ( न्यायाधीश ), व्यवहार - निर्णेता, सभ्य, सेनाको जीविका - निर्वाहके लिये धन देनेका अधिकारी ( सेनानायक ) कर्मचारियोंको काम पूरा होनेपर वेतन देनेके लिये राजासे धन लेनेवाला, नगराध्यक्ष, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक, दुष्टोंको दण्ड देनेका अधिकारी तथा जल, पर्वत, वन एवं दुर्गम भूमिकी रक्षा करनेवाला - इनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये । २. उपर्युक्त अठारह तीर्थोंमेंसे आदिके तीनको छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्षके भी सदा परीक्षणीय हैं ।
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अयोध्याकाण्डे तालाब जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जहाँके स्त्री - पुरुष सदा । प्रसन्न रहते हैं, जो सामाजिक उत्सवोंके कारण सदा शोभासम्पन्न दिखायी देता है, जहाँ खेत जोतनेमें समर्थ पशुओंकी अधिकता है, जहाँ किसी प्रकारकी हिंसा नहीं होती, जहाँ खेतीके लिये वर्षाके जलपर निर्भर नहीं रहना पड़ता ( नदियोंके जलसे ही सिंचाई हो जाती है ), जो बहुत ही सुन्दर और हिंसक पशुओंसे रहित है, जहाँ किसी तरहका भय नहीं है, नाना प्रकारकी खानें जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, जहाँ पापी मनुष्योंका सर्वथा अभाव है तथा हमारे पूर्वजोंने जिसकी भलीभाँति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन - धान्यसे सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है न? ॥ ४३–४६ ॥
कच्चित् ते दयिताः सर्वे कृषिगोरक्षजीविनः ।
वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते ॥ ४७ ॥
' तात! कृषि और गोरक्षासे आजीविका चलानेवाले सभी वैश्य तुम्हारे प्रीतिपात्र हैं न? क्योंकि कृषि और व्यापार आदिमें संलग्न रहनेपर ही यह लोक सुखी एवं उन्नतिशील होता है ॥ ४७ ॥
तेषां गुप्तिपरीहारैः कच्चित् ते भरणं कृतम् ।
रक्ष्या हि राज्ञा धर्मेण सर्वे विषयवासिनः ॥ ४८ ॥
' उन वैश्योंको इष्टकी प्राप्ति कराकर और उनके अनिष्टका निवारण करके तुम उन सब लोगोंका भरण-पोषण तो करते हो न? क्योंकि राजाको अपने राज्यमें निवास करनेवाले सब लोगोंका धर्मानुसार पालन करना चाहिये ॥ ४८ ॥
कच्चित्स्त्रियः सान्त्वयसे कच्चित्तास्ते सुरक्षिताः ।
कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद् गुह्यं न भाषसे ॥ ४ ९ ॥
' क्या तुम अपनी स्त्रियोंको संतुष्ट रखते हो? क्या वे तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सुरक्षित रहती हैं? तुम उनपर अधिक विश्वास तो नहीं करते? उन्हें अपनी गुप्त बात तो नहीं कह देते? ॥ ४ ९ ॥
कच्चिन्नागवनं गुप्तं कच्चित् ते सन्ति धेनुकाः ।
कच्चिन्न गणिकाश्चानां कुञ्जराणां च तृप्यसि ॥ ५० ॥
' जहाँ हाथी उत्पन्न होते हैं, वे जंगल तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हैं न? तुम्हारे पास दूध देनेवाली गौएँ तो अधिक संख्यामें हैं न? ( अथवा हाथियोंको फँसानेवाली हथिनियोंकी तो तुम्हारे पास कमी नहीं है? ) तुम्हें हथिनियों, घोड़ों और हाथियोंके संग्रहसे कभी तृप्ति तो नहीं होती? ॥ ५० ॥
कच्चिद् दर्शयसे नित्यं मानुषाणां विभूषितम् ।
उत्थायोत्थाय पूर्वाह्णे राजपुत्र महापथे ॥ ५१ ॥
' राजकुमार! क्या तुम प्रतिदिन पूर्वाह्नकालमें शततमः सर्गः ५०५ वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो प्रधान सड़कपर जा - जाकर नगरवासी मनुष्योंको दर्शन देते हो? ॥ ५१ ॥
कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ताः प्रत्यक्षास्तेऽविशङ्कया ।
सर्वे वा पुनरुत्सृष्टा मध्यमेवात्र कारणम् ॥। ५२ ॥
' काम - काजमें लगे हुए सभी मनुष्य निडर होकर तुम्हारे सामने तो नहीं आते? अथवा वे सब सदा तुमसे दूर तो नहीं रहते? क्योंकि कर्मचारियोंके विषयमें मध्यम स्थितिका अवलम्बन करना ही अर्थसिद्धिका कारण होता है ॥५२ ॥
कच्चिद् दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकैः ।
यन्त्रैश्च प्रतिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरैः ॥ ५३ ॥
' क्या तुम्हारे सभी दुर्ग ( किले ) धन - धान्य, अस्त्र - शस्त्र, जल, यन्त्र ( मशीन ), शिल्पी तथा धनुर्धर सैनिकोंसे भरे - पूरे रहते हैं? ॥ ५३ ॥
आयस्ते विपुलः कच्चित् कच्चिदल्पतरो व्ययः ।
अपात्रेषु न ते कच्चित् कोषो गच्छति राघव ॥ ५४ ॥
' रघुनन्दन! क्या तुम्हारी आय अधिक और व्यय बहुत कम है? तुम्हारे खजानेका धन अपात्रोंके हाथमें तो नहीं चला जाता? ॥ ५४ ॥
देवतार्थे च पित्रर्थे ब्राह्मणाभ्यागतेषु च ।
योधेषु मित्रवर्गेषु कच्चिद् गच्छति ते व्ययः ॥ ५५ ॥
' देवता, पितर, ब्राह्मण, अभ्यागत, योद्धा तथा मित्रोंके लिये ही तो तुम्हारा धन खर्च होता है न? ॥ ५५ ॥
कच्चिदार्योऽपि शुद्धात्मा क्षारितश्चापकर्मणा ।
अदृष्टः शास्त्रकुशलैर्न लोभाद् बध्यते शुचिः ॥ ५६ ॥
' कभी ऐसा तो नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी श्रेष्ठ, निर्दोष और शुद्धात्मा पुरुषपर भी दोष लगा दे तथा शास्त्रज्ञानमें कुशल विद्वानोंद्वारा उसके विषयमें विचार कराये बिना ही लोभवश उसे आर्थिक दण्ड दे दिया जाता हो? ॥ ५६ ॥
गृहीतश्चैव पृष्टश्च काले दृष्टः सकारणः ।
कच्चिन्न मुच्यते चोरो धनलोभान्नरर्षभ ॥ ५७ ॥
' नरश्रेष्ठ! जो चोरीमें पकड़ा गया हो, जिसे किसीने चोरी करते समय देखा हो, पूछताछसे भी जिसके चोर होनेका प्रमाण मिल गया हो तथा जिसके विरुद्ध ( चोरीका माल बरामद होना आदि ) और भी बहुत - से कारण ( सबूत ) हों, ऐसे चोरको भी तुम्हारे राज्यमें धनके लालचसे छोड़ तो नहीं दिया जाता है? ॥ ५७ ॥
व्यसने कच्चिदाढ्यस्य दुर्बलस्य च राघव ।
अर्थं विरागाः पश्यन्ति तवामात्या बहुश्रुताः ॥ ५८ ॥
' रघुकुलभूषण! यदि धनी और गरीबमें कोई विवाद छिड़ा हो और वह राज्यके न्यायालयमें निर्णयके लिये
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५०६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
आया हो तो तुम्हारे बहुज्ञ मन्त्री धन आदिके लोभको ।
छोड़कर उस मामलेपर विचार करते हैं न? ॥ ५८ ॥
यानि मिथ्याभिशस्तानां पतन्त्यश्रूणि राघव ।
तानि पुत्रपशून् घ्नन्ति प्रीत्यर्थमनुशासतः ॥ ५ ९ ॥
' रघुनन्दन! निरपराध होनेपर भी जिन्हें मिथ्या दोष लगाकर दण्ड दिया जाता है, उन मनुष्योंकी आँखोंसे जो आँसू गिरते हैं, वे पक्षपातपूर्ण शासन करनेवाले राजाके पुत्र और पशुओंका नाश कर डालते हैं ॥ ५ ९ ॥
कच्चिद् वृद्धांश्च बालांश्च वैद्यान् मुख्यांश्च राघव ।
दानेन मनसा वाचा त्रिभिरेतैर्बुभूषसे ॥ ६० ॥
' राघव! क्या तुम वृद्ध पुरुषों, बालकों और प्रधान - प्रधान वैद्योंका आन्तरिक अनुराग, मधुर वचन और धनदान – इन तीनोंके द्वारा सम्मान करते हो? ॥ ६० ॥
कच्चिद् गुरूंश्च वृद्धांश्च तापसान् देवतातिथीन् ।
चैत्यांश्च सर्वान् सिद्धार्थान् ब्राह्मणांश्च नमस्यसि ॥ ६१ ॥
' गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, देवताओं, अतिथियों, चैत्य वृक्षों और समस्त पूर्णकाम ब्राह्मणोंको नमस्कार करते हो न? ॥ ६१ ॥
कच्चिदर्थेन वा धर्ममर्थं धर्मेण वा पुनः ।
उभौ वा प्रीतिलोभेन कामेन न विबाधसे ॥ ६२ ॥
' तुम अर्थके द्वारा धर्मको अथवा धर्मके द्वारा अर्थको ह्यनि तो नहीं पहुँचाते? अथवा आसक्ति और लोभरूप कामके द्वारा धर्म और अर्थ दोनोंमें बाधा तो नहीं आने देते? ।
कच्चिदर्थं च कामं च धर्मं च जयतां वर ।
विभज्य काले कालज्ञ सर्वान् वरद सेवसे ॥ ६३ ॥
' विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ, समयोचित कर्तव्यके ज्ञाता तथा दूसरोंको वर देनेमें समर्थ भरत! क्या तुम समयका विभाग करके धर्म, अर्थ और कामका योग्य समयमें सेवन करते हो? ॥ ६३ ॥
कच्चित् ते ब्राह्मणाः शर्म सर्वशास्त्रार्थकोविदाः ।
आशंसन्ते महाप्राज्ञ पौरजानपदैः सह ॥ ६४ ॥
‘ महाप्राज्ञ! सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थको जाननेवाले ब्राह्मण पुरवासी और जनपदवासी मनुष्योंके साथ तुम्हारे कल्याणकी कामना करते हैं न? ॥ ६४ ॥
नास्तिक्यमनृतं क्रोधं प्रमादं दीर्घसूत्रताम् ।
अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पञ्चवृत्तिताम् ॥ ६५ ॥
एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च मन्त्रणम् ।
निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम् ॥ ६६ ॥
मङ्गलाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः ।
कच्चित् त्वं वर्जयस्येतान् राजदोषांश्चतुर्दश ॥ ६७ ॥
' नास्तिकता, असत्य - भाषण, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानी पुरुषोंका संग न करना, आलस्य, नेत्र आदि पाँचों इन्द्रियोंके वशीभूत होना, राजकार्योंके विषयमें अकेले ही विचार करना, प्रयोजनको न समझनेवाले विपरीतदर्शी मूर्खोसे सलाह लेना, निश्चित किये हुए कार्योंका शीघ्र प्रारम्भ न करना, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखकर प्रकट कर देना, माङ्गलिक आदि कार्योंका अनुष्ठान न करना तथा सब शत्रुओंपर एक ही साथ चढ़ाई कर देना- ये राजाके चौदह दोष हैं । तुम इन दोषोंका सदा परित्याग करते हो न? ॥ ६५–६७ ॥
दशपञ्चचतुर्वर्गान् सप्तवर्गं च तत्त्वतः ।
अष्टवर्गं त्रिवर्गं च विद्यास्तिस्त्रश्च राघव ॥६८ ॥
इन्द्रियाणां जयं बुद्ध्वा षाड्गुण्यं दैवमानुषम् ।
कृत्यं विंशतिवर्गं च तथा प्रकृतिमण्डलम् ॥ ६ ९ ॥
यात्रादण्डविधानं च द्वियोनी संधिविग्रहौ ।
कच्चिदेतान् महाप्राज्ञ यथावदनुमन्यसे ॥ ७० ॥
' महाप्राज्ञ भरत! दशवर्ग, १ पञ्चवर्ग, २ चतुर्वर्ग, ३ सप्तवर्ग, ४ अष्टवर्ग, ५ त्रिवर्ग, ६ तीन १. कामसे उत्पन्न होनेवाले दस दोषोंको दशवर्ग कहते है । ये राजाके लिये त्याज्य हैं । मनुजीने उनके नाम इस प्रकार गिनाये हैं — आखेट, जुआ, दिनमें सोना, दूसरोंकी निन्दा करना, स्त्रीमें आसक्त होना, मद्यपान, नाचना, गाना, बाजा बजाना और व्यर्थ घूमना । २. जलदुर्ग, पर्वतदुर्ग, वृक्षदुर्ग, ईरिणदुर्ग और धन्वदुर्ग - ये पाँच प्रकारके दुर्ग पञ्चवर्ग कहलाते हैं । इनमें आरम्भके तीन तो प्रसिद्ध ही हैं । जहाँ किसी प्रकारकी खेती नहीं होती, ऐसे प्रदेशको ईरिण कहते हैं । बालूसे भरी मरुभूमिको धन्व कहते हैं । गर्मीके दिनोंमें वह शत्रुओंके लिये दुर्गम होती है । इन सब दुगका यथासमय उपयोग करके राजाको आत्मरक्षा करनी चाहिये । ३. साम, दान, भेद और दण्ड - इन चार प्रकारकी नीतिको चतुर्वर्ग कहते हैं । ४. राजा, मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना, सेना और मित्रवर्ग - ये परस्पर उपकार करनेवाले राज्यके सात अङ्ग हैं । इन्हींको सप्तवर्ग कहा गया है । ५. चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता - ये क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आठ दोष अष्टवर्ग माने गये हैं । किसी - किसीके मतमें खेतीकी उन्नति करना, व्यापारको बढ़ाना, दुर्ग बनवाना, पुल निर्माण कराना, जंगलसे हाथी पकड़कर मँगवाना, खानोंपर अधिकार प्राप्त करना, अधीन राजाओंसे कर लेना और निर्जन प्रदेशको आबाद करना - ये राजाके लिये उपादेय आठ गुण ही अष्टवर्ग हैं । ६. धर्म, अर्थ और कामको अथवा उत्साह - शक्ति, प्रभुशक्ति तथा मन्त्रशक्तिको त्रिवर्ग
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अयोध्याकाण्डे विद्या, ' बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको जीतना, छः गुण, २ । दैवी और मानुषी बाधाएँ, राजाके नीतिपूर्ण कार्य, विंशतिवर्ग, ५ प्रकृतिमण्डल, ६ यात्रा ( शत्रुपर आक्रमण ), दण्डविधान ( व्यूहरचना ) तथा दो - दो गुणोंकी योनिभूत संधि और विग्रह — इन सबकी ओर तुम यथार्थ रूपसे ध्यान देते हो न? इनमेंसे त्यागनेयोग्य दोषोंको त्यागकर ग्रहण करनेयोग्य गुणोंको ग्रहण करते हो न? ॥ ६८-७० ॥
मन्त्रिभिस्त्वं यथोद्दिष्टं चतुर्भिस्त्रिभिरेव वा ।
कच्चित् समस्तैर्व्यस्तैश्च मन्त्रं मन्त्रयसे बुध ॥ ७१ ॥
' विद्वन्! क्या तुम नीतिशास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चार या तीन मन्त्रियोंके साथ - सबको एकत्र करके अथवा सबसे अलग - अलग मिलकर सलाह करते हो? ॥ ७१ ॥
कच्चित् ते सफला वेदाः कच्चित् ते सफलाः क्रियाः ।
कच्चित् ते सफला दाराः कच्चित् ते सफलं श्रुतम् ॥ ७२ ॥
' क्या तुम वेदोंकी आज्ञाके अनुसार काम । करके उन्हें सफल करते हो? क्या तुम्हारी क्रियाएँ सफल ( उद्देश्यकी सिद्धि करनेवाली ) हैं? क्या तुम्हारी स्त्रियाँ भी सफल ( संतानवती ) हैं? और क्या तुम्हारा शास्त्रज्ञान भी विनय आदि गुणोंका उत्पादक होकर सफल हुआ है?॥ ७२ ॥
कहते हैं । १. त्रयी, वार्ता और दण्डनीति- ये तीन विद्याएँ हैं वार्ताके अन्तर्गत हैं तथा नीतिशास्त्रका नाम दण्डनीति है । शततमः सर्गः ५०७
कच्चिदेषैव ते बुद्धिर्यथोक्ता मम राघव ।
आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थसंहिता ॥ ७३ ॥
' रघुनन्दन! मैंने जो कुछ कहा है, तुम्हारी बुद्धिका भी ऐसा ही निश्चय है न? क्योंकि यह विचार आयु और यशको बढ़ानेवाला तथा धर्म, काम और अर्थकी सिद्धि करनेवाला है ॥ ७३ ॥
यां वृत्तिं वर्तते तातो यां च नः प्रपितामहः ।
तां वृत्तिं वर्तसे कच्चिद् या च सत्पथगा शुभा ॥ ७४ ॥
' हमारे पिताजी जिस वृत्तिका आश्रय लेते हैं, हमारे प्रपितामहोंने जिस आचरणका पालन किया है, सत्पुरुष भी जिसका सेवन करते हैं और जो कल्याणका मूल है, उसीका तुम पालन करते हो न? ॥७४ ॥
कच्चित् स्वादुकृतं भोग्यमेको नाश्नासि राघव ।
कच्चिदाशंसमानेभ्यो मित्रेभ्यः सम्प्रयच्छसि ॥ ७५ ॥
' रघुनन्दन! तुम स्वादिष्ट अन्न अकेले ही तो नहीं खा जाते? उसकी आशा रखनेवाले मित्रोंको भी देते हो न? ॥ ७५ ॥
राजा तु धर्मेण हि पालयित्वा
महीपतिर्दण्डधरः प्रजानाम् ।
अवाप्य कृत्स्नां वसुधां यथाव-दितश्च्युतः स्वर्गमुपैति विद्वान् ॥ ७६ ॥
' इस प्रकार धर्मके अनुसार दण्ड धारण । इनमें तीनों वेदोंको त्रयी कहते हैं । कृषि और गोरक्षा आदि २. संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय - ये छः गुण हैं । इनमें शत्रुसे मेल रखना संधि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बर्तना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है । ३. आग लगना, बाढ़ आना, बीमारी फैलना, अकाल पड़ना और महामारीका प्रकोप होना - ये पाँच दैवी बाधाएँ हैं । राज्यके अधिकारियों, चोरों, शत्रुओं और राजाके प्रिय व्यक्तियोंसे तथा स्वयं राजाके लोभसे जो भय प्राप्त होता है, उसे मानवी बाधा कहते हैं । ४. शत्रु राजाओंके सेवकोंमेंसे जिनको वेतन न मिला हो, जो अपमानित किये गये हों, जो अपने मालिकके किसी बर्तावसे कुपित हों तथा जिन्हें भय दिखाकर डराया गया हो, ऐसे लोगोंको मनचाही वस्तु देकर फोड़ लेना राजाका कृत्य ( नीतिपूर्ण कार्य ) माना गया है । ५. बालक, वृद्ध, दीर्घकालका रोगी जातिच्युत, डरपोक, भीरु मनुष्योंको साथ रखनेवाला, लोभी- लालची लोगोंको आश्रय देनेवाला, मन्त्री, सेनापति आदि प्रकृतियोंको असंतुष्ट रखनेवाला, विषयोंमें आसक्त, चञ्चलचित्त मनुष्योंसे सलाह लेनेवाला, देवता और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला, दैवका मारा हुआ, भाग्यके भरोसे पुरुषार्थ न करनेवाला, दुर्भिक्षसे पीड़ित, सैनिक - कष्टसे युक्त ( सेनारहित ), स्वदेशमें न रहनेवाला, अधिक शत्रुओंवाला, अकाल ( क्रूर ग्रहदशा आदिसे युक्त ) और सत्यधर्मसे रहित — ये बीस प्रकारके राजा संधिके योग्य नहीं माने गये हैं । इन्हींको विंशतिवर्गके नामसे कहा गया है । ६. राज्यके स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना - राज्यके इन सात अङ्गको ही प्रकृतिमण्डल कहते हैं । किसी - किसीके मतमें मन्त्री, राष्ट्र, किला, खजाना और दण्ड - ये पाँच प्रकृतियाँ अलग हैं और बारह राजाओंके समूहको मण्डल कहा है । ७. द्वैधीभाव और समाश्रय – ये इनकी योनिसंधि हैं और यान तथा आसन इनकी योनिविग्रह हैं, अर्थात् प्रथम दो संधिमूलक और अन्तिम दो विग्रहमूलक हैं ।
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५०८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे करनेवाला विद्वान् राजा प्रजाओंका पालन करके | कर लेता है तथा देहत्याग करनेके पश्चात् स्वर्गलोकमें
समूची पृथ्वीको यथावत् रूपसे अपने अधिकारमें । जाता है ' ॥ ७६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे शततमः सर्गः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सौवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १०० ॥
एकाधिकशततमः सर्गः श्रीरामका भरतसे वनमें आगमनका प्रयोजन पूछना, भरतका उनसे राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना और श्रीरामका उसे अस्वीकार कर देना
तं तु रामः समाज्ञाय भ्रातरं गुरुवत्सलम् ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ १ ॥
लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीने अपने गुरुभक्त भाई भरतको अच्छी तरह समझाकर अथवा उन्हें अपनेमें अनुरक्त जानकर उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया - ॥ १ ॥
किमेतदिच्छेयमहं श्रोतुं प्रव्याहृतं त्वया ।
यस्मात् त्वमागतो देशमिमं चीरजटाजिनी ॥ २ ॥
यन्निमित्तमिमं देशं कृष्णाजिनजटाधरः ।
हित्वा राज्यं प्रविष्टस्त्वं तत् सर्वं वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
' भाई! तुम राज्य छोड़कर वल्कल, कृष्णमृगचर्म और जटा धारण करके जो इस देशमें आये हो, इसका क्या कारण है? जिस निमित्तसे इस वनमें तुम्हारा प्रवेश हुआ है, यह मैं तुम्हारे मुँहसे सुनना चाहता हूँ । तुम्हें सब कुछ साफ - साफ बताना चाहिये ' ॥ २-३ ॥
इत्युक्तः केकयीपुत्रः काकुत्स्थेन महात्मना ।
प्रगृह्य बलवद् भूयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ४ ॥
ककुत्स्थवंशी महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर भरतने बलपूर्वक आन्तरिक शोकको दबा पुनः हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा- ॥ ४ ॥
आर्य तातः परित्यज्य कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
गतः स्वर्गं महाबाहुः पुत्रशोकाभिपीडितः ॥ ५ ॥
' आर्य! हमारे महाबाहु पिता अत्यन्त दुष्कर कर्म करके पुत्रशोकसे पीड़ित हो हमें छोड़कर स्वर्गलोकको चले गये ॥५ ॥
स्त्रिया नियुक्तः कैकेय्या मम मात्रा परंतप ।
चकार सा महत्पापमिदमात्मयशोहरम् ॥ ६ ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनन्दन! अपनी स्त्री एवं मेरी माता कैकेयीकी प्रेरणासे ही विवश हो पिताजीने ऐसा कठोर कार्य किया था । मेरी माँने अपने सुयशको नष्ट करनेवाला यह बड़ा भारी पाप किया है ॥ ६ ॥
सा राज्यफलमप्राप्य विधवा शोककर्शिता ।
पतिष्यति महाघोरे नरके जननी मम ॥ ७ ॥
' अतः वह राज्यरूपी फल न गयी । अब मेरी माता शोकसे दुर्बल पड़ेगी ॥ ७ ॥
तस्य मे दासभूतस्य प्रसादं अभिषिञ्चस्व चाद्यैव राज्येन ' अब आप अपने दासस्वरूप कीजिये और इन्द्रकी भाँति आज ही लिये अपना अभिषेक कराइये ॥८ पाकर विधवा हो हो महाघोर नरकमें
कर्तुमर्हसि ।
मघवानिव ॥८ ॥
मुझ भरतपर कृपा राज्य ग्रहण करनेके ॥
इमाः प्रकृतयः सर्वा विधवा मातरश्च याः ।
त्वत्सकाशमनुप्राप्ताः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ९ ॥
' ये सारी प्रकृतियाँ ( प्रजा आदि ) और सभी विधवा माताएँ आपके पास आयी हैं । आप इन सबपर कृपा करें ॥९ ॥
तथानुपूर्व्या युक्तश्च युक्तं चात्मनि मानद ।
राज्यं प्राप्नुहि धर्मेण सकामान् सुहृदः कुरु ॥ १० ॥
' दूसरोंको मान देनेवाले रघुवीर! आप ज्येष्ठ होनेके नाते राज्य - प्राप्तिके क्रमिक अधिकारसे युक्त हैं, न्यायतः आपको ही राज्य मिलना उचित है; अतः आप धर्मानुसार राज्य ग्रहण करें और अपने सुहृदोंको सफल - मनोरथ बनावें ॥ १० ॥
भवत्वविधवा भूमिः समग्रा पतिना त्वया ।
शशिना विमलेनेव शारदी रजनी यथा ॥ ११ ॥
' आप जैसे पतिसे युक्त हो यह सारी वसुधा वैधव्यरहित हो जाय और निर्मल चन्द्रमासे सनाथ हुई शरत्कालकी रात्रिके समान शोभा पाने लगे ॥ ११ ॥
एभिश्च सचिवैः सार्धं शिरसा याचितो मया ।
भ्रातुः शिष्यस्य दासस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ १२ ॥
' मैं इन समस्त सचिवोंके साथ आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप राज्य