वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ — पृष्ठ 931–940
वाल्मीकि रामायण — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940
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किष्किन्धाकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ९ १ ९ उन बड़े - बूढ़े वानरोंका सम्मान क करके उनसे यह अर्थयुक्त बात कही— ॥ १४ ॥
क इदानीं महातेजा लङ्घयिष्यति सागरम् ।
कः करिष्यति सुग्रीवं सत्यसंधमरिंदमम् ॥ १५ ॥
' सज्जनो! तुमलोगोंमें कौन ऐसा महातेजस्वी वीर है जो इस समय समुद्रको लाँघ जायगा और शत्रुदमन सुग्रीवको सत्यप्रतिज्ञ बनायेगा ॥ १५ ॥
को वीरो योजनशतं लङ्घयेत प्लवङ्गमः ।
इमांश्च यूथपान् सर्वान् मोचयेत् को महाभयात् ॥ १६ ॥
' कौन वीर वानर सौ योजन समुद्रको लाँघ सकेगा? और कौन इन समस्त यूथपतियोंको महान् भयसे मुक्त कर देगा? ॥ १६ ॥
कस्य प्रसादाद् दारांश्च पुत्रांश्चैव गृहाणि च ।
इतो निवृत्ताः पश्येम सिद्धार्थाः सुखिनो वयम् ॥ १७ ॥
' किसके प्रसादसे हमलोग सफलमनोरथ एवं सुखी होकर यहाँसे लौटेंगे और घर - द्वार तथा स्त्री -पुत्रोंका मुँह देख सकेंगे ॥ १७ ॥
कस्य प्रसादाद् रामं च लक्ष्मणं च महाबलम् ।
अभिगच्छेम संहृष्टाः सुग्रीवं च वनौकसम् ॥ १८ ॥
' किसके प्रसादसे हमलोग हर्षोत्फुल्ल होकर श्रीराम, महाबली लक्ष्मण तथा वानरवीर सुग्रीवके पास चल सकेंगे ॥ १८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये
। यदि कश्चित् समर्थो वः सागरप्लवने हरिः ।
स ददात्विह नः शीघ्रं पुण्यामभयदक्षिणाम् ॥१ ९ ॥
' यदि तुमलोगोंमेंसे कोई वानरवीर समुद्रको लाँघ जानेमें समर्थ हो तो वह शीघ्र ही हमें यहाँ परम पवित्र अभय दान दे ' ॥ १ ९ ॥
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा न कश्चित् किंचिदब्रवीत् ।
स्तिमितेवाभवत् सर्वा सा तत्र हरिवाहिनी ॥ २० ॥
अङ्गदकी यह बात सुनकर कोई कुछ नहीं बोला ।
वह सारी वानर सेना वहाँ जडवत् स्थिर रही ॥ २० ॥
पुनरेवाङ्गदः प्राह तान् हरीन् हरिसत्तमः ।
सर्वे बलवतां श्रेष्ठा भवन्तो दृढविक्रमाः ।
व्यपदेशकुले जाताः पूजिताश्चाप्यभीक्ष्णशः ॥ २१ ॥
तब वानरश्रेष्ठ अङ्गदने पुनः उन सबसे कहा— ' बलवानोंमें श्रेष्ठ वानरो! तुम सब लोग दृढ़तापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले हो । तुम्हारा जन्म कलङ्करहित उत्तम कुलमें हुआ है । इसके लिये तुम्हारी बारम्बार प्रशंसा हो चुकी है ॥ २१ ॥
नहि वो गमने भङ्गः कदाचित् कस्यचिद् भवेत् ।
ब्रुवध्वं यस्य या शक्तिः प्लवने प्लवगर्षभाः ॥ २२ ॥
श्रेष्ठ वानरो! तुमलोगोंमें कभी किसीकी भी गति कहीं नहीं रुकती । इसलिये समुद्रको लाँघनेमें जिसकी जितनी शक्ति हो, वह उसे बतावे ' ॥ २२ ॥
किष्किन्धाकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
पञ्चषष्टितमः सर्गः बारी - बारीसे वानर - वीरोंके द्वारा अपनी - अपनी गमनशक्तिका वर्णन, जाम्बवान् और अङ्गदकी बातचीत तथा प्रेरित करनेके लिये
अथाङ्गदवचः श्रुत्वा ते सर्वे वानरर्षभाः ।
स्वं स्वं गतौ समुत्साहमूचुस्तत्र यथाक्रमम् ॥ १ ॥
अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर लम्बी छलाँग मारनेके सम्बन्धमें अपने - अपने उत्साहका - शक्तिका क्रमशः परिचय देने लगे ॥ १ ॥
गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ।
मैन्दश्च द्विविदश्चैव सुषेणो जाम्बवांस्तथा ॥ २ ॥
गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान् - इन सबने अपनी - । जाम्बवान्का हनुमान्जीको उनके पास जाना अपनी शक्तिका वर्णन किया ॥२ ॥
आबभाषे गजस्तत्र प्लवेयं दशयोजनम् ।
गवाक्षो योजनान्याह गमिष्यामीति विंशतिम् ॥३ ॥
इनमेंसे गजने कहा- ' मैं दस योजनकी छलाँग मार सकता हूँ । ' गवाक्ष बोले- ' मैं बीस योजनतक चला जाऊँगा ' ॥३ ॥
शरभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह ।
त्रिंशतं तु गमिष्यामि योजनानां प्लवङ्गमाः ॥४ ॥
इसके बाद वहाँ शरभ नामक वानरने उन
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९ २० श्रीमद्वाल्मीकीयरामाय
कपिवरोंसे कहा- ' वानरो! मैं तीस योजनतक एक ।
छलाँगमें चला जाऊँगा ' ॥४ ॥
ऋषभो वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह ।
चत्वारिंशद् गमिष्यामि योजनानां न संशयः ॥ ५ ॥
तदनन्तर कपिवर ॠषभने उन वानरोंसे कहा- हा - ' मैं चालीस योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥
वानरांस्तु महातेजा अब्रवीद् गन्धमादनः ।
योजनानां गमिष्यामि पञ्चाशत्तु न संशयः ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी गन्धमादनने उन वानरोंसे कहा — ' इसमें संदेह नहीं कि मैं पचास योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा ' ॥ ६ ॥
मैन्दस्तु वानरस्तत्र वानरांस्तानुवाच ह ।
योजनानां परं षष्टिमहं प्लवितुमुत्सहे ॥ ७ ॥
इसके बाद वहाँ वानर - वीर मैन्द उन वानरोंसे बोले— ' मैं साठ योजनतक एक छलाँगमें कूद जानेका उत्साह रखता हूँ'॥७ ॥
ततस्तत्र महातेजा द्विविदः प्रत्यभाषत ।
गमिष्यामि न संदेहः सप्ततिं योजनान्यहम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी द्विविद बोले- ' मैं सत्तर योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है ' ॥ ८ ॥
सुषेणस्तु महातेजाः सत्त्ववान् कपिसत्तमः ।
अशीतिं प्रतिजानेऽहं योजनानां पराक्रमे ॥ ९ ॥
इसके बाद धैर्यशाली कपिश्रेष्ठ महातेजस्वी सुषेण बोले — ' मैं एक छलाँगमें असी योजनतक जानेकी प्रतिज्ञा करता हूँ'॥९ ॥
तेषां कथयतां तत्र सर्वांस्ताननुमान्य च ।
ततो वृद्धतमस्तेषां जाम्बवान् प्रत्यभाषत ॥ १० ॥
इस प्रकार कहनेवाले सब वानरोंका सम्मान करके ऋक्षराज जाम्बवान्, जो सबसे बूढ़े थे, बोले - ॥ १० ॥
पूर्वमस्माकमप्यासीत् कश्चिद् गतिपराक्रमः ।
ते वयं वयसः पारमनुप्राप्ताः स्म साम्प्रतम् ॥ ११ ॥
किं तु नैवं गते शक्यमिदं कार्यमुपेक्षितुम् ।
यदर्थं कपिराजश्च रामश्च कृतनिश्चयौ ॥ १२ ॥
साम्प्रतं कालमस्माकं या गतिस्तां निबोधत ।
नवतिं योजनानां तु गमिष्यामि न संशयः ॥ १३ ॥
' पहले युवावस्थामें मेरे अंदर भी दूरतक छलाँग मारनेकी कुछ शक्ति थी । यद्यपि अब मैं उस अवस्थाको पार कर चुका हूँ तो भी जिस कार्यके लिये वानरराज सुग्रीव तथा भगवान् श्रीराम दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, उसकी मेरे द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती । इस समय मेरी जो गति है, उसे आपलोग सुनें । मैं एक छलाँगमें नब्बे योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥
तांश्च सर्वान् हरिश्रेष्ठाञ्जाम्बवानिदमब्रवीत् ।
न खल्वेतावदेवासीद् गमने मे पराक्रमः ॥ १४ ॥
मया वैरोचने यज्ञे प्रभविष्णुः सनातनः ।
प्रदक्षिणीकृतः पूर्वं क्रममाणस्त्रिविक्रमम् ॥ १५ ॥
ऐसा कहकर जाम्बवान् उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंसे पुनः इस प्रकार बोले- ' पूर्वकालमें मेरे अंदर इतनी ही दूरतक चलनेकी शक्ति नहीं थी । पहले राजा बलिके यज्ञमें सर्वव्यापी एवं सबके कारणभूत सनातन भगवान् विष्णु जब तीन पग भूमि नापनेके लिये अपने पैर बढ़ा रहे थे, उस समय मैंने उनके उस विराट् स्वरूपकी थोड़े ही समयमें परिक्रमा कर ली थी ॥ १४-१५ ॥
स इदानीमहं वृद्धः प्लवने मन्दविक्रमः ।
यौवने च तदासीन्मे बलमप्रतिमं परम् ॥ १६ ॥
' इस समय तो मैं बूढ़ा हो गया, अतः छलाँग मारनेकी मेरी शक्ति बहुत कम हो गयी है; किंतु युवावस्थामें मेरे भीतर वह महान् बल था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ॥ १६ ॥
सम्प्रत्येतावदेवाद्य शक्यं मे गमने स्वतः ।
नैतावता च संसिद्धिः कार्यस्यास्य भविष्यति ॥ १७ ॥
' आजकल तो मुझमें स्वतः चलनेकी इतनी ही शक्ति है, परंतु इतनी ही गतिसे समुद्रलङ्घनरूप इस वर्तमान कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती ' ॥ १७ ॥
अथोत्तरमुदारार्थमब्रवीदङ्गदस्तदा 1 अनुमान्य तदा प्राज्ञो जाम्बवन्तं महाकपिः ॥ १८ ॥
तदनन्तर बुद्धिमान् महाकपि अङ्गदने उस समय जाम्बवान्का विशेष आदर करके यह उदारतापूर्ण बात कही - ॥ १८ ॥
अहमेतद् गमिष्यामि योजनानां शतं महत् ।
निवर्तने तु मे शक्तिः स्यान्न वेति न निश्चितम् ॥ १ ९ ॥
' मैं इस महासागरके सौ योजनकी विशाल दूरीको लाँघ जाऊँगा, किंतु उधरसे लौटनेमें मेरी ऐसी ही शक्ति रहेगी या नहीं, यह निश्चितरूपसे नहीं कहा जा सकता ' ॥ १ ९ ॥
तमुवाच हरिश्रेष्ठं जाम्बवान् वाक्यकोविदः ।
ज्ञायते गमने शक्तिस्तव हर्वृक्षसत्तम ॥ २० ॥
तब बातचीतकी कलामें चतुर जाम्बवान्ने | कपिश्रेष्ठ अङ्गदसे कहा- ' रीछों और वानरोंमें श्रेष्ठ
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किष्किन्धाकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ९ २१
युवराज! तुम्हारी गमनशक्तिसे हमलोग भलीभाँति ।
परिचित हैं ॥२० ॥
कामं शतसहस्त्रं वा नह्येष विधिरुच्यते ।
योजनानां भवान् शक्तो गन्तुं प्रतिनिवर्तितुम् ॥ २१ ॥
' भले ही, तुम एक लाख योजनतक चले जाओ, तथापि तुम सबके स्वामी हो, अतः तुम्हें भेजना हमारे लिये उचित नहीं है । तुम लाखों योजन जाने और वहाँसे लौटनेमें समर्थ हो ॥२१ ॥
नहि प्रेषयिता तात स्वामी प्रेष्यः कथंचन ।
भवतायं जनः सर्वः प्रेष्यः प्लवगसत्तम ॥ २२ ॥
‘ किंतु तात! वानरशिरोमणे! जो सबको भेजनेवाला । स्वामी है, वह किसी तरह प्रेष्य ( आज्ञापालक ) नहीं हो सकता । ये सब लोग तुम्हारे सेवक हैं, तुम इन्हींमेंसे किसीको भेजो ॥ २२ ॥
भवान् कलत्रमस्माकं स्वामिभावे व्यवस्थितः ।
स्वामी कलत्रं सैन्यस्य गतिरेषा परंतप ॥ २३ ॥
' तुम कलत्र ( स्त्रीकी भाँति रक्षणीय ) हो, ( जैसे नारी पतिके हृदयकी स्वामिनी होती है, उसी प्रकार ) तुम हमारे स्वामीके पदपर प्रतिष्ठित हो । परंतप! स्वामी सेनाके लिये कलत्र ( स्त्री ) के समान संरक्षणीय होता है । यही लोककी मान्यता है ॥ २३ ॥
अपि वै तस्य कार्यस्य भवान् मूलमरिंदम ।
तस्मात् कलत्रवत् तात प्रतिपाल्यः सदा भवान् ॥ २४ ॥
' शत्रुदमन! तात! तुम्हीं उस कार्यके मूल हो, अतः सदा कलत्रकी भाँति तुम्हारा पालन करना उचित है ॥२४ ॥
मूलमर्थस्य संरक्ष्यमेष कार्यविदां नयः ।
मूले हि सति सिध्यन्ति गुणाः सर्वे फलोदयाः ॥ २५ ॥
' कार्यके मूलकी रक्षा करनी चाहिये । यही कार्यके तत्त्वको जाननेवाले विद्वानोंकी नीति है; क्योंकि मूलके रहनेपर ही सभी गुण सफल सिद्ध होते हैं ॥ २५ ॥
तद् भवानस्य कार्यस्य साधनं सत्यविक्रम ।
वुद्धिविक्रमसम्पन्नो हेतुरत्र परंतप ॥ २६ ॥
' अतः सत्यपराक्रमी शत्रुदमन वीर! तुम्हीं इस कार्यके साधन तथा बुद्धि और पराक्रमसे सम्पन्न हेतु हो ॥ २६ ॥
गुरुश्च गुरुपुत्रश्च त्वं हि नः कपिसत्तम ।
भवन्तमाश्रित्य वयं समर्था ह्यर्थसाधने ॥ २७ ॥
' कपिश्रेष्ठ! तुम्हीं हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो । तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधनमें समर्थ हो सकते हैं ' ॥ २७ ॥
उक्तवाक्यं महाप्राज्ञं जाम्बवन्तं महाकपिः ।
प्रत्युवाचोत्तरं वाक्यं वालिसूनुरथाङ्गदः ॥ २८ ॥
जब परम बुद्धिमान् जाम्बवान् पूर्वोक्त बात कह चुके, तब महाकपि वालिकुमार अङ्गदने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ २८ ॥
यदि नाहं गमिष्यामि नान्यो वानरपुङ्गवः ।
पुनः खल्विदमस्माभिः कार्यं प्रायोपवेशनम् ॥ २ ९ ॥
' यदि मैं नहीं जाऊँगा और दूसरा कोई भी श्रेष्ठ वानर जानेको तैयार न होगा, तब फिर हमलोगोंको निश्चितरूपसे मरणान्त उपवास ही करना चाहिये ॥ २ ९ ॥
नह्यकृत्वा हरिपतेः संदेशं तस्य धीमतः ।
तत्रापि गत्वा प्राणानां न पश्ये परिरक्षणम् ॥ ३० ॥
' बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीवके आदेशका पालन किये बिना यदि हमलोग किष्किन्धाको लौट चलें तो वहाँ जाकर भी हमें अपने प्राणोंकी रक्षाका कोई उपाय नहीं दिखायी देता ॥ ३० ॥
स हि प्रसादे चात्यर्थकोपे च हरिरीश्वरः ।
अतीत्य तस्य संदेशं विनाशो गमने भवेत् ॥३१ ॥
' वे हमपर कृपा करने और अत्यन्त कुपित होकर हमें दण्ड देनेमें भी समर्थ हैं । उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जानेपर हमारा विनाश अवश्यम्भावी है ॥ ३१ ॥
तत्तथा ह्यस्य कार्यस्य न भवत्यन्यथा गतिः ।
तद् भवानेव दृष्टार्थः संचिन्तयितुमर्हति ॥ ३२ ॥
' अतः जिस उपायसे इस सीता दर्शनरूपी कार्यकी सिद्धिमें कोई रुकावट न पड़े, उसका आप ही विचार करें; क्योंकि आपको सब बातोंका अनुभव है ' ॥ ३२ ॥
सोऽङ्गदेन तदा वीरः प्रत्युक्तः प्लवगर्षभः ।
जाम्बवानुत्तमं वाक्यं प्रोवाचेदं ततोऽङ्गदम् ॥ ३३ ॥
उस समय अङ्गदके ऐसा कहनेपर वीर वानर-शिरोमणि जाम्बवान्ने उनसे यह उत्तम बात कही — ॥ ३३ ॥
तस्य ते वीर कार्यस्य न किंचित् परिहास्यते ।
एष संचोदयाम्येनं यः कार्यं साधयिष्यति ॥ ३४ ॥
' वीर! तुम्हारे इस कार्यमें कोई किंचित् भी त्रुटि नहीं आने पायेगी । अब मैं ऐसे वीरको प्रेरित कर रहा हूँ, जो इस कार्यको सिद्ध कर सकेगा'॥३४ ॥
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९ २२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ततः प्रतीतं प्लवतां वरिष्ठ- यूथपति जाम्बवान्ने वानरसेनाके श्रेष्ठ मेकान्तमाश्रित्य सुखोपविष्टम् । हनुमान्जीको ही प्रेरित किया, जो एकान्तमें जाकर संचोदयामास हरिप्रवीरो मौजसे बैठे हुए थे । उन्हें किसी बातकी चिन्ता नहीं हरिप्रवीरं हनुमन्तमेव ॥ ३५ ॥ थी और वे दूरतककी छलाँग मारनेवालोंमें सबसे
ऐसा कहकर वानरों और भालुओंके वीर । श्रेष्ठ थे ॥ ३५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
षट्षष्टितमः सर्गः जाम्बवान्का हनुमान्जीको उनकी उत्पत्तिकथा सुनाकर समुद्रलङ्घनके लिये उत्साहित करना
अनेकशतसाहस्त्रीं विषण्णां हरिवाहिनीम् ।
जाम्बवान् समुदीक्ष्यैवं हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ १ ॥
लाखों वानरोंकी सेनाको इस तरह विषादमें पड़ी देख जाम्बवान्ने हनुमान्जीसे कहा- ॥ १ ॥
वीर वानरलोकस्य सर्वशास्त्रविदां वर ।
तूष्णीमेकान्तमाश्रित्य हनूमन् किं न जल्पसि ॥ २ ॥
' वानरजगत्के वीर तथा सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हनुमान्! तुम एकान्तमें आकर चुपचाप क्यों बैठे हो? कुछ बोलते क्यों नहीं? ॥ २ ॥
हनूमन्हरिराजस्य सुग्रीवस्य समो ह्यसि ॥ रामलक्ष्मणयोश्चापि तेजसा च बलेन च ॥ ३ ॥
' हनूमन्! तुम तो वानरराज सुग्रीवके समान पराक्रमी हो तथा तेज और बलमें श्रीराम और लक्ष्मणके तुल्य हो ॥ ३ ॥
अरिष्टनेमिनः पुत्रो वैनतेयो महाबलः ।
गरुत्मानिव विख्यात उत्तमः सर्वपक्षिणाम् ॥ ४ ॥
' कश्यपजीके महाबली पुत्र और समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ जो विनतानन्दन गरुड़ हैं, उन्हींके समान तुम भी विख्यात शक्तिशाली एवं तीव्रगामी हो ॥ ४ ॥
बहुशो हि मया दृष्टः सागरे स महाबलः ।
भुजङ्गानुद्धरन् पक्षी महाबाहुर्महाबलः ॥ ५ ॥
' महाबली महाबाहु पक्षिराज गरुड़को मैंने समुद्रमें कई बार देखा है, जो बड़े - बड़े सर्पोंको वहाँसे निकाल लाते हैं ॥ ५ ॥
पक्षयोर्यद् बलं तस्य भुजवीर्यबलं तव ।
विक्रमश्चापि वेगश्च न ते तेनापहीयते ॥ ६ ॥
' उनके दोनों पंखोंमें जो बल है, वही बल, वही पराक्रम तुम्हारी इन दोनों भुजाओंमें भी है । इसीलिये तुम्हारा वेग और विक्रम भी उनसे कम नहीं है ॥ ६ ॥
बलं बुद्धिश्च तेजश्च सत्त्वं च हरिपुङ्गव ।
विशिष्टं सर्वभूतेषु किमात्मानं न सज्जसे ॥ ७ ॥
' वानरशिरोमणे! तुम्हारा बल, बुद्धि, तेज और धैर्य भी समस्त प्राणियोंमें सबसे बढ़कर है । फिर तुम अपने - आपको ही समुद्र लाँघनेके लिये क्यों नहीं तैयार करते? ॥ ७ ॥
अप्सराऽप्सरसां श्रेष्ठा विख्याता पुञ्जिकस्थला ।
अञ्जनेति परिख्याता पत्नी केसरिणो हरेः ॥ ८ ॥
विख्याता त्रिषु लोकेषु रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
अभिशापादभूत् तात कपित्वे कामरूपिणी ॥ ९ ॥
दुहिता वानरेन्द्रस्य कुञ्जरस्य महात्मनः । ' ( वीरवर! तुम्हारे प्रादुर्भावकी कथा इस प्रकार है — ) पुञ्जिकस्थला नामसे विख्यात जो अप्सरा है, वह समस्त अप्सराओंमें अग्रगण्य है । तात! एक समय शापवश वह कपियोनिमें अवतीर्ण हुई । उस समय वह वानरराज महामनस्वी कुञ्जरकी पुत्री इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली थी । इस भूतलपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी । वह तीनों लोकोंमें विख्यात थी । उसका नाम अञ्जना था । वह वानरराज केसरीकी पत्नी हुई ॥ ८ - ९ ३ ॥ मानुषं विग्रहं कृत्वा रूपयौवनशालिनी ॥ १० ॥
विचित्रमाल्याभरणा कदाचित् क्षौमधारिणी ।
। अचरत् पर्वतस्याग्रे प्रावृडम्बुदसंनिभे ॥ ११ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ९ २३ ' एक दिनकी बात है, रूप और यौवनसे सुशोभित । होनेवाली अञ्जना मानवी स्त्रीका शरीर धारण करके वर्षाकालके मेघकी भाँति श्याम कान्तिवाले एक पर्वत -शिखरपर विचर रही थी । उसके अङ्गोंपर रेशमी साड़ी शोभा पाती थी । वह फूलोंके विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थी ॥ १०-११ ॥
तस्या वस्त्रं विशालाक्ष्याः पीतं रक्तदशं शुभम् ।
स्थितायाः पर्वतस्याग्रे मारुतोऽपाहरच्छनैः ॥ १२ ॥
' उस विशाललोचना बालाका सुन्दर वस्त्र तो पीले रंगका था, किंतु उसके किनारेका रंग लाल था । वह पर्वतके शिखरपर खड़ी थी । उसी समय वायुदेवताने उसके उस वस्त्रको धीरेसे हर लिया ॥ १२ ॥
स ददर्श ततस्तस्या वृत्तावूरू सुसंहतौ ।
स्तनौ च पीनौ सहितौ सुजातं चारु चाननम् ॥ १३ ॥
' तत्पश्चात् उन्होंने उसकी परस्पर सटी हुई गोल-गोल जाँघों, एक - दूसरेसे लगे हुए पीन उरोजों तथा मनोहर मुखको भी देखा ॥ १३ ॥
तां बलादायतश्रोणीं तनुमध्यां यशस्विनीम् ।
दृष्ट्वैव शुभसर्वाङ्गीं पवनः काममोहितः ॥ १४ ॥
' उसके नितम्ब ऊँचे और विस्तृत थे । कटिभाग बहुत ही पतला था । उसके सारे अङ्ग परम सुन्दर थे । इस प्रकार बलपूर्वक यशस्विनी अञ्जनाके अङ्गोंका अवलोकन करके पवन देवता कामसे मोहित हो गये ।
सतां भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां पर्यष्वजत मारुतः ।
मन्मथाविष्टसर्वाङ्गो गतात्मा तामनिन्दिताम् ॥ १५ ॥
' उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें कामभावका आवेश हो गया । मन अञ्जनामें ही लग गया । उन्होंने उस अनिन्द्य सुन्दरीको अपनी दोनों विशाल भुजाओंमें भरकर हृदयसे लगा लिया ॥ १५ ॥
सा तु तत्रैव सम्भ्रान्ता सुव्रता वाक्यमब्रवीत् ।
एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति ॥ १६ ॥
' अञ्जना उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सती नारी थी । अतः उस अवस्थामें पड़कर वह वहीं घबरा उठी और बोली- ' कौन मेरे इस पातिव्रत्यका नाश करना चाहता है '? ॥ १६ ॥
अञ्जनाया वचः श्रुत्वा मारुतः प्रत्यभाषत ।
न त्वां हिंसामि सुश्रोणि मा भूत् ते मनसो भयम् ॥ १७॥
अञ्जनाकी बात सुनकर पवनदेवने उत्तर दिया - ' सुश्रोणि! मैं तुम्हारे एकपत्नी- व्रतका नाश नहीं कर रहा हूँ । अतः तुम्हारे मनसे यह भय दूर हो जाना चाहिये ॥ १७ ॥
मनसास्मि गतो यत् त्वां परिष्वज्य यशस्विनि ।
वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ॥ १८ ॥
' यशस्विनि! मैंने अव्यक्तरूपसे तुम्हारा आलिङ्गन करके मानसिक संकल्पके द्वारा तुम्हारे साथ समागम किया है । इससे तुम्हें बल - पराक्रमसे सम्पन्न एवं बुद्धिमान् पुत्र प्राप्त होगा ॥ १८ ॥
महासत्त्वो महातेजा महाबलपराक्रमः ।
लङ्घने प्लवने चैव भविष्यति मया समः ॥ १ ९ ॥
' वह महान् धैर्यवान्, महातेजस्वी, महाबली, महापराक्रमी तथा लाँघने और छलाँग मारनेमें मेरे समान होगा ' ॥ १ ९ ॥
एवमुक्ता ततस्तुष्टा जननी ते महाकपे ।
गुहायां त्वां महाबाहो प्रजज्ञे प्लवगर्षभ ॥ २० ॥
' महाकपे! वायुदेवके ऐसा कहनेपर तुम्हारी माता प्रसन्न हो गयीं । महाबाहो! वानरश्रेष्ठ! फिर उन्होंने तुम्हें एक गुफामें जन्म दिया ॥ २० ॥
अभ्युत्थितं ततः सूर्यं बालो दृष्ट्वा महावने ।
फलं चेति जिघृक्षुस्त्वमुत्प्लुत्याभ्युत्पतो दिवम् ॥ २१ ॥
‘ बाल्यावस्थामें एक विशाल वनके भीतर एक दिन उदित हुए सूर्यको देखकर तुमने समझा कि यह भी कोई फल है; अतः उसे लेनेके लिये तुम सहसा आकाशमें उछल पड़े ॥ २१ ॥
शतानि त्रीणि गत्वाथ योजनानां महाकपे ।
तेजसा तस्य निर्धूतो न विषादं गतस्ततः ॥ २२ ॥
' महाकपे! तीन सौ योजन ऊँचे जानेके बाद सूर्यके तेजसे आक्रान्त होनेपर भी तुम्हारे मनमें खेद या चिन्ता नहीं हुई ॥ २२ ॥
त्वामप्युपगतं तूर्णमन्तरिक्षं महाकपे ।
क्षिप्तमिन्द्रेण ते वज्रं कोपाविष्टेन तेजसा ॥ २३ ॥
' कपिप्रवर! अन्तरिक्षमें जाकर जब तुरंत ही तुम सूर्यके पास पहुँच गये, तब इन्द्रने कुपित होकर तुम्हारे ऊपर तेजसे प्रकाशित वज्रका प्रहार किया ॥ २३ ॥
तदा शैलाग्रशिखरे वामो हनुरभज्यत ।
ततो हि नामधेयं ते हनुमानिति कीर्तितम् ॥ २४ ॥
' उस समय उदयगिरिके शिखरपर तुम्हारे हनु
( ठोड़ी ) का बायाँ भाग वज्रकी चोटसे खण्डित हो गया ।
। तभीसे तुम्हारा नाम हनुमान् पड़ गया ॥ २४ ॥
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९ २४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे
ततस्त्वां निहतं दृष्ट्वा वायुर्गन्धवहः स्वयम् ।
त्रैलोक्यं भृशसंक्रुद्धो न ववौ वै प्रभञ्जनः ॥ २५ ॥
' तुमपर प्रहार किया गया है, यह देखकर गन्धवाहक वायुदेवताको बड़ा क्रोध हुआ । उन प्रभञ्जनदेवने तीनों लोकोंमें प्रवाहित होना छोड़ दिया ॥ २५ ॥
सम्भ्रान्ताश्च सुराः सर्वे त्रैलोक्ये क्षुभिते सति ।
प्रसादयन्ति संक्रुद्धं मारुतं भुवनेश्वराः ॥ २६ ॥
' इससे सम्पूर्ण देवता घबरा गये; क्योंकि वायुके अवरुद्ध हो जानेसे तीनों लोकोंमें खलबली मच गयी थी । उस समय समस्त लोकपाल कुपित हुए वायुदेवको मनाने लगे ॥२६ ॥
प्रसादिते च पवने ब्रह्मा तुभ्यं वरं ददौ ।
अशस्त्रवध्यतां तात समरे सत्यविक्रम ॥ २७ ॥
' सत्यपराक्रमी तात! पवनदेवके प्रसन्न होनेपर ब्रह्माजीने तुम्हारे लिये यह वर दिया कि तुम समराङ्गणमें किसी भी अस्त्र - शस्त्र के द्वारा मारे नहीं जा सकोगे ॥ २७ ॥
वज्रस्य च निपातेन विरुजं त्वां समीक्ष्य च ।
सहस्रनेत्रः प्रीतात्मा ददौ ते वरमुत्तमम् ॥ २८ ॥
स्वच्छन्दतश्च मरणं तव स्यादिति वै प्रभो । ' प्रभो! वज्रके प्रहारसे भी तुम्हें पीड़ित न देखकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने तुम्हारे लिये यह उत्तम वर दिया- ' मृत्यु तुम्हारी इच्छाके अधीन होगी — तुम जब चाहोगे, तभी मर सकोगे, अन्यथा नहीं ' ॥ २८३ ॥
स त्वं केसरिणः पुत्रः क्षेत्रजो भीमविक्रमः ॥ २ ९ ॥ मारुतस्यौरसः पुत्रस्तेजसा चापि तत्समः । ' इस प्रकार तुम केसरीके क्षेत्रज पुत्र हो । तुम्हारा पराक्रम शत्रुओंके लिये भयंकर है । तुम वायुदेवके औरस पुत्र हो, इसलिये तेजकी दृष्टिसे भी उन्हींके समान हो ॥ २ ९ ३ ॥ त्वं हि वायुसुतो वत्स प्लवने चापि तत्समः ॥ ३० ॥
वयमद्य गतप्राणा भवानस्मासु साम्प्रतम् ।
दाक्ष्यविक्रमसम्पन्नः कपिराज इवापरः ॥ ३१ ॥
' वत्स! तुम पवनके पुत्र हो, अतः छलाँग मारनेमें भी उन्हींके तुल्य हो । हमारी प्राणशक्ति अब चली गयी । इस समय तुम्हीं हमलोगोंमें दूसरे वानरराजकी भाँति चातुर्य एवं पौरुषसे सम्पन्न हो॥३०-३१ ॥
त्रिविक्रमे मया तात सशैलवनकानना ।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी परिक्रान्ता प्रदक्षिणम् ॥ ३२ ॥
‘ तात! भगवान् वामनने त्रिलोकीको नापनेके लिये जब पैर बढ़ाया था, उस समय मैंने पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीकी इक्कीस बार प्रदक्षिणा की थी ॥ ३२ ॥
तथा चौषधयोऽस्माभिः संचिता देवशासनात् ।
निर्मध्यममृतं याभिस्तदानीं नो महद्बलम् ॥ ३३ ॥
' समुद्र - मन्थनके समय देवताओंकी आज्ञासे हमने उन ओषधियोंका संचय किया था, जिनके द्वारा अमृतको मथकर निकालना था । उन दिनों हममें महान् बल था ॥ ३३ ॥
स इदानीमहं वृद्धः परिहीनपराक्रमः ।
साम्प्रतं कालमस्माकं भवान् सर्वगुणान्वितः ॥ ३४ ॥
' अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूँ । मेरा पराक्रम घट गया है । इस समय हमलोगोंमें तुम्हीं सब प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न हो ॥३४ ॥
तद् विजृम्भस्व विक्रान्त प्लवतामुत्तमो ह्यसि ।
त्वद्वीर्यं द्रष्टुकामा हि सर्वा वानरवाहिनी ॥ ३५ ॥
' अतः पराक्रमी वीर! तुम अपने असीम बलका विस्तार करो । छलाँग मारनेवालोंमें तुम सबसे श्रेष्ठ हो । यह सारी वानरसेना तुम्हारे बल - पराक्रमको देखना चाहती है ॥ ३५ ॥
उत्तिष्ठ हरिशार्दूल लङ्घयस्व महार्णवम् ।
परा हि सर्वभूतानां हनुमन् या गतिस्तव ॥ ३६ ॥
' वानरश्रेष्ठ हनुमान्! उठो और इस महासागरको लाँघ जाओ; क्योंकि तुम्हारी गति सभी प्राणियोंसे बढ़कर है ॥ ३६ ॥
विषण्णा हरयः सर्वे हनुमन् किमुपेक्षसे ।
विक्रमस्व महावेग विष्णुस्त्रीन् विक्रमानिव ॥ ३७ ॥
' हनुमन्! समस्त वानर चिन्तामें पड़े हैं । तुम क्यों इनकी उपेक्षा करते हो? महान् वेगशाली वीर! जैसे भगवान् विष्णुने त्रिलोकीको नापनेके लिये तीन पग बढ़ाये थे, उसी प्रकार तुम भी अपने पैर बढ़ाओ ' ॥ ३७ ॥
ततः कपीनामृषभेण चोदितः प्रतीतवेगः पवनात्मजः कपिः । प्रहर्षयंस्तां हरिवीरवाहिनीं चकार रूपं महदात्मनस्तदा ॥ ३८ ॥
इस प्रकार वानरों और भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान्की
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किष्किन्धाकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ९ २५ प्रेरणा पाकर कपिवर पवनकुमार हनुमान्को अपने | उस सेनाका हर्ष बढ़ाते हुए उस समय अपना विराट्रूप
महान् वेगपर विश्वास हो आया । उन्होंने वानर वीरोंकी । प्रकट किया ॥ ३८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
सप्तषष्टितमः सर्गः हनुमान्जीका समुद्र लाँघनेके लिये उत्साह प्रकट करना, जाम्बवान्के द्वारा उनकी प्रशंसा तथा वेगपूर्वक छलाँग मारनेके लिये
तं दृष्ट्वा जृम्भमाणं ते क्रमितुं शतयोजनम् ।
वेगेनापूर्यमाणं च सहसा वानरोत्तमम् ॥ १ ॥
सहसा शोकमुत्सृज्य प्रहर्षेण समन्विताः ।
विनेदुस्तुष्टुवुश्चापि हनूमन्तं महाबलम् ॥ २ ॥ ।
सौ योजनके समुद्रको लाँघनेके लिये वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको सहसा बढ़ते और वेगसे परिपूर्ण होते देख सब वानर तुरंत शोक छोड़कर अत्यन्त हर्षसे भर गये और महाबली हनुमान्जीकी स्तुति करते हुए जोर - जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १-२ ॥
प्रहृष्टा विस्मिताश्चापि ते वीक्षन्ते समन्ततः ।
त्रिविक्रमं कृतोत्साहं नारायणमिव प्रजाः ॥ ३ ॥
वे उनके चारों ओर खड़े हो प्रसन्न एवं चकित होकर उन्हें इस प्रकार देखने लगे, जैसे उत्साहयुक्त नारायणावतार वामनजीको समस्त प्रजाने देखा था ॥ ३ ॥
संस्तूयमानो हनुमान् व्यवर्धत महाबलः ।
समाविद्धय च लाङ्गूलं हर्षाद् बलमुपेयिवान् ॥ ४ ॥
अपनी प्रशंसा सुनकर महाबली हनुमान्ने शरीरको और भी बढ़ाना आरम्भ किया । साथ ही हर्षके साथ अपनी पूँछको बारम्बार घुमाकर अपने महान् बलका स्मरण किया ॥ ४ ॥
तस्य संस्तूयमानस्य वृद्धैर्वानरपुङ्गवैः ।
तेजसाऽऽपूर्यमाणस्य रूपमासीदनुत्तमम् ॥ ५ ॥
बड़े - बूढ़े वानरशिरोमणियोंके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते और तेजसे परिपूर्ण होते हुए हनुमान्जीका रूप उस समय बड़ा ही उत्तम प्रतीत होता था ॥ ५ ॥
यथा विजृम्भते सिंहो विवृते गिरिगह्वरे ।
मारुतस्यौरसः पुत्रस्तथा सम्प्रति जृम्भते ॥ ६ ॥
जैसे पर्वतकी विस्तृत कन्दरामें सिंह अँगड़ाई लेता है, उसी प्रकार वायुदेवताके औरस पुत्रने उस समय अपने शरीरको अँगड़ाई ले - लेकर बढ़ाया ॥ ६ ॥
हनुमान्जीका महेन्द्र पर्वतपर चढ़ना
अशोभत मुखं तस्य जृम्भमाणस्य धीमतः ।
अम्बरीषोपमं दीप्तं विधूम इव पावकः ॥ ७ ॥
जँभाई लेते समय बुद्धिमान् हनुमान्जीका दीप्तिमान् मुख जलते हुए भाड़ तथा धूमरहित अनिके समान शोभा पा रहा था ॥७ ॥
हरीणामुत्थितो मध्यात् सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।
अभिवाद्य हरीन् वृद्धान् हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ८ ॥
वे वानरोंके बीचसे उठकर खड़े हो गये । उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया । उस अवस्थामें हनुमान्जीने बड़े - बूढ़े वानरोंको प्रणाम करके इस प्रकार कहा- ॥ ८ ॥
आरुजन् पर्वताग्राणि हुताशनसखोऽनिलः ।
बलवानप्रमेयश्च वायुराकाशगोचरः ॥ ९ ॥
' आकाशमें विचरनेवाले वायुदेवता बड़े बलवान् हैं । उनकी शक्तिकी कोई सीमा नहीं है । वे अग्निदेवके सखा हैं और अपने वेगसे बड़े - बड़े पर्वत - शिखरोंको भी तोड़ डालते हैं ॥ ९ ॥
तस्याहं शीघ्रवेगस्य शीघ्रगस्य महात्मनः ।
मारुतस्यौरसः पुत्रः प्लवनेनास्मि तत्समः ॥१० ॥
' अत्यन्त शीघ्र वेगसे चलनेवाले उन शीघ्रगामी महात्मा वायुका मैं औरस पुत्र हूँ और छलाँग मारनेमें उन्हींके समान हूँ ॥ १० ॥
उत्सहेयं हि विस्तीर्णमालिखन्तमिवाम्बरम् ।
मेरुं गिरिमसङ्गेन परिगन्तुं सहस्रशः ॥ ११ ॥
' कई सहस्र योजनोंतक फैले हुए मेरुगिरिकी, जो आकाशके बहुत बड़े भागको ढके हुए है और उसमें रेखा खींचता - सा जान पड़ता है, मैं बिना विश्राम लिये सहस्रों बार परिक्रमा कर सकता हूँ ॥११ ॥
बाहुवेगप्रणुन्नेन सागरेणाहमुत्सहे ।
समाप्लावयितुं लोकं सपर्वतनदीह्रदम् ॥ १२ ॥
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९ २६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' अपनी भुजाओंके वेगसे समुद्रको विक्षुब्ध करके । उसके जलसे मैं पर्वत, नदी और जलाशयोंसहित सम्पूर्ण जगत्को आप्लावित कर सकता हूँ ॥ १२ ॥
ममोरुजङ्घावेगेन भविष्यति समुत्थितः ।
समुत्थितमहाग्राहः समुद्रो वरुणालयः ॥ १३ ॥ ।
' वरुणका निवासस्थान यह महासागर मेरी जाँघों और पिंडलियोंके वेगसे विक्षुब्ध हो उठेगा और इसके भीतर रहनेवाले बड़े - बड़े ग्राह ऊपर आ जायँगे ॥ १३ ॥
पन्नगाशनमाकाशे पतन्तं पक्षिसेवितम् ।
वैनतेयमहं शक्तः परिगन्तुं सहस्रशः ॥ १४ ॥
' समस्त पक्षी जिनकी सेवा करते हैं, वे सर्पभोजी विनतानन्दन गरुड़ आकाशमें उड़ते हों तो भी मैं हजारों बार उनके चारों ओर घूम सकता हूँ ॥ १४ ॥
उदयात् प्रस्थितं वापि ज्वलन्तं रश्मिमालिनम् ।
अनस्तमितमादित्यमहं गन्तुं समुत्सहे ॥ १५ ॥
ततो भूमिमसंस्पृष्ट्वा पुनरागन्तुमुत्सहे ।
प्रवेगेनैव महता भीमेन प्लवगर्षभाः ॥ १६ ॥
‘ श्रेष्ठ वानरो! उदयाचलसे चलकर अपने तेजसे प्रज्वलित होते हुए सूर्यदेवको मैं अस्त होनेसे पहले ही छू सकता हूँ और वहाँसे पृथ्वीतक आकर यहाँ पैर रखे बिना ही पुनः उनके पासतक बड़े भयंकर वेगसे जा सकता हूँ ॥ १५-१६ ॥
उत्सहेयमतिक्रान्तुं सर्वानाकाशगोचरान् ।
सागरान् शोषयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम् ॥ १७ ॥
पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि प्लवमानः प्लवङ्गमः ।
हरिष्याम्युरुवेगेन प्लवमानो महार्णवम् ॥ १८ ॥
' आकाशचारी समस्त ग्रह - नक्षत्र आदिको लाँघकर आगे बढ़ जानेका उत्साह रखता हूँ । मैं चाहूँ तो समुद्रोंको सोख लूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूँगा और कूद कूदकर पर्वतोंको चूर - चूर कर डालूँगा; क्योंकि मैं दूरतककी छलाँगें मारनेवाला वानर हूँ । महान् वेगसे महासागरको फाँदता हुआ मैं अवश्य उसके पार पहुँच जाऊँगा ॥
लतानां विविधं पुष्पं पादपानां च सर्वशः ।
अनुयास्यति मामद्य प्लवमानं विहायसा ॥ १ ९ ॥
' आज आकाशमें वेगपूर्वक जाते समय लताओं और वृक्षोंके नाना प्रकारके फूल मेरे साथ - साथ उड़ते जायँगे ॥ १ ९ ॥
भविष्यति हि मे पन्थाः स्वातेः पन्था इवाम्बरे ।
चरन्तं घोरमाकाशमुत्पतिष्यन्तमेव च ॥ २० ॥ ।
द्रक्ष्यन्ति निपतन्तं च सर्वभूतानि वानराः । ' बहुत - से फूल बिखरे होनेके कारण मेरा मार्ग आकाशमें अनेक नक्षत्रपुञ्जोंसे सुशोभित स्वातिमार्ग ( छायापथ ) के समान प्रतीत होगा । वानरो! आज समस्त प्राणी मुझे भयंकर आकाशमें सीधे जाते हुए, ऊपर उछलते हुए और नीचे उतरते हुए देखेंगे ॥ २०३ ॥
महामेरुप्रतीकाशं मां द्रक्ष्यध्वं प्लवङ्गमाः ॥ २१ ॥
दिवमावृत्य गच्छन्तं ग्रसमानमिवाम्बरम् ।
विधमिष्यामि जीमूतान् कम्पयिष्यामि पर्वतान् ।
सागरं शोषयिष्यामि प्वलमानः समाहितः ॥ २२ ॥
' कपिवरो! तुम देखोगे, मैं महागिरि मेरुके समान विशाल शरीर धारण करके स्वर्गको ढकता और आकाशको निगलता हुआ - सा आगे बढूँगा, बादलोंको छिन्न - भिन्न कर डालूँगा, पर्वतोंको हिला दूँगा और एकचित्त हो छलाँग मारकर आगे बढ़नेपर समुद्रको भी सुखा दूँगा॥२१-२२ ॥ वैनतेयस्य वा शक्तिर्मम वा मारुतस्य वा ।
ऋते सुपर्णराजानं मारुतं वा महाबलम् ।
न तद् भूतं प्रपश्यामि यन्मां प्लुतमनुव्रजेत् ॥ २३ ॥
' विनतानन्दन गरुडमें, मुझमें अथवा वायुदेवतामें ही समुद्रको लाँघ जानेकी शक्ति है । पक्षिराज गरुड अथवा महाबली वायुदेवताके सिवा और किसी प्राणीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो यहाँसे छलाँग मारनेपर मेरे साथ जा सके ॥ २३ ॥
निमेषान्तरमात्रेण निरालम्बनमम्बरम् ।
सहसा निपतिष्यामि घनाद् विद्युदिवोत्थिता ॥ २४ ॥
' मेघसे उत्पन्न हुई विद्युत्की भाँति मैं पलक मारते - मारते सहसा निराधार आकाशमें उड़ जाऊँगा ॥ २४ ॥
भविष्यति हि मे रूपं प्लवमानस्य सागरम् ।
विष्णोः प्रक्रममाणस्य तदा त्रीन् विक्रमानिव ॥ २५ ॥
' समुद्रको लाँघते समय मेरा वही रूप प्रकट होगा, जो तीनों पगोंको बढ़ाते समय वामनरूपधारी भगवान् विष्णुका हुआ था ॥ २५ ॥
बुद्ध्या चाहं प्रपश्यामि मनश्चेष्टा च मे तथा ।
अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीं प्रमोदध्वं प्लवङ्गमाः ॥ २६ ॥
' वानरो! मैं बुद्धिसे जैसा देखता या सोचता हूँ, मेरे मनकी चेष्टा भी उसके अनुरूप ही होती है । मुझे निश्चय जान पड़ता है कि मैं विदेहकुमारीका दर्शन करूँगा, अतः अब तुमलोग खुशियाँ मनाओ ॥ २६ ॥
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किष्किन्धाकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ९ २७
मारुतस्य समो वेगे गरुडस्य समो जवे ।
अयुतं योजनानां तु गमिष्यामीति मे मतिः ॥ २७ ॥
‘ मैं वेगमें वायुदेवता तथा गरुडके समान हूँ । मेरा तो ऐसा विश्वास है कि इस समय मैं दस हजार योजनतक जा सकता हूँ ॥ २७ ॥
वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुवः ।
विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये ॥ २८ ॥
लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मतिः । ' वज्रधारी इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्माजीके हाथसे भी मैं बलपूर्वक अमृत छीनकर सहसा यहाँ ला सकता हूँ । समूची लङ्काको भी भूमिसे उखाड़कर हाथपर उठाये चल सकता हूँ । ऐसा मेरा विश्वास है ' ॥ २८३ ॥
तमेवं वानरश्रेष्ठं गर्जन्तममितप्रभम् ॥ २ ९ ॥ प्रहृष्टा हरयस्तत्र समुदैक्षन्त विस्मिताः । अमिततेजस्वी वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी जब इस प्रकार गर्जना कर रहे थे, उस समय सम्पूर्ण वानर अत्यन्त हर्षमें भरकर चकितभावसे उनकी ओर देख रहे थे ॥२ ९ ३ ॥ तच्चास्य वचनं श्रुत्वा ज्ञातीनां शोकनाशनम् ॥ ३० ॥
उवाच परिसंहृष्टो जाम्बवान् प्लवगेश्वरः । हनुमान्जीकी बातें भाई - बन्धुवोंके शोकको नष्ट करनेवाली थीं । उन्हें सुनकर वानर सेनापति
जाम्बवान्को बड़ी प्रसन्नता हुई । वे बोले - ॥ ३०३ ॥ ।
वीर केसरिणः पुत्र वेगवन् मारुतात्मज ॥ ३१ ॥
ज्ञातीनां विपुलः शोकस्त्वया तात प्रणाशितः । ' वीर! केसरीके सुपुत्र! वेगशाली पवनकुमार! । तात! तुमने अपने बन्धुओंका महान् शोक नष्ट कर दिया ॥ ३१३ ॥
तव कल्याणरुचयः कपिमुख्याः समागताः ॥ ३२ ॥
मङ्गलान्यर्थसिद्ध्यर्थं करिष्यन्ति समाहिताः । ' यहाँ आये हुए सभी श्रेष्ठ वानर तुम्हारे कल्याणकी कामना करते हैं । अब ं ये कार्यकी सिद्धिके उद्देश्यसे एकाग्रचित्त हो तुम्हारे लिये मङ्गलकृत्य – स्वस्तिवाचन आदिका अनुष्ठान करेंगे ॥ ३२३ ॥
ऋषीणां च प्रसादेन कपिवृद्धमतेन च ॥ ३३ ॥
गुरूणां च प्रसादेन सम्प्लव त्वं महार्णवम् । ' ऋषियोंके प्रसाद, वृद्ध वानरोंकी अनुमति तथा गुरुजनोंकी कृपासे तुम इस महासागरके पार हो जाओ ॥ ३३३ ॥
स्थास्यामश्चैकपादेन यावदागमनं तव ॥ ३४ ॥
त्वद्गतानि च सर्वेषां जीवनानि वनौकसाम् । ' जबतक तुम लौटकर यहाँ आओगे, तबतक हम तुम्हारी प्रतीक्षामें एक पैरसे खड़े रहेंगे; क्योंकि हम सब वानरोंका जीवन तुम्हारे ही अधीन है ' ॥ ३४३ ॥
ततश्च हरिशार्दूलस्तानुवाच वनौकसः ॥ ३५ ॥
कोऽपि लोके न मे वेगं प्लवने धारयिष्यति । तदनन्तर कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने उन वनवासी वानरोंसे कहा - ' जब मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा, उस समय संसारमें कोई भी मेरे वेगको धारण नहीं कर सकेगा ॥ ३५३ ॥
एतानीह नगस्यास्य शिलासंकटशालिनः ॥ ३६ ॥
शिखराणि महेन्द्रस्य स्थिराणि च महान्ति च ।
येषु वेगं गमिष्यामि महेन्द्रशिखरेष्वहम् ॥ ३७ ॥
नानाद्रुमविकीर्णेषु धातुनिष्पन्दशोभिषु । ' शिलाओंके समूहसे शोभा पानेवाले केवल इस महेन्द्र पर्वतके ये शिखर ही ऊँचे - ऊँचे और स्थिर हैं, जिनपर नाना प्रकारके वृक्ष फैले हुए हैं तथा गैरिक आदि धातुओंके समुदाय शोभा दे रहे हैं । इन महेन्द्र-शिखरों पर ही वेगपूर्वक पैर रखकर मैं यहाँसे छलाँग मारूँगा ॥ ३६-३७३ ॥ एतानि मम वेगं हि शिखराणि महान्ति च ॥ ३८ ॥
प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामितः शतम् । ' यहाँसे सौ योजनके लिये छलाँग मारते समय महेन्द्र पर्वतके ये महान् शिखर ही मेरे वेगको धारण कर सकेंगे ' ॥ ३८३ ॥
ततस्तु मारुतप्रख्यः स हरिर्मारुतात्मजः ।
आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दनः ॥ ३ ९ ॥
यों कहकर वायुके समान महापराक्रमी शत्रुमर्दन पवनकुमार हनुमान्जी पर्वतोंमें श्रेष्ठ महेन्द्रपर चढ़ गये ॥ ३ ९ ॥
वृतं नानाविधैः पुष्पैर्मृगसेवितशाद्वलम् ।
लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम् ॥ ४० ॥
वह पर्वत नाना प्रकारके पुष्पयुक्त वृक्षोंसे भरा हुआ था, वन्य पशु वहाँकी हरी - हरी घास चर रहे थे, लताओं और फूलोंसे वह सघन जान पड़ता था और वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल - फूल लगे रहते थे ॥४० ॥
सिंहशार्दूलसहितं मत्तमातङ्गसेवितम् ।
मत्तद्विजगणोद्धुष्टं सलिलोत्पीडसंकुलम् ॥ ४१ ॥
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९ २८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे महेन्द्र पर्वतके वनोंमें सिंह और बाघ भी । निवास करते थे, मतवाले गजराज विचरते थे, मदमत्त पक्षियोंके समूह सदा कलरव किया करते थे तथा जलके स्रोतों और झरनोंसे वह पर्वत व्याप्त दिखायी देता था ॥ ४१ ॥
महद्भिरुच्छ्रितं शृङ्गैर्महेन्द्रं स महाबलः ।
विचचार हरिश्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः ॥ ४२ ॥
बड़े - बड़े शिखरोंसे ऊँचे प्रतीत होनेवाले महेन्द्र पर्वतपर आरूढ़ हो इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली कपिश्रेष्ठ हनुमान् वहाँ इधर - उधर टहलने लगे ॥ ४२ ॥
पादाभ्यां पीडितस्तेन महाशैलो महात्मना ।
ररास सिंहाभिहतो महान् मत्त इव द्विपः ॥ ४३ ॥
महाकाय हनुमान्जीके दोनों पैरोंसे दबा हुआ वह महान् पर्वत सिंहसे आक्रान्त हुए महान् मदमत्त गजराजकी भाँति चीत्कार - सा करने लगा ( वहाँ रहनेवाले प्राणियोंका शब्द ही मानो उसका आर्त चीत्कार था ) ॥ ४३ ॥
मुमोच सलिलोत्पीडान् विप्रकीर्णशिलोच्चयः ।
वित्रस्तमृगमातङ्गः प्रकम्पितमहाद्रुमः ॥ ४४ ॥
उसके शिलासमूह इधर - उधर बिखर गये । उससे नये - नये झरने फूट निकले । वहाँ रहनेवाले मृग और हाथी भयसे थर्रा उठे और बड़े - बड़े वृक्ष झोंके खाकर झूमने लगे ॥४४ ॥
नानागन्धर्वमिथुनैः पानसंसर्गकर्कशैः ।
उत्पतद्भिर्विहंगैश्च विद्याधरगणैरपि ॥ ४५ ॥
त्यज्यमानमहासानुः संनिलीनमहोरगः ।
शैलशृङ्गशिलोत्पातस्तदाभूत् स महागिरिः ॥ ४६ ॥
मधुपानके संसर्गसे उद्धत चित्तवाले अनेकानेक गन्धर्वोंके जोड़े, विद्याधरोंके समुदाय और उड़ते हुए पक्षी भी उस पर्वतके विशाल शिखरोंको छोड़कर जाने लगे । बड़े - बड़े सर्प बिलोंमें छिप गये तथा उस पर्वतके शिखरोंसे बड़ी - बड़ी शिलाएँ टूट - टूटकर गिरने लगीं । इस प्रकार वह महान् पर्वत बड़ी दुरवस्थामें पड़ गया ॥ ४५-४६ ॥
निःश्वसद्भिस्तदा तैस्तु भुजगैरर्धनिःसृतैः ।
सपताक इवाभाति स तदा धरणीधरः ॥ ४७ ॥
बिलोंसे अपने आधे शरीरको बाहर निकालकर लम्बी साँस खींचते हुए सर्पोंसे उपलक्षित होनेवाला वह महान् पर्वत उस समय अनेकानेक पताकाओंसे अलंकृत - सा प्रतीत होता था ॥४७ ॥
ऋषिभिस्त्राससम्भ्रान्तैस्त्यज्यमानः शिलोच्चयः ।
सीदन् महति कान्तारे सार्थहीन इवाध्वगः ॥ ४८ ॥
भयसे घबराये हुए ऋषि - मुनि भी उस पर्वतको छोड़ने लगे । जैसे विशाल दुर्गम वनमें अपने साथियोंसे बिछुड़ा हुआ एक राही भारी विपत्ति में फँस जाता है, यही दशा उस महान् पर्वत महेन्द्रकी हो रही थी ॥ ४८ ॥
स वेगवान् वेगसमाहितात्मा हरिप्रवीरः परवीरहन्ता । मनः समाधाय महानुभावो जगाम लङ्कां मनसा मनस्वी ॥ ४ ९ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वानरसेनाके श्रेष्ठ वीर वेगशाली महामनस्वी महानुभाव हनुमान्जीका मन वेगपूर्वक छलाँग मारनेकी योजनामें लगा हुआ था । उन्होंने चित्तको एकाग्र करके मन - ही - मन लङ्काका | स्मरण किया ॥ ४ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
॥ किष्किन्धाकाण्डं सम्पूर्णम् ॥