शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 281–290
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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अ ० १ ९ ] कोटिरुद्रसंहिता २६७
ताभ्यां संप्रार्थितः शंभुः पार्थिवे पूजनाय वै ।
आयाति नित्यं तल्लिंगे भक्ताधीनतया शिवः ॥
एवं पूजयतोः शंभुं तयोर्विष्ण्ववतारयोः ।
चिरकालो व्यतीयाय शैवयोर्धर्मपुत्रयोः ॥
एकस्मिन्समये तत्र प्रसन्नः परमेश्वरः ।
प्रत्युवाच प्रसन्नोऽस्मि वरो मे व्रियतामिति ॥
इत्युक्ते च तदा तेन नरो नारायणः स्वयम् ।
ऊचतुर्वचनं तत्र लोकानां हितकाम्यया ॥
नरनारायणावूचतुः
यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरस्त्वया ।
स्थीयतां स्वेन रूपेण पूजार्थं शंकर स्वयम् ॥
सूत उवाच
इत्युक्तस्तु तदा ताभ्यां केदारे हिमसंश्रये ।
स्वयं च शंकरस्तस्थौ ज्योतीरूपो महेश्वरः ॥
ताभ्यां च पूजितश्चैव सर्वदुःखभयापहः ।
लोकानामुपकारार्थं भक्तानां दर्शनाय वै ॥
स्वयं स्थितस्तदा शंभुः केदारेश्वरसंज्ञकः ।
भक्ताभीष्टप्रदो नित्यं दर्शनादर्चनादपि ॥
देवाश्च पूजयंतीह ऋषयश्च पुरातनाः ।
मनोऽभीष्टफलं ते ते सुप्रसन्नान्महेश्वरात् ॥
भवस्य पूजनान्नित्यं बदर्याश्रमवासिनः ।
प्राप्नुवन्ति यतः सो हि भक्ताभीष्टप्रदः सदा ॥
तद्दिनं हि समारभ्य केदारेश्वर एव च ।
पूजितो येन भक्त्या वै दुःखं स्वप्नेऽपि दुर्लभम् ॥
यो वै हि पाण्डवान्दृष्ट्वा माहिषं रूपमास्थितः ।
मायामास्थाय तत्रैव पलायनपरोऽभवत् ॥
धृतश्च पाण्डवैस्तत्र ह्यवाङ्मुखतया स्थितः । उनके द्वारा पूजनहेतु प्रार्थना किये जानेपर भक्तके २ वशीभूत होनेके कारण सदाशिव नित्य इनके पार्थिव लिंगमें विराजमान हो जाते हैं ॥ १-२ ॥ इस प्रकार शिवकी पूजा करते हुए उन परम ३ शिव - भक्त विष्णुके अवतारभूत धर्मपुत्र नर - नारायणका बहुत समय बीत गया । किसी समय प्रसन्न हुए ४ परमेश्वरने कहा — मैं [ आप दोनोंपर ] प्रसन्न हूँ; वर माँगिये ॥ । ३-४ ॥ तब उनके इस प्रकार कहनेपर स्वयं नर-५ नारायणने लोककल्याणकी कामनासे यह वचन कहा- ॥५ ॥
नर - नारायण बोले- हे देवेश! हे शंकर! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि वर देना चाहते हैं, ६ तो अपने स्वरूपसे पूजाके निमित्त स्वयं यहींपर निवास करें ॥६ ॥
सूतजी बोले- तब उन दोनोंके द्वारा इस प्रकार ७ कहे जानेपर हिमाच्छादित उस केदारक्षेत्रमें स्वयं महेश्वर सदाशिव ज्योतिरूपसे विराजमान हो गये ॥७ ॥
इस प्रकार उनसे पूजित होकर सम्पूर्ण संकट ८ तथा भयको दूर करनेवाले शिवजी लोकका कल्याण करनेके लिये एवं भक्तोंको दर्शन देनेके लिये वहाँ केदारेश्वर नामसे स्वयं स्थित हो गये । वे दर्शन तथा ९ पूजन करनेसे अपने भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करते हैं ॥ ८ - ९ ॥ इनका पूजन सभी देवता तथा पुरातन ऋषि भी १० करते हैं और वे भलीभाँति प्रसन्न हुए महेश्वरसे मनोभिलषित वर प्राप्त करते हैं । बदरिकाश्रमके निवासी भी सदाशिवकी नित्य पूजा करनेका वांछित ११ फल प्राप्त करते हैं, क्योंकि वे [ सदाशिव ] सदैव अपने भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १०-११ ॥ उस दिनसे लेकर जिसने भी भक्तिसे केदारेश्वरकी १२ पूजा की, उसे स्वप्नमें भी [ किसी प्रकारका ] कष्ट नहीं हुआ ॥१२ ॥
पाण्डवोंको देखकर जिन्होंने मायासे महिषका १३ रूप धारणकर पलायन किया था और जब उन पाण्डवोंने महिषरूपधारी उन शिवको तथा उनकी पूँछ भी पकड़ ली, तब वे उन [ पाण्डवों ] -के प्रार्थना
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२६८ पुच्छं चैव धृतं तैस्तु प्रार्थितश्च पुनः पुनः तद्रूपेण स्थितस्तत्र भक्तवत्सलनामभाक् नयपाले शिरोभागो गतस्तद्रूपतः स्थितः तथैव पूजनान्नित्यमाज्ञां चैवाप्यदात्तथा पूजितश्च स्वयं शंभुस्तत्र तस्थौ वरानदात् ॥
पूजयित्वा गतास्ते तु पाण्डवा मुदितास्तदा ।
लब्ध्वा चित्तेप्सितं सर्वं विमुक्ताः सर्वदुःखतः ॥
तत्र नित्यं हरः साक्षात्क्षेत्रे केदारसंज्ञके ।
भारतीभिः प्रजाभिश्च तथैव परिपूज्यते ॥
तत्रत्यं वलयं यो वै ददाति हरवल्लभः ।
हररूपान्तिकं तच्च हररूपसमन्वितम् ॥
तथैव रूपं दृष्ट्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
जीवन्मुक्तो भवेत्सोऽपि यो गतो बदरीवने ॥
दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य हि ।
केदारेश्वरशंभोश्च मुक्तिभागी न संशयः ॥
केदारेशस्य भक्ता ये मार्गस्थास्तस्य वै मृताः ।
तेऽपि मुक्ता भवन्त्येव नात्र कार्या विचारणा ॥
गत्वा तत्र प्रीतियुक्तः केदारेशं प्रपूज्य च ।
तत्रत्यमुदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विन्दति ॥
खण्डेऽस्मिन् भारते विप्रा नरनारायणेश्वरः ।
केदारेशः प्रपूज्यश्च सर्वैर्जीवैः सुभक्तितः ॥
अस्य खण्डस्य स स्वामी सर्वेशोऽपि विशेषतः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ ॥ १४ / करनेपर नीचेकी ओर मुखकर वहाँ स्थित हो गये भक्तवत्सल नामवाले सदाशिव उसी रूपमें ॥ । विराजमान हुए । उस रूपका शिरोभाग नयपाल वहाँ ॥ १५ ( नेपाल ) -में प्रकट हुआ । उसके बाद शिवजीने उन्हें । ( पाण्डवोंको ) पूजन करनेकी आज्ञा प्रदान की । तब १६ | उनके द्वारा पूजित होकर शिवजीने उन्हें अनेक वरदान दिये और स्वयं वहीं स्थित हो गये । पाण्डव भी १७ उनकी पूजाकर प्रसन्न होकर सभी मनोवांछित फल प्राप्त करके समस्त दुःखोंसे मुक्त होकर वहाँसे चले गये॥१३–१७ ॥ भारतवासी लोगोंद्वारा उस केदारेश्वर क्षेत्रमें साक्षात् १८ [ भगवान् ] शंकरकी नित्य पूजा की जाती है ॥ १८ ॥
जो शिवप्रेमी वहाँका शिवरूपयुक्त कंकण उन्हें १ ९ प्रदान करता है, वह शिवजीके समीप जाकर उनके उस रूपको देखकर सभी पापोंसे छूट जाता है । जो २० बदरीवनकी यात्रा करता है, वह भी जीवन्मुक्त हो जाता है । वहाँ नर - नारायण तथा केदारेश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य मुक्तिका अधिकारी हो जाता है; २१ इसमें सन्देह नहीं है ॥ १ ९ –२१ ॥ केदारेश्वरके जो भक्त उनकी यात्रा करते हुए २२ मार्गमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे भी मुक्त हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं करना चाहिये । वहाँ जाकर प्रसन्नतासे युक्त होकर केदारेश्वरका पूजनकर तथा वहाँका जल २३ पीकर मनुष्य पुनर्जन्म नहीं पाता है ॥ २२-२३ ॥ हे ब्राह्मणो! इस भरतखण्डमें सभी प्राणियोंको २४ नर - नारायण तथा केदारेश्वरकी भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये । वे इस भूखण्डके स्वामी हैं और विशेष करके सबके स्वामी हैं, केदार नामक शम्भु सभी सर्वकामप्रदः शंभुः केदाराख्यो न संशयः ॥ २५ प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २४-२५ ॥ एतद्वचः समाख्यातं हे महर्षियो! आपलोगोंने जो बात पूछी थी, वह श्रुत्वा पापं यत्पृष्टमृषिसत्तमाः । सब मैंने कह दिया, इसे सुननेसे सारे पाप दूर हो जाते
हरेत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ २६ । हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ २६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां केदारेश्वरज्योतिर्लिंगमाहात्म्यवर्णनं ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें केदारेश्वरज्योतिर्लिंगमाहात्म्यवर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ९ ॥
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अ ० २० ] कोटिरुद्रसंहिता २६ ९ अथ विंशोऽध्यायः भीमशंकर ज्योतिर्लिंगके माहात्म्य सूत उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं भैमशंकरम् ।
यस्य श्रवणमात्रेण सर्वाभीष्टं लभेन्नरः ॥
कामरूपाभिधे देशे शंकरो लोककाम्यया ।
अवतीर्णः स्वयं साक्षात्कल्याणसुखभाजनम् ॥
यदर्थमवतीर्णोऽसौ शंकरो लोकशंकरः ।
शृणुतादरतस्तच्च कथयामि मुनीश्वराः ॥
भीमो नाम महावीर्यो राक्षसोऽभूत्पुरा द्विजाः ।
दुःखदः सर्वभूतानां धर्मध्वंसकरः सदा ॥
कुंभकर्णात्समुत्पन्नः कर्कट्यां सुमहाबलः ।
सह्ये च पर्वते सोऽपि मात्रावासं चकार ह ॥
कुंभकर्णे च रामेण हते लोकभयंकरे ।
राक्षसी पुत्रसंयुक्ता सह्येऽतिष्ठत्स्वयं तदा ॥
स बाल एकदा भीमः कर्कटीं मातरं द्विजाः ।
पप्रच्छ च खलो लोकदुःखदो भीमविक्रमः ॥
भीम उवाच
मातर्मे कः पिता कुत्र कथं वैकाकिनी स्थिता ।
ज्ञातुमिच्छामि तत्सर्वं यथार्थं त्वं वदाधुना ॥
- वर्णन - प्रसंग में भीमासुरके उपद्रवका वर्णन सूतजी बोले – [ हे महर्षियो! ] अब मैं भीमशंकरके माहात्म्यको कह रहा हूँ, जिसके १ सुननेमात्रसे मनुष्य सभी प्रकारके अभीष्टको प्राप्त कर लेता है ॥१ ॥
कामरूप नामक देशमें लोकहितकी कामनासे २ साक्षात् कल्याण एवं सुखके भाजन शिवजी स्वयं प्रकट हुए थे । * हे मुनीश्वरो! लोककल्याण करनेवाले ३ शंकरजीने [ यहाँ ] जिस लिये अवतार लिया, उसे आपलोग आदरपूर्वक सुनिये; मैं कह रहा हूँ ॥ २-३ ॥ हे ब्राह्मणो! पूर्व समयमें सभी प्राणियोंको सदा ४ दुःख देनेवाला एवं धर्मको नष्ट करनेवाला भीम नामका एक बड़ा बलवान् राक्षस हुआ था ॥ ४ ॥
महाबलवान् वह कुम्भकर्णके द्वारा कर्कटी ५ नामक राक्षसीसे उत्पन्न हुआ था और अपनी माताके साथ सह्य पर्वतपर निवास करता था ॥ ५ ॥
संसारको भयभीत करनेवाले कुम्भकर्णका ६ रामके द्वारा वध कर दिये जानेपर वह राक्षसी स्वयं सह्य पर्वतपर अपने पुत्रके साथ निवास करने लगी ॥६ ॥
हे द्विजो! सारे प्राणियोंको दुःख देनेवाले प्रचण्ड ७ पराक्रमी उस भीमने बाल्यावस्थामें किसी समय [ अपनी ] माता कर्कटीसे पूछा— ॥७ ॥
भीम बोला- हे मातः! मेरे पिता कौन हैं, वे कहाँ रहते हैं और तुम अकेली ही यहाँ क्यों रहती हो? मैं वह सब जानना चाहता हूँ, तुम इस समय ८ | ठीक - ठीक बताओ ॥ ८ ॥
* मतान्तरसे भीमशंकर ज्योतिर्लिंग बम्बई से पूर्व एवं पूनासे उत्तर भीमा नदीके तटपर सह्याद्रिपर स्थित है । यहींसे भीमा नदी निकलती है । ऐसी जनश्रुति है कि भगवान् शंकरने जब त्रिपुरासुरका वध किया था तो उन्होंने यहीं विश्राम किया था । उस समय ‘ भीमक ' नामक एक सूर्यवंशीय राजा यहाँ तपस्या करता था । राजाकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् शिवने उसे दर्शन दिया और उसकी प्रार्थनापर वे यहाँ दिव्य ज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित होकर भीमशंकरके नामसे प्रसिद्ध हो गये । मराठी शिवलीलामृत, गुरुचरित्र, स्तोत्ररत्नाकर आदि ग्रन्थोंमें इस ज्योतिर्लिंगकी महिमाका गान किया गया है । गंगाधर, रामदास, श्रीधरस्वामी, ज्ञानेश्वर आदि संत-महात्माओंने इसी ज्योतिर्लिंगकी महिमाका वर्णन किया है । वर्तमानमें इसी ज्योतिर्लिंगकी अधिक प्रसिद्धि है । कुछ लोग उत्तराखण्डके नैनीताल जिलेमें उज्जनक नामक स्थानपर स्थित भगवान् शिवके विशाल मन्दिरको श्रीभीमशंकर ज्योतिर्लिंग कहते हैं, किंतु शिवपुराणके अनुसार श्रीभीमशंकर ज्योतिर्लिंग असम प्रान्तके कामरूप जिलेमें ब्रह्मपुर पहाड़ीपर गोहाटीके पास अवस्थित है ।
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२७० श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० सूतजी बोले- इस प्रकार अपने पुत्रके पूछनेपर तदा तेन सूत पुत्रेण उवाच राक्षसी च सा । उस दुष्टा राक्षसीने अपने पुत्रसे कहा — तुम सुनो, मैं एवं पृष्टा श्रूयतां कथयाम्यहम् ॥ ९ सब कुछ कहती हूँ ॥ ९ ॥
उवाच पुत्रं सा दुष्टा कर्कट्युवाच
पिता ते कुम्भकर्णश्च रावणानुज एव च ।
रामेण मारितः सोऽयं भ्रात्रा सह महाबलः ॥ १०
अत्रागतः कदाचिद्वै कुम्भकर्णः स राक्षसः ।
मद्भोगं कृतवांस्तात प्रसह्य बलवान्पुरा ॥ ११
लंकां स गतवान् मां च त्यक्त्वात्रैव महाबलः ।
मया न दृष्टा सा लंका ह्यत्रैव निवसाम्यहम् ॥ १२
पिता मे कर्कटो नाम माता मे पुष्कसी मता ।
भर्ता मम विराधो हि रामेण निहतः पुरा ॥ १३
पित्रोः पार्श्वे स्थिता चाहं निहते स्वामिनि प्रिये ।
पितरौ मे मृतौ चात्र ऋषिणा भस्मसात्कृतौ ॥ १४
भक्षणार्थं गतौ तत्र क्रुद्धेन सुमहात्मना ।
सुतीक्ष्णेन सुतपसागस्त्यशिष्येण वै तदा ॥ १५
साहमेकाकिनी जाता दुःखिता पर्वते पुरा ।
निवसामि स्म दुःखार्ता निरालंबा निराश्रया ॥ १६
एतस्मिन्समये ह्यत्र राक्षसो रावणानुजः ।
आगत्य कृतवान् संगं मां विहाय गतो हि सः ॥ १७
ततस्त्वं च समुत्पन्नो महाबलपराक्रमः ।
अवलंब्य पुनस्त्वां च कालक्षेपं करोम्यहम् ॥ १८
सूत उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्या भीमो भीमपराक्रमः ।
क्रुद्धश्च चिंतयामास किं करोमि हरिं प्रति ॥ १ ९
पितानेन हतो मे हि तथा मातामहा अपि ।
विराधश्च हतोऽनेन दुःखं बहुतरं कृतम् ॥ २०
तत्पुत्रोऽहं भवेयं चेद्धरिं तं पीडयाम्यहम् ।
इति कृत्वा मतिं भीमस्तपस्तप्तुं महद्ययौ ॥ २१ ।
कर्कटी बोली – तुम्हारे पिता रावणके छोटे । भाई महाबली कुम्भकर्ण थे, जिन्हें रामने उनके भाई । रावणसहित मार डाला । हे तात! पूर्वकालमें किसी समय वह बलवान् राक्षस कुम्भकर्ण यहाँ आया और । उसने मेरे साथ बलपूर्वक सहवास किया । इसके बाद वह महाबली [ कुम्भकर्ण ] मुझे यहींपर छोड़कर लंकापुरी चला गया । मैंने वह लंका नहीं देखी है, अतः मैं यहीं निवास करती हूँ । मेरे पिताका नाम कर्कट है तथा मेरी माता पुष्कसी कही गयी है । मेरा पति विराध था, जिसे रामने पहले ही मार दिया था ॥ १०–१३ ॥ अपने प्रिय पतिके मारे जानेपर मैं अपने माता-पिताके साथ यहाँ निवास करने लगी । मेरे माता-पिताको ( सुतीक्ष्ण ) ऋषिने भस्म कर दिया और वे मर गये । [ इसका कारण यह था कि ] वे दोनों उनको खानेके लिये गये हुए थे, तब परम तपस्वी महात्मा अगस्त्यशिष्य सुतीक्ष्णने क्रोधित हो उन्हें भस्म कर दिया ॥ १४-१५ ॥ इस प्रकार मैं दुखी होकर बिना किसी सहायक एवं आश्रयके पहलेसे अकेली ही इस पर्वतपर निवास करने लगी । इस अवसरपर रावणके छोटे भाई राक्षस कुम्भकर्णने यहाँ आकर मेरे साथ सहवास किया और वह मुझे छोड़कर चला गया । [ हे पुत्र! ] उसके बाद महाबली एवं पराक्रमी तुम उत्पन्न हुए और अब मैं तुम्हारा सहारा लेकर समय बिता रही हूँ ॥ १६-१८ ॥ सूतजी बोले- माताके इस वचनको सुनकर प्रबलपराक्रमी भीम कुपित हो उठा और विचार करने लगा कि अब मैं हरिके प्रति क्या करूँ? इस रामचन्द्रने मेरे पिता तथा नानाका वध किया और इसने विराधका भी वध किया; इस प्रकार इसने बहुत अधिक दुःख दिया है । अतः यदि मैं कुम्भकर्णका पुत्र हूँ, तो हरिको अवश्य पीड़ा पहुँचाऊँगा – ऐसा विचार करके भीम महान् तप करनेके लिये चल पड़ा ॥ १ ९ –२१ ॥
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अ ० २० ] कोटिरुद्रसंहिता २७१
ब्रह्माणं च समुद्दिश्य वर्षाणां च सहस्त्रकम् ।
मनसा ध्यानमाश्रित्य तपश्चक्रे महत्तदा ॥
ऊर्ध्वबाहुश्चैकपादः सूर्ये दृष्टिं दधत्पुरा ।
संस्थितः स बभूवाथ भीमो राक्षसपुत्रकः ॥
शिरसस्तस्य संजातं तेजः परमदारुणम् ।
तेन दग्धास्तदा देवा ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥
प्रणम्य वेधसं भक्त्या तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः ।
दुःखं निवेदयाञ्चक्रुर्ब्रह्मणे ते सवासवाः ॥
देवा ऊचु:
ब्रह्मन्वै रक्षसस्तेजो लोकान्पीडितुमुद्यतम् ।
यत्प्रार्थ्यते च दुष्टेन तत्त्वं देहि वरं विधे ॥
नो चेदद्य वयं दग्धास्तीव्रतत्तेजसा पुनः ।
यास्यामः संक्षयं सर्वे तस्मात्तं देहि प्रार्थितम् ॥
सूत उवाच
इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ।
जगाम च वरं दातुं वचनं चेदमब्रवीत् ॥
ब्रह्मोवाच
प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि यत्ते मनसि वर्तते ।
इति श्रुत्वा विधेर्वाक्यमब्रवीद्राक्षसो हि सः ॥
भीम उवाच
यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरस्त्वया ।
अतुलं च बलं मेऽद्य देहि त्वं कमलासन ॥
सूत उवाच
इत्युक्त्वा तु नमश्चक्रे ब्रह्मणे स हि राक्षसः ।
ब्रह्मा चापि तदा तस्मै वरं दत्त्वा गृहं ययौ ॥
राक्षसो गृहमागत्य ब्रह्माप्तातिबलस्तदा ।
मातरं प्रणिपत्याशु स भीमः प्राह गर्ववान् ॥
भीम उवाच
पश्य मातर्बलं मेऽद्य करोमि प्रलयं महत् ।
देवानां शक्रमुख्यानां हरेर्वै तत्सहायिनः ॥
सूत उवाच
इत्युक्त्वा प्रथमं भीमो जिग्ये देवान्सवासवान् ।
स्थानान्निःसारयामास स्वात्स्वात्तान्भीमविक्रमः ॥
उसने ब्रह्माको उद्देश्य करके मनसे उनका ध्यान २२ करते हुए एक हजार वर्षतक महान् तप किया । वह राक्षसपुत्र भीम सूर्यकी ओर दृष्टि लगाये हुए दोनों २३ हाथ ऊपर उठाकर एक पैरपर स्थित रहा ॥ २२-२३ ॥ [ इस प्रकार तपमें निरत उस राक्षसके ] सिरसे २४ अत्यन्त भयानक तेज उत्पन्न हुआ; तब उस तेजसे । जलते हुए देवता ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ २४ ॥
इन्द्रसहित उन देवताओंने ब्रह्माजीको प्रणाम करके
२५ अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की ।
उसके अनन्तर वे ब्रह्माजीसे अपना दुःख कहने लगे ॥ २५ ॥
देवता बोले- हे ब्रह्मन्! उस राक्षसका तेज सभी लोकोंको पीड़ित करनेके लिये उद्यत है, अतः २६ हे विधे! वह दुष्ट जो माँगता है, उसे वह वर दीजिये; नहीं तो आज हम सब उसके प्रचण्ड तेजसे दग्ध होकर नष्ट हो जायँगे, इसलिये उसकी प्रार्थना अवश्य २७ स्वीकार कीजिये ॥ २६-२७ ॥ सूतजी बोले- - उनका यह वचन सुनकर लोकपितामह ब्रह्माजी उसको वर देनेके लिये गये २८ और उन्होंने यह वचन कहा —॥२८ ॥
ब्रह्माजी बोले- [ हे राक्षस! ] मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारे मनमें जो भी हो, वह वर माँगो । ब्रह्माजीका २ ९ यह वचन सुनकर उस राक्षसने कहा- ॥ २ ९ ॥ भीम बोला- हे देवताओंके स्वामी कमलासन ब्रह्माजी! यदि आप [ मुझपर ] प्रसन्न हैं तथा मुझे वर ३० देना चाहते हैं, तो आज मुझे अप्रतिम बल दीजिये ॥ ३० ॥
सूतजी बोले- ऐसा कहकर उस राक्षसने ब्रह्माजीको प्रणाम किया और ब्रह्माजी भी उसे वर देकर अपने ३१ धामको चले गये । तब ब्रह्मदेवसे अतुल बलका वरदान प्राप्तकर उस गर्वयुक्त राक्षस भीमने शीघ्र ही घर आकर ३२ माताको प्रणामकर कहा— ॥ ३१-३२ ॥ भीम बोला- हे माता! अब मेरे बलको देखना; मैं इन्द्र आदि सभी देवताओं, विष्णु तथा ३३ उनके सहायकोंका घोर विनाश करूँगा ॥३३ ॥
सूतजी बोले- इस प्रकार कहकर प्रचण्ड पराक्रमवाले उस भीमने सर्वप्रथम इन्द्रादि देवताओंको जीता और उन्हें अपने - अपने स्थानसे हटाकर बाहर ३४ | निकाल दिया ॥ ३४ ॥
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२७२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० ततो जिग्ये हरिं युद्धे प्रार्थितं निर्जरैरपि । इसके बाद [ सहायताहेतु ] देवताओंके द्वारा ततो जेतुं रसां दैत्यः प्रारम्भं कृतवान्मुदा ॥ ३५ प्रार्थित विष्णुको भी उस दैत्यने जीत लिया । तदनन्तर
पुरा सुदक्षिणं तत्र कामरूपेश्वरं प्रभुम् ।
जेतुं गतस्ततस्तेन युद्धमासीद्भयंकरम् ॥ ३६
भीमोऽथ तं महाराजं प्रभावाद् ब्रह्मणोऽसुरः ।
जिग्ये वरप्रभावेण महावीरं शिवाश्रयम् ॥ ३७
स हि जित्वा ततस्तं च कामरूपेश्वरं प्रभुम् ।
बबंध ताडयामास भीमो भीमपराक्रमः ॥ ३८
गृहीतं तस्य सर्वस्वं राज्यं सोपस्करं द्विजाः ।
तेन भीमेन दुष्टेन शिवदासस्य भूपतेः ॥ ३ ९
राजा चापि सुधर्मिष्ठः प्रियधर्मो हरप्रियः ।
गृहीतो निगडैस्तेन ह्येकान्ते स्थापितश्च सः ॥ ४०
तत्र तेन तदा कृत्वा पार्थिवीं मूर्तिमुत्तमाम् ।
भजनं च शिवस्यैव प्रारब्धं प्रियकाम्यया ॥ ४१
गंगायाः स्तवनं तेन बहुधा च तदा कृतम् ।
मानसं स्नानकर्मादि कृत्वा शंकरपूजनम् ॥ ४२
पार्थिवेन विधानेन चकार नृपसत्तमः ।
तद्ध्यानं च यथा स्याद्वै कृत्वा च विधिपूर्वकम् ॥ ४३
प्रणिपातैस्तथा स्तोत्रैर्मुद्रासनपुरःसरम् ।
कृत्वा हि सकलं तच्च स भेजे शंकरं मुदा ॥ ४४
पञ्चाक्षरमयीं विद्यां जजाप प्रणवान्विताम् ।
नान्यत्कार्यं स वै कर्तुं लब्धवानन्तरं तदा ॥ ४५
तत्पत्नी च तदा साध्वी दक्षिणानाम विश्रुता ।
विधानं पार्थिवं प्रीत्या चकार नृपवल्लभा ॥ ४६
दंपती त्वेकभावेन शंकरं भक्तशंकरम् ।
भेजाते तत्र तौ नित्यं शिवाराधनतत्परौ ॥ ४७
राक्षसो यज्ञकर्मादि वरदर्पविमोहितः ।
लोपयामास तत्सर्वं मह्यं वै दीयतामिति ॥ ४८
उसने प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीको जीतनेका उपक्रम किया ॥ ३५ ॥
वह पहले कामरूपके स्वामी सुदक्षिणको जीतने गया, वहाँ राजाके साथ उसका भयंकर युद्ध हुआ ॥ ३६ ॥
असुर भीमने ब्रह्माके वरदानके प्रभावसे उस महावीर तथा शिवभक्त महाराजाको [ युद्धमें ] जीत लिया ॥ ३७ ॥
तब उस महाभयंकर पराक्रमवाले भीमने प्रभावशाली कामरूपेश्वरको जीतकर बाँध लिया और क्लेश देने लगा । हे द्विजो! उस दुष्ट भीमने उस शिवभक्त राजाका सामग्रीसहित राज्य तथा सर्वस्व छीन लिया । उसने उस धर्मात्मा, शिवभक्त तथा धर्मप्रिय राजाको बेड़ियोंसे बाँध दिया और एकान्तमें बन्द कर दिया ॥ ३८–४० ॥ तब वहाँ उसने अपने कल्याणकी इच्छासे उत्तम पार्थिव लिंग बनाकर शिवजीका भजन करना प्रारम्भ किया । उसने अनेक प्रकारसे गंगाजीकी उस समय स्तुति की । मानसिक स्नान आदि कर्म करके उस नृपश्रेष्ठने पार्थिव - विधानसे शिवका पूजन किया । जिस प्रकारका ध्यान विहित है, वैसा ही ध्यान विधिपूर्वक करके प्रणाम, स्तोत्रपाठ, मुद्रा, आसन आदिके साथ सब कुछ करते हुए उसने प्रसन्नतापूर्वक शिवजीकी उपासना की॥४१–४४ ॥ वह प्रणवके सहित पंचाक्षरी विद्याका जप करता था । उस समय उसे अन्य कार्य करनेके लिये कोई अवकाश न रहा । राजाको [ अत्यन्त ] प्रिय उसकी पतिव्रता पत्नी, जिसका नाम दक्षिणा था, प्रेमपूर्वक सविधि पार्थिव - पूजन किया करती
थी ॥। ४५-४६ ॥
इस प्रकार उन दोनों पति- पत्नीने शिवाराधनमें तत्पर हो भक्तोंका कल्याण करनेवाले शंकरकी तन्मयतासे सेवा की । वरदानके अभिमानसे मोहित हुए उस राक्षसने सम्पूर्ण यज्ञकर्मादि धर्मोंका लोप कर दिया और ' सब कुछ मुझे ही समर्पण करो ' - वह इस प्रकारका प्रचार करने लगा ॥ ४७-४८ ॥
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अ ० २० ] कोटिरुद्रसंहिता २७३
बहुसैन्यसमायुक्तो राक्षसानां दुरात्मनाम् ।
चकार वसुधां सर्वां स्ववशे चर्षिसत्तमाः ॥ ४ ९
वेदधर्मं शास्त्रधर्मं स्मृतिधर्मं पुराणजम् ।
लोपयित्वा च तत्सर्वं बुभुजे स्वयमूर्जितः ॥ ५०
देवाश्च पीडितास्तेन सशक्रा ऋषयस्तथा ।
अत्यन्तं दुःखमापन्ना लोकान्निः सारिता द्विजाः ॥ ५१
ते ततो विकलाः सर्वे सवासवसुरर्षयः ।
ब्रह्मविष्णू पुरोधाय शंकरं शरणं ययुः ॥ ५२
स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकैश्च शंकरं लोकशंकरम् ।
प्रसन्नं कृतवन्तस्ते महाकोश्यास्तटे शुभे ॥ ५३
कृत्वा च पार्थिवीं मूर्तिं पूजयित्वा विधानतः ।
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैर्नमस्कारादिभिः क्रमात् ॥ ५४
एवं स्तुतस्तदा शंभुर्देवानां स्तवनादिभिः ।
सुप्रसन्नतरो भूत्वा तान्सुरानिदमब्रवीत् ॥ ५५
शिव उवाच
हे हरे हे विधे देवा ऋषयश्चाखिला अहम् ।
प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूत किं कार्यं करवाणि वः ॥ ५६
सूत उवाच
इत्युक्ते च तदा तेन शिवेन वचने द्विजाः ।
सुप्रणम्य करौ बध्वा देवा ऊचुः शिवं तदा ॥ ५७
देवा ऊचुः
सर्वं जानासि देवेश सर्वेषां मनसि स्थितम् ।
अन्तर्यामी च सर्वस्य नाज्ञातं विद्यते तव ॥ ५८
तथापि श्रूयतां नाथ स्वदुःखं ब्रूमहे वयम् ।
त्वदाज्ञया महादेव कृपादृष्ट्या विलोकय ॥ ५ ९
राक्षसः कर्कटीपुत्रः कुंभकर्णोद्भवो बली ।
पीडयत्यनिशं देवान्ब्रह्मदत्तवरोर्जितः ॥ ६०
तमिमं जहि भीमाह्वं राक्षसं दुःखदायकम् ।
कृपां कुरु महेशान विलंबं न कुरु प्रभो ॥ ६१
हे महर्षियो! उसने दुष्ट राक्षसोंकी बहुत बड़ी अपनी सेना लेकर सारी पृथ्वी अपने वशमें कर ली और शक्तिसम्पन्न होकर वेदधर्म, शास्त्रधर्म, स्मृति-धर्म एवं पुराणधर्मका लोपकर स्वयं वह सबका भोग करने लगा । हे द्विजो! उसने इन्द्रसहित समस्त देवताओं तथा ऋषियोंको पीड़ा पहुँचायी और उन्हें अत्यन्त दुःखित करके उनके स्थानोंसे निकाल दिया ॥४ ९ –५१ ॥ तब व्याकुल हुए इन्द्रसहित देवता तथा ऋषि ब्रह्मा और विष्णुको आगेकर शंकरकी शरणमें गये ॥ ५२ ॥
उन लोगोंने महाकोशी नदीके उत्तम तटपर लोकका कल्याण करनेवाले शंकरकी अनेक स्तोत्रोंसे स्तुतिकर उन्हें प्रसन्न किया और पार्थिव मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके क्रमसे अनेक प्रकारके स्तोत्रों तथा नमस्कारादिसे उन्हें प्रसन्न किया । इस प्रकार देवगणोंकी स्तुति आदिसे स्तुत हुए शिवजीने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन देवताओंसे यह कहा — ॥५३–५५ ॥ शिवजी बोले- हे विष्णो! हे ब्रह्मन्! हे समस्त देवताओ एवं ऋषियो! मैं प्रसन्न हूँ, आपलोग वर माँगिये; मैं आपलोगोंका कौन - सा कार्य करूँ? ॥ ५६ ॥
सूतजी बोले- हे द्विजो! तब उन शिवजीके द्वारा यह वचन कहे जानेपर देवता लोग हाथ जोड़कर भलीभाँति प्रणाम करके शिवजीसे कहने लगे —॥५७ ॥
देवता बोले- हे देवेश! आप सबके मनमें स्थित सारी बातें जानते हैं; आप अन्तर्यामी हैं, अतः कोई भी बात आपसे छिपी नहीं है । हे नाथ! फिर भी सुनिये; हमलोग आपकी आज्ञासे अपना दुःख निवेदन करते हैं । हे महादेव! आप [ अपनी ] कृपादृष्टिसे हमें देखिये ॥ ५८-५९ ॥ कुम्भकर्णसे उत्पन्न कर्कटीका बलवान् पुत्र राक्षस भीम ब्रह्माके द्वारा दिये गये वरदानसे उन्मत्त होकर देवताओंको निरन्तर पीड़ा पहुँचा रहा है ॥ ६० ॥
हे महेश्वर! आप दुःख देनेवाले उस भीम नामक राक्षसका वध कीजिये । कृपा कीजिये । हे प्रभो! इसमें विलम्ब न कीजिये ॥ ६१ ॥
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२७४ सूत उवाच इत्युक्तस्तु सुरैः सर्वैः शंभुर्वै भक्तवत्सलः वधं तस्य करिष्यामीत्युक्त्वा देवांस्ततोऽब्रवीत् शंभुरुवाच कामरूपेश्वरो राजा मदीयो भक्त उत्तमः तस्मै ब्रूतेति वै देवाः कार्यं शीघ्रं भविष्यति सुदक्षिण महाराज कामरूपेश्वर प्रभो मद्भक्तस्त्वं विशेषेण कुरु मद्भजनं रतेः
दैत्यं भीमाह्वयं दुष्टं ब्रह्मप्राप्तवरोर्जितम् ।
हनिष्यामि न संदेहस्त्वत्तिरस्कारकारिणम् ॥
सूत उवाच अथ ते निर्जराः सर्वे तत्र गत्वा मुदान्विताः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २१ सूतजी बोले- इस प्रकार सभी देवताओं द्वारा । । कहे जानेपर भक्तवत्सल शिवजी- ' मैं उसका वध ॥ ६२ करूँगा ' – ऐसा कहकर पुनः देवताओंसे कहने लगे ॥ ६२ ॥
शम्भु बोले- हे देवताओ! राजा कामरूपेश्वर । मेरा उत्तम भक्त है, आपलोग उससे यह कहिये, तब ॥ ६३ कार्य शीघ्र पूरा होगा । [ शंकरजीने तुमसे कहा है कि ] हे सुदक्षिण! हे महाराज! हे कामरूपेश्वर! हे प्रभो! । तुम मेरे विशेष रूपसे भक्त हो, प्रेमपूर्वक मेरा भजन ॥ ६४ करते रहो । मैं ब्रह्मासे प्राप्त वरसे शक्तिमान् तथा तुम्हारा तिरस्कार करनेवाले भीम नामक दुष्ट राक्षसका वध ६५ करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ६३–६५ ॥ सूतजी बोले- इसके बाद उन सभी देवताओंने हर्षित हो वहाँ जाकर शिवजीने जो कहा था, वह सब तस्मै महानृपायोचुर्यदुक्तं शंभुना च तत् ॥ ६६ उस महाराजासे कह दिया । उससे यह कहकर वे तमित्युक्त्वा च वै देवा आनंदं परमं गताः । सभी देवता तथा महर्षि परम आनन्दित हुए और शीघ्र महर्षयश्च ते सर्वे ययुः शीघ्रं निजाश्रमान् ॥ ६७ | ही अपने - अपने आश्रमोंको चले गये ॥ ६६-६७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां भीमेश्वरज्योतिर्लिंगमाहात्म्ये भीमासुरकृतोपद्रववर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहिताके भीमेश्वरज्योतिर्लिंगमाहात्म्यमें भीमासुरकृतोपद्रववर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः भीमशंकर ज्योतिर्लिंगकी उत्पत्ति तथा उसके माहात्म्यका वर्णन सूत उवाच
शिवोऽपि च गणैः सार्धं जगाम हितकाम्यया ।
स्वभक्तनिकटं गुप्तस्तस्थौ रक्षार्थमादरात् ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र कामरूपेश्वरेण च ।
अत्यन्तं ध्यानमारब्धं पार्थिवस्य पुरस्तदा ॥
केनचित्तत्र गत्वा च राक्षसाय निवेदितम् ।
राजा किंचित्करोत्येवं त्वदर्थं ह्याभिचारिकम् ॥
सूत उवाच
राक्षसः स च तच्छ्रुत्वा क्रुद्धस्तद् हननेच्छया ।
गृहीत्वा करवालं च जगाम नृपतिं प्रति ॥
तद् दृष्ट्वा राक्षसस्तत्र पार्थिवादि स्थितं च यत् ।
तदर्थं तत्स्वरूपं च दृष्ट्वा किंचित्करोत्यसौ ॥
सूतजी बोले - [ उसके बाद ] शिवजी भी अपने गणोंको साथ लेकर राजाके कल्याणकी कामनासे १ आदरपूर्वक वहाँ गये और उसकी रक्षाके लिये गुप्तरूपसे स्थित हो गये ॥१ ॥
इसी अवसरपर कामरूपेश्वरने वहाँ पार्थिव २ लिंगके आगे गहन ध्यान करना प्रारम्भ किया ॥ २ ॥
तभी किसीने जाकर राक्षससे कह दिया कि वह ३ राजा आपके निमित्त कुछ अभिचारकर्म कर रहा है ॥ ३ ॥
सूतजी बोले- यह सुनकर राक्षस कुपित हो उठा और उसे मारनेकी इच्छासे हाथमें तलवार लेकर ४ राजाके समीप गया ॥४ ॥
वहाँ जो पार्थिव शिवलिंग आदि रखा हुआ था, उसे देखकर और उसके स्वरूपको देखकर उसने ५ | निश्चय कर लिया कि यह मेरे लिये कुछ कर रहा
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अ ० २१ ] कोटिरुद्रसंहिता २७५
अत एनं बलादद्य हन्मि सोपस्करं नृपम् ।
विचार्येति महाक्रुद्धो राक्षसः प्राह तं नृपम् ॥
भीम उवाच
रे रे पार्थिव दुष्टात्मन् क्रियते किं त्वयाधुना ।
सत्यं वद न हन्यां त्वामन्यथा हन्मि निश्चितम् ॥
सूत उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य कामरूपेश्वरश्च सः ।
मनसीति चिचिन्ताशु शिवविश्वासपूरितः ॥
भविष्यं यद्भवत्येव नास्ति तस्य निवर्तकः ।
प्रारब्धाधीनमेवात्र प्रारब्धः स शिवः स्मृतः ॥
कृपालुः शंकरश्चात्र पार्थिवे वर्तते ध्रुवम् ।
मदर्थं न करोतीह कुतः कोऽयं च राक्षसः ॥
स्वानुरूपां प्रतिज्ञां स सत्यं चैव करिष्यति ।
सत्यप्रतिज्ञो भगवान् शिवश्चेति श्रुतौ श्रुतः ॥
मम भक्तं यदा कश्चित्पीडयत्यतिदारुणः ।
तदाहं तस्य रक्षार्थं दुष्टं हन्मि न संशयः ॥
एवं धैर्यं समालंब्य ध्यात्वा देवं च शंकरम् ।
प्रार्थयामास सद्भक्त्या मनसैव रसेश्वरः ॥
त्वदीयोऽस्मि महाराज यथेच्छसि तथा कुरु ।
सत्यं च वचनं ह्यत्र ब्रवीमि कुरु मे हितम् ॥
एवं मनसि स ध्यात्वा सत्यपाशेन यन्त्रितः ।
प्राह सत्यं वचो राजा राक्षसं चावमानयन् ॥
नृप उवाच
भजामि शंकरं देवं स्वभक्तपरिपालकम् ।
चराचराणां सर्वेषामीश्वरं निर्विकारकम् ॥
सूत उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा कामरूपेश्वरस्य सः ।
क्रोधेन प्रचलद्गात्रो भीमो वचनमब्रवीत् ॥
भीम उवाच
शंकरस्ते मया ज्ञातः किं करिष्यति वै मम ।
यो मे पितृव्यकेनैव स्थापितः किंकरो यथा ॥
है । अतः मैं आज सभी सामग्रीसहित इसे बलपूर्वक ६ मार डालूँगा । इस प्रकार विचार करके अत्यन्त क्रुद्ध हो राक्षसने राजासे कहा — ॥५-६ ॥ भीम बोला- हे दुष्टात्मा राजा! तुम इस समय क्या कर रहे हो? यह सच - सच बता दो, तो ७ तुम्हें नहीं मारूँगा, अन्यथा निश्चय ही तुम्हारा वध कर दूँगा ॥७ ॥
सूतजी बोले- उसका यह वचन सुनकर शिवमें विश्वासपरायण वह कामरूपेश्वर शीघ्र ही अपने मनमें ८ यह विचार करने लगा -जो होनहार है, वह होकर रहेगा, उसको टालनेवाला कोई नहीं है, यहाँ तो सब कुछ प्रारब्धके अधीन है और शिवको ही प्रारब्ध कहा ९ गया है । वे दयालु शिवजी निश्चितरूपसे इस पार्थिव लिंगमें भी उपस्थित हैं । क्या वे मेरे लिये कुछ नहीं १० करेंगे? यह राक्षस [ उनके सामने ] क्या है? वे अपनी की हुई प्रतिज्ञा पूर्ण करेंगे; क्योंकि भगवान् शिव वेदमें ११ सत्यप्रतिज्ञ कहे गये हैं । [ वे स्वयं कहते हैं ] जब कोई अत्यन्त निर्दयी व्यक्ति मेरे भक्तको पीड़ित करता है, तो मैं उसकी रक्षाके लिये उस दुष्टका वध कर देता हूँ, १२ इसमें संशय नहीं है ॥ ८-१२ ॥ इस प्रकार धैर्य धारणकर भगवान् शिवका ध्यान १३ करते हुए वह राजा अपने मनमें उत्तम भक्तिपूर्वक प्रार्थना करने लगा । हे महाराज! मैं आपका हूँ, जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा कीजिये । मैं यह सत्य कहता १४ हूँ कि आप मेरा कल्याण कीजिये ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकार मनमें ध्यान करके सत्यपाशमें बँधे १५ हुए उस राजाने राक्षसका तिरस्कार करते हुए सत्य वचन कहा —॥१५ ॥
राजा बोला - [ हे राक्षस! ] मैं अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाले, समस्त चराचरके स्वामी तथा निर्विकार १६ भगवान् शिवका भजन कर रहा हूँ ॥ १६ ॥
सूतजी बोले – उस कामरूपेश्वरका यह वचन सुनकर क्रोधसे काँपते हुए शरीरवाले उस भीमने यह १७ | वचन कहा —॥१७ ॥
भीम बोला- मैं तुम्हारे शंकरको जानता हूँ, वह मेरा क्या कर लेगा, जिसे मेरे पिताके भाई १८ । [ रावण ] -ने दासकी भाँति स्थापित किया था ॥ १८ ॥
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२७६ तद्बलं हि समाश्रित्य विजेतुं त्वं समीहसे तर्हि त्वया जितं सर्वं नात्र कार्या विचारणा यावन्मया न दृष्टो हि शंकरस्त्वत्प्रपालकः तावत्त्वं स्वामिनं मत्वा सेवसे नान्यथा क्वचित् मया दृष्टे च तत्सर्वं स्फुटं स्यात्सर्वथा नृप तस्मात्त्वं वै शिवस्येदं रूपं दूरतरं कुरु अन्यथा हि भयं तेऽद्य भविष्यति न संशयः । स्वामिनस्ते करं तीक्ष्णं दास्येऽहं भीमविक्रमः सूत उवाच
इति तद्वचनं श्रुत्वा कामरूपेश्वरो नृपः ।
दृढं शंकरविश्वासो द्रुतं वाक्यमुवाच तम् ॥
राजोवाच
अहं च पामरो दुष्टो न मोक्ष्ये शंकरं पुनः ।
सर्वोत्कृष्टश्च मे स्वामी न मां मुंचति कर्हिचित् ॥
सूत उवाच
एवं वचस्तदा श्रुत्वा तस्य राज्ञः शिवात्मनः ।
तं प्रहस्य द्रुतं भीमो भूपतिं राक्षसोऽब्रवीत् ॥
भीम उवाच
मत्तो भिक्षयते नित्यं स किं जानाति स्वाकृतिम् ।
योगिनां का च निष्ठा वै भक्तानां प्रतिपालने ॥
इति कृत्वा मतिं त्वं च दूरतो भव सर्वथा । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २१ । तुम उसीके बलका सहारा लेकर मुझे जीतना चाहते ॥ १ ९ हो, तो अब तुम सब कुछ जीत चुके! इसमें सन्देह । नहीं करना चाहिये । जबतक तुम्हारा पालन करनेवाला । । वह शिव मेरे सामने आकर दिखायी नहीं पड़ता ॥ २० तबतक तुम उसे स्वामी मानकर उसकी सेवा करते, रहो, अन्यथा कभी नहीं कर सकोगे ॥ १ ९ -२० ॥ । हे राजन्! उसे मेरे द्वारा देख लेनेसे सब कुछ ॥ २१ भलीभाँति स्पष्ट हो जायगा, अत: तुम शिवजीके इस रूपको दूर कर दो । अन्यथा तुम्हें आज अवश्य ही भय होगा, इसमें संशय नहीं है, भयंकर पराक्रमवाला ॥ २२ मैं तुम्हारे स्वामीको तीक्ष्ण चपेटा मारूँगा ॥ २१-२२ ॥ सूतजी बोले – उसका यह वचन सुनकर शिवके प्रति आस्थावाले राजा कामरूपेश्वरने भीमसे शीघ्र ही २३ । यह दृढ़ वचन कहा— ॥ २३ ॥
राजा बोला- हे राक्षस! मैं नीच एवं दुष्ट जो भी हूँ, किंतु शिवजीका त्याग कभी नहीं करूँगा और २४ मेरे स्वामी भी सर्वश्रेष्ठ हैं, वे मेरा त्याग कभी नहीं करेंगे ॥ २४ ॥
सूतजी बोले- इस प्रकार उस शिवभक्त राजाकी बात सुनकर उस भीम राक्षसने हँसकर शीघ्र ही उस २५ | राजासे कहा— ॥ २५ ॥
भीम बोला- मत्त होकर वह नित्य भीख माँगता रहता है, उसे तो अपने स्वरूपका भी ज्ञान २६ नहीं है । भक्तोंकी रक्षा करनेमें योगियोंकी क्या निष्ठा होगी? ॥ २६ ॥
ऐसा विचारकर तुम सब प्रकारसे उससे दूर रहो, अहं च तव स स्वामी युद्धं वै करवावहै ॥ २७ मैं और तुम्हारा वह स्वामी [ परस्पर ] युद्ध करेंगे ॥ २७ ॥
सूत उवाच सूतजी बोले- उसके बाद इस प्रकार कहे इत्युक्तः स नृपश्रेष्ठः शंभुभक्तो दृढव्रतः । जानेपर शिवभक्त तथा दृढ़ व्रतवाले उस श्रेष्ठ राजाने प्रत्युवाचाभयो भीमं दुःखदं जगतां सदा ॥ २८ निडर होकर सदा जगत्को दुःख देनेवाले भीमसे राजोवाच
शृणु राक्षस दुष्टात्मन्मया कर्तुं न शक्यते ।
त्वया विक्रियते तर्हि कुतस्त्वं शक्तिमानसि ॥ २
सूत उवाच इत्युक्तः सैन्यमादाय राजानं परिभर्त्स्य तम् । करालं करवालं कहा— ॥ २८ ॥
राजा बोला — हे दुष्टात्मा राक्षस! सुनो, मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता । तुम जो यह विकर्म करते ९ हो, उसमें तुम समर्थ कहाँसे हुए हो? ॥२ ९ ॥ सूतजी बोले- उसके इस प्रकार कहनेपर सेना लेकर [ आये हुए ] भीमने उस राजाको धमका करके च पार्थिवे प्राक्षिपत्तदा ॥ ३० अपने भयंकर कृपाणसे पार्थिव लिंगपर प्रहार किया