शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 311–320
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320
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अ ० २६ ] कोटिरुद्रसंहिता २ ९ ७
किंचान्यच्च शृणु स्वामिन्वपुषा सुन्दरेण ह ।
तिष्ठ त्वं मत्समीपे वै सगणः साम्बिकः प्रभो ॥
सूत उवाच
एवं तस्या वचः श्रुत्वा शंकरो भक्तवत्सलः ।
लोकोपकरणार्थाय पुनर्गगां वचोऽब्रवीत् ॥
शिव उवाच
धन्यासि श्रूयतां गंगे ह्यहं भिन्नस्त्वया न हि ।
तथापि स्थीयते ह्यत्र स्थीयतां च त्वयापि हि ॥
सूत उवाच
इत्येवं वचनं श्रुत्वा स्वामिनः परमेशितुः ।
प्रसन्नमानसा भूत्वा गंगा च प्रत्यपूजयत् ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवा ऋषयश्च पुरातनाः ।
सुतीर्थान्यप्यनेकानि क्षेत्राणि विविधानि च ॥
आगत्य गौतमं सर्वे गंगां च गिरिशं तथा ।
जय जयेति भाषन्तः पूजयामासुरादरात् ॥
ततस्ते निर्जराः सर्वे तेषां चक्रुः स्तुतिं मुदा ।
करान् बध्वा नतस्कंधा हरिब्रह्मादयस्तदा ॥
गंगा प्रसन्ना तेभ्यश्च गिरिशश्चोचतुस्तदा ।
वरं ब्रूत सुरश्रेष्ठा दद्बो वः प्रियकाम्यया ॥
देवा ऊचुः
यदि प्रसन्नो देवेश प्रसन्ना त्वं सरिद्वरे ।
स्थातव्यमत्र कृपया नः प्रियार्थं तथा नृणाम् ॥
गंगोवाच
यूयं सर्वप्रियार्थं च तिष्ठथात्र न किं पुनः ।
गौतमं क्षालयित्वाहं गमिष्यामि यथागतम् ॥
भवत्सु मे विशेषोऽत्र ज्ञेयश्चैव कथं सुराः तत्प्रमाणं कृतं चेत्स्यात्तदा तिष्ठाम्यसंशयम् सर्वे ऊचुः सिंहराशौ यदा स्याद्वै गुरुः सर्वसुहृत्तमः तदा वयं च सर्वे त्वागमिष्यामो न संशयः हे स्वामिन्! हे प्रभो! एक और बात सुनिये, ३२ आप अपने गणों एवं पार्वतीसहित अपने सुन्दर स्वरूपसे मेरे समीप निवास कीजिये ॥३२ ॥
सूतजी बोले – उनका यह वचन सुनकर भक्तवत्सल शंकरने लोकोपकारके लिये गंगाजीसे ३३ पुनः यह वचन कहा – ॥ ३३ ॥
शिवजी बोले — हे गंगे! तुम धन्य हो, सुनो! मैं तुमसे पृथक् नहीं हूँ, फिर भी मैं यहाँ निवास करता ३४ हूँ और तुम भी निवास करो ॥ ३४ ॥
सूतजी बोले- इस प्रकार स्वामी सदाशिवकी बात सुनकर गंगाने प्रसन्नचित्त होकर उनकी आज्ञा ३५ स्वीकार कर ली ॥ ३५ ॥
इसी बीच देवता, प्राचीन ऋषि, पितर, अनेक ३६ सुन्दर तीर्थ एवं विविध क्षेत्र - सभीने वहाँ आकर गौतम, गंगा तथा गिरीशकी जय - जयकार करते हुए ३७ आदरपूर्वक उनका पूजन किया ॥ ३६-३७ ॥ इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु आदि उन सभी ३८ देवताओंने हाथ जोड़कर सिर झुका करके प्रसन्नतापूर्वक उनकी स्तुति की । उस समय उन देवताओंपर प्रसन्न हुईं गंगाजी तथा शिवजीने कहा- हे सुरश्रेष्ठो! आपलोग वर माँगिये । आपलोगोंका हित करनेकी इच्छासे हम ३ ९ दोनों उसे प्रदान करेंगे ॥ ३८-३९ ॥ देवता बोले — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और हे गंगे! यदि आप भी प्रसन्न हैं, तो हमलोगोंके तथा मनुष्योंके हितके लिये कृपापूर्वक यहीं निवास ४० करें ॥ ४० ॥
गंगाजी बोलीं- हे देवताओ! तुमलोग स्वयं ही लोकोपकारके निमित्त यहाँ निवास क्यों ४१ नहीं करते, मैं तो गौतमको पवित्रकर जहाँसे आयी हूँ, वहीं चली जाऊँगी । आप लोगोंमें मेरा वैशिष्ट्य किस प्रकार जाना जा सके यदि उसे प्रमाणित । करो, तब मैं निश्चय ही यहाँ निवास कर सकती ॥ ४२ हूँ ॥ ४१-४२ ॥ सभी [ देवगण ] बोले- जब सबके परम सुहृद् बृहस्पति सिंहराशिपर स्थित रहेंगे, तब हम । सभी लोग आपके समीप आयेंगे, इसमें संशय नहीं ॥ ४३ है ॥ ४३ ॥
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२ ९ ८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २६ एकादश च वर्षाणि लोकानां पातकं त्विह । हे सरिद्वरे! इस लोकमें ग्यारह वर्षपर्यन्त क्षालितं यद्भवेदेवं मलिनाः स्मः सरिद्वरे ॥ ४४ लोगोंका जो पाप प्रक्षालित होगा, उससे जब हमलोग | मलिन हो जायँगे, तब हे प्रिये! उस पापको धोनेके लिये तस्यैव क्षालनाय त्वायास्यामः सर्वथा प्रिये । | हमलोग निश्चित रूपसे आपके पास आयेंगे, हे महादेवि त्वत्सकाशं महादेवि प्रोच्यते सत्यमादरात् ॥ ४५ हमलोग आदरपूर्वक सत्य कह रहे हैं ॥ ४४-४५ ॥! अनुग्रहाय लोकानामस्माकं प्रियकाम्यया । हे सरिद्वरे! लोकोंपर अनुग्रह करने तथा हमलोगोंका स्थातव्यं शंकरेणापि त्वया चैव सरिद्वरे ॥ ४६ हित करनेके लिये आपको एवं शंकरजीको भी यहीं यावत्सिंहे गुरुश्चैव स्थास्यामस्तावदेव हि त्वयि स्नानं त्रिकालं च शंकरस्य च दर्शनम् ॥
कृत्वा स्वपापं निखिलं विमोक्ष्यामो न संशयः ।
स्वदेशांश्च गमिष्यामो भवच्छासनतो वयम् ॥
सूत उवाच
इत्येवं प्रार्थितस्तैस्तु गौतमेन महर्षिणा ।
स्थितोऽसौ शंकरः प्रीत्या स्थिता सा च सरिद्वरा ॥
सा गंगा गौतमी नाम्ना लिंगं त्र्यंबकमीरितम् ।
ख्याताख्यातं बभूवाथ महापातकनाशनम् ॥
तद्दिनं हि समारभ्य सिंहस्थे च बृहस्पतौ ।
आयांति सर्वतीर्थानि क्षेत्राणि दैवतानि च ॥
सरांसि पुष्करादीनि गंगाद्याः सरितस्तथा ।
वासुदेवादयो देवाः सन्ति वै गौतमीतटे ॥
यावत्तत्र स्थितानीह तावत्तेषां फलं न हि ।
स्वप्रदेशे समायातास्तर्ह्येतेषां फलं भवेत् ॥
ज्योतिर्लिंगमिदं प्रोक्तं त्र्यंबकं नाम विश्रुतम् ।
रहना चाहिये ॥४६ ॥
। जबतक बृहस्पति सिंहराशिपर रहेंगे, तबतक ४७ हमलोग भी यहीं निवास करेंगे और तीनों समय आप [ के जल ] -में स्नान करके तथा शिवजीका दर्शन करके अपने सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होंगे और पुन: ४८ आपकी आज्ञासे अपने - अपने स्थानको चले जायँगे,
इसमें सन्देह नहीं है ॥। ४७-४८ ॥
सूतजी बोले- इस प्रकार महर्षि गौतम तथा उन देवताओंके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर वे शंकरजी ४ ९ प्रेमपूर्वक वहीं स्थित हो गये और वे गंगाजी भी स्थित हो गयीं । वहाँपर वे गंगाजी गौतमी नामसे प्रसिद्ध हुईं तथा वह शिवलिंग त्र्यम्बक नामसे विश्वमें विख्यात हुआ, ५० जो महापातकका भी नाश करनेवाला है ॥ ४ ९ -५० ॥ उस दिनसे लेकर जब - जब बृहस्पति सिंहराशिपर ५१ आते हैं, तब सभी देवता, तीर्थ तथा क्षेत्र यहाँ आते हैं । पुष्कर आदि समस्त सरोवर, गंगा आदि सभी नदियाँ एवं विष्णु आदि देवगण गौतमीतटपर निवास ५२ करते हैं ॥ ५१-५२ ॥ ये जबतक वहाँ रहते हैं, तबतक [ अपने ५३ स्थानपर उनके सेवनका ] फल प्राप्त नहीं होता और जब वे अपने - अपने निवासपर चले जाते हैं, तभी [ उनकी उपासनाका ] फल प्राप्त होता है ॥५३ ॥
यह त्र्यम्बक नामसे प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग गौतमीके स्थितं तटे हि गौतम्या महापातकनाशनम् ॥ ५४ तटपर स्थित है और महान् पापोंका नाश करनेवाला है । यः पश्येद्भक्तितो जो इस त्र्यम्बकेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगका भक्तिपूर्वक ज्योतिर्लिंगं त्र्यंबकनामकम् । दर्शन, पूजन, प्रणाम एवं स्तवन करता है, वह सभी पूजयेत्प्रणमेत्स्तुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५५ प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५४-५५ ॥ ज्योतिर्लिंगं त्र्यंबकं हि पूजितं गौतमके द्वारा पूजित यह त्र्यम्बक नामक सर्वकामप्रदं गौतमेन ह । ज्योतिर्लिंग इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला चात्र परत्र परमुक्तिदम् ॥ ५६ | तथा परलोकमें उत्तम मुक्ति प्रदान करनेवाला है ॥ ५६ ॥
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अ ० २७ ] कोटिरुद्रसंहिता २ ९९ इति वश्च समाख्यातं यत्पृष्टोऽहं मुनीश्वराः । हे मुनीश्वरो! जो आपलोगोंने मुझसे पूछा था, उसे मैंने कह दिया, अब आपलोग और क्या सुनना किमन्यदिच्छथ श्रोतुं तद् ब्रूयां वो न संशयः ॥ ५७ चाहते हैं? उसे मैं कहूँगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५७ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां त्र्यंबकेश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें त्र्यम्बकेश्वरमाहात्म्यवर्णन नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः गौतमी गंगा एवं त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंगका माहात्म्यवर्णन ऋषय ऊचुः
गंगा च जलरूपेण कुतो जाता वद प्रभो ।
तन्माहात्म्यं विशेषेण कुतो जातं वद प्रभो ॥
यैर्विप्रैगतमायैव दुःखं दत्तं दुरात्मभिः ।
तेषां किं च ततो जातमुच्यतां व्याससद्गुरो ॥
सूत उवाच
एवं संप्रार्थिता गंगा गौतमेन तदा स्वयम् ।
ब्रह्मणश्च गिरेर्विप्रा द्रुतं तस्मादवातरत् ॥
औदुंबरस्य शाखायास्तत्प्रवाहो विनिःसृतः ।
तत्र स्नानं मुदा चक्रे गौतमो विश्रुतो मुनिः ॥
गौतमस्य च ये शिष्या अन्ये चैव महर्षयः ।
समागताश्च ते तत्र स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ॥
गंगाद्वारं च तन्नाम प्रसिद्धमभवत्तदा ।
सर्वपापहरं रम्यं दर्शनान्मुनिसत्तमाः ॥
गौतमस्पर्द्धिनस्ते च ऋषयस्तत्र चागताः ।
स्नानार्थं तांश्च सा दृष्ट्वा ह्यंतर्धानं गता द्रुतम् ॥
मा मेति गौतमस्तत्र व्याजहार वचो द्रुतम् ।
मुहुर्मुहुः स्तुवन् गंगां साञ्जलिर्नतमस्तकः ॥
गौतम उवाच
इमे च श्रीमदांधाश्च साधवो वाप्यसाधवः ।
एतत्पुण्यप्रभावेण दर्शनं दीयतां त्वया ॥
सूत उवाच
ततो वाणी समुत्पन्ना गंगाया व्योममंडलात् ।
गंगावचनमुत्तमम् ॥
तच्छृणुध्वमुषिश्रेष्ठा ऋषिगण बोले- हे प्रभो! गंगा किस स्थानसे जलरूपमें प्रवाहित होकर प्रकट हुईं? हे प्रभो! उनका १ माहात्म्य सबकी अपेक्षा अधिक क्यों हुआ? इसे बताइये । हे व्यासशिष्य! जिन दुष्ट ब्राह्मणोंने महर्षि गौतमको दुःख दिया, बादमें उन्हें क्या फल मिला, २ उसे कहिये? ॥१-२ ॥ सूतजी बोले- हे ब्राह्मणो! उस समय गौतमके द्वारा प्रार्थना करनेपर स्वयं गंगाजी शीघ्र ही उस ३ ब्रह्मगिरिसे प्रकट हुईं ॥ ३ ॥
गूलर वृक्षकी शाखासे उनकी धारा निकली, तब ४ सुप्रसिद्ध मुनि गौतमने आनन्दसे उसमें स्नान किया ॥ ४ ॥
गौतमके जो शिष्य थे तथा अन्य आये हुए जो ५ महर्षिगण थे, उन सभीने वहाँपर प्रसन्नतापूर्वक स्नान किया । तभीसे उस स्थानका नाम गंगाद्वार प्रसिद्ध हो गया । हे मुनियो! इस रमणीय क्षेत्रका दर्शन करनेसे ६ सम्पूर्ण पापोंका अपहरण हो जाता है॥५-६ ॥ उसके बाद [ महर्षि ] गौतमसे द्वेष करनेवाले वे ७ सभी ऋषि भी स्नान करनेके लिये वहाँ आ गये, तब उन्हें देखकर वे गंगाजी शीघ्रतासे अन्तर्धान हो गयीं ॥ ७ ॥
महर्षि गौतमने हाथ जोड़कर सिर झुकाकर ८ गंगाकी बारंबार स्तुति करते हुए शीघ्रतासे कहा- — ऐसा मत कीजिये, ऐसा मत कीजिये ॥ ८ ॥
गौतम बोले- [ हे माता! ] ये सभी महर्षि श्रीमदमें अन्धे हों, सज्जन हों अथवा असज्जन हों, [ परंतु मेरे ] ९ इस पुण्यके प्रभावसे आप इन्हें दर्शन दीजिये ॥ ९ ॥
सूतजी बोले – हे ऋषिश्रेष्ठो! उसके बाद आकाश-मण्डलसे गंगाजीकी वाणी प्रतिध्वनित हुई, आपलोग १० । गंगाजीके उस उत्तम कथनको सुनिये —॥१० ॥
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३०० एते दुष्टतमाश्चैव कृतघ्नाः स्वामिद्रोहिणः जाल्माः पाखंडिनश्चैव द्रष्टुं वर्ज्याश्च सर्वदा गौतम उवाच मातश्च श्रूयतामेतन्महतां गिर एव च तस्मात्त्वया च कर्त्तव्यं सत्यं च भगवद् वचः अपकारिषु यो लोक उपकारं करोति वै तेन पूतो भवाम्यत्र भगवद्वचनं त्विदम् सूत उवाच इति श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं गौतमस्य महात्मनः । पुनर्वाणी समुत्पन्ना गंगाया व्योममंडलात्
कथ्यते हि त्वया सत्यं गौतमर्षे शिवं वचः ।
तथापि संग्रहार्थं च प्रायश्चित्तं चरन्तु वै ॥
शतमेकोत्तरं चात्र कार्यं प्रक्रमणं गिरेः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ । गंगाजी बोलीं- ये अत्यन्त दुष्ट, कृतघ्न ॥ ११ स्वामीसे द्रोह करनेवाले, धूर्त और पाखण्डी हैं, इन्हें, देखनातक नहीं चाहिये ॥ ११ ॥
गौतम बोले — हे मातः! महापुरुषोंके इस । । कथनको आप सुनिये और भगवान् शंकरके वचनको सत्य ॥ १२ कीजिये । ' इस पृथ्वीपर जो मनुष्य अपकार करनेवालोंका । भी उपकार ही करता है, मैं उससे पवित्र होता हूँ'-॥ १३ यह भगवान्का वचन है ॥ १२-१३ ॥ -सूतजी बोले — महात्मा गौतममुनिका यह वचन सुनकर आकाशमण्डलसे पुन: गंगाजीका कथन ध्वनित ॥ १४ हुआ - हे गौतम महर्षे! आप सत्य और कल्याणकारी वचन कह रहे हैं, फिर भी ये संसारको शिक्षा देनेके १५ लिये प्रायश्चित्त करें । विशेषरूपसे आपके अधीन हुए इन लोगोंको आपकी आज्ञासे एक सौ एक बार इस भवच्छासनतस्त्वेतैस्त्वदधीनैर्विशेषतः ॥ १६ | पर्वतकी परिक्रमा करनी चाहिये । हे मुने! तभी इन
ततश्चैवाधिकारश्च जायते दुष्टकारिणाम् ।
मद्दर्शने विशेषेण सत्यमुक्तं मया मुने ॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्याश्चक्रुर्वै ते तथाखिलाः ।
संप्रार्थ्य गौतमं दीनाः क्षन्तव्यो नोऽपराधकः ॥
एवं कृते तदा तेन गौतमेन तदाज्ञया ।
कुशावर्तं नाम चक्रे गङ्गाद्वारादधोगतम् ॥
ततः प्रादुरभूत्तत्र सा तस्य प्रीतये पुनः ।
कुशावर्तं च विख्यातं तीर्थमासीदनुत्तमम् ॥
तत्र स्नातो नरो यस्तु मोक्षाय परिकल्पते ।
त्यक्त्वा सर्वानघान्सद्यो विज्ञानं प्राप्य दुर्लभम् ॥
गौतमो ऋषयश्चान्ये मिलिताश्च परस्परम् ।
लज्जितास्ते तदा ये च कृतघ्ना ह्यभवन्पुरा ॥
ऋषय ऊचुः
अस्माभिरन्यथा सूत श्रुतं तद्वर्णयामहे ।
गौतमस्तान्द्विजान् क्रुद्धः शशापेति प्रबुध्यताम् ॥
सूत उवाच द्विजास्तदपि सत्यं वै कल्पभेदसमाश्रयात् । दुराचारियोंको मेरे दर्शनका विशेष अधिकार प्राप्त १७ होगा, यह मैंने सत्य कहा है ॥ १४–१७ ॥ [ पुनः सूतजी बोले- ] गंगाजीकी यह बात १८ सुनकर उन सभी दीन ऋषियोंने ' हमारे अपराधको क्षमा करें ' गौतमसे इस प्रकार प्रार्थनाकर पर्वतकी परिक्रमा की । उन ऋषियोंके द्वारा ऐसा कर लेनेपर उन गौतमने गंगाजीकी आज्ञासे गंगाद्वारके नीचेवाले १ ९ स्थानका नाम कुशावर्त रखा ॥ १८-१९ ॥ उसके बाद वे गंगाजी गौतमको प्रसन्न करनेके २० लिये वहाँ पुनः प्रकट हुईं, तबसे वह श्रेष्ठ तीर्थ कुशावर्त नामसे प्रसिद्ध हुआ । वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य अपने सभी पापोंका त्याग करके दुर्लभ विज्ञान प्राप्तकर शीघ्र २१ ही मोक्षका अधिकारी हो जाता है ॥ २०-२१ ॥ इसके बाद जब गौतम एवं अन्य ऋषिगण २२ परस्पर मिले, उस समय जिन्होंने पहले कृतघ्नता की थी, वे लोग लज्जित हो गये ॥२२ ॥
ऋषिगण बोले — हे सूतजी! हमलोगोंने तो इसे दूसरी तरहसे सुना है, हम उसका वर्णन करते हैं । गौतमने २३ क्रुद्ध होकर उन्हें शाप दिया था- आप ऐसा जानिये ॥ २३ ॥
सूतजी बोले- हे द्विजो! कल्पभेदके कारण वह भी सत्य है, हे सुव्रतो! मैं उस कथाका भी विशेष
वर्णयामि विशेषेण तां कथामपि सुव्रताः ॥ २४ । रूपसे वर्णन करता हूँ ॥ २४ ॥
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अ ० २७ ] गौतमोऽपि ऋषीन्दृष्ट्वा तदा दुर्भिक्षपीडितान् तपश्चकार सुमहद्वरुणस्य महात्मनः अक्षय्यं कल्पयामास जलं वरुणदायया ततो व्रीहीन् यवांश्चैव वापयामास भूरिशः एवं परोपकारी स गौतमो मुनिसत्तमः आहारं कल्पयामास तेभ्यः स्वतपसो बलात् कदाचित्तत्स्त्रियो दुष्टा जलार्थमपमानिताः ऊचुः पतिभ्यस्ताः क्रुद्धा ' गौतमेर्ष्याकरं वचः ततस्ते भिन्नमतयो गां कृत्वा कृत्रिमां द्विजाः तद्वान्यभक्षणासक्तां चक्रुस्तां कुटिलाशयाः स्वधान्यभक्षणासक्तां गां दृष्ट्वा गौतमस्तदा तृणेन ताडयामास शनैस्तां संनिवारयन् तृणसंस्पर्शमात्रेण सा भूमौ पतिता च गौः मृता ह्यभूत्क्षणं विप्रा भाविकर्मवशात्तदा कोटिरुद्रसंहिता ३०१ । गौतमने उन ऋषियोंको दुर्भिक्षसे पीड़ित || २५ | देखकर महात्मा वरुणको उद्देश्यकर बहुत बड़ा तप । किया । उसके अनन्तर वरुणकी कृपासे उन्होंने अक्षय ॥ २६ जल प्राप्त किया और तत्पश्चात् बहुत - से धान तथा । जौ बोवाये । [ हे ऋषिश्रेष्ठो! ] इस प्रकार उन ॥ २७ परोपकारी महर्षि गौतमने अपने तपोबलसे उनके भोजनका प्रबन्ध किया॥२५–२७ ॥ । किसी समय उनकी दुष्ट स्त्रियाँ जब जल लेनेके ॥ २८ प्रसंगमें [ अपने ही व्यवहारके कारण ] अपमानित हो गयीं । तब वे क्रुद्ध होकर अपने पतियोंसे गौतमके प्रति । ईर्ष्यायुक्त वचन बोलीं । तब दुष्टबुद्धिवाले तथा कुटिल ॥ २ ९ अन्तःकरणवाले उन ब्राह्मणोंने एक कृत्रिम गाय बनाकर उनकी फसलको चरनेके लिये छोड़ दिया ॥ २८-२९ ॥ । तब गौतमने अपनी फसलको खानेमें आसक्त ॥ ३० उस गायको देखकर उसे धीरेसे हटाते हुए एक । तिनकेसे मारा । हे विप्रो! वह गाय तिनकेके स्पर्शमात्रसे भूमिपर गिर पड़ी और होनहारवश क्षणभरमें मर ॥ ३१ गयी ॥ ३०-३१ ॥ गौर्हता गौतमेनेति तदा ते कुटिलाशयाः एकत्रीभूय तत्रत्याः सकला ऋषयोऽवदन् ततः स गौतमो भीतो गौर्हतेति बभूव ह चकार विस्मयं नार्यहल्याशिष्यैः शिवानुगः ततः स गौतमो ज्ञात्वा तां गां क्रोधसमाकुलः शशाप तानृषीन् सर्वान् गौतमो मुनिसत्तमः गौतम उवाच यूयं सर्वे दुरात्मानो दुःखदा मे विशेषतः शिवभक्तस्य सततं स्युर्वेदविमुखाः सदा ॥ अद्यप्रभृति वेदोक्ते सत्कर्मणि विशेषतः । मा भूयाद्भवतां श्रद्धा शैवमार्गे विमुक्तिदे अद्यप्रभृति दुर्मार्गे तत्र श्रद्धा भवेत्तु वः मोक्षमार्गविहीने हि सदा श्रुतिबहिर्मुखे ॥ अद्यप्रभृति भालानि मृल्लिप्तानि भवन्तु वः स्रंसध्वं नरके यूयं भालमृल्लेपना द्विजाः । तब वहाँके कुत्सित विचारवाले सभी ऋषिगण ॥ ३२ एकत्र होकर कहने लगे कि गौतमने गाय मार डाली ॥ ३२ ॥
। इसके बाद शिवभक्त गौतम ' गाय मर गयी'-॥ ३३ ऐसा सोचकर भयभीत हो गये और अपनी पत्नी अहल्या तथा शिष्योंसहित आश्चर्यमें पड़ गये । उसके । पश्चात् उस कृत्रिम गायके विषयमें जानकर वे गौतम ॥ ३४ कुपित हो उठे और तब मुनिश्रेष्ठ गौतमने उन सभी ऋषियोंको शाप दे दिया॥३३-३४ ॥ गौतम बोले — तुम सभी दुरात्मा हो, मुझ । शिवभक्तको इस प्रकार विशेष दुःख देनेके कारण ३५ वेदसे विमुख हो जाओ । आजसे वेदोक्त सत्कर्ममें और विशेषकर मुक्ति प्रदान करनेवाले शैवमार्गमें ॥ ३६ तुमलोगोंकी श्रद्धा नहीं रहेगी ॥ ३५-३६ ॥ । आजसे वेदबहिष्कृत एवं मोक्षमार्गसे रहित बुरे ३७ मार्गमें तुमलोगोंकी प्रवृत्ति रहेगी । आजसे तुमलोगोंकै मस्तकमें मृत्तिकाका तिलक होगा और हे ब्राह्मणो! । माथेपर मृत्तिकाका लेप करनेवाले तुमलोग नरकगामी ॥ ३८ होओगे ॥ ३७-३८ ॥
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३०२ भवन्तो मा भविष्यन्तु शिवैकपरदैवताः अन्यदेव समत्वेन जानन्तु शिवमद्वयम् मा भूयाद्भवतां प्रीतिः शिवपूजादिकर्मणि शिवनिष्ठेषु भक्तेषु शिवपर्वसु सर्वदा ॥
अद्य दत्ता मया शापा यावन्तो दुःखदायकाः ।
तावन्तः सन्तु भवतां सन्ततावपि सर्वदा ॥
अशैवाः सन्तु भवतां पुत्रपौत्रादयो द्विजाः ।
पुत्रैः सहैव तिष्ठन्तु भवन्तो नरके ध्रुवम् ॥
ततो भवन्तु चाण्डाला दुःखदारिद्र्यपीडिताः ।
शठा निन्दाकराः सर्वे तप्तमुद्रांकिताः सदा ॥
सूत उवाच
इति शप्त्वा मुनीन् सर्वान् गौतमः स्वाश्रमं ययौ ।
शिवभक्तिं चकाराति स बभूव सुपावनः ॥
ततस्तैः खिन्नहृदया ऋषयस्तेऽखिला द्विजाः ।
काञ्च्यां चक्रुर्निवासं हि शैवधर्मबहिष्कृताः ॥
तत्पुत्राश्चाभवन्सर्वे शैवधर्मबहिष्कृताः । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २७ । तुमलोग शिवको परदेवता नहीं मानोगे और ॥ ३ ९ / उन अद्वैत सदाशिवको अन्य देवताओंके समान समझोगे ॥ ३ ९ ॥ । शिवपूजा आदि कर्ममें, शिवनिष्ठ भक्तोंमें एवं ४० शिवपर्वोंमें तुमलोगोंकी प्रीति कभी भी नहीं होगी ॥ ४० ॥
आज मैंने जितने दुःखदायी शाप तुमलोगोंको ४१ दिये है, वे सब सर्वदा तुमलोगोंकी सन्तानोंको भी प्राप्त होंगे ॥४१ ॥
हे द्विजो! तुमलोगों के पुत्र - पौत्र आदि शिवभक्तिसे ४२ विमुख रहेंगे और तुमलोग अपने पुत्रोंके साथ निश्चित रूपसे नरकमें निवास करोगे । उसके बाद चाण्डालयोनिमें जन्म लेकर दुःख - दारिद्र्यसे पीड़ित रहोगे और धूर्त ४३ एवं निन्दा करनेवाले होओगे तथा सर्वदा तप्त मुद्रासे चिह्नित रहोगे ॥ ४२-४३ ॥ सूतजी बोले – [ हे महर्षियो! ] इस प्रकार उन सभी मुनियोंको शाप देकर महर्षि गौतम अपने आश्रमपर ४४ चले गये । उन्होंने अत्यधिक शिवभक्ति की तथा वे परम पवित्र हो गये । उसके बाद उन शापोंके कारण खिन्न हृदयवाले वे सभी ब्राह्मण शिवधर्मसे बहिष्कृत ४५ होकर कांचीपुरीमें निवास करने लगे ॥ ४४-४५ ॥ उनके सभी पुत्र भी शिवधर्मसे बहिष्कृत हो अग्रे तद्वद्भविष्यन्ति कलौ बहुजनाः खलाः ॥ ४६ गये । आगे चलकर कलियुगमें बहुत - से लोग उन्हींके समान दुष्ट होंगे । हे मुनिसत्तमो! इस प्रकार मैंने इति प्रोक्तमशेषेण तद्वृत्तं मुनिसत्तमाः । उनका समग्र वृत्तान्त आपलोगोंसे कहा । हे प्राज्ञो! पूर्ववृत्तमपि प्राज्ञाः श्रुतं सर्वैस्तु चादरात् ॥ ४७ इसके पहलेका वृत्तान्त भी आपलोग आदरपूर्वक सुन चुके हैं ॥ ४६-४७ ॥ इति वश्च समाख्यातो गौतम्याश्च समुद्भवः । इस प्रकार मैंने गौतमी गंगाकी उत्पत्ति तथा माहात्म्यमुत्तमं चैव सर्वपापहरं परम् ॥ ४८ पापहारी उत्तम माहात्म्य आपलोगोंसे कह दिया और त्र्यंबकस्य च माहात्म्यं ज्योतिर्लिंगस्य कीर्तितम् । त्र्यम्बक नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य भी मैंने कहा, यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः जिसे सुनकर मनुष्य सारे पापोंसे छूट जाता है, इसमें ॥ ४ ९ सन्देह नहीं है ॥ ४८-४९ ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि वैद्यनाथेश्वरस्य अब इसके आगे मैं वैद्यनाथेश्वर नामक हि । ज्योतिर्लिंगके पापनाशक माहात्म्यका वर्णन करूँगा,
ज्योतिर्लिंगस्य माहात्म्यं श्रूयतां पापहारकम् ॥ ५० । आप लोग उसे सुनिये ॥ ५० ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे चतुर्थ्यां कोटिरुद्रसंहितायां त्र्यंबकेश्वरज्योतिर्लिंगमाहात्म्यवर्णनं ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत चतुर्थ कोटिरुद्रसंहितामें नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
त्र्यम्बकेश्वरज्योतिर्लिंगमाहात्म्यवर्णन नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
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अ ० २८ ] कोटिरुद्रसंहिता ३०३ अथाष्टाविंशोऽध्यायः वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंगके सूत उवाच
रावणो राक्षसश्रेष्ठो मानी मानपरायणः ।
आरराध हरं भक्त्या कैलासे पर्वतोत्तमे ॥
आराधितः कियत्कालं न प्रसन्नो हरो यदा ।
तदा चान्यत्तपश्चक्रे प्रसादार्थं शिवस्य सः ॥
ततश्चायं हिमवतः सिद्धिस्थानस्य वै गिरेः ।
पौलस्त्यो रावणः श्रीमान् दक्षिणे वृक्षखण्डके ॥
भूमौ गर्तं वरं कृत्वा तत्राग्निं स्थाप्य स द्विजाः ।
तत्सन्निधौ शिवं स्थाप्य हवनं स चकार ह ॥
ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यस्थो वर्षासु स्थंडिलेशयः ।
शीते जलांतरस्थो हि त्रिधा चक्रे तपश्च सः ॥
चकारैवं बहु तपो न प्रसन्नस्तदापि हि ।
परमात्मा महेशानो दुराराध्यो दुरात्मभिः ॥
ततः शिरांसि छित्त्वा च पूजनं शंकरस्य वै ।
प्रारब्धं दैत्यपतिना रावणेन महात्मना ॥
एकैकं च शिरश्छिन्नं विधिना शिवपूजने ।
एवं सत्क्रमतस्तेन छिन्नानि नव वै यदा ॥
एकस्मिन्नवशिष्टे तु प्रसन्नः शंकरस्तदा ।
आविर्बभूव तत्रैव संतुष्टो भक्तवत्सलः ॥
शिरांसि पूर्ववत्कृत्वा नीरुजानि तथा प्रभुः ।
मनोरथं ददौ तस्मै चातुलं बलमुत्तमम् ॥
प्रसादं तस्य संप्राप्य रावणः स च राक्षसः ।
प्रत्युवाच शिवं शम्भुं नतस्कंधः कृतांजलिः ॥
रावण उवाच
प्रसन्नो भव देवेश लंकां च त्वां नयाम्यहम् ।
सफलं कुरु मे कामं त्वामहं शरणं गतः ॥
प्रादुर्भाव एवं माहात्म्यका वर्णन सूतजी बोले- किसी समय अभिमानी तथा मानपरायण राक्षस श्रेष्ठ रावण पर्वतोंमें उत्तम कैलासपर १ भक्तिपूर्वक शिवजीकी आराधना करने लगा ॥१ ॥
जब कुछ समयतक आराधना किये जानेपर भी २ शिवजी प्रसन्न न हुए, तब शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये उसने दूसरे प्रकारका तप करना प्रारम्भ किया ॥ २ ॥
हे द्विजो! पुलस्त्यकुलमें जन्म ग्रहण करनेवाला ३ ऐश्वर्यसम्पन्न वह रावण सिद्धिके स्थानभूत हिमालय पर्वतके दक्षिणमें वृक्षोंसे भरी हुई भूमिमें एक उत्तम गर्त बनाकर उसमें अग्नि स्थापित करके उसके समीपमें ४ शिवजीकी स्थापनाकर हवन करने लगा ॥ ३-४ ॥ वह ग्रीष्मकालमें पंचाग्निके मध्यमें बैठकर, ५ वर्षाकालमें [ खुले ] चबूतरेपर बैठकर और शीतकालमें जलके भीतर रहकर - इस तरह तीन प्रकारसे तप करने लगा ॥५ ॥
इस प्रकार उसने घोर तप किया, तब भी ६ दुष्टात्माओंके लिये दुराराध्य परमात्मा सदाशिव प्रसन्न नहीं हुए ॥६ ॥
उसके बाद दैत्यपति महात्मा रावणने अपने ७ । सिर काटकर शिवका पूजन प्रारम्भ किया ॥७ ॥
उसने शिवपूजनमें विधिपूर्वक एक - एक सिर काट डाला, इस प्रकार जब उसने क्रमशः अपने नौ ८ सिर काट डाले, तब एक सिरके शेष रहनेपर शंकरजी प्रसन्न हो गये और वे भक्तवत्सल सदाशिव सन्तुष्ट ९ होकर वहीं प्रकट हो गये ॥८ - ९ ॥ प्रभु सदाशिवने उसके सिरोंको पूर्ववत् स्वस्थ करके उसको मनोवांछित फल तथा अतुल बल प्रदान १० किया ॥ १० ॥
तब उनकी प्रसन्नता प्राप्तकर उस राक्षस ११ रावणने हाथ जोड़कर तथा सिर झुकाकर कल्याणकारी शिवजीसे कहा —॥११ ॥
रावण बोला- हे देवेश! आप मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपको लंकापुरी ले चलता हूँ, मेरी इस १२ । इच्छाको पूर्ण कीजिये, मैं आपकी शरणमें हूँ ॥ १२ ॥
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३०४ सूत उवाच इत्युक्तश्च तदा तेन शंभुर्वै रावणेन सः प्रत्युवाच विचेतस्कः संकटं परमं गतः शिव उवाच श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ वचो मे सारवत्तया नीयतां स्वगृहे मे हि सद्भक्त्या लिंगमुत्तमम् भूमौ लिंगं यदा त्वं च स्थापयिष्यसि यत्र वै स्थास्यत्यत्र न संदेहो यथेच्छसि तथा कुरु सूत उवाच इत्युक्तः शंभुना तेन रावणो राक्षसेश्वरः तथेति तत्समादाय जगाम भवनं निजम् ॥ आसीन्मूत्रोत्सर्गकामो मार्गे हि शिवमायया । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ सूतजी बोले- तब उस रावणके द्वारा इस । प्रकार कहे जानेपर वे शिवजी परम संकटमें पड़ गये ॥ १३ और खिन्नमनस्क होकर उन्होंने कहा- ॥ १३ ॥
शिवजी बोले- हे राक्षस श्रेष्ठ! तुम मेरी महत्त्वपूर्ण । बात सुनो, तुम उत्तम भक्तिसे युक्त होकर मेरे इस श्रेष्ठ शिवलिंगको अपने घर ले जाओ । किंतु तुम इस ॥ १४ लिंगको भूमिपर जहाँ भी रख दोगे, यह वहींपर स्थित । हो जायगा, इसमें सन्देह नहीं । अब जैसा चाहो, वैसा ॥ १५ करो ॥ १४-१५ ॥ सूतजी बोले- उन शिवजीके इस प्रकार कहनेपर । राक्षसेश्वर रावण ‘ ठीक है ' - ऐसा कहकर उसे लेकर १६ अपने घर चला ॥ १६ ॥
इसके बाद शिवकी मायासे मार्गमें ही उसे तत्स्तंभितुं तुं न शक्तोऽभूत्पौलस्त्यो रावणः प्रभुः ॥ १७ लघुशंकाकी इच्छा हुई । जब पुलस्त्यका पौत्र
दृष्ट्वैकं तत्र वै गोपं प्रार्थ्य लिंगं ददौ च तत् ।
मुहूर्तके ह्यतिक्रांते गोपोऽभूद्विकलस्तदा ॥
भूमौ संस्थापयामास तद्भारेणातिपीडितः ।
तत्रैव तत्स्थितं लिङ्गं वज्रसारसमुद्भवम् ।
सर्वकामप्रदं चैव दर्शनात्पापहारकम् ॥
वैद्यनाथेश्वरं नाम्ना तल्लिंगमभवन्मुने ।
प्रसिद्धं त्रिषु लोकेषु भुक्तिमुक्तिप्रदं सताम् ॥
ज्योतिर्लिंगमिदं श्रेष्ठं दर्शनात्पूजनादपि ।
सर्वपापहरं दिव्यं मुक्तिवर्धनमुत्तमम् ॥
तस्मिँलिंगे स्थिते तत्र सर्वलोकहिताय वै ।
रावणः स्वगृहं गत्वा वरं प्राप्य महोत्तमम् ।
प्रियायै सर्वमाचख्यौ सुखेनाति महासुरः ॥
तच्छ्रुत्वा सकला देवाः शक्राद्या मुनयस्तथा ।
परस्परं समामन्त्र्य शिवासक्तधियोऽमलाः ॥
वह सामर्थ्यशाली रावण मूत्रके वेगको रोकनेमें समर्थ नहीं हुआ, तब उसने वहाँ एक गोपको देखकर १८ उससे प्रार्थनाकर उस शिवलिंगको उसीको दे दिया । एक मुहूर्त बीतने पर वह गोप शिवलिंगके भारसे पीड़ित होकर व्याकुल हो उठा और उसे पृथ्वीपर रख दिया । इस प्रकार वज्रसारसे उत्पन्न हुआ वह लिंग वहींपर स्थित हो गया, जो दर्शनमात्रसे पापोंको दूर १ ९ करनेवाला तथा समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है॥१७–१९ ॥ हे मुने! वह लिंग तीनों लोकोंमें वैद्यनाथेश्वर २० नामसे प्रसिद्ध हुआ, वह सत्पुरुषोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है ॥ २० ॥
यह दिव्य, उत्तम एवं श्रेष्ठ ज्योतिर्लिंग दर्शन २१ एवं पूजनसे सारे पापोंको दूर करनेवाला है और मुक्ति प्रदान करनेवाला है ॥ २१ ॥
सारे लोकोंका कल्याण करनेके लिये उस लिंगके वहाँ स्थित हो जानेपर रावण श्रेष्ठ वर २२ प्राप्तकर अपने घर चला गया और उस महान् असुरने अपनी पत्नीसे अत्यन्त हर्षपूर्वक सारा वृत्तान्त बताया ॥ २२ ॥
इस [ वृत्तान्त ] -को सुनकर इन्द्र आदि सभी देवता तथा निष्पाप मुनिगण आपसमें विचारकर २३ । वैद्यनाथेश्वरमें आसक्त बुद्धिवाले हो गये ॥ २३ ॥
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अ ० २८ ] कोटिरुद्रसंहिता ३०५
तस्मिन्काले सुराः सर्वे हरिब्रह्मादयो मुने ।
आजग्मुस्तत्र सुप्रीत्या पूजां चक्रुर्विशेषतः ॥
प्रत्यक्षं तं तदा दृष्ट्वा प्रतिष्ठाप्य च ते सुराः ।
वैद्यनाथेति संप्रोच्य नत्वा नुत्वा दिवं ययुः ॥
ऋषय ऊचुः
तस्मिँल्लिंगे स्थिते तत्र रावणे च गृहं गते ।
किं चरित्रमभूत्तात ततस्तद्वद विस्तरात् ॥
सूत उवाच
रावणोऽपि गृहं गत्वा वरं प्राप्य महोत्तमम् ।
प्रियायै सर्वमाचख्यौ मुमोदाति महासुरः ॥
तच्छ्रुत्वा सकलं देवाः शक्राद्या मुनयस्तथा ।
परस्परं समूचुस्ते समुद्विग्ना मुनीश्वराः ॥
देवादय ऊचुः
रावणोऽयं दुरात्मा हि देवद्रोही खलः कुधीः ।
शिवाद् वरं च संप्राप्य दुःखं दास्यति नोऽति सः ॥
किं कुर्मः क्व च गच्छामः किं भविष्यति वा पुनः ।
दुष्टश्च दक्षतां प्राप्तः किं किं नो साधयिष्यति ॥
इति दुःखं समापन्नाः शक्राद्या मुनयः सुराः ।
नारदं च समाहूय पप्रच्छुर्विकलास्तदा ॥
देवा ऊचुः
सर्वं कार्यं समर्थोऽसि कर्तुं त्वं मुनिसत्तम ।
उपायं कुरु देवर्षे देवानां दुःखनाशने ॥
रावणोऽयं महादुष्टः किं किं नैव करिष्यति ।
क्व यास्यामो वयं चात्र दुष्टेनापीडिता वयम् ॥
नारद उवाच
दुःखं त्यजत भो देवा युक्तिं कृत्वा च याम्यहम् ।
देवकार्यं करिष्यामि कृपया शंकरस्य वै ॥
हे मुने! उस समय ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी २४ देवगण वहाँ आये और उन्होंने विशेष विधिसे अतिशय प्रीतिपूर्वक शिवजीका पूजन किया ॥२४ ॥
वहाँ भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन करके २५ देवताओंने उस ( वज्रसारमय ) शिवलिंगकी विधिवत् स्थापना की और उसका वैद्यनाथ नाम रखकर उसकी वन्दना और स्तवन करके वे स्वर्गलोकको चले गये ॥ २५ ॥
ऋषि बोले- हे तात! उस लिंगके वहाँ स्थित हो जानेपर तथा रावणके घर चले जानेपर क्या घटना २६ हुई, उसे विस्तारसे कहिये ॥ २६ ॥
सूतजी बोले- अति उत्तम वर प्राप्तकर घर जा करके महान् असुर रावणने सारा वृत्तान्त अपनी २७ पत्नीसे कहा और वह बहुत आनन्दित हुआ ॥ २७ ॥
हे मुनीश्वरो! वह सारा वृत्तान्त सुनकर वे इन्द्र २८ आदि देवता तथा मुनिगण अत्यन्त व्याकुल होकर आपसमें कहने लगे— ॥ २८ ॥
देवता बोले — यह दुरात्मा रावण देवद्रोही, खल तथा दुर्बुद्धि है, शिवजीसे वरदान पाकर यह २ ९ हमलोगोंको बहुत अधिक दुःखित करेगा ॥२ ९ ॥ हमलोग क्या करें? कहाँ जायँ? अब फिर क्या ३० होगा? एक तो वह स्वयं दुष्ट है, दूसरे प्राप्तकर और भी उद्धत हो गया है, अतः कौन - सा अपकार नहीं करेगा ॥३० ॥
तब इस प्रकार दुखी हो इन्द्रादि ३१ मुनिगण नारदजीको बुलाकर व्याकुल हो लगे ॥ ३१ ॥
देवगण बोले- हे मुनिसत्तम! कार्य करनेमें समर्थ हैं, अतः हे देवर्षे ३२ दुःखनाशका कोई उपाय कीजिये ॥ ३२ यह महाखल रावण क्या - क्या नहीं ३३ हमलोग इस दुष्टसे सर्वथा पीड़ित हैं, हमलोग कहाँ जायँ? ॥ ३३ ॥
अब वरदान हमलोगोंका देवता एवं करके पूछने आप सभी ! देवगणोंके ॥ कर डालेगा! अतः अब नारदजी बोले — हे देवताओ! आपलोग दुखी मत होइये, मैं जा रहा हूँ और कोई उपाय करके शंकरकी ३४ । कृपासे देवताओंका कार्य अवश्य करूँगा ॥३४ ॥
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३०६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २८ सूत उवाच सूतजी बोले- ऐसा कहकर वे देवर्षि [ नारद ] इत्युक्त्वा स तु देवर्षिरगमद्रावणालयम् । | रावणके घर गये और उससे सत्कृत होकर प्रीति सत्कारं समनुप्राप्य प्रीत्योवाचाखिलं च तत् नारद उवाच राक्षसोत्तम धन्यस्त्वं शैववर्यस्तपोधन त्वां दृष्ट्वा च मनो मेऽद्य प्रसन्नमति रावण स्ववृत्तं ब्रूह्यशेषेण शिवाराधनसंभवम् इति पृष्टस्तदा तेन रावणो वाक्यमब्रवीत् रावण उवाच गत्वा मया तु कैलासे तपोऽर्थं च महामुने तत्रैव बहुकालं वै तपस्तप्तं सुदारुणम् यदा न शंकरस्तुष्टस्ततश्च परिवर्तितम् आगत्य वृक्षखण्डे वै पुनस्तप्तं मया मुने ॥ ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्ये तु वर्षासु स्थंडिलेशयः । शीते जलांतरस्थो हि कृतं चैव त्रिधा तपः
एवं मया कृतं तत्र तपोऽत्युग्रं मुनीश्वर ।
तथापि शंकरो मह्यं न प्रसन्नोऽभवन्मनाक् ॥
तदा मया तु क्रुद्धेन भूमौ गर्तं विधाय च ।
तत्राग्निं च समाधाय पार्थिवं च प्रकल्प्य च ॥
गंधैश्च चंदनैश्चैव धूपैश्च विविधैस्तदा ।
नैवेद्यैः पूजितः शम्भुरारार्तिकविधानतः ॥
प्रणिपातैः स्तवैः पुण्यैस्तोषितः शंकरो मया ।
गीतैर्नृत्यैश्च वाद्यैश्च मुखाङ्गुलिसमर्पणैः ॥
एतैश्च विविधैश्चान्यैरुपायैर्भूरिभिर्मुने ।
शास्त्रोक्तेन विधानेन पूजितो भगवान् हरः ॥
न तुष्टः सम्मुखो जातो यदा च भगवान् हरः ।
तदाहं दुःखितोऽभूवं तपसोऽप्राप्य सत्फलम् ॥
धिक् शरीरं बलं चैव धिक् तपःकरणं मम ।
इत्युक्त्वा तु मया तत्र स्थापितेऽग्नौ हुतं बहु ॥
पुनश्चेति विचार्यैव त्यक्षाम्यग्नौ निजां तनुम् ।
संछिन्नानि शिरांस्येव तस्मिन् प्रज्वलिते शुचौ ॥
॥ ३५ । उन्होंने वह सब कहा- ॥ ३५ ॥
नारदजी बोले - हे राक्षसोत्तम! तुम धन्य हो । । और श्रेष्ठ शिवभक्त हो । हे तपोधन! हे रावण! तुम्हें ॥ ३६ । देखकर मेरा मन आज बहुत अधिक प्रसन्न हुआ । | अब तुम शिवाराधन- सम्बन्धी अपने सम्पूर्ण वृत्तान्तको । कहो । तब उनके इस प्रकार पूछनेपर रावणने यह ॥ ३७ वचन कहा— ॥ ३६-३७ ॥ रावण बोला — हे महामुने! तप करनेके लिये । कैलासपर्वतपर जाकर मैंने वहाँ बहुत समयतक ॥ ३८ अत्यन्त कठोर तप किया ॥ ३८ ॥
। हे मुने! जब शिवजी प्रसन्न नहीं हुए, तब ३ ९ वहाँसे आकर मैं पुनः वृक्षसमूहके समीप दूसरे प्रकारसे तपस्या करने लगा । ग्रीष्मऋतुमें पंचाग्निके मध्य रहकर, वर्षामें स्थण्डिलशायी होकर और शीतकालमें जलके मध्यमें रहकर तीन प्रकारसे मैंने ॥ ४० तप किया ॥ ३ ९ -४० ॥ हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने वहाँ अति कठोर ४१ तप किया, फिर भी जब मेरे ऊपर थोड़ा भी शिवजी प्रसन्न न हुए, तब मुझे बड़ा क्रोध हुआ और मैंने ४२ भूमिमें गड्ढा खोदकर उसमें अग्नि स्थापित करके तथा पार्थिव शिवलिंग बनाकर गन्ध, चन्दन, धूप, विविध ४३ नैवेद्य तथा आरती आदिसे विधिपूर्वक शिवजीका पूजन किया । प्रणिपात, पुण्यप्रद स्तुति, गीत, नृत्य, वाद्य तथा मुखांगुलि - समर्पणके द्वारा मैंने शंकरजीको ४४ सन्तुष्ट किया । हे मुने! इन उपायों तथा अन्य बहुत-से उपायोंके द्वारा शास्त्रोक्त विधिसे मैंने भगवान् ४५ शिवका पूजन किया ॥ ४१-४५ ॥ जब भगवान् शिव सन्तुष्ट होकर प्रकट नहीं ४६ हुए, तब मैं अपने तपका उत्तम फल न प्राप्तकर दुखी हुआ । मेरे शरीर तथा बलको धिक्कार है । मेरे तपको भी धिक्कार है, ऐसा कहकर मैंने वहाँ स्थापित ४७ अग्निमें बहुत हवन किया ॥ ४६-४७ ॥ इसके बाद यह विचार करके कि अब मैं इस अग्निमें अपने शरीरकी ही आहुति दूँगा, मैं उस प्रज्वलित ४८ अग्निकी सन्निधिमें अपने सिरोंको काटने लगा ॥ ४८ ॥