शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 681–690
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690
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अ ० १३ ] कैलाससंहिता ६६७
इयं भगवती साक्षाच्छंकरार्द्धशरीरिणी ।
पञ्चवक्त्रा दशभुजा त्रिपञ्चनयनोज्ज्वला ॥
नवरत्नकिरीटोद्यच्चन्द्रलेखावतंसिनी शुद्धस्फटिकसंकाशा दशायुधधरा शुभा ॥ हारकेयूरकटककिंकिणीनूपुरादिभिः भूषितावयवा दिव्यवसना रत्नभूषणा ॥
विष्णुना विधिना देवऋषिगंधर्वदानवैः ।
मानवैश्च सदा सेव्या सर्वात्मव्यापिनी शिवा ॥
सदाशिवस्य देवस्य धर्मपत्नी मनोहरा ।
जगदम्बा त्रिजननी त्रिगुणा निर्गुणाप्यजा ॥
इत्येवं संविचार्याथ गायत्रीं प्रजपेत्सुधीः ।
आदिदेवीं च त्रिपदां ब्राह्मणत्वादिदामजाम् ॥
यो ह्यन्यथा जपेत्पापो गायत्रीं शिवरूपिणीम् ।
स पच्यते महाघोरे नरके कल्पसंख्यया ॥
सा व्याहृतिभ्यः संजाता तास्वेव विलयं गता । ताश्च प्रणवसम्भूता प्रणव प्रणवे विलयं गताः ॥ "
प्रणवः सर्ववेदादिः प्रणवः शिववाचकः ।
मन्त्राधिराजराजश्च महाबीजं मनुः परः ॥
शिवो वा प्रणवो ह्येष प्रणवो वा शिवः स्मृतः ।
वाच्यवाचकयोर्भेदो नात्यन्तं विद्यते यतः ॥
एनमेव महामन्त्रं जीवानां च तनुत्यजाम् । काश्यां संश्राव्य मरणे दत्ते मुक्तिं परां शिवः
तस्मादेकाक्षरं देवं शिवं परमकारणम् ।
उपासते यतिश्रेष्ठा हृदयाम्भोजमध्यगम् ॥
मुमुक्षवोऽपरे धीरा विरक्ता लौकिका नराः ।
विषयान्मनसा ज्ञात्वोपासते परमं शिवम् ॥
ये भगवती सावित्री साक्षात् शंकरकी ५२ अर्धांगिनी हैं, पाँच मुख- दस भुजाएँ तथा पंद्रह नेत्रोंसे समन्वित हैं, इनके शरीरका वर्ण अत्यन्त उज्ज्वल है, नवरत्नसे जटित इनका किरीट मस्तकपर चन्द्रमाकी ५३ लेखासे सुशोभित हो रहा है, शुद्ध स्फटिकके समान इनके शरीरकी कान्ति है, मंगलमयी ये हाथोंमें दस आयुध धारण की हुई हैं, इनके अंगोंमें हार - केयूर-५४ किंकिणी तथा नूपुर आदि आभूषण सुशोभित हो रहे हैं, ये दिव्य वस्त्र तथा रत्नोंके आभूषणोंसे मण्डित हैं ॥५२–५४ ॥ ये शिवा सर्वव्यापिनी हैं एवं विष्णु, ब्रह्मा, ५५ देवता, ऋषि, गन्धर्व, दानव एवं मनुष्योंसे सर्वदा सेवनीय हैं, ये सदाशिवकी मनोहर धर्मपत्नी हैं, जगदम्बा हैं, तीनों लोकोंको उत्पन्न करनेवाली हैं, ५६ त्रिगुणात्मिका, निर्गुणा एवं अजा हैं ॥ ५५-५६ ॥ इस प्रकारका विचार करके बुद्धिमान् पुरुषको ५७ गायत्रीका जप करना चाहिये; क्योंकि ये आदिदेवी हैं, त्रिपदा हैं, ब्राह्मणत्व आदि प्रदान करनेवाली एवं अजा हैं । जो पापी शास्त्रीयविधिका अतिक्रमणकर ५८ शिवरूपा गायत्रीका जप करते हैं, वे कल्पपर्यन्त नरकमें यातना प्राप्त करते हैं ॥५७-५८ ॥ व्याहृतियोंसे ही गायत्री उत्पन्न हुई हैं और ५ ९ उन्हींमें लीन हो जाती हैं और व्याहृतियाँ प्रणवसे उत्पन्न होकर उसीमें लीन होती हैं ॥ ५ ९ ॥ सम्पूर्ण वेदोंका आदि प्रणव ही है तथा शिवका ६० वाचक भी प्रणव ही है । यह श्रेष्ठ मन्त्र मन्त्रोंका राजाधिराज तथा महाबीजस्वरूप है ॥ ६० ॥
प्रणव ही शिव और शिव ही प्रणव कहे गये हैं; ६१ क्योंकि वाचक और वाच्यमें कुछ भी भेद नहीं है ॥ ६१ ॥
काशीमें मृत्यु प्राप्त करते समय शिवजी ॥ ६२ प्राणियोंको इसी मन्त्रका उपदेश देकर मुक्त करते हैं । इसीलिये एकाक्षर -स्वरूप, दिव्य, मंगलमय तथा परमकारणरूप इस मन्त्रकी यतिश्रेष्ठ हृदयकमलमें ६३ उपासना करते हैं ॥ ६२-६३ ॥ अन्य मुमुक्षु, धीर, विरक्त तथा लौकिक पुरुष भी इन विषयोंको अच्छी तरह जानकर परमकल्याणमय ६४ । प्रणवकी उपासना करते हैं ॥६४ ॥
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ ६६८
एवं विलाप्य गायत्रीं प्रणवे शिववाचके ।
अहं वृक्षस्य रेरिवेत्यनुवाकं जपेत्पुनः ॥ ६५
यश्छन्दसामामृषभ इत्यनुवाकमुपक्रमात् ।
गोपायान्तं जपन्यश्चादुत्थितोऽहमितीरयेत् ॥ ६६
वदेज्जपेत् त्रिधा मन्दमध्योच्छ्रायक्रमान्मुने ।
प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य सृष्टिस्थितिलयक्रमात् ॥ ६७
तेषामथ क्रमाद्भूयाद्भूः संन्यस्तम्भुवस्तथा ।
संन्यस्तं सुवरित्युक्त्वा संन्यस्तं पदमुच्चरन् ॥ ६८
सर्वमन्त्रान्त प्रदेशे मयेति च पदं वदेत् ।
प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य समष्टिव्याहृतीर्वदेत् ॥६ ९
समस्तमित्यतो ब्रूयान्मयेति च समब्रवीत् ।
सदाशिवं हृदि ध्यात्वा मंदादीति ततो मुने ॥ ७०
प्रैषमन्त्रांस्तु जप्त्वैवं सावधानेन चेतसा ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहेति संजपन् ॥ ७१
प्राच्यां दिश्यप उद्धृत्य प्रक्षिपेदंजलिं ततः ।
शिखां यज्ञोपवीतं च यत्रोत्पाट्य च पाणिना ॥ ७२
गृहीत्वा प्रणवं भूश्च समुद्रं गच्छ संवदेत् ।
वह्निजायां समुच्चार्य सोदकाञ्जलिना ततः ॥ ७३
अप्सु हूयादथ प्रेषैरभिमन्त्र्य त्रिधा त्वपः ।
प्राश्य तीरे समागत्य भूमौ वस्त्रादिकं त्यजेत् ॥ ७४
इस प्रकार गायत्रीको शिववाचक प्रणवमें लीन करनेके पश्चात् ' अहं वृक्षस्य रेरिवा " - - - इस अनुवाकका जप करना चाहिये ॥ ६५ ॥
तत्पश्चात् ' यश्छन्दसामृषभ: ' ( तैत्तिरीय ० १।४ । १ ) - इस अनुवाकको आरम्भसे लेकर " ' श्रुतं मे गोपाय’२ तक पढ़कर कहे- ' दारैषणायाश्च वित्तै-| षणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थितोऽहम् ' अर्थात् ‘ मैं स्त्रीकी कामना, धनकी कामना और लोकोंमें ख्यातिकी कामनासे ऊपर उठ गया हूँ । ' मुने! इस वाक्यका मन्द, मध्यम और उच्चस्वरसे क्रमशः तीन बार उच्चारण करे । तत्पश्चात् सृष्टि, स्थिति और लयके क्रमसे पहले प्रणवमन्त्रका उद्धार करे, फिर क्रमशः इन वाक्योंका उच्चारण करे — ' ॐ भूः संन्यस्तं मया ', ' ॐ भुवः संन्यस्तं मया ', II सुवः संन्यस्तं मया ', ' ॐ भूर्भुवः सुवः संन्यस्तं मया इन वाक्योंका मन्द, मध्यम और उच्चस्वरसे हृदयमें सदाशिवका ध्यान करते हुए सावधान चित्तसे उच्चारण करे । तदनन्तर ‘ अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहा ' ( मेरी ओरसे सब प्राणियोंको अभयदान दिया गया ) — ऐसा कहते हुए पूर्व दिशामें एक अंजलि जल लेकर छोड़े । इसके बाद शिखाके शेष बालोंको हाथसे उखाड़ डाले और यज्ञोपवीतको निकालकर जलके साथ हाथमें ले इस प्रकार कहे- ' ॐ भूः समुद्रं गच्छ स्वाहा ' यों कहकर उसका जलमें होम कर दे । फिर ' ॐ भूः संन्यस्तं मया ', ' ॐ भुवः संन्यस्तं मया ', ' ॐ सुवः संन्यस्तं मया ' – इस प्रकार तीन बार कहकर तीन बार जलको अभिमन्त्रित करके उसका १. अहं वृक्षस्य रेरिया । कोर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणं सवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् । ( तैत्तिरीय ० १।१०।१ ) २. ‘ मैं संसारवृक्षका उच्छेद करनेवाला हूँ, मेरी कीर्ति पर्वतके शिखरकी भाँति उन्नत है; अन्नोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें जैसे उत्तम अमृत है, उसी प्रकार मैं भी अतिशय पवित्र अमृतस्वरूप हूँ तथा मैं प्रकाशयुक्त धनका भण्डार हूँ, परमानन्दमय अमृतसे अभिषिक्त तथा श्रेष्ठ बुद्धिवाला हूँ - इस प्रकार यह त्रिशंकु ऋषिका अनुभव किया हुआ वैदिक प्रवचन है । ' ३. यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः केशोऽसि मेधया पिहितः श्रुतं मे गोपाय । ' जो वेदोंमें सर्वश्रेष्ठ है, सर्वरूप है और अमृतस्वरूप वेदोंसे प्रधानरूपमें प्रकट हुआ है, वह सबका स्वामी परमेश्वर मुझे धारणायुक्त बुद्धिसे सम्पन करे । हे देव! मैं आपकी कृपासे अमृतमय परमात्माको अपने हृदयमें धारण करनेवाला बन जाऊँ । मेरा शरीर विशेष फुर्तीला — सब प्रकारसे रोगरहित हो और मेरी जिह्वा अतिशय मधुमती ( मधुरभाषिणी ) हो जाय । मैं दोनों कानोंद्वारा अधिक सुनता रहूँ । ( हे प्रणव! तू ) लौकिक बुद्धिसे ढकी हुई परमात्माकी निधि है । तू मेरे सुने हुए उपदेशकी रक्षा करे । '
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अ ० १३ ] कैलाससंहिता ६६ ९
उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा गच्छेत् सप्तपदाधिकम् ।
किञ्चिद्दूरमथाचार्यस्तिष्ठ तिष्ठेति संवदेत् ॥ ७५
लोकस्य व्यवहारार्थं कौपीनं दण्डमेव च ।
भगवन्स्वीकुरुष्वेति दद्यात्स्वेनैव पाणिना ॥ ७६
दत्त्वा सुदोरं कौपीनं काषायवसनं ततः ।
आच्छाद्याचम्य च द्वेधा तं शिष्यमिति संवदेत् ॥ ७७
इन्द्रस्य वज्रोऽसि तत इति मन्त्रमुदाहरेत् ।
सम्प्रार्थ्य दण्डं गृह्णीयात्सखामा इति संजपन् ॥ ७८
अथ गत्वा गुरोः पार्श्वं शिवपादांबुजं स्मरन् ।
प्रणमेद्दण्डवद्भूमौ त्रिवारं संयतात्मवान् ॥ ७ ९
पुनरुत्थाय च शनैः प्रेम्णा पश्यन्गुरुं निजम् ।
कृताञ्जलिपुटस्तिष्ठेद्गुरुपादसमीपतः ॥८०
कर्मारम्भात्पूर्वमेव गृहीत्वा गोमयं शुभम् ।
स्थूलामलकमात्रेण कृत्वा पिण्डान्विशोषयेत् ॥ ८१
सौरैस्तु किरणैरेव होमारम्भाग्निमध्यगान् ।
निक्षिप्य होमसम्पूर्त्ती भस्म सङ्गृह्य गोपयेत् ॥ ८२
ततो गुरुः समादाय विरजानलजं सितम् ।
भस्म तेनैव तं शिष्यमग्निरित्यादिभिः क्रमात् ॥ ८३
* मैंने भूलोकका संन्यास ( पूर्णत: त्याग ) कर दिया । मैंने आचमन करे । फिर जलाशयके किनारे आकर वस्त्र और कटिसूत्रको भूमिपर त्याग दे तथा उत्तर या पूर्वकी ओर मुँह करके सात पदसे कुछ अधिक चले । कुछ दूर जानेपर आचार्य उससे कहे, ' ठहरो, ठहरो भगवन्! लोक - व्यवहारके लिये कौपीन और दण्ड स्वीकार करो । ' यों कह आचार्य अपने हाथसे ही उसे कटिसूत्र और कौपीन देकर गेरुआ वस्त्र भी अर्पित करे । तत्पश्चात् संन्यासी जब उससे अपने शरीरको ढककर दो बार आचमन कर ले तब आचार्य शिष्यसे कहे- ' इन्द्रस्य वज्रोऽसि ' यह मन्त्र बोलकर दण्ड ग्रहण करो । तब वह इस मन्त्रको पढ़े और ' सखा मा गोपायौजः सखा योऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारय ' * – इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए दण्डकी प्रार्थना करके उसे हाथमें ले । ( तत्पश्चात् प्रणव या गायत्रीका उच्चारण करके । कमण्डलु ग्रहण करे । ) तदनन्तर भगवान् शिवके चरणारविन्दका चिन्तन करते हुए गुरुके निकट जा वह तीन बार पृथ्वीमें लोटकर दण्डवत् प्रणाम करे । उस समय वह अपने मनको पूर्णतया संयममें रखे । फिर धीरेसे उठकर प्रेमपूर्वक अपने गुरुकी ओर देखते हुए हाथ जोड़ उनके चरणोंके समीप खड़ा हो जाय । संन्यास - दीक्षा-विषयक कर्म आरम्भ होनेके पहले ही शुद्ध गोबर लेकर आँवले बराबर उसके गोले बना ले और सूर्यकी किरणोंसे ही उन्हें सुखाये । फिर होम आरम्भ होनेपर उन गोलोंको होमाग्निके बीचमें डाल दे । होम समाप्त होनेपर उन सबको संग्रह करके सुरक्षित रखे । तदनन्तर दण्डधारणके पश्चात् गुरु विरजाग्निजनित उस श्वेत भस्मको लेकर उसीको शिष्यके अंगोंमें लगाये अथवा उसे लगानेकी आज्ञा दे । उसका क्रम इस प्रकार है — ‘ ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्म सर्वश्र्ह वा इदं भस्म मन एतानि चक्षूषि ' इस मन्त्रसे । भस्मको अभिमन्त्रित करे । तदनन्तर ईशानादि पाँच भुवः ( अन्तरिक्ष ) लोकका परित्याग कर दिया तथा मैंने स्वर्गलोकका भी सर्वथा त्याग कर दिया । मैंने भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक - इन तीनोंको भलीभाँति त्याग दिया ।
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ ६७०
मन्त्रैरङ्गानि संस्पृश्य मूर्धादिचरणान्ततः ।
ईशानाद्यैः पञ्चमन्त्रैः शिर आरभ्य सर्वतः ॥ ८४
समुद्धृत्य विधानेन त्रिपुण्ड्रं धारयेत्ततः ।
त्रियायुषैस्त्र्यम्बकैश्च मूर्ध्न आरभ्य च क्रमात् ॥ ८५
ततः सद्भक्तियुक्तेन चेतसा शिष्यसत्तमः ।
हृत्पंकजे समासीनं ध्यायेच्छिवमुमासखम् ॥ ८६
हस्तं निधाय शिरसि शिष्यस्य स गुरुर्वदेत् ।
त्रिवारं प्रणवं दक्षकर्णे ऋष्यादिसंयुतम् ॥ ८७
ततः कृत्वा च करुणां प्रणवस्यार्थमादिशेत् ।
षड्विधार्थपरिज्ञानसहितं गुरुसत्तमः ॥ ८८
द्विषट्प्रकारं स गुरुं प्रणमेद्भुवि दण्डवत् ।
तदधीनो भवेन्नित्यं नान्यत्कर्म समाचरेत् ॥ ८ ९
तदाज्ञया ततः शिष्यो वेदान्तार्थानुसारतः ।
शिवज्ञानपरो भूयात्सगुणागुणभेदतः ॥ ९ ०
ततस्तेनैव शिष्येण श्रवणाद्यङ्गपूर्वकम् ।
प्राभातिकाद्यनुष्ठानं जपान्ते कारयेद् गुरुः॥९ १
पूजां च मण्डले तस्मिन्कैलासप्रस्तराह्वये ।
शिवोदितेन मार्गेण शिष्यस्तत्रैव पूजयेत् ॥ ९ २
देवं नित्यमशक्तश्चेत्पूजितं गुरुणा शुभम् ।
स्फाटिकं पीठिकोपेतं गृह्णीयाल्लिंगमैश्वरम् ॥ ९ ३
वरं प्राणपरित्यागश्छेदनं शिरसोऽपि मे ।
न त्वनभ्यर्च्य भुञ्जीयां भगवन्तं त्रिलोचनम् ॥ ९ ४
एवं त्रिवारमुच्चार्य शपथं गुरुसन्निधौ । ।
कुर्याद् दृढमनाः शिष्यः शिवभक्तिं समुद्वहन् ॥ ९ ५ ।
| मन्त्रोंद्वारा उस भस्मका शिष्यके अंगोंसे स्पर्श | कराकर उसे मस्तकसे लेकर पैरोंतक सर्वांगमें । लगानेके लिये दे दे । शिष्य उस भस्मको विधिपूर्वक हाथमें लेकर ' त्र्यायुषम् ०१ ' तथा | ' त्र्यम्बकम् ० " इन दोनों मन्त्रोंको तीन - तीन बार पढ़ते हुए ललाट आदि अंगोंमें क्रमशः त्रिपुण्ड धारण करे॥६६–८५ ॥ इसके पश्चात् अत्यन्त भक्तिभावसे समन्वित हो उत्तम शिष्य अपने हृदयकमलमें विराजमान उमासहित शिवजीका ध्यान करे ॥ ८६ ॥
गुरु प्रसन्नतापूर्वक शिष्यके सिरपर हाथ रखकर दाहिने कानमें तीन बार ऋषि, छन्द, देवतासहित प्रणवमन्त्रका उपदेश करे । इसके बाद श्रेष्ठ गुरु शिष्यपर करुणा करके छः प्रकारके अर्थोंसे युक्त प्रणवके तात्पर्यको भी समझाये ॥ ८७-८८ ॥ शिष्य भी पृथ्वीपर दण्डवत् गिरकर बारह बार गुरुको प्रणाम करे और सदा गुरुके अधीन रहे तथा [ उनकी आज्ञाके बिना ] अन्य कर्म न करे ॥ ८ ९ ॥ गुरुकी आज्ञासे शिष्य सर्वदा वेदान्तके अर्थके अनुसार सगुण एवं निर्गुण भेदसे शिवज्ञानमें तत्पर रहे । गुरु सर्वदा श्रवण, मनन, निदिध्यासन, प्रात: कालिक अनुष्ठान तथा अन्तमें जपादि कार्य उस शिष्यसे कराता रहे ॥ ९ ० - ९ १ ॥ शिष्य भी कैलासप्रस्तर नामक मण्डलमें शिवजीद्वारा कही गयी विधिके अनुसार शिवपूजन करता रहे॥९ २ ॥ यदि शिष्य गुरुके आज्ञानुसार मण्डलमें शिवजीका सदा पूजन करनेमें असमर्थ हो, तो गुरुसे शिवका पीठयुक्त स्फटिक लिंग ग्रहणकर उसीकी पूजा करे । चाहे मेरे प्राण चले जायँ अथवा भले ही सिर कटा लेना पड़े, किंतु भलीभाँति भगवान् त्र्यम्बकका अर्चन किये बिना कभी भी भोजन नहीं करूँगा, इस प्रकार शिवभक्ति रखते हुए वह शिष्य गुरुके समीप दृढ़चित्त होकर तीन बार उच्चारण करके शपथ ग्रहण करे । १ - त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् ॥ ( यजुर्वेद ३।६२ २ - त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय ) मामृतात् ॥ ( यजुर्वेद ३ । ६० )
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अ ० १४ ] कैलाससंहिता ६७१ तत एव महादेवं नित्यमुद्युक्तमानसः । इसके बाद शिवभक्तिमें तत्पर मनवाला वह पंचावरण मार्गसे परम भक्तिके साथ नित्य महादेवका पूजन
पूजयेत्परया भक्त्या पञ्चावरणमार्गतः ॥ ९ ६ । करे ॥ ९ ३ - ९ ६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां संन्यासविधिर्नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें संन्यासविधि नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः शिवस्वरूप प्रणवका वर्णन वामदेव उवाच भगवन्षण्मुखाशेषविज्ञानामृतवारिधे विश्वामरेश्वरसुत प्रणतार्त्तिप्रभञ्जन ॥
षड्विधार्थपरिज्ञानमिष्टदं किमुदाहृतम् ।
के तत्र षड्विधा अर्थाः परिज्ञानं च किं प्रभो ॥
प्रतिपाद्यश्च कस्तस्य परिज्ञाने च किं फलम् ।
एतत्सर्वं समाचक्ष्व यद्यत्पृष्टं मया गुह ॥
एतमर्थमविज्ञाय पशुशास्त्रविमोहितः ।
अद्याप्यहं महासेन भ्रान्तश्च शिवमायया ॥
अहं शिवपदद्वंद्वज्ञानामृतरसायनम् पीत्वा विगतसम्मोहो भविष्यामि यथा तथा ॥
कृपामृतार्द्रया दृष्ट्या विलोक्य सुचिरं मयि ।
कर्त्तव्यो ऽनुग्रहः श्रीमत्पादाब्जशरणागते ॥
इति श्रुत्वा मुनीन्द्रोक्तं ज्ञानशक्तिधरो विभुः ।
प्राहान्यदर्शनमहासंत्रासजनकं वचः ॥
सुब्रह्मण्य उवाच श्रूयतां मुनिशार्दूल त्वया यत्पृष्टमादरात् । वामदेव बोले- हे भगवन्! हे षण्मुख! हे सम्पूर्ण विज्ञानरूपी अमृतके सागर! हे समस्त १ देवताओंके स्वामी शिवजीके पुत्र! हे शरणागतोंके दुःखके विनाशक! आपने कहा कि प्रणवके छः प्रकारोंके अर्थोंका ज्ञान अभीष्ट प्रदान करनेवाला २ है — वह क्या है, उसमें छः प्रकारके कौन - से अर्थ हैं, उनका ज्ञान किस प्रकारसे किया जा सकता है, उसका प्रतिपाद्य कौन है और उसके परिज्ञानका फल ३ क्या है? हे कार्तिकेय! मैंने जो - जो पूछा है, यह सब बताइये ॥ १–३ ॥ हे महासेन! इस अर्थको बिना जाने पशुशास्त्रसे ४ मोहित हुआ मैं आज भी शिवजीकी मायासे भ्रमित हो रहा हूँ ॥४ ॥
मैं अब जिस प्रकार शिवजीके चरणयुगलके ५ ज्ञानामृत रसायनका पानकर मायासे रहित हो जाऊँ, वैसा कीजिये । कृपामृतसे आर्द्र दृष्टिसे निरन्तर मेरी ओर देखकर आपके ऐश्वर्यमय चरणकमलकी शरणमें ६ आये हुए मुझपर अनुग्रह कीजिये ॥ ५-६ ॥ मुनिवरकी यह बात सुनकर ज्ञानशक्तिको धारण करनेवाले वे प्रभु शिवशास्त्रको विपरीत माननेवालोंको ७ महान् भय उत्पन्न करनेवाला वचन कहने लगे ॥७ ॥
सुब्रह्मण्य बोले — हे मुनिशार्दूल! आपने आदरपूर्वक समष्टि तथा व्यष्टि भावसे [ इस जगत्में परिज्ञानं महेशितुः ॥ ८ विराजमान ] महेश्वरके जिस परिज्ञानको पूछा है, उसे समष्टिव्यष्टिभावेन सुनिये । हे सुव्रत! मैं उस प्रणवार्थपरिज्ञानरूप एक ही प्रणवार्थपरिज्ञानरूपं तद्विस्तरादहम् । विषयको छः प्रकारके तात्पर्योकी [ वस्तुतः ] एकताके वदामि सुव्रत ॥ ९ परिज्ञानसहित विस्तारपूर्वक बता रहा हूँ ॥ ८ - ९ ॥ षड्विधार्थैक्यपरिज्ञानेन
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १४ ६७२
प्रथमो मन्त्ररूपः स्याद् द्वितीयो मन्त्रभावितः ।
देवतार्थस्तृतीयोऽर्थः प्रपञ्चार्थस्ततः परम् ॥ १०
चतुर्थः पञ्चमार्थः स्याद् गुरुरूपप्रदर्शकः ।
षष्ठः शिष्यात्मरूपोऽर्थः षड्विधार्थाः प्रकीर्तिताः ॥ ११
तत्र मन्त्रस्वरूपं ते वदामि मुनिसत्तम ।
येन विज्ञातमात्रेण महाज्ञानी भवेन्नरः ॥ १२
आद्यः स्वरः पञ्चमश्च पञ्चमान्तस्ततः परः ।
बिन्दुनादौ च पञ्चार्णाः प्रोक्ता वेदैर्न चान्यथा ॥ १३
एतत्समष्टिरूपो हि वेदादिः समुदाहृतः ।
नादः सर्वसमष्टिः स्याद् बिन्द्वाढ्यं यच्चतुष्टयम् ॥ १४
व्यष्टिरूपेण संसिद्धं प्रणवे शिववाचके ।
यंत्ररूपं शृणु प्राज्ञ शिवलिंगं तदेव हि ॥ १५
सर्वाधस्ताल्लिखेत्पीठं तदूर्ध्वं प्रथमं स्वरम् ।
उवर्णं च तदूर्ध्वस्थं पवर्गान्तं तदूर्ध्वगम् ॥ १६
तन्मस्तकस्थं बिंदुं च तदूर्ध्वं नादमालिखेत् ।
यंत्रे संपूर्णतां याते सर्वकामः प्रसिध्यति ॥ १७
एवं यन्त्रं समालिख्य प्रणवेनैव वेष्टयेत् ।
तदुत्थेनैव नादेन विद्यान्नादावसानकम् ॥ १८
देवतार्थं प्रवक्ष्यामि गूढं सर्वत्र यन्मुने ।
तव स्नेहाद् वामदेव यथा शंकरभाषितम् ॥ १ ९
सद्योजातं प्रपद्यामीत्युपक्रम्य सदाशिवोम् ।
इति प्राह श्रुतिस्तारं ब्रह्मपञ्चकवाचकम् ॥ २०
विज्ञेया ब्रह्मरूपिण्यः सूक्ष्माः पञ्चैव देवताः ।
एता एव शिवस्यापि मूर्तित्वेनोपबृंहिताः ॥ २१
शिवस्य वाचको मन्त्रः शिवमूर्त्तेश्च वाचकः ।
मूर्त्तिमूर्त्तिमतोर्भेदो नात्यन्तं विद्यते यतः ॥२२
ईशानमुकुटोपेत इत्यारभ्य पुरोदितः ॥
शिवस्य विग्रहः पञ्चवक्त्राणि शृणु सांप्रतम् ॥ २३
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पञ्चमादि समारभ्य सद्योजाताद्यनुक्रमात् ।
ऊर्ध्वान्तमीशानान्तं च मुखपञ्चकमीरितम् ॥ २४ ।
पहला मन्त्ररूप अर्थ, दूसरा यन्त्ररूप अर्थ, तीसरा देवताबोधक अर्थ, चौथा प्रपंचरूप अर्थ, पाँचवाँ गुरुरूपको | दिखानेवाला अर्थ और छठा शिष्यके स्वरूपका बोधक अर्थ - ये छः प्रकारके अर्थ कहे गये हैं । हे मुनिश्रेष्ठ! | मैं उनमें मन्त्ररूप अर्थको आपसे कहता हूँ, जिसे जाननेमात्र से मनुष्य महाज्ञानी हो जाता है॥१०–१२ ॥ पहला स्वर अकार, दूसरा स्वर उकार, पाँचवें वर्गका अन्तिम वर्ण मकार, बिन्दु एवं नाद — ये ही पाँच वर्ण वेदोंके द्वारा ओंकारमें कहे गये हैं, दूसरे नहीं । इनका समष्टिरूप ॐकार ही वेदका आदि कहा गया है । नाद सर्वसमष्टिरूप है और बिन्दुसहित जो चार वर्णोंका समूह है, वह शिववाचक प्रणवमें व्यष्टिरूपसे प्रतिष्ठित है । हे प्राज्ञ! अब यन्त्ररूप सुनें; वही शिवलिंगस्वरूप है॥१३–१५ ॥ सबसे नीचे पीठकी रचना करे । उसके ऊपर प्रथम स्वर अकार, उसके ऊपर उकार, उसके ऊपर पवर्गका अन्तिम वर्ण मकार, उसके मस्तकपर बिन्दु और उसके ऊपर [ अर्धचन्द्राकार ] नाद लिखे । इस प्रकार यन्त्रके पूर्ण हो जानेपर सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं । इस रीतिसे यन्त्रको लिखकर उसे ॐकारसे वेष्टित करे । उससे उठे हुए नादसे ही नादकी पूर्णताको जाने ॥ १६-१८ ॥ हे मुने! हे वामदेव! अब मैं शिवजीद्वारा कहे गये देवतार्थको, जो सर्वत्र गूढ़ है, आपके स्नेहवश कह रहा हूँ । श्रुतिने स्वयं ‘ सद्योजातं प्रपद्यामि ' से सदाशिवोम् ' पर्यन्त इन पाँच मन्त्रोंका वाचक तार अर्थात् ॐको कहा है ॥ १ ९ -२० ॥ ब्रह्मरूपी सूक्ष्म देवता भी पाँच ही हैं, इस प्रकार समझना चाहिये और ये सभी शिवकी मूर्तिके रूपमें भी प्रतिष्ठित हैं, यह मन्त्र शिवका वाचक है तथा शिवमूर्तिका भी वाचक है; क्योंकि मूर्ति और मूर्तिमान्में वस्तुतः भेद नहीं है ॥ २१-२२ ॥ ' ईशानमुकुटोपेतः ' इत्यादि श्लोकोंके द्वारा भगवान् शिवके विग्रहको पहले ही बताया जा चुका है, अब उनके पाँच मुखोंको सुनें । पंचम अर्थात् ईशानसे आरम्भ करके सद्योजातादिके अनुक्रमसे उनका श्रीविग्रह कहा गया तथा [ पश्चिममुख सद्योजातसे लेकर ] ऊर्ध्वमुख ईशानपर्यन्त शिवके पाँच मुख कहे गये हैं ॥ २३-२४ ॥
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अ ० १४ ] कैलाससंहिता ६७३ ईशानस्यैव देवस्य चतुर्व्यूहपदे स्थितम् । तत्पुरुषसे लेकर सद्योजातपर्यन्त ये चार ब्रह्मरूप पुरुषाद्यं च सद्यान्तं ब्रह्मरूपं चतुष्टयम् ॥ २५ ईशानदेवके चतुर्व्यूहके रूपमें स्थित हैं ॥ २५ ॥
पञ्चब्रह्मसमष्टिः स्यादीशानं ब्रह्म विश्रुतम् । हे मुने! सुविख्यात ईशान नामक ब्रह्मरूपके पुरुषाद्यं तु तद्व्यष्टिः सद्योजातान्तिकं मुने ॥ २६ साथ [ सद्योजातादिके ] समन्वित होनेकी स्थिति
अनुग्रहमयं चक्रमिदं पञ्चार्थकारणम् ।
परब्रह्मात्मकं सूक्ष्मं निर्विकारमनामयम् ॥
अनुग्रहोऽपि द्विविधस्तिरोभावादिगोचरः ।
प्रभुश्चान्यस्तु जीवानां परावरविमुक्तिदः ॥
एतत्सदाशिवस्यैव कृत्यद्वयमुदाहृतम् ।
अनुग्रहेऽपि सृष्ट्यादिकृत्यानां पञ्चकं विभोः ॥
मुने तत्रापि सद्याद्या देवताः परिकीर्तिताः ।
परब्रह्मस्वरूपास्ताः पञ्च कल्याणदाः सदा ॥
अनुग्रहमयं चक्रं शान्त्यतीतकलामयम् ।
सदाशिवाधिष्ठितं च परमं पदमुच्यते ॥
एतदेव पदं प्राप्य यतीनां भावितात्मनाम् ।
सदाशिवोपासकानां प्रणवासक्तचेतसाम् ॥
एतदेव पदं प्राप्य तेन साकं मुनीश्वराः ।
भुक्त्वा सुविपुलान्भोगान्देवेन ब्रह्मरूपिणा ॥
महाप्रलयसंभूतौ शिवसाम्यं भजन्ति हि ।
न पतन्ति पुनः क्वापि संसाराब्धौ जनाश्च ते ॥
ते ब्रह्मलोक इति च श्रुतिराह सनातनी ।
ऐश्वर्यं तु शिवस्यापि समष्टिरिदमेव हि ॥
सर्वैश्वर्येण सम्पन्न इत्याहाथर्वणी शिखा सर्वैश्वर्यप्रदातृत्वमस्यैव प्रवदन्ति हि चमकस्य पदान्नान्यदधिकं विद्यते पदम् ब्रह्मपञ्चकविस्तारप्रपञ्चः खलु दृश्यते पंचब्रह्मात्मक समष्टि कही जाती है तथा तत्पुरुषसे लेकर सद्योजातपर्यन्त [ पाँचों ] ब्रह्मरूपोंकी [ पृथक्-पृथक् ] स्थिति व्यष्टि कहलाती है ॥ २६ ॥
यह अनुग्रहमयचक्र है, यह पंचार्थका कारण, २७ परब्रह्मस्वरूप, सूक्ष्म, निर्विकार तथा अनामय है ॥ २७ ॥
अनुग्रह भी दो प्रकारका है— एक तिरोभाव और २८ दूसरा प्रकट रूप । दूसरा जो प्रकट रूप अनुग्रह है, वह जीवोंका अनुशासक और उन्हें पर- अवर मुक्ति । देनेवाला है । सदाशिवके ये दो कार्य कहे गये हैं । २ ९ विभुके अनुग्रहमें भी सृष्टि आदि पाँच कृत्य होते | हैं ॥ २८-२९ ॥ हे मुने! उन सर्गादि कृत्योंके सद्योजातादि पाँच ३० देवता कहे गये हैं । वे पाँचों परब्रह्मके स्वरूप एवं सदा कल्याण करनेवाले हैं । अनुग्रहमय चक्र शान्त्यतीत-कलासे युक्त है और सदाशिवके द्वारा अधिष्ठित ३१ होनेसे परम पद कहा जाता है॥३०-३१ ॥ प्रणवमें निष्ठा रखनेवाले सदाशिवके उपासकों ३२ तथा आत्मानुसन्धानमें निरत यतियोंको यही पद प्राप्त करना चाहिये । इसी पदको प्राप्त करके श्रेष्ठ मुनिगण ब्रह्मरूपी उन शिवके साथ अनेक प्रकारके उत्तम ३३ सुखोंको भोगकर महाप्रलय होनेपर शिवसाम्य प्राप्त कर लेते हैं और वे लोग फिर कभी संसारसागरमें नहीं ३४ | गिरते हैं॥३२–३४ ॥ ‘ ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति ३५ सर्वे ' - ऐसा सनातनी श्रुति कहती है । यह समष्टि ही सदाशिवका ऐश्वर्य है । वे सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न । हैं- ऐसा आथर्वणी श्रुति कहती है । वे समस्त ऐश्वर्य ॥ ३६ । देते हैं — ऐसा वेद कहते हैं ॥ ३५-३६ ॥ चमकाध्यायके पदसे [ यह ज्ञात होता है कि । शिवसे ] श्रेष्ठ कोई पद नहीं है । ब्रह्मपंचकका विस्तार ॥ ३७ । ही प्रपंच कहलाता है ॥३७ ॥
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६७४ ब्रह्मभ्य एव संजाता निवृत्त्याद्याः कला मताः सूक्ष्मभूतस्वरूपिण्यः कारणत्वेन विश्रुताः स्थूलरूपस्वरूपस्य प्रपञ्चस्यास्य सुव्रत पञ्चधावस्थितं यत्तद् ब्राह्मपञ्चकमिष्यते श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ । निवृत्ति आदि कलाएँ पंचब्रह्मसे ही उत्पन्न कही ॥ ३८ गयी हैं, जो सूक्ष्मभूत स्वरूपवाली हैं तथा कारणके । रूपमें प्रसिद्ध हैं । हे सुव्रत! स्थूलस्वरूपवालेइस । । प्रपंचकी जो पाँच प्रकारकी स्थिति है, वही ब्राह्मपंचक ॥ ३ ९ कहा जाता है ॥ ३८-३९ ॥ पुरुषः श्रोत्रवाण्यौ च शब्दाकाशौ च पञ्चकम् । हे मुनिसत्तम! पुरुष, श्रोत्र, वाणी, शब्द और व्याप्तमीशानरूपेण ब्रह्मणा मुनिसत्तम प्रकृतिस्त्वक्च पाणिश्च स्पर्शो वायुश्च पञ्चकम् व्याप्तं पुरुषरूपेण ब्रह्मणैव मुनीश्वर अहंकारस्तथा चक्षुः पादो रूपं च पावकः अघोरब्रह्मणा व्याप्तमेतत्पञ्चकमञ्चितम् बुद्धिश्च रसना पायू रस आपश्च पञ्चकम् । ब्रह्मणा वामदेवेन व्याप्तं भवति नित्यशः
मनो नासा तथोपस्थो गन्धो भूमिश्च पञ्चकम् ।
सद्येन ब्रह्मणा व्याप्तं पञ्चब्रह्ममयं जगत् ॥
यन्त्ररूपेणोपदिष्टः प्रणवः शिववाचकः ।
समष्टिः पञ्चवर्णानां बिन्द्वाद्यं यच्चतुष्टयम् ॥
शिवोपदिष्टमार्गेण यन्त्ररूपं विभावयेत् ।
प्रणवं परमं मन्त्राधिराजं शिवरूपिणम् ॥
॥ ४० आकाश – यह पंचसमुदाय ईशानरूप ब्रह्मसे व्याप्त । है । हे मुनीश्वर! प्रकृति, त्वक्, हाथ, स्पर्श और ॥ ४ ९ वायु - ये पाँच तत्पुरुषरूप ब्रह्मसे व्याप्त हैं । अहंकार, । । चक्षु, चरण, रूप और अग्नि- यह पंचसमुदाय ॥ ४२ अघोररूप ब्रह्मसे व्याप्त है । बुद्धि, रसना, पायु, रस तथा जल — यह पंचसमुदाय वामदेवरूप ब्रह्मसे व्याप्त ॥ ४३ है । मन, नासिका, उपस्थ, गन्ध और भूमि - यह पंचसमुदाय सद्योजातरूप ब्रह्मसे व्याप्त है । इस प्रकार ४४ यह सारा जगत् पंचब्रह्ममय है ॥ ४०–४४ ॥ शिववाचक प्रणव यन्त्ररूपसे कहा गया है । वह ४५ [ नादपर्यन्त ] पाँचों वर्णोंका समष्टिरूप है तथा बिन्दुयुक्त जो चार वर्ण हैं, वे प्रणवके व्यष्टिरूप हैं । शिवजीके द्वारा उपदिष्ट मार्गसे सर्वश्रेष्ठ मन्त्राधिराज तथा शिवरूपी प्रणवका यन्त्ररूपसे ध्यान करना ४६ | चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां शिवरूपप्रणववर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
॥। इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें शिवरूप प्रणववर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः तिरोभावादि चक्रों तथा उनके अधिदेवताओं आदिका वर्णन ईश्वर उवाच
ततः परं प्रवक्ष्यामि सृष्टिपद्धतिमुत्तमाम् ।
सदाशिवान्महेशादिचतुष्कस्य वरानने ॥
सदाशिवः समष्टिः स्यादाकाशाधिपतिः प्रभुः ।
अस्यैव व्यष्टितापन्नं महेशादिचतुष्टयम् ॥
सदाशिवसहस्त्रांशान्महेशस्य
समुद्भवः ।
पुरुषानन्तरूपत्वाद्वायोरधिपतिश्च सः ॥
ईश्वर बोले- हे वरानने! इसके बाद सदाशिवसे जिस प्रकार महेश्वरादि व्यूहचतुष्टयकी १ उत्पत्ति होती है, उस उत्तम सृष्टि - पद्धतिको मैं कह रहा हूँ ॥१ ॥
आकाशके अधिपति प्रभु सदाशिव समष्टिस्वरूप २ हैं । महेश्वरादि चाररूप ( महेश्वर, रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा ) उन्हींकी व्यष्टि हैं । महेश्वरकी उत्पत्ति सदाशिवके हजारवें भागसे होती है । पुरुषके अनन्तरूप होनेसे वे ३ । वायुके अधिपति हैं ॥ २-३ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_23_1_Back
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अ ० १५ ] कैलाससंहिता ६७५
मायाशक्तियुतो वामे सकलश्च क्रियाधिकः ।
अस्यैव व्यष्टिरूपं स्यादीश्वरादिचतुष्टयम् ॥
ईशो विश्वेश्वरः पश्चात्परमेशस्ततः परम् ।
सर्वेश्वर इतीदं तु तिरोधाचक्रमुत्तमम् ॥
तिरोभावो द्विधा भिन्न एको रुद्रादिगोचरः ।
अन्यश्च देहभावेन पशुवर्गस्य सन्ततेः ॥
भोगानुरञ्जनपरः कर्मसाम्यक्षणावधि ।
कर्मसाम्ये स एकः स्यादनुग्रहमयो विभुः ॥
तत्र सर्वेश्वरा यास्ते देवताः परिकीर्तिताः ।
परब्रह्मात्मकाः साक्षान्निर्विकल्पा निरामयाः ॥
तिरोभावात्मकं चक्रं भवेच्छान्तिकलामयम् ।
महेश्वराधिष्ठितं च पदमेतदनुत्तमम् ॥
एतदेव पदं प्राप्यं महेशपदसेविनाम् ।
माहेश्वराणां सालोक्यक्रमादेव विमुक्तिदम् ॥
महेश्वरसहस्त्रांशाद् रुद्रमूर्तिरजायत ।
अघोरवदनाकारस्तेजस्तत्त्वाधिपश्च सः ॥
गौरीशक्तियुतो वामे सर्वसंहारकृत्प्रभुः ।
अस्यैव व्यष्टिरूपं स्याच्छिवाद्यथ चतुष्टयम् ॥
शिवो हरो मृडभवौ विदितं चक्रमद्भुतम् ।
संहाराख्यं महादिव्यं परमं हि मुनीश्वर ॥
स संहारस्त्रिधा प्रोक्तो बुधैर्नित्यादिभेदतः । नित्यो जीवसुषुप्त्याख्यो विधेर्नैमित्तिकः स्मृतः विलयस्तस्य तु महानिति वेदनिदर्शितः । जीवानां ` जन्मदुःखादिश्रान्तानामुषितात्मनाम् विश्रान्त्यर्थं मुनिश्रेष्ठ कर्मणां पाकहेतवे संहारः कल्पितस्त्रेधा रुद्रेणामिततेजसा वे वामभागमें मायाशक्तिसे युक्त, सकल तथा ४ क्रियाओंके स्वामी हैं । ईश्वर आदि चारोंका समूह इन्हींका व्यष्टिरूप है । ईश, विश्वेश्वर, परमेश, ५ सर्वेश्वर - यह उत्तम तिरोधानचक्र है ॥ ४-५ ॥ तिरोभाव भी दो प्रकारका है, एक रुद्र आदिके ६ रूपमें दिखायी पड़ता है और दूसरा जीवसमूहके विस्तारके रूपमें देहभावसे स्थित है ॥ ६ ॥
यह शरीर तभीतक रहता है, जबतक पुण्य और ७ पाप जीवमें रहता है । इसकी अवधि कर्मसाम्यपर्यन्त है । कर्मसाम्य होनेपर वह जीव अनुग्रहमय परमात्मामें मिलकर एक हो जाता है ॥७ ॥
उसमें सर्वेश्वर आदि जो चार देवता कहे ८ गये हैं, वे साक्षात् परब्रह्मात्मक, निर्विकल्प एवं निरामय हैं ॥ ८ ॥
तिरोभावात्मक चक्र शान्तिकलामय है, यह ९ उत्तम पद महेश्वरसे अधिष्ठित है । यह पद [ तिरोभावात्मक चक्र ] ही महेश्वरके चरणोंकी सेवा करनेवालोंका प्राप्य है तथा शिवोपासकोंको [ अधिकारके १० अनुसार ] क्रमशः सालोक्य आदि मुक्तियाँ प्रदान करनेवाला है ॥ ९ -१० ॥ रुद्रमूर्तिकी उत्पत्ति महेश्वरके हजारवें अंशसे हुई है, वे अघोर वदनके आकारवाले तथा तेजस्तत्त्वके ११ स्वामी हैं ॥११ ॥
सबका संहार करनेवाले वे प्रभु अपने वामभागमें गौरीशक्तिसे युक्त हैं तथा शिवादि चार रूप इन्हींके १२ व्यष्टिरूप हैं । हे मुनीश्वर! शिव, हर, मृड और भव- - [ इनसे युक्त ] यह सुप्रसिद्ध, अद्भुत तथा महादिव्य १३ ' संहार ' नामक चक्र है॥१२-१३ ॥ विद्वानोंने उस संहारचक्रको नित्य आदिके भेदसे ॥ १४ तीन प्रकारका कहा है । नित्य वह है, जिसमें जीव सुषुप्तिमें रहता है । सृष्टिके निमित्तभूत ( संहारचक्र ) -को नैमित्तिक कहते हैं और उस [ जगत् ] - के विलयको महाप्रलय कहते हैं— इसका वेदमें निर्देश है । जब ॥ १५ जीव संसारमें जन्म - दुःखादिसे श्रान्त हो जाता है, उस समय हे मुनिश्रेष्ठ! उस जीवकी विश्रान्ति और उसके । कर्मपरिपाकके लिये अमित तेजस्वी रुद्रने तीन प्रकारके ॥ १६ संहारोंकी कल्पना की है ॥ १४–१६ ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_23_2_Front
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १५ ६७६
रुद्रस्यैव तु कृत्यानां त्रयमेतदुदाहृतम् ।
संहृतावपि सृष्ट्यादिकृत्यानां पञ्चकं विभोः ॥ १७
मुने तत्र भवाद्यास्ते देवताः परिकीर्तिताः ।
परब्रह्मस्वरूपाश्च लोकानुग्रहकारकाः ॥ १८
संहाराख्यमिदं चक्रं विद्यारूपकलामयम् ।
अधिष्ठितं च रुद्रेण पदमेतन्निरामयम् ॥ १ ९
एतदेव पदं प्राप्यं रुद्राराधनकांक्षिणाम् ।
रुद्राणां तद्धि सालोक्यक्रमात्सायुज्यदं मुने ॥ २०
रुद्रमूर्तेः सहस्त्रांशाद्विष्णोश्चैवाभवज्जनिः ।
स वामदेवचक्रात्मा वारितत्त्वैकनायकः ॥ २१
रमाशक्तियुतो वामे सर्वरक्षाकरो महान् ।
चतुर्भुजोऽरविंदाक्षः श्यामः शंखादिचिह्नभृत् ॥ २२
अस्यैव वासुदेवादिचतुष्कं व्यष्टितां गतम् ।
उपासनरतानां वै वैष्णवानां विमुक्तिदम् ॥ २३
वासुदेवोऽनिरुद्धश्च ततः संकर्षणः परः ।
प्रद्युम्नश्चेति विख्यातं स्थितिचक्रमनुत्तमम् ॥ २४
स्थितिः सृष्टस्य जगतस्तत्कर्त्रा सह पालनम् ।
आरब्धकर्मभोगान्तं जीवानां फल भोगिनाम् ॥ २५
विष्णोरेवेदमाख्यातं कृत्यं रक्षाविधायिनः ।
स्थितावपि तु सृष्ट्यादिकृत्यानां पञ्चकं विभोः ॥ २६
तत्र प्रद्युम्नमुख्यास्ते देवताः परिकीर्तिताः ।
निर्विकल्पा निरातंका मुक्तानंदकराः सदा ॥ २७
स्थितिचक्रमिदं ब्रह्मन् प्रतिष्ठारूपमुत्तमम् ।
जनार्दनाधिष्ठितं च परमं पदमुच्यते ॥ २८
एतदेव पदं प्राप्यं विष्णुपादाब्जसेविनाम् ।
वैष्णवानां नां चक्रमिदं सालोक्यादिपदप्रदम् ॥ २ ९
विष्णोरेव सहस्रांशात्संबभूव पितामहः ।
सद्योजातमुखात्मा यः पृथिवीतत्त्वनायकः ॥ ३० ।
ये तीनों प्रकारके संहारकृत्य रुद्रके ही कहे गये हैं । संहारकालमें भी उन विभुके सृष्टि आदि पाँच | कार्योंका यह समुदाय ( सृष्टि, स्थिति, लय, तिरोभाव । अनुग्रह रहता है । हे मुने! सृष्टि आदि ) पाँच कृत्योंके, | वे भव आदि देवता कहे गये हैं, जो परब्रह्मके स्वरूप और लोकपर अनुग्रह करनेवाले हैं ॥ १७-१८ ॥ यह संहार नामक चक्र विद्यारूप और कलामय है । यह निरामय पद रुद्रसे अधिष्ठित है ॥१ ९ ॥ रुद्राराधनमें निरत चित्तवाले रुद्रोपासकोंके लिये यह पद ही प्राप्य है तथा उन्हें सालोक्यमुक्तिके क्रमसे शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला है ॥२० ॥
रुद्रमूर्तिके हजारवें भागसे विष्णुकी उत्पत्ति हुई है, वे वामदेवचक्रके आत्मारूप तथा जलतत्त्वके अधिपति हैं । वे बायें भागमें रमाशक्तिसे समन्वित, सबकी रक्षा करनेवाले, महान्, चार भुजाओंवाले, कमलसदृश नेत्रवाले, श्यामवर्ण तथा शंख आदि चिह्नोंको धारण करनेवाले हैं ॥ २१-२२ ॥ व्यष्टिकी दशामें इन्हींके वासुदेव आदि चार रूप होते हैं, जो उपासनापरायण वैष्णवोंको मुक्ति प्रदान करते हैं । यह उत्तम स्थितिचक्र वासुदेव, अनिरुद्ध, संकर्षण तथा प्रद्युम्न नामसे विख्यात है ॥ २३-२४ ॥ उत्पन्न किये गये जगत्की स्थिति - सम्पादन तथा ब्रह्माके साथ [ अपने कर्मके अनुसार ] फलका भोग करनेवाले जीवोंका आरब्ध कर्मके भोगपर्यन्त पालन करना — यह रक्षा करनेवाले विष्णुका कृत्य कहा गया है । स्थितिमें भी विभु विष्णुके सृष्टि आदि पाँच कृत्य हैं, उसमें प्रद्युम्न आदि वे पाँच देवता हो गये हैं, जो सर्वदा निर्विकल्प, निरातंक तथा मुक्तिरूप आनन्दको देनेवाले हैं ॥ २५ - २७ ॥ हे ब्रह्मन्! यह प्रतिष्ठा नामक स्थितिचक्र जनार्दनसे अधिष्ठित है तथा परम पद कहा जाता है ॥ २८ ॥
विष्णुके चरणकमलोंकी सेवा करनेवालोंके लिये यही पद प्राप्तव्य है, वैष्णवोंका यह चक्र सालोक्य आदि मुक्तिपद देनेवाला है । विष्णुके हजारवें भागसे पितामह उत्पन्न हुए हैं, जो सद्योजात नामक शिवके मुखरूप हैं और पृथ्वीतत्त्वके नायक हैं ॥ २ ९ -३० ॥ 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_23_2_Back