शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 711–720
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
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अ ० १ ९ ] कैलाससंहिता
एष त आत्मान्तर्यामी योऽमृतश्च शिवः स्वयम् ।
यश्चायं पुरुषे शम्भुर्यश्चादित्ये व्यवस्थितः ॥
स चाऽसौ सेति पार्थक्यं नैकं सर्वं स ईरितः ।
सोपाधिद्वयमस्यार्थ उपचारात्तथोच्यते ॥
तं शम्भुनाथं श्रुतयो वदन्ति हि हिरण्मयम् ।
हिरण्यबाहव इति सर्वाङ्गस्योपलक्षणम् ॥
अन्यथा तत्पतित्वं तु न भवेदिति यत्नतः ।
य एषोऽन्तरिति शम्भुश्छान्दोग्ये श्रूयते शिवः ॥
हिरण्यश्मश्रुवांस्तद्वद्धिरण्यमयकेशवान् नखमारभ्य केशान्तं सर्वत्रापि हिरण्मयः ॥
अहमस्मि परं ब्रह्म परापरपरात्परम् ।
इति वाक्यस्य तात्पर्यं वदामि श्रूयतामिदम् ॥
अहंपदस्यार्थभूतः शक्त्यात्मा शिव ईरितः ।
स एवास्मीति वाक्यार्थं योजना भवति ध्रुवम् ॥
सर्वोत्कृष्टश्च सर्वात्मा परब्रह्म स ईरितः ।
परश्चाथापरश्चेति परात्परमिति त्रिधा ॥
रुद्रो ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रोक्ताः श्रुत्यैव नान्यथा ।
तेभ्यश्च परमो देवः परशब्देन बोधितः ॥
वेदशास्त्रगुरूणां च वाक्याभ्यासवशाच्छिशोः ।
पूर्णानन्दमयः शम्भुः प्रादुर्भूतो भवेद्धृदि ॥
सर्वभूतस्थितः शम्भुः स एवाहं न संशयः ।
तत्त्वजातस्य सर्वस्य प्राणोऽस्म्यहमहं शिवः ॥
६ ९ ७ [ अब ‘ एष त आत्मा ' तथा ' यश्चायं पुरुषे ' १३ इन दो वाक्योंके अर्थपर विचार किया जाता है— ] यह तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा है, जो स्वयं ही अमृतस्वरूप शिव है । यह जो पुरुषमें शम्भु है, वही सूर्यमें भी स्थित है । इन दोनोंमें कोई भेद नहीं है । जो पुरुषमें है, वही आदित्यमें है । इन दोनोंमें पृथक्ता नहीं है । वह तत्त्व एक ही है । उसीको सर्वरूप कहा गया १४ है । पुरुष और आदित्य – इन दो उपाधियोंसे युक्त जो अर्थ किया जाता है, वह औपचारिक है ॥ १३-१४ ॥ उन शम्भुनाथको सब श्रुतियाँ हिरण्यमय १५ बताती हैं । ' हिरण्यबाहवे नम: ' इसमें जो ‘ बाहु ’ शब्द है, वह सब अंगोंका उपलक्षण है । अन्यथा उसे हिरण्यपति कहना किसी भी यत्नसे सम्भव नहीं होता । छान्दोग्योपनिषद् में जो यह श्रुति है— ' य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते १६ हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व एव सुवर्णः । ( छान्दोग्य ० १।६।६ ) इसके द्वारा आदित्य-मण्डलान्तर्गत पुरुषको सुवर्णमय दाढ़ी - मूँछोंवाला, सुवर्णसदृश केशोंवाला तथा नखसे लेकर केशाग्रभागपर्यन्त सारा - का - सारा सुवर्णमय- प्रकाशमय ही बताया १७ गया है । अतः वह हिरण्यमय पुरुष साक्षात् शम्भु ही हैं ॥ १५–१७ ॥ अब ' अहमस्मि परं ब्रह्म परापरपरात्परम् ' इस १८ वाक्यका तात्पर्य बताता हूँ, सुनो । ‘ अहम् ' पदके अर्थभूत सत्यात्मा शिव ही बताये गये हैं । वे ही शिव मैं हूँ, ऐसी वाक्यार्थयोजना अवश्य होती है । उन्हींको १ ९ सबसे उत्कृष्ट और सर्वस्वरूप परब्रह्म कहा गया है । उसके तीन भेद हैं- पर, अपर तथा परात्पर । रुद्र, २० ब्रह्मा और विष्णु - ये तीन देवता श्रुतिने ही बताये हैं । ये ही क्रमशः पर, अपर तथा परात्पररूप हैं । इन तीनोंसे भी जो श्रेष्ठ देवता हैं, वे शम्भु ' परब्रह्म ' २१ शब्दसे कहे गये हैं ॥ १८-२१ ॥ वेदों, शास्त्रों और गुरुके वचनोंके अभ्याससे २२ शिष्यके हृदयमें स्वयं ही पूर्णानन्दमय शम्भुका प्रादुर्भाव होता है । सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें विराजमान शम्भु ब्रह्मरूप ही हैं । वही मैं हूँ, इसमें संशय नहीं है । मैं २३ । शिव ही सम्पूर्ण तत्त्वसमुदायका प्राण हूँ ॥ २२-२३ ॥
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६ ९ ८ इत्युक्त्वा पुनरप्याह शिवस्तत्त्वत्रयस्य च प्राणोऽस्मीत्यत्र पृथ्व्यादिगुणान्तग्रहणान्मुने आत्मतत्त्वानि सर्वाणि गृहीतानीति भावय पुनश्च सर्वग्रहणं विद्यातत्त्वे शिवात्मनोः
तत्त्वयोश्चास्म्यहं प्राणः सर्वः सर्वात्मको ह्यहम् ।
जीवस्य चान्तर्यामित्वाज्जीवोऽहं तस्य सर्वदा ॥
यद्भूतं यच्च भव्यं यद्भविष्यत्सर्वमेव च । मन्मयत्वादहं सर्वः सर्वो वै रुद्र इत्यपि
श्रुतिराह मुने सा हि साक्षाच्छिवमुखोद्गता ।
सर्वात्मा परमैरेभिर्गुणैर्नित्यसमन्वयात् ॥
स्वस्मात्परात्मविरहादद्वितीयोऽहमेव हि ।
सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति वाक्यार्थः पूर्वमीरितः ॥
पूर्णोऽहं भावरूपत्वान्नित्यमुक्तोऽहमेव हि ।
पशवो मत्प्रसादेन मुक्ता मद्भावमाश्रिताः ॥
योऽसौ सर्वात्मकः शम्भुः सोऽहंहंसः शिवोऽस्म्यहम् ।
इति वै सर्ववाक्यार्थी वामदेव शिवोदितः ॥
इतीशश्रुतिवाक्याभ्यामुपदिष्टार्थमादरात् ।
साक्षाच्छिवैक्यदं पुंसां शिशोर्गुरुरुपादिशेत् ॥
आदाय शंख साधारमस्त्रमन्त्रेण भस्मना ।
शोध्य तत्पुरतः स्थाप्य चतुरस्त्रे समर्चिते ॥
ओमित्यभ्यर्च्य गन्धाद्यैरस्त्रं वस्त्रोपशोभितम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ । ऐसा कहकर स्कन्दजी फिर कहते हैं- मुने! मैं शिव आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व - इन तीनोंका ॥ २४ प्राण हूँ । पृथिवी आदिका भी प्राण हूँ । पृथ्वी आदिके | गुणोंतकका ग्रहण होनेसे यह समझ लो कि यहाँ सारे । आत्मतत्त्व गृहीत हो गये । फिर सबका ग्रहण विद्यातत्त्व ॥ २५ और शिवतत्त्वका भी ग्रहण कराता है ॥ २४-२५ ॥ इन सब तत्त्वोंका मैं प्राण हूँ । मैं सर्व हूँ, सर्वात्मक २६ हूँ, जीवका भी अन्तर्यामी होनेसे उसका भी जीव । ( आत्मा ) हूँ ॥ जो भूत, वर्तमान और भविष्यत्काल है , वह सब मेरा स्वरूप होनेके कारण मैं ही हूँ । ' सर्वो वै ॥ २७ रुद्रः ' ( सब कुछ रुद्र ही है ) – यह श्रुति साक्षात् शिवके मुखसे प्रकट हुई है । अत: शिव ही सर्वरूप हैं; क्योंकि २८ उन्हींका इन समस्त उत्कृष्ट गुणोंसे नित्य सम्बन्ध है । अपने और परायेके भेदसे रहित होनेके कारण मैं ही अद्वितीय आत्मा हूँ।‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इस वाक्यका २ ९ अर्थ पहले बताया जा चुका है ॥ २६–२९ ॥ मेँ भावरूप होनेके कारण पूर्ण हूँ । नित्यमुक्त भी ३० मैं ही हूँ । पशु ( जीव ) मेरी कृपासे मुक्त होकर मेरे स्वरूपको प्राप्त होते हैं । जो सर्वात्मक शम्भु हैं, वही मैं हूँ । मैं हंसरूप तथा शिवरूप हूँ । वामदेव! इस ३१ प्रकार सम्पूर्ण वाक्योंके अर्थ भगवान् शिव ही बताये गये हैं॥३०-३१ ॥ ईशावास्योपनिषद्की श्रुतिके दो वाक्योंद्वारा ३२ प्रतिपादित अर्थ साक्षात् शिवकी एकताका ज्ञान प्रदान करनेवाला होता है । गुरुको चाहिये कि शिष्योंको इसका आदरपूर्वक उपदेश करे ॥ ३२ ॥
गुरुको उचित है कि वे आधारसहित शंखको ३३ लेकर अस्त्र - मन्त्र ( फट् ) -से तथा भस्मद्वारा उसकी शुद्धि करके उसे अपने सामने पूजित हुए चौकोर मण्डलमें स्थापित करे । फिर ओंकारका उच्चारण करके गन्ध । आदिके द्वारा उस शंखकी पूजा करे । उसमें वस्त्र वासितं जलमापूर्व सम्पूज्योमिति मन्त्रतः ॥३४ लपेट दे और सुगन्धित जल भरकर प्रणवका उच्चारण करते हुए उसका पूजन करे ॥ ३३-३४ ॥ तत्पश्चात् सात बार प्रणवके द्वारा फिर उस सप्तधैवाभिमन्त्र्याथ | शंखको अभिमन्त्रित करके शिष्यसे कहे- ' हे शिष्य! प्रणवेन पुनश्च तम् । जो थोड़ा - सा भी अन्तर करता है - भेदभाव रखता है, यस्त्वन्तरं किञ्चिदपि कुरुते सोऽतिभीतिभाक् ॥ ३५ | वह भयका भागी होता है सिद्धान्त ॥ यह श्रुतिका
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अ ० १ ९ ] कैलाससंहिता
इत्याह श्रुतिसत्तत्त्वं दृढात्मा गतभीर्भव ।
इत्याभाष्य स्वयं शिष्यं देवं ध्यायन् समर्चयेत् ॥
शिष्यासनं सम्प्रपूज्य षडुत्थापनमार्गतः ।
शिवासनं च संकल्प्य शिवमूर्ति प्रकल्पयेत् ॥
पञ्च ब्रह्माणि विन्यस्य शिरः पादावसानकम् ।
मुण्डवक्त्रकलाभेदैः प्रणवस्य कला अपि ॥
अष्टत्रिंशन्मन्त्ररूपाः शिष्यदेहेऽथ मस्तके ।
समावाह्य शिवं मुद्राः स्थापनीयाः प्रदर्शयेत् ॥
ततश्चाङ्गानि विन्यस्य सर्वज्ञानीत्यनुक्रमात् ।
कल्पयेदुपचारांश्च षोडशासनपूर्वकम् ॥
पायसान्नं च नैवेद्यं समर्व्योमग्निजायया ।
गण्डूषाचमनार्घ्यादि धूपदीपादिकं क्रमात् ॥
नामाष्टकेन सम्पूज्य ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
जपेद् ब्रह्मविदाप्नोति भृगुर्वै वारुणिस्ततः ॥
यो देवानामुपक्रम्य यः परः स महेश्वरः ।
इत्यन्तं तस्य पुरतः कह्लारादिविनिर्मिताम् ॥
आदाय मालामुत्थाय श्रीविरूपाक्षनिर्मिते ।
शास्त्रे पञ्चास्यके रूपे सिद्धिस्कन्धं जपेच्छनैः ॥
ख्यातिः पूर्णोऽहमित्यन्तं सानुकूलेन चेतसा ।
देशिकस्तस्य शिष्यस्य कण्ठदेशे समर्पयेत् ॥
तिलकं चन्दनेनाथ सर्वाङ्गालेपनं पुनः ।
स्वसम्प्रदायानुगुणं कारयेच्च यथाविधि ॥
ततश्च देशिकः प्रीत्या नाम श्रीपादसंज्ञितम् ।
छत्रं च पादुकां दद्याद् दूर्वाकल्पविकल्पनम् ॥
व्याख्यातृत्वं च कर्मादि गुर्वासनपरिग्रहम् ।
अनुगृह्य गुरुस्तस्मै शिष्याय शिवरूपिणे ॥
६ ९९ बताया गया, इसलिये तुम अपने चित्तको स्थिर करके ३६ निर्भय हो जाओ । ' ऐसा कहकर गुरु स्वयं महादेवजीका ध्यान करते हुए उन्हींके रूपमें शिष्यका अर्चन करे ॥ ३५-३६ ॥ शिष्यके आसनकी पूजा करके उसमें शिवके ३७ आसन और शिवकी मूर्तिकी भावना करे । फिर सिरसे पैरतक ' सद्योजातादि ' पाँच मन्त्रोंका न्यास करके ३८ मस्तक, मुख और कलाओंके भेदसे प्रणवकी कलाओंका भी न्यास करे । शिष्यके शरीरमें अड़तीस मन्त्ररूपा प्रणवकी कलाओंका न्यास करके उसके मस्तकपर ३ ९ शिवका आवाहन करे । तत्पश्चात् स्थापनी आदि मुद्राओंका प्रदर्शन करे । फिर सर्वज्ञादि मन्त्रसे क्रमशः ४० अंगन्यास करके आसनपूर्वक षोडश उपचारोंकी कल्पना करे ॥ ३७–४० ॥ खीरका नैवेद्य अर्पण करके ॐ स्वाहा ' का ४१ उच्चारण करे । कुल्ला और आचमन कराये । अर्घ्य आदि देकर क्रमशः धूप - दीपादि समर्पित करे । शिवके आठ नामोंसे पूजन करके वेदोंके पारंगत ब्राह्मणोंके साथ ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' इत्यादि ब्रह्मानन्दवल्लीके ४२ मन्त्रोंको तथा ' भृगुर्वै वारुणिः ' इत्यादि भृगुवल्लीके मन्त्रोंको पढ़े ॥ ४१-४२ ॥ तत्पश्चात् ' यो देवानां प्रथमं पुरस्तात्'-४३ ( १० । ३ ) से लेकर ' तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः ' ( १० । ८ ) तक [ महानारायणोपनिषद्के मन्त्रोंका ] पाठ करे । इसके बाद शिष्यके सामने ४४ कह्लार आदिकी बनी हुई माला लेकर खड़े हो गुरु शिवनिर्मित पांचास्यिक शास्त्रके सिद्धिस्कन्धका धीरे-धीरे जप करे । अनुकूल चित्तसे ' ख्यातिः पूर्णोऽहम् ' इस मन्त्रतकका जप करके गुरु उस मालाको शिष्यके ४५ कण्ठमें पहना दे ॥ ४३–४५ ॥ तदनन्तर ललाटमें तिलक लगाकर सम्प्रदायके ४६ अनुसार उसके सर्वांगमें विधिवत् चन्दनका लेप कराये । तत्पश्चात् गुरु प्रसन्नतापूर्वक श्रीपादयुक्त नाम देकर शिष्यको छत्र और चरणपादुका अर्पित करे । ४७ उसे व्याख्यान देने तथा आवश्यक कर्म आदिके लिये गुर्वासन ग्रहण करनेका तथा दूर्वार्चनका अधिकार ४८ । दे । फिर गुरु अपने उस शिवरूपी शिष्यपर अनुग्रह
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७०० शिवोऽहमस्मीति सदा समाधिस्थो भवेति तम् सम्प्रोच्याथ स्वयं तस्मै नमस्कारं समाचरेत् सम्प्रदायानुगुण्येन नमस्कुर्युस्तथापरे शिष्यस्तदा समुत्थाय नमस्कुर्याद् गुरुं तथा गुरोरपि गुरुं तस्य शिष्यांश्च स्वगुरोरपि एवं कृतनमस्कारं शिष्यं दद्याद् गुरुः स्वयम् श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० । । करके कहे - " तुम सदा समाधिस्थ रहकर ' मैं शिव ॥ ४ ९ हू ' इस प्रकारकी भावना करते रहो । " यों कहकर स्वयं शिष्यको नमस्कार करे ॥ ४६–४९ ॥ वह । फिर सम्प्रदायकी मर्यादाके अनुसार दूसरे लोग । भी उसे नमस्कार करें । उस समय शिष्य उठकर ॥ ५० गुरुको नमस्कार करे I । अपने गुरुके गुरुको और उनके शिष्योंको भी मस्तक झुकाये ॥ ५० ॥
। इस प्रकार नमस्कार करके सुशील शिष्य जब तं विनयावनतं स्थितम् ॥५१ मौन और विनीतभावसे गुरुके समीप खड़ा हो, तब सुशीलं यतवाचं अद्य प्रभृति लोकानामनुग्रहपरो भव । परीक्ष्य वत्सरं शिष्यमङ्गीकुरु विधानतः रागादिदोषान्सन्त्यज्य शिवध्यानपरो भव सत्सम्प्रदायसंसिद्धैः सङ्गं कुरु न चेतरैः अनभ्यर्च्य शिवं जातु मा भुंक्ष्वाप्राणसंक्षयम् गुरुभक्तिं समास्थाय सुखी भव सुखी भव इति क्रमाद् गुरुवरो दयालुर्ज्ञानसागरः सानुकूलेन चित्तेन समं शिष्यं समाचरेत् तव स्नेहान्मयायं वै वामदेव मुनीश्वर योगपट्टप्रकारस्ते प्रोक्तो गुह्यतरोऽपि हि ॥
इत्युक्त्वा षण्मुखस्तस्मै क्षौरस्नानविधिक्रमम् ।
वक्तुमारभते प्रीत्या यतीनां कृपया शुभम् ॥
गुरु स्वयं उसे इस प्रकारका उपदेश दे – ' बेटा! आजसे तुम समस्त लोकोंपर अनुग्रह करते रहो । यदि कोई शिष्य होनेके लिये आये तो पहले एक वर्षतक ॥ ५२ उसकी परीक्षा कर लो, फिर शास्त्रविधिके अनुसार उसे शिष्य बनाओ॥५१-५२ ॥ । राग आदि दोषोंका त्याग करके निरन्तर शिवका ॥ ५३ चिन्तन करते रहो । श्रेष्ठ सम्प्रदायके सिद्ध पुरुषोंका संग करो, दूसरोंका नहीं । प्राणोंपर संकट आ जाय तो भी । E शिवका पूजन किये बिना कभी भोजन न करो । गुरुभक्तिका
॥ ५४ आश्रय ले सुखी रहो, सुखी रहो । ' ॥। ५३-५४ ॥
। इस उपदिष्ट क्रमसे दयालु, ज्ञानसागर श्रेष्ठ गुरु ॥ ५५ प्रसन्न चित्तसे शिष्यको अपने समान बना दें ॥ ५५ ॥
। मुनीश्वर वामदेव! तुम्हारे स्नेहवश अत्यन्त ५६ गोपनीय होनेपर भी मैंने यह योगपट्टका प्रकार तुम्हें बताया है । ऐसा कहकर स्कन्दने यतियोंपर कृपा करके उनसे संन्यासियोंके क्षौर और स्नानविधिका ५७ | वर्णन किया ॥ ५६-५७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां योगपट्टविधिवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें योगपट्टविधिवर्णन नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः यतियोंके क्षौर - स्नानादिकी विधि तथा अन्य आचारोंका वर्णन सुब्रह्मण्य उवाच सुब्रह्मण्य बोले — हे वामदेव! हे महामुने! क्षौरस्नानविधिं वक्ष्ये वामदेव महामुने । अब मैं क्षौर तथा स्नानविधि जिसके यस्य सद्यो विधानेन शुद्धिः स्याद्यतिनः परा ॥ १ करनेसे यतिकी कहता हूँ,
योगपट्टप्रकारस्य विधिं प्राप्य मुनीश्वर । तत्क्षण परम शुद्धि होती है ॥१ ॥
स शिष्यः स्याद् व्रती पूर्णः क्षौरकर्मोद्यतो हे मुनीश्वर! योगपट्टकी विधि प्राप्तकर शिष्य पूर्ण भवेत् ॥ २ व्रती हो और तब क्षौर कर्मके लिये उद्यत हो जाय ॥ २ ॥
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अ ० २० ] कैलाससंहिता ७०१
गुरुं नत्वा विशेषेण लब्धानुज्ञस्ततो गुरोः ।
शिरः संक्षाल्य चाचम्य सवासाः क्षौरमाचरेत् ॥
क्षालयेद्वसनं पश्चान्मृदम्भोभिः क्षुरादिकम् ।
तद्धस्तौ च मृदालिप्य क्षालयेति मृदं ददेत् ॥
स्थापितं प्रोक्षितं तोयैः शिवं शिवमितीरयन् ।
स्वनेत्रे पिहिते चैवानामाङ्गुष्ठाभिमन्त्रिते ॥
अस्त्रेणोन्मील्य संदृश्य क्षुरादिक्षौरसाधनम् ।
अभिमन्त्र्य द्वादशाथ प्रोक्षयेदस्त्रमन्त्रतः ॥
क्षुरं गृहीत्वा तारेण दक्षभागे निकृन्तयेत् ।
केशांश्च कांश्चिदग्रेषु वप्त्वा सर्वं च वापयेत् ॥
पृथिव्यां पर्णमादाय विक्षिपेन्न भुवः स्थले ।
श्मश्रूणि हस्तपादस्थनखानि च निकृंतयेत् ॥
बिल्वाश्वत्थतुलस्यादिस्थाने सङ्गृह्य मृत्तिकाम् ।
द्विषड्वारं निमज्याप्सु तीरं गत्वोपविश्य च ॥
शुद्धे देशे तु संस्थाप्य मृदं त्रेधा विभज्य च ।
एवं पुनस्त्रिधा कृत्वा प्रोक्ष्यास्त्रेणाभिमन्त्रयेत् ॥
तत्रैकां मृदमादाय दापयित्वान्यपाणिना ।
करौ द्वादशधालिप्य प्रत्येकं केन क्षालयेत् ॥
पुनरेकां पादयोश्च मुखे चान्यां करे क्रमात् ।
संलिप्याक्षाल्य चाम्भोभिः पुनश्च जलमाविशेत् ॥
अन्यां मृदं भागयित्वा शिरसि द्वादश क्रमात् ।
आलिप्य मृदमास्यान्तं निमज्य च पुनः पुनः ॥
तीरं गत्वा तु गंडूषान् षोडशाचमनं द्विधा ।
प्राणानायम्य च पुनः प्रणवं द्व्यष्टसंख्यया ॥
तदनन्तर गुरुको विशेषरूपसे नमस्कारकर उनसे ३ आज्ञा लेकर सिर प्रक्षालन करके आचमन करे और वस्त्र पहने हुए ही क्षौरकर्म कराये ॥३ ॥
[ नापितके द्वारा ] वस्त्रप्रक्षालन कराये, उसका ४ क्षुरा मिट्टी और जलसे शुद्ध करवा ले । उस नापितके हाथमें मिट्टी देकर कहे कि इस मिट्टीसे हाथ शुद्ध करो ॥४ ॥
प्रक्षालित क्षुरेको शिव- शिव कहते हुए किसी ५ पत्रपर स्थापित करे, फिर अनामिका एवं अँगूठेको अभिमन्त्रितकर उन दोनों अँगुलियोंसे नेत्र बन्द करे । अस्त्र मन्त्रसे नेत्रोंको खोलकर क्षौरके साधनभूत ६ क्षुरेको देखे । बारह बार अभिमन्त्रितकर अस्त्रमन्त्रसे क्षुरेको पुनः प्रक्षालित करे॥५-६ ॥ प्रणवका उच्चारणकर यति नापितके हाथमें क्षुरा ७ देकर दाहिनी ओरसे क्षौर क्रिया कराये । उस समय आगेके कुछ बालोंको कटवाकर पुनः समस्त बालोंका वपन करवा ले ॥ ७ ॥
एक पत्ता भूमिपर रखकर उसीके ऊपर बालोंको ८ रखे, उन्हें पृथ्वीपर नहीं रखना चाहिये । मूँछ और हाथ - पैरके नाखून भी कटवा लेना चाहिये ॥ ८ ॥
इसके बाद बेल, पीपल, तुलसी आदि वृक्षोंके ९ स्थानकी मिट्टीका संग्रह करे । बारह बार जलमें डुबकी लगा किनारेपर जाकर बैठे । किसी शुद्ध स्थानपर उस मृत्तिकाको रख करके उसके तीन भाग १० करके पुनः एकके तीन भाग करे एवं अस्त्रमन्त्रद्वारा उसका प्रोक्षण तथा अभिमन्त्रण करे ॥ ९ -१० ॥ उसमेंसे एक भाग मृत्तिका लेकर दूसरे हाथमें ११ भी उसे रखकर बारह बार हाथोंमें लेपकर प्रत्येक बार जलसे दोनों हाथोंको धो डाले ॥११ ॥
एक भागको दोनों पैरोंमें और शेष एक भागको १२ मुखमें तथा हाथमें क्रमसे लगाकर जलसे धोकर पुन: जलमें प्रवेश करे ॥ १२ ॥
इसके बाद मिट्टीके दूसरे भागको लेकर बारह १३ बार क्रमशः सिरसे मुखपर्यन्त लेपकर बार - बार गोता लगाये और तटपर जाकर सोलह बार कुल्ला करके दो बार आचमन करे । पुनः ॐ कारपूर्वक सोलह १४ प्राणायाम करे ॥ १३-१४ ॥
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७०२ मृदमन्यां पुनस्त्रेधा विभज्य च तदेकया कटिशौचं पादशौचं विधायाचम्य च द्विधा प्रणवेनाथ षोडश प्राणानायम्य वाग्यतः पुनरन्यां स्वोरुदेशे त्रिधा विन्यस्य चोमिति प्रोक्ष्याभिमन्त्रयेत्सप्त स्वपाण्योस्तलमेकधा त्रिधालिप्याथ सम्पश्येत्सूर्यमूर्तिं च पावनीम् स्वकक्षयोः समालिप्य व्यत्यस्ताभ्यामथान्यया पाणिभ्यां च मृदा शिष्यः सुमतिर्दृढमानसः गृहीत्वान्यां मृदं शुद्धां तथासौ गुरुभक्तिमान् शिर आरभ्य पादान्तं विलिप्यादित्यदृष्टया ॥ समुत्थाय ततोऽसौ वै दण्डमादाय भूतले स्वगुरुं मन्त्रदं भक्त्या संस्मरेज्ज्ञाननिष्ठया
ततः साम्बं महेशानं शंकरं चन्द्रशेखरम् ।
संस्मरेद्भक्तितः शिष्यः सर्वैश्वर्यपतिं शिवम् ॥
त्रिवारं प्रणमेत्प्रीत्या साष्टाङ्गं च गुरुं शिवम् ।
पञ्चाङ्गेनैकवारं च समुत्थाय च वन्दयेत् ॥
तीर्थं प्रविश्य तन्मध्ये निमज्योन्मज्य तां मृदम् । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २० । इसके पश्चात् अन्य मृत्तिकाको लेकर ॥ १५ तीन भाग करके उनमेंसे एक भागके द्वारा कटिशौच उसके और पादशौच करके दो बार आचमन करे और । हो प्रणवमन्त्रसे सोलह बार प्राणायाम करे । फिर मौन । भागको लेकर उसे ऊरुदेशपर रखकर प्रणवसे दूसरे ॥ १६ / तीन । भाग करे । पुनः प्रोक्षणकर उसे सात बार अभिमन्त्रित । करे । एक - एकके क्रमसे तीन बार दोनों हाथोंके । । तलवोंमें उसे लगाकर सबको पवित्र करनेवाली । ॥ १७ सूर्यमूर्तिका दर्शन करे ॥ १५–१७ ॥ ॥ बुद्धिमान् शिष्य स्वस्थचित्त होकर मिट्टी लेकर । ॥ १८ दाहिने हाथसे बायीं काँख तथा बायें हाथ दाह । काँखमें उसे लगाये । तत्पश्चात् गुरुभक्त शिष्य दूसरी १ ९ शुद्ध मिट्टीको लेकर सूर्यको देखता हुआ सिरसे पैरतक । उस मिट्टीको लगाये और उठ करके पृथ्वीपर स्थित ॥ २० दण्ड लेकर अपने मन्त्रदाता गुरुका भक्तिपूर्वक तत्त्वबुद्धिसे स्मरण करे । इसके बाद वह शिष्य भक्तिपूर्वक सर्वैश्वर्यपति, चन्द्रमाको धारण करनेवाले, पार्वतीसहित कल्याणमय २१ महेश्वर शंकरजीका स्मरण करे ॥ १८–२१ ॥ इसके बाद प्रेमपूर्वक तीन बार गुरु तथा शिवको २२ साष्टांग प्रणाम करे, फिर उठकर उन्हें एक बार । पंचांग प्रणाम करे ॥ २२ ॥
इसके बाद जलमें प्रवेशकर बार - बार डुबकी स्कन्धे संस्थाप्य पूर्वोक्तप्रकारेण विलेपयेत् ॥ २३ लगानेके बाद कन्धेपर [ तीर्थकी ] मृत्तिका रखकर पहले
तत्रावशिष्टं संगृह्य जलमध्ये प्रविश्य च ।
विलोड्य सम्यक् तां तत्र सर्वाङ्गेषु विलिप्य च ॥
त्रिवारमोमिति प्रोच्य शिवपादाम्बुजं स्मरन् ।
संसाराम्बुधिसंतारं सदा यद्विधितो हि सः ॥
अभिषिच्योमिति जलं विरजाभस्मलोलितम् ।
अङ्गोपमार्ज्जनं कृत्वा सुस्नायाद्भस्मनाततः ॥
त्रिपुंड्रं च विधायाथ यथोक्तविधिना शुभम् ।
यथोक्ताङ्गेषु सर्वेषु सावधानतया मुने ॥
ततः शुद्धमना भूत्वा कुर्यान्मध्यदिनक्रियाः ।
महेश्वरं नमस्कृत्य गुरूंस्तीर्थादिकानि च ॥
सम्पूजयेन्महेशानं भक्त्या परमया मुने ।
साम्बिकं ज्ञानदातारं पातारं त्रिभवस्य वै ॥
बतायी गयी विधिसे शरीरमें लेप करे । अवशिष्ट मिट्टीको २४ लेकर जलमें प्रविष्ट हो उसे मल करके अच्छी तरह | सभी अंगोंमें लगाकर तीन बार ॐकारका उच्चारणकर २५ संसारसागरसे पार करनेवाले शिवके चरणकमलका स्मरण करते हुए स्नान करे, इसके बाद विरजा भस्ममिश्रित जलसे शरीरके अंगोंका उपमार्जनकर भलीभाँति भस्मसे २६ स्नान करे ॥ २३-२६ ॥ उसके बाद शास्त्रविधिके अनुसार उत्तम त्रिपुण्ड्र २७ धारण करके हे मुने! सावधानीसे यथोक्त सभी अंगोंमें भस्म लगाये ॥ २७ ॥
इसके पश्चात् शुद्धचित्त होकर मध्याह्नकी क्रियाएँ २८ सम्पादित करे । तदनन्तर महेश्वर, गुरुजनों तथा तीर्थों आदिको नमस्कारकर हे मुने! परम भक्तिपूर्वक ज्ञानदाता, २ ९ त्रैलोक्यरक्षक साम्ब सदाशिवका पूजन करे ॥ २८-२९ ॥
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अ ० २१ ] कैलाससंहिता ७०३ ततोऽसौ दृढचेतस्को यतिः स्ववृषसंस्थितः । तत्पश्चात् स्वस्थचित्त हो उस शुद्ध यतिको भिक्षार्थं प्रव्रजेच्छुद्धो विप्रवर्गेषु साधुषु ॥ ३० अपने धर्ममें स्थित होकर ब्राह्मणों अथवा साधुओंके ततस्तत्र च शुद्धात्मा पञ्चधा परिकल्पितम् । बीच भिक्षाके लिये जाना चाहिये । [ शास्त्रकारोंके भैक्ष्यं यथोचितं कुर्याद् दूषितान्नं विवर्जयेत् आदेशानुसार ] वह शुद्धात्मा पाँच घरोंसे भिक्षा ग्रहण ॥ ३१ करे, किंतु दूषित अन्न कभी ग्रहण न करे ॥ ३०-३१ ॥ शौचं स्नानं तथा भिक्षां नित्यमेकान्तसेवनम् भिक्षोश्चत्वारि कर्माणि पञ्चमं नैव विद्यते अलाबुं वेणुपात्रं च दारवं मृण्मयं तथा भिक्षोश्चत्वारि पात्राणि पञ्चमं नैव विद्यते ताम्बूलं तैजसं पात्रं रेतस्सेकं सिताम्बरम् दिवास्वापो हि नक्तान्नं यतीनां षड्विवर्जिताः साक्षरा विपरीताश्च राक्षसास्त इति स्मृताः तस्माद्वै विपरीतं च कर्म नैवाचरेद् यतिः यतिः प्रयत्नतः कुर्यात्क्षौरस्नानं च शुद्धये संस्मरन्मनसा शुद्धं परं ब्रह्म सदाशिवम् इत्येवं मुनिशार्दूल तव स्नेहान्मयाखिलः क्षौरस्नानविधिः प्रोक्तः किम्भूयः श्रोतुमिच्छसि । भिक्षुके चार कर्म हैं - शौच, स्नान, भिक्षा तथा ॥ ३२ एकान्तवास; इसके अतिरिक्त पाँचवाँ कर्म नहीं है ॥ लौकीका पात्र, वेणुका पात्र, लकड़ीका पात्र तथा ॥ ३३ मिट्टीका पात्र – ये चार प्रकारके पात्र भिक्षुकको ग्राह्य हैं, पाँचवाँ कोई अन्य नहीं॥३२-३३ ॥ । ताम्बूल, स्वर्णादि धातुका पात्र, वीर्यसेचन, श्वेत ॥ ३४ वस्त्रधारण, दिनमें शयन तथा रात्रिमें भोजन - ये छ: कर्म यतियोंके लिये सर्वथा वर्जित हैं ॥ ३४ ॥
। विपरीत आचरण करनेवाले साक्षर भी राक्षस कहे ॥ ३५ गये हैं, इसलिये यतिको विपरीत आचरण कभी नहीं । करना चाहिये । यतिको शुद्धिके लिये शुद्ध सनातन शिवतत्त्वका स्मरण करते हुए यत्नपूर्वक क्षौर एवं स्नान ॥ ३६ करना चाहिये । हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार आपके स्नेहके । कारण मैंने क्षौरस्नानकी सम्पूर्ण विधि कह दी, अब ॥ ३७ । आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ३५–३७ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे षष्ठ्यां कैलाससंहितायां क्षौरस्नानविधिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत छठी कैलाससंहितामें क्षौरस्नानविधिवर्णन नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः यतिके अन्त्येष्टिकर्मकी वामदेव उवाच
ये मुक्ता यतयस्तेषां दाहकर्म न विद्यते ।
मृते शरीरे खननं तद्देहस्य श्रुतं मया ॥ १
तत्कर्माचक्ष्व सुप्रीत्या कार्तिकेय गुरो मम ।
त्वत्तोऽन्यो न हि संवक्ता त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ २
पूर्णाहंभावमाश्रित्य ये मुक्ता देहपंजरात् ।
ये तूपासनमार्गेण देहमुक्ताः परं गताः ॥ ३
दशाहपर्यन्त विधिका वर्णन वामदेवजी बोले – जो मुक्त यति हैं, उनके शरीरका दाहकर्म नहीं होता । मरनेपर उनके शरीरको गाड़ दिया जाता है, यह मैंने सुना है । मेरे गुरु कार्तिकेय! आप प्रसन्नतापूर्वक यतियोंके उस अन्त्येष्टिकर्मका मुझसे वर्णन कीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें आपके सिवा दूसरा कोई इस विषयका वर्णन करनेवाला नहीं है॥१-२ ॥ भगवन्! शंकरनन्दन! जो पूर्ण परब्रह्ममें अहंभावका आश्रय ले देहपंजरसे मुक्त हो गये हैं तथा जो उपासनाके मार्गसे शरीरबन्धनसे मुक्त हो परमात्माको
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७०४ तेषां गतिविशेषं च भगवन् शंकरात्मज वक्तुमर्हसि सुप्रीत्या मां विचार्य स्वशिष्यतः सूत उवाच मुनिविज्ञप्तिमाकर्ण्य शक्तिपुत्रः सुरारिहा प्राहात्यन्तरहस्यं तद् भृगुणा श्रुतमीश्वरात् सुब्रह्मण्य उवाच इदमेव मुने गुह्यं भृगवे शिवयोगिने उक्तं भगवता साक्षात्सर्वज्ञेन पिनाकिना वक्ष्ये तदद्य ते ब्रह्मन्न देयं यस्य कस्यचित् देयं शिष्याय शान्ताय शिवभक्तियुताय वै समाधिस्थो यतिः कश्चिच्छिवभावेन देहमुक् अस्ति चेत्स महाधीरः परिपूर्णः शिवो भवेत् ॥ अधैर्यचित्तो यः कश्चित्समाधिं न च विन्दति तदुपायं प्रवक्ष्यामि सावधानतया शृणु त्रिपदार्थपरिज्ञानं वेदान्तागमवाक्यजम् श्रुत्वा गुरोर्मुखाद्योगमभ्यसेत्स यमादिकम् तत्कुर्वन्स यतिः सम्यक् शिवध्यानपरो भवेत् नियमेन मुने नित्यं प्रणवासक्तमानसः देहदौर्बल्यवशतो यद्यधैर्यधरो यतिः अकामश्च शिवं स्मृत्वा स जीर्णां स्वां तनुं त्यजेत् ॥ सदाशिवानुग्रहतो नंदिना प्रेरिता मुने । आतिवाहिकरूपिण्यो देवताः पञ्च विश्रुताः अग्न्यहन्ताकृतिः काचिज्ज्योतिः पुंजवपुष्मती । अह्नोऽभिमानिनी काचिच्छुक्लपक्षाभिमानिनी
उत्तरायणरूपा च पञ्चानुग्रहतत्परा ।
धूम्रा तमस्विनी रात्रिः कृष्णपक्षाभिमानिनी ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २१ । प्राप्त हुए हैं, उनकी गतिमें क्या अन्तर है-॥ ४ बताइये । प्रभो! मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये अच्छी यह | तरह विचार करके प्रसन्नतापूर्वक मुझसे इस विषयका । वर्णन कीजिये ॥ ३४ ॥
सूतजी बोले – मुनि वामदेवजीका निवेदन । । सुनकर देवशत्रुओंका नाश करनेवाले पार्वतीनन्दन | स्कन्दजी शिवजीसे भृगुके द्वारा सुने गये परम ॥ ५ रहस्यको कहने लगे -॥५ ॥
सुब्रह्मण्य बोले – हे मुने! हे ब्रह्मन्! इस गुप्त । बातका सर्वज्ञ सदाशिवने परम शैव भृगुसे जैसा वर्णन ॥ ६ किया था । मैं वही आपसे कह रहा हूँ । यह ज्ञान । जिस किसीको नहीं देना चाहिये, इसे शान्तचित्त तथा ॥ ७ शिवभक्तिसमन्वित शिष्यको ही देना चाहिये ॥ ६-७ ॥ । जो कोई यति समाधिस्थ हो शिवके चिन्तनपूर्वक ८ अपने शरीरका परित्याग करता है, वह यदि महान् धीर हो तो परिपूर्ण शिवरूप हो जाता है; किंतु यदि । कोई अधीरचित्त होनेके कारण समाधिलाभ नहीं कर ॥ ९ पाता तो उसके लिये उपाय बताता हूँ; सावधान होकर सुनो ॥ ८ - ९ ॥ । वेदान्त - शास्त्रके वाक्योंसे जो ज्ञाता, ज्ञान ॥ १० और ज्ञेय - इन तीन पदार्थोंका परिज्ञान होता है, उसे गुरुके मुखसे सुनकर यति यम - नियमादिरूप योगका अभ्यास करे । उसे करते हुए वह भलीभाँति शिवके । ध्यानमें तत्पर रहे । मुने! उसे नित्य नियमपूर्वक ॥ ११ प्रणवके जप और अर्थचिन्तनमें मनको लगाये रखना चाहिये ॥ १०-११ ॥ । मुने! यदि देहकी दुर्बलताके कारण धीरता १२ धारण करनेमें असमर्थ यति निष्कामभावसे शिवका स्मरण करके अपने जीर्ण शरीरको त्याग दे तो ॥ १३ भगवान् सदाशिवके अनुग्रहसे नन्दीके भेजे हुए विख्यात पाँच आतिवाहिक देवता आते हैं ॥ १२-१३ ॥ उनमेंसे कोई तो अग्निका अभिमानी, कोई ॥ १४ | ज्योतिःपुंजस्वरूप, कोई दिनाभिमानी, कोई शुक्ल-पक्षाभिमानी और कोई उत्तरायणका अभिमानी होता । है । ये पाँचों सब प्राणियोंपर करनेमें रहते । हैं । इसी तरह धूमाभिमानी अनुग्रह तत्पर । १५ | अभिमानी, तमका अभिमानी, रात्रिका , कृष्णपक्षका अभिमानी और दक्षिणायनका
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अ ० २१ ] कैलाससंहिता ७०५
दक्षिणायनरूपेति विश्रुताः पञ्च देवताः ।
तासां वृत्तिं शृणुष्वाद्य वामदेव महामुने ॥ १६
ताः पञ्च देवता जीवान् कर्मानुष्ठानतत्परान् ।
गृहीत्वा त्रिदिवं यान्ति तत्पुण्यवशतो मुने ॥ १७
भुक्त्वा भोगान्यथोक्तांश्च ते तत्पुण्यक्षये पुनः ।
मानुषं लोकमासाद्य भजते जन्म पूर्ववत् ॥१८
ताः पुनः पञ्चधा मार्गं विभज्यारभ्य भूतलम् ।
अग्न्यादिक्रमतां गृह्य सदाशिवपदं यतिः ॥ १ ९
निनीय वन्द्यचरणौ देवदेवस्य पृष्ठतः ।
तिष्ठन्त्यनुग्रहाकाराः कर्मण्येव प्रयोजिताः ॥ २०
समागतमभिप्रेक्ष्य देवदेवः सदाशिवः ।
विरक्तश्चेन्महामन्त्रतात्पर्यमुपदिश्य च ॥ २१
स्वसाम्यं च वपुर्दत्ते गाणपत्येभिषिच्य च ।
अनुगृह्णाति सर्वेशः शंकरः सर्वनायकः ॥ २२
मृगटङ्कत्रिशूलाग्र्यवरदानविभूषितम् 1 त्रिनेत्रं चन्द्रशकलं गङ्गोल्लासिजटाधरम् ॥ २३
अधिष्ठितविमानाग्र्यं सर्वगं सर्वकामदम् ।
इति शाखाविरक्तस्य रुद्रकन्यासमावृतम् ॥ २४
नृत्यगीतमृदङ्गादिवाद्यघोषमनोहरम् अभिमानी – ये सब मिलकर पाँच होते हैं । ये पाँचों विख्यात देवता दक्षिण मार्गमें प्रसिद्ध हैं । महामुने वामदेव! अब तुम उन सब देवताओंकी वृत्तिका वर्णन सुनो ॥ १४–१६ ॥ कर्मके अनुष्ठानमें लगे हुए जीवोंको साथ ले वे पाँचों देवता उनके पुण्यवश स्वर्गलोकको जाते हैं और वहाँ यथोक्त भोगोंका उपभोग करके वे जीव पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मनुष्यलोकमें आते तथा पूर्ववत् जन्म ग्रहण करते हैं ॥ १७-१८ ॥ इनके सिवा जो उत्तर मार्गके पाँच देवता हैं, वे भूतलसे लेकर ऊर्ध्वलोकतकके मार्गको पाँच भागोंमें विभक्त करके यतिको साथ ले क्रमशः अग्नि आदिके मार्गमें होते हुए उसे सदाशिवके धाममें पहुँचाते हैं । वहाँ देवाधिदेव महादेवके चरणोंमें प्रणाम करके लोकानुग्रहके कर्ममें ही लगाये गये वे अनुग्रहाकार देवता उन सदाशिवके पीछे खड़े हो जाते हैं ॥ १ ९ -२० ॥ यतिको आया देख देवाधिदेव सदाशिव यदि वह विरक्त हो तो उसे महामन्त्रके तात्पर्यका उपदेश दे गणपतिके पदपर अभिषिक्त करके अपने ही समान शरीर देते हैं । इस प्रकार सर्वेश्वर सर्वनियन्ता भगवान् शंकर उसपर अनुग्रह करते हैं ॥ २१-२२ ॥ उसे मृग, टंक, त्रिशूल, वरदान [ मुद्रा ] -से विभूषितकर अर्धचन्द्रसमन्वित तथा गंगाप्रवाहसे उल्लसित जटाओंवाला बना देते हैं ॥ २३ ॥
जो यति नाना शाखाओंवाले विषयभोगोंसे विरक्त नहीं हुआ है, उसे कृपापूर्वक शिवजी सभी कामनाओंको प्रदान करनेवाला, रुद्रकन्याओंसे समावृत, मृदंगादि वाद्यध्वनियों तथा नृत्य - गीतादिसे मनोहर, दिव्य वस्त्र, दिव्याम्बरस्त्रगालेपभूषणैरपि भूषितम् ॥ २५ माल्य, आभूषण आदिसे विभूषित, दिव्य अमृत घटोंसे दिव्यांभः परिपूरितम् । पूर्ण, दिव्य शय्याओंसे युक्त, करोड़ों सूर्योंके समान दिव्यामृतघटैः पूर्ण ॥ २६ दीप्तिमान् तथा करोड़ों चन्द्रोंके समान शीतल, मनके सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशीतलम् समान वेगवाला, सर्वत्रगामी विमान प्रदान करते हैं । इन मनोवेगं सर्वगं च विमानमनुगृह्य च । भोगोंको भोग लेनेपर निवृत्त हुई भोगासक्तिवाले यतिको भुक्तभोगस्य तस्यापि भोगकौतूहल क्षये ॥ २७ स्वभावतः अत्यन्त दुर्गम, तीव्रतर, [ विषय - वासनारूपी ] शक्तिं तीव्रतरां प्रकृत्या ह्यतिदुर्गमाम् । वनको दग्ध करनेके लिये उद्यत, प्रलयकालीन अग्निके निपात्य ॥ २८ । सदृश प्रभावाली शक्ति प्रदान करते हैं ॥ २४–२८ ॥ कान्तारं दग्धुकामां तां प्रलयानलसुप्रभाम् 2224 chichouran IInd Part Section 24 1 Front
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श्रीशिवमहापुराण [ अ ० २१ ७०६ परमेश्वरः । वे परमेश्वर अनुग्रहपूर्वक उस यतिको महामन्त्रके अनुगृह्य महामन्त्रतात्पर्यं निश्चलम् ॥ २ ९ तात्पर्यका उपदेश करते हैं । जिसके फलस्वरूप बहके पूर्णोऽहं भावनारूपः शम्भुरस्मीति अनुगृह्य समाधिं च स्वदास्यस्पन्दरूपिणीः रव्यादिकर्म्मसामर्थ्यरूपाः सिद्धीरनर्गलाः आयुः क्षये पद्मयोनेः पुनरावृत्तिवर्जिताम् मुक्तिं च परमां तस्मै प्रयच्छति जगद्गुरुः एतदेव पदं तस्मात्सर्वैश्वर्यं समष्टिमत् । मुक्तिघंटापथं चेति वेदान्तानां विनिश्चयः
मुमूर्षोस्तस्य मन्दस्य यतेः सत्सम्प्रदायिनः ।
यतयः सानुकूलत्वात्तिष्ठेयुः परितस्तदा ॥
ततः सर्वे च ते तत्र प्रणवादीन्यनुक्रमात् । उपदिश्य च वाक्यानि तात्पर्यं च समाहिताः
वर्णयेयुः स्फुटं प्रीत्या शिवं संस्मारयन्सदा ।
निर्गुणं परमज्योतिः प्रणम्य विलयावधि ॥
एतेषां सममेवात्र संस्कारक्रम उच्यते ।
असंस्कृतशरीराणां दौर्गत्यं नैव जायते ॥
संन्यस्य सर्वकर्माणि शिवाश्रयपरा यतः ।
देहं दूषयतस्तेषां राज्ञो राष्ट्रं च नश्यति ॥
तद्ग्रामवासिनस्तेऽपि भवेयुर्भृशदुःखिनः ।
तद्दोषपरिहाराय विधानं चैवमुच्यते ॥
स तु नम इरिण्याय चेत्यारभ्य विनम्रधीः ।
नम आमीवत्केभ्यान्तं तत्काले प्रजपेन्मनुम् ॥
ओमित्यन्ते जपन् देवयजनं पूरयेत्ततः ।
ततः शान्तिर्भवेत्तस्य दोषस्य हि मुनीश्वर ॥
| ' मैं परिपूर्ण शिव ही हूँ ' इस प्रकारकी निश्चल भावनावाला हो जाता है ॥ २ ९ ॥ । उसे वे अनुगृहीत करके निश्चल समाधि देते हैं । ॥ ३० अपने प्रति दास्यभावकी फलस्वरूपा तथा सूर्य आदिके | कार्य करनेकी शक्तिरूपा ऐसी सिद्धियाँ प्रदान करते हैं, जो कहीं अवरुद्ध नहीं होतीं । साथ ही वे जगद्गुरु शंकर उस यतिको वह परम मुक्ति देते हैं, ज । ब्रह्माजीकी आयु समाप्त होनेपर भी पुनरावृत्तिके ॥ ३१ चक्र दूर रहती है॥३०-३१ ॥ अतः यही समष्टिमान् सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे युक्त पद ॥ ३२ है और यही मोक्षका राजमार्ग है, ऐसा वेदान्तशास्त्रका निश्चय है ॥३२ ॥
जिस समय यति मरणासन्न हो शरीरसे शिथिल ३३ हो जाय, उस समय श्रेष्ठ सम्प्रदायवाले दूसरे यति अनुकूलताकी भावना ले उसके चारों ओर खड़े हो जायँ । वे सब वहाँ क्रमशः प्रणव आदि वाक्योंका उपदेश ॥ ३४दे उनके तात्पर्यका सावधानी और प्रसन्नताके साथ सुस्पष्ट वर्णन करें तथा जबतक उसके प्राणोंका लय ३५ न हो जाय तबतक निर्गुण परमज्योतिःस्वरूप सदाशिवका उसे निरन्तर स्मरण कराते रहें । ३३-३५ ॥ सब यतियोंका यहाँ समानरूपसे संस्कार - क्रम ३६ बताया जाता है । संन्यासी सब कर्मोंका त्याग करके भगवान् शिवका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं । इसलिये उनके शरीरका दाहसंस्कार नहीं होता और उसके न ३७ होनेसे उनकी दुर्गति नहीं होती । संन्यासीके शरीरको दूषित करनेवाले राजाका राज्य नष्ट हो जाता है । उसके गाँवोंमें रहनेवाले लोग अत्यन्त दुखी हो जाते ३८ हैं । इसलिये उस दोषका परिहार करनेके लिये शान्तिका विधान बताया जाता है ॥ ३६–३८ ॥ उस समय ‘ नम इरिण्याय ' से लेकर ' नम ३ ९ अमीवकेभ्यः ' तकके मन्त्रका विनीतचित्त होकर जप करे । फिर अन्तमें ओंकारका जप करते हुए मिट्टीसे । देवयजनकी * पूर्ति करे । मुनीश्वर! ऐसा करनेसे उस ४० । दोषकी शान्ति हो जाती है ॥ ३ ९ -४० ॥ * संन्यासीके शरीरको गाड़नेके लिये जो गड्ढा खोदा जाता है, उसको ' देवयजन ' कहते हैं । 2224 Shivmahapuran_IInd Part_Section_24_1_Back