शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 801–810

शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810

पृष्ठ 801

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अ ० १८ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७८७

तदा देवश्च देवी च दिव्यासनगतावुभौ ।

दर्शनं ददतुस्तेषां देवादीनां द्विजोत्तमाः ॥

तदानीमेव दक्षोऽपि गतस्तत्र सहामरैः ।

जामातरं हरं द्रष्टुं देवीं चात्मसुतां सतीम् ॥

तदात्मगौरवाद्देवो देव्या दक्षे समागते ।

देवादिभ्यो विशेषेण न कदाचिदभूत्स्मृतिः ॥

तस्य तस्याः परं भावमज्ञातुश्चापि केवलम् ।

पुत्रीत्येवं विमूढस्य तस्यां वैरमजायत ॥

ततस्तेनैव वैरेण विधिना च प्रचोदितः ।

नाजुहाव भवं दक्षो दीक्षितस्तामपि द्विषन् ॥

अन्याञ्जामातरः सर्वानाहूय स यथाक्रमम् ।

शतशः पुष्कलामर्चाञ्चकार च पृथक् पृथक् ॥

तथा तान्संगतान् श्रुत्वा नारदस्य मुखात्तदा ।

ययौ रुद्राय रुद्राणी विज्ञाप्य भवनं पितुः ॥

अथ संनिहितं दिव्यं विमानं विश्वतोमुखम् ।

लक्षणाढ्यं सुखारोहमतिमात्रं मनोहरम् ॥

तप्तजाम्बूनदप्रख्यं चित्ररत्नपरिष्कृतम् ।

मुक्तामयवितानाग्र्यं स्रग्दामसमलंकृतम् ॥

तप्तकाञ्चननिर्व्यूहं रत्नस्तम्भशतावृतम् वज्रकल्पितसोपानं विद्रुमस्तम्भतोरणम् हे द्विजश्रेष्ठो! वहाँ दिव्य आसनपर ६ विराजमान शंकर एवं देवीने उन देवता आदिको दर्शन दिया ॥६ ॥

उस समय देवताओंके साथ दक्ष भी अपनी ७ पुत्री सती तथा जामाता शंकरको देखनेके लिये गये हुए थे ॥७ ॥

उस समय देवीके साथ स्थित भगवान् ८ सदाशिव अपनी स्वरूपमहिमामें निमग्न होनेके कारण ( लोक - व्यवहारमें अनासक्त होनेसे ) आये हुए पितृतुल्य श्वशुर दक्षका देवताओंकी अपेक्षा विशेष आदर करना चाहिये, इस बातका तनिक भी स्मरण न कर सके ॥ ८ ॥

भगवान् सदाशिव तथा सतीकी परम ९ महिमासे अपरिचित तथा सती देवीको केवल पुत्री समझनेवाले दक्ष [ इसी कारण ] सतीसे द्वेष करने लगे ॥९ ॥

इसी वैरभावके कारण तथा दुर्भाग्यसे प्रेरित १० हुए [ यज्ञ ] - दीक्षित दक्षने द्वेषवश न केवल शिवजीको अपितु अपनी पुत्रीको भी यज्ञमें आमन्त्रित नहीं किया ॥ १० ॥

जितने भी अन्य जामाता थे, उन सभीको ११ बुलाकर दक्षने पृथक् - पृथक् उनका अत्यधिक सत्कार किया ॥११ ॥

तब नारदजीके मुखसे अपने पिताके यज्ञमें उन १२ सभीको गया हुआ सुनकर रुद्राणी भी रुद्रदेवको सूचितकर पिताके भवन जाने लगीं ॥१२ ॥

[ उनकी यात्राके लिये आया हुआ जो १३ विमान था, वह ] चारों ओर खिड़कियोंवाला, सभी प्रकारके लक्षणोंसे समन्वित, सुखपूर्वक आरोहणके लिये अतीव योग्य, मनको मोहित करनेवाला, १४ सर्वोत्तम, तप्त स्वर्णके समान देदीप्यमान, विचित्र रत्नोंसे परिष्कृत, मोतियोंसे युक्त वितानसे सुशोभित, । मालाओंसे अलंकृत, विचित्र तप्त स्वर्ण - जैसी कान्तिवाली ॥ १५ खूटियोंसे युक्त, सैकड़ों रत्नजटित स्तम्भोंसे आवृत, हीरेसे निर्मित सीढ़ियोंवाला, मूँगोंके तोरणसे सुशोभित स्तम्भवाला, बिछे हुए पुष्पोंसे युक्त विचित्र रत्नोंके पुष्पपट्टपरिस्तीर्ण चित्ररत्नमहासनम् ।

पृष्ठ 802

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श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १८ ७८८ ॥ १६ । आसनसे शोभायमान, हीरेकी जालियोंवाला, दोषरहित वज्रजालकिरच्छिद्रमच्छिद्रमणिकुट्टिमम् | मणियोंसे निर्मित फर्शवाला था, जिसमें मणिमय मणिदण्डमनोज्ञेन महावृषभलक्ष्मणा । । मनोहर दण्ड लगा था और जो महावृषभके चिह्नसे अलङ्कृतपुरोभागमभ्रशुभ्रेण केतुना ॥ १७ | अंकित था, ऐसे मेघसदृश उज्ज्वल ध्वजसे अलंकृत रत्नकञ्चुकगुप्तांगैश्चित्रवेत्रैकपाणिभिः अधिष्ठितमहाद्वारमप्रधृष्यैर्गणेश्वरैः मृदंगतालगीतादिवेणुवीणाविशारदैः विदग्धवेषभूषैश्च बहुभिः स्त्रीजनैर्वृतम् आरुरोह महादेवी सह प्रियसखीजनैः चामरव्यजने तस्या वज्रदंडमनोहरे

गृहीत्वा रुद्रकन्ये द्वे विवीजतुरुभे शुभे ।

तदा चामरयोर्मध्ये देव्या वदनमाबभौ ॥

अन्योऽन्यं युध्यतोर्मध्ये हंसयोरिव पंकजम् ।

छत्रं शशिनिभं तस्याश्चूडोपरि सुमालिनी ॥

धृतमुक्तापरिक्षिप्तं बभार प्रेमनिर्भरा ।

तच्छत्रमुज्ज्वलं देव्या रुरुचे वदनोपरि ॥

उपर्यमृतभांडस्य मंडलं शशिनो यथा ।

अथ चाग्रे समासीना सुस्मितास्या शुभावती ॥

अक्षद्यूतविनोदेन रमयामास वै सतीम् ।

सुयशाः पादुके देव्याः शुभे रत्नपरिष्कृते ॥

स्तनयोरन्तरे कृत्वा तदा देवीमसेवत ।

अन्या काञ्चनचार्वङ्गी दीप्तं जग्राह दर्पणम् ॥

अपरा तालवृन्तं च परा तांबूलपेटिकाम् ।

काचित्क्रीडाशुकं चारु करेऽकुरुत भामिनी ॥

काचित्तु सुमनोज्ञानि पुष्पाणि सुरभीणि च ।

काचिदाभरणाधारं बभार कमलेक्षणा ॥

काचिच्च पुनरालेपं सुप्रसूनं शुभाञ्जनम् ।

अन्याश्च सदृशास्तास्ता यथास्वमुचितक्रियाः ॥

1 | पूर्वभागवाले, रत्नजटित कंचुकसे ढँके हुए देहवाले ॥ १८ । तथा हाथमें बेंत धारण किये हुए दुर्धर्षं गणेश्वरोंसे | अधिष्ठित महाद्वारवाले, मृदंग - ताल - गीत - वेणु - वीणा-| वादनमें प्रवीण तथा मनोहर वेष धारण की हुई बहुत-॥ १ ९ | सी स्त्रियोंसे घिरे हुए तथा अपने पास लाये गये उस । दिव्य विमानपर महादेवी अपनी प्रिय सखियोंके साथ आरूढ़ हुईं ॥ १३–१९ १ / २ ॥ ॥ २० उस समय दो सुन्दर रुद्रकन्याएँ हीरेसे जटित दण्डवाले दो मनोहर चामर हाथोंमें लेकर उनके दोनों ओरसे डुला रही थीं । उस समय दोनों २१ चामरोंके मध्य देवीका मुखमण्डल इस प्रकार शोभायमान होने लगा, जैसे परस्पर लड़ते हुए दो हंसोंके मध्य २२ कमल सुशोभित हो रहा हो । सुमालिनीने प्रेमसे परिपूर्ण होकर भगवती सतीके शिरोभागमें चन्द्रके समान मनको मुग्ध करनेवाले छत्रको लगाया । वह २३ मोतीकी झालरोंसे सुसज्जित था । देवीके मुखमण्डलपर वह समुज्ज्वल मनोहर छत्र इस तरह शोभायमान हो रहा था, मानो अमृतकलशके ऊपर चन्द्रमा सुशोभित २४ हो रहा हो । देवी सतीके सम्मुख बैठी मन्द मुसकान करती हुई शुभावती पासेके खेलद्वारा सती देवीका २५ मनोविनोद कर रही थी । सुयशा देवीकी रत्नजटित सुन्दर पादुका अपने वक्षःस्थलसे लगाकर उनकी सेवा कर रही थी । स्वर्णके समान अंगवाली कोई दूसरी २६ सखी हाथमें उज्वल दर्पण धारण की हुई थी । किसी सखीने तालवृन्त धारण कर रखा था तो कोई पानदान २७ लिये हुए थी । एक सुन्दरीने हाथमें मनोहर क्रीडाशुक धारण कर रखा था ॥ २०–२७ ॥ कोई मनको मुग्ध करनेवाले सुगन्धित पुष्प २८ तथा कोई कमलनयना स्त्री आभूषणोंकी पेटी लिये हुए थी । किसीके हाथमें सुगन्धित आलेप, उत्तम फूल एवं सुन्दर अंजन था । इसी तरह अन्यान्य | दासियाँ उन महादेवीको चारों ओरसे घेरकर २ ९ | अपने - अपने अनुकूल कार्योंमें लगकर उनकी सेवा

पृष्ठ 803

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अ ० १८ ] वायवीयसंहिता तां महादेवीमसेवन्त समन्ततः । आवृत्य अतीव शुशुभे तासामन्तरे परमेश्वरी ॥ ३०

तारापरिषदो मध्ये चंद्रलेखेव शारदी ।

ततः शंखसमुत्थस्य नादस्य समनन्तरम् ॥ ३१

प्रास्थानिको महानादः पटहः समताड्यत ।

ततो मधुरवाद्यानि सह तालोद्यतैः स्वनैः ॥ ३२

अनाहतानि सन्नेदुः काहलानां शतानि च ।

सायुधानां गणेशानां महेशसमतेजसाम् ॥ ३३

सहस्त्राणि शतान्यष्टौ तदानीं पुरतो ययुः ।

तेषां मध्ये वृषारूढो गजारूढो यथा गुरुः ॥ ३४

जगाम गणपः श्रीमान् सोमनन्दीश्वरार्चितः ।

देवदुंदुभयो नेदुर्दिवि दिव्यसुखा घनाः ॥ ३५

ननृतुर्मुनयः सर्वे मुमुदुः सिद्धयोगिनः ।

ससृजुः पुष्पवृष्टिं च वितानोपरि वारिदाः ॥ ३६

तदा देवगणैश्चान्यैः पथि सर्वत्र संगताः ।

क्षणादिव पितुर्गेहं प्रविवेश महेश्वरी ॥ ३७

तां दृष्ट्वा कुपितो दक्षश्चात्मनः क्षयकारणात् ।

तस्या यवीयसीभ्योऽपि चक्रे पूजामसत्कृताम् ॥ ३८

तदा शशिमुखी देवी पितरं सदसि स्थितम् ।

अंबिका युक्तमव्यग्रमुवाचाकृपणं वचः ॥३ ९

देव्युवाच पिशाचान्ता यस्याज्ञावशवर्तिनः । ( पूर्वखण्ड ) ७८ ९ कर रही थीं । वे परमेश्वरी उनके बीचमें इस तरह अत्यधिक सुशोभित हो रही थीं, जिस तरह तारोंके समूहके मध्यमें शरत्कालीन चन्द्ररेखा सुशोभित होती है ॥ २८-३० १/२ ॥ इसके पश्चात् शंखध्वनिके होते ही महान् ध्वनि करनेवाले, प्रस्थानके सूचक नगाड़े बज उठे । ताल और स्वरसे समन्वित दूसरे भी सुमधुर बाजे और बिना आघातके सैकड़ों काहल नामक बाजे भी बजने लगे ॥ ३१-३२१ / २ ॥ उस समय महादेवके समान अमित तेजस्वी एक हजार आठ सौ गणेशोंके समूह अस्त्र - शस्त्रसे युक्त हो उनके आगे चलने लगे । उन गणोंके मध्यमें बैलपर सवार देववन्दित श्रीमान् गणपति सोमनन्दी हाथीपर आरूढ़ देवगुरु बृहस्पतिके समान चलने लगे ॥ ३३-३४१ / २ ॥ उस समय आकाशमें कानोंको सुख देनेवाले देवगणोंके नगाड़े बजने लगे । सभी मुनिगण नाचने लगे, सिद्ध और योगी हर्षित हो उठे एवं बादल वितानके ऊपर पुष्पवृष्टि करने लगे । मार्गमें अनेक देवताओं तथा अन्य लोगोंसे मिलती हुई वे महेश्वरी थोड़ी देरमें अपने पिता दक्षके घर पहुँच गयीं । उन्हें देखकर अपनी मृत्युके वशीभूत हुए दक्ष कुपित हो उठे और उन्होंने सतीका उतना भी सत्कार नहीं किया, जितना कि उनकी छोटी बहनोंका किया था । इसके बाद उन चन्द्रमुखी सती देवीने सभामें विराजमान अपने पिता दक्षसे युक्तियुक्त, उदार तथा धैर्ययुक्त वाणीमें कहा— ॥ ३५–३९ ॥ देवी बोलीं- हे तात! ब्रह्मासे लेकर पिशाच-पर्यन्त जिनकी आज्ञाका पालन करते हैं, आपने ब्रह्मादयः सांप्रतं तात विधिना नार्चितः किल ॥ ४० इस समय उन देवाधिदेवकी विधिपूर्वक अर्चना नहीं स देवः की । उनकी पूजाकी बात तो छोड़िये, आपको मुझ तदास्तां मम ज्यायस्याः पुत्र्याः पूजां किमीदृशीम् । ज्येष्ठ पुत्रीका सत्कार भी क्या इसी तरह करना कृतवानसि गर्हितम् ॥ ४१ चाहिये? आपने मेरा सत्कार न करके निन्दित कार्य असत्कृतामवज्ञाय किया है ॥ ४०-४१ ॥ सती देवीने जब उनसे इस प्रकार कहा, दक्षः क्रोधादमर्षितः । तब दक्षने क्रोधसे व्याकुल होकर कहा- ये मेरी एवमुक्तोऽब्रवीदेनां सुता मम ॥ ४२ | पुत्रियाँ तुम्हारी अपेक्षा श्रेष्ठ, विशिष्ट और पूज्य हैं । त्वत्तः श्रेष्ठा विशिष्टाश्च पूज्या बालाः

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७ ९ ० तासां तु ये च भर्त्तारस्ते मे बहुमता मुदा गुणैश्चाप्यधिकाः सर्वे भर्तुस्ते त्र्यंबकादपि स्तब्धात्मा तामसः शर्वः त्वमिमं समुपाश्रिता तेन त्वामवमन्येऽहं प्रतिकूलो हि मे भवः तथोक्ता पितरं दक्षं क्रुद्धा देवी तमब्रवीत् शृण्वतामेव सर्वेषां ये यज्ञसदसि स्थिताः

अकस्मान्मम भर्तारमजाताशेषदूषणम् ।

वाचा दूषयसे दक्ष साक्षाल्लोकमहेश्वरम् ॥

विद्याचौरो गुरुद्रोही वेदेश्वरविदूषकः त एते बहुपाप्मानः सर्वे दंड्या इति श्रुतिः

तस्मादत्युत्कटस्यास्य पापस्य सदृशो भृशम् ।

सहसा दारुणो दंडस्तव दैवाद्भविष्यति ॥

त्वया न पूजितो यस्माद्देवदेवस्त्रियम्बकः ।

तस्मात्तव कुलं दुष्टं नष्टमित्यवधारय ॥

इत्युक्त्वा पितरं रुष्टा सती संत्यक्तसाध्वसा ।

तदीयां च तनुं त्यक्त्वा हिमवन्तं ययौ गिरिम् ॥

स पर्वतवरः श्रीमाँल्लब्धपुण्यफलोदयः ।

तदर्थमेव कृतवान् सुचिरं दुश्चरं तपः ॥

तस्मात्तमनुगृह्णाति भूधरेश्वरमीश्वरी ।

स्वेच्छया पितरं चक्रे स्वात्मनो योगमायया ॥

यदा गता सती दक्षं विनिन्द्य भयविह्वलम् ।

तदा तिरोहिता मंत्रा विहतश्च ततोऽध्वरः ॥

तदुपश्रुत्य गमनं देव्यास्त्रिपुरमर्दनः ।

दक्षाय च ऋषिभ्यश्च चुकोप च शशाप तान् ॥

यस्मादवमता दक्ष मत्कृतेऽनागसा सती ।

पूजिताश्चेतराः सर्वाः स्वसुता भर्तृभिः सह ॥

वैवस्वतेऽन्तरे तस्मात्तव जामातरस्त्वमी । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १८ | इनके जो पति हैं, वे भी मेरे लिये अत्यन्त माननीय । हैं और वे सभी तुम्हारे पति त्रिनेत्र शिवसे गुणों ॥ ४३ अधिक हैं । जिनकी तुम आश्रिता हो में बहुत, वे शिव स्तब्ध और तमोगुणी हैं । मैंने तुम्हारा अपमान । इसीलिये किया; क्योंकि शिव मेरे अनुकूल नहीं ॥ ४४ हैं ॥ ४२–४४ ॥ । इस तरह दक्षके कहनेपर यज्ञमें जो सदस्य ॥ ४५ स्थित थे, उन सभीको सुनाते हुए वे देवी अपने पिता | दक्षसे कहने लगीं - हे दक्ष! आपने सर्वथा निर्दोष साक्षात् लोकमहेश्वर मेरे पतिको वचनोंद्वारा अकारण ४६ दूषित बताया है ॥ ४५-४६ ॥ विद्याकी चोरी करनेवाला, गुरुद्रोही एवं वेद । ॥ ४७ तथा ईश्वरकी निन्दा करनेवाला — ये सभी पापी दण्डके योग्य हैं, ऐसी वेदाज्ञा है । इसलिये दैवयोगसे आपको उसी महापापके समान ही दारुण दण्ड सहसा ४८ प्राप्त होगा । आपने देवाधिदेव सदाशिवकी पूजा नहीं की, अतः आपका दूषित कुल नष्ट हो गया— - ऐसा ४ ९ समझिये ॥ ४७ – ४ ९ ॥ इस तरह क्रोधित हुई सती देवीने निर्भय ५० होकर अपने पितासे ऐसा कहकर उनसे सम्बन्धित | शरीरको त्याग दिया और हिमालयपर्वतपर चली गयीं ॥५० ॥

पुण्य फलोंकी समृद्धिवाले श्रीमान् पर्वतश्रेष्ठ ५१ हिमालयने उन भगवतीकी प्राप्तिके लिये सुदीर्घ-कालपर्यन्त दुष्कर तप किया था । इसीलिये उन ईश्वरीने उन पर्वतराज हिमालयपर अनुग्रह किया ५२ और योगमायाके द्वारा अपनी इच्छासे उन्हें अपना पिता बनाया ॥ ५१-५२ ॥ जिस समय सती भयसे व्याकुल दक्षकी ५३ निन्दा करके गयीं, उसी समय मन्त्र तिरोहित हो गये और वह यज्ञ विनष्ट हो गया । शिवजीने देवीके | गमनका समाचार सुनकर दक्ष तथा ऋषियोंपर ५४ अत्यधिक क्रोध किया और उन्हें शाप दे दिया । हे दक्ष! आपने मेरे कारण दोषरहित सतीका अपमान ५५ | किया और पतियोंसहित अपनी अन्य सभी पुत्रियोंका | सत्कार किया, अतः आपके ये सभी अयोनिज | जामाता वैवस्वत मन्वन्तरमें ब्रह्माजीके द्वारा प्रवर्तित

पृष्ठ 805

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अ ० १ ९ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ७ ९ १ उत्पत्स्यन्ते समं सर्वे ब्रह्मयज्ञेष्वयोनिजाः ॥

भविता मनुष राजा चाक्षुषस्य त्वमन्वये ।

प्राचीनबर्हिषः पौत्रः पुत्रश्चापि प्रचेतसः ॥

अहं तत्रापि ते विघ्नमाचरिष्यामि दुर्मते ।

धर्मार्थकामयुक्तेषु कर्मस्वपि पुनः पुनः ॥

तेनैवं व्याहृतो दक्षो रुद्रेणामिततेजसा । स्वायंभुवीं तनुं त्यक्त्वा पपात भुवि दुःखितः

ततः प्राचेतसो दक्षो जज्ञे वै चाक्षुषेऽन्तरे ।

प्राचीनबर्हिषः पौत्रः पुत्रश्चैव प्रचेतसाम् ॥

भृग्वादयोऽपि जाता वै मनोर्वैवस्वतस्य तु अन्तरे ब्रह्मणो यज्ञे वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् तदा दक्षस्य धर्मार्थं प्रवृत्तस्य दुरात्मनः महेशः कृतवान् विघ्नं मनौ वैवस्वते सति ५६ यज्ञोंमें उत्पन्न होंगे और आप चाक्षुष मन्वन्तरमें प्राचीनबर्हिके पौत्र तथा प्रचेताओंके पुत्र होकर ५७ मनुष्योंके राजा बनेंगे । हे दुर्मते! मैं उस समय आपके धर्म, अर्थ, कामसे युक्त कार्योंमें बारंबार विघ्न ५८ डालूँगा ॥ ५३–५८ ॥ जिस समय अमित तेजस्वी रुद्रने दक्षके प्रति ॥ ५ ९ ऐसा कहा, उसी समय दुखी दक्ष ब्रह्मदेवसे उत्पन्न अपने देहका त्यागकर पृथ्वीपर गिर पड़े । इसके पश्चात् वही प्राचेतस दक्ष चाक्षुष मन्वन्तरमें प्राचेतस ६० नामसे प्रचेताओंके पुत्र और प्राचीनबर्हिके पौत्रके रूपमें पृथ्वीपर उत्पन्न हुए ॥५ ९ -६० ॥ । वे भृगु आदि महर्षि भी वैवस्वत मन्वन्तरके ॥ ६१ ब्रह्माजीके यज्ञमें वरुणके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए ॥ ६१ ॥

। तब वैवस्वत मन्वन्तरमें उन दुरात्मा दक्षके ॥ ६२ । धर्मार्थ प्रवृत्त होनेपर महादेवने विघ्न किया ॥६२ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे सतीदेहत्यागो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें सतीदेहत्याग नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥

अथैकोनविंशोऽध्यायः दक्षयज्ञका उपक्रम, दधीचिका दक्षको शाप देना, वीरभद्र और भद्रकालीका प्रादुर्भाव तथा उनका यज्ञध्वंसके लिये प्रस्थान ऋषय ऊचुः

कथं दक्षस्य धर्मार्थं प्रवृत्तस्य दुरात्मनः ।

महेशः कृतवान् विघ्नमेतदिच्छाम वेदितुम् ॥ १

वायुरुवाच

विश्वस्य जगतो मातुरपि देव्यास्तपोबलात् ।

पितृभावमुपागत्य मुदि हिमवद्गिरौ ॥ २

देवेऽपि तत्कृतोद्वाहे हिमवच्छिखरालये ।

सङ्क्रीडति तया सार्द्धं काले बहुतरे गते ॥ ३

वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते दक्षः प्राचेतसः स्वयम् ।

अश्वमेधेन यज्ञेन यक्ष्यमाणोऽन्वपद्यत ॥ ४

ऋषि बोले — धर्मकार्यमें प्रवृत्त हुए दुरात्मा दक्षके कर्ममें महेश्वरने किस प्रकार विघ्न किया, हमलोग यह जानना चाहते हैं? ॥ १ ॥

वायु बोले- अपने तपके प्रभावसे सारे संसारकी माता भगवती देवीका पितृत्व प्राप्त करके हिमालय बहुत ही प्रसन्न हुए । जब शिवजीका उनसे विवाह हो गया और हिमालयके शिखरपर उनके साथ विहार करते हुए शिवजीका बहुत समय बीत गया । तब वैवस्वत मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर उन प्रचेताके पुत्र स्वयं दक्षने अश्वमेधयज्ञ करनेका विचार किया ॥ २–४ ॥

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७ ९ २ ( श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १ ९

ततो हिमवतः पृष्ठे दक्षो वै यज्ञमाहरत् ।

गंगाद्वारे शुभे देशे ऋषिसिद्धनिषेविते ॥ ५

तस्य तस्मिन्मखे देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।॥६

आदित्या वसवो रुद्राः साध्याः सह मरुद्गणैः ।

ऊष्मपाः सोमपाश्चैव आज्यपा धूमपास्तथा ॥ ७

अश्विनौ पितरश्चैव तथा चान्ये महर्षयः ।

विष्णुना सहिताः सर्वे स्वागता यज्ञभागिनः ॥ ८

दृष्ट्वा देवकुलं सर्वमीश्वरेण विना गतम् ।

दधीचो मन्युनाविष्टो दक्षमेवमभाषत ॥ ९

दधीच उवाच

अप्यपूज्ये चैव पूजा पूज्यानां चाप्यपूजने ।

नरः पापमवाप्नोति महद्वै नात्र संशयः ॥ १०

असतां सम्मतिर्यत्र सतामवमतिस्तथा ।

दंडो देवकृतस्तत्र सद्यः पतति दारुणः ॥ ११ ।

एवमुक्त्वा तु विप्रर्षिः पुनर्दक्षमभाषत ।

पूज्यं तु पशुभर्तारं कस्मान्नार्चयसे प्रभुम् ॥ १२

दक्ष उवाच

सन्ति मे बहवो रुद्राः शूलहस्ताः कपर्दिनः ।

एकादशावस्थिता ये नान्यं वेद्मि महेश्वरम् ॥ १३

दधीच उवाच

किमेभिरमरैरन्यैः पूजितैरध्वरे फलम् ।

राजा चेदध्वरस्यास्य न रुद्रः पूज्यते त्वया ॥ १४

ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्स्रष्टा यः प्रभुरव्ययः ।

ब्रह्मादयः पिशाचान्ता यस्य कैंकर्यवादिनः ॥ १५

प्रकृतीनां परश्चैव पुरुषस्य च यः परः ।

चिन्त्यते योगविद्वद्भिर्ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६

अक्षरं परमं ब्रह्म ह्यसच्च सदसच्च यत् ।

अनादिमध्यनिधनमप्रतर्क्यं सनातनम् ॥ १७

यः स्रष्टा चैव संहर्ता भर्ता चैव महेश्वरः ।

तस्मादन्यं न पश्यामि शंकरात्मानमध्वरे ॥ १८ ।

दक्ष हिमालयके पृष्ठपर ऋषियों तथा सिद्धोंद्वारा । सेवित गंगाद्वार नामक शुभस्थानपर यज्ञ करने लगे ॥५ इसके बाद उनके उस यज्ञमें जानेके लिये ॥ इन्द्रादि देवता आपसमें आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, ऊष्मप | सोमप, आज्यप, धूमप, दोनों अश्विनीकुमार, पितृगण, । तथा अन्य महर्षिगण - विष्णुके सहित ये सभी लोग । । उस यज्ञमें भाग लेनेके लिये आये । [ उस यज्ञमें ] सदाशिवके अतिरिक्त सभी देवताओंको उपस्थित | देखकर कोपाविष्ट दधीच दक्षसे इस प्रकार कहने लगे — ॥७ – ९ ॥ दधीचि बोले – अपूज्यके पूजनसे तथा पूज्योंकी पूजा न करनेसे मनुष्यको बड़ा पाप लगता है, इसमें सन्देह नहीं है । जहाँ असज्जनोंका सम्मान तथा सत्पुरुषोंका अपमान होता है, वहाँ शीघ्र ही ईश्वरके द्वारा दिया गया कठोर दण्ड उपस्थित होता है ॥ १०-११ ॥ दधीचिने इस प्रकार कहकर दक्षसे पुनः कहा-तुम पूज्य पशुपति महेश्वरका पूजन किसलिये नहीं करते हो? ॥१२ ॥

दक्ष बोले — जटाजूटसे समन्वित, हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए एकादश रुद्र तथा अन्य बहुत - से रुद्र मेरे यहाँ उपस्थित हैं, मैं और किसी अन्य महेश्वरको नहीं जानता हूँ ॥१३ ॥

दधीचि बोले — यदि तुम इस यज्ञके राजा महेश्वरका पूजन नहीं कर रहे हो, तो इस यज्ञमें इन अन्य देवताओंके पूजनसे क्या लाभ! ॥१४ ॥

जो अविनाशी प्रभु, ब्रह्मा, रुद्र और विष्णुको उत्पन्न करनेवाले हैं और ब्रह्मासे लेकर पिशाचपर्यन्त जिनके वशवर्ती हैं, जो प्रकृति और पुरुषसे परे हैं, जिनके ध्यानमें योगज्ञाता और तत्त्वदर्शी महर्षि तत्पर रहते हैं, जो अक्षर परम ब्रह्म तथा सदसत्स्वरूप हैं, आदि - मध्य - अन्तसे रहित, तर्कसे सर्वथा अज्ञेय, विशुद्ध तथा सनातन हैं, जो सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले, संहार करनेवाले तथा महेश्वर हैं, मैं इस यज्ञमें उन शंकरात्माके अतिरिक्त अन्य किसीको नहीं देखता हूँ ॥ १५ - १८ ॥

पृष्ठ 807

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अ ० १ ९ ] वायवीयसंहिता दक्ष उवाच एतन्मखेशस्य सुवर्णपात्रे हविः समस्तं विधिमन्त्रपूतम् । । विष्णोर्नयाम्यप्रतिमस्य भागं प्रभोर्विभज्याहवनीयमद्य ॥ १ ९ । दधीच उवाच

यस्मान्नाराधितो रुद्रः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ।

तस्माद्दक्ष तवाशेषो यज्ञोऽयं न भविष्यति ॥ २०

इत्युक्त्वा वचनं क्रुद्धो दधीचो मुनिसत्तमः ।

निर्गम्य च ततो देशाज्जगाम स्वकमाश्रमम् ॥ २१

निर्गतेऽपि मुनौ तस्मिन्देवा दक्षं न तत्यजुः ।

अवश्यमनुभावित्वादनर्थस्य तु भाविनः ॥ २२

एतस्मिन्नेव काले तु ज्ञात्वैतत्सर्वमीश्वरात् ।

दग्धुं दक्षाध्वरं विप्रा देवी देवमचोदयत् ॥ २३

देव्या संचोदितो देवो दक्षाध्वरजिघांसया ।

ससर्ज सहसा वीरं वीरभद्रं गणेश्वरम् ॥ २४

सहस्रवदनं देवं सहस्रकमलेक्षणम् ।

सहस्त्रमुद्गरधरं सहस्त्रशरपाणिकम् ॥ २५

शूलटंकगदाहस्तं दीप्तकार्मुकधारिणम् ।

चक्रवज्रधरं घोरं चंद्रार्द्धकृतशेखरम् ॥ २६

कुलिशोद्योतितकरं तडिज्ज्वलितमूर्द्धजम् ।

दंष्ट्राकरालं बिभ्राणं महावक्त्रं महोदरम् ॥ २७

विद्युज्जिह्वं प्रलंबोष्ठं मेघसागरनिःस्वनम् ।

वसानं चर्म वैयाघ्रं महद्रुधिरनिस्स्रवम् ॥ २८

गण्डद्वितयसंसृष्टमण्डलीकृतकुण्डलम् वरामरशिरोमालावलीकलितशेखरम् ॥२ ९ रणन्नूपुरकेयूरमहाकनकभूषितम् रत्नसंचयसंदीप्तं तारहारावृतोरसम् ॥ ३०

महाशरभशार्दूलसिंहैः सदृशविक्रमम् ।

प्रशस्तमत्तमातंगसमानगमनालसम् ॥३१

( पूर्वखण्ड ) ७ ९ ३ दक्ष बोले - [ हे महर्षे! ] इस सोनेके पात्रमें यज्ञेश्वर विष्णुके निमित्त विधिपूर्वक अभिमन्त्रित हवि रखी हुई है, उसे मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, उस सम्पूर्ण हविको विभाजितकर उनके लिये अभी प्रदान कीजिये ॥ १ ९ ॥ दधीचि बोले- हे दक्ष! आपने देवदेवेश्वर रुद्रकी आराधना नहीं की है, अतः आपका यह यज्ञ पूर्ण नहीं होगा । यह वचन कहकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि क्रुद्ध हो उस यज्ञशालासे निकलकर अपने आश्रमको चले गये॥२०-२१ ॥ उन मुनिके चले जानेपर तथा अवश्य होनेवाले अनिष्टको समझते हुए भी देवताओंने दक्षका त्याग नहीं किया । हे विप्रो! इसी समय ईश्वर शिवसे यह सब जानकर देवीने दक्षके यज्ञको जलानेके लिये शिवजीको प्रेरित किया॥२२-२३ ॥ तब देवीके द्वारा प्रेरित किये गये शिवने दक्ष यज्ञको विनष्ट करनेकी इच्छासे पराक्रमी, हजार मुखोंवाले, कमलके समान हजार नेत्रोंवाले, हजारों मुद्गर, हजारों धनुष, हजारों शूल, टंक, गदा, तेजस्वी धनुष, चक्र [ आदि शस्त्रास्त्रोंसे युक्त ] तथा भयंकर स्वरूपवाले, वज्र अपने हाथोंमें धारण किये हुए, मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए, वज्रसे चमकते हुए हाथवाले, विद्युत्की प्रभाके सदृश केशोंवाले, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त, विशाल मुख तथा उदरवाले, बिजलीके समान जीभवाले, लटकते हुए लम्बे ओठवाले, समुद्र एवं मेघकी गर्जनाके समान शब्दवाले, अत्यधिक रक्त स्रावसे युक्त, व्याघ्रके चर्मको धारण किये हुए, दोनों कपोलोंसे सटे हुए गोलाकार कुण्डल धारण किये हुए, देवताओंकी उत्तम शिरोमालावलीसे सुशोभित सिरवाले, उत्तम स्वर्णनिर्मित बजते हुए नूपुर तथा बाजूबन्दसे विभूषित, रत्नोंसे प्रकाशित, तारमय हारसे आवृत वक्षःस्थलवाले, महाशरभ, शार्दूल और सिंहके समान पराक्रमवाले, मदमत्त महान् हाथीके समान मन्थर गतिवाले, शंख - चामर-

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७ ९ ४ श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १ ९ शंखचामरकुंदेन्दुमृणालसदृशप्रभम् सतुषारमिवाद्रीन्द्रं साक्षाज्जङ्गमतां गतम् ॥

ज्वालामालापरिक्षिप्तं दीप्तमौक्तिकभूषणम् ।

तेजसा चैव दीव्यन्तं युगान्त इव पावकम् ॥

स जानुभ्यां महीं गत्वा प्रणतः प्राञ्जलिस्ततः ।

पार्श्वतो देवदेवस्य पर्यतिष्ठद् गणेश्वरः ॥

मन्युना चासृजद्भद्रां भद्रकालीं महेश्वरीम् ।

आत्मनः कर्मसाक्षित्वे तेन गन्तुं सहैव तु ॥

तं दृष्ट्वावस्थितं वीरभद्रं कालाग्निसन्निभम् ।

भद्रया सहितं प्राह भद्रमस्त्विति शंकरः ॥

स च विज्ञापयामास सह देव्या महेश्वरम् ।

आज्ञापय महादेव किं कार्यं करवाण्यहम् ॥

ततस्त्रिपुरहा प्राह हैमवत्याः प्रियेच्छया ।

वीरभद्रं महाबाहुं वाचा विपुलनादया ॥

महादेव उवाच

प्राचेतसस्य दक्षस्य यज्ञं सद्यो विनाशय ।

भद्रकाल्या सहासि त्वमेतत्कृत्यं गणेश्वर ॥

अहमप्यनया सार्द्धं रैभ्याश्रमसमीपतः ।

स्थित्वा वीक्षे गणेशान विक्रमं तव दुःसहम् ॥

वृक्षाः कनखले ये तु गंगाद्वारसमीपगाः ।

सुवर्णश्रृंगस्य गिरेर्मेरुमंदरसंनिभाः ॥

तस्मिन्प्रदेशे दक्षस्य यज्ञः संप्रति वर्तते ।

सहसा तस्य यज्ञस्य विघातं कुरु मा चिरम् ॥

इत्युक्ते सति देवेन देवी हिमगिरीन्द्रजा ।

भद्रं भद्रां च संप्रेक्ष्य वत्सं धेनुरिवौरसम् ॥

आलिङ्ग्य च समाघ्राय मूर्ध्नि षड्वदनं यथा ।

सस्मिता वचनं प्राह मधुरं मधुरं स्वयम् ॥

| कुन्द, चन्द्रमा एवं मृणालके समान प्रभावाले ३२ मानो बर्फसे ढका हुआ साक्षात् हिमालयपर्वत, | चलता - फिरता सुशोभित हो रहा हो - ऐसे ही प्रतीत | होनेवाले, ज्वालासमूहसे देदीप्यमान, मोतियोंके आभूषणोंसे सुशोभित और अपने तेजके ३३ कारण | प्रलयकालीन अग्निके समान प्रदीप्त होनेवाले गणाधिप वीरभद्रको सहसा उत्पन्न किया । घुटने टेककर हाथ ३४ जोड़कर शिवजीको प्रणाम करके वीरभद्र उनके । समीप बैठ गये ॥ २४–३४ ॥ इसके पश्चात् देवीने क्रोधसे अपने कर्मके साक्षित्वके लिये महेश्वरी भद्रा भद्रकालीको साथ ३५ जानेके लिये उत्पन्न किया । तब भद्रकालीसे समन्वित कालाग्निके सदृश स्थित उन वीरभद्रको देखकर ३६ शंकरजीने कहा – तुम्हारा कल्याण हो ॥ ३५-३६ ॥ तत्पश्चात् वीरभद्रने देवीके साथ विराजमान ३७ महेश्वरसे कहा - हे महादेव! आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन - सा कार्य करूँ? तब त्रिपुरका वध करनेवाले सदाशिवने पार्वतीका प्रिय करनेकी इच्छासे ३८ महागम्भीर वाणीमें महान् भुजाओंवाले वीरभद्रसे कहा— ॥ ३७-३८ ॥ महादेव बोले — हे गणेश्वर! तुम प्रचेताके पुत्र दक्षके यज्ञको विनष्ट करो, तुम भद्रकालीके साथ इस ३ ९ कार्यको करो । हे गणेशान! मैं भी इन देवीके साथ रैभ्यके आश्रमके पास स्थित होकर तुम्हारा दुःसह ४० पराक्रम देखता रहूँगा ॥ ३ ९ -४० ॥ कनखलमें गंगाद्वारके समीप स्थित जो ऊँचे वृक्ष ४१ हैं, वे सोनेके शिखरवाले मेरुपर्वतपर मन्दरके समान दिखायी पड़ रहे हैं, उसी प्रदेशमें दक्षका यज्ञ हो रहा

। है । उस यज्ञको तुम विना विलम्ब किये सहसा विनष्ट ।

४२ कर दो ॥ ४१-४२ ॥

सदाशिवके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ४३ हिमवान्‌की कन्या पार्वती देवी वीरभद्र और | भद्रकालीको इस तरह देखकर जैसे कोई गाय अपने बछड़ेको देखती हो, उनका आलिंगन करके पुनः कार्तिकेयके समान उनका मस्तक सँघकर हँसती हुई ४४ अत्यन्त मधुर वचन बोलीं- ॥ ४३-४४ ॥

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अ ० १ ९ ] वायवीयसहिता देव्युवाच

वत्स भद्र महाभाग महाबलपराक्रम ।

मत्प्रियार्थं त्वमुत्पन्नो मम मन्युं प्रमार्जय ॥ ४५

यज्ञेश्वरमनाहूय यज्ञकर्मरतोऽभवत् ।

दक्षो वैरेण तं तस्माद्भिन्धि यज्ञं गणेश्वर ॥ ४६

यज्ञलक्ष्मीमलक्ष्मीं त्वं भद्र कृत्वा ममाज्ञया ।

यजमानं च तं हत्वा वत्स हिंसय भद्रया ॥ ४७

अशेषामिव तामाज्ञां शिवयोश्चित्रकृत्ययोः ।

मूर्ध्नि कृत्वा नमस्कृत्य भद्रो गन्तुं प्रचक्रमे ॥ ४८

अथैष भगवान्क्रुद्धः प्रेतावासकृतालयः ।

वीरभद्रो महादेवो देव्या मन्युप्रमार्जकः ॥ ४ ९

ससर्ज रोमकूपेभ्यो रोमजाख्यान् गणेश्वरान् ।

दक्षिणाद्भुजदेशात्तु शतकोटिगणेश्वरान् ॥ ५०

पादात्तथोरुदेशाच्च पृष्ठात्पार्श्वान्मुखाद्गलात् ।

गुह्याद् गुल्फाच्छिरोमध्यात्कंठादास्यात्तथोदरात् ॥ ५१

तदा गणेश्वरैर्भद्रैर्भद्रतुल्यपराक्रमैः ।

संछादितमभूत्सर्वं साकाशविवरं जगत् ॥ ५२

सर्वे सहस्त्रहस्तास्ते सहस्रायुधपाणयः ।

रुद्रस्यानुचराः सर्वे सर्वे रुद्रसमप्रभाः ॥ ५३

शूलशक्तिगदाहस्ताष्टंकोपलशिलाधराः 1 कालाग्निरुद्रसदृशास्त्रिनेत्राश्च जटाधराः ॥ ५४

निपेतुर्भृशमाकाशे शतशः सिंहवाहनाः ।

विनेदुश्च महानादाञ्जलदा इव भद्रजाः ॥ ५५

तैर्भद्रैर्भगवान् भद्रस्तथा परिवृतो बभौ । ( पूर्वखण्ड ) ७ ९ ५ देवी बोलीं- हे वत्स! हे महाभाग! महान् बल तथा पराक्रमवाले हे वीरभद्र! तुम मेरा हित करनेके लिये ही उत्पन्न हुए हो, अतः मेरे क्रोधका शमन करो ॥४५ ॥

गणेश्वर! वैरके कारण यज्ञेश्वरको बिना बुलाये ही दक्षने यज्ञकर्म प्रारम्भ किया है, इसलिये तुम शीघ्र ही उस यज्ञको नष्ट कर दो । हे भद्र! हे वत्स! तुम इस भद्राके साथ मेरी आज्ञासे यज्ञलक्ष्मीको अलक्ष्मी बनाकर उस यज्ञकर्ता दक्षको विनष्ट कर दो ॥ ४६-४७ ॥ तब विचित्र कार्य करनेवाले उन शिव तथा पार्वतीके सभी आदेशोंको सिरपर धारणकर उन्हें नमस्कार करके वीरभद्र जानेके लिये उद्यत हो गये ॥ ४८ ॥

इसके पश्चात् श्मशानवासी भगवान् वीरभद्र महादेवने देवीके क्रोधको शान्त करनेकी इच्छासे अपने रोमकूपोंसे हजारों रोमज नामक गणेश्वरोंको उत्पन्न किया । इसी तरह उन्होंने अपनी दाहिनी भुजा, चरण, ऊरुप्रदेश, पीठ, पार्श्व, मुख, गला, गुह्य, गुल्फ, सिर, मध्यभाग, कण्ठ, जबड़े तथा पेटसे सौ करोड़ गणेश्वरोंको उत्पन्न किया । उस समय वीरभद्रके समान पराक्रमवाले गणेश्वरोंसे आकाशविवरसहित सारा जगत् ढँक गया ॥ ४ ९ –५२ ॥ उन सभीके हजार हाथ थे तथा हाथोंमें हजारों आयुध थे । वे सभी रुद्रके अनुचर थे तथा रुद्रके समान तेजस्वी थे ॥५३ ॥

वे हाथोंमें शूल, शक्ति, गदा, टंक, उपल एवं । शिला लिये हुए थे । वे कालाग्निरुद्रके समान, तीन नेत्रोंवाले तथा जटाजूटसे समन्वित थे ॥ ५४ ॥

वीरभद्रद्वारा उत्पन्न वे करोड़ों गण सिंहोंपर विराजमान हो आकाशमें विचरने लगे और मेघके समान महाघोर गर्जना करने लगे ॥ ५५ ॥

उन गणोंसे घिरे हुए भगवान् वीरभद्र इस तरह प्रतीत हो रहे थे, जैसे प्रलयकालमें सैकड़ों कालाग्नियोंसे घिरे हुए कालभैरव शोभित होते कालानलशतैर्युक्तो यथान्ते कालभैरवः ॥५६ । हैं ॥५६ ॥

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७ ९ ६ तेषां मध्ये समारुह्य वृषेन्द्रं वृषभध्वजः जगाम भगवान् भद्रः शुभ्रमभ्रं यथा भवः तस्मिन्वृषभमारूढे भद्रे तु भसितप्रभः बभार मौक्तिकं छत्रं गृहीतसितचामरः स तदा शुशुभे पार्श्वे भद्रस्य भसितप्रभः भगवानिव शैलेन्द्रः पार्श्वे विश्वजगद्गुरोः सोऽपि तेन बभौ भद्रः श्वेतचामरपाणिना बालसोमेन सौम्येन यथा शूलवरायुधः दध्मौ शंखं सितं भद्रं भद्रस्य पुरतः शुभम् भानुकम्पो महातेजा हेमरत्नैरलङ्कृतः देवदुंदुभयो नेदुर्दिव्यसंकुलनिःस्वनाः ववृषुः शतशो मूर्ध्नि पुष्पवर्षं बलाहकाः फुल्लानां मधुगर्भाणां पुष्पाणां गन्धबन्धवः मार्गानुकूलसंवाहा ववुश्च पथि मारुताः ततो गणेश्वराः सर्वे मत्ता युद्धबलोद्धताः ननृतुर्मुमुदुर्ने दुर्जहसुर्जगदुर्जगुः तदा भद्रगणान्तःस्थो बभौ भद्रः सभद्रया । यथा रुद्रगणान्तःस्थस्त्र्यम्बकोऽम्बिकया सह

तत्क्षणादेव दक्षस्य यज्ञवाटं हिरण्मयम् ।

प्रविवेश महाबाहुर्वीरभद्रो महानुगः ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १ ९ । उन गणोंके बीच वृषभध्वज भगवान् वीरभद्र ॥ ५७ बैलपर आरूढ़ होकर गये । तब श्वेत चामर लिये | भसितप्रभ नामक गणने वृषभपर सवार उन वीरभद्रके हुए । सिरके ऊपर मुक्तामणिकी झालरवाला छत्र लगा ॥ ५८ दिया ॥ ५७-५८ ॥ । उस समय वीरभद्रके समीप वह भसितप्रभ ॥ ५ ९ इस तरह सुशोभित हो रहा था, जैसे समस्त जगत्‌के | गुरु भगवान् शंकरके समीप ऐश्वर्यसम्पन्न हिमालय । सुशोभित होते हैं । वे वीरभद्र भी श्वेत चामरको हाथमें धारण किये हुए उस भसितप्रभके साथ इस । तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे श्रेष्ठ त्रिशूल धारण ॥ ६० करनेवाले भगवान् रुद्र सौम्य बालचन्द्रमासे शोभायमान होते हैं ॥५ ९ -६० ॥ । इसके बाद सुवर्ण - रत्नादिसे अलंकृत ॥ ६१ महातेजस्वी भानुकम्प नामक गणेश्वरने वीरभद्रके आगे अपना कल्याणमय, शुभ एवं श्वेत वर्णका शंख बजाया ॥ ६१ ॥

। सघन तथा दिव्य ध्वनिवाली देवदुन्दुभियाँ ॥ ६२ बजने लगीं और मेघ उनके सिरपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥६२ ॥

। मकरन्दसे परिपूर्ण, खिले हुए फूलोंकी सुगन्धसे ॥ ६३ सुरभित तथा यात्राके अनुकूल हवाएँ मार्गमें बहने लगीं । इसके पश्चात् सभी गणेश्वर मत्त तथा युद्धबलसे । गर्वित होकर नृत्य करने लगे, हर्षित हो उठे, नाद ॥६४ करने लगे, कुछ हँसने लगे, चिल्लाने लगे तथा कुछ गाने लगे॥६३-६४ ॥ उस समय अपने गणोंके मध्यमें वीरभद्र ॥ ६५ भद्रकालीके साथ उसी प्रकार शोभित हो रहे थे, | जैसे रुद्रगणोंके मध्य शिवजी पार्वतीके साथ सुशोभित होते हैं ॥ ६५ ॥

उसी समय अनुचरोंसहित महाबाहु वीरभद्रने ६६ । दक्षकी सुवर्णमयी यज्ञशालामें प्रवेश किया ॥ ६६ ॥