शिव महापुराण - २ — पृष्ठ 861–870
शिव महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870
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अ ० ३१ ] वायवीयसंहिता
ईशेच्छा च विधातृत्वं विधेराज्ञापनं परम् ।
आज्ञावश्यमिदं कुर्यान्न कुर्यादिति शासनम् ॥ २८
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तच्छासनानुवर्तित्वं साधुभावस्य लक्षणम् ।
विपरीतमसाधोः स्यान्न सर्वं तत्तु दृश्यते ॥२ ९
साधु संरक्षणीयं चेद्विनिवर्त्यमसाधु यत् ।
निवर्तते च सामादेरन्ते दण्डो हि साधनम् ॥ ३०
हितार्थ लक्षणं चेदं दण्डान्तमनुशासनम् ।
अतो यद्विपरीतं तदहितं संप्रचक्षते ॥३१
हिते सदा निषण्णानामीश्वरस्य निदर्शनम् ।
स कथं दुष्यते सद्भिरसतामेव निग्रहात् ॥ ३२
अयुक्तकारिणो लोके गर्हणीया विवेकिता ।
यदुद्वेजयते लोकं तदयुक्तं प्रचक्षते ॥ ३३
सर्वोऽपि निग्रहो लोके न च विद्वेषपूर्वकः ।
न हि द्वेष्टि पिता पुत्रं यो निगृह्याति शिक्षयेत् ॥ ३४
माध्यस्थेनापि निग्राह्यान्यो निगृह्णाति मार्गतः ।
तस्याप्यवश्यं यत्किञ्चिन्नैर्घृण्यमनुवर्तते ॥ ३५
अन्यथा न हिनस्त्येव सदोषानप्यसौ परान् । ( पूर्वखण्ड ) ८४७ इच्छा ही उनका विधानकर्तृत्व है और विधान उनकी सामर्थ्यशालिनी आज्ञा है । ' यह कर्तव्य है और यह कर्तव्य नहीं है ' इस प्रकारके अनुशासनका नाम आज्ञा है ॥ २७-२८ ॥ जो लोग उनके इस अनुशासनका पालन करते हैं, वे ही साधुजन हैं तथा [ शिवानुशासनसे ] विपरीत आचरण करनेवाला असाधु कहलाता है । अतएव सभी लोग साधु नहीं हो पाते । यदि साधुकी रक्षा करनी है तो असाधुका निवारण करना ही होगा । पहले साम आदि तीन उपायोंसे असाधुके निवारणका प्रयत्न किया जाता है । यदि यह प्रयत्न सफल नहीं हुआ तो अन्तमें चौथे उपाय दण्डका ही आश्रय लिया जाता है । यह दण्डान्त अनुशासन लोकहितके लिये ही किया जाना चाहिये । यही उसके औचित्यको परिलक्षित कराता है । यदि अनुशासन इसके विपरीत हो तो उसे अहितकर कहते हैं ॥२ ९ –३१ ॥ जो सदा हितमें ही लगे रहनेवाले हैं, उन्हें ईश्वरका दृष्टान्त अपने सामने रखना चाहिये । ( ईश्वर केवल दुष्टोंको ही दण्ड देते हैं, इसीलिये निर्दोष कहे जाते हैं । ) अतः जो दुष्टोंको ही दण्ड देता है, वह उस निग्रह - कर्मको लेकर सत्पुरुषोंद्वारा लांछित कैसे किया जा सकता है? ॥३२ ॥
अयुक्त अर्थात् अनुचित कर्म करनेवाले लोग विवेकी पुरुषके द्वारा गर्हित माने जाते हैं और जो कर्म लोगोंको उद्विग्न करता है, वह कर्म अयुक्त कहलाता है । लोकमें जहाँ कहीं भी निग्रह होता है, वह यदि विद्वेषपूर्वक न हो, तभी श्रेष्ठ माना जाता है । जो पिता पुत्रको दण्ड देकर उसे अधिक शिक्षित बनाता है, वह उससे द्वेष नहीं करता । तटस्थ भावसे जो व्यक्ति दण्डनीय लोगोंको अनुशासित करता है, उसमें भी यत्किंचित् कठोरता देखी ही जाती है ॥ ३३–३५ ॥ यदि उसमें कठोरता न हो तो वह अपराधी पुरुषोंको दण्डित ही कैसे करेगा, पर वह मध्यस्थ भावमें स्थित रहकर भी ' अज्ञ पुरुषोंको दण्डित करता
माध्यस्थ्यमाचरन् ॥ ३६ । है ॥ ३६ ॥
हिनस्ति चायमप्यज्ञान्परं
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८४८ तस्माद्दुःखात्मिकां हिंसां कुर्वाणो यः स निर्घृणः इति निर्बन्धयन्त्येके नियमो नेति चापरे निदानज्ञस्य भिषजो रुग्णे हिंसां प्रयुञ्जतः न किञ्चिदपि नैर्घृण्यं घृणैवात्र प्रयोजिका ॥ घृणापि न गुणायैव हिंस्त्रेषु प्रतियोगिषु तादृशेषु घृणी भ्रान्त्या घृणान्तरितनिर्घृणः
उपेक्षापीह दोषाय रक्ष्येषु प्रतियोगिषु ।
शक्तौ सत्यामुपेक्षातो रक्ष्यः सद्यो विपद्यते ॥
सर्पस्यास्यगतं पश्यन् यस्तु रक्ष्यमुपेक्षते ।
दोषाभासान्समुत्प्रेक्ष्य फलतः सोऽपि निर्घृणः ॥
तस्माद् घृणा गुणायैव सर्वथेति न सम्मतम् ।
सम्मतं प्राप्तकामित्वं सर्वं त्वन्यदसम्मतम् ॥
मूर्त्यात्मस्वपि रागाद्या दोषाः सन्त्येव वस्तुतः ।
तथापि तेषामेवैते न शिवस्य तु सर्वथा । ॥
अग्नावपि समाविष्टं ताम्रं खलु सकालिकम् ।
इति नाग्निरसौ दुष्येत्ताम्रसंसर्गकारणात् ॥
नाग्नेरशुचिसंसर्गादशुचित्वमपेक्षते अशुचेस्त्वग्निसंयोगाच्छुचित्वमपि जायते ॥ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३१ । इसलिये [ भले ही वह मध्यस्थ भाववाला क्यों ॥ ३७ न हो, पर ] दण्डित करता हुआ व्यक्ति निर्दय ही है - ऐसा कुछ लोग कहते हैं और दूसरे होता | कहते हैं कि ऐसा कोई [ निश्चित ] नियम लोग नहीं है ॥ ३७ ॥
जिस प्रकार रोगके कारणको जाननेवाला । वैद्य रोगीके प्रति निर्दयतापूर्ण व्यवहार करता हुआ भी ३८ [ वस्तुतः ] तनिक भी निर्दयी नहीं होता, अपितु । उसका यह व्यवहार दयासे ही प्रेरित होता है ॥ ३८ । हिंसाके लिये उद्यत शत्रुके प्रति की गयी ॥ ॥ ३ ९ दया उपक वैसे लोगोंके प्रति व्यक्ति भ्रमवश दयावान् हो भी जाय तो अन्ततोगत्वा उसे निर्दय होना ही पड़ता है । रक्षणीय व्यक्तिकी रक्षा न करना और दण्डनीय व्यक्तिको दण्ड न देना - यह दोनों ही प्रकारकी उपेक्षा दोषपूर्ण है । सामर्थ्यके होनेपर भी यदि ४० रक्षणीय व्यक्तिकी रक्षा न की जाय तो शीघ्र ही रक्षणीय व्यक्तिका नाश हो जाता है । सर्पके मुखमें जाते हुए व्यक्तिको देखते हुए भी जो पुरुष दोषाभासोंका अनुमानकर उस रक्षणीय व्यक्तिकी उपेक्षा कर देता है, वस्तुतः वह भी निर्दय ही होता ४१ है ॥ ३ ९ –४१ ॥ इसलिये दया प्रत्येक समय कल्याणकारिणी ४२ ही होती है - ऐसा मानना उचित नहीं है । अतएव आवश्यकतानुरूप व्यवहार ही उचित है तथा उसके अतिरिक्त व्यवहार अनुचित कहा गया है ॥ ४२ ॥
मूर्त्यात्माओंमें भी राग आदि दोष होते ही ४३ हैं, पर वे दोष वस्तुतः उनके ही समझने चाहिये, [ सर्वव्यापक होनेपर भी ] शिवमें दोषोंकी स्थिति सर्वथा नहीं है ॥ ४३ ॥
मलसे युक्त ताम्रका अग्निमें प्रक्षेप होनेपर भी ४४ वह अग्नि [ समल ] ताम्रके संसर्गसे मलिन नहीं होती ॥ ४४ ॥
अपवित्र वस्तुओंका संसर्ग होनेपर भी अग्निमें | अपवित्रता नहीं देखी जाती किंतु अग्निके संसर्गसे , ४५ अपवित्र वस्तु पवित्र हो जाती है । इस प्रकार शुद्ध
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अ ० ३१ ] वायवीयसंहिता
एवं शोध्यात्मसंसर्गान्न ह्यशुद्धः शिवो भवेत् ।
शिवसंसर्गतस्त्वेष शोध्यात्मैव हि शुद्ध्यति ॥ ४६
अयस्यग्नौ समाविष्टे दाहोऽग्नेरेव नायसः ।
मूर्त्तात्मन्येवमैश्वर्यमीश्वरस्यैव नात्मनाम् ॥ ४७
न हि काष्ठं ज्वलत्यूर्ध्वमग्निरेव ज्वलत्यसौ ।
काष्ठस्याङ्गारता नाग्नेरेवमत्रापि योज्यताम् ।
अत एव जगत्यस्मिन्काष्ठपाषाणमृत्स्वपि ॥ ४८
शिवावेशवशादेव शिवत्वमुपचर्यते ।
मैत्र्यादयो गुणा गौणास्तस्मात्ते भिन्नवृत्तयः ।
तैर्गुणैरुपरक्तानां दोषाय च गुणाय च ॥ ४ ९
यत्तु गौणमगौणं च तत्सर्वमनुगृह्णतः ।
न गुणाय न दोषाय शिवस्य गुणवृत्तयः ॥ ५०
न चानुग्रहशब्दार्थं गौणमाहुर्विपश्चितः ।
संसारमोचनं किं तु शैवमाज्ञामयं हितम् ॥५१
हितं तदाज्ञाकरणं यद्धितं तदनुग्रहः । ( पूर्वखण्ड ) ८४ ९ करनेयोग्य [ मलावृत ] जीवके संसर्गसे शिवजी अशुद्ध नहीं होते, अपितु उनके संसर्गसे अशुद्ध जीव शुद्ध हो जाता है॥४५-४६ ॥ जैसे अग्निमें गिरे हुए लोहेमें जो दाहकता है, वह लोहेकी नहीं अपितु अग्निकी ही है, उसी प्रकार मूर्त्यात्मामें स्थित जो ऐश्वर्य है, वह वस्तुतः शिवका ही है, आत्माओं [ मूर्त्यात्मा ] -का नहीं ॥४७ ॥
काष्ठ कभी ऊपरकी ओर नहीं जलता अपितु अग्नि [ -की शिखा ] ही ऊपरकी ओर जलती है । इसी प्रकार काष्ठ ही अंगारके रूपमें देखा जाता है, न कि अग्नि- ऐसा ही इस विषयमें भी समझ लेना चाहिये । इसलिये इस संसारमें भी काष्ठ, पाषाण, मृत्तिका आदिमें शिवकी व्याप्ति होनेके कारण उनका शिवरूपसे व्यवहार किया जाता है । मैत्री आदि गुण चित्तवृत्तिरूप होनेके कारण गौण कहे गये हैं । उन्हीं गुणोंसे उपरत होनेके कारण [ जीवोंके ] कर्म दोषयुक्त तथा गुणयुक्त हो जाते हैं ॥ ४८-४९ ॥ ये गुणात्मक वृत्तियाँ चाहे प्रधान हों या अप्रधान हों, पर इससे अनुग्रहकर्ता भगवान् शिवमें न दोषकी स्थिति होती है और न गुणकी ही स्थिति होती है । अनुग्रह शब्दके तात्पर्यको विद्वानोंने लाक्षणिक नहीं कहा है, उनके मतमें यह अर्थ संसारबन्धनसे छुड़ानेवाला तथा कल्याणकारी शिवादेश है ॥ ५०-५१ ॥ शिवकी आज्ञाका पालन ही हित है और जो हित है, वही उनका अनुग्रह है । अतएव सबको सर्वं हिते नियुञ्जानः सर्वानुग्रहकारकः ॥ ५२ हितमें नियुक्त करनेवाले शिव सबपर अनुग्रह करनेवाले कहे गये हैं । जो ' उपकार ' शब्दका अर्थ है, उसे भी अनुग्रह ही कहा गया है; क्योंकि उपकार यस्तूपकारशब्दार्थस्तमप्याहुरनुग्रहम् भी हितरूप ही होता है । अतः सबका उपकार तस्यापि हितरूपत्वाच्छिवः सर्वोपकारकः ॥ ५३ करनेवाले शिव सर्वानुग्राहक हैं । शिवके द्वारा जङ-चेतन सभी सदा हितमें ही नियुक्त होते हैं । परंतु सबको जो एक साथ और एक समान हितकी । उपलब्धि नहीं होती, इसमें उनका स्वभाव ही प्रतिबन्धक हिते सदा नियुक्तं तु सर्वं चिदचिदात्मकम्
तत्समं न लभते हितम् ॥ ५४ । है ॥ ५२-५४ ॥
स्वभावप्रतिबन्धं
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८५० श्रीशिवमहापुराण [ अ ०
यथा विकासयत्येव रविः पद्मानि भानुभिः ।
समं न विकसन्त्येव स्वस्वभावानुरोधतः ॥ ५५
स्वभावोऽपि हि भावानां भाविनोऽर्थस्य कारणम् ।
न हि स्वभावो नश्यन्तमर्थं कर्तृषु साधयेत् ॥ ५६
सुवर्णमेव नाङ्गारं द्रावयत्यग्निसङ्गमः ।
एवं पक्वमलानेव मोचयेन्न शिवः परान् ॥५७
यद्यथा भवितुं योग्यं तत्तथा न भवेत्स्वयम् ।
विना भावनया कर्ता स्वतन्त्रः सन्ततो भवेत् ॥ ५८
स्वभावविमलो यद्वत्सर्वानुग्राहकः शिवः ।
स्वभावमलिनास्तद्वदात्मनो जीवसंज्ञिताः ॥ ५ ९
अन्यथा संसरन्त्येते नियमान्न शिवः कथम् ।
कर्ममायानुबन्धोऽस्य संसारः कथ्यते बुधैः ॥ ६०
अनुबन्धोऽयमस्यैव न शिवस्येति हेतुमान् ।
स हेतुरात्मनामेव निजो नागन्तुको मलः ॥ ६१
आगन्तुकत्वे कस्यापि भाव्यं केनापि हेतुना । योऽयं हेतुरसावेकस्त्वविचित्रस्वभावतः ॥ ६२ |
आत्मतायाः समत्वेऽपि बद्धा मुक्ताः परे यतः ।
बद्धेष्वेव पुनः केचिल्लयभोगाधिकारतः ॥ ६३ ।
३१ जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा सभीकमलोंको विकासके लिये प्रेरित करते हैं, परंतु वे अपने | स्वभावके अनुसार एक साथ और - अपने एक समान | विकसित नहीं होते, स्वभाव भी पदार्थोंके भावी अर्थका कारण होता है, किंतु वह नष्ट होते हुए | अर्थको कर्ताओंके लिये सिद्ध नहीं कर सकता । जैसे अग्निका संयोग सुवर्णको ही पिघलाता है कोयले अंगारको नहीं, उसी प्रकार भगवान् शिव, या परिपक्व मलवाले पशुओंको ही बन्धनमुक्त करते हैं, दूसरोंको नहीं ॥ ५५–५७ ॥ जो वस्तु जैसी होनी चाहिये, वैसी वह स्वयं नहीं बनती । वैसी बननेके लिये कर्ताकी भावनाका सहयोग होना आवश्यक है । कर्ताकी भावनाके बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है, अतः कर्ता सदा स्वतन्त्र होता है ॥५८ ॥
सबपर अनुग्रह करनेवाले शिव जिस तरह स्वभावसे ही निर्मल हैं, उसी तरह ' जीव ' संज्ञा धारण करनेवाली आत्माएँ स्वभावतः मलिन होती हैं । यदि ऐसी बात न होती तो वे जीव क्यों नियमपूर्वक संसारमें भटकते और शिव क्यों संसार - बन्धनसे परे रहते? विद्वान् पुरुष कर्म और मायाके बन्धनको ही जीवका ' संसार ' कहते हैं । यह बन्धन जीवको ही प्राप्त होता है, शिवको नहीं । इसमें कारण है, जीवका स्वाभाविक मल । वह कारणभूत मल जीवोंका अपना स्वभाव ही है, आगन्तुक नहीं है । यदि आगन्तुक होता तो किसीको भी किसी भी कारणसे बन्धन प्राप्त हो जाता । जो यह हेतु है, वह एक है; क्योंकि सब जीवोंका स्वभाव एक - सा है ॥ ५ ९ –६२ ॥ यद्यपि सबमें एक - सा आत्मभाव है, तो भी मलके परिपाक और अपरिपाकके कारण कुछ जीव बद्ध हैं और कुछ बन्धनसे मुक्त हैं । बद्ध जीवोंमें भी कुछ लोग लय और भोगके अधिकारके अनुसार उत्कृष्ट और निकृष्ट होकर ज्ञान और ऐश्वर्य आदिकी
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अ ० ३१ ] वायवीयसंहिता
ज्ञानैश्वर्यादिवैषम्यं भजन्ते सोत्तराधराः ।
केचिन्मूर्त्यात्मतां यान्ति केचिदासन्नगोचराः ॥ ६४
मूर्त्यात्मसु शिवाः केचिदध्वनां मूर्द्धसु स्थिताः ।
मध्ये महेश्वरा रुद्रास्त्वर्वाचीनपदे स्थिताः ॥ ६५
आसन्नेऽपि च मायायाः परस्मात्कारणात्त्रयम् ।
तत्राप्यात्मा स्थितोऽधस्तादन्तरात्मा च मध्यतः ॥ ६६
परस्तात्परमात्मेति ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
वर्तन्ते वसवः केचित्परमात्मपदाश्रयाः ॥ ६७
अन्तरात्मपदे केचित्केचिदात्मपदे तथा ।
शान्त्यतीतपदे शैवाः शान्ते माहेश्वरे ततः ॥ ६८
विद्यायां तु यथा रौद्राः प्रतिष्ठायां तु वैष्णवाः ।
निवृत्तौ च तथात्मानो ब्रह्मा ब्रह्माङ्गयोनयः ॥ ६ ९
देवयोन्यष्टकं मुख्यं मानुष्यमथ मध्यमम् ।
पक्ष्यादयोऽधमाः पञ्च योनयस्ताश्चतुर्दश ॥ ७०
ज्ञेयः संसारिणो मलः । ( पूर्वखण्ड ) ८५१ विषमताको प्राप्त होते हैं अर्थात् कुछ लोग अधिक ज्ञान और ऐश्वर्यसे युक्त होते हैं तथा कुछ लोग कम । कोई मूर्त्यात्मा होते हैं और कोई साक्षात् शिवके समीप विचरनेवाले होते हैं ॥ ६३-६४ ॥ मूर्त्यात्माओंमें भी कोई तो शिवस्वरूप हो छहों अध्वाओंके ऊपर स्थित होते हैं, कोई अध्वाओंके मध्यमार्गमें महेश्वर होकर रहते हैं और कोई निम्नभागमें रुद्ररूपसे स्थित होते हैं ॥ ६५ ॥
शिवके समीपवर्ती स्वरूपमें भी मायासे परे होनेके कारण उत्कृष्ट, मध्यम और निकृष्टके भेदसे | तीन श्रेणियाँ होती हैं - वहाँ निम्न स्थानमें आत्माकी स्थिति है, मध्यम स्थानमें अन्तरात्माकी स्थिति है और जो सबसे उत्कृष्ट श्रेणीका स्थान है, उसमें परमात्माकी स्थिति है । ये ही क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर कहलाते हैं । कोई पशु ( जीव ) परमात्मपदका आश्रय लेनेवाले होते हैं, कोई अन्तरात्मपदपर और आत्मपदपर प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ६६-६७१ / २ ॥ शैव शान्त्यतीत पदका तथा माहेश्वरगण शान्तिपदका सेवन करते हैं । विद्यापदमें रौद्रगण एवं प्रतिष्ठापदमें वैष्णव स्थितिलाभ करते हैं । निवृत्तिपदमें ब्रह्माजी तथा उनके शरीरसे उत्पन्न दिव्यात्माएँ निवास करती हैं ॥ ६८-६९ ॥ अष्टविध देवयोनियाँ प्रधान मानी गयी हैं, मनुष्ययोनि मध्यम हैं और पंचविध पशुयोनियाँ अधम कही गयी हैं । इस प्रकार ये चौदह योनियाँ कही गयी हैं ॥ ७० ॥
संसारी जीवका उत्कृष्ट तथा अपकृष्ट भाव उत्तराधरभावोऽपि ॥ ७१ ही वस्तुतः उसका स्वाभाविक मल कहा गया है, यथाऽऽमभावो मुक्तस्य पूर्वं पश्चात्तु पक्वता मलोऽप्यामश्च पक्वश्च भवेत्संसारकारणम् । जिस प्रकार खायी गयी भोज्य वस्तुकी पूर्वावस्थाको आम कहते हैं और खानेके उपरान्त उसी वस्तुकी पक्व संज्ञा हो जाती है । उसी प्रकार मल भी पक्व और आमके भेदसे दो प्रकारका होता है, यह द्विविध मल ही [ जन्म - मरणादिरूप ] संसारका कारण होता | है ॥ ७११/२ ॥
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८५२ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० आमे त्वधरता पुंसां पक्वे तूत्तरता क्रमात् ॥७२ पश्वात्मानस्त्रिधा भिन्ना एकद्वित्रिमलाः क्रमात् ।
अत्रोत्तरा एकमला द्विमला मध्यमा मताः ।
त्रिमलास्त्वधमा ज्ञेया यथोत्तरमधिष्ठिताः ॥ ७३
त्रिमलानधितिष्ठन्ति द्विमलैकमलाः क्रमात् ।
इत्थमौपाधिको भेदो विश्वस्य परिकल्पितः ॥ ७४
एकद्वित्रिमलान्सर्वाञ्छिव एकोऽधितिष्ठति ।
अशिवात्मकमप्येतच्छिवेनाधिष्ठितं यथा ॥ ७५
अरुद्रात्मकमित्येवं रुद्रैर्जगदधिष्ठितम् ।
अण्डान्ता हि महाभूमिः शतरुद्राद्यधिष्ठिता ॥ ७६
मायान्तमन्तरिक्षं तु ह्यमरेशादिभिः क्रमात् ।
अंगुष्ठमात्रपर्यन्तैः समन्तात्सन्ततं ततम् ॥ ७७
महामायावसाना द्यौर्वाय्वाद्यैर्भुवनाधिपैः ।
अनाश्रितान्तैरध्वान्तर्वर्त्तिभिः समधिष्ठिताः ॥ ७८
ते हि साक्षाद्दिविषदस्त्वन्तरिक्षसदस्तथा ।
पृथिवीषद इत्येवं देवा देवव्रतैः स्तुताः ॥ ७ ९
एवं त्रिभिर्मलैरामैः पक्वैरेव पृथक्पृथक् ।
निदानभूतैः संसाररोगः पुंसां प्रवर्तते ॥ ८०
अस्य रोगस्य भैषज्यं ज्ञानमेव न चापरम् । ।
भिषगाज्ञापकः शम्भुः शिवः परमकारणम् ॥ ८१ ।
३१ अपक्व मल जीवगणोंकी अधोगतिका | होता है और पक्व मल उनकी क्रमशः ऊर्ध्वगतिका कारण । कारण बनता है । ये पशु जीवात्मा एक, दो तथा मलोंसे युक्त होते हैं । एक मलसे युक्त जीव यहाँ तीन | कहा गया है, दो मलोंवाला मध्यम तथा श्रेष्ठ तीन । मलवाला जीव अधम कहा गया है । ये मलावृत जीव । उत्तरोत्तर अधिष्ठित हैं 1 । तीन मलवालोंपर दो मलवाले । तथा उनपर एक मलवाले अधिष्ठित होते हैं । इस प्रकार मलरूप उपाधिके कारण संसारी जीवोंका भेद परिकल्पित किया गया है ॥ ७२–७४ ॥ एक, दो तथा तीन मलवाले सभी जीवोंपर एकमात्र भगवान् शिवका आधिपत्य है । यह जगत् जिस प्रकार अशिवात्मक अर्थात् अभद्र होकर भी शिवसे अधिष्ठित है, उसी प्रकार अरुद्रात्मक होकर भी रुद्रोंद्वारा अधिष्ठित होता है । [ समस्त ] ब्रह्माण्डात्मिका यह महाभूमि शतरुद्र आदिके द्वारा अधिष्ठित है तथा उनसे अधिष्ठित यह महाभूमि मायासे आवेष्टित और अन्तरिक्षसे निरन्तर आवृत तथा अंगुष्ठमात्र परिमाणवाले अमरेशादि देवगणोंसे अधिष्ठित है॥७५–७७ ॥ महामायापर्यन्त यह द्युलोक वाम आदि भुवन-पतियोंके द्वारा अधिष्ठित है तथा साक्षात् सम्बन्ध न | होनेपर भी [ पूर्वोक्त ] षडध्वाके अन्तर्वर्ती देवगणोंसे भी अधिष्ठित है । वामादि दिविषद्, अमरेशादि अन्तरिक्षसद् तथा शतरुद्रादि पृथिवीषद् – इन देवगणोंका देवोपासक [ मुनिगण ] सर्वदा स्तवन करते रहते हैं ॥ ७८-७९ ॥ संसाररोगके कारणभूत, [ अल्प पक्व, ] पक्व तथा अपक्व - इन तीनों मलोंके द्वारा मनुष्य [ जन्म-मरणरूप ] संसाररोगसे ग्रस्त होते हैं ॥ ८० ॥
इस संसाररोगकी औषधि ज्ञानके अतिरिक्त । अन्य कुछ भी नहीं है । कल्याणस्वरूप परमकारण भगवान् शिव ही आज्ञारूप औषधि, करनेवाले वैद्य हैं ॥ ८१ ॥ प्रदान
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अ ० ३१ ] वायवीयसंहिता
अदुःखेनाऽपि शक्तोऽसौ पशून्मोचयितुं शिवः ।
कथं दुःखं करोतीति नात्र कार्या विचारणा ॥ ८२
दुःखमेव हि सर्वोऽपि संसार इति निश्चितम् ।
कथं दुःखमदुःखं स्यात्स्वभावो ह्यविपर्ययः ॥ ८३
न हि रोगी ह्यरोगी स्याद्भिषग्भैषज्यकारणात् ।
रोगार्तं तु भिषग्रोगाद्भैषजैः सुखमुद्धरेत् ॥ ८४
एवं स्वभावमलिनान्स्वभावादुःखिनः पशून् ।
स्वाज्ञौषधविधानेन दुःखान्मोचयते शिवः ॥ ८५
न भिषक् कारणं रोगे शिवः संसारकारणम् ।
इत्येतदपि वैषम्यं न दोषायास्य कल्पते ॥ ८६
दुःखे स्वभावसंसिद्धे कथं तत्कारणं शिवः ।
स्वाभाविको मलः पुंसां स हि संसारयत्यमून् ॥ ८७
संसारकारणं यत्तु मलं मायाद्यचेतनम् ।
तत्स्वयं न प्रवर्तेत शिवसान्निध्यमन्तरा ॥ ८८
यथा मणिरयस्कान्तः सान्निध्यादुपकारकः ।
अयसश्चलतस्तद्वच्छिवोऽप्यस्येति सूरयः ॥ ८ ९
। ( पूर्वखण्ड ) ८५३ भगवान् शिव तो अनायास ही समस्त पशुओंको बन्धनसे मुक्त करनेमें समर्थ हैं । फिर वे उन्हें बन्धनमें डाले रखकर क्यों दुःख देते हैं? यहाँ ऐसा विचार या संदेह नहीं करना चाहिये; क्योंकि सारा संसार दुःखरूप ही है, ऐसा विचारवानोंका निश्चित सिद्धान्त है । जो स्वभावतः दुःखमय है, वह दुःखरहित कैसे हो सकता है । स्वभावमें उलट - फेर नहीं हो सकता ॥ ८२-८३ ॥ वैद्यकी दवासे रोग अरोग नहीं होता । वह रोगपीड़ित मनुष्यका अपनी दवासे सुखपूर्वक उद्धार कर देता है । इसी प्रकार जो स्वभावतः मलिन और स्वभावसे ही दुखी हैं, उन पशुओंको अपनी आज्ञारूपी ओषधि देकर शिव दुःखसे छुड़ा देते हैं । रोग होनेमें वैद्य कारण नहीं है, परंतु संसारकी उत्पत्तिमें शिव कारण हैं । अतः रोग और वैद्यके दृष्टान्तसे शिव और संसारके दान्तमें समानता नहीं है । इसलिये इसके द्वारा शिवपर दोषारोपण नहीं किया जा सकता । जब दुःख स्वभाव - सिद्ध है, तब शिव उसके कारण कैसे हो सकते हैं? जीवोंमें जो स्वाभाविक मल है, वही उन्हें संसारके चक्रमें डालता है॥८४–८७ ॥ विद्वानोंका कहना है कि संसारका कारणभूत जो मल - अचेतन माया आदि है, वह शिवका सांनिध्य प्राप्त किये बिना स्वयं चेष्टाशील नहीं हो सकता । जैसे चुम्बकमणि लोहेका सांनिध्य पाकर ही उपकारक होता है— लोहेको खींचता है, उसी प्रकार शिव भी जड माया आदिका सांनिध्य पाकर ही उसके उपकारक होते हैं, उसे सचेष्ट बनाते
हैं ॥। ८८-८९ ॥
उनके विद्यमान सांनिध्यको अकारण हटाया न निवर्तयितुं शक्यं सान्निध्यं सदकारणम् ॥ ९ ० नहीं जा सकता । अतः जगत्के लिये जो सदा अज्ञात अधिष्ठाता ततो नित्यमज्ञातो जगतः शिवः हैं, वे शिव ही इसके अधिष्ठाता हैं । शिवके बिना यहाँ कोई भी प्रवृत्त ( चेष्टाशील ) नहीं होता, । उनकी आज्ञाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता । उनसे प्रेरित होकर ही यह सारा जगत् विभिन्न विद्यते । प्रकारकी चेष्टाएँ करता है, तथापि वे शिव कभी
न शिवेन विना किंचित्प्रवृत्तमिह ॥ ९९ । मोहित नहीं होते ॥ ९ ० - ९ १ ॥
तत्प्रेरितमिदं सर्वं तथापि न स मुह्यति
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८५४ शक्तिराज्ञात्मिका तस्य नियन्त्री विश्वतोमुखी तया ततमिदं शश्वत्तथापि स न दुष्यति अनिदं प्रथमं सर्वमीशितव्यं स ईश्वरः ईशनाच्च तदीयाज्ञा तथापि स न दुष्यति योऽन्यथा मन्यते मोहात्स विनश्यति दुर्मतिः तच्छक्तिवैभवादेव तथापि स न दुष्यति एतस्मिन्नन्तरे व्योम्नः श्रुता वागशरीरिणी सत्यमोममृतं सौम्यमित्याविरभवत्स्फुटम् ॥
ततो हृष्टतराः सर्वे विनष्टाशेषसंशयाः ।
मुनयो विस्मयाविष्टाः प्रणेमुः पवनं प्रभुम् ॥
तथा विगतसन्देहान्कृत्वापि पवनो मुनीन् ।
नैते प्रतिष्ठितज्ञाना इति मत्वैवमब्रवीत् ॥
वायुरुवाच
परोक्षमपरोक्षं च द्विविधं ज्ञानमिष्यते ।
परोक्षमस्थिरं प्राहुरपरोक्षं तु सुस्थिरम् ॥
हेतूपदेशगम्यं यत्तत्परोक्षं प्रचक्षते ।
अपरोक्षं पुनः श्रेष्ठादनुष्ठानाद्भविष्यति ॥
नापरोक्षादृते मोक्ष इति कृत्वा विनिश्चयम् । श्रेष्ठानुष्ठानसिद्ध्यर्थं श्रीशिवमहापुराण [ अ ०३१ । उनकी आज्ञारूपिणी जो शक्ति है, वही ॥ ९ २ नियन्त्रण करती है । उसका सब और मुख है सबका । उसीने | सदा इस सम्पूर्ण दृश्यप्रपंचका विस्तार | है, तथापि उसके दोषसे शिव दूषित नहीं किया । यह समस्त जगत् शिवसे प्रेरित होता है होते । | इससे शिवका स्वस्वरूप विकृत नहीं होता, किंतु ॥ प्रेरणा अथवा शासनका कार्य शिवकी आज्ञाके द्वारा सम्पन्न ॥ ९ ३ होता है॥९ २ - ९ ३ ॥ । जो दुर्बुद्धि मानव मोहवश इसके विपरीत ॥ ९ ४ मान्यता रखता है, वह नष्ट हो जाता है । शिवकी शक्तिके वैभवसे ही संसार चलता है, तथापि इससे शिव दूषित नहीं होते ॥ ९ ४ ॥ । इसी समय आकाशसे शरीररहित वाणी ९ ५ सुनायी दी- ' सत्यम् ओम् अमृतं सौम्यम् ' * इन पदोंका वहाँ स्पष्ट उच्चारण हुआ, उसे सुनकर सब लोग बहुत प्रसन्न हुए । उनके समस्त संशयोंका निवारण हो गया तथा उन मुनियोंने विस्मित हो ९ ६ प्रभु पवनदेवको प्रणाम किया । इस प्रकार उन मुनियोंको संदेहरहित करके भी वायुदेवने यह नहीं माना कि इन्हें पूर्ण ज्ञान हो गया । ' इनका ज्ञान अभी ९ ७ प्रतिष्ठित नहीं हुआ है ' ऐसा समझकर ही वे? इस प्रकार बोले— ॥ ९ ५ – ९ ७ ॥ वायुदेवताने कहा— मुनियो! परोक्ष और अपरोक्षके भेदसे ज्ञान दो प्रकारका माना गया है । ९ ८ परोक्ष ज्ञानको अस्थिर कहा जाता है और अपरोक्ष ज्ञानको सुस्थिर । युक्तिपूर्ण उपदेशसे जो ज्ञान होता है, उसे विद्वान् पुरुष परोक्ष कहते हैं । वही श्रेष्ठ ९९ अनुष्ठानसे अपरोक्ष हो जायगा । अपरोक्ष ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं होता, ऐसा निश्चय करके तुमलोग आलस्यरहित हो श्रेष्ठ अनुष्ठानकी सिद्धिके लिये प्रयतध्वमतन्द्रिताः ॥ १०० प्रयत्न करो॥९८–१०० ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे ज्ञानोपदेशो नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके ॥ ३१ ॥
ज्ञानोपदेश अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके पूर्वखण्डमें नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥
* इन पदोंका सम्मिलित अर्थ इस प्रकार है - हाँ, वह सत्य है, अमृतमय है और सौम्यहै ।
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अ ० ३२ ] वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) ८५५ अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः परम धर्मका प्रतिपादन, शैवागमके अनुसार ऋषय ऊचुः
किं तच्छ्रेष्ठमनुष्ठानं मोक्षो येनापरोक्षितः ।
तत्तस्य साधनं चाद्य वक्तुमर्हसि मारुत ॥ १
वायुरुवाच
शैवो हि परमो धर्मः श्रेष्ठानुष्ठानशब्दितः ।
यत्रापरोक्षो लक्ष्येत साक्षान्मोक्षप्रदः शिवः ॥ २
स तु पञ्चविधो ज्ञेयः पंचभिः पर्वभिः क्रमात् ।
क्रियातपोजपध्यानज्ञानात्मभिरनुत्तरैः ॥ ३
तैरेव सोत्तरैः सिद्धो धर्मस्तु परमो मतः ।
परोक्षमपरोक्षं च ज्ञानं च मोक्षदम् ॥ ४
परमोऽपरमश्वोभौ धर्मो हि श्रुतिचोदितौ ।
धर्मशब्दाभिधेयेऽर्थे प्रमाणं श्रुतिरेव नः ॥
परमो योगपर्यन्तो धर्मः श्रुतिशिरोगतः ।
धर्मस्त्वपरमस्तद्वदधः श्रुतिमुखोत्थितः ॥ ६
अपश्वात्माधिकारत्वाद्यो धर्मः परमो मतः ।
साधारणस्ततोऽन्यस्तु सर्वेषामधिकारतः ॥ ७
स चायं परमो धर्मः परधर्मस्य साधनम् ।
धर्मशास्त्रादिभिः सम्यक् साङ्ग एवोपबृंहितः ॥ ८
शैवो यः परमो धर्मः श्रेष्ठानुष्ठानशब्दितः ।
इतिहासपुराणाभ्यां कथंचिदुपबृंहितः ॥ ९
शैवागमैस्तु संपन्नः सहाङ्गोपाङ्गविस्तरः । पाशुपत ज्ञान तथा उसके साधनोंका वर्णन ऋषियोंने पूछा — वायुदेव! वह कौन - सा श्रेष्ठ अनुष्ठान है, जो मोक्षस्वरूप ज्ञानको अपरोक्ष कर देता है? उसको और उसके साधनोंको आज आप हमें बतानेकी कृपा करें ॥१ ॥
वायुने कहा — भगवान् शिवका बताया हुआ जो परम धर्म है, उसीको श्रेष्ठ अनुष्ठान कहा गया है । उसके सिद्ध होनेपर साक्षात् मोक्षदायक शिव अपरोक्ष हो जाते हैं ॥२ ॥
वह परम धर्म पाँचों पर्वोंके कारण क्रमशः पाँच प्रकारका जानना चाहिये । उन पर्वोंके नाम हैं - क्रिया, तप, जप, ध्यान और ज्ञान 1 । ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं, उन उत्कृष्ट साधनोंसे सिद्ध हुआ धर्म परम धर्म माना गया है । जहाँ परोक्ष ज्ञान भी अपरोक्ष होकर मोक्षदायक होता है ॥ ३-४ ॥ वैदिक धर्म दो प्रकारके बताये गये हैं- परम और अपरम । ' धर्म ' शब्दसे प्रतिपाद्य अर्थमें हमारे लिये श्रुति ही प्रमाण है । योगपर्यन्त जो परम धर्म है, वह श्रुतियोंके शिरोभूत उपनिषद्में वर्णित है और जो अपरम धर्म है, वह उसकी अपेक्षा नीचे श्रुतिके मुखभागसे अर्थात् संहिता - मन्त्रोंद्वारा प्रतिपादित हुआ है ॥५-६ ॥ जिसमें पशु ( बद्ध ) जीवोंका अधिकार नहीं है, वह वेदान्तवर्णित धर्म ' परम धर्म ' माना गया है । उससे भिन्न जो यज्ञ - यागादि हैं, उसमें सबका अधिकार होनेसे वह साधारण या ' अपरम धर्म ' कहलाता है । जो अपरम धर्म है, वही परम धर्मका साधन है । धर्मशास्त्र आदिके द्वारा उसका सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक सांगोपांग निरूपण हुआ है ॥ ७-८ ॥ भगवान् शिवके द्वारा प्रतिपादित जो परम धर्म है, उसीका नाम श्रेष्ठ अनुष्ठान है । इतिहास और पुराणोंद्वारा उसका किसी प्रकार विस्तार हुआ है, परंतु शैव - शास्त्रोंद्वारा उसके विस्तारका सांगोपांग निरूपण
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८५६ तत्संस्काराधिकारैश्च सम्यगेवोपबृंहितः
शैवागमो हि द्विविधः श्रौतोऽश्रौतश्च संस्कृतः ।
श्रुतिसारमयः श्रौतः स्वतन्त्र इतरो मतः ॥
स्वतन्त्रो दशधा पूर्वं तथाष्टादशधा पुनः ।
कामिकादिसमाख्याभिः सिद्धः सिद्धान्तसंज्ञितः ॥
श्रुतिसारमयो यस्तु शतकोटिप्रविस्तरः ।
परं पाशुपतं यत्र व्रतं ज्ञानं च कथ्यते ॥
युगावर्तेषु शिष्येत योगाचार्यस्वरूपिणा ।
तत्र तत्रावतीर्णेन शिवेनैव प्रवर्त्यते ॥
संक्षिप्यास्य प्रवक्तारश्चत्वारः परमर्षयः ।
रुरुर्दधीचोऽगस्त्यश्च उपमन्युर्महायशाः ॥
ते च पाशुपता ज्ञेयाः संहितानां प्रवर्तकाः ।
तत्सन्ततीया गुरवः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
तत्रोक्तः परमो धर्मश्चर्याद्यात्मा चतुर्विधः ।
तेषु पाशुपतो योगः शिवं प्रत्यक्षयेद् दृढम् ॥
तस्माच्छ्रेष्ठमनुष्ठानं योगः पाशुपतो मतः ।
तत्राप्युपायको युक्तो ब्रह्मणा स तु कथ्यते ॥
नामाष्टकमयो योगः शिवेन परिकल्पितः ।
तेन योगेन सहसा शैवी प्रज्ञा प्रजायते ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ३२ ॥ १० । किया गया है । वहीं उसके स्वरूपका सम्यक् रूपये । प्रतिपादन हुआ है । साथ ही उसके संस्कार | अधिकार भी सम्यक् रूपसे विस्तारपूर्वक और गये हैं॥९ -१० ॥ बताये शैव - आगमके दो भेद हैं- श्रौत और अश्रौत ११ जो श्रुतिके सार तत्त्वसे सम्पन्न है, वह संस्कार । | सम्पन्न श्रौत है; और जो स्वतन्त्र है, वह अश्रौत माना । गया है । स्वतन्त्र शैवागम पहले दस प्रकारका था । फिर अठारह प्रकारका हुआ । वह कामिका आदि , १२ | संज्ञाओंसे सिद्ध होकर सिद्धान्त नाम धारण करता है ॥ ११-१२ ॥ श्रुतिसारमय जो शैव - शास्त्र है, उसका विस्तार १३ सौ करोड़ श्लोकोंमें किया गया है । उसीमें उत्कृष्ट ' पाशुपत व्रत ' और ' पाशुपत ज्ञान ' का वर्णन किया गया है । युग - युगमें होनेवाले शिष्योंको उसका उपदेश देनेके लिये भगवान् शिव स्वयं ही योगाचार्य-१४ रूपसे जहाँ - तहाँ अवतीर्ण हो उसका प्रचार करते हैं ॥ १३-१४ ॥ इस शैव - शास्त्रको संक्षिप्त करके उसके १५ सिद्धान्तका प्रवचन करनेवाले मुख्यतः चार महर्षि हैं – रुरु, दधीच, अगस्त्य और महायशस्वी उपमन्यु । उन्हें संहिताओंका प्रवर्तक ‘ पाशुपत ' जानना चाहिये । १६ उनकी संतान - परम्परामें सैकड़ों - हजारों गुरुजन हो चुके हैं॥१५-१६ ॥ पाशुपत सिद्धान्तमें जो परम धर्म बताया गया है, १७ वह चर्या * आदि चार पादोंके कारण चार प्रकारका माना गया है । उन चारोंमें जो पाशुपत योग है, वह दृढ़तापूर्वक शिवका साक्षात्कार करानेवाला है । इसलिये पाशुपत योग ही श्रेष्ठ अनुष्ठान माना गया । है । उसमें भी ब्रह्माजीने जो उपाय बताया है उसका १८ वर्णन किया जाता है ॥ १७-१८ ॥, भगवान् शिवके द्वारा परिकल्पित जो ‘ नामाष्टकमय | योग ' है, उसके द्वारा सहसा ' शैवी प्रज्ञा ' का उदय १ ९ होता है । उस प्रज्ञाद्वारा पुरुष शीघ्र ही सुस्थिर परम * चर्या, विद्या, क्रिया और योग- ये चार पाद हैं ।