शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 101–110
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
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अ ० १२ ] विद्येश्वरसंहिता ८ ९
गङ्गायां माघमासे तु तथा कुम्भगते रवौ ।
श्राद्धं वा पिण्डदानं वा तिलोदकमथापि वा ॥
वंशद्वयपितॄणां च कुलकोट्युद्धरं विदुः ।
कृष्णावेण्यां प्रशंसन्ति मीनगे च गुरौ रवौ ॥
तत्तत्तीर्थे च तन्मासि स्नानमिन्द्रपदप्रदम् ।
गङ्गां वा सह्यजां वापि समाश्रित्य वसेद् बुधः ॥
तत्कालकृतपापस्य क्षयो भवति निश्चितम् ।
रुद्रलोकप्रदान्येव सन्ति क्षेत्राण्यनेकशः ॥
ताम्रपर्णी वेगवती ब्रह्मलोकफलप्रदे ।
तयोस्तीरे हि सन्त्येव क्षेत्राणि स्वर्गदानि च ॥
सन्ति क्षेत्राणि तन्मध्ये पुण्यदानि च भूरिशः ।
तत्र तत्र वसन्प्राज्ञस्तादृशं च फलं लभेत् ॥
सदाचारेण सद्वृत्त्या सदा भावनयापि च ।
वसेद् दयालुः प्राज्ञो वै नान्यथा तत्फलं लभेत् ॥
पुण्यक्षेत्रे कृतं पुण्यं बहुधा ऋद्धिमृच्छति ।
पुण्यक्षेत्रे कृतं पापं महदण्वपि जायते ॥
तत्कालं जीवनार्थश्चेत्पुण्येन क्षयमेष्यति ।
पुण्यमैश्वर्यदं प्राहुः कायिकं वाचिकं तथा ॥
मानसं च तथा पापं तादृशं नाशयेद् द्विजाः ।
मानसं वज्रलेपं तु कल्पकल्पानुगं तथा ॥
ध्यानादेव हि तन्नश्येन्नान्यथा नाशमृच्छति ।
वाचिकं जपजालेन कायिकं कायशोषणात् ॥
दानाद्धनकृतं नश्येन्नान्यथा कल्पकोटिभिः ।
क्वचित्पापेन पुण्यं च वृद्धिपूर्वेण नश्यति ॥
माघमासमें तथा सूर्यके कुम्भराशिमें स्थित होनेपर २ ९ फाल्गुनमासमें गंगाजीके तटपर किया हुआ श्राद्ध, पिण्डदान अथवा तिलोदकदान पिता और नाना दोनों कुलोंके पितरोंकी अनेकों पीढ़ियोंका उद्धार करनेवाला माना ३० गया है । सूर्य और बृहस्पति जब मीनराशिमें स्थित हों, तब कृष्णवेणी नदीमें किये गये स्नानकी ऋषियोंने प्रशंसा की है । उन - उन महीनोंमें पूर्वोक्त तीर्थोंमें किया हुआ स्नान इन्द्रपदकी प्राप्ति करानेवाला होता है । विद्वान् ३१ पुरुष गंगा अथवा कावेरी नदीका आश्रय लेकर तीर्थवास करे । ऐसा करनेसे उस समयमें किये हुए पापका निश्चय ही नाश हो जाता है ॥ २ ९ –३११ / २ ॥ ३२ रुद्रलोक प्रदान करनेवाले बहुत - से क्षेत्र हैं । ताम्रपर्णी और वेगवती- ये दोनों नदियाँ ब्रह्मलोककी प्राप्तिरूप फल देनेवाली हैं । उन दोनोंके तटपर अनेक स्वर्गदायक ३३ क्षेत्र हैं । उन दोनोंके मध्यमें बहुत - से पुण्यप्रद क्षेत्र हैं । वहाँ निवास करनेवाला विद्वान् पुरुष वैसे फलका भागी होता है । सदाचार, उत्तम वृत्ति तथा सद्भावनाके साथ ३४ मनमें दयाभाव रखते हुए विद्वान् पुरुषको तीर्थमें निवास करना चाहिये, अन्यथा उसका फल नहीं मिलता । ३५ पुण्यक्षेत्रमें किया हुआ थोड़ा - सा पुण्य भी अनेक प्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होता है तथा वहाँ किया हुआ छोटा - सा ३६ पाप भी महान् हो जाता है । यदि पुण्यक्षेत्रमें रहकर ही जीवन बितानेका निश्चय हो, तो उस पुण्यसंकल्पसे उसका पहलेका सारा पाप तत्काल नष्ट हो जायगा; ३७ क्योंकि पुण्यको ऐश्वर्यदायक कहा गया है । हे ब्राह्मणो! तीर्थवासजनित पुण्य कायिक, वाचिक और मानसिक ३८ सारे पापोंका नाश कर देता है । तीर्थमें किया हुआ मानसिक पाप वज्रलेप हो जाता है । वह कई कल्पोंतक पीछा नहीं छोड़ता है॥३२-३८ ॥ वैसा पाप केवल ध्यानसे ही नष्ट होता है, ३ ९ अन्यथा नष्ट नहीं होता । वाचिक पाप जपसे तथा कायिक पाप शरीरको सुखाने - जैसे कठोर तपसे नष्ट होता है । धनोपार्जनमें हुए पाप दानसे नष्ट होते हैं अन्यथा करोड़ों कल्पोंमें भी उनका नाश नहीं होता । कभी - कभी अतिशय मात्रामें बढ़े पापोंसे पुण्य भी नष्ट ४० हो जाते हैं । पुण्य और पाप दोनोंका बीजांश, वृद्ध्यंश
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९ ० बीजांशश्चैव वृद्धयंशो भोगांशः पुण्यपापयोः ज्ञाननाश्यो हि बीजांशो वृद्धिरुक्तप्रकारतः भोगांशो भोगनाश्यस्तु नान्यथा पुण्यकोटिभिः बीजप्ररोहे नष्टे तु शेषो भोगाय कल्पते देवानां पूजया चैव ब्राह्मणानां च दानतः तपोधिक्याच्च कालेन भोगः सह्यो भवेन्नृणाम् तस्मात्पापमकृत्वैव वस्तव्यं सुखमिच्छता श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १३ । और भोगांश होता है । बीजांशका नाश ज्ञानसे ॥ ४१ वृद्धयंशका ऊपर लिखे प्रकारसे तथा भोगांशका नाश, भोगनेसे होता है । अन्य किसी प्रकारसे करोड़ों पुण्य | करके भी पापके भोगांश नहीं मिट सकते । पाप-। बीजके अंकुरित हो जानेपर उसका अंश नष्ट होनेपर ॥ ४२ भी शेष पाप भोगना ही पड़ता है । देवताओंकीपूजा, ब्राह्मणोंको दान तथा अधिक तप करनेसे समय पाकर । पापभोग मनुष्योंके सहनेयोग्य हो जाते हैं । इसलिये । सुख चाहनेवाले व्यक्तिको पापोंसे बचकर ही तीर्थवास ॥ ४३ करना चाहिये ॥३ ९ -४३ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां शिवक्षेत्रवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें शिवक्षेत्रका वर्णन नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्मधारण, सन्ध्यावन्दन, प्रणव- जप, गायत्री जप, दान, न्यायतः धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र ऋषय ऊचुः
सदाचारं श्रावयाशु येन लोकाञ्जयेद् बुधः ।
धर्माधर्ममयान्ब्रूहि स्वर्गनारकदांस्तथा ॥
सूत उवाच
सदाचारयुतो विद्वान् ब्राह्मणो नाम नामतः ।
वेदाचारयुतो विप्रो ह्येर्तेरेकैकवान्द्विजः ॥
अल्पाचारोऽल्पवेदश्च क्षत्रियो राजसेवकः ।
किञ्चिदाचारवान्वैश्यः कृषिवाणिज्यकृत्तथा ॥
शूद्रब्राह्मण इत्युक्तः स्वयमेव हि कर्षकः ।
असूयालुः परद्रोही चण्डालद्विज उच्यते ॥
आदिकी विधि एवं उनकी महिमाका वर्णन ऋषिगण बोले - [ हे सूतजी! ] अब आप शीघ्र ही हमें वह सदाचार सुनाइये, जिससे विद्वान् पुरुष पुण्यलोकोंपर विजय प्राप्त कर लेता है । स्वर्ग १ प्रदान करनेवाले धर्ममय आचारों तथा नरकका कष्ट देनेवाले अधर्ममय आचारोंका भी वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] सदाचारका पालन करनेवाला विद्वान् ब्राह्मण ही वास्तवमें ' ब्राह्मण ' नाम २ धारण करनेका अधिकारी है । जो केवल वेदोक्त आचारका पालन करनेवाला है, उस ब्राह्मणकी ' विप्र ' संज्ञा होती है । सदाचार, वेदाचार तथा विद्या- इनमेंसे एक - एक गुणसे ही युक्त होनेपर उसे ' द्विज ' कहते हैं । जिसमें स्वल्पमात्रामें ही आचारका पालन देखा जाता है, जिसने | वेदाध्ययन भी बहुत कम किया है तथा जो राजाका ' ३ । सेवक ( पुरोहित, मन्त्री आदि ) है, उसे ' क्षत्रियब्राह्मण । । कहते हैं । जो ब्राह्मण कृषि तथा वाणिज्य कर्म करनेवाला | है और कुछ - कुछ ब्राह्मणोचित आचारका भी पालन करता है, वह ' वैश्यब्राह्मण ' है तथा जो स्वयं ही खेत । जोतता ( हल चलाता ) है, उसे ' शूद्रब्राह्मण ' कहा गया । । है । जो दूसरोंके दोष देखनेवाला और परद्रोही है, उसे ४ । ' चाण्डालद्विज ' कहते हैं ॥ २–४ ॥
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अ ० १३ ] विद्येश्वरसंहिता ९ १
पृथिवीपालको राजा इतरे क्षत्रिया मताः ।
धान्यादिक्रयवान्वैश्य इतरो वणिगुच्यते ॥
ब्रह्मक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषुः शूद्र उच्यते ।
कर्षको वृषलो ज्ञेय इतरे चैव दस्यवः ॥
सर्वो ह्युषः प्राङ्मुखश्च चिन्तयेद् देवपूर्वकान् ।
धर्मानर्थांश्च तत्क्लेशानायं च व्ययमेव च ॥
आयुर्द्वषश्च मरणं पापं भाग्यं तथैव च ।
व्याधिः पुष्टिस्तथा शक्तिः प्रातरुत्थानदिक्फलम् ॥
निशान्त्ययामोषा ज्ञेया यामार्धं सन्धिरुच्यते ।
तत्काले तु समुत्थाय विण्मूत्रे विसृजेद् द्विजः ॥
गृहाद् दूरं ततो गत्वा बाह्यतः प्रावृतस्तथा ।
उदङ्मुखः समाविश्य प्रतिबन्धेऽन्यदिङ्मुखः ॥
जलाग्निब्राह्मणादीनां देवानां नाभिमुख्यतः ।
लिङ्गं पिधाय वामेन मुखमन्येन पाणिना ॥
मलमुत्सृज्य चोत्थाय न पश्येच्चैव तन्मलम् ।
उद्घृतेन जलेनैव शौचं कुर्याज्जलाद् बहिः ॥
अथवा देवपित्रर्षितीर्थावतरणं विना ।
सप्त वा पञ्च वा त्रीन्वा गुदं संशोधयेन्मृदा ॥
लिङ्गे कर्कोटमात्रं तु गुदे प्रसृतिरिष्यते ।
तत उत्थाय पद्धस्तशौचं गण्डूषमष्टकम् ॥
इसी तरह क्षत्रियोंमें भी जो पृथ्वीका पालन ५ करता है, वह राजा है । दूसरे लोग राजत्वहीन क्षत्रिय माने गये हैं । वैश्योंमें भी जो धान्य आदि वस्तुओंका क्रय - विक्रय करता है, वह वैश्य है; दूसरोंको वणिक् ६ कहते हैं । जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्योंकी सेवामें लगा रहता है, वह शूद्र कहलाता है । जो शूद्र हल
जोतनेका काम करता है, उसे वृषल समझना चाहिये ।
शेष शूद्र दस्यु कहलाते हैं॥५-६ ॥
इन सभी वर्णोंके मनुष्योंको चाहिये कि वे ७ उषःकालमें उठकर पूर्वाभिमुख हो सबसे पहले देवताओंका, फिर धर्मका, पुनः अर्थका, तदनन्तर उसकी प्राप्तिके लिये उठाये जानेवाले क्लेशोंका तथा आय और व्ययका भी चिन्तन करें ॥ ७ ॥
प्रात: काल उठकर [ पूर्व, अग्निकोण, दक्षिण ८ आदि ] आठ दिशाओंकी ओर मुख करके बैठनेपर क्रमशः आयु, द्वेष, मरण, पाप, भाग्य, व्याधि, पुष्टि और शक्ति प्राप्त होती है ॥ ८ ॥
रातके पिछले पहरको उषःकाल जानना चाहिये । ९ उस अन्तिम पहरका जो आधा या मध्यभाग है, उसे सन्धि कहते हैं । उस सन्धिकालमें उठकर द्विजको मल-मूत्र आदिका त्याग करना चाहिये । घरसे दूर जाकर बाहरसे अपने शरीरको ढके रखकर दिनमें उत्तराभिमुख १० बैठकर मल - मूत्रका त्याग करे । यदि उत्तराभिमुख बैठनेमें कोई रुकावट हो तो दूसरी दिशाकी ओर मुख करके बैठे । जल, अग्नि, ब्राह्मण आदि तथा देवताओंका सामना बचाकर बैठे । बायें हाथसे उपस्थको ढँककर तथा दाहिने ११ हाथसे मुखको ढककर मलत्याग करे और उठनेपर उस मलको न देखे । तदनन्तर जलाशयसे बाहर निकाले हुए जलसे ही गुदाकी शुद्धि करे; अथवा देवताओं, पितरों तथा ऋषियोंके तीर्थोंमें उतरे बिना ही प्राप्त १२ हुए जलसे शुद्धि करनी चाहिये । गुदामें सात, पाँच या तीन बार मिट्टीसे उसे धोकर शुद्ध करे । लिंगमें ककोड़ेके फलके बराबर मिट्टी लेकर लगाये और १३ उसे धो दे । परंतु गुदामें लगानेके लिये एक पसर मिट्टीकी आवश्यकता होती है । लिंग और गुदाकी शुद्धिके पश्चात् उठकर अन्यत्र जाय और हाथ - पैरोंकी १४ । शुद्धि करके आठ बार कुल्ला करे ॥ ९ -१४ ॥
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९ २ श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १३
येन केन च पत्रेण काष्ठेन च जलाद् बहिः ।
कार्यं सन्तर्जनीं त्यज्य दन्तधावनमीरितम् ॥ १५
जलदेवान्नमस्कृत्य मन्त्रेण स्नानमाचरेत् ।
अशक्तः कण्ठदघ्नं वा कटिदघ्नमथापि वा ॥ १६
आजानुजलमाविश्य मन्त्रस्नानं समाचरेत् ।
देवादींस्तर्पयेद्विद्वांस्तत्र तीर्थजलेन च ॥ १७
धौतवस्त्रं समादाय पञ्चकच्छेन धारयेत् ।
उत्तरीयं च किञ्चैव धार्यं सर्वेषु कर्मसु ॥ १८
नद्यादितीर्थस्नाने तु स्नानवस्त्रं न शोधयेत् ।
वापीकूपगृहादौ तु स्नानादूर्ध्वं नयेद् बुधः ॥ १ ९
शिलादार्वादिके वापि जले वापि स्थलेऽपि वा ।
संशोध्य पीडयेद्वस्त्रं पितॄणां तृप्तये द्विजाः ॥ २०
जाबालकोक्तमन्त्रेण भस्मना च त्रिपुण्ड्रकम् ।
अन्यथा चेज्जले पातस्ततो नरकमृच्छति ॥ २१
जिस किसी वृक्षके पत्तेसे अथवा उसके पतले । काष्ठसे जलके बाहर दातुन करना चाहये । उस समय तर्जनी अँगुलीका उपयोग न करे । यह दन्तशुद्धिका विधान बताया गया है । तदनन्तर जल - सम्बन्धी देवताओंको नमस्कार करके मन्त्रपाठ करते हुए स्नान करे । यदि कण्ठतक या कमरतक पानीमें खड़े होनेकी शक्ति न हो तो घुटनेतक जलमें खड़ा होकर अपने ऊपर जल छिड़ककर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नानकार्य सम्पन्न करे । विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वहाँ तीर्थजलसे देवता आदिका स्नानांग तर्पण भी करे ॥ १५ - १७ ॥ इसके बाद धौतवस्त्र लेकर पाँच कच्छ करके उसे धारण करे । साथ ही कोई उत्तरीय भी धारण कर ले; क्योंकि सन्ध्या - वन्दन आदि सभी कर्मोंमें उसकी आवश्यकता होती है । नदी आदि तीर्थोंमें स्नान करनेपर स्नान - सम्बन्धी उतारे हुए वस्त्रको वहाँ न धोये । स्नानके पश्चात् विद्वान् पुरुष उस वस्त्रको बावड़ीमें, कुएँके पास अथवा घर आदिमें ले जाय और वहाँ पत्थरपर, लकड़ी आदिपर, जलमें या स्थलमें अच्छी तरह धोकर उस वस्त्रको निचोड़े । हे द्विजो! वस्त्रको निचोड़नेसे जो जल गिरता है, वह पितरोंकी तृप्तिके लिये होता है ॥ १८-२० ॥ इसके बाद जाबालि - उपनिषद्में बताये गये [ अग्निरिति ] मन्त्रसे भस्म लेकर उसके द्वारा त्रिपुण्ड्र लगाये । * इस विधिका पालन न किया जाय, इसके पूर्व ही यदि जलमें भस्म गिर जाय तो कर्ता नरकमें जाता है । ' आपो हि ष्ठा ' इस मन्त्रसे पाप - शान्तिके * जाबालि उपनिषद् भस्मधारणकी विधि इस प्रकार कही गयी है-‘ ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म व्योमेति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म ' इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करे । ‘ मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । मा नो वीरान्न्रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ' ॥ इस मन्त्रसे उठाकर जलसे मले, तत्पश्चात्— ‘ त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् ॥ ' इत्यादि मन्त्रसे मस्तक, ललाट, वक्षःस्थल और कन्धोंपर त्रिपुण्ड्र करे । ‘ त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम् ॥ ' तथा-' त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ ' — इन दोनों मन्त्रोंको तीन - तीन बार पढ़ते हुए तीन रेखाएँ खींचे ।
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अ ० १३ ]
आपोहिष्ठेति शिरसि प्रोक्षयेत्पापशान्तये ।
यस्येति मन्त्रं पादे तु सन्धिप्रोक्षणमुच्यते ॥
हृदये मूर्ध्नि पादे च मूर्ध्नि हृत्पाद एव च ।
हृत्पादमूर्ध्नि सम्प्रोक्ष्य मन्त्रस्नानं विदुर्बुधाः ॥
ईषत्स्पर्शे च दौः स्वास्थ्ये राजराष्ट्रभयेऽपि च अगत्या गतिकाले च मन्त्रस्नानं समाचरेत् ॥ प्रातः सूर्यानुवाकेन सायमग्न्यनुवाकतः अपः पीत्वा तथा मध्ये पुनः प्रोक्षणमाचरेत् गायत्र्या जपमन्त्रान्ते त्रिरूर्ध्वं प्राग्विनिक्षिपेत् । मन्त्रेण सह चैकं वै मध्येऽर्घ्यं तु रवेर्द्विजाः अथ जाते च सायाह्ने भुवि पश्चिमदिङ्मुखः उद्धृत्य दद्यात् प्रातस्तु मध्याह्नेऽङ्गुलिभिस्तथा अङ्गुलीनां च रन्ध्रेण लम्बं पश्येद् दिवाकरम् । आत्मप्रदक्षिणं कृत्वा शुद्धाचमनमाचरेत् सायं मुहूर्तादर्वाक्तु कृता सन्ध्या वृथा भवेत् विद्येश्वरसंहिता ९ ३ लिये सिरपर जल छिड़के तथा ' यस्य क्षयाय ' - इस २२ मन्त्रको पढ़कर पैरपर जल छिड़के; इसे सन्धिप्रोक्षण कहते हैं । ' आपो हि ष्ठा ' इत्यादि मन्त्रमें तीन ऋचाएँ हैं और प्रत्येक ऋचामें गायत्री छन्दके तीन-२३ तीन चरण हैं । इनमेंसे प्रथम ऋचाके तीन चरणोंका पाठ करते हुए क्रमश: पैर, मस्तक और हृदयमें जल छिड़के; दूसरी ऋचाके तीन चरणोंको पढ़कर क्रमश: मस्तक, हृदय और पैरमें जल छिड़के तथा तीसरी ऋचाके तीन चरणोंका पाठ करते हुए क्रमशः हृदय, पैर और मस्तकका जलसे प्रोक्षण करे - इसे विद्वान् पुरुष मन्त्रस्नान मानते हैं ॥ २१–२३ ॥ । किसी अपवित्र वस्तुसे किंचित् स्पर्श हो जानेपर, २४ अपना स्वास्थ्य ठीक न रहनेपर, राजभय या राष्ट्रभय उपस्थित होनेपर तथा यात्राकालमें जलकी उपलब्धि । न होनेकी विवशता आ जानेपर मन्त्रस्नान करना ॥ २५ चाहिये । प्रातः काल [ सूर्यश्च मा मन्युश्च - इस ] सूर्यानुवाकसे तथा सायंकाल [ अग्निश्च मा मन्युश्च -इस ] अग्नि - सम्बन्धी अनुवाकसे जलका आचमन करके पुनः जलसे अपने अंगोंका प्रोक्षण करे । मध्याह्नकालमें भी [ आपः पुनन्तु - इस ] मन्त्रसे आचमन करके पूर्ववत् प्रोक्षण करना चाहिये ॥ २४-२५ ॥ प्रात: कालकी सन्ध्योपासनामें गायत्रीमन्त्रका जप ॥ २६ करके तीन बार ऊपरकी ओर सूर्यदेवको अर्घ्य देना चाहिये । हे ब्राह्मणो! मध्याह्नकालमें गायत्री-। मन्त्रके उच्चारणपूर्वक सूर्यको एक ही अर्घ्य देना ॥ २७ चाहिये । फिर सायंकाल आनेपर पश्चिमकी ओर मुख करके बैठ जाय और पृथ्वीपर ही सूर्यके लिये अर्घ्य । दे [ ऊपरकी ओर नहीं ] । प्रातः काल और मध्याह्नकालके ॥ २८ समय अंजलिमें अर्घ्यजल लेकर अँगुलियोंकी ओरसे सूर्यदेव लिये अर्घ्य दे । अँगुलियोंके छिद्रसे ढलते | हुए सूर्यको देखे तथा उनके लिये आत्म - प्रदक्षिणा करके शुद्ध आचमन करे ॥ २६–२८ ॥ । सायंकालमें सूर्यास्तसे दो घड़ी पहले की हुई सन्ध्या निष्फल होती है; क्योंकि वह सायं सन्ध्याका समय नहीं है । ठीक समयपर सन्ध्या करनी चाहिये-अकालात्काल इत्युक्तो दिनेऽतीते यथाक्रमम् ॥ २ ९ | ऐसी शास्त्रकी आज्ञा है । यदि सन्ध्योपासना किये
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९ ४
दिवातीते च गायत्रीं शतं नित्यं क्रमाज्जपेत् ।
आदशाहात्परातीतं गायत्रीं लक्षमभ्यसेत् ॥
मासातीते तु नित्ये हि पुनश्चोपनयं चरेत् ।
ईशो गौरी गुहो विष्णुर्ब्रह्मा चन्द्रश्च वै यमः ॥
एवंरूपांश्च वै वै देवांस्तर्पयेदर्थसिद्धये ।
ब्रह्मार्पणं ततः कृत्वा शुद्धाचमनमाचरेत् ॥
तीर्थदक्षिणतः शस्ते मठे मन्त्रालये बुधः तत्र देवालये वापि गृहे वा नियतस्थले
सर्वान्देवान्नमस्कृत्य स्थिरबुद्धिः स्थिरासनः ।
प्रणवं पूर्वमभ्यस्य गायत्रीमभ्यसेत्ततः ॥
जीवब्रह्मैक्यविषयं बुद्ध्वा प्रणवमभ्यसेत् ।
त्रैलोक्यसृष्टिकर्तारं स्थितिकर्तारमच्युतम् ॥
संहर्तारं तथा रुद्रं स्वप्रकाशमुपास्महे ।
ज्ञानकर्मेन्द्रियाणां च मनोवृत्तीर्धियस्तथा ॥
भोगमोक्षप्रदे धर्मे ज्ञाने च प्रेरयेत्सदा ।
इत्थमर्थं धिया ध्यायन्ब्रह्म प्राप्नोति निश्चयम् ॥
केवलं वा जपेन्नित्यं ब्राह्मण्यस्य च पूर्तये । श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १३ | बिना दिन बीत जाय तो प्रत्येक समयके लिये क्रमशः ३० प्रायश्चित्त करना चाहिये । यदि एक दिन बीते हैं । | प्रत्येक बीते हुए सन्ध्याकालके लिये नित्य - नियमके अतिरिक्त सौ गायत्री - मन्त्रका अधिक जप करे । यदि नित्यकर्मके लुप्त हुए दस दिनसे अधिक बीत जाय तो उसके प्रायश्चित्तरूपमें एक लाख गायत्रीका जप करना चाहिये । यदि एक मासतक नित्यकर्म छूट जाय तो पुनः अपना उपनयनसंस्कार कराये ॥ २ ९ -३०१ / ३ ॥ ३१ अर्थसिद्धिके लिये ईश, गौरी, कार्तिकेय, विष्णु, ब्रह्मा, चन्द्रमा और यमका तथा ऐसे ही अन्य देवताओंक भी शुद्ध जलसे तर्पण करे । तत्पश्चात् तर्पण कर्मको ३२ ब्रह्मार्पण करके शुद्ध आचमन करे । तीर्थके दक्षिण भागमें प्रशस्त मठमें, मन्त्रालयमें, देवालयमें, घरमें अथवा अन्य ॥ ३३ किसी नियत स्थानमें आसनपर स्थिरतापूर्वक बैठका विद्वान् पुरुष अपनी बुद्धिको स्थिर करे और सम्पूर्ण देवताओंको नमस्कार करके पहले प्रणवका जप करनेके ३४ पश्चात् गायत्री मन्त्रकी आवृत्ति करे ॥ ३१–३४ ॥ प्रणवके अ, उ, म् इन तीनों अक्षरोंसे जीव और ३५ ब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन होता है— इस बातको जानका प्रणवका जप करना चाहिये । जपकालमें यह भावना करनी चाहिये कि हम तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, पालन करनेवाले विष्णु तथा संहार करनेवाले रुद्रकी — जो स्वयंप्रकाश चिन्मय हैं, उपासना करते हैं । ३६ यह ब्रह्मस्वरूप ओंकार हमारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंकी वृत्तियोंको, मनकी वृत्तियोंको तथा बुद्धिवृत्तियों को सर्व भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले धर्म एवं ज्ञानकी ओर प्रेरित करे । बुद्धिके द्वारा प्रणवके इस अर्थका चिन्तन ३७ करता हुआ जो इसका जप करता है, वह निश्चय ह ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है । अथवा अर्थानुसन्धानके बिन भी प्रणवका नित्य जप करना चाहिये, इससे ब्राह्मणत्वका । पूर्ति होती है । ब्राह्मणत्वकी पूर्तिके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणको सहस्रमभ्यसेन्नित्यं प्रातर्ब्राह्मणपुङ्गवः ॥ ३८ प्रतिदिन प्रात: काल एक सहस्र गायत्री मन्त्रका जप कर । चाहिये । मध्याह्नकालमें सौ बार और सायंकालमें अट्ठाईस बार जपकी विधि है । अन्य वर्णके लोगोंको अर्थात अन्येषां च यथाशक्ति मध्याह्ने च शतं जपेत् । क्षत्रिय और वैश्यको तीनों सन्ध्याओंके समय यथासाध्य सायं द्विदशकं ज्ञेयं शिखाष्टकसमन्वितम् ॥ ३ ९ गायत्री जप करना चाहिये ॥ ३५-३९ ॥
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अ ० १३ ] विद्येश्वरसंहिता ९ ५
मूलाधारं समारभ्य द्वादशांशस्थितांस्तथा ।
विद्येशब्रह्मविष्ण्वीशजीवात्मपरमेश्वरान् ॥
ब्रह्मबुद्धया तदैक्यं च सोऽहं भावनया जपेत् ।
तानेव ब्रह्मरन्ध्रादौ कायाद् बाह्ये च भावयेत् ॥
महत्तत्त्वं समारभ्य शरीरं तु सहस्त्रकम् ।
एकैकस्माज्जपादेकमतिक्रम्य शनैः शनैः ॥
परस्मिन्योजयेज्जीवं जपतत्त्वमुदाहृतम् ।
शतद्विदशकं देहं शिखाष्टकसमन्वितम् ॥
मन्त्राणां जप एवं हि जपमादिक्रमाद्विदुः ।
सहस्त्रं ब्राह्मदं विद्याच्छतमैन्द्रप्रदं विदुः ॥
इतरत्त्वात्मरक्षार्थं ब्रह्मयोनिषु जायते ।
दिवाकरमुपस्थाय नित्यमित्थं समाचरेत् ॥
लक्षद्वादशयुक्तस्तु पूर्णब्राह्मण ईरितः ।
गायत्र्या लक्षहीनं तु वेदकार्ये न योजयेत् ॥
आसप्ततेस्तु नियमं पश्चात्प्रव्राजनं चरेत् ।
प्रातर्द्वादशसाहस्त्रं प्रव्राजी प्रणवं जपेत् ॥
दिने दिने त्वतिक्रान्ते नित्यमेवं क्रमाज्जपेत् ।
मासादौ क्रमशोऽतीते सार्धलक्षजपेन हि ॥
अत ऊर्ध्वमतिक्रान्ते पुनः प्रैषं समाचरेत् ।
एवं कृत्वा दोषशान्तिरन्यथा रौरवं व्रजेत् ॥
[ शरीरके भीतर मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, ४० अनाहत, आज्ञा और सहस्रार - ये छ: चक्र हैं । ] इनमें मूलाधारसे लेकर सहस्रारतक छहों स्थानोंमें क्रमशः विद्येश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, ईश, जीवात्मा और परमेश्वर स्थित हैं । इन सबमें ब्रह्मबुद्धि करके इनकी एकताका ४१ निश्चय करे और वह ब्रह्म मैं हूँ — ऐसी भावनासे युक्त होकर जप करे । उन्हीं विद्येश्वर आदिकी ब्रह्मरन्ध्र आदिमें तथा इस शरीरसे बाहर भी भावना करे । महत्तत्त्वसे ४२ लेकर पंचभूतपर्यन्त तत्त्वोंसे बना हुआ जो शरीर है, ऐसे सहस्रों शरीरोंका एक - एक अजपा गायत्रीके जपसे एक-एकके क्रमसे अतिक्रमण करके जीवको धीरे - धीरे परमात्मासे संयुक्त करे - यह जपका तत्त्व बताया गया है । सौ अथवा ४३ अट्ठाईस मन्त्रोंके जपसे उतने ही शरीरोंका अतिक्रमण होता है । इस प्रकार जो मन्त्रोंका जप है, इसीको आदिक्रमसे वास्तविक जप जानना चाहिये ॥ ४० – ४३१/२ ॥ ४४ एक हजार बार किया हुआ जप ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाला होता है - ऐसा जानना चाहिये । सौ बार किया हुआ जप इन्द्रपदकी प्राप्ति करानेवाला माना गया ४५ है । ब्राह्मणेतर पुरुष आत्मरक्षाके लिये जो स्वल्पमात्रामें जप करता है, वह ब्राह्मणके कुलमें जन्म लेता है । इस प्रकार प्रतिदिन सूर्योपस्थान करके उपर्युक्तरूपसे जपका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ४४-४५ ॥ बारह लाख गायत्रीका जप करनेवाला पुरुष ४६ पूर्णरूपसे ब्राह्मण कहा गया है । जिस ब्राह्मणने एक लाख गायत्रीका भी जप न किया हो, उसे वैदिक कार्यमें न लगाये । सत्तर वर्षकी अवस्थातक नियमपालनपूर्वक कार्य करे । इसके बाद गृह त्यागकर संन्यास ले ले । परिव्राजक या संन्यासी पुरुष नित्य प्रातःकाल बारह ४७ हजार प्रणवका जप करे । यदि एक दिन नियमका उल्लंघन हो जाय, तो दूसरे दिन उसके बदलेमें उतना मन्त्र और अधिक जपना चाहिये; इस प्रकार जपको चलानेका प्रयत्न करना चाहिये । यदि क्रमशः एक मास उल्लंघनका ४८ व्यतीत हो गया हो तो डेढ़ लाख जप करके उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये । इससे अधिक समयतक नियमका उल्लंघन हो जाय तो पुनः नये सिरेसे गुरुसे नियम ग्रहण करे । ऐसा करनेसे दोषोंकी शान्ति होती है, अन्यथा ४ ९ रौरव नरकमें जाना पड़ता है ॥ ४६–४९ ॥
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९ ६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ] १३
धर्मार्थयोस्ततो यत्नं कुर्यात्कामी न चेतरः ।
ब्राह्मणो मुक्तिकामः स्याद् ब्रह्मज्ञानं सदाभ्यसेत् ॥ ५०
धर्मादर्थोऽर्थतो भोगो भोगाद्वैराग्यसम्भवः ।
धर्मार्जितार्थ भोगेन वैराग्यमुपजायते ॥ ५१
विपरीतार्थ भोगेन राग एव प्रजायते ।
धर्मश्च द्विविधः प्रोक्तो द्रव्यदेहद्वयेन च ॥ ५२
द्रव्यमिज्यादिरूपं स्यात्तीर्थस्नानादि दैहिकम् ।
धर्मेण धनमाप्नोति तपसा दिव्यरूपताम् ॥ ५३
निष्कामः शुद्धिमाप्नोति शुद्धया ज्ञानं न संशयः ।
कृतादौ हि तपः श्लाघ्यं द्रव्यधर्मः कलौ युगे ॥ ५४
कृते ध्यानाज्ज्ञानसिद्धिस्त्रेतायां तपसा तथा ।
द्वापरे यजनाज्ज्ञानं प्रतिमापूजया कलौ ॥५५
यादृशं पुण्यपापं वा तादृशं फलमेव हि ।
द्रव्यदेहाङ्गभेदेन न्यूनवृद्धिक्षयादिकम् ॥ ५६
अधर्मो हिंसिकारूपो धर्मस्तु सुखरूपकः ।
अधर्माद् दुःखमाप्नोति धर्माद्वै सुखमेधते ॥ ५७
विद्याद् दुर्वृत्तितो दुःखं सुखं विद्यात्सुवृत्तितः ।
धर्मार्जनमतः कुर्याद्भोगमोक्षप्रसिद्धये ॥ ५८ ।
सकुटुम्बस्य विप्रस्य चतुर्जनयुतस्य च ।
शतवर्षस्य वृत्तिं तु दद्यात्तद्ब्रह्मलोकदम् ॥ ५ ९
जो सकाम भावनासे युक्त गृहस्थ ब्राह्मण है, उसीको धर्म तथा अर्थके लिये यत्न करना चाहिये । मुमुक्षु ब्राह्मणको तो सदा ज्ञानका ही अभ्यास करना चाहिये । धर्मर अर्थकी प्राप्ति होती है, अर्थसे भोग सुलभ होता है और । उस भोगसे वैराग्यकी प्राप्ति होती है । धर्मपूर्वक उपार्जित धनसे जो भोग प्राप्त होता है, उससे एक दिन अवश्य वैराग्यका उदय होता है । धर्मके विपरीत अधर्मसे उपार्जित धनके द्वारा जो भोग प्राप्त होता है, उससे भोगोंके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है ॥ ५०-५११ / २ ॥ धर्म दो प्रकारका कहा गया है— द्रव्यके द्वारा सम्पादित होनेवाला और शरीरसे किया जानेवाला ॥ द्रव्यधर्म यज्ञ आदिके रूपमें और शरीरधर्म तीर्थ - स्नान आदिके रूपमें पाये जाते हैं । मनुष्य धर्मसे धन पाता है, तपस्यासे उसे दिव्य रूपकी प्राप्ति होती है । कामनाओंका त्याग करनेवाले पुरुषके अन्तःकरणकी शुद्धि होती है; उस शुद्धिसे ज्ञानका उदय होता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ५२-५३१ / २ ॥ सत्ययुग आदिमें तपको ही प्रशस्त कहा गया है, किंतु कलियुगमें द्रव्यसाध्य धर्म अच्छा माना गया है । सत्ययुगमें ध्यानसे, त्रेतामें तपस्यासे और द्वापरमें या करनेसे ज्ञानकी सिद्धि होती है, परंतु कलियुगमें प्रतिम ( भगवद्विग्रह ) -की पूजासे ज्ञानलाभ होता है ॥ ५४-५५ । जिसका जैसा पुण्य या पाप होता है, उसे वैस ही फल प्राप्त होता है । द्रव्य, देह अथवा अंगम न्यूनता, वृद्धि अथवा क्षय आदिके रूपमें वह फल प्रकट होता है ॥ ५६ ॥
अधर्म हिंसा ( दुःख ) - रूप है और धर्म सुखरूप है । मनुष्य अधर्मसे दुःख पाता है और धर्मसे सुख ख अभ्युदयका भागी होता है । दुराचारसे दुःख प्राप्त होता है और सदाचारसे सुख । अतः भोग और मोक्षकी सिद्धिने लिये धर्मका उपार्जन करना चाहिये ॥ ५७-५८ ॥ जिसके घरमें कम - से - कम चार मनुष्य हैं, ऐसे कुटुम्बी ब्राह्मणको जो सौ वर्षके लिये जीविका ( जीवन निर्वाहकी सामग्री ) देता है, उसके लिये वह दान ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला होता है । एक हजार
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अ ० १३ ] विद्येश्वरसंहिता ९ ७
चान्द्रायणसहस्त्रं तु ब्रह्मलोकप्रदं विदुः ।
सहस्रस्य कुटुम्बस्य प्रतिष्ठां क्षत्रियश्चरेत् ॥ ६०
इन्द्रलोकप्रदं विद्यादयुतं ब्रह्मलोकदम् ।
यां देवतां पुरस्कृत्य दानमाचरते नरः ॥ ६१
तत्तल्लोकमवाप्नोति इति वेदविदो विदुः ।
अर्थहीनः सदा कुर्यात्तपसामर्जनं तथा ॥ ६२
तीर्थाच्च तपसा प्राप्यं सुखमक्षय्यमश्नुते ।
अर्थार्जनमथो वक्ष्ये न्यायतः सुसमाहितः ॥ ६३
कृतात्प्रतिग्रहाच्चैव याजनाच्च विशुद्धतः ।
अदैन्यादनतिक्लेशाद् ब्राह्मणो धनमर्जयेत् ॥ ६४
क्षत्रियो बाहुवीर्येण कृषिगोरक्षणाद् विशः ।
न्यायार्जितस्य वित्तस्य दानात्सिद्धिं समश्नुते ॥ ६५
ज्ञानसिद्ध्या मोक्षसिद्धिः सर्वेषां गुर्वनुग्रहात् ।
मोक्षात्स्वरूपसिद्धिः स्यात्परानन्दं समश्नुते ॥ ६६
सत्सङ्गात्सर्वमेतद्वै नराणां जायते द्विजाः ।
धनधान्यादिकं सर्वं देयं वै गृहमेधिना ॥ ६७
यद्यत्काले वस्तुजातं फलं वा धान्यमेव च ।
तत्तत्सर्वं ब्राह्मणेभ्यो देयं वै हितमिच्छता ॥ ६८
जलं चैव सदा देयमन्नं क्षुद्व्याधिशान्तये ।
क्षेत्रं धान्यं तथामान्नमन्नमेव चतुर्विधम् ॥ ६ ९
यावत्कालं यदन्नं वै भुक्त्वा श्रवणमेधते ।
तावत्कृतस्य पुण्यस्य त्वर्धं दातुर्न संशयः ॥ ७०
2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_5_1_Front चान्द्रायण व्रतका अनुष्ठान ब्रह्मलोकदायक माना गया है । जो क्षत्रिय एक हजार कुटुम्बोंको जीविका और आवास देता है, उसका वह कर्म इन्द्रलोककी प्राप्ति करानेवाला होता है और दस हजार कुटुम्बोंको दिया हुआ आश्रयदान ब्रह्मलोक प्रदान करता है । दाता पुरुष जिस देवताके उद्देश्यसे दान करता है अर्थात् वह दानके द्वारा जिस देवताको प्रसन्न करना चाहता है, उसीका लोक उसे प्राप्त होता है - ऐसा वेदवेत्ता पुरुष कहते हैं । धनहीन पुरुष सदा तपस्याका उपार्जन करे; क्योंकि तपस्या और तीर्थसेवनसे अक्षय सुख पाकर मनुष्य उसका उपभोग करता है ॥ ५ ९ –६२१ / २ ॥ अब मैं न्यायतः धनके उपार्जनकी विधि बता रहा हूँ । ब्राह्मणको चाहिये कि वह सदा सावधान रहकर विशुद्ध प्रतिग्रह ( दानग्रहण ) तथा याजन ( यज्ञ कराने ) आदिसे धनका अर्जन करे । वह इसके लिये कहीं दीनता न दिखाये और न अत्यन्त क्लेशदायक कर्म ही करे । क्षत्रिय बाहुबलसे धनका उपार्जन करे और वैश्य कृषि एवं गोरक्षासे । न्यायोपार्जित धनका दान करनेसे दाताको ज्ञानकी सिद्धि होती है 1 ज्ञानसिद्धिद्वारा सब पुरुषोंको गुरुकृपासे मोक्षसिद्धि सुलभ होती है । मोक्षसे स्वरूपकी सिद्धि ( ब्रह्मरूपसे स्थिति ) प्राप्त होती है, जिससे [ मुक्त पुरुष ] परमानन्दका अनुभव करता है । हे द्विजो! मनुष्योंको यह सब सत्संगसे प्राप्त है ॥ ६३-६६१ / २ ॥ गृहस्थाश्रमीको धन - धान्य आदि सभी वस्तुओंका दान करना चाहिये । अपना हित चाहनेवाले गृहस्थको जिस कालमें जो फल अथवा धान्यादि वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥ वह तृषा - निवृत्तिके लिये जल तथा क्षुधारूपी रोगकी शान्तिके लिये सदा अन्नका दान करे । खेत, धान्य, कच्चा अन्न तथा भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य- ये चार प्रकारके सिद्ध अन्न दान करने चाहिये । जिसके अन्नको खाकर मनुष्य जबतक कथा - श्रवण आदि सद्धर्मका पालन करता है, उतने समयतक उसके किये हुए पुण्यफलका आधा भाग दाताको मिल जाता है; इसमें । संशय नहीं है ॥ ६ ९ -७० ॥
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९ ८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १३
ग्रहीता हि गृहीतस्य दानाद्वै तपसा तथा ।
पापसंशोधनं कुर्यादन्यथा रौरवं व्रजेत् ॥ ७१
आत्मवित्तं त्रिधा कुर्याद्धर्मवृद्ध्यात्मभोगतः ।
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं कर्म कुर्यात्तु धर्मतः ॥ ७२
वित्तस्य वर्धनं कुर्याद् वृद्धयंशेन हि साधकः ।
हितेन मितमेध्येन भोगं भोगांशतश्चरेत् ॥ ७३
कृष्यर्जिते दशांशं हि देयं पापस्य शुद्धये ।
शेषेण कुर्याद्धर्मादि अन्यथा रौरवं व्रजेत् ॥ ७४
अथवा पापबुद्धिः स्यात्क्षयं वा सस्यमेष्यति ।
वृद्धिवाणिज्यके देयं षडंशं हि विचक्षणैः ॥ ७५
शुद्धप्रतिग्रहे देयं चतुर्थांशं द्विजोत्तमैः ।
अकस्मादुत्थितेऽर्थे हि देयमर्थं द्विजोत्तमैः ॥ ७६
असत्प्रतिग्रहे सर्वं दुर्दानं सागरे क्षिपेत् ।
आहूय दानं कर्तव्यमात्मभोगसमृद्धये ॥ ७७
पृष्टं सर्वं सदा देयमात्मशक्त्यनुसारतः ।
जन्मान्तरे ऋणी हि स्याददत्ते पृष्टवस्तुनि ॥ ७८
परेषां च तथा दोषं न प्रशंसेद्विचक्षणः ।
विद्वेषेण तथा ब्रह्मन् श्रुतं दृष्टं च नो वदेत् ॥ ७ ९
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न वदेत्सर्वजन्तूनां हृदि रोषकरं बुधः ।
सन्ध्ययोरग्निकार्यं च कुर्यादैश्वर्यसिद्धये ॥ ८०
अशक्तस्त्वेककाले वा सूर्याग्नी च यथाविधि ।
तण्डुलं धान्यमाज्यं वा फलं कन्दं हविस्तथा ॥ ८१ ।
दान लेनेवाला पुरुष दानमें प्राप्त हुई वस्तुका दान तथा तपस्या करके अपने प्रतिग्रहजनित पापकी शुद्धि करे; अन्यथा उसे रौरव नरकमें गिरना पड़ता है । अपने | धनके तीन भाग करे - एक भाग धर्मके लिये, दूसरा भाग वृद्धिके लिये तथा तीसरा भाग अपने उपभोगके लिये । नित्य, नैमित्तिक और काम्य – ये तीनों प्रकारके कर्म धर्मार्थ रखे हुए धनसे करे । साधकको चाहिये कि वह वृद्धिके लिये रखे हुए धनसे ऐसा व्यापार करे, जिससे उस धनकी वृद्धि हो तथा उपभोगके लिये रक्षित धनसे हितकारक, परिमित एवं पवित्र भोग भोगे ॥ ७१ - ७३ ॥ खेतीसे पैदा किये हुए धनका दसवाँ अंश दान कर दे । इससे पापकी शुद्धि होती है । शेष धनसे धर्म, वृद्धि एवं उपभोग करे, अन्यथा वह रौरव नरकमें पड़ता है अथवा उसकी बुद्धि पापसे परिपूर्ण हो जाती है या खेती ही चौपट हो जाती है । वृद्धिके लिये किये गये व्यापारमें प्राप्त हुए धनका छठा भाग दान कर दे ॥ ७४-७५ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दानमें प्राप्त हुए शुद्ध पदार्थोंका चतुर्थांश दान कर देना चाहिये । उन्हें अकस्मात् प्राप्त हुए धनका तो आधा भाग दान कर ही देना चाहिये । असत् - प्रतिग्रह ( दूषित दान ) -में प्राप्त सम्पूर्ण पदार्थोंको समुद्रमें फेंक देना चाहिये । अपने भोगकी समृद्धिके लिये ब्राह्मणोंको बुलाकर दान करना चाहिये । किसीके द्वारा याचना करनेपर अपनी शक्तिके अनुसार सदैव ही सब कुछ देना चाहिये । यदि माँगे जानेपर [ शक्ति रहते हुए ] वह पदार्थ न दिया जाय तो दूसरे जन्ममें वह ऋण चुकाना पड़ता है॥७६–७८ ॥ विद्वान्को चाहिये कि वह दूसरोंके दोषोंका वर्णन न करे । हे ब्रह्मन्! द्वेषवश दूसरोंके सुने या देखे हुए छिद्रको भी प्रकट न करे । विद्वान् पुरुष ऐसी बात न कहे, जो समस्त प्राणियोंके हृदयमें रोष पैदा करनेवाली हो ॥ ७ ९ १ / २ ॥ ऐश्वर्यकी सिद्धिके लिये दोनों सन्ध्याओंके समय अग्निहोत्र करे, यदि असमर्थ हो तो वह एक ही समय सूर्य और अग्निको विधिपूर्वक दी हुई आहुतिसे सन्तुष्ट करे । चावल, धान्य, घी, फल, कन्द तथा हविष्य - इनके द्वारा विधिपूर्वक स्थालीपाक 2223 Shivmahapuranam_Part I_Section_5_1_Back