शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 1031–1040

शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040

पृष्ठ 1031

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१०२२ तान् वीक्ष्य विगतोत्साहानन्धकः प्रत्यभाषत दैत्यांस्तु हुंडहुंडादीन्महाधीरपराक्रमः अंधक उवाच कविं विक्रम्य नयता नन्दिना वंचिता वयम् तनूर्विना कृताः प्राणाः सर्वेषामद्य नो ननु धैर्यं वीर्यं गतिः कीर्तिः सत्त्वं तेजः पराक्रमः युगपन्नो हृतं सर्वमेकस्मिन् भार्गवे हृते धिगस्मान् कुलपूज्यो यैरेकोऽपि कुलसत्तमः गुरुः सर्वसमर्थश्च त्राता त्रातो न चापदि

तद्यूयमविलंब्येह युध्यध्वमरिभिः सह ।

वीरैस्तैः प्रमथैर्वीराः स्मृत्वा गुरुपदांबुजम् ॥

गुरोः काव्यस्य सुखदौ स्मृत्वा चरणपंकजौ ।

सूदयिष्याम्यहं सर्वान् प्रमथान् सह नन्दिना ॥

अद्यैतान् विवशान् हत्वा सहदेवैः सवासवैः ।

भार्गवं मोचयिष्यामि जीवं योगीव कर्मतः ॥

स चापि योगी योगेन यदि नाम स्वयं प्रभुः ।

शरीरात्तस्य निर्गच्छेदस्माकं शेषपालकः ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्यन्धकवचः श्रुत्वा दानवा मेघनिस्स्वनाः ।

प्रमथान् निर्दयाः प्राहुर्मर्तव्ये कृतनिश्चयाः ॥

सत्यायुषि न नो जातु शक्ताः स्युः प्रमथा बलात् ।

असत्यायुषि किं गत्वा त्यक्त्वा स्वामिनमाहवे ॥

ये स्वामिनं विहायातो बहुमानधना जनाः ।

यांति ते यांति नियतमंधतामिस्रमालयम् ॥

अयशस्तमसा ख्यातिं मलिनीकृत्य भूरिशः ।

इहामुत्रापि सुखिनो न स्युर्भग्ना रणाजिरे ॥

श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४८ । उन्हें उत्साहरहित देखकर महान् धैर्य तथा ॥ ७ पराक्रमसे युक्त अन्धकने हुण्ड, तुहुण्ड आदि दैत्योंसे इस प्रकार कहा —॥७ ॥

अन्धक बोला — अपने पराक्रमसे शुक्राचार्यको पकड़कर ले जाते हुए इस नन्दीने हमलोगोंको धोखा । दिया है, उसने निश्चय ही हमलोगोंको बिना प्राणके ॥ ८ कर दिया है । केवल एक शुक्राचार्यके हरण कर लिये । जानेसे हमलोगोंका धैर्य, ओज, कीर्ति, बल, तेज और ॥ ९ पराक्रम एक साथ ही नष्ट हो गया । हमलोगोंको धिक्कार है, जो कि हम कुलपूज्य, परम कुलीन, ॥ । १० सर्वसमर्थ, रक्षक एवं गुरुकी इस आपत्तिमें रक्षा न कर सके॥८–१० ॥ अत: तुम सब वीर करके बिना विलम्ब किये ११ साथ युद्ध करो ॥११ ॥

गुरु शुक्राचार्यके १२ स्मरणकर मैं नन्दीसहित दूँगा ॥ १२ ॥

गुरुके चरणकमलोंका स्मरण ही उन वीर शत्रु प्रमथगणोंके सुखद चरणकमलोंका सभी प्रमथोंको नष्ट कर आज मैं इन्द्रसहित देवताओंके साथ इन १३ प्रमथगणोंको मारकर इन्हें विवशकर शुक्राचार्यको इस प्रकार छुड़ाऊँगा, जिस प्रकार योगी कर्मसे जीवको छुड़ा देता है ॥१३ ॥

यद्यपि ऐसा भी सम्भव है कि हमलोगोंमेंसे १४ शेषका पालन करनेवाले महायोगी प्रभु शुक्र स्वयं योगबलसे शिवजीके शरीरसे निकल जायँ ॥१४ ॥

सनत्कुमार बोले — अन्धककी यह बात सुनकर मेघके समान गर्जना करनेवाले निर्दय दैत्य मरनेका १५ निश्चयकर प्रमथगणोंसे कहने लगे —॥१५ ॥

आयुके शेष रहनेपर प्रमथगण हमें बलपूर्वक १६ जीत नहीं सकते, किंतु यदि आयु समाप्त हो गयी है, तो स्वामीको युद्धभूमिमें छोड़कर भागनेसे क्या लाभ है? ॥ १६ ॥

अत्यन्त अहंकारी जो लोग अपने स्वामीको १७ छोड़कर चले जाते हैं, वे निश्चय ही अन्धतामिस्र नरकमें । गिरते हैं । युद्धभूमिसे भागनेवाले अपयशरूपी अन्धकारसे | अपनी ख्यातिको अत्यधिक मलिन करके इस लोक १८ एवं परलोकमें सुखी नहीं रहते हैं ॥ १७-१८ ॥

पृष्ठ 1032

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अ ० ४८ ] रुद्रसंहिता किं दानैः किं तपोभिश्च किं तीर्थपरिमज्जनैः

धरातीर्थे यदि स्नानं ।

संप्रधार्येति तद्वाक्यं दैत्यास्ते पुनर्भवमलापहे ॥ १ ९

ममंथुः प्रमथानाजौ दनुजास्तथा ।

तत्र बाणासिवज्रौघैः रणभेरीं निनाद्य च ॥ २०

कठिनैश्च शिलामयैः । भुशुण्डिभिंदिपालैश्च शक्तिभल्लपरश्वधैः खट्वांगैः पट्टिशैः शूलैर्लकुटैर्मुसलैरलम् ॥ २१

परस्परमभिघ्नन्तः ।

प्रचक्रुः कदनं महत् ॥ २२

कार्मुकाणां विकृष्टानां पततां च पतत्रिणाम् ।

भिंदिपालभुशुंडीनां क्ष्वेडितानां रवोऽभवत् ॥ २३

रणतूर्य्यनिनादैश्च गजानां बहुबृंहितैः । ह्वेषारवैर्हयानांश्च महान्कोलाहलोऽभवत् ॥ २४

अतिस्वनैरवापूरि द्यावाभूम्योर्यदन्तरम् ।

अभीरूणां च भीरूणां महारोमोद्गमोऽभवत् ॥ २५

गजवाजिमहारावस्फुटशब्दग्रहाणि च ।

भग्नध्वजपताकानि क्षीणप्रहरणानि च ॥ २६

रुधिरोद्गारचित्राणि व्यश्वहस्तिरथानि च ।

पिपासितानि सैन्यानि मुमूर्च्छरुभयत्र वै ॥ २७

अथ ते प्रमथा वीरा नंदिप्रभृतयस्तदा ।

बलेन जघ्नुरसुरान्सर्वान्प्रापुर्जयं मुने ॥ २८

दृष्ट्वा सैन्यं च प्रमथैर्भज्यमानमितस्ततः ।

दुद्राव रथमास्थाय स्वयमेवान्धको गणान् ॥ २ ९

शरासारप्रयुक्तैस्तैर्वज्रपातैर्नगा इव ।

प्रमथा नेशिरे चास्त्रैर्निस्तोया इव तोयदाः ॥ ३०

यान्तमायान्तमालोक्य दूरस्थं निकटस्थितम् ।

प्रत्येकं रोमसंख्याभिर्विव्याधेषुभिरन्धकः ॥ ३१

दृष्ट्वा सैन्यं भज्यमानमन्धकेन बलीयसा ।

स्कंदो विनायको नंदी सोमनंद्यादयः परे ॥ ३२

प्रमथा प्रबला वीराः शंकरस्य गणा निजाः ।

समरं चक्रुर्विचित्रं च महाबलाः ॥ ३३ ।

चुक्रुधुः ( युद्धखण्ड ) १०२३ पुनर्जन्मरूपी मलका नाश करनेवाले धरातीर्थ-युद्धतीर्थमें यदि मनुष्य स्नान कर लेता है, तो दान, तप एवं तीर्थस्नानसे क्या लाभ? इस प्रकार उन वाक्योंपर विचारकर दैत्य तथा दानव रणभेरी बजाकर प्रमथगणोंको युद्धभूमिमें पीड़ित करने लगे । युद्धमें उन्होंने बाण, खड्ग, वज्र, भयंकर शिलीमुख, भुशुण्डी, भिन्दिपाल, शक्ति भाला, परशु, खट्वांग, पट्टिश, त्रिशूल, दण्ड एवं मुसलोंसे, परस्पर प्रहार करते हुए घोर संहार किया ॥ १ ९ –२२ ॥ उस समय खींचे जाते हुए धनुषों, छोड़े जाते हुए बाणों, चलाये जाते हुए भिन्दिपालों एवं भुशुण्डियोंका शब्द हो रहा था । रणकी तुरहियोंके निनादों, हाथियोंके चिंघाड़ों तथा घोड़ोंकी हिनहिनाहटोंसे सर्वत्र महान् कोलाहल मच गया ॥ २३-२४ ॥ भूमि तथा आकाशके मध्य गूँजे हुए शब्दोंसे साहसी तथा कायर सभीको बहुत रोमांच होने लगा । वहाँ हाथी, घोड़ोंकी घोर ध्वनिसे स्पष्ट शब्द हो रहे थे, जिनसे ध्वज एवं पताकाएँ टूट गयीं तथा शस्त्र नष्ट हो गये ॥ २५-२६ ॥ खूनकी धारासे रणस्थली अद्भुत हो गयी, हाथी, घोड़े एवं रथ नष्ट हो गये और युद्धकी पिपासा रखनेवाली दोनों ओरकी सेनाएँ मूर्च्छित हो गयीं ॥ २७ ॥

हे मुने! उसके बाद नन्दी आदि प्रमथगणोंने अपने बलसे सभी दैत्योंको मारा और विजय प्राप्त की ॥ २८ ॥

इस प्रकार प्रमथोंके द्वारा अपनी सेनाको विनष्ट होता हुआ देखकर स्वयं अन्धक रथपर आरूढ़ हो शिवगणोंपर झपट पड़ा ॥२ ९ ॥ अन्धकके द्वारा प्रयुक्त किये गये बाणों तथा अस्त्रोंसे प्रमथगण इस प्रकार नष्ट हो गये, जिस प्रकार वज्रप्रहारसे पर्वत एवं पवनसे जलरहित मेघ नष्ट हो जाते हैं ॥ ३० ॥

अन्धकने आने - जानेवाले, दूरस्थ एवं निकटस्थ एक - एक गणको देखकर असंख्य बाणोंसे उन्हें विद्ध कर दिया । तब बलवान् अन्धकके द्वारा नाशको प्राप्त होती हुई अपनी सेनाको देखकर स्वामीकार्तिकेय, गणेश, नन्दीश्वर, सोमनन्दी आदि एवं दूसरे भी शिवजीके वीर प्रमथ तथा महाबली गण उठे और क्रुद्ध हो युद्ध करने लगे॥३१–३३ ॥

पृष्ठ 1033

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१०२४ विनायकेन स्कंदेन नंदिना सोमनंदिना वीरेण नैगमेयेन वैशाखेन बलीयसा इत्याद्यैस्तु गणैरुग्रैरंधकोऽप्यंधकीकृतः त्रिशूलशक्तिबाणौघधारासंपातपातिभिः ततः कोलाहलो जातः प्रमथासुरसैन्ययोः तेन शब्देन महता शुक्रः शंभूदरे स्थितः छिद्रान्वेषी भ्रमन्सोऽथ विनिकेतो यथानिलः श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४८ । उस समय गणेश, स्कन्द, नन्दी, सोमनन्दी , ॥ ३४ नैगमेय एवं वैशाख आदि उग्र गणोंने त्रिशूल, शक्ति । तथा बाणोंकी वर्षासे अन्धकको भी अन्धा कर ॥ ३५ दिया ॥ ३४-३५ ॥ । उस समय असुरों और प्रमथगणोंकी सेनाओंमें ॥ ३६ कोलाहल होने लगा । उस महान् शब्द द्वारा शिवजीके उदरमें स्थित हुए शुक्र अपने निकलनेका । रास्ता खोजते हुए शिवजीके उदरमें चारों ओर इस सप्तलोकान्सपातालान् रुद्रदेहे व्यलोकयत् ॥ ३७ प्रकार घूमने लगे, जिस प्रकार आधाररहित पवन ब्रह्मनारायणेन्द्राणां सादित्याप्सरसां तथा भुवनानि विचित्राणि युद्धं च प्रमथासुरम्

स वर्षाणां शतं कुक्षौ भवस्य परितो भ्रमन् ।

न तस्य ददृशे रन्ध्रं शुचे रन्ध्रं खलो यथा ॥

शांभवेनाथ योगेन शुक्ररूपेण भार्गवः ।

इमं मंत्रवरं जप्त्वा शंभोर्जठरपंजरात् ॥

निष्क्रान्तो लिङ्गमार्गेण प्रणनाम ततः शिवम् ।

गौर्य्या गृहीतः पुत्रार्थं तदविघ्नेश्वरीकृतः ॥

अथ काव्यं विनिष्क्रांतं शुक्रमार्गेण भार्गवम् ।

दृष्ट्वोवाच महेशानो विहस्य करुणानिधिः ॥

महेश्वर उवाच

शुक्रवन्निःसृतो यस्माल्लिंगान्मे भृगुनन्दन ।

कर्मणा तेन शुक्रस्त्वं मम पुत्रोऽसि गम्यताम् ॥

सनत्कुमार उवाच

इत्येवमुक्तो देवेन शक्रोऽर्कसदृशद्युतिः ।

प्रणनाम शिवं भूयस्तुष्टाव विहितांजलिः ॥

शुक्र उवाच अनंतपादस्त्वमनंतमूर्ति-रनंतमूर्द्धान्तकरः शिवश्च अनन्तबाहुः कथमीदृशं त्वां स्तोष्ये ह नुत्यं प्रणिपत्य मूर्ध्ना ॥ इधर - उधर भटकता है । उन्होंने शिवजीके देहमें सप्त । पातालसहित सात लोकोंको एवं ब्रह्मा, नारायण, इन्द्र, ॥ ३८ आदित्य तथा अप्सराओंके विचित्र भुवन तथा प्रमथों एवं असुरोंके युद्धको देखा ॥ ३६–३८ ॥ उन शुक्रने शिवजीके उदरमें चारों ओर सौ ३ ९ वर्षपर्यन्त घूमते हुए भी कहीं कोई छिद्र वैसे ही नहीं प्राप्त किया, जैसे दुष्ट व्यक्ति पवित्र व्यक्तिमें कोई छिद्र नहीं देख पाता । तब शिवजीसे प्राप्त किये गये ४० योगसे श्रेष्ठ मन्त्रका जप करके भृगुकुलोत्पन्न वे शुक्राचार्य शिवजीके उदरसे उनके लिंगमार्गसे शुक्र ( वीर्य ) -रूपसे निकले और उन्होंने शिवजीको प्रणाम किया । इसके बाद पार्वतीने पुत्ररूपसे उन्हें ग्रहण ४१ किया और उन्हें विघ्नरहित कर दिया ॥ ३ ९ –४१ ॥ तब लिंगसे वीर्यरूपमें निकले हुए शुक्रको ४२ देखकर दयासागर शिवजी हँसकर उनसे कहने लगे —॥४२ ॥

महेश्वर बोले — हे भृगुनन्दन! आप मेरे लिंगसे वीर्यरूपमें निकले हैं, इस कारण आपका नाम शुक्र ४३ हुआ और आप मेरे पुत्र हुए, अब जाइये ॥ ४३ ॥

सनत्कुमार बोले — शिवजीके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सूर्यके समान कान्तिमान् शुक्रने शिवको पुनः ४४ प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की ॥ ४४ ॥

शुक्र बोले- आप अनन्त चरणवाले, अनन्त मूर्तिवाले, अनन्त सिरवाले, अन्त करनेवाले, कल्याण-| स्वरूप, अनन्त बाहुवाले तथा अनन्त स्वरूपवाले हैं, | इस प्रकार सिर झुकाकर प्रणाम करनेयोग्य आपकी ४५ स्तुति मैं कैसे करूँ । आप अष्टमूर्ति होते हुए भी

पृष्ठ 1034

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अ ० ४ ९ ] रुद्रसंहिता त्वमष्टमूर्तिस्त्वमनन्तमूर्ति-स्त्वमिष्टदः सर्वसुरासुराणाम्

अनिष्टदृष्टेश्च विमर्दकश्च ।

स्तोष्ये ह नुत्यं कथमीदृशं त्वाम् ॥ ४६

सनत्कुमार उवाच

इति स्तुत्वा शिवं शुक्रः पुनर्नत्वा शिवाज्ञया ।

विवेश दानवानीकं मेघमालां यथा शशी ॥ ४७

निगीर्णनमिति प्रोक्तं शंकरेण कवे रणे ।

शृणु मंत्रं च तं जप्तो यः शंभो: कविनोदरे ॥ ४८

( युद्धखण्ड ) १०२५ अनन्तमूर्ति हैं, आप सभी देवताओं तथा असुरोंको वांछित फल देनेवाले तथा अनिष्ट दृष्टिवालेका करनेवाले हैं, इस प्रकार सर्वथा प्रणाम किये जानेयोग्य संहार आपकी स्तुति मैं किस प्रकार करूँ ॥ ४५-४६ ॥ सनत्कुमार बोले — इस प्रकार शिवकी स्तुतिकर उन्हें पुनः नमस्कार करके शुक्रने शिवकी आज्ञासे दानवोंकी सेनामें इस प्रकार प्रवेश किया, जिस प्रकार मेघमालामें चन्द्रमा प्रवेश करता है ॥ ४७ ॥

[ हे व्यासजी! ] इस प्रकार मैंने युद्धमें शिवजीके द्वारा शुक्रके निगल जानेका वर्णन किया, अब उस मन्त्रको सुनिये, जिसे शिवजीके उदरमें शुक्रने | जपा था ॥ ४८ ॥

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे शुक्रनिगीर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके ॥ ४८ ॥

पंचम युद्धखण्डमें शुक्रनिगीर्णन नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४८ ॥

अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः शुक्राचार्यद्वारा शिवके उदरमें जपे गये मन्त्रका वर्णन, अन्धकद्वारा भगवान् शिवकी नामरूपी स्तुति - प्रार्थना, भगवान् शिवद्वारा अन्धकासुरको जीवनदानपूर्वक गाणपत्य पद प्रदान करना सनत्कुमार उवाच ॐ नमस्ते देवेशाय सुरासुरनमस्कृताय भूतभव्यमहादेवाय हरितपिंगललोचनाय बलाय बुद्धिरूपिणे वैयाघ्रवसनच्छदायारणेयाय त्रैलोक्यप्रभवे ईश्वराय हराय हरिनेत्राय युगान्त-करणायानलाय गणेशाय लोकपालाय महाभुजाय महाहस्ताय शूलिने महादंष्ट्रिणे कालाय महेश्वराय अव्ययाय कालरूपिणे नीलग्रीवाय महोदराय गणाध्यक्षाय सर्वात्मने सर्वभावनाय सर्वगाय मृत्युहंत्रे पारियात्रसुव्रताय ब्रह्मचारिणे वेदान्तगाय [ शुक्राचार्यने भगवान् शिवके उदरमें जिस मन्त्रका जप किया था, उस मन्त्रका भावार्थ इस प्रकार है— ] सनत्कुमार बोले - [ हे महर्षे ] ‘ ॐ जो देवताओंके स्वामी, सुर - असुरद्वारा वन्दित, भूत और भविष्यके महान् देवता, हरे और पीले नेत्रोंसे युक्त, महाबली, बुद्धिस्वरूप, बाघम्बर धारण करनेवाले, अग्निस्वरूप, त्रिलोकीके उत्पत्तिस्थान, ईश्वर, हर, हरिनेत्र, प्रलयकारी, अग्निस्वरूप, गणेश, लोकपाल, महाभुज, महाहस्त, त्रिशूल धारण करनेवाले, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले, कालस्वरूप, महेश्वर, अविनाशी, कालरूपी, नीलकण्ठ, महोदर, गणाध्यक्ष, सर्वात्मा, सबको उत्पन्न करनेवाले, सर्वव्यापी, मृत्युको हटानेवाले, पारियात्र पर्वतपर उत्तम व्रत धारण करनेवाले, ब्रह्मचारी, वेदान्तप्रतिपाद्य, तपकी अन्तिम सीमातक पहुँचनेवाले, तपोन्तगाय व्यंगाय शूलपाणये । पशुपति, विशिष्ट अंगोंवाले, शूलपाणि, वृषध्वज, पशुपतये पापापहारी, जटाधारी, शिखण्ड धारण करनेवाले, वृषकेतवे हरये जटिने शिखंडिने लकुटिने

पृष्ठ 1035

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१०२६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ ९ महायशसे भूतेश्वराय गुहावासिने वीणापणवतालवते | दण्डधारी, महायशस्वी, भूतेश्वर, गुहामें निवास करनेवाले. अमराय दर्शनीयाय बालसूर्य - निभायं श्मशानवासिने वीणा और पणवपर ताल लगानेवाले, अमर, दर्शनीय, भगवते उमापतये अरिन्दमाय भगस्याक्षिपातिने बालसूर्य - सरीखे रूपवाले, श्मशानवासी, ऐश्वर्यशाली उमापति, शत्रुदमन, भगके नेत्रोंको नष्ट कर देनेवाले, पूष्णोर्दशननाशनाय क्रूरकर्तकाय पाशहस्ताय पूषाके दाँतोंके विनाशक, क्रूरतापूर्वक संहार करनेवाले, प्रलयकालाय उल्कामुखायाग्निकेतवे मुनये दीप्ताय पाशधारी, प्रलयकालरूप, उल्कामुख, अग्निकेतु, विशांपतये उन्नयते जनकाय चतुर्थकाय मननशील, प्रकाशमान, प्रजापति, ऊपर उठानेवाले, लोकसत्तमाय वामदेवाय वाग्दाक्षिण्याय वामतो भिक्षवे भिक्षुरूपिणे जटिने स्वयं जटिलाय शक्रहस्तप्रतिस्तंभकाय वसूनां स्तंभकाय क्रतवे क्रतुकराय कालाय मेधाविने मधुकराय चलाय वानस्पत्याय वाजसनेति समाश्रमपूजिताय जगद्धात्रे जगत्कर्त्रे पुरुषाय शाश्वताय ध्रुवाय धर्माध्यक्षाय त्रिवर्त्मने भूतभावनाय त्रिनेत्राय बहुरूपाय सूर्यायुतसमप्रभाय देवाय सर्वतूर्य -निनादिने सर्वबाधाविमोचनाय बंधनाय सर्वधारिणें धर्मोत्तमाय पुष्पदंतायाविभागाय मुखाय सर्वहराय हिरण्यश्रवसे द्वारिणे भीमाय भीम-71. पराक्रमाय ॐ नमो नमः ।

इमं मन्त्रवरं जप्त्वा शुक्रो जठरपंजरात् ।

निष्क्रान्तो लिंगमार्गेण शंभोः शुक्रमिवोत्कटम् ॥ १

गौर्या गृहीतः पुत्रार्थं विश्वेशेन ततः कृतः ।

अजरश्चामरः श्रीमान्द्वितीय 1 इव शंकरः ॥ २

1133 त्रिभिर्वर्षसहस्त्रैस्तु समतीतैर्महीतलेः । महेश्वरात्पुनर्जातः शुक्रो वेदनिधिर्मुनिः ॥ ३.

ददर्श शूले संशुष्कं ध्यायन्तं परमेश्वरम् ।

अंधकं धैर्यसंपन्नं दानवेशं तपस्विनम् ॥ ४ ।

महादेवं विरूपाक्षं चन्द्रार्द्धकृतशेखरम् ।

अमृतं शाश्वतं स्थाणुं नीलकंठं पिनाकिनम् ॥ ५

वृषभाक्षं महाज्ञेयं पुरुषं । सर्वकामदम् ॥ 11

कामारिं कामदहनं कामरूपं कपर्दिनम् ॥: ६ । जीवोंको उत्पन्न करनेवाले, तुरीयतत्त्वरूप, लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ, वामदेव, वाणीकी चतुरतारूप, वाममार्गमें भिक्षुरूप, भिक्षुक, जटाधारी, जटिल - दुराराध्य, इन्द्रके हाथको स्तम्भित करनेवाले, वसुओंको विजडित कर देनेवाले, यज्ञस्वरूप, यज्ञकर्ता, काल, मेधावी, मधुकर, चलने - फिरनेवाले, वनस्पतिका आश्रय लेनेवाले, वाजसन नामसे सम्पूर्ण आश्रमोंद्वारा पूजित, जगद्धाता, जगत्कर्ता, सर्वान्तर्यामी, सनातन, ध्रुव, धर्माध्यक्ष, भूः - भुवः - स्वः– इन तीनों लोकोंमें विचरनेवाले, भूतभावन, त्रिनेत्र, बहुरूप, दस हजार सूर्योंके समान प्रभाशाली, महादेव, सब तरहके बाजे बजानेवाले, सम्पूर्ण बाधाओंसे विमुक्त करनेवाले, बन्धनस्वरूप, सबको धारण करनेवाले, उत्तम धर्मरूप, पुष्पदन्त, विभागरहित, मुख्यरूप, सबका हरण करनेवाले, सुवर्णके समान दीप्त कीर्तिवाले, मुक्तिके द्वारस्वरूप, भीम तथा भीमपराक्रमी हैं, उन्हें नमस्कार है, नमस्कार है । ' - इस श्रेष्ठ मन्त्रका जप करके शिवजीके जठरपंजरसे उनके लिंगमार्गसे उत्कट वीर्यकी भाँति शुक्राचार्य बाहर आये ॥१ ॥

पार्वतीने उन्हें पुत्ररूपमें ग्रहण किया और विश्वेश्वरने उन्हें अजर - अमर एवं ऐश्वर्यमय बनाकर दूसरे शिव समान कर दिया ॥ २ ॥

इस प्रकार तीन हजार वर्ष बीत जानेपर वेदनिधि मुनि शुक्र महेश्वरसे पुनः पृथ्वीपर उत्पन्न हुए ॥ ३ ॥

तब उन्होंने शिवके त्रिशूलपर अत्यन्त शुक शरीरवाले, महाधैर्यवान् और तपस्वी दानवराज अन्धक शिवजीका ध्यान करते हुए देखा ॥४ ॥

[ वह शिवजीके १०८ नामोंका इस प्रकार स्मरण कर रहा था ], महादेव, विरूपाक्ष, चन्द्रार्धकृतशेखर अमृत, शाश्वत, स्थाणु, ' नीलकण्ठ, पिनाकी, वृषभाक्ष, महाज्ञेय, पुरुष, सर्वकामद, कामारि, कामदहन, कामरूप,

पृष्ठ 1036

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अ ० ४ ९ ] रुद्रसंहिता विरूपं गिरिशं भीमं स्रग्विणं रक्तवाससम्

योगिनं कालदहनं त्रिपुरघ्नं ।

गूढव्रतं गुप्तमंत्रं गंभीरं कपालिनम् ॥ ७

भावगोचरम् ।

अणिमादिगुणाधारं त्रिलोकैश्वर्यदायकम् ॥ ८

वीरं वीरहणं घोरं विरूपं मांसलं पटुम् ।

महामांसादमुन्मत्तं भैरवं वै महेश्वरम् ॥ ९

त्रैलोक्यद्रावणं लुब्धं लुब्धकं यज्ञसूदनम् । कृत्तिकानां सुतैर्युक्तमुन्मत्तं कृत्तिवाससम् गजकृत्तिपरीधानं ॥ १०

क्षुब्धं भुजगभूषणम् ।

दत्तालंबं च वेतालं घोरं शाकिनिपूजितम् ॥ ११

अघोरं घोरदैत्यघ्नं घोरघोषं वनस्पतिम् ।

भस्माङ्ग जटिलं शुद्धं भेरुंडशतसेवितम् ॥ १२

भूतेश्वरं भूतनाथं पञ्चभूताश्रितं खगम् ।

क्रोधितं निष्ठुरं चण्डं चण्डीशं चण्डिकाप्रियम् ॥ १३

चण्डं तुंगं गरुत्मन्तं नित्यमासवभोजनम् ।

लेलिहानं महारौद्रं मृत्युं मृत्योरगोचरम् ॥ १४

मृत्योर्मृत्युं महासेनं श्मशानारण्यवासिनम् ।

रागं विरागं रागांधं वीतरागशतार्चितम् ॥ १५

सत्त्वं रजस्तमोधर्ममधर्मं वासवानुजम् ।

सत्यं त्वसत्यं सद्रूपमसद्रूपमहेतुकम् ॥ १६

अर्द्धनारीश्वरं भानुं भानुकोटिशतप्रभम् । १. यज्ञं यज्ञपतिं रुद्रमीशानं वरदं शिवम् ॥ १७

अष्टोत्तरशतं ह्येतन्मूर्तीनां परमात्मनः ।

शिवस्य दानवो ध्यायन् मुक्तस्तस्मान्महाभयात् ॥ १८

दिव्येनामृतवर्षेण सोऽभिषिक्तः कपर्द्दिना ।

तुष्टेन मोचितं तस्माच्छूलाग्रादवरोपितः ॥ १ ९

उक्तश्चाथ महादैत्यो महेशानेन सोऽन्धकः ।:: असुरः सांत्वपूर्वं यत्कृतं सर्वं महात्मना ॥२० ईश्वर उवाच

भोः भो दैत्येन्द्र तुष्टोऽस्मि यमेन नियमेन च ।

शौर्येण तव धैर्येण वरं वरय सुव्रत ॥ २१

आराधितस्त्वया नित्यं सर्वनिर्धूतकल्मषः ।

वरदोऽहं वरार्हस्त्वं महादैत्येन्द्रसत्तम ॥ २२

प्राणसंधाराणादस्तिः यच्च पुण्यफलं तव ॥

त्रिभिर्वर्षसहस्त्रैस्तु तेनास्तु तव निर्वृतिः ॥ २३ ।

( युद्धखण्ड ) १०२७ | कपर्दी, विरूप, गिरिश, भीम, स्रग्वी, रक्तवासा कालदहन, त्रिपुरघ्न, कपाली, गूढव्रत, योगी, , गुप्तमन्त्र, गम्भीर, भावगोचर, अणिमादि गुणाधार, त्रिलोकैश्वर्यदायक, वीर, वीरहण, घोर, विरूप, मांसल, पटु, महामांसाद, उन्मत्त, भैरव, महेश्वर, त्रैलोक्यद्रावण, लुब्ध, लुब्धक, यज्ञसूदन, कृत्तिकासुतयुक्त, उन्मत्त, कृत्तिवासा, गजकृत्तिपरीधान, क्षुब्ध, भुजगभूषण, दत्तालम्ब, वेताल, घोर, शाकिनीपूजित, अघोर, घोर दैत्यघ्न, घोरघोष, वनस्पति, भस्मांग, जटिल, शुद्ध, भेरुण्डशतसेवित, भूतेश्वर, भूतनाथ, पंचभूताश्रित, खग, क्रोधित, निष्ठुर, चण्ड, चण्डीश, चण्डिकाप्रिय, चण्ड, तुंग, गरुत्मान्, नित्य आसवभोजन, लेलिहान, महारौद्र, मृत्यु, मृत्योरगोचर, मृत्योर्मृत्यु, महासेन, श्मशानारण्यवासी, राग, विराग, रागान्ध, वीतरागशतार्चित, सत्त्व, रज, तम, धर्म, अधर्म, वासवानुज, सत्य, असत्य, सद्रूप, असद्रूप, अहेतुक, अर्धनारीश्वर, भानु, भानुकोटि-शतप्रभ, यज्ञ, यज्ञपति, रुद्र, ईशान, वरद और शिव– इस प्रकार परमात्मा शिवजीकी इन एक सौ आठ मूर्तियोंका ध्यान करता हुआ वह दैत्य उस महाभयसे मुक्त हो गया॥५–१८ ॥ प्रसन्न हुए शिवजीने दिव्य अमृतकी वर्षासे उसका अभिषेक किया और उस त्रिशूलके अग्रभागसे उसे उतारा और महात्मा शिवजीने वह सब कृत्य उस महादैत्य अन्धकसे शान्तिपूर्वक कहा, जिसे उन्होंने पहले किया था ॥ १ ९ -२० ॥ ईश्वर बोलें हे दैत्येन्द्र । ' ' हे ' सुव्रत । ' मैं तुम्हारे यम, नियम, शौर्य एवं धैर्यसे ' अत्यन्त ' ' प्रसन्न हूँ, तुम वर माँगो । हे श्रेष्ठ महादैत्येन्द्र! तुमने निष्पाप होकर नित्य मेरी आराधना की है, तुम वरके योग्य हो, इसलिये मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ । इस प्रकार तीन सहस्र वर्षपर्यन्त प्राणधारण करनेका तुम्हारा जोः पुण्यफल है, उससे तुम्हारी मुक्तिः हो जाय ॥ २१ - २३ ।

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१०२८ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ४ ९ सनत्कुमार उवाच

एतच्छ्रुत्वान्धकः प्राह वेपमानः कृतांजलिः ।

भूमौ जानुद्वयं कृत्वा भगवन्तमुमापतिम् ॥ २४

अंधक उवाच

भगवन्यन्मयोक्तोऽसि दीनो हीनः परात्परः ।

हर्षगद्गदया वाचा मया पूर्वं रणाजिरे ॥ २५

यद्यत्कृतं विमूढत्वात्कर्म लोकेषु गर्हितम् ।

अजानता त्वां तत्सर्वं प्रभो मनसि मा कृथाः ॥ २६

पार्वत्यामपि दुष्टं यत्कामदोषात्कृतं मया ।

क्षम्यतां मे महादेव कृपणो दुःखितो भृशम् ॥ २७

दुःखितस्य दया कार्या कृपणस्य विशेषतः ।

दीनस्य भक्तियुक्तस्य भवता नित्यमेव हि ॥ २८

सोऽहं दीनो भक्तियुक्त आगतः शरणं तव ।

रक्षा मयि विधातव्या रचितोऽयं मयाञ्जलिः ॥ २ ९

इयं देवी जगन्माता परितुष्टा ममोपरि ।

क्रोधं विहाय सकलं प्रसन्ना मां निरीक्षताम् ॥ ३०

क्वास्याः क्रोधः क्व कृपणो दैत्योऽहं चन्द्रशेखर ।

तत्सोढा नाहमर्द्धेन्दुचूड शंभो महेश्वर ॥ ३१

क्व भवान्परमोदारः क्व चाहं विवशीकृतः ।

कामक्रोधादिभिर्दोषैर्जरसा मृत्युना तथा ॥ ३२

अयं ते वीरकः पुत्रो युद्धशौंडो महाबलः ।

कृपणं मां समालक्ष्य मा मन्युवशमन्वगाः ॥३३

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तुषारहारशीतांशुशंखकुन्देन्दुवर्णभाक् ।

पश्येयं पार्वतीं नित्यं मातरं गुरुगौरवात् ॥ ३४

नित्यं भवद्भ्यां भक्तस्तु निर्वैरो दैवतैः सह ।

निवसेयं गणैः सार्द्धं शांतात्मा योगचिंतकः ॥ ३५

मा स्मरेयं पुनर्जातं विरुद्धं दानवोद्भवम् । ।

त्वत्कृपातो महेशान देह्येतद्वरमुत्तमम् ॥ ३६

सनत्कुमार बोले- यह सुनकर अन्धक पृथ्वीपर दोनों घुटनोंको टेककर काँपते हुए हाथ जोड़कर उमापति शिवजीसे कहा- ॥ २४ ॥

अन्धक बोला — हे भगवन्! मैंने इससे पूर्वमें आप परात्पर परमात्माको युद्धक्षेत्रमें प्रसन्न गद्गद वाणीसे दीन, हीन इत्यादि जो कहा है एवं हे शम्भो! मूर्ख होनेके कारण अज्ञानवश इस लोकमें जो - जो निन्दित कर्म किया है, उसे आप अपने मनमें न रखें ॥ २५-२६ ॥ हे महादेव! मैंने कामविकारसे पार्वतीके प्रति अपराध किया है, उसे क्षमा करें; क्योंकि मैं अत्यन्त कृपण एवं दुखी हूँ ॥ २७ ॥

हे प्रभो! अत्यन्त दुखित, कृपण, दीन एवं भक्तिसे युक्त जनपर आपको विशेष रूपसे दया करनी चाहिये ॥ २८ ॥

मैं दीन आपकी शरणमें आया हूँ, अतः मेरी रक्षा कीजिये । मैंने हाथ जोड़ रखे हैं ॥ २ ९ ॥ मुझपर सन्तुष्ट होनेवाली जगज्जननी ये देवी समस्त क्रोध त्यागकर मेरे ऊपर प्रसन्न होकर मुझे देखें ॥ ३० ॥

हे चन्द्रशेखर! हे अर्धेन्दुचूड! हे शम्भो! हे महेश्वर! कहाँ तो इन महादेवीका क्रोध और कहाँ मैं दयाका पात्र दैत्य, फिर भी आप मेरा अपराध क्षमा करते रहें ॥ ३१ ॥

कहाँ आप जैसे परमोदार और कहाँ काम, क्रोधादि दोषों एवं मृत्यु तथा वृद्धावस्थाके वशीभूत रहनेवाला मैं । [ हे प्रभो! ] आपका यह युद्धकुशल तथा महाबली पुत्र वीरक मुझ दयापात्रको देखकर अब क्रोध न MA तुषार चन्द्र, शंख तथा कुछ कुन्दके समान स्वच्छ वर्णवाले इन माता अत्यन्त आदरसे नित्य देखा करूँ । अब मैं आप दोनोंका सदा भक्त होकर तथा देवताओंके साथ वैररहित होकर शान्तचित्त और योगपरायण हो इन गणोंके साथ निवास करूँ ॥ ३४-३५ ॥ हे महेशान! आपकी कृपासे मैं दानवकुलमें उत्पन्न होनेके कारण किये गये विपरीत कर्मोंका स्मरण कभी न करूँ, आप मुझे यह उत्तम वर दीजिये ॥ ३६ ॥

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अ ० ५० ] रुद्रसंहिता सनत्कुमार उवाच ।

एतावदुक्त्वा वचनं दैत्येन्द्रो मौनमास्थितः ।

ध्यायंस्त्रिलोचनं देवं पार्वतीं प्रेक्ष्य मातरम् ॥ ३७

ततो दृष्टस्तु रुद्रेण प्रसन्नेनैव चक्षुषा । स्मृतवान्पूर्ववृत्तांतमात्मनो जन्म चाद्भुतम् ॥ ३८

तस्मिन्स्मृते च वृत्तान्ते ततः पूर्णमनोरथः ।

प्रणम्य मातापितरौ कृतकृत्योऽभवत्ततः ॥ ३ ९

पार्वत्या मूर्व्युपाघ्रातः शंकरेण च धीमता ।

तथाऽभिलषितं लेभे तुष्टाद् बालेन्दुशेखरात् ॥ ४०

एतद्वः सर्वमाख्यातमन्धकस्य पुरातनम् ।

गाणपत्यं महादेवप्रसादात्परसौख्यदम् ॥ ४१

मृत्युंजयश्च कथितो मंत्रो मृत्युविनाशनः ।

पठितव्यः प्रयत्नेन सर्वकामफलप्रदः ॥ ४२

( युद्धखण्ड ) १०२ ९ सनत्कुमार बोले- इतना कहकर उस दैत्येन्द्रने माता पार्वतीकी ओर देखकर भगवान् शिवका ध्यान करते हुए मौन धारण कर लिया । तदनन्तर शिवजीने प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे उसे देखा, तब उसे अपने पूर्ववृत्तान्त तथा अद्भुत जन्मका स्मरण हो आया ॥ ३७-३८ ॥ इस प्रकार उस पूर्ववृत्तान्तका स्मरण होनेपर वह पूर्णमनोरथवाला हो गया और माता - पिताको प्रणामकर कृतकृत्य हो गया । इसके बाद बुद्धिमान् शिवजी तथा पार्वतीने उसका मस्तक सूँघा और उसने प्रसन्न हुए सदाशिवसे अभिलषित वर प्राप्त किया । [ हे वेदव्यासजी! ] इस प्रकार मैंने अन्धकका सारा पुरातन वृत्तान्त और शंकरजीकी कृपासे उसे सुख देनेवाले गाणपत्य पदकी प्राप्तिका वर्णन किया और सभी कामनाओंका फल देनेवाले तथा मृत्युका विनाश करनेवाले मृत्युंजय मन्त्रको भी मैंने कहा, इसको । यत्नपूर्वक पढ़ना ( जपना ) चाहिये ॥ ३ ९ —४२ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे अंधकगणजीवन-प्राप्तिवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४ ९ ॥। ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें अन्धकगणजीवप्राप्तिवर्णन नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ९ ॥ अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः शुक्राचार्यद्वारा काशीमें शुक्रेश्वर लिंगकी स्थापनाकर उनकी आराधना करना, मूर्त्यष्टक स्तोत्रसे उनका स्तवन, शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी विद्या प्रदान करना और सनत्कुमार उवाच

शृणु व्यास यथा प्राप्ता मृत्युप्रशमनी परा ।

विद्या काव्येन मुनिना शिवान्मृत्युञ्जयाभिधात् ॥

पुरासौ भृगुदायादो गत्वा वाराणसीं पुरीम् ।

बहुकालं तपस्तेपे ध्यायन्विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥

स्थापयामास तत्रैव लिंगं शंभोः परात्मनः ।

कूपं चकार सद्रम्यं वेदव्यास तदग्रतः ॥

पंचामृतैर्द्रोणमितैर्लक्षकृत्वः । प्रयत्नत्तः । ग्रहोंके मध्य प्रतिष्ठित करना: । ' : सनत्कुमार, बोले- [ हे व्यास! ], मृत्युंजय नामक शिवजीसे, जिस प्रकार शुक्राचार्य मुनिने १ मृत्युनाशिनी व की, उसे, आप सुनें । पूर्वकालमें भृगुपुत्र शुक्राचार्य वाराणसीपुरीमें जाकर विश्वेश्वर प्रभुका ध्यान करते हुए दीर्घकालतक २ तप करते रहे॥१-२ ॥ हे वेदव्यास! उन्होंने वहाँ परमात्मा शिवका लिंग स्थापित किया और उसके सामने एक मनोहर ३ कूपका निर्माण करवाया । उन्होंनेः 1 । द्रोण- परिमाणके पंचामृतसे उन देवेशको एक लाख बार स्नान करवाया

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१०३० ( श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५० स्नापयामास देवेशं सुगंधस्नपनैर्बहु ॥ ४

सहस्रकृत्वो देवेशं चन्दनैर्यक्षकर्दमैः ।

समालिलिंप सुप्रीत्या सुगन्धोद्वर्त्तनान्यनु ॥ ५

राजचंपकधत्तूरैः करवीरकुशेशयैः ।

मालतीकर्णिकारैश्च कदंबैर्बकुलोत्पलैः ॥ ६

मल्लिकाशतपत्रीभिस्सिंधुवारैः सकिंशुकैः ।

बन्धूकपुष्पैः पुन्नागैर्नागकेशरकेशरैः ॥ ७

नवमल्लीचिबिलिकैः कुंदैः समुचुकुन्दकैः ।

मन्दारैर्बिल्वपत्रैश्च द्रोणैर्मरुबकैर्बृकैः ।

ग्रन्थिपणैर्दमनकैः सुरम्यैश्चूतपल्लवैः ॥ ८

तुलसीदेवगंधारीबृहत्पत्रीकुशांकुरैः प्रत्र नंद्यावर्तैरगस्त्यैश्च सशालैर्देवदारुभिः ॥ ९

कांचनारैः कुरबकैर्दूर्वांकुरकुरुंटकैः ।

प्रत्येकमेभिः कुसुमैः पल्लवैरपरैरपि ॥ १०

पत्रैः सहस्रपत्रैश्च रम्यैर्नानाविधैः शुभैः ।

सावधानेन सुप्रीत्या स समानर्च शंकरम् ॥ ११

गीतनृत्योपहारैश्च संस्तुतः स्तुतिभिर्बहु ।

नाम्नां सहस्त्रैरन्यैश्च स्तोत्रैस्तुष्टाव शंकरम् ॥ १२

सहस्त्रं पञ्चशरदामित्थं शुक्रो महेश्वरम् ।

नानाप्रकारविधिना महेशं स समर्चयत् ॥ १३

यदा देवं नानुलोके मनागपि वरोन्मुखम् ।

तदान्यं नियमं घोरं जग्राहातीव दुःसहम् ॥ १४

प्रक्षाल्य चेतसोऽत्यन्तं चांचल्याख्यं महामलम् ।

भावनावार्भिरसकृदिन्द्रियैः सहितस्य च ॥ १५

निर्मलीकृत्य तच्चेतो रत्नं दत्त्वा पिनाकिने ।

प्रपपौ कणधूमौघं सहस्रं शरदां कविः ॥१६

काव्यमित्थं तपो घोरं कुर्वन्तं दृढमानसम् ।

प्रससाद स तं वीक्ष्य भार्गवाय महेश्वरः ॥ १७

तस्माल्लिंगाद्विनिर्गत्य सहस्रार्काधिकद्युतिः । 11

उवाच तं विरूपाक्षः साक्षाद्दाक्षायणीपतिः ॥ १८

महेश्वर उवाच

तपोनिधे महाभाग भृगुपुत्र महामुने । ।

तपसानेन ते नित्यं प्रसन्नोऽहं विशेषतः ॥ १ ९

* ' कर्पूरागरुकस्तूरीकङ्कोलैर्यक्षकर्दमः । ' ( अमरकोश ) और कंकोलको समान मात्रामें मिलाकर बनाया जाता है । | और इसी प्रकार नाना प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंसे भी एक लाख बार स्नान करवाया । उन्होंने देवेशका चन्दन, यक्षकर्दम * और सुगन्धित उबटनसे हजारों बार प्रीतिपूर्वक अनुलेपन किया ॥ ३-५ ॥ उन्होंने राजचम्पक, धतूरा, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदम्ब, बकुल, उत्पल, मल्लिका, शतपत्री, सिन्धुवार, किंशुक, बन्धूकपुष्प, पुन्नाग, केशर, नागकेशर, नवमल्ली, चिबिलिक, कुन्द, मुचुकुन्द, मन्दार, बेलपत्र, द्रोण, मरुबक, वृक, ग्रन्थिपर्ण, दमनक, सुरम्य आम्रपत्र, तुलसी, देवगन्धारी, बृहत्पत्री, कुशांकुर, नन्द्यावर्त, अगस्त्य, साल, देवदारु, कचनार, कुरबक, दूर्वांकुर, कुरुण्टक – इन प्रत्येक पुष्पोंसे तथा अनेक प्रकारके दूसरे मनोहर पल्लवों, पत्तों तथा कमलोंसे सावधानचित्त हो प्रीतिपूर्वक शिवजीका पूजन किया ॥ ६-११ ॥ तदनन्तर उन्होंने गीत, नृत्य, उपहार, बहुत - सी स्तुतियों, शिवसहस्रनामस्तोत्र तथा अन्य स्तुतियोंसे शिवजीको प्रसन्न किया । इस प्रकार शुक्राचार्य पाँच हजार वर्षपर्यन्त नाना प्रकारकी अर्चनविधिसे महेश्वर शिवकी पूजा करते रहे ॥ १२-१३ ॥ जब उन्होंने शिवजीको वरदानके लिये थोड़ा भी उन्मुख न देखा, तब अत्यन्त कठिन दूसरा नियम धारण किया । भावनारूपी जलसे इन्द्रियोंसहित चित्तके चांचल्यरूपी महान् दोषको धोकर उस चित्तरूप महारलको निर्मल करके शिवजीके लिये अर्पण करके शुक्राचार्य हजारों वर्षपर्यन्त तुषाग्निजन्य धूमराशिका पान करने लगे ॥ १४–१६ ॥ इस प्रकार दृढ़ मनवाला होकर घोर तप करते हुए उनको देखकर शिवजी शुक्राचार्यपर अत्यन्त प्रसन्न हो गये और हजारों सूर्योंसे भी अधिक तेजवाले दाक्षायणीपति विरूपाक्ष शिवजी उस लिंगसे प्रकट होकर कहने लगे- ॥ १७-१८ ॥ महेश्वर बोले — हे तपोनिधे! हे महाभाग! हे महामुने! हे भृगुपुत्र! मैं आपके इस तपसे विशेषरूपसे प्रसन्न हूँ । हे भार्गव! आप अपना मनोभिलषित एक प्रकारका सुगन्धित अंगलेप, जो कपूर, अगरु, कस्तूरी

पृष्ठ 1040

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अ ० ५० ] रुद्रसंहिता (

मनोऽभिलषितं सर्वं वरं वरय भार्गव ।

प्रीत्या दास्येऽखिलान्कामान्नादेयं विद्यते तव ॥ २०

सनत्कुमार उवाच निशम्येति वचः शंभोर्महासुखकरंपरम् । स बभूव कविस्तुष्टो निमग्नः सुखवारिधौ ॥ २१ उद्यदानंदसंदोहरोमांचांचितविग्रहः प्रणनाम मुदा शंभुमंभोजनयनो द्विजः ॥ २२

तुष्टावाष्टतनुं तुष्टः प्रफुल्लनयनांचलः ।

मौलावञ्जलिमाधाय वदन् जय जयेति च ॥ २३

भार्गव उवाच त्वं भाभिराभिरभिभूय तमः समस्त-मस्तं नयस्यभिमतानि निशाचराणाम् । देदीप्यसे दिवमणे गगने हिताय लोकत्रयस्य जगदीश्वर तन्नमस्ते ॥ २४ लोकेऽतिवेलमतिवेलमहामहोभि-र्निर्भासि कौ च गगनेऽखिललोकनेत्रः । विद्राविताखिलतमाः सुतमो हिमांशो पीयूषपूरपरिपूरित तन्नमस्ते ॥ २५ त्वं पावने पथि सदा गतिरप्युपास्यः कस्त्वां विना भुवनजीवन जीवतीह । स्तब्धप्रभंजनविवर्द्धितसर्वजंतोः संतोषिताहिकुलसर्वग वै नमस्ते ॥ २६ विश्वैकपावक नतावक पावकैक-15:

। शक्तेः ऋते मृतवतामृतदिव्यकार्यम् ।

प्राणिष्यदो जगदहो जगदंतरात्मं-स्त्वं पावकः प्रतिपदं शमदो नमस्ते ॥ २७ ।

( क्षेत्रज्ञ युद्धखण्ड ) १०३१ समस्त वर माँगिये, मैं प्रसन्न होकर आपकी सभी कामनाएँ पूर्ण करूँगा । आपके लिये कुछ भी अदेय नहीं है ॥ १ ९ -२० ॥ सनत्कुमार बोले- शिवजीके इस अत्यन्त सुख देनेवाले श्रेष्ठ वचनको सुनकर शुक्राचार्य हर्षित हो गये और आनन्दसमुद्रमें निमग्न हो गये ॥२१ ॥

कमलके समान नेत्रवाले तथा हर्षातिरेकसे रोमांचित विग्रहवाले शुक्राचार्यने प्रसन्नतापूर्वक शिवजीको प्रणाम किया और प्रफुल्लित नेत्रोंवाला होकर सिरपर अंजलि लगाकर जय - जयकार करते हुए बड़ी प्रसन्नतासे वे अष्टमूर्ति * शिवजीकी स्तुति करने लगे— ॥ २२-२३ ॥ ॥ भार्गव बोले- हे जगदीश्वर! आप अपने तेजसे समस्त अन्धकारको दूरकर रातमें विचरण करनेवाले राक्षसोंके मनोरथोंको नष्ट कर देते हैं । हे दिनमणे! आप त्रिलोकीका हित करनेके लिये आकाशमें सूर्यरूपसे प्रकाशित हो रहे हैं; ऐसे आपको नमस्कार है ॥२४ ॥

हे हिमांशो! आप पृथ्वी तथा आकाशमें समस्त प्राणियोंके नेत्र बनकर चन्द्ररूपसे विराजमान हैं और लोकमें व्याप्त अन्धकारका नाश करनेवाले एवं अमृतकी किरणोंसे युक्त हैं । हे अमृतमय! आपको नमस्कार है ॥ २५ ॥

हे भुवनजीवन! आप पावनपथ – योगमार्गका आश्रय लेनेवालोंकी सदा गति तथा उपास्यदेव हैं । इस जगत्में आपके बिना कौन जीवित रह सकता है । आप वायुरूपसे समस्त प्राणियोंका वर्धन करनेवाले

और सर्पकुलोंको सन्तुष्ट करनेवाले हैं । हे सर्वव्यापिन् ।

आपको नमस्कार है ॥२६ ॥

विश्वके एकमात्र पावनकर्ता हे शरणागतरक्षक! यदि आपकी एकमात्र पावर्क ( पवित्र करनेवाली ' एवं ' दांहिका ) शक्ति न रहे, तो मरनेवालोंको मोक्ष प्रदान कौन करे? हे जगदन्तरात्मन्! आप ही समस्त प्राणियोंके भीतर वैश्वानर नामक पावक ( अग्निरूप ) हैं और उन्हें पग - पगपर शान्ति प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥२७ ॥

या आत्मा ), चन्द्रमा और सूर्य -इन आठोंमें अधिष्ठित शर्व, * पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान - ये अष्टमूर्तियोंके नाम हैं । भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव और ईशान