शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 1081–1085
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1085
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१०७२ इति ते वर्णितं तात चरितं परमाद्भुतम् शिवयोर्भक्तवात्सल्यसूचकं शिवदं सताम् ॥ ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वामन्त्र्य तं व्यासं तन्नुतो मद्वरात्मजः । ययौ विहायसा काशीं चरितं शशिमौलिनः
युद्धखंडमिदं प्रोक्तं मया ते मुनिसत्तम ।
रौद्रीयसंहितामध्ये सर्वकामफलप्रदम् ॥
इयं हि संहिता रौद्री सम्पूर्णा वर्णिता मया ।
सदाशिवप्रियतरा भुक्तिमुक्तिफलप्रदा ॥
इमां यश्च पठेन्नित्यं शत्रुबाधानिवारिकाम् ।
सर्वान्कामानवाप्नोति ततो मुक्तिं लभेत ना ॥
सूत उवाच
इति ब्रह्मसुतः श्रुत्वा पित्रा शिवयशः परम् ।
शतनामाप्य शंभोश्च कृतार्थोऽभूच्छिवानुगः ॥
ब्रह्मनारदसंवादः सम्पूर्णः कथितो मया ।
शिवः सर्वप्रधानो हि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ५ ९ । हे तात! भक्तोंपर कृपालुताका सूचक, सज्जनोंका ३६ कल्याण करनेवाला तथा परम अद्भुत शिव - पार्वतीका यह चरित्र मैंने आपसे कहा ॥ ३६ ॥
ब्रह्माजी बोले— [ हे नारद! ] इस प्रकार शिवजीके चरित्रका वर्णनकर, उन व्यासजीसे ॥ ३७ अनुज्ञा लेकर और उनसे वन्दित होकर मेरे श्रेष्ठ पुत्र सनत्कुमार आकाशमार्गसे शीघ्र ही काशीको चले गये ॥ ३७ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! रुद्रसंहिताके अन्तर्गत सब कामनाओं ३८ और सिद्धियोंको पूर्ण करनेवाले इस युद्धखण्डका वर्णन मैंने आपसे किया । शिवको अत्यन्त सन्तुष्ट करनेवाली तथा भुक्ति - मुक्तिको देनेवाली इस सम्पूर्ण ३ ९ रुद्रसंहिताका वर्णन मैंने आपसे किया ॥ ३८-३९ ॥ जो मनुष्य शत्रुबाधाका निवारण करनेवाली इस ४० रुद्रसंहिताको नित्य पढ़ता है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त करता है और उसके बाद मुक्तिको प्राप्त कर लेता है ॥४० ॥
सूतजी बोले- इस प्रकार ब्रह्माके पुत्र नारदजी अपने पितासे शिवजीके परम यश तथा ४१ शिवके शतनामोंको सुनकर कृतार्थ एवं शिवानुगामी हो गये ॥४१ ॥
मैंने यह ब्रह्मा और नारदजीका सम्पूर्ण संवाद आपसे कहा । शिवजी सम्पूर्ण देवताओंमें प्रधान हैं, ४२ । अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ॥४२ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखण्डे विदलोत्पलदैत्यवधवर्णनं नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिताके पंचम युद्धखण्डमें विदल और उत्पलदैत्यवधवर्णन नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ९ ॥ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयरुद्रसंहितायां पञ्चमो युद्धखण्डः समाप्तः ॥ ॥ समाप्तेयं द्वितीया रुद्रसंहिता ॥ २ ॥
॥ श्रीशिवमहापुराण - प्रथम खण्ड - पूर्वार्ध सम्पूर्ण ॥
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