शिव महापुराण - १ — पृष्ठ 81–90
शिव महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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अ ० ८ ] विद्येश्वरसंहिता ६ ९ सवै वै गृहीत्वैककरेण केशं तत्पञ्चमं दृप्तमसत्यभाषिणम् । छित्त्वा शिरो ह्यस्य निहन्तुमुद्यतः प्रकम्पयन् खड्गमतिस्फुटं करैः ॥ पिता तवोत्सृष्टविभूषणाम्बर-स्वगुत्तरीयामलकेशसंहतिः प्रवातरम्भेव तेव चञ्चलः पपात वै भैरवपादपङ्कजे ॥ तावद्विधिं तात दिदृक्षुरच्युतः कृपालुरस्मत्पतिपादपल्लवम् निषिच्य बाष्पैरवदत् कृताञ्जलि -यथा शिशुः स्वं पितरं कलाक्षरम् ॥ अच्युत उवाच त्वया प्रयत्नेन पुरा हि दत्तं यदस्य पञ्चाननमीश चिह्नम् । तस्मात् क्षमस्वाद्यमनुग्रहार्हं कुरु प्रसादं विधये ह्यमुष्मै ॥
इत्यर्थितोऽच्युतेनेशस्तुष्टः सुरगणाङ्गणे ।
निवर्तयामास तदा भैरवं ब्रह्मदण्डतः ॥
अथाह देवः कितवं विधिं विगतकन्धरम् ।
ब्रह्मंस्त्वमर्हणाकाङ्क्षी शठेशत्वं समास्थितः ॥
नातस्ते सत्कृतिर्लोके भूयात् स्थानोत्सवादिकम् । ब्रह्मोवाच स्वामिन् प्रसीदाद्य महाविभूते मन्ये वरं मे शिरसः प्रमोक्षम् ॥
नमस्तुभ्यं भगवते बन्धवे विश्वयोनये ।
सहिष्णवे च दोषाणां शम्भवे शैलधन्वने ॥
ईश्वर उवाच
अराजभयमेतद्वै जगत् सर्वं नशिष्यति ।
ततस्त्वं जहि दण्डार्हं वह लोकधुरं शिशो ॥
वरं ददामि ते तत्र गृहाण दुर्लभं परम् ।
वैतानिकेषु गृह्येषु यज्ञेषु च भवान् गुरुः ॥
निष्फलस्त्वदृते यज्ञः साङ्गश्च सहदक्षिणः । तब भैरव एक हाथसे [ ब्रह्माके ] केश पकड़कर असत्य भाषण करनेवाले उनके उद्धत पाँचवें सिरको काटकर हाथोंमें तलवार भाँजते हुए उन्हें मार ४ डालनेके लिये उद्यत हुए ॥४ ॥
[ हे सनत्कुमार! ] तब आपके पिता अपने आभूषण, वस्त्र, माला, उत्तरीय एवं निर्मल बालोंके बिखर जानेसे आँधीमें झकझोरे हुए केलेके पेड़ और लतागुल्मोंके ५ समान कम्पित होकर भैरवके चरण - कमलोंपर गिर पड़े । हे तात! तब ब्रह्माकी रक्षा करनेकी इच्छासे कृपालु विष्णुने मेरे स्वामी भगवान् शंकरके चरणकमलोंको अपने अश्रु - जलसे भिगोते हुए हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना की, जैसे एक छोटा बालक अपने ६ पिताके प्रति टूटी - फूटी वाणीमें करता है॥५-६ ॥ अच्युत बोले - [ हे ईश! ] आपने ही पहले कृपापूर्वक इन ब्रह्माको पंचाननरूप प्रदान किया था । इसलिये ये आपके अनुग्रह करनेयोग्य हैं, इनका अपराध क्षमा करें और इनपर प्रसन्न हों ॥ ७ ॥
७ भगवान् अच्युतके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर शिवजीने प्रसन्न होकर देवताओंके ८ सामने ही ब्रह्माको दण्डित करनेसे भैरवको रोक दिया । शिवजीने एक सिरसे विहीन कपटी ब्रह्मासे कहा— हे ब्रह्मन्! तुम श्रेष्ठता पानेके चक्करमें ९ शठेशत्वको प्राप्त हो गये हो । इसलिये संसारमें तुम्हारा सत्कार नहीं होगा और तुम्हारे मन्दिर तथा पूजनोत्सव आदि नहीं होंगे ॥ ८ - ९ १ / २ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे महाविभूतिसम्पन्न स्वामिन्! आप मुझपर प्रसन्न होइये; मैं [ आपकी कृपासे ] अपने सिरके कटनेको भी आज श्रेष्ठ समझता हूँ । १० विश्वके कारण, विश्वबन्धु, दोषोंको सह लेनेवाले और पर्वतके समान कठोर धनुष धारण करनेवाले ११ आप भगवान् शिवको नमस्कार है ॥ १०-११ ॥ ईश्वर बोले — हे वत्स! अनुशासनका भय नहीं रहनेसे यह सारा संसार नष्ट हो जायगा । अतः तुम दण्डनीयको दण्ड दो और इस संसारकी व्यवस्था १२ चलाओ । तुम्हें एक परम दुर्लभ वर भी देता हूँ, जिसे ग्रहण करो । अग्निहोत्र आदि वैतानिक और गृह्य यज्ञोंमें १३ आप ही श्रेष्ठ रहेंगे । सर्वांगपूर्ण और पुष्कल दक्षिणावाला यज्ञ भी आपके बिना निष्फल होगा ॥ १२-१३१ / २ ॥
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७० अथाह देवः कितवं केतकं कूटसाक्षिणम् ॥ रे रे केतक दुष्टस्त्वं शठ दूरमितो व्रज ममापि प्रेम ते पुष्पे माभूत्पूजास्वितः परम् इत्युक्ते तत्र देवेन केतकं देवजातयः । सर्वा निवारयामासुस्तत्पार्श्वादन्यतस्तदा केतक उवाच
नमस्ते नाथ मे जन्म निष्फलं भवदाज्ञया ।
सफलं क्रियतां तात क्षम्यतां मम किल्बिषम् ॥
ज्ञानाज्ञानकृतं पापं नाशयत्येव ते स्मृतिः ।
तादृशे त्वयि दृष्टे मे मिथ्यादोषः कुतो भवेत् ॥
तथा स्तुतस्तु भगवान् केतकेन सभास्थले ।
न मे त्वद्धारणं योग्यं सत्यवागहमीश्वरः ॥
मदीयास्त्वां धरिष्यन्ति जन्म ते सफलं ततः ।
त्वं वै वितानव्याजेन ममोपरि भविष्यसि ॥
इत्यनुगृह्य भगवान् केतकं विधिमाधवौ ।
विरराज सभामध्ये सर्वदेवैरभिष्टुतः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ १४ तब भगवान् शिवने झूठी गवाही देनेवाले कपटी | केतक पुष्पसे कहा - अरे शठ केतक! तुम दुष्ट हो । यहाँसे दूर चले जाओ । मेरी पूजामें उपस्थित तुम्हारा ॥ १५ फूल मुझे प्रिय नहीं होगा | कहते ही सभी देवताओंने ॥ १६ हटाकर अन्यत्र भेज दिया केतक बोला - हे है । आपकी आज्ञाके कारण । शिवजीद्वारा इस प्रकार केतकीको उनके पाससे
।
॥ १४–१६ ॥
नाथ! आपको नमस्कार | मेरा तो जन्म ही निष्फल हो गया है । हे तात! मेरा अपराध क्षमा करें और मेरा १७ जन्म सफल कर दें । जाने - अनजानेमें हुए पाप आपके स्मरणमात्रसे नष्ट हो जाते हैं, फिर ऐसे प्रभावशाली १८ आपके साक्षात् दर्शन करनेपर भी मेरे झूठ बोलनेका दोष कैसे रह सकता है? ॥ १७-१८ ॥ उस सभास्थलमें केतक पुष्पके इस प्रकार १ ९ स्तुति करनेपर भगवान् सदाशिवने कहा- मैं सत्य बोलनेवाला हूँ, अतः मेरे द्वारा तुझे धारण किया जाना उचित नहीं है, किंतु मेरे ही अपने ( विष्णु आदि २० देवगण ) तुम्हें धारण करेंगे और तुम्हारा जन्म सफल होगा और मण्डप आदिके बहाने तुम मेरे ऊपर भी उपस्थित रहोगे ॥ १ ९ -२० ॥ इस प्रकार भगवान् शंकर ब्रह्मा, विष्णु और केतकी पुष्पपर अनुग्रह करके सभी देवताओंसे स्तुत २१ । होकर सभामें सुशोभित हुए ॥२१ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां शिवानुग्रहवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें शिवकी कृपाका वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः महेश्वरका ब्रह्मा और विष्णुको अपने निष्कल और सकल स्वरूपका परिचय देते हुए नन्दिकेश्वर उवाच
तत्रान्तरे तौ च नाथं प्रणम्य विधिमाधवौ ।
बद्धाञ्जलिपुटौ तूष्णीं तस्थतुर्दक्षवामगौ ॥
तत्र संस्थाप्य तौ देवं सकुटुम्बं वरासने ।
पूजयामासतुः पूज्यं पुण्यैः पुरुषवस्तुभिः ॥
लिंगपूजनका महत्त्व बताना नन्दिकेश्वर बोले — वे दोनों — ब्रह्मा और विष्णु । भगवान् शंकरको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर । १ उनके दायें - बायें भागमें चुपचाप खड़े हो गये । फिर | उन्होंने वहाँ [ साक्षात् प्रकट ] पूजनीय महादेवजीको | कुटुम्बसहित श्रेष्ठ आसनपर स्थापित करके पवित्र २ पुरुष - वस्तुओं द्वारा उनका पूजन किया ॥ १-२ ॥
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अ ० ९ ] विद्येश्वरसंहिता ७१
पौरुषं प्राकृतं वस्तु ज्ञेयं दीर्घाल्पकालिकम् ।
हारनूपुरकेयूरकिरीटमणिकुण्डलैः ॥
यज्ञसूत्रोत्तरीयस्त्रक्क्षौममाल्याङ्गुलीयकैः 1 पुष्पताम्बूलकर्पूरचन्दनागुरुलेपनैः ॥ धूपदीपसितच्छत्रव्यजनध्वजचामरैः अन्यैर्दिव्योपहारैश्च वाङ्मनोतीतवैभवैः ॥
पतियोग्यैः पश्चलभ्यैस्तौ समार्चयतां पतिम् ।
यद्यच्छ्रेष्ठतमं वस्तु पतियोग्यं हितध्वज ॥
तद्वस्त्वखिलमीशोऽपि पारम्पर्यचिकीर्षया ।
सभ्यानां प्रददौ हृष्टः पृथक् तत्र यथाक्रमम् ॥
कोलाहलो महानासीत्तत्र तद्वस्तु गृह्यताम् ।
तत्रैव ब्रह्मविष्णुभ्यां चार्चितः शङ्करः पुरा ॥
प्रसन्नः प्राह तौ नम्रौ सस्मितं भक्तिवर्धनः । ईश्वर उवाच तुष्टोऽहमद्य वां वत्सौ पूजयास्मिन् महादिने ॥
दिनमेतत्ततः पुण्यं भविष्यति महत्तरम् ।
शिवरात्रिरिति ख्याता तिथिरेषा मम प्रिया ॥
एतत्काले तु यः कुर्यात् पूजां मल्लिङ्गवेरयोः । कुर्यात् स जगतः कृत्यं स्थितिसर्गादिकं पुमान् दीर्घकालतक अविकृतभावसे सुस्थित रहनेवाली ३ वस्तुओंको पुरुषवस्तु कहते हैं और अल्पकालतक ही टिकनेवाली वस्तुएँ प्राकृतवस्तु कहलाती हैं- इस तरह वस्तुके ये दो भेद जानने चाहिये । [ किन पुरुष-वस्तुओंसे उन्होंने भगवान् शिवका पूजन किया, यह बताया जाता है— ] हार, नूपुर, केयूर, किरीट, ४ मणिमय कुण्डल, यज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र, पुष्प-माला, रेशमी वस्त्र, हार, मुद्रिका ( अँगूठी ), पुष्प, ताम्बूल, कपूर, चन्दन एवं अगुरुका अनुलेप, धूप, दीप, श्वेतछत्र, व्यजन, ध्वजा, चँवर तथा अन्यान्य दिव्य उपहारोंद्वारा उन दोनोंने अपने स्वामी महेश्वरका ५ पूजन किया, जिन महेश्वरका वैभव वाणी और मनकी पहुँचसे परे था, जो केवल पशुपति परमात्माके ही योग्य थे और जिन्हें पशु ( बद्ध जीव ) नहीं पा सकते थे ॥ ३–५१ / २ ॥ ६ हे सनत्कुमार! स्वामीके योग्य जो - जो उत्तम वस्तुएँ थीं, उन सभी वस्तुओंका भगवान् शंकरने भी प्रसन्नतापूर्वक यथोचित रूपसे सभासदोंके बीच वितरण कर दिया, जिससे यह श्रेष्ठ परम्परा बनी रहे कि प्राप्त ७ पदार्थोंका वितरण आश्रितोंमें करना चाहिये । उन वस्तुओंको ग्रहण करनेवाले सभासदोंमें वहाँ कोलाहल ८ मच गया । इस प्रकार वहाँ पहले ही ब्रह्मा तथा विष्णुसे पूजित हुए भक्तिवर्धक भगवान् शिव विनम्र उन दोनों देवताओंसे हँसकर कहने लगे ॥ ६-८१ / २ ॥ ईश्वर बोले - – हे पुत्रो! आजका दिन महान् ९ है । इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुमलोगोंपर बहुत प्रसन्न हूँ । इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान् - से - महान् होगा । आजकी यह तिथि शिवरात्रिके नामसे विख्यात होकर मेरे लिये १० परम प्रिय होगी॥९ -१० ॥ इस समय जो मेरे लिंग ( निष्कल - अंग-आकृतिसे रहित निराकार स्वरूपके प्रतीक ) और वेर ( सकल - साकाररूपके प्रतीक विग्रह ) - की पूजा करेगा, वह पुरुष जगत्की सृष्टि और पालन आदि कार्य भी ॥ ११ | कर सकता है ॥ ११ ॥
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७२ शिवरात्रावहोरात्रं निराहारो जितेन्द्रियः अर्चयेद्वा यथान्यायं यथाबलमवञ्चकः यत्फलं मम पूजायां वर्षमेकं निरन्तरम् तत्फलं लभते सद्यः शिवरात्रौ मदर्चनात्
मद्धर्मवृद्धिकालोऽयं चन्द्रकाल इवाम्बुधेः ।
प्रतिष्ठाद्युत्सवो यत्र मामको मङ्गलायनः ॥
यत्पुनः स्तम्भरूपेण स्वाविरासमहं पुरा ।
स कालो मार्गशीर्षे तु स्यादार्द्राऋक्षमर्भकौ ॥
आर्द्रायां मार्गशीर्षे तु यः पश्येन्मामुमासखम् ।
मद्वेरमपि वा लिङ्गं स गुहादपि मे प्रियः ॥
अलं दर्शनमात्रेण फलं तस्मिन् दिने शुभे ।
अभ्यर्चनं चेदधिकं फलं वाचामगोचरम् ॥
रणरङ्गतलेऽमुष्मिन् यदहं लिङ्गवर्ष्मणा ॥
जृम्भितो लिङ्गवत्तस्माल्लिङ्गस्थानमिदं भवेत् ॥
अनाद्यन्तमिदं स्तम्भमणुमात्रं भविष्यति ।
दर्शनार्थं हि जगतां पूजनार्थं हि पुत्रकौ ॥
भोगावहमिदं लिङ्गं भुक्तिमुक्त्येकसाधनम् ।
दर्शनस्पर्शनध्यानाज्जन्तूनां जन्ममोचनम् ॥
अनलाचलसङ्काशं यदिदं लिङ्गमुत्थितम् ।
अरुणाचलमित्येव तदिदं ख्यातिमेष्यति ॥
अत्र तीर्थं च बहुधा भविष्यति महत्तरम् ।
मुक्तिरप्यत्र जन्तूनां वासेन मरणेन च ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ । जो शिवरात्रिको दिन - रात निराहार एवं जितेन्द्रिय ॥ १२ रहकर अपनी शक्तिके अनुसार निष्कपट भावसे मेरी यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलनेवाले फलका वर्णन । । सुनो । एक वर्षतक निरन्तर मेरी पूजा करनेपर जो फल ॥ १३ मिलता है, वह सारा फल केवल शिवरात्रिको मेरा पूजन । करनेसे मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता है ॥ १२-१३ ॥ जैसे पूर्ण चन्द्रमाका उदय समुद्रकी वृद्धिका १४ अवसर है, उसी प्रकार यह शिवरात्रि तिथि मेरे धर्मकी वृद्धिका समय है । इस तिथिमें मेरी स्थापना आदिका मंगलमय उत्सव होना चाहिये ॥ १४ ॥
हे वत्सो! पहले मैं जब ज्योतिर्मय स्तम्भरूपसे १५ प्रकट हुआ था, उस समय मार्गशीर्षमासमें आर्द्रा नक्षत्र था । अतः जो पुरुष मार्गशीर्षमासमें आर्द्रा नक्षत्र होनेपर मुझ उमापतिका दर्शन करता है अथवा मेरी मूर्ति या १६ लिंगकी ही झाँकीका दर्शन करता है, वह मेरे लिये कार्तिकेयसे भी अधिक प्रिय है । उस शुभ दिन मेरे १७ दर्शनमात्रसे पूरा फल प्राप्त होता है । यदि [ दर्शनके साथ - साथ ] मेरा पूजन भी किया जाय तो उसका अधिक फल प्राप्त होता है, जिसका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता ॥ १५–१७ ॥ इस रणभूमिमें मैं लिंगरूपसे प्रकट होकर बहुत १८ बड़ा हो गया था । अतः उस लिंगके कारण यह भूतल लिंगस्थानके नामसे प्रसिद्ध हुआ । हे पुत्रो! जगत्के लोग इसका दर्शन और पूजन कर सकें, १ ९ इसके लिये यह अनादि और अनन्त ज्योतिःस्तम्भ अत्यन्त छोटा हो जायगा । यह लिंग सब प्रकारके २० भोगोंको सुलभ करानेवाला और भोग तथा मोक्षका एकमात्र साधन होगा । इसका दर्शन, स्पर्श तथा ध्यान | प्राणियोंको जन्म और मृत्युसे छुटकारा दिलानेवाला होगा ॥ १८-२० ॥ अग्निके पहाड़ जैसा जो यह शिवलिंग यहाँ । २१ प्रकट हुआ है, इसके कारण यह स्थान अरुणाचल । नामसे प्रसिद्ध होगा । यहाँ अनेक प्रकारके बड़े - बड़े ।
। तीर्थ प्रकट होंगे । इस स्थानमें निवास करने या मरनेसे ।
२२ जीवोंका मोक्ष हो जायगा॥२१-२२ ॥
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अ ० ९ ] विद्येश्वरसंहिता ७३
रथोत्सवादिकल्याणं जनावासं तु सर्वतः ।
अत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्वं कोटिगुणं भवेत् ॥
मत्क्षेत्रादपि सर्वस्मात् क्षेत्रमेतन्महत्तरम् ।
अत्र संस्मृतिमात्रेण मुक्तिर्भवति देहिनाम् ॥
तस्मान्महत्तरमिदं क्षेत्रमत्यन्तशोभनम् ।
सर्वकल्याणसम्पूर्णं सर्वमुक्तिकरं शुभम् ॥
अर्चयित्वात्र मामेव लिङ्गे लिङ्गिनमीश्वरम् ।
सालोक्यं चैव सामीप्यं सारूप्यं साष्टिरेव च ॥
सायुज्यमिति पञ्चैते क्रियादीनां फलं मतम् ।
सर्वेऽपि यूयं सकलं प्राप्स्यथाशु मनोरथम् ॥
नन्दिकेश्वर उवाच
इत्यनुगृह्य भगवान् विनीतौ विधिमाधवौ ।
यत्पूर्वं प्रहतं युद्धे तयोः सैन्यं परस्परम् ॥
तदुत्थापयदत्यर्थं स्वशक्त्यामृतधारया ।
तयोर्मोढ्यं च वैरं च व्यपनेतुमुवाच तौ ॥
सकलं निष्कलं चेति स्वरूपद्वयमस्ति मे ।
नान्यस्य कस्यचित्तस्मादन्यः सर्वोऽप्यनीश्वरः ॥
पुरस्तात् स्तम्भरूपेण पश्चाद् रूपेण चार्भकौ ।
ब्रह्मत्वं निष्कलं प्रोक्तमीशत्वं सकलं तथा ॥
द्वयं ममैव संसिद्धं न मदन्यस्य कस्यचित् ।
तस्मादीशत्वमन्येषां युवयोरपि न क्वचित् ॥
तदज्ञानेन वां वृत्तमीशमानं महाद्भुतम् ।
तन्निराकर्तुमत्रैवमुत्थितोऽहं रणक्षितौ ॥
त्यजतं मानमात्मीयं मयीशे कुरुतं मतिम् । मत्प्रसादेन लोकेषु सर्वोऽप्यर्थः प्रकाशते गुरूक्तिर्व्यञ्जकं तत्र प्रमाणं वा पुनः पुनः ब्रह्मतत्त्वमिदं गूढं भवत्प्रीत्या भणाम्यहम् रथोत्सवादिके आयोजनसे यहाँ सर्वत्र अनेक लोग २३ कल्याणकारी रूपसे निवास करेंगे । इस स्थानपर किया गया दान, हवन तथा जप - यह सब करोड़गुना फल देनेवाला होगा । यह क्षेत्र मेरे सभी क्षेत्रोंमें श्रेष्ठतम होगा । २४ यहाँ मेरा स्मरण करनेमात्रसे प्राणियोंकी मुक्ति हो जायगी । अत: यह परम रमणीय क्षेत्र अति महत्त्वपूर्ण २५ है । यह सभी प्रकारके कल्याणोंसे पूर्ण, शुभ और सबको मुक्ति प्रदान करनेवाला होगा ॥ २३–२५ ॥ इस लिंगमें मुझ लिंगेश्वरकी अर्चना करके २६ मनुष्य सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, साष्टि और सायुज्य – इन पाँचों प्रकारकी मुक्तियोंका अधिकार प्राप्त कर लेगा । आपलोगोंको भी शीघ्र ही सभी २७ मनोवांछित फल प्राप्त होंगे ॥ २६-२७ ॥ नन्दिकेश्वर बोले – इस प्रकार विनम्र ब्रह्मा तथा विष्णुपर अनुग्रह करके भगवान् शंकरने उनके जो २८ सैन्यदल परस्पर युद्धमें मारे गये थे, उन्हें अपनी अमृतवर्षिणी शक्तिसे जीवित कर दिया । उन दोनों ब्रह्मा और विष्णुकी २ ९ मूढ़ता और [ पारस्परिक ] वैरको मिटानेके लिये भगवान् शंकर उन दोनोंसे कहने लगे- ॥ २८-२९ ॥ मेरे दो रूप हैं – ‘ सकल ' और ' निष्कल ' । दूसरे ३० किसीके ऐसे रूप नहीं हैं, अतः [ मेरे अतिरिक्त ] अन्य सब अनीश्वर हैं । हे पुत्रो! पहले मैं स्तम्भरूपसे ३१ प्रकट हुआ, फिर अपने साक्षात् रूपसे । ' ब्रह्मभाव ' मेरा ' निष्कल ' रूप और ' महेश्वरभाव ' सकल रूप है । ये दोनों मेरे ही सिद्धरूप हैं; मेरे अतिरिक्त किसी ३२ दूसरेके नहीं हैं । इस कारण तुम दोनोंका अथवा अन्य किसीका भी ईश्वरत्व कभी नहीं है ॥ ३०-३२ ॥ अज्ञानके कारण तुम दोनोंको जो यह ईशत्वका ३३ आश्चर्यजनक अभिमान उत्पन्न हो गया था, उसे दूर करनेके लिये ही मैं इस रणभूमिमें प्रकट हुआ हूँ । उस अपने अभिमानको छोड़ दो और मुझ ॥ ३४ परमेश्वरमें [ अपनी ] बुद्धि स्थिर करो । मेरे अनुग्रहसे ही सभी लोकोंमें सब कुछ प्रकाशित होता है । इस । गूढ़ ब्रह्मतत्त्वको तुम्हारे प्रति प्रेम होनेके कारण ही मैं ॥ ३५ | बता रहा हूँ ॥ ३३-३५ ॥
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७४ अहमेव परं ब्रह्म मत्स्वरूपं कलाकलम् ब्रह्मत्वादीश्वरश्चाहं कृत्यं मेऽनुग्रहादिकम् बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च ब्रह्माहं ब्रह्मकेशवौ समत्वाद्व्यापकत्वाच्च तथैवात्माहमर्भकौ
अनात्मानः परे सर्वे जीवा एव न संशयः ।
अनुग्रहाद्यं सर्गान्तं जगत्कृत्यं च पञ्चकम् ॥
ईशत्वादेव मे नित्यं न मदन्यस्य कस्यचित् ।
आदौ ब्रह्मत्वबुद्ध्यर्थं निष्कलं लिङ्गमुत्थितम् ॥
तस्मादज्ञातमीशत्वं व्यक्तं द्योतयितुं हि वाम् । सकलोऽहमतो जातः साक्षादीशस्तु तत्क्षणात् सकलत्वमतो ज्ञेयमीशत्वं मयि सत्वरम् यदिदं निष्कलं स्तम्भं मम ब्रह्मत्वबोधकम् ॥
लिङ्गलक्षणयुक्तत्वान्मम लिङ्गं भवेदिदम् ।
तदिदं नित्यमभ्यर्यं युवाभ्यामत्र पुत्रकौ ॥
मदात्मकमिदं नित्यं मम सान्निध्यकारणम् । महत्पूज्यमिदं नित्यमभेदाल्लिङ्गलिङ्गिनोः
यत्र प्रतिष्ठितं येन मदीयं लिङ्गमीदृशम् ।
तत्र प्रतिष्ठितः सोऽहमप्रतिष्ठोऽपि वत्सकौ ॥
मत्साम्यमेकलिङ्गस्य स्थापने फलमीरितम् ।
द्वितीये स्थापिते लिङ्गे मदैक्यं फलमेव हि ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ० ९ । मैं ही परब्रह्म हूँ । कल ( सगुण ) और अकल ॥ ३६ ( निर्गुण ) – - ये दोनों मेरे ही स्वरूप हैं । मेरा स्वरूप ब्रह्मरूप होनेके कारण मैं ईश्वर भी हूँ । जीवोंपर । अनुग्रह आदि करना मेरा कार्य है । हे ब्रह्मा और ॥ ३७ केशव! सबसे बृहत् और जगत्की वृद्धि करनेवाला होनेके कारण मैं ' ब्रह्म ' हूँ । हे पुत्रो! सर्वत्र समरूपसे स्थित और व्यापक होनेसे मैं ही सबका आत्मा हूँ ॥ ३६-३७ ॥ अन्य सभी जीव अनात्मरूप हैं; इसमें सन्देह ३८ नहीं है । सर्गसे लेकर अनुग्रहतक ( आत्मा या ईश्वरसे भिन्न ) जो जगत् - सम्बन्धी पाँच कृत्य हैं, वे सदा मेरे ही हैं, मेरे अतिरिक्त दूसरे किसीके नहीं हैं; क्योंकि ३ ९ मैं ही सबका ईश्वर हूँ । पहले मेरी ब्रह्मरूपताका बोध करानेके लिये ' निष्कल ' लिंग प्रकट हुआ था, फिर ॥ ४० तुम दोनोंको अज्ञात ईश्वरत्वका स्पष्ट साक्षात्कार करानेके लिये मैं साक्षात् जगदीश्वर ही ' सकल ' । रूपमें तत्काल प्रकट हो गया । अतः मुझमें जो ईशत्व ४१ है, उसे ही मेरा सकलरूप जानना चाहिये तथा जो यह मेरा निष्कल स्तम्भ है, वह मेरे ब्रह्मस्वरूपका ४२ बोध करानेवाला है । हे पुत्रो! लिंग - लक्षणयुक्त होने कारण यह मेरा ही लिंग ( चिह्न ) है । तुम दोनोंको प्रतिदिन यहाँ रहकर इसका पूजन करना चाहिये । यह ॥ ४३ मेरा ही स्वरूप है और मेरे सामीप्यकी प्राप्ति । करानेवाला है । लिंग और लिंगीमें नित्य अभेद होनेके कारण मेरे इस लिंगका महान् पुरुषोंको भी पूजन करना चाहिये ॥ ३८–४३ ॥ हे वत्सो! जहाँ - जहाँ जिस किसीने मेरे लिंगको ४४ स्थापित कर लिया, वहाँ मैं अप्रतिष्ठित होनेपर भी प्रतिष्ठित हो जाता हूँ ॥ ४४ ॥
मेरे एक लिंगकी स्थापना करनेका फल मेरी समानताकी प्राप्ति बताया गया है । एकके बाद दूसरे शिवलिंगकी भी स्थापना कर दी गयी, तब फलरूपसे | मेरे साथ एकत्व ( सायुज्य मोक्ष ) - रूप फल प्राप्त ४५ | होता है ॥ ४५ ॥
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अ ० १० ] विद्येश्वरसंहिता ७५ लिङ्गं प्राधान्यतः स्थाप्यं तथा वेरं तु गौणकम् । प्रधानतया शिवलिंगकी ही स्थापना करनी लिङ्गाभावे न तत्क्षेत्रं सवेरमपि सर्वतः ॥ ४६ चाहिये । मूर्तिकी स्थापना उसकी अपेक्षा गौण है । शिवलिंगके अभावमें सब ओरसे मूर्तियुक्त होनेपर भी वह स्थान क्षेत्र नहीं कहलाता ॥ ४६ ॥
इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां शिवस्य महेश्वराभिधानवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें शिवके महेश्वरत्वका वर्णन नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः सृष्टि, स्थिति आदि पाँच कृत्योंका प्रतिपादन, प्रणव एवं पंचाक्षर मन्त्रकी महत्ता, ब्रह्मा - विष्णुद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा उनका अन्तर्धान होना ब्रह्मविष्णू ऊचतुः सर्गादिपञ्चकृत्यस्य लक्षणं ब्रूहि नौ प्रभो । शिव उवाच मत्कृत्यबोधनं गुह्यं कृपया प्रब्रवीमि वाम् ॥
सृष्टिः स्थितिश्च संहारस्तिरोभावोऽप्यनुग्रहः ।
पञ्चैव मे जगत्कृत्यं नित्यसिद्धमजाच्युतौ ॥
सर्गः संसारसंरम्भस्तत्प्रतिष्ठा स्थितिर्मता ।
संहारो मर्दनं तस्य तिरोभावस्तदुत्क्रमः ॥
तन्मोक्षोऽनुग्रहस्तन्मे कृत्यमेवं हि पञ्चकम् ।
कृत्यमेतद्वहत्यन्यस्तूष्णीं गोपुरबिम्बवत् ॥
सर्गादि यच्चतुःकृत्यं संसारपरिजृम्भणम् ।
पञ्चमं मुक्तिहेतुर्वै नित्यं मयि च सुस्थिरम् ॥
तदिदं पञ्चभूतेषु दृश्यते मामकैर्जनैः ।
सृष्टिर्भूमौ स्थितिस्तोये संहारः पावके तथा ॥
तिरोभावोऽनिले तद्वदनुग्रह इहाम्बरे ।
सृज्यते धरया सर्वमद्भिः सर्वं प्रवर्धते ॥
अर्द्यते तेजसा सर्वं वायुना चापनीयते ।
व्योम्नानुगृह्यते सर्वं ज्ञेयमेवं हि सूरिभिः ॥
ब्रह्मा और विष्णु बोले — हे प्रभो! हम दोनोंको सृष्टि आदि पाँच कृत्योंका लक्षण बताइये ॥ १/२ ॥ शिवजी बोले- मेरे कृत्योंको समझना अत्यन्त १ गहन है, तथापि मैं कृपापूर्वक तुम दोनोंको उनके विषयमें बता रहा हूँ । हे ब्रह्मा और अच्युत! सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह — ये पाँच ही मेरे जगत् - सम्बन्धी २ कार्य हैं, जो नित्यसिद्ध हैं । संसारकी रचनाका जो आरम्भ है, वह‘सर्ग ' है । मुझसे पालित होकर सृष्टिका सुस्थिररूपसे रहना ही उसकी ' स्थिति ' कहा गया है । उसका विनाश ३ ही ' संहार ' है । प्राणोंका उत्क्रमण ही ' तिरोभाव ' है । इन सबसे छुटकारा मिल जाना ही मेरा ' अनुग्रह ' है । इस प्रकार मेरे पाँच कृत्य हैं । इन मेरे कर्तव्योंको चुपचाप ४ अन्य पंचभूतादि वहन करते रहते हैं, जैसे जलमें पड़नेवाले गोपुर - बिम्बमें आवागमन होता रहता है ॥ १-४ ॥ सृष्टि आदि जो चार कृत्य हैं, वे संसारका विस्तार ५ करनेवाले हैं । पाँचवाँ कृत्य अनुग्रह मोक्षका हेतु है । वह सदा मुझमें ही अचल भावसे स्थिर रहता है । मेरे भक्तजन इन पाँचों कृत्योंको पाँचों भूतोंमें देखते हैं । ६ सृष्टि भूतलमें, स्थिति जलमें, संहार अग्निमें, तिरोभाव वायुमें और अनुग्रह आकाशमें स्थित है । पृथ्वीसे सबकी सृष्टि होती है, जलसे सबकी वृद्धि होती है, आग सबको ७ जला देती है, वायु सबको एक स्थानसे दूसरे स्थानको ले जाती है और आकाश सबको अनुगृहीत करता है— ८ । यह विद्वान् पुरुषोंको जानना चाहिये॥५–८ ॥
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७६ श्रीशिवमहापुराण [ अ ० १०
पञ्चकृत्यमिदं वोढुं ममास्ति मुखपञ्चकम् ।
चतुर्दिक्षु चतुर्वक्त्रं तन्मध्ये पञ्चमं मुखम् ॥
युवाभ्यां तपसा लब्धमेतत्कृत्यद्वयं सुतौ ।
सृष्टिस्थित्यभिधं भाग्यं मत्तः प्रीतादतिप्रियम् ॥
तथा रुद्रमहेशाभ्यामन्यत्कृत्यद्वयं परम् ।
अनुग्रहाख्यं केनापि लब्धुं नैव हि शक्यते ॥
तत्सर्वं पौर्विकं कर्म युवाभ्यां कालविस्मृतम् ।
न तद् रुद्रमहेशाभ्यां विस्मृतं कर्म तादृशम् ॥
रूपे वेषे च कृत्ये च वाहने चासने तथा ।
आयुधादौ च मत्साम्यमस्माभिस्तत्कृते कृतम् ॥
मद्ध्यानविरहाद्वत्सौ मौढ्यं वामेवमागतम् ।
मज्ज्ञाने सति मैवं स्यान्मानं रूपं महेशवत् ॥
तस्मान्मज्ज्ञानसिद्ध्यर्थं मन्त्रमोंकारनामकम् ।
इतः परं प्रजपतं मामकं मानभञ्जनम् ॥
उपादिशं निजं मन्त्रमोङ्कारमुरुमङ्गलम् ।
ॐकारो मन्मुखाज्जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः ॥
वाचकोऽयमहं वाच्यो मन्त्रोऽयं हि मदात्मकः ।
तदनुस्मरणं नित्यं ममानुस्मरणं भवेत् ॥
अकार उत्तरात् पूर्वमुकारः पश्चिमाननात् ।
मकारो दक्षिणमुखाद् बिन्दुः प्राङ्मुखतस्तथा ॥
नादो मध्यमुखादेवं पञ्चधासौ विजृम्भितः ।
एकीभूतः पुनस्तद्वदोमित्येकाक्षरोऽभवत् ॥
नामरूपात्मकं सर्वं
सर्वं वेदभूतकुलद्वयम् ।
व्याप्तमेतेन मन्त्रेण शिवशक्त्योश्च बोधकः ॥
इन पाँच कृत्योंका भार वहन करनेके लिये ही ९ मेरे पाँच मुख हैं । चार दिशाओंमें चार मुख हैं और | इनके बीचमें पाँचवाँ मुख है 1 । हे पुत्रो! तुम दोनोंने | तपस्या करके प्रसन्न हुए मुझ परमेश्वरसे भाग्यवश १० सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त किये हैं । ये । दोनों तुम्हें बहुत प्रिय हैं । इसी प्रकार मेरे विभूतिस्वरूप रुद्र और महेश्वरने दो अन्य उत्तम कृत्य - संहार और ११ तिरोभाव मुझसे प्राप्त किये हैं, परंतु अनुग्रह नामक कृत्य कोई नहीं पा सकता॥९ –११ ॥ उन सभी पहलेके कर्मोंको तुम दोनोंने समयानुसार १२ भुला दिया । रुद्र और महेश्वर अपने कर्मोंको नहीं भूले हैं, इसलिये मैंने उन्हें अपनी समानता प्रदान की है । वे रूप, वेष, कृत्य, वाहन, आसन और आयुध १३ आदिमें मेरे समान ही हैं ॥ १२-१३ ॥ हे पुत्रो! मेरे ध्यानसे शून्य होनेके कारण १४ तुम दोनोंमें मूढ़ता आ गयी है, मेरा ज्ञान रहनेपर महेशके समान अभिमान और स्वरूप नहीं रहता । इसलिये मेरे ज्ञानकी सिद्धिके लिये मेरे ओंकार नामक १५ मन्त्रका तुम दोनों जप करो, यह अभिमानको दूर करनेवाला है ॥ १४-१५ ॥ पूर्वकालमें मैंने अपने स्वरूपभूत मन्त्रका उपदेश १६ किया है, जो ओंकारके रूपमें प्रसिद्ध है । वह महामंगलकारी मन्त्र है । सबसे पहले मेरे मुखसे ओंकार ( ॐ ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूपका बोध करानेवाला है । ओंकार १७ वाचक है और मैं वाच्य हूँ । यह मन्त्र मेरा स्वरूप ही है । प्रतिदिन ओंकारका निरन्तर स्मरण करनेसे मेरा ही सदा स्मरण होता रहता है ॥ १६-१७ ॥ पहले मेरे उत्तरवर्ती मुखसे अकार, पश्चिम १८ मुखसे उकार, दक्षिण मुखसे मकार, पूर्ववर्ती मुखसे बिन्दु तथा मध्यवर्ती मुखसे नाद उत्पन्न हुआ । इस । प्रकार पाँच अवयवोंसे युक्त होकर ओंकारका विस्तार । । हुआ है । इन सभी अवयवोंसे एकीभूत होकर वह । १ ९ प्रणव ॐ नामक एक अक्षर हो गया । यह नाम-रूपात्मक सारा जगत् तथा वेद - वर्णित स्त्री - पुरुषवर्गरूप दोनों कुल इस प्रणव- मन्त्रसे व्याप्त हैं । यह मन्त्र शिव २० और शक्ति दोनोंका बोधक है ॥ १८-२० ॥
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अ ० १० ] विद्येश्वरसंहिता ७७
अस्मात् पञ्चाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत् ।
अकारादिक्रमेणैव नकारादि यथाक्रमम् ॥
अस्मात् पञ्चाक्षराज्जाता मातृका: पञ्चभेदतः ।
तस्माच्छिरश्चतुर्वक्त्रात्रिपाद्गायत्रिरेव हि ॥
वेदः सर्वस्ततो जज्ञे ततो वै मन्त्रकोटयः ।
तत्तन्मन्त्रेण तत्सिद्धिः सर्वसिद्धिरितो भवेत् ॥
अनेन मन्त्रकन्देन भोगो मोक्षश्च सिद्ध्यति ।
सकला मन्त्रराजानः साक्षाद्भोगप्रदाः शुभाः ॥
नन्दिकेश्वर उवाच पुनस्तयोस्तत्र तिरः पटं गुरुः
प्रकल्प्य मन्त्रं च समादिशत् परम् ।
निधाय तच्छीण कराम्बुजं शनै-रुदङ्मुखं संस्थितयोः सहाम्बिकः ॥
त्रिरुच्चार्याग्रहीन्मन्त्रं यन्त्रतन्त्रोक्तिपूर्वकम् ।
शिष्यौ च तौ दक्षिणायामात्मानं च समार्पयत् ॥
प्रबद्धहस्तौ किल तौ तदन्तिके तमूचतुर्देववरं जगद्गुरुम् ॥ ब्रह्माच्युतावूचतुः नमो निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे । नमः सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने नमः प्रणववाच्याय नमः प्रणवलिङ्गिने नमः सृष्ट्यादिकर्त्रे च नमः पञ्चमुखाय ते * अ इ उ ऋ लृ — ये पाँच मूलभूत स्वर इसी प्रणवसे पंचाक्षरमन्त्रकी उत्पत्ति हुई है, जो २१ मेरे सकल रूपका बोधक है । वह अकारादि क्रमसे और नकारादि क्रमसे क्रमशः प्रकाशमें आया है । [ ॐ नमः शिवाय ] इस पंचाक्षरमन्त्रसे मातृकावर्ण प्रकट २२ हुए हैं, जो पाँच भेदवाले हैं । * उसीसे शिरोमन्त्र तथा चार मुखोंसे त्रिपदा गायत्रीका प्राकट्य हुआ है । उस गायत्रीसे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं और उन वेदोंसे २३ करोड़ों मन्त्र निकले हैं । उन - उन मन्त्रोंसे भिन्न - भिन्न कार्योंकी सिद्धि होती है, परंतु इस प्रणव एवं पंचाक्षरसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है । इस मूलमन्त्रसे भोग २४ और मोक्ष दोनों ही सिद्ध होते हैं । मेरे सकल स्वरूपसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी मन्त्रराज साक्षात् भोग प्रदान करनेवाले और शुभकारक हैं॥२१–२४ ॥ नन्दिकेश्वर बोले- तदनन्तर जगदम्बा पार्वतीके साथ बैठे हुए गुरुवर महादेवजीने उत्तराभिमुख बैठे हुए ब्रह्मा और विष्णुको परदा करनेवाले वस्त्रसे आच्छादित करके उनके मस्तकपर अपना करकमल २५ रखकर धीरे - धीरे उच्चारण करके उन्हें उत्तम मन्त्रका उपदेश दिया ॥ २५ ॥
यन्त्र - तन्त्रमें बतायी हुई विधिके पालन-२६ पूर्वक तीन बार मन्त्रका उच्चारण करके भगवान् शिवने उन दोनों शिष्योंको मन्त्रकी दीक्षा दी । तत्पश्चात् उन २७ शिष्योंने गुरुदक्षिणाके रूपमें अपने - आपको ही समर्पित कर दिया और दोनों हाथ जोड़कर उनके समीप खड़े हो उन देवश्रेष्ठ जगद्गुरुका स्तवन किया ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्मा और विष्णु बोले - – [ हे प्रभो! ] आप निष्कलरूप हैं; आपको नमस्कार है । आप निष्कल तेजसे प्रकाशित होते हैं; आपको नमस्कार है । आप सबके स्वामी ॥ २८ हैं; आपको नमस्कार है । आप सर्वात्माको नमस्कार है अथवा सकल - स्वरूप आप महेश्वरको नमस्कार है । आप प्रणवके वाच्यार्थ हैं; आपको नमस्कार है । आप प्रणवलिंग - वाले हैं; आपको नमस्कार है । सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह करनेवाले । आपको नमस्कार है । आपके पाँच मुख हैं; आपको ॥ २ ९ । नमस्कार है । पंचब्रह्मस्वरूप पाँच कृत्यवाले आपको हैं तथा व्यंजन भी पाँच - पाँच वर्णोंसे युक्त पाँच वर्गवाले हैं ।
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७८ पञ्चब्रह्मस्वरूपाय पञ्चकृत्याय ते नमः आत्म ब्रह्मणे तुभ्यमनन्तगुणशक्तये सकलाकलरूपाय शम्भवे गुरवे नमः इति स्तुत्वा गुरुं पद्यैर्ब्रह्मा विष्णुश्च नेमतुः ईश्वर उवाच वत्सकौ सर्वतत्त्वं च कथितं दर्शितं च वाम् जपतं प्रणवं मन्त्रं देवीदिष्टं मदात्मकम्
ज्ञानं च सुस्थिरं भाग्यं सर्वं भवति शाश्वतम् ।
आर्द्रायां च चतुर्दश्यां तज्जप्यं त्वक्षयं भवेत् ॥
सूर्यगत्या महार्द्रायामेकं कोटिगुणं भवेत् ।
मृगशीर्षान्तिमो भागः पुनर्वस्वादिमस्तथा ॥
आर्द्रासमं सदा ज्ञेयं पूजाहोमादितर्पणे ।
दर्शनं तु प्रभाते च प्रातः सङ्गवकालयोः ॥
चतुर्दशी तथा ग्राह्या निशीथव्यापिनी भवेत् ।
प्रदोषव्यापिनी चैव परयुक्ता प्रशस्यते ॥
लिङ्गं वेरं च मे तुल्यं यजतां लिङ्गमुत्तमम् ।
तस्माल्लिङ्गं परं पूज्यं वेरादपि मुमुक्षुभिः ॥
लिङ्गमोङ्कारमन्त्रेण वेरं पञ्चाक्षरेण तु ।
स्वयमेव हि सद्द्द्रव्यैः प्रतिष्ठाप्यं परैरपि ॥
पूजयेदुपचारैश्च मत्पदं सुलभं भवेत् ।
इति शास्य तथा शिष्यौ तत्रैवान्तर्हितः शिवः ॥
श्रीशिवमहापुराण [ अ ] ० १० । नमस्कार है । आप सबके आत्मा हैं, ब्रह्म हैं, आपके ॥ ३० गुण और आपकी शक्तियाँ अनन्त हैं, आपको नमस्कार है । आपके सकल और निष्कल दो रूप हैं ॥ आप सद्गुरु एवं शम्भु हैं, आपको नमस्कार है । इन ॥ ३१ पद्योंद्वारा अपने गुरु महेश्वरकी स्तुति करके ब्रह्मा और । विष्णुने उनके चरणोंमें प्रणाम किया॥२८–३१ ॥ ईश्वर बोले – हे वत्सो! मैंने तुम दोनोंसे सारा । तत्त्व कहा और दिखा दिया । तुमदोनों देवीके द्वारा ॥ ३२ उपदिष्ट प्रणव ( ॐ ), जो मेरा ही स्वरूप है - का निरन्तर जप करो ॥ ३२ ॥
[ इसके जपसे ] ज्ञान, स्थिर भाग्य — सब कुछ ३३ सदाके लिये प्राप्त हो जाता है । आर्द्रा नक्षत्रसे युक्त चतुर्दशीको प्रणवका जप किया जाय तो वह अक्षय फल देनेवाला होता है । सूर्यकी संक्रान्तिसे युक्त महा - आर्द्रा ३४ नक्षत्रमें एक बार किया हुआ प्रणवजप कोटिगुने जपका फल देता है । मृगशिरा नक्षत्रका अन्तिम भाग तथा पुनर्वसुका आदिभाग पूजा, होम और तर्पण आदिके लिये सदा ३५ आर्द्राके समान ही होता है - यह जानना चाहिये । मेरा या मेरे लिंगका दर्शन प्रभातकालमें ही प्रातः तथा संगव ( मध्याह्नके पूर्व ) - कालमें करना चाहिये ॥ ३३-३५ ॥ मेरे दर्शन - पूजनके लिये चतुर्दशी तिथि निशीथव्यापिनी ३६ अथवा प्रदोषव्यापिनी लेनी चाहिये; क्योंकि परवर्तिनी ( अमावास्या ) तिथिसे संयुक्त चतुर्दशीकी ही प्रशंसा की जाती है । पूजा करनेवालोंके लिये मेरी मूर्ति तथा लिंग दोनों समान हैं, फिर भी मूर्तिकी अपेक्षा लिंगका ३७ स्थान श्रेष्ठ है । इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको चाहिये कि वे वेर ( मूर्ति ) -से भी श्रेष्ठ समझकर लिंगका ही पूजन करें । लिंगका ॐकारमन्त्रसे और वेरका पंचाक्षरमन्त्रसे ३८ पूजन करना चाहिये । शिवलिंगकी स्वयं ही स्थापना करके अथवा दूसरोंसे भी स्थापना करवाकर उत्तम द्रव्यमय उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये; इससे मेरा पद सुलभ हो जाता है । इस प्रकार उन दोनों शिष्योंको उपदेश देकर ३ ९ । भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ३६–३९ ॥ इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वरसंहितायां ओंकारोपदेशवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत प्रथम विद्येश्वरसंहितामें ओंकारोपदेशका वर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १० ॥