लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 151–160

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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अध्याय ३२ ] मुनियोंद्वारा की गयी शिवस्तुति १४ ९ बत्तीसवाँ अध्याय मुनियोंद्वारा ऋषय ऊचुः

नमो दिग्वाससे नित्यं कृतान्ताय त्रिशूलिने ।

विकटाय करालाय करालवदनाय च ॥

अरूपाय सुरूपाय विश्वरूपाय ते नमः ।

कटङ्कटाय रुद्राय स्वाहाकाराय वै नमः ॥

सर्वप्रणतदेहाय स्वयं च प्रणतात्मने ।

नित्यं नीलशिखण्डाय श्रीकण्ठाय नमो नमः ॥

नीलकण्ठाय देवाय चिताभस्माङ्गधारिणे ।

त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः ॥

आत्मा च सर्वभूतानां सांख्यैः पुरुष उच्यते ।

पर्वतानां महामेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ॥

ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं देवानां वासवस्तथा ।

ॐकारः सर्ववेदानां श्रेष्ठं साम च सामसु ॥

आरण्यानां पशूनां च सिंहस्त्वं परमेश्वरः ।

ग्राम्याणामृषभश्चासि भगवान् लोकपूजितः ॥

सर्वथा वर्तमानोऽपि यो यो भावो भविष्यति ।

त्वामेव तत्र पश्यामो ब्रह्मणा कथितं तथा ॥

कामः क्रोधश्च लोभश्च विषादो मद एव च ।

एतदिच्छामहे बोद्धुं प्रसीद परमेश्वर ॥

महासंहरणे प्राप्ते त्वया देव कृतात्मना ।

करं ललाटे संविध्य वह्निरुत्पादितस्त्वया ॥

तेनाग्निना तदा लोका अर्चिर्भिः सर्वतो वृताः ।

तस्मादग्निसमा ह्येते बहवो विकृताग्नयः ॥

की गयी शिवस्तुति ऋषिगण बोले- दिशाओंको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, शाश्वत, प्रलयके कारण, त्रिशूलधारी, विकट १ रूपवाले, कराल ( संसाररूपी वृक्षके लिये कुठार स्वरूप ) तथा भीषण वदनवाले शिवको नमस्कार है ॥ १ ॥

बिना रूपवाले, सुन्दर रूपवाले, विश्वरूप आपको २ नमस्कार है । गजाननरूप, स्वाहा करनेवाले यजमानरूप रुद्रको नमस्कार है ॥ २ ॥

सभी लोगोंसे नमस्कृत देहवाले, स्वयं विनीत ३ आत्मावाले, निरन्तर नील जटाजूट धारण करनेवाले, अपने शरीरमें चिताकी भस्मको धारण करनेवाले, श्रीकण्ठ, नीलकण्ठ शिवको बार - बार नमस्कार है । हे ४ प्रभो! आप सभी देवताओंमें ब्रह्मा हैं तथा रुद्रोंमें नीललोहित हैं ॥ ३-४ ॥ आप समस्त भूतोंकी आत्मा हैं । सांख्यविद् आपको ५ पुरुष कहते हैं । आप पर्वतोंमें विशाल मेरु पर्वत तथा नक्षत्रोंमें चन्द्रमा हैं ॥ ५ ॥

ऋषियोंमें आप वसिष्ठ हैं तथा देवताओंमें देवराज ६ इन्द्र हैं, सभी वेदोंमें साररूपसे आप ओंकार हैं एवं सभी गेयस्वरोंमें आप सामगान हैं ॥ ६ ॥

आप परमेश्वर वन्य पशुओंमें सिंह हैं और ग्राम्य ७ पशुओं में आप ऐश्वर्यसम्पन्न तथा लोकपूज्य वृषभ हैं ॥ ७ ॥

हे प्रभो! आप वैसा कीजिये कि आपका जो भी ८ विद्यमान स्वरूप हो, उसमें हम ब्रह्माद्वारा कथित आपके सर्वस्वरूपका दर्शन कर सकें ॥ ८ ॥

हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये । हम यह जानना ९ चाहते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, विषाद तथा मद — ये पाँचों विकार सभीको दग्ध क्यों करते हैं? ॥९ ॥

१० हे देव! महासंहार उपस्थित होनेपर शुद्ध चित्तवाले आप परमेश्वरने ललाटपर हाथ घर्षितकर अग्नि उत्पन्न की थी ॥१० ॥

११ तब उसी अग्निकी ज्वालाओंसे समस्त लोक

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग १५०

कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहो दम्भ उपद्रवः ।

यानि चान्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥

दह्यन्ते प्राणिनस्ते तु त्वत्समुत्थेन वह्निना ।

अस्माकं दह्यमानानां त्राता भव सुरेश्वर ॥

त्वं च लोकहितार्थाय भूतानि परिषिञ्चसि ।

महेश्वर महाभाग प्रभो शुभनिरीक्षक ॥

आज्ञापय वयं नाथ कर्तारो वचनं तव ।

भूतकोटिसहस्त्रेषु रूपकोटिशतेषु च ॥

अन्तं गन्तुं न शक्ताः स्म देवदेव नमोऽस्तु ते ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे । सभी ओरसे आच्छादित हो गये । इसीलिये ये काम, १२ क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ आदि विक्षोभात्मक विकृत अग्नियाँ अग्नितुल्य ही हैं । इस जगत्में जो भी स्थावर - जंगम जीव एवं पदार्थ हैं, वे सब आपद्वारा उत्पादित अग्निसे दग्ध हो रहे हैं । अतएव हे सुरेश्वर! १३ उस अग्निसे दग्ध हो रहे हम सभीकी आप रक्षा कीजिये ॥ ११ - १३ ॥ हे महेश्वर! हे महाभाग! हे प्रभो! हे शुभ १४ निरीक्षक! आप लोक - कल्याणके लिये जीवोंको अमृतरूपी जलसे सींचते । हे नाथ! आज्ञा दीजिये; हमलोग आपके वचनोंका पालन करनेके लिये तत्पर हैं । अनन्त १५ पदार्थों एवं उनके नाम - रूपोंके मध्य आप व्याप्त हैं, आपका पार हम पा नहीं सके हैं । हे देवाधिदेव! १६ | आपको नमस्कार है ॥ १४–१६ ॥ ' शिवस्तुतिवर्णनं ' नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' शिवस्तुतिवर्णन ' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥

तैंतीसवाँ अध्याय मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश नन्द्युवाच

ततस्तुतोष भगवाननुगृह्य महेश्वरः ।

स्तुतिं श्रुत्वा स्तुतस्तेषामिदं वचनमब्रवीत् ॥ १

यः पठेच्छृणुयाद्वापि युष्माभिः कीर्तितं स्तवम् ।

श्रावयेद्वा द्विजान् विप्रो गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥२

वक्ष्यामि वो हितं पुण्यं भक्तानां मुनिपुङ्गवाः ।

स्त्रीलिङ्गमखिलं देवी प्रकृतिर्मम देहजा ॥ ३

पुंल्लिङ्गं पुरुषो विप्रा मम देहसमुद्भवः उभाभ्यामेव वै सृष्टिर्मम विप्रा न संशयः ॥ ४

न निन्देद्यतिनं तस्माद्दिग्वाससमनुत्तमम् ।

बालोन्मत्तविचेष्टं तु मत्परं ब्रह्मवादिनम् ॥ ५

नन्दीश्वर बोले- उन मुनियोंके द्वारा संस्तुत भगवान् महेश्वर उनकी स्तुति सुनकर उनके प्रति अनुग्रहशील होकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनसे यह वचन बोले ॥१ ॥

जो विप्र आप लोगोंद्वारा की गयी स्तुतिको पढ़ेगा अथवा सुनेगा अथवा द्विजोंको सुनायेगा, वह मेरे गणोंमें मुख्य स्थान प्राप्त करेगा ॥ २ ॥

हे मुनिश्रेष्ठो! आप भक्तोंके हितार्थ अब मैं शुभ उपदेश करता हूँ । इस जगत् में समस्त स्त्रीलिङ्ग - समुदाय मेरे शरीरसे उत्पन्न प्रकृतिदेवीका ही रूप है और हे विप्रो! सभी पुंल्लिंग- समुदाय मेरी देहसे उत्पन्न पुरुषका रूप है । हे विप्रो! यह सृष्टि मुझसे प्रादुर्भूत पुरुष – प्रकृति ( नर - नारी ) इन्हीं दोनोंसे हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३-४ ॥ सभी शिवरूप हैं, अतएव किसीकी भी निन्दा न

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अध्याय ३३ ] मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश १५१ 36 36 36 36 35 356 355 356 ये हि मां भस्मनिरता भस्मना दग्धकिल्बिषाः । 355 करें । विशेष रूपसे मेरी भक्तिमें तत्पर उत्तम, दिगम्बर, यथोक्तकारिणो दान्ता विप्रा ध्यानपरायणाः ॥ 96363636363636363695

महादेवपरा नित्यं चरन्तो ह्यूर्ध्वरेतसः ।

अर्चयन्ति महादेवं वाङ्मनः कायसंयताः ॥

रुद्रलोकमनुप्राप्य न निवर्तन्ति ते पुनः ।

तस्मादेतद् व्रतं दिव्यमव्यक्तं व्यक्तलिङ्गिनः ॥

भस्मव्रताश्च मुण्डाश्च व्रतिनो विश्वरूपिणः ।

न तान् परिवदेद्विद्वान्न चैतान्नाभिलङ्घयेत् ॥

न हसेन्नाप्रियं ब्रूयादमुत्रेह हितार्थवान् ।

यस्तान्निन्दति मूढात्मा महादेवं स निन्दति ॥

यस्त्वेतान् पूजयेन्नित्यं स पूजयति शङ्करम् ।

एवमेष महादेवो लोकानां हितकाम्यया ॥

युगे युगे महायोगी क्रीडते भस्मगुण्ठितः ।

एवं चरत भद्रं वस्ततः सिद्धिमवाप्स्यथ ॥

अतुल मह महाभयप्रणाशहेतुं शिवकथितं परमं पदं विदित्वा । व्यपगतभवलोभमोहचित्ताः प्रणिपतिताः सहसा शिरोभिरुग्रम् ॥

ततः प्रमुदिता विप्राः श्रुत्वैवं कथितं तदा ।

गन्धोदकैः सुशुद्धैश्च कुशपुष्पविमिश्रितैः ॥

स्नापयन्ति महाकुम्भैरद्भिरेव महेश्वरम् ।

गायन्ति विविधैर्गुह्यैर्हुङ्कारैश्चापि सुस्वरैः ॥

नमो देवाधिदेवाय महादेवाय वै नमः ।

अर्धनारीशरीराय सांख्ययोगप्रवर्तिने ॥

६ ब्रह्मवादी, बालस्वभाववाले, उन्मत्त तथा चेष्टारहित यतिकी तो कभी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये ॥ ५ ॥

भस्मसे विभूषित होकर दग्ध पापोंवाले, इन्द्रियजित्, ७ ध्यानपरायण, नित्य नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले तथा महादेवकी भक्तिमें तत्पर जो विप्र मन - वाणी एवं शरीरसे संयत होकर मुझ महादेवकी यथोक्त रीतिसे ८ पूजा - आराधना करते हैं, वे रुद्रलोकको प्राप्त होते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता है । अतएव व्यक्त लिङ्गवाले शिवका यह [ पाशुपत ] व्रत परम दिव्य तथा ९ अव्यक्त है ॥ ६-८ ॥ विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि भस्म धारण किये तथा मुण्डित सिर जो शिवरूप व्रती हैं, उनकी न तो निन्दा करे तथा न तो उनकी बातोंका उल्लंघन करे । १० लोक एवं परलोकमें अपना हित चाहनेवालेको ऐसे महात्माओंपर न तो हँसना चाहिये और न तो उनके प्रति अप्रिय वचन बोलना चाहिये ॥ ९ १ / २ ॥ ११ जो मनुष्य इनकी निन्दा करता है, वह मन्दबुद्धि साक्षात् महादेवकी निन्दा करता है तथा जो इनकी नित्य पूजा करता है, वह महादेवजीकी पूजा करता ॥ १० 21. 11 १२ इस प्रकार ये महायोगी शिवजी भस्म - भूषित होकर लोक - कल्याणकी कामनासे युग - युगमें नानाविध क्रीड़ाएँ करते हैं । आपलोग भी ऐसा ही आचरण कीजिये; उससे आपलोगोंका कल्याण होगा तथा आपलोग सिद्धि प्राप्त करेंगे ॥ ११-१२ ॥ १३ महाभयका नाश करनेवाले शिव - कथित अतुलनीय तथा परमपदको जानकर उन मुनियोंका चित्त सांसारिक लोभ एवं मोहसे रहित हो गया और उन्होंने शंकरजीके १४ चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया ॥ १३ ॥

इस प्रकार शिवकी बातें सुनकर प्रसन्न मनवाले उन मुनियोंने गन्ध, पुष्प तथा कुशसे मिश्रित शुद्ध जलसे १५ परिपूर्ण विशाल घड़ोंसे महेश्वरको स्नान कराया और पुनः वे गूढ़ तथा हुंकारयुक्त सुन्दर स्वरोंसे महादेवजीका स्तुति गान करने लगे ॥ १४-१५ ॥ १६ देवाधिदेव महादेवको नमस्कार है । अर्धनारीश्वर

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग १५२ अ गजचर्मनिवासिने । । तथा सांख्ययोगके प्रवर्तक शिवको नमस्कार हैं । मेघवाहन मेघवाहनकृष्णाय व्यालयज्ञोपवीतिने ॥ १७ कृष्ण ( सदाशिव ), गजचर्मको अधोवस्त्रके रूपमें धारण कृष्णाजिनोत्तरीयाय सुरचितसुविचित्रकुण्डलाय सुरचितमाल्यविभूषणाय तुभ्यम् । मृगपतिवरचर्मवाससे च प्रथितयशसे नमोऽस्तु शङ्कराय ॥

ततस्तान् स मुनीन् प्रीतः प्रत्युवाच महेश्वरः ।

प्रीतोऽस्मि तपसा युष्मान् वरं वृणुत सुव्रताः ॥

ततस्ते मुनयः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम् ।

भृग्वङ्गिरा वसिष्ठश्च विश्वामित्रस्तथैव च ॥

गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।

मरीचिः कश्यपः कण्वः संवर्तश्च महातपाः ॥

ते प्रणम्य महादेवमिदं वचनमब्रुवन् ।

भस्मस्नानं च नग्नत्वं वामत्वं प्रतिलोमता ॥

सेव्यासेव्यत्वमेवं च ह्येतदिच्छाम वेदितुम् ।

ततस्तेषां वचः श्रुत्वा भगवान् परमेश्वरः ॥

सस्मितं प्राह सम्प्रेक्ष्य सर्वान् मुनिवरांस्तदा ॥

करनेवाले, कृष्णमृगके चर्मको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले एवं सर्पको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ सुन्दर बने हुए अतिविचित्र कुण्डल धारण करनेवाले, १८ | सुन्दर रचित मालाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, सिंहके उत्तम चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले तथा विस्तृत यशवाले आप शंकरको नमस्कार है ॥ १८ ॥

१ ९ तत्पश्चात् उस स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त उन महादेवने उन मुनियोंसे पुनः कहा- हे सुव्रत मुनीश्वरो! मैं तुमलोगों की तपस्यासे अति प्रसन्न हूँ । तुम २० सब वर माँगो ॥१ ९ ॥ इसपर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, २१ अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप, | कण्व, संवर्त आदि उन सभी महान् तपस्वी मुनियोंने शिवजीको प्रणामकर उनसे यह वचन कहा - भस्म-२२ स्नान, नग्नता, वामता, प्रतिलोमता ( काम्य कर्ममार्गमें प्रवृत्ति ), सेव्य तथा असेव्य - इनके विषयमें हम जानना चाहते हैं॥२०–२२२ ॥ २३ इसपर उनकी बात सुनकर परमेश्वर भगवान् शिवने मुसकराकर सभी मुनिवरोंकी ओर देखकर उनसे २४ | कहा ॥ २३-२४ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ऋषिवाक्यं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' ऋषिवाक्य ' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥

चौंतीसवाँ अध्याय भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन श्रीभगवानुवाच

एतद्वः सम्प्रवक्ष्यामि कथासर्वस्वमद्य वै ।

अग्निर्ह्यहं सोमकर्ता सोमश्चाग्निमुपाश्रितः ॥

कृतमेतद्वहत्यग्निर्भूयो लोकसमाश्रयात् ।

असकृत्त्वग्निना दग्धं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥

भगवान् शिव बोले — हे मुनीश्वर! इन सबके माहात्म्यसे युक्त कथाके सारभागका वर्णन मैं आपलोगोंसे १ करूँगा । सोमका कारणस्वरूप अग्नि मैं हूँ तथा अग्निसंयुक्त सोम भी मैं ही हूँ ॥१ ॥

इस लोक ( भारतवर्ष ) -में रहनेके कारण सबके कर्मोंका फल अग्निके द्वारा ही धारण किया जाता है । २ | अग्निने इस स्थावर - जंगम जगत्‌को अनेक बार दग्ध

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अध्याय ३४ ] भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं भस्मसाद्विहितं

****** सर्वं पवित्रमिदमुत्तमम्।

भस्मना वीर्यमास्थाय भूतानि परिषिञ्चति ॥ ३

अग्निकार्यं च यः कृत्वा करिष्यति त्रियायुषम् ।

भस्मना मम वीर्येण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ ४

भासतेत्येव यद्भस्म शुभं भावयते च यत् ।

भक्षणात्सर्वपापानां भस्मेति परिकीर्तितम् ॥ ५

ऊष्मपाः पितरो ज्ञेया देवा वै सोमसम्भवाः ।

अग्नीषोमात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ६

अहमग्निर्महातेजाः सोमश्चैषा महाम्बिका ।

अहमग्निश्च सोमश्च प्रकृत्या पुरुषः स्वयम् ॥ ७

तस्माद्भस्म महाभागा मद्वीर्यमिति चोच्यते ।

स्ववीर्यं वपुषा चैव धारयामीति वै स्थितिः ॥ ८

तदाप्रभृति लोकेषु रक्षार्थमशुभेषु च ।

भस्मना क्रियते रक्षा सूतिकानां गृहेषु च ॥ ९

भस्मस्नानविशुद्धात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः ।

मत्समीपं समागम्य न भूयो विनिवर्तते ॥ १०

व्रतं पाशुपतं योगं कापिलं चैव निर्मितम् ।

पूर्वं पाशुपतं ह्येतन्निर्मितं तदनुत्तमम् ॥ ११

शेषाश्चाश्रमिणः सर्वे पश्चात्सृष्टाः स्वयम्भुवा ।

सृष्टिरेषा मया सृष्टा लज्जामोहभयात्मिका ॥१२

नग्ना एव हि जायन्ते देवता मुनयस्तथा ।

ये चान्ये मानवा लोके सर्वे जायन्त्यवाससः ॥ १३

इन्द्रियैरजितैर्नग्नो दुकूलेनापि संवृतः ।

तैरेव संवृतैर्गुप्तो न वस्त्रं कारणं स्मृतम् ॥ १४

शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन १५३ YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA YAYA किया है । अग्नि से भस्मीभूत हो जानेसे यह सम्पूर्ण जगत् पवित्र तथा उत्तम हो जाता है । उसी भस्मसे ओज प्राप्त करके यह सोम प्राणियोंको जीवित करता है ॥२-३ ॥ जो मनुष्य अग्निहोत्र - कार्य सम्पन्न करके भस्मसे त्र्यायुष करता है, वह मेरे ओजसे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥

यह भस्म प्रकाशित करता है, कल्याण सम्पादित करता है तथा समस्त पापोंका नाश करता है, अतएव इसे भस्म कहा जाता है ॥ ५ ॥

ऊष्मपसंज्ञक पितर तथा देवतागण चन्द्रमासे उत्पन्न कहे गये हैं । स्थावर - जंगममय यह समस्त जगत् अग्नि- सोमात्मक है ॥ ६ ॥

मैं महान् तेजसे युक्त अग्नि हूँ तथा ये महिमामयी अम्बा पार्वती सोमस्वरूपा हैं । प्रकृतिके साथ पुरुषरूप मैं अग्नि सोम दोनों ही हूँ ॥ ७ ॥

अतएव हे महाभाग मुनियो! यह भस्म मेरा वीर्य है - ऐसा कहा जाता | मैं अपने शरीरमें अपने वीर्य ( भस्म ) - को धारण करके अधिष्ठित हूँ और उसी समयसे यह भस्म सभी अमंगलोंसे लोकोंकी रक्षा करता है तथा इसी भस्मसे सूतिकागृहोंकी भी रक्षा की जाती है ॥ ८ - ९ ॥ जो मनुष्य क्रोध तथा इन्द्रियोंको जीतकर भस्मस्नान करके पवित्र अन्तः करणवाला हो जाता है, वह मेरा सांनिध्य प्राप्त कर लेता है एवं पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥

पाशुपतव्रत, योगशास्त्र तथा कापिल ( सांख्यशास्त्र ) -की रचना मैंने ही की । इनमें पाशुपतयोगकी रचना पहले हुई है, इसलिये यह उत्तम है ॥ ११ ॥

आश्रम - सम्बन्धी शेष सभी शास्त्र स्वयंभू ब्रह्माजी द्वारा बादमें रचे गये और लज्जा, मोह तथा भयसे युक्त इस सृष्टिकी रचना मैंने ही की है ॥१२ ॥

देवता तथा मुनिगण नग्न ही उत्पन्न होते हैं । लोकमें अन्य जो मनुष्य हैं, वे भी वस्त्रविहीन-अवस्थामें उत्पन्न होते हैं । इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त न | किये हुए लोग सुन्दर वस्त्र धारण करके भी नग्न हैं और

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१५४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग 69696969696969696 ****

क्षमा धृतिरहिंसा च वैराग्यं चैव सर्वशः ।

तुल्यौ मानावमानौ च तदावरणमुत्तमम् ॥ १५

भस्मस्नानेन दिग्धाङ्गो ध्यायते मनसा भवम् ।

यद्यकार्यसहस्त्राणि कृत्वा यः स्नाति भस्मना ॥ १६

तत्सर्वं दहते भस्म यथाग्निस्तेजसा वनम् ।

तस्माद्यत्नपरो भूत्वा त्रिकालमपि यः सदा ॥ १७

भस्मना कुरुते स्नानं गाणपत्यं स गच्छति ।

समाहृत्य क्रतून् सर्वान् गृहीत्वा व्रतमुत्तमम् ॥ १८

ध्यायन्ति ये महादेवं लीलासद्भावभाविताः ।

उत्तरेणार्यपन्थानं तेऽमृतत्वमवाप्नुयुः ॥ १ ९

दक्षिणेन च पन्थानं ये श्मशानानि भेजिरे ।

अणिमा गरिमा चैव लघिमा प्राप्तिरेव च ॥ २०

इच्छाकामावसायित्वं तथा प्राकाम्यमेव च ।

ईशित्वं च वशित्वं च अमरत्वं च ते गताः ॥ २१

इन्द्रादयस्तथा देवाः कामिकव्रतमास्थिताः ।

ऐश्वर्यं परमं प्राप्य सर्वे प्रथिततेजसः ॥ २२

व्यपगतमदमोहमुक्तराग-स्तमरजदोषविवर्जितस्वभावः 1 परिभवमिदमुत्तमं विदित्वा पशुपतियोगपरो भवेत्सदैव ॥ २३ ।

इमं पाशुपतं ध्यायन् सर्वपापप्रणाशनम् ।

यः पठेच्च शुचिर्भूत्वा श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ॥ २४ ।

सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति ।

सर्वे मुनयः श्रुत्वा वसिष्ठाद्या द्विजोत्तमाः ॥ २५

| इन्द्रियजित् लोग नग्न रहते हुए भी वस्त्रसे ढँके हुए हैं, इसमें वस्त्र हेतु नहीं माना गया है॥१३-१४ ॥ क्षमा, धैर्य, अहिंसा, वैराग्य तथा हर तरहसे मान-अपमानमें समानता उत्तम आवरण कहे गये हैं ॥ १५ ॥

भस्म - स्नानके द्वारा पूरे शरीरमें भस्मका अनुलेपनकर मनसे शिवजीका ध्यान करना चाहिये । हजारों प्रकार कुकृत्य करके भी यदि जो कोई मनुष्य भस्मसे स्नान करे, तो उसके सभी पापोंको भस्म उसी प्रकार जला डालता है, जिस प्रकार अग्नि अपने तेजसे वनको दग्ध देता है ॥ १६२ ॥

अतएव जो मनुष्य प्रयत्नशील होकर त्रिकाल भस्म - स्नान करता है, वह मेरे गणोंमें श्रेष्ठताको प्राप्त होता है ॥ १७२ ॥

जो लोग उत्तम व्रत धारण करके समस्त यज्ञ सम्पन्न करके महादेवके लीला - विग्रहका चिन्तन करते हुए उनकी आराधना करते हैं; वे अमृतत्व ( मोक्ष ) -को प्राप्त होते हैं । इसे श्रेष्ठ उत्तरमार्ग कहा गया है ॥ १८-१९ ॥ जो लोग दक्षिण - मार्गके द्वारा नाशवान् काम्यकर्मोंके लिये परमेश्वरकी आराधना करते हैं, वे अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, इच्छाकामावसायित्व, प्राकाम्य, ईशित्व तथा वशित्व सिद्धियाँ प्राप्तकर अमर हो जाते हैं ॥ २०-२१ ॥ इन्द्र आदि सभी देवता भी काम्य व्रतका आश्रयणकर परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति करके अपरिमित तेजस्वी हो गये ॥ २२ ॥

मद - मोहसे शून्य, रागोंसे मुक्त तथा तम - रज आदि विकारोंसे रहित स्वभाववाला होकर संसारको परिभूत करनेवाले पाशुपतयोगको उत्तम जानकर सदा इस पशुपतियोगमें स्थित रहना चाहिये ॥ २३ ॥

सभी इन्द्रियोंको जीतकर जो मनुष्य पवित्र मनसे सभी पापोंका नाश करनेवाले इस पाशुपतयोगका ध्यानपूर्वक श्रद्धा-भावसे पाठ करता है, सभी पातकोंसे रहित विशुद्ध आत्मावाला वह प्राणी रुद्रलोकको प्राप्त होता है ॥ २४१/२ ॥ महादेवजीका यह वचन सुनकर द्विजोंमें श्रेष्ठ

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अध्याय ३५ ] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा

भस्मपाण्डुरदिग्धाङ्गा बभूवुर्विगतस्पृहाः ।

रुद्रलोकाय कल्पान्ते संस्थिताः शिवतेजसा ॥ २६

तस्मान्न निन्द्याः पूज्याश्च विकृता मलिना अपि ।

रूपान्विताश्च विप्रेन्द्राः सदा योगीन्द्रशङ्कया ॥ २७

बहुना किं प्रलापेन भवभक्ता द्विजोत्तमाः ।

सम्पूज्याः सर्वयत्नेन शिववन्नात्र संशयः ॥ २८

मलिनाश्चैव विप्रेन्द्रा भवभक्ता दृढव्रताः ।

दधीचस्तु यथा देवदेवं जित्वा व्यवस्थितः ॥ २ ९

नारायणं तथा लोके रुद्रभक्त्या न संशयः ।

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भस्मदिग्धतनूरुहाः ॥ ३०

जटिनो मुण्डिनश्चैव नग्ना नानाप्रकारिणः ।

सम्पूज्याः शिववन्नित्यं मनसा कर्मणा गिरा ॥ ३१

तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५५ वसिष्ठ आदि वे सभी मुनि अपने अंगोंमें पीताभ - श्वेत भस्म लगाने लगे और इच्छारहित वे मुनिगण कल्पके अन्तमें शिवजीके तेजके प्रभावसे रुद्रलोकके लिये प्रस्थित हुए ॥ २५-२६ ॥ [ नन्दी कहते हैं - हे सनत्कुमारजी! ] अतः मलिन, विकृत, रूपसम्पन्न चाहे जिस रूपमें हो, महान् योगीकी शंका करके उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये, अपितु उनकी सदा पूजा करनी चाहिये ॥ २७ ॥

अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता; दृढ़ व्रतवाले भगवान् शिवके द्विजश्रेष्ठ भक्त चाहे वे मलिन ही क्यों न हों, पूरे प्रयत्नसे शिवकी ही भाँति उनकी पूजा करनी चाहिये, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ २८१ / २ ॥ इसी भाँति मुनि दधीच शिवकी भक्तिसे देवदेव नारायणको जीतकर लोकमें प्रतिष्ठित हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है ॥२ ९ १ / २ ॥ अतएव भस्मसे लिप्त शरीरवाले, जटाधारी, मुण्डित सिरवाले तथा दिगम्बर वेशवाले अनेक प्रकारके महात्माओंकी मन, वचन एवं कर्मसे पूर्ण प्रयत्नके साथ महादेवकी । भाँति विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥३०-३१ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगिप्रशंसा नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' योगिप्रशंसा ' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥

पैंतीसवाँ अध्याय महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा सनत्कुमार उवाच

कथं जघान राजानं क्षुपं पादेन सुव्रत ।

दधीचः समरे जित्वा देवदेवं जनार्दनम् ॥ १

वज्रास्थित्वं कथं लेभे महादेवान् महातपाः ।

वक्तुमर्हसि शैलादे जितो मृत्युस्त्वया यथा ॥ २

शैलादिरुवाच

ब्रह्मपुत्रो महातेजा राजा क्षुप इति स्मृतः ।

अभून्मित्रो दधीचस्य मुनीन्द्रस्य जनेश्वरः ॥ ३

तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा सनत्कुमार बोले - हे सुव्रत! मुनि दधीचने समरमें देवदेव नारायणको जीतकर राजा क्षुपके ऊपर अपने पैरसे प्रहार क्यों किया? और उन महातपस्वीने महादेवजीसे अपनी हड्डियाँ वज्रतुल्य होनेका वरदान किस प्रकार प्राप्त किया और हे नन्दीश्वर! जिस प्रकार आपने मृत्युपर विजय प्राप्त की, वह भी आप कृपा करके बताइये ॥ १-२ ॥ नन्दी कहते हैं - ब्रह्माजीके पुत्र महान् तेजवाले क्षुप नामक एक राजा हुए हैं । उन लोकपति क्षुपकी । मुनीश्वर दधीचसे मित्रता थी ॥ ३ ॥

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१५६ चिरात्तयोः प्रसङ्गाद्वै वादः क्षुपदधीचयोः अभवत् क्षत्रियश्रेष्ठो विप्र एवेति विश्रुतः अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः तस्मादिन्द्रो ह्यहं वह्निर्यमश्च निर्ऋतिस्तथा वरुणश्चैव वायुश्च सोमो धनद एव च ईश्वरोऽहं न सन्देहो नावमन्तव्य एव च महती देवता या सा महतश्चापि सुव्रत श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । कालान्तरमें उन क्षुप तथा दधीचके मध्य किसी ॥ ४ बातके सन्दर्भमें विवाद हो गया । क्षुपका कथन था कि क्षत्रिय श्रेष्ठ होता है और दधीचका कथन था कि । ब्राह्मण ही श्रेष्ठ होता है ॥ ४ ॥

॥ ५ राजा आठ लोकपालोंका विग्रहस्वरूप होता है । इन्द्र, अग्नि, यम, निरृति, वरुण, वायु, चन्द्र, कुबेर तथा । ईश्वर मैं ही हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं है, अतः तुम्हें ॥ ६ मेरी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये ॥ ५-६ ॥ । हे सुव्रत! वह राजा महान् देवता होता है । अत: हे तस्मात्त्वया महाभाग च्यावनेय सदा ह्यहम् ॥ ७ च्यवनपुत्र! हे महाभाग! तुम्हें मेरा अपमान कभी नहीं करना नावमन्तव्य एवेह पूजनीयश्च सर्वथा श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुपस्य मुनिसत्तमः दधीचरच्यावनिश्चोग्रो गौरवादात्मनो द्विजः अताडयत्क्षुपं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टिना चिच्छेद वज्रेण च तं दधीचं बलवान् क्षुपः ब्रह्मलोके पुरासौ हि ब्रह्मणः क्षुतसम्भवः लब्धं वज्रं च कार्यार्थं वज्रिणा चोदितः प्रभुः स्वेच्छयैव नरो भूत्वा नरपालो बभूव सः तस्माद्राजा स विप्रेन्द्रमजयद्वै महाबलः यथा वज्रधरः श्रीमान् बलवांस्तमसान्वितः पपात भूमौ निहतो वज्रेण द्विजपुङ्गवः सस्मार च तदा तत्र दुःखाद्वै भार्गवं मुनिम् शुक्रोऽपि सन्धयामास ताडितं कुलिशेन तम् योगादेत्य दधीचस्य देहं देहभृतांवरः सन्धाय पूर्ववद्देहं दधीचस्याह भार्गवः भो दधीच महाभाग देवदेवमुमापतिम् सम्पूज्य पूज्यं ब्रह्माद्यैर्देवदेवं निरञ्जनम् अवध्यो भव विप्रर्षे प्रसादात्त्र्यम्बकस्य तु मृतसञ्जीवनं तस्माल्लब्धमेतन्मया द्विज ॥ चाहिये, अपितु सर्वथा मेरी पूजा करनी चाहिये ॥ ७२ ॥

। उन क्षुपका वह वचन सुनकर च्यवनपुत्र मुनिश्रेष्ठः ॥ ८ द्विज दधीचने आत्मगौरवसे प्रेरित होकर अपने बाँयें हाथसे । क्षुपके सिरपर तेज मुष्टिका - प्रहार किया ॥ ८१/२ ॥ । बलशाली क्षुपने भी वज्रसे उन दधीचपर प्रहार किया । पूर्वकालमें राजा क्षुप ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी ॥ ९ छींकसे उत्पन्न हुए थे । भगवान्‌की प्रेरणासे असुरोंके । पराजयरूप कार्यके निमित्त इन्द्रसे उन्होंने वज्र प्राप्त ॥ १० किया था ॥ ९ - १० ॥ अपनी इच्छासे ही नर होकर वे राजा बने थे ॥ श्रीयुक्त, बलवान् तथा तमोगुणयुक्त इन्द्रकी भाँति राजां ॥ ११ क्षुप भी बलशाली थे, इसीलिये वे विप्रेन्द्र दधीचको । जीतनेमें समर्थ हो गये ॥ १११/२ ॥ ॥ १२ राजा क्षुपके वज्र - प्रहारसे निहत द्विजश्रेष्ठ दधीच भूमिपर गिर पड़े । फिर अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने । भृगु - पुत्र मुनि शुक्राचार्यका स्मरण किया ॥ १२१ / २ ॥ ॥ १३ देहधारियोंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने भी वहाँ पहुँचकर । । दधीचमुनिके वज्र - ताड़ित शरीरको अपने योगबलसे यथावत् जोड़ दिया ॥ १३१२ ॥

॥ १४ दधीचके शरीरको पूर्वकी भाँति ठीककर भार्गव । शुक्राचार्यने कहा - हे महाभाग दधीच! हे विप्रवर! ब्रह्मा ॥ १५ आदि देवताओंसे पूजित निरंजन देवाधिदेव उमापति शिवकी सम्यक् पूजा करके उन त्र्यम्बक महादेवके । अनुग्रहसे अवध्य हो जाओ ॥ १४-१५१ / २ ॥ १६ हे द्विज! उन्हीं महादेवजीसे मैंने भी मृतसंजीवनी

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अध्याय ३५ ] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५७

नास्ति मृत्युभयं शम्भोर्भक्तानामिह सर्वतः ।

मृतसञ्जीवनं चापि शैवमद्य वदामि ते ॥ १७

त्रियम्बकं यजामहे त्रैलोक्यपितरं प्रभुम् ।

त्रिमण्डलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम् ॥ १८

त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः ।

त्रिदेवस्य महादेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ॥ १ ९

सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणे प्रकृतौ तथा ।

इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च ॥ २०

पुष्पेषु गन्धवत्सूक्ष्मः सुगन्धिः परमेश्वरः ।

पुष्टिश्च प्रकृतिर्यस्मात्पुरुषस्य द्विजोत्तम ॥२१

महदादिविशेषान्तविकल्पस्यापि सुव्रत ।

विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने ॥ २२

इन्द्रस्यापि च देवानां तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः ।

तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसा तथा ॥ २३ ।

स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च यजामहे ।

सत्येनानेन मुक्षीयान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम् ॥ २४

बन्धमोक्षकरो यस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः ।

मृतसञ्जीवनो मन्त्रो मया लब्धस्तु शङ्करात् ॥ २५

जवा हुत्वाभिमन्त्र्यैवं जलं पीत्वा दिवानिशम् ।

लिङ्गस्य सन्निधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं द्विज ॥ २६

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तपसाराध्य शङ्करम् ।

वज्रास्थित्वमवध्यत्वमदीनत्वं च लब्धवान् ॥ २७

विद्या प्राप्त की है । शिवजीके भक्तोंको मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं होता है । उसी शैवी मृतसंजीवनी विद्याको अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ ॥ १६-१७ ॥ तीनों लोकोंके पिता; सोम - चन्द्र - अग्नि - इन तीनों मण्डलोंके जनक; सत- रज - तम – तीनों गुणोंके महेश्वर; तीन तत्त्वों ( बुद्धि - अहंकार - मन ), तीन अग्नियों ( गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि ), तीन देवों ( ब्रह्मा - विष्णु - रुद्र ) तथा जगत्के सभी तीन प्रकारके पदार्थोंके स्वामी, सुगन्धिरूप पुष्टिवर्धन परमेश्वर महादेवका यजन करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ सुगन्धिरूप वह सूक्ष्म परमेश्वर सभी जगह, समस्त जीवधारियोंमें, त्रिगुणात्मिका प्रकृतिमें, इन्द्रियोंमें, अन्य देवताओं तथा गणोंमें उसी प्रकार अधिष्ठित है, जैसे पुष्पोंमें गन्ध विद्यमान रहती है ॥ २०१ / २ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! चूँकि पुरुषरूप परमेश्वरकी पुष्टि प्रकृतिरूप है । हे सुव्रत! हे महामुने! अतएव वही परमेश्वर महत् आदिसे लेकर विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण | जगत् - प्रपंच, विष्णु, ब्रह्मा, मुनियों तथा इन्द्र आदि सभी देवताओंका पुष्टिवर्धन करता है ॥ २१-२२ १/२ ॥ कर्म, तपस्या, स्वाध्याय, योग तथा ध्यानके द्वारा उन अमृतरूप महादेवका यजन करना चाहिये ॥ २३१/२ ॥ जन्म - मरणरूप बन्धनसे मुक्ति प्रदान करनेवाले प्रभु शिव इस सत्यके द्वारा जीवको मृत्युके पाशसे छुटकारा प्रदान करते हैं । सूर्यकी किरणोंसे पककर अपने मूलबन्धसे स्वयं मुक्त हुए उर्वारुक ( ककड़ी ) -की भाँति वह जीव शिवाराधनके द्वारा सांसारिक बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २४ ९ / २ ॥ मैंने भी शिवजीसे ही मृतसंजीवनी मन्त्र प्राप्त किया है । हे द्विज! जप करने, हवन करने, अभिमन्त्रित जलका पान करने तथा दिन - रात शिवलिङ्गके सांनिध्यमें बैठकर उनका ध्यान करनेसे मृत्युका भय नहीं रह जाता ॥ २५-२६ ॥ उन शुक्राचार्यका वह वचन सुनकर मुनि दधीचने | घोर तपस्या करके शिवकी आराधना की, जिसके

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१५८ - श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग एवमाराध्य देवेशं दधीचो मुनिसत्तमः । प्राप्यावध्यत्वमन्यैश्च वज्रास्थित्वं प्रयत्नतः अताडयच्च राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्धनि क्षुपो दधीचं वज्रेण जघानोरसि च प्रभुः नाभून्नाशाय तद्वज्रं दधीचस्य महात्मनः । प्रभावात्परमेशस्य वज्रबद्धशरीरिणः दृष्ट्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च क्षुपो दधीचस्य तदा प्रभावम् आराधयामास हरिं मुकुन्द-मिन्द्रानुजं प्रेक्ष्य तदाम्बुजाक्षम् परिणामस्वरूप उनकी हड्डियाँ वज्र - तुल्य हो गयीं, वे ॥ २८ अवध्य हो गये तथा उनकी सारी दीनता दूर हो. गयी ॥ २७ ॥

इस प्रकार देवेश्वर शिवकी आराधना करके । मुनिश्रेष्ठ दधीचने वज्रके समान हड्डियाँ हो जाने तथा ॥ २ ९ दूसरोंसे मारे न जा सकनेका वरदान प्राप्तकर चेष्टापूर्व राजा क्षुपके सिरपर अपने चरण- मूलसे प्रहार किया । इसपर राजा क्षुपने भी अपने वज्रसे उनकी छातीपर आघात किया ॥ २८-२९ ॥ ॥ ३० किंतु भगवान् शिवके अनुग्रहसे वज्र - तुल्य शरीरवाले महात्मा दधीचको वह वज्र विनष्ट करनेमें समर्थ नहीं हो सका ॥ ३० ॥

दधीचका अवध्यत्व, उनकी अदीनता तथा उनके । तपोबलका प्रभाव देखकर राजा क्षुप कमलके सदृश नेत्र वाले उपेन्द्र मुकुन्द श्रीविष्णुकी आराधना करने ॥ ३१ | लगे ॥ ३१ ॥

इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे क्षुपाभिधनृपपराभववर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' क्षुपाभिधनृपपराभववर्णन ' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥

छत्तीसवाँ अध्याय राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, नन्द्युवाच

पूजया तस्य सन्तुष्टो भगवान् पुरुषोत्तमः ।

श्रीभूमिसहितः श्रीमान् शङ्खचक्रगदाधरः ॥

किरीटी पद्महस्तश्च सर्वाभरणभूषितः ।

पीताम्बरश्च भगवान् देवैर्दैत्यैश्च संवृतः ॥

प्रददौ दर्शनं तस्मै दिव्यं वै गरुडध्वजः ।

दिव्येन दर्शनेनैव दृष्ट्वा देवं जनार्दनम् ॥

तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य गरुडध्वजम् ।

त्वमादिस्त्वमनादिश्च प्रकृतिस्त्वं जनार्दनः ॥

पुरुषस्त्वं जगन्नाथो विष्णुर्विश्वेश्वरो भवान् ।

योऽयं ब्रह्मासि पुरुषो विश्वमूर्तिः पितामहः ॥

विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन नन्दीश्वर बोले - [ हे सनत्कुमारजी! ] उन राजा क्षुपकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवताओं तथा दैत्योंसे १ पूजित, हाथोंमें शंख - चक्र - गदा - पद्म धारण किये हुए, पीत वस्त्र पहने हुए, सभी आभूषणोंसे सुशोभित एवं २ मुकुट धारण किये हुए लक्ष्मी तथा भूमिसहित गरुड़ध्वज श्रीमान् भगवान् पुरुषोत्तमने उन क्षुपको दिव्य दर्शन दिया ॥ १-२१२ ॥ ३ दिव्य दर्शनके अनन्तर उन गरुड़ध्वज भगवान् विष्णु देवको प्रणाम करके राजा क्षुप अत्यन्त प्रिय ४ वाणीमें उनकी स्तुति करने लगे ॥३२ ॥

आप आदि हैं तथा आप आदिरहित भी हैं । आप ही प्रकृति हैं, आप ही जनार्दन हैं, आप ही पुरुष हैं, ५ | आप ही जगन्नाथ, आप ही विष्णु तथा आप ही