लिङ्ग महापुराण — पृष्ठ 51–60

लिङ्ग महापुराण · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय ( विघ्न ) पाशुपतयोगकी प्राप्ति ४ ९ 35 356 35 95

आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् साक्षात्समरसे स्थितः ।

धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादश धारणम् ॥

ध्यानं द्वादशकं यावत्समाधिरभिधीयते ।

अथवा ज्ञानिनां विप्राः सम्पर्कादेव जायते ॥

प्रयत्नाद्वा तयोस्तुल्यं चिराद्वा ह्यचिराद् द्विजाः ।

योगान्तरायास्तस्याथ जायन्ते युञ्जतः पुनः ॥

नश्यन्त्यभ्यासतस्तेऽपि प्रणिधानेन वै गुरोः ॥

YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA YA इस प्रकार समरसमें स्थित विद्वान् साधक ईश्वर ११३ तथा जीवके ऐक्यको प्राप्त होकर उस रसजनित ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति कर लेता है ॥ ११२१ / २ ॥ बारह प्राणायामोंकी एक धारणा होती है, बारह धारणाओंका एक ध्यान होता है तथा बारह ध्यानोंकी Y63539595 ११४ एक समाधि कही जाती है ॥ ११३१/२ ॥ हे विप्रो! यह योगसिद्धि ज्ञानियोंके समागमसे अथवा प्रयत्न करनेसे प्राप्त होती है । वे दोनों साधन समान ही हैं । यह सिद्धि पूर्वजन्मके योगाभ्यासी साधकको शीघ्र तथा नवीनाभ्यासी साधकको विलम्बसे प्राप्त होती ११५ है । हे द्विजो! योगसाधनको अवधिमें बार - बार विघ्न भी उत्पन्न होते हैं, किंतु वे विघ्न निरन्तर अभ्यास करनेसे तथा गुरुके सान्निध्यसे नष्ट भी हो ११६ | जाते हैं ॥ ११४-११६ ॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽष्टाङ्गयोगनिरूपणं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' अष्टांगयोगनिरूपण ' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

नौवाँ अध्याय योगसाधनाके अन्तराय ( विघ्न ), योगसे प्राप्त होनेवाली विघ्नरूप विभिन्न सिद्धियाँ तथा ऐश्वर्य, गुणवैतृष्ण्य तथा वैराग्यसे पाशुपतयोगकी प्राप्ति सूत उवाच आलस्यं प्रथमं पश्चाद् व्याधिपीडा प्रजायते । प्रमादः संशयस्थाने चित्तस्येहानवस्थितिः

अश्रद्धादर्शनं भ्रान्तिर्दुःखं च त्रिविधं ततः ।

दौर्मनस्यमयोग्येषु विषयेषु च योगता ॥

दशधाभिप्रजायन्ते मुनेर्योगान्तरायकाः । आलस्यं चाप्रवृत्तिश्च गुरुत्वात्कायचित्तयोः

व्याधयो धातुवैषम्यात् कर्मजा दोषजास्तथा ।

प्रमादस्तु समाधेस्तु साधनानामभावनम् ॥

पातंजलयोगसूत्रमें योगके अन्तराय इस प्रकार बताये गये सूतजी बोले - [ हे मुनीश्वरो! ] योगसाधनके कालमें पहले आलस्य तथा बादमें व्याधिपीड़ा उत्पन्न ॥ १ होती है, इसी प्रकार प्रमाद, संशय, चित्तकी अनवस्थिति, अश्रद्धादर्शन, भ्रान्ति, त्रिविध दुःख, दौर्मनस्य ( मनमें असत्संकल्प - विकल्पका होना ), निषिद्ध विषयोंमें मनका २ लगना - ये कुल दस प्रकारके विघ्न * साधकके योगाभ्यासमें उत्पन्न होते हैं ॥ १-२१ / २ ॥ शरीर तथा चित्तके भारीपनके कारण योगमें प्रवृत्त ॥ ३ न होना ही आलस्य है । धातुवैषम्य ( न्यूनाधिक्य ) - के कारण क्रियासे होनेवाले तथा वात - पित्त आदि दोषोंसे होनेवाले विकार ही व्याधियाँ हैं । समाधिके साधनोंका ४ । अनुष्ठान न करना प्रमाद है॥३-४ ॥ हैं - व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वा-नवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः । ( पातंजलयोगप्रदीप समाधिपाद ३० ) अर्थात् व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, अनवस्थितत्व - ये चित्तके नौ विक्षेप [ योगके विघ्न ] हैं ।

पृष्ठ 52

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५० इदं वेत्युभयस्पृक्तं विज्ञानं स्थानसंशयः । अनवस्थितचित्तत्वमप्रतिष्ठा हि योगिनः लब्धायामपि भूमौ च चित्तस्य भवबन्धनात् श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग यह करूँ अथवा वह करू- इन दोनों स्थितियोंसे ॥ ५ मिश्रित अनिश्चिततापूर्ण विज्ञानको स्थानसंशय कहा गया है । समाधि अवस्थाको पाकर भी भवबन्धनके कारण योगीके चित्तका ( लक्ष्यमें ) न ठहर पाना

चित्तत्व है ॥ ५१/२ ॥

अश्रद्धाभावरहिता वृत्तिर्वै साधनेषु च ॥ ६ अनवस्थित-साध्ये चित्तस्य हि गुरौ ज्ञानाचारशिवादिषु । विपर्ययज्ञानमिति भ्रान्तिदर्शनमुच्यते

अनात्मन्यात्मविज्ञानमज्ञानात्तस्य सन्निधौ ।

दुःखमाध्यात्मिकं प्रोक्तं तथा चैवाधिभौतिकम् ॥

आधिदैविकमित्युक्तं त्रिविधं सहजं पुनः इच्छाविघातात्सङ्क्षोभश्चेतसस्तदुदाहृतम् दौर्मनस्यं निरोद्धव्यं वैराग्येण परेण तु । तमसा रजसा चैव संस्पृष्टं दुर्मनः स्मृतम् तदा मनसि सञ्जातं दौर्मनस्यमिति स्मृतम् । हठात्स्वीकरणं कृत्वा योग्यायोग्यविवेकतः विषयेषु विचित्रेषु जन्तोर्विषयलोलता अन्तराया इति ख्याता योगस्यैते हि योगिनाम् अत्यन्तोत्साहयुक्तस्य नश्यन्ति न च संशयः प्रनष्टेष्वन्तरायेषु द्विजाः पश्चाद्धि योगिनः उपसर्गाः प्रवर्तन्ते सर्वे तेऽसिद्धिसूचकाः प्रतिभा प्रथमा सिद्धिर्द्वितीया श्रवणा स्मृता वार्ता तृतीया विप्रेन्द्रास्तुरीया चेह दर्शना आस्वादा पञ्चमी प्रोक्ता वेदना षष्ठिका स्मृता स्वल्पषट्सिद्धिसन्त्यागात्सिद्धिदाः सिद्धयो मुनेः प्रतिभा प्रतिभावृत्तिः प्रतिभाव इति स्थितिः योगके साधन, साध्य, गुरु, ज्ञान, आचार तथा भगवान् शिव आदिमें चित्तकी सद्भावरहित वृत्तिका नाम ॥ ७ अश्रद्धा है ॥६२ ॥

समाधिके समीप पहुँचकर अज्ञानताके कारण अनात्मपदार्थोंमें आत्मज्ञानरूप विपरीत ज्ञान रखना ८ । भ्रान्तिदर्शन कहा जाता है ॥७१ / २ ॥ आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक— । ये तीन प्रकारके सहज दुःख बताये गये हैं । इच्छा-॥ ९ विघातके कारण चित्तमें उत्पन्न विक्षोभ ही दुःख कहा गया है ॥८ - ९ ॥ परम वैराग्यके द्वारा दौर्मनस्यको नियन्त्रित करना ॥ १० चाहिये । तमोगुण तथा रजोगुणसे मिला हुआ यह मन दुर्मन कहा गया है । इसलिये ऐसे मनमें उत्पन्न । होनेवाला दूषित भाव दौर्मनस्य कहा गया है ॥ १०२ ॥

॥ ११ योग्य तथा अयोग्य जानते हुए भी अयोग्य विषयोंके प्रति हठपूर्वक आसक्ति रखना ही विषय-। लोलता है । योगियोंके योगसाधनमें इन्हें विघ्नरूप कहा ॥ १२ गया है । अत्यन्त उत्साहसे युक्त होकर अभ्यास करनेवाले साधककी ये बाधाएँ दूर हो जाती हैं, इसमें । संशय नहीं है॥११-१२ / २ ॥ ॥ १३ हे द्विजो! इन विघ्नोंके समाप्त हो जानेके उपरान्त योगीके योगसाधनमें नानाविध उपसर्ग ( उपद्रव ) उत्पन्न होते । हैं । वे सभी उपसर्ग भी असिद्धिसूचक हैं ॥ १३२ ' २ ॥ १४ हे विप्रेन्द्रो! प्रतिभा पहली सिद्धि, श्रवणा दूसरी सिद्धि, वार्ता तीसरी सिद्धि, दर्शना चौथी सिद्धि, । आस्वादा पाँचवीं सिद्धि तथा वेदना छठी सिद्धि की ॥ १५ गयी है ॥ १४-१५ ॥ इन प्रतिभा आदि स्वल्प षट् सिद्धियोंके आकर्षणसे । मुक्त मुनिको अणिमादि सिद्धियाँ अभिलषित सिद्धि | १६ | प्रदान करती हैं, प्रत्येक पदार्थविषयक अवबोधात्मक

पृष्ठ 53

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अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय

बुद्धिर्विवेचना वेद्यं बुद्ध्यते बुद्धिरुच्यते ।

सूक्ष्मे व्यवहितेऽतीते विप्रकृष्टे त्वनागते ॥

सर्वत्र सर्वदा ज्ञानं प्रतिभानुक्रमेण तु ।

श्रवणात्सर्वशब्दानामप्रयत्नेन योगिनः ॥

ह्रस्वदीर्घप्लुतादीनां गुह्यानां श्रवणादपि ।

स्पर्शस्याधिगमो यस्तु वेदना तूपपादिता ॥

दर्शनाद्दिव्यरूपाणां दर्शनं चाप्रयत्नतः ।

संविद्दिव्यरसे तस्मिन्नास्वादो ह्यप्रयत्नतः ॥

वार्ता च दिव्यगन्धानां तन्मात्रा बुद्धिसंविदा ।

विन्दन्ते योगिनस्तस्मादाब्रह्मभवनं द्विजाः ॥

जगत्यस्मिन् हि देहस्थं चतुःषष्टिगुणं समम् ।

औपसर्गिकमेतेषु गुणेषु गुणितं द्विजाः ॥

सन्त्याज्यं सर्वथा सर्वमौपसर्गिकमात्मनः ।

पैशाचे पार्थिवं चाप्यं राक्षसानां पुरे द्विजाः ॥

याक्षे तु तैजसं प्रोक्तं गान्धर्वे श्वसनात्मकम् ।

ऐन्द्रे व्योमात्मकं सर्वं सौम्ये चैव तु मानसम् ॥

प्राजापत्ये त्वहङ्कारं ब्राह्मे बोधमनुत्तमम् ।

आद्ये चाष्टौ द्वितीये च तथा षोडशरूपकम् ॥

चतुर्विंशत्तृतीये तु द्वात्रिंशच्च चतुर्थके ।

चत्वारिंशत् पञ्चमे तु भूतमात्रात्मकं स्मृतम् ॥

गन्धो रसस्तथा रूपं शब्दः स्पर्शस्तथैव च ।

प्रत्येकमष्टधा सिद्धं पञ्चमे तच्छतक्रतोः ॥

( विघ्न ) पाशुपतयोगकी प्राप्ति ५१ फ्र वृत्तिको प्रतिभा कहते हैं, विवेचनापूर्वक वेद्य वस्तुको १७ जिससे जाना जाय, वह बुद्धि कही गयी है । अतीत ( भूत ), अनागत ( भविष्य ), सूक्ष्म, अदृष्ट, दूरस्थ, अत्यन्त समीप ( वर्तमान ) पदार्थोंका सर्वदा एवं सर्वत्र १८ ज्ञान प्रदान करनेवाली प्रतिभासिका वृत्ति ही प्रतिभा है ॥ १६-१७१ / २ ॥ सभी शब्दों, ह्रस्व - दीर्घ- प्लुत आदि स्वरों तथा गुह्य ध्वनियोंका बिना किसी प्रयासके श्रवण होकर १ ९ उनका यथार्थ ज्ञान हो जाना श्रवणासिद्धि है और स्पर्शकी जो अनुभूति है, वह वेदनासिद्धि कही गयी है ॥ १८-१९ ॥ २० बिना किसी प्रयत्नके दिव्य रूपोंका भी नेत्रेन्द्रियसे दिखायी पड़ना दर्शनासिद्धि है और दिव्य रसोंका सहज रूपमें बिना किसी प्रयत्नके ठीक - ठीक ज्ञान होना २१ आस्वादासिद्धि है । इसी तरह बुद्धिके द्वारा दिव्य गन्धों का भी ठीक - ठीक गन्धतन्मात्राके रूपमें अनुभव कर लेना वार्तासिद्धि है ॥ २० १/२ ॥ हे द्विजो! इस योगजनित धर्मरूप संसर्गसे योगीलोग २२ इस जगत्में ब्रह्मलोकपर्यन्त जो सब कुछ है, उसे अपने देहमें स्थित देखते हैं । हे द्विजो! आगे बताये जानेवाले आठ गुण वृद्धिक्रमसे गुणित होकर संख्यामें चौंसठ २३ गुणोंके बराबर हो जाते हैं॥२१-२२ ॥ हे द्विजो! साधकको अपने इन औपसर्गिक अर्थात् विघ्नकारी गुणोंका सर्वथा परित्याग कर देना २४ चाहिये । पिशाचलोकमें पार्थिव गुण, राक्षसलोकमें जल-सम्बन्धी गुण, यक्षलोकमें तेजसम्बन्धी गुण, गन्धर्वलोक में वायुसम्बन्धी गुण, इन्द्रलोकमें व्योमात्मक अर्थात् आकाशसम्बन्धी गुण, सोमलोकमें मनसम्बन्धी गुण, २५ प्रजापतिलोकमें अहंकारसम्बन्धी गुण तथा ब्रह्मलोकमें सर्वोत्तम बोधगुण कहे गये हैं ॥ २३-२४१ / २ ॥ पहले पार्थिवमें आठ गुण, दूसरे जलमें सोलह २६ गुण, तीसरे तेजमें चौबीस गुण, चौथे वायुमें बत्तीस गुण तथा पाँचवें आकाशमें चालीस गुणवाले ऐश्वर्य विद्यमान हैं । गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द पूर्वोक्त पंचमहाभूतोंकी २७ । तन्मात्राएँ कही गयी हैं । इन्द्रसम्बन्धी व्योमात्मक गुणपर्यन्त

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५२ तथाष्टचत्वारिंशच्च षट्पञ्चाशत्तथैव च चतुःषष्टिगुणं ब्राह्मं लभते द्विजसत्तमाः औपसर्गिकमाब्रह्मभुवनेषु परित्यजेत् लोकेष्वालोक्य योगेन योगवित्परमं सुखम्

स्थूलता ह्रस्वता बाल्यं वार्धक्यं यौवनं तथा ।

नानाजातिस्वरूपं च चतुर्भिर्देहधारणम् ॥

पार्थिवांशं विना नित्यं सुरभिर्गन्धसंयुतः ।

एतदष्टगुणं प्रोक्तमैश्वर्यं पार्थिवं महत् ॥

जले निवसनं यद्वद्भूम्यामिव विनिर्गमः । इच्छेच्छक्तः स्वयं पातुं समुद्रमपि नातुरः

यत्रेच्छति जगत्यस्मिंस्तत्रास्य जलदर्शनम् ।

यद्यद्वस्तु समादाय भोक्तुमिच्छति कामतः ॥

तत्तद्रसान्वितं तस्य त्रयाणां देहधारणम् ।

भाण्डं विनाथ हस्तेन जलपिण्डस्य धारणम् ॥

अव्रणत्वं शरीरस्य पार्थिवेन समन्वितम् ।

एतत् षोडशकं प्रोक्तमाप्यमैश्वर्यमुत्तमम् ॥

देहादग्निविनिर्माणं तत्तापभयवर्जितम् ।

लोकं दग्धमपीहान्यददग्धं स्वविधानतः ॥

जलमध्ये हुतवहं चाधाय परिरक्षणम् ।

अग्निनिग्रहणं हस्ते स्मृतिमात्रेण चागमः ॥

भस्मीभूतविनिर्माणं यथापूर्वं सकामतः ।

द्वाभ्यां रूपविनिष्पत्तिर्विना तैस्त्रिभिरात्मनः ॥

चतुर्विंशात्मकं ह्येतत्तैजसं मुनिपुङ्गवाः । मनोगतित्वं श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । इन पाँचोंमें प्रत्येक आठ - आठके वृद्धिक्रमसे बताये जा ॥ २८ चुके हैं ॥ २५ - २७ ॥ हे उत्तम द्विजो! इसी प्रकार मनसम्बन्धी अड़तालीस । गुण तथा अहंकारसम्बन्धी छप्पन गुण और अन्तमें ॥ २ ९ चौंसठ गुणात्मक ब्राह्म अर्थात् बुद्धिसम्बन्धी ब्रह्मके ऐश्वर्यको साधक प्राप्त कर लेता है ॥ २८ ॥

जो योगी ब्रह्मलोकपर्यन्त सभी लोकोंमें औपसर्गिक ३० अर्थात् योगविघ्नोंको विचारपूर्वक उनका परित्याग कर देता है, वह परम सुखी हो जाता ॥ २ ९ ॥ शरीरकी स्थूलता, ह्रस्वता, बालकपन, वृद्धता, ३१ यौवन, अनेकविध रूप धारण करना, बिना पार्थिव अंशके शेष चार तत्त्वोंसे देह धारण करना तथा नित्य सुगन्धिसे युक्त रहना - ये आठ प्रकारके महान् पार्थिव || ३२ गुण कहे गये हैं ॥ ३०-३१ ॥ पृथ्वीपर रहनेकी भाँति जलमें निवास करना, उससे बाहर आनेकी सामर्थ्य रखना, इच्छा होनेपर स्वयं ३३ | सम्पूर्ण समुद्रका पान करनेमें समर्थ होना तथा उससे किसी प्रकारका प्रतिकूल प्रभाव न पड़ना, इस जगत्में जहाँ भी इच्छा करे, वहाँ जलका दर्शन कर लेना, ३४ जिस - जिस वस्तुका भक्षण किया जाय, उसे अपनी इच्छाके अनुसार रसयुक्त बना देना, तेज, वायु, आकाश-इन तीनोंसे देह धारण करना, बिना पात्रके हाथसे ३५ जलपिण्डका धारण करना तथा शरीरमें व्रण आदिका | न होना- इन आठ तथा पूर्वोक्त पार्थिव गुणोंको मिलाकर— ये सोलह गुणात्मक आप्य ( जलसम्बन्धी ) उत्तम ऐश्वर्य ३६ | कहे गये हैं ॥ ३२–३५ ॥ श्रेष्ठ मुनियो! देहसे अग्निका निर्माण, अग्निके तापका भय न होना, दग्धलोकको भी अपने योगविधानसे ३७ अदग्धतुल्य अर्थात् पूर्ववत् कर देना, जलके भीतर अग्नि स्थापित करके उसे वैसे ही बनाये रखना, हाथसे आग पकड़ लेना, स्मरणमात्रसे अग्नि प्रकट कर देना, ३८ भस्म हुए पदार्थको इच्छापूर्वक पहलेकी भाँति कर देना तथा उन तीनों ( पृथ्वी, जल, तेज ) - के बिना दो तत्त्वों अर्थात् वायु और आकाशसे अपनी देह धारण करना—

भूतानामन्तर्निवसनं तथा ॥३ ९ । ये चौबीस गुणवाले तैजस ऐश्वर्य हैं ॥ ३६–३८ / २ ॥

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अध्याय ९ ] योगसाधनाके अन्तराय

पर्वतादिमहाभारस्कन्धेनोद्वहनं पुनः ।

लघुत्वं च गुरुत्वं च पाणिभ्यां वायुधारणम् ॥

अङ्गुल्यग्रनिघातेन भूमेः सर्वत्र कम्पनम् ।

एकेन देहनिष्पत्तिर्वातैश्वर्यं स्मृतं बुधैः ॥

छायाविहीननिष्पत्तिरिन्द्रियाणां च दर्शनम् ।

आकाशगमनं नित्यमिन्द्रियार्थैः समन्वितम् ॥

दूरे च शब्दग्रहणं सर्वशब्दावगाहनम् ।

तन्मात्रलिङ्गङ्ग्रहणं सर्वप्राणिनिदर्शनम् ॥

ऐन्द्रमैश्वर्यमित्युक्तमेतैरुक्तः पुरातनः ।

यथाकामोपलब्धिश्च यथाकामविनिर्गमः ॥

सर्वत्राभिभवश्चैव सर्वगुह्यनिदर्शनम् ।

कामानुरूपनिर्माणं वशित्वं प्रियदर्शनम् ॥

संसारदर्शनं चैव मानसं गुणलक्षणम् ।

छेदनं ताडनं बन्धं संसारपरिवर्तनम् ॥

सर्वभूतप्रसादश्च मृत्युकालजयस्तथा ।

प्राजापत्यमिदं प्रोक्तमाहङ्कारिकमुत्तमम् ॥

अकारणजगत्सृष्टिस्तथानुग्रह एव च ।

प्रलयश्चाधिकारश्च लोकवृत्तप्रवर्तनम् ॥

असादृश्यमिदं व्यक्तं निर्माणं च पृथक् पृथक् ।

संसारस्य च कर्तृत्वं ब्राह्ममेतदनुत्तमम् ॥

एतावत्तत्त्वमित्युक्तं प्राधान्यं वैष्णवं पदम् ।

ब्रह्मणा तद्गुणं शक्यं वेत्तुमन्यैर्न शक्यते ॥

विद्यते तत्परं शैवं विष्णुना नावगम्यते । ( विघ्न ) पाशुपतयोगकी प्राप्ति ५३ मनकी गति प्राप्त कर लेना अर्थात् जहाँ मनकी ४० इच्छा हो वहाँ चले जाना, अन्य प्राणियोंके अन्तर्मनमें निवास करना, पर्वत आदि महाभार कंधेपर धारण करके चलना, हलका तथा भारी होनेकी सामर्थ्य रखना, ४१ हाथोंसे वायु पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागसे आघात करके पृथ्वीमें सर्वत्र कम्पन उत्पन्न कर देना, केवल आकाश तत्त्वसे देह धारण करना - ये वातसम्बन्धी ४२ ऐश्वर्य विद्वानोंके द्वारा कहे गये हैं ॥३ ९ -४१ ॥ शरीरकी छाया न होना, इन्द्रियोंका प्रत्यक्ष दर्शन होना, आकाशमें गमन करना, इन्द्रियोंके अर्थका ज्ञान, ४३ दूरसे ही शब्दोंको सुननेकी क्षमता रखना, सभी शब्दोंके ज्ञानमें पारंगत होना, तन्मात्राओंके स्वरूपका ज्ञान तथा सभी प्राणियोंको साक्षात् देखनेमें समर्थ होना - ये ऐन्द्र ४४ ऐश्वर्य अर्थात् आकाशसम्बन्धी ऐश्वर्य हैं । इन समस्त पाँच प्रकारके ऐश्वर्योंसे युक्त साधक कायव्यूहसामर्थ्यवान् कहा जाता है॥४२-४३१ / २ ॥ ४५ किसी भी अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति, जहाँ भी जानेकी इच्छा हो, वहाँ पहुँच जाना, सभी जगह अपना शक्तिप्राबल्य प्रदर्शित करना अर्थात् अपने प्रभावसे ४६ | सभीको पराभूत कर देना, सभी गुप्त पदार्थोंको देख लेना, अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करना, सभीको अपने वशमें कर लेना, सभीको प्रिय लगना, ४७ सम्पूर्ण जगत्को देखनेकी सामर्थ्य रखना – ये सब मानस गुणोंके लक्षण हैं ॥ ४४-४५१ / २ ॥ छेदन, ताड़न, बन्ध, संसारपरिवर्तन, सर्वभूतप्रसाद, ४८ मृत्यु तथा कालका जय - ये प्रजापतिसम्बन्धी श्रेष्ठ आहंकारिक ऐश्वर्य कहे गये हैं ॥ ४६-४७ ॥। बिना कारण जगत्की सृष्टि, अनुग्रह, प्रलय, ४ ९ अधिकार, लोकवृत्तका प्रवर्तन, असादृश्य, पृथक् - पृथक् व्यक्त निर्माण तथा संसारका कर्तृत्व- - यह उत्तम ब्राह्म ऐश्वर्य है ॥ ४८-४९ ॥ ५० ये ब्राह्म ऐश्वर्यके तत्त्व कहे गये हैं और ये ही प्रधानसम्बन्धी वैष्णव पद हैं । ब्रह्माके बिना उस गुणको अन्य कोई नहीं जान सकता है ॥५० ॥

शुद्धं को जानीयाच्छिवात्मकम् ॥५१ उस वैष्णवपदसे भी परे शैवपद है, जिसे विष्णु असंख्येयगुणं

पृष्ठ 56

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५४ व्युत्थाने सिद्धयश्चैता ह्युपसर्गाश्च कीर्तिताः निरोद्धव्याः प्रयत्नेन वैराग्येण परेण तु नाशातिशयतां ज्ञात्वा विषयेषु भयेषु च । अश्रद्धया त्यजेत्सर्वं विरक्त इति कीर्तितः वैतृष्ण्यं पुरुषे ख्यातं गुणवैतृष्ण्यमुच्यते । वैराग्येणैव सन्त्याज्याः सिद्धयश्चौपसर्गिकाः औपसर्गिकमाब्रह्मभुवनेषु परित्यजेत् । निरुद्ध्यैव त्यजेत्सर्वं प्रसीदति महेश्वरः

प्रसन्ने विमला मुक्तिर्वैराग्येण परेण वै ।

अथवानुग्रहार्थं च लीलार्थं वा तदा मुनिः ॥

अनिरुद्ध्य विचेष्टेद्यः सोऽप्येवं हि सुखी भवेत् ।

क्वचिद्भूमिं परित्यज्य ह्याकाशे क्रीडते श्रिया ॥

उद्गिरेच्च क्वचिद्वेदान् सूक्ष्मानर्थान् समासतः ।

क्वचिच्छुते तदर्थेन श्लोकबन्धं करोति सः ॥

क्वचिद्दण्डकबन्धं तु कुर्याद् बन्धं सहस्रशः ।

मृगपक्षिसमूहस्य रुतज्ञानं च विन्दति ॥

ब्रह्माद्यं स्थावरान्तं च हस्तामलकवद्भवेत् ।

बहुनात्र किमुक्तेन विज्ञानानि सहस्त्रशः ॥

उत्पद्यन्ते मुनिश्रेष्ठा मुनेस्तस्य महात्मनः ।

अभ्यासेनैव विज्ञानं विशुद्धं च स्थिरं भवेत् ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग । । भी नहीं जानते हैं । असंख्य गुणोंवाले शुद्ध शिवात्मक ॥ ५२ तत्त्वको कौन जान सकता है अर्थात् कोई नहीं जान सकता ॥ ५१ ॥

चौंसठ गुणात्मक ये ऐश्वर्य व्यवहारकालमें सिद्धि कहे जाते हैं, किंतु समाधिकालमें ये ही उपसर्ग अर्थात् ॥ ५३ विघ्न कहे गये हैं । इन्हें प्रयत्नपूर्वक परम वैराग्यसे रोकना चाहिये ॥ ५२ ॥

भय उत्पन्न करनेवाले विषय - भोगोंकी अवश्यम्भाव ॥ ५४ नश्वरता जानकर सबका अश्रद्धासे त्याग कर देना चाहिये । ऐसा करनेवाला विरक्त कहा जाता है ॥ ५३ ॥

पुरुषमें वितृष्णा नामसे प्रसिद्ध भावको ही गुणवैतृष्ण्य कहा जाता है । औपसर्गिक अर्थात् विघ्नरूप सिद्धियोंका ॥ ५५ वैराग्यके द्वारा परित्याग कर देना चाहिये ॥५४ ॥

चित्तको विषयभोगोंसे हटाकर भुवनोंमें समस्त विघ्नरूप ब्राह्म ऐश्वर्योंका परित्याग करनेसे महेश्वर ५६ प्रसन्न होते हैं और इस प्रकार साधकके परम वैराग्यसे शिवके प्रसन्न होनेपर उसे विमल मुक्ति प्राप्त होती है अथवा जो योगी सांसारिक प्राणियोंके कल्याणार्थ या लीलाके निमित्त इन सिद्धियोंका त्याग नहीं करता, वह ५७ भी सुखी ही रहता है ॥ ५५-५६ १/२ ॥ कभी भूमि छोड़कर अपनी प्रबल शक्तिसे आकाशमें क्रीडा करता है और कभी सूक्ष्म अर्थात् सामान्य ५८ लोगोंके लिये अबोधगम्य वेदार्थोंको संक्षेपमें उच्चारित करता है ॥५७१ / २ ॥ वह कभी कोई प्रसंग सुनकर उसके अर्थसे

श्लोक- रचना कर डालता है । कभी दण्डक छन्दमें और

५ ९ इसी प्रकार हजारों प्रकारके छन्दोंमें काव्यरचना करता | है ॥ ५८ ९ २ ॥ उसे मृग तथा पक्षिवर्गकी ध्वनियोंका ज्ञान हो ६० जाता है । यहाँतक कि ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समग्र संसार उस योगीके लिये हस्तामलकतुल्य हो जाता | है ॥ ५ ९ २ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो! अधिक क्या कहा जाय; उस ६१ | महात्मा योगीमें हजारों प्रकारके विज्ञान उत्पन्न हो जाते

पृष्ठ 57

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अध्याय १० ] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण

तेजोरूपाणि सर्वाणि सर्वं पश्यति योगवित् ।

देवबिम्बान्यनेकानि विमानानि सहस्रशः ॥ ६२

पश्यति ब्रह्मविष्णवीन्द्रयमाग्निवरुणादिकान् ।

ग्रहनक्षत्रताराश्च भुवनानि सहस्रशः ॥ ६३

पातालतलसंस्थाश्च समाधिस्थः स पश्यति ।

आत्मविद्याप्रदीपेन स्वस्थेनाचलनेन तु ॥ ६४

प्रसादामृतपूर्णेन सत्त्वपात्रस्थितेन तु ।

तमो निहत्य पुरुषः पश्यति ह्यात्मनीश्वरम् ॥ ६५

तस्य प्रसादाद्धर्मश्च ऐश्वर्यं ज्ञानमेव च ।

वैराग्यमपवर्गश्च नात्र कार्या विचारणा ॥ ६६

न शक्यो विस्तरो वक्तुं वर्षाणामयुतैरपि ।

योगे पाशुपते निष्ठा स्थातव्यं च मुनीश्वराः ॥ ६७

भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५५ हैं । सतत अभ्यासके द्वारा ही यह विशुद्ध विज्ञान सदा स्थिर रहता है ॥ ६०-६१ ॥ योगी सभी तेजसम्पन्न देवताओंके बिम्ब तथा हजारों प्रकारके विमानोंको देखनेकी सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है ॥ ६२ ॥

वह ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, यम, अग्नि, वरुण आदि देवताओं, ग्रहों, नक्षत्रों, तारों तथा हजारों भुवनोंको देख लेता है ॥ ६३ ॥

वह पातालके तलमें स्थित पदार्थोंको भी आत्मविद्यारूप स्वस्थ तथा अचल दीपकसे समाधिस्थ होकर देखता है ॥ ६४ ॥

वह साधक प्रसादरूप अमृतसे पूर्ण सत्त्वपात्रमें स्थित उस आत्मविद्यारूप प्रदीपसे अज्ञानान्धकारको नष्ट करके अपने भीतर साक्षात् ईश्वरका दर्शन करता है ॥ ६५ ॥

उसी परमेश्वरकी कृपासे धर्म, ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य तथा मोक्ष सुलभ हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं करना चाहिये ॥ ६६ ॥

हे मुनीश्वरो! शिवकी महिमाका विस्तृत वर्णन हजारों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है । अतएव पाशुपतयोगमें निष्ठापूर्वक रहना चाहिये तथा उसीमें सदा । मनको स्थिर रखना चाहिये ॥६७ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगान्तरायकथनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ' योगान्तरायकथन ' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

दसवाँ अध्याय योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण, साधुधर्मका स्वरूप, भगवान् शिवके साक्षात्कारके उपायोंका वर्णन तथा भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता सूत उवाच सूतजी बोले- हे उत्तम ब्राह्मणो! संत, जितेन्द्रिय, सतां जितात्मनां साक्षाद् द्विजातीनां द्विजोत्तमाः । साक्षात् द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ), धर्मज्ञ, साधु, धर्मज्ञानां च साधूनामाचार्याणां शिवात्मनाम् ॥ १ आचार्य, शिवात्मा, दयावान्, तपस्वी, संन्यासी, द्विजश्रेष्ठास्तथा चैव तपस्विनाम् । वैराग्य - परायण, ज्ञानी, मनपर नियन्त्रण रखनेवाले, दयावतां संन्यासिनां विरक्तानां ज्ञानिनां वशगात्मनाम् ॥ २ | दानी, उदार, मनसा - वाचा - कर्मणा सत्यवादी, अलुब्ध,

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५६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग 5 दानिनां चैव दान्तानां त्रयाणां सत्यवादिनाम् । | योगपरायण, श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वेत्ता, श्रुतियों तथा सयोगानां श्रुतिस्मृतिविदां द्विजाः ॥ ३ स्मृतियोंका अनुकरण करनेवालोंका विरोध न करनेवाले अलुब्धानां लोगोंपर महेश्वर प्रसन्न रहते हैं॥१-३१ / २ ॥ श्रौतस्मार्ताविरुद्धानां प्रसीदति महेश्वरः । सत् शब्दका अर्थ ब्रह्म होता है । जो अन्तमें उस सदिति ब्रह्मणः शब्दस्तदन्ते ये लभन्त्युत ॥ ४ ब्रह्मको पा लेते हैं, वे ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होते हैं, सायुज्यं ब्रह्मणो यान्ति तेन सन्तः प्रचक्षते दशात्मके ये विषये साधने चाष्टलक्षणे न क्रुध्यन्ति न हृष्यन्ति जितात्मानस्तु ते स्मृताः सामान्येषु च द्रव्येषु तथा वैशेषिकेषु च ब्रह्मक्षत्रविशेो यस्माद्युक्तास्तस्माद् द्विजातयः वर्णाश्रमेषु युक्तस्य स्वर्गादिसुखकारिणः श्रौतस्मार्तस्य धर्मस्य ज्ञानाद्धर्मज्ञ उच्यते विद्यायाः साधनात्साधुर्ब्रह्मचारी गुरोर्हितः क्रियाणां साधनाच्चैव गृहस्थः साधुरुच्यते साधनात्तपसोऽरण्ये साधुर्वैखानसः स्मृतः यतमानो यतिः साधुः स्मृतो योगस्य साधनात् । एवमाश्रमधर्माणां साधनात्साधवः स्मृताः गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थो यतिस्तथा धर्माधर्माविह प्रोक्तौ शब्दावेतौ क्रियात्मकौ कुशलाकुशलं कर्म धर्माधर्माविति स्मृतौ । धारणार्थे महान् ह्येष धर्मशब्दः प्रकीर्तितः

अधारणे महत्त्वे च अधर्म इति चोच्यते ।

अत्रेष्टप्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते ॥

अधर्मश्चानिष्टफलो ह्याचार्यैरुपदिश्यते ।

वृद्धाश्चालोलुपाश्चैव आत्मवन्तो ह्यदाम्भिकाः ॥

सम्यग्विनीता ऋजवस्तानाचार्यान् प्रचक्षते ।

स्वयमाचरते यस्मादाचारे स्थापयत्यपि ॥

इसीलिये ऐसे महात्मा संत कहे जाते हैं ॥४२ ॥

। दस इन्द्रियोंके विषयभोगोंमें तथा पूर्ववर्णित आठ ॥ ५ प्रकारके ऐश्वर्यरूप साधनोंकी अप्राप्तिसे जो न तो क्रोध करते हैं और न उनकी प्राप्तिसे हर्षका अनुभव करते । हैं, वे जितात्मा कहे गये हैं ॥ ५१/२ ॥ ॥ ६ सामान्य तथा विशेष पदार्थोंके साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका सम्बन्धविशेष होनेसे ही ये द्विजाति । कहे गये हैं ॥६२ ॥

॥ ७ स्वर्ग आदिका सुख प्रदान करनेवाले श्रुति - स्मृति-प्रतिपादित वर्णाश्रम धर्मका ज्ञान रखनेसे व्यक्ति धर्मज्ञ

कहा जाता है ॥७१२ ॥

॥ ८ विद्याकी साधना करनेके कारण गुरुका हित । करनेवाला ब्रह्मचारी साधु तथा विहित कर्मोंकी साधना करनेवाला गृहस्थ साधु कहा जाता है । वनमें तपस्या की ॥ ९ साधना करनेसे वैखानस साधु एवं योगकी साधना करने तथा यतिधर्ममें परायण होनेसे व्यक्ति यति साधु कहा जाता है । इस प्रकार अपने - अपने आश्रमोंके धर्मोंका ॥ १० साधन करनेसे गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा यति-। ये सभी साधु कहे गये हैं॥८–१० / २ ॥ ॥ ११ धर्म तथा अधर्म- ये दोनों शब्द क्रियाके वाचक । कहे गये हैं । कुशल कर्मको धर्म तथा अकुशल कर्मको अधर्म कहा गया है ॥ ११२ ॥

॥ १२ महत्तायुक्त यह धर्म शब्द धारणके अर्थमें कहा गया है तथा अधारण ( धारण न करने ) - को उद्देश्य करके कृत कर्म अधर्म कहा जाता है ॥ १२२ ॥

१३ जिससे अभीष्टकी प्राप्ति हो, उसे आचार्यलोग धर्म कहते हैं तथा जिससे अनिष्ट फलकी प्राप्ति हो, उसे आचार्यलोग अधर्म कहते हैं ॥ १३१ / २ ॥ १४ वृद्ध, निर्लोभी, जितेन्द्रिय, दम्भ न करनेवाले, पूर्ण विनम्र, सरल स्वभाववाले लोगोंको आचार्य कहा जाता | है ॥ १४२ ॥

१५ जो स्वयं आचरण करता है तथा सभीको आचारमें

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अध्याय १० ] योगसिद्धिप्राप्त पुरुषोंके लक्षण

आचिनोति च शास्त्रार्थानाचार्यस्तेन चोच्यते ।

विज्ञेयं श्रवणाच्छ्रौतं स्मरणात्स्मार्तमुच्यते ॥ १६

इज्या वेदात्मकं श्रौतं स्मार्तं वर्णाश्रमात्मकम् ।

दृष्ट्वानुरूपमर्थं यः पृष्टो नैवापि गूहति ॥ १७

यथादृष्टप्रवादस्तु सत्यं लैङ्गेऽत्र पठ्यते ।

ब्रह्मचर्यं तथा मौनं निराहारत्वमेव च ॥ १८

अहिंसा सर्वतः शान्तिस्तप इत्यभिधीयते ।

आत्मवत्सर्वभूतेषु यो हितायाहिताय च ॥ १ ९

वर्तते त्वसकृद्वृत्तिः कृत्स्ना ह्येषा दया स्मृता ।

यद्यदिष्टतमं द्रव्यं न्यायेनैवागतं क्रमात् ॥ २०

तत्तद्गुणवते देयं दातुस्तद्दानलक्षणम् ।

दानं त्रिविधमित्येतत्कनिष्ठज्येष्ठमध्यमम् ॥ २१

कारुण्यात्सर्वभूतेभ्यः संविभागस्तु मध्यमः ।

श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः ॥ २२

शिष्टाचाराविरुद्धश्च स धर्मः साधुरुच्यते ।

मायाकर्मफलत्यागी शिवात्मा परिकीर्तितः ॥ २३

निवृत्तः सर्वसङ्गेभ्यो युक्तो योगी प्रकीर्तितः ।

असक्तो भयतो यस्तु विषयेषु विचार्य च ॥ २४

अलुब्धः संयमी प्रोक्तः प्रार्थितोऽपि समन्ततः ।

आत्मार्थं वा परार्थं वा इन्द्रियाणीह यस्य वै ॥ २५

न मिथ्या सम्प्रवर्तन्ते शमस्यैव तु लक्षणम् ।

अनुद्विग्नो ह्यनिष्टेषु तथेष्टान्नाभिनन्दति ॥ २६

भक्तिभावमें श्रद्धाकी महत्ता ५७ नियोजित करता है एवं शास्त्रोंके अर्थोंका परिशीलन करता है; वह आचार्य कहा जाता है ॥१५१ / २ ॥ वेदोंका श्रवण करनेसे श्रौत तथा शास्त्रोंके अर्थोंका स्मरण करनेसे स्मार्त कहा जाता है । वेदविहित यज्ञ आदि करनेवाला श्रौत तथा वर्णाश्रमसम्बन्धी नियमोंका पालन करनेवाला स्मार्त कहा जाता है ॥ १६१ / २ ॥ किसीके द्वारा पूछनेपर देखे गये अनुरूप ( कथनयोग्य ) तथा अननुरूप ( कथनके अयोग्य ) विषयको बिना छिपाये अभिव्यक्त करनेको लिङ्गपुराणके अनुसार सत्य कहा गया है ॥१७१ / २ ॥ ब्रह्मचर्य, मौन, निराहार, अहिंसा तथा सर्वविध शान्तिको तप कहा गया है ॥१८ / २ ॥ जो पुरुष सदा अपने ही हित तथा अहितकी भाँति सभी प्राणियोंके हिताहितका ध्यान रखता है; उसकी यह निरन्तर बनी रहनेवाली वृत्ति पूर्णतः दया कही गयी है ॥ १ ९ २ ॥ क्रमसे न्यायपूर्वक अर्जित अभीष्टतम द्रव्य गुणीको ही दिया जाना चाहिये । दाताके द्वारा प्रदत्त दानका यही लक्षण है । वह दान भी कनिष्ठ, मध्यम तथा श्रेष्ठ - तीन प्रकारका होता है । करुणापूर्वक सभी प्राणियोंके निमित्त धनका विभाग करना मध्यम दान है ॥ २० - २१ १/२ ॥ श्रुतियों तथा स्मृतियोंसे विहित वर्णाश्रमसम्बन्धी तथा शिष्टाचारके अनुकूल जो धर्म है, वह साधुधर्म कहा जाता है ॥२२ ९ / २ ॥ मायायुक्त कर्मफलका त्याग करनेवाला शिवात्मा कहा जाता है तथा सभी आसक्तियोंसे निवृत्त प्राणी युक्त - योगी कहा जाता है ॥ २३१/२ ॥ अनासक्त तथा पुनः - पुनः जन्म - मृत्युके भयसे भीत होकर विषयभोगोंकी नश्वरतापर विचार करके सभी ओरसे प्रलोभन दिये जानेपर भी जो अलुब्ध बना रहता है, वह संयमी कहा जाता है ॥ २४ ९ / २ ॥ अपने लिये अथवा दूसरेके लिये जिस व्यक्तिकी इन्द्रियाँ मिथ्या प्रवृत्त नहीं होतीं, वह शमके लक्षणोंवाला कहा जाता है ॥ २५ ९ ॥ जो अनिष्ट अर्थात् प्रतिकूल विषयोंपर उद्विग्न

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श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ५८ 96 96 96 96 96 96 96 96 96 36 प्रीतितापविषादेभ्यो

********* विनिवृत्तिर्विरक्तता ।

संन्यासः कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह ॥

कुशलाकुशलानां तु प्रहाणं न्यास उच्यते ।

अव्यक्ताद्यविशेषान्ते विकारेऽस्मिन्नचेतने ॥

चेतनाचेतनान्यत्वविज्ञानं ज्ञानमुच्यते ।

एवं तु ज्ञानयुक्तस्य श्रद्धायुक्तस्य शङ्करः ॥

प्रसीदति न सन्देहो धर्मश्चायं द्विजोत्तमाः ।

किं तु गुह्यतमं वक्ष्ये सर्वत्र परमेश्वरे ॥

भवे भक्तिर्न सन्देहस्तया युक्तो विमुच्यते ।

अयोग्यस्यापि भगवान् भक्तस्य परमेश्वरः ॥

प्रसीदति न सन्देहो निगृह्य विविधं तमः ।

ज्ञानमध्यापनं होमो ध्यानं यज्ञस्तपः श्रुतम् ॥

दानमध्ययनं सर्वं भवभक्त्यै न संशयः चान्द्रायणसहस्त्रैश्च प्राजापत्यशतैस्तथा मासोपवासैश्चान्यैर्वा भक्तिर्मुनिवरोत्तमाः अभक्ता भगवत्यस्मिँल्लोके गिरिगुहाशये पतन्ति चात्मभोगार्थं भक्तो भावेन मुच्यते भक्तानां दर्शनादेव नृणां स्वर्गादयो द्विजाः | नहीं होता तथा अनुकूल विषयोंकी प्राप्तिपर हर्षित नहीं २७ होता; वह प्रीति, संताप तथा विषादसे रहित हो जाता है । उसकी यह विनिवृत्ति ही विरक्तता ( विराग ) कही जाती है ॥२६१२ ॥

निषिद्ध कर्मोंसहित विहित कर्मोंमें दोष - गुण बुद्धिका २८ न्यास ( त्याग ) ही संन्यास है और इष्ट और अनिष्ट कर्मोंका भलीभाँति छोड़ना ही न्यास है ॥ २७ ९ ॥ अव्यक्त अर्थात् प्रकृतिसे लेकर परमाणुपर्यन्त इस जड जगत्के सभी पदार्थोंसे ईश्वरको पृथक् जानना ही वास्तविक ज्ञान है ॥ २८ ९ २ ॥ २ ९ हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकारके ज्ञान तथा भक्ति ( श्रद्धा ) - से सम्पन्न पुरुषके ऊपर भगवान् शंकर अवश्य प्रसन्न होते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है और वास्तवमें ३० यही धर्म है ॥२ ९ / २ 11 ' परम गुह्य रहस्य क्या है ' अब मैं आप लोगोंको वह बताता हूँ । सर्वव्यापी परमेश्वर शिवमें भक्ति रखनी चाहिये । उस भक्तिसे युक्त प्राणी नि: संदेह मुक्ति प्राप्त ३१ कर लेता है ॥ ३०१ / २ ॥ पात्रता न होनेपर भी उनकी परम भक्तिसे युक्त प्राणीके विविध अज्ञानरूप अन्धकारोंको दूर करके महेश्वर शिव उसपर प्रसन्न हो जाते हैं; इसमें संदेह ३२ नहीं है ॥ ३१ ९ / २ ॥ ज्ञान, अध्यापन, होम, ध्यान, यज्ञ, तप, वेद, दान, अध्ययन - ये सभी शिवकी भक्ति प्राप्त करनेके साधन । हैं; इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है ॥ ३२ ९ / २ ॥ ॥ ३३ मुनीश्वरो! हजारों चान्द्रायण तथा सैकड़ों प्राजापत्यव्रतों, मासपर्यन्त किये गये उपवासों तथा अन्य अनुष्ठान आदिकी अपेक्षा शिवभक्ति ही श्रेष्ठ । | है ॥ ३३२ ॥

॥ ३४ भगवान् शिवकी भक्तिसे हीन प्राणी स्वर्गादिकी प्राप्तिके लिये अनेकविध कर्मजालमें फँसकर गहन गिरि-गुहारूपी इस मृत्युलोकमें बार - बार गिरते रहते हैं, किंतु । भक्तिभावसे युक्त प्राणी मुक्त हो जाता है ॥ ३४२ ॥

॥ ३५ हे द्विजो! भगवान् शिवके भक्तोंके दर्शनमात्रसे