स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस — पृष्ठ 281–290

स्तोत्र रत्नावली गीता प्रेस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २७१ फ्र

मलवैचित्ये पुनरावृत्तिः पुनरपि जननीजठरोत्पत्तिः ।

पुनरप्याशाकुलितं जठरं किं नहि मुञ्चसि कथयेश्चित्तम् । भज ॰ ॥ ३ ॥

मायाकल्पितमैन्द्रं जालं न हि तत्सत्यं दृष्टिविकारम् ।

ज्ञाते तत्त्वे सर्वमसारं मा कुरु मा कुरु विषयविचारम् । भज ० ॥ ४ ॥

रज्ज सर्पभ्रमणारोपस्तद्वद्ब्रह्मणि जगदारोपः ।

मिथ्यामायामोहविकारं मनसि विचारय बारम्बारम् । भज ॰ ॥ ५ ॥

अध्वरकोटीगङ्गागमनं कुरु योगं चेन्द्रियदमनम् ।

ज्ञानविहीनः सर्वमतेन न भवति मुक्तो जन्मशतेन । भज ० ॥ ६ ॥

सोऽहं हंसो ब्रह्मैवाहं शुद्धानन्दस्तत्त्वपरोऽहम् ।

अद्वैतोऽहं सङ्गविहीने चेन्द्रिय आत्मनि निखिले लीने । भज ० ॥ ७ ॥

सबकी उपेक्षा कर दे; हे मन्दमते! सदा गौरीपति भगवान् शिवको भज ॥२ ॥ मलभूत संसारके रूपपर मोहित होनेसे पुनः संसारमें लौटना

पड़ता है, फिर माताके गर्भसे उत्पत्ति होती है, अतः पुनः आशासे व्याकुल हुए अपने चित्तसे तू कह दे कि रे चित्त! क्यों नहीं इस पेटकी चिन्ताको छोड़ता है? और हे मन्दमते! तू सदा गौरीपति भगवान् शिवको भज ॥ ३ ॥

अरे, यह सारा प्रपञ्च मायासे कल्पित इन्द्रजाल है, इसका विकार प्रत्यक्ष देखा गया है, इसे कदापि सत्य न जान, तत्त्वज्ञान हो जानेपर सब कुछ असार ही ठहरता है, इसलिये विषयोपभोगका विचार कभी न कर; हे मन्दमते! सदा गौरीपति भगवान् शिवको भज ॥ ४ ॥ जैसे रज्जुमें भ्रमसे सर्पका आरोप

होता है, उसी प्रकार शुद्ध ब्रह्ममें जगत्‌का आरोपमात्र है, यह माया - मोहका विकार असत्य है, इस बातको तू बारम्बार मनमें विचार । हे मन्दमते! सदा गौरीपति भगवान् शिवको भज ॥ ५ ॥ लोग करोड़ों यज्ञ करते हैं, स्नानार्थ

गङ्गाजी जाते हैं, इन्द्रियोंको दमन करनेवाला योग करते हैं, परन्तु यह सबका सिद्धान्तमत है कि ज्ञानहीन जीव सैकड़ों जन्ममें भी मुक्त नहीं हो सकता; इसलिये हे मन्दमते! तू सदा गौरीपति भगवान् शिवका भजन कर ॥ ६ ॥

जब सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त होकर आत्मामें लीन हो जाती हैं उस

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२७२ * स्तोत्ररत्नावली * ****** शङ्करकिङ्कर मा कुरु चिन्तां चिन्तामणिना विरचितमेतत् । यः सद्भक्त्या पठति हि नित्यं

ब्रह्मणि लीनो भवति हि सत्यम् । भज ० ॥ ८ ॥

इति श्रीचिन्तामणिविरचितं गौरीशाष्टकं सम्पूर्णम् । ८० – सप्तश्लोकी गीता

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।

यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १ ॥

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥ २ ॥

समय ऐसा भान होने लगता है कि मैं ही वह परमात्मा हूँ, मैं शुद्ध ब्रह्म ही हूँ तथा इन पञ्चभूतोंसे पृथक् शुद्ध अद्वैत आनन्दस्वरूप हूँ; हे मन्दमते! सदा गौरीपति भगवान् शिवका भजन कर ॥ ७ ॥ हे शिवके सेवक!

तू चिन्ता न कर, क्योंकि जो पुरुष चिन्तामणिद्वारा रचित इस गौरीशाष्टकस्तोत्रका शुद्ध भक्तिसे नित्य पाठ करता है, वह ब्रह्ममें लीन हो जाता है, यह सत्य बात है; इसलिये हे मन्दमते! तू सदा गौरीपति भगवान् शिवको भज ॥ ८ ॥

‘ ओम् ' इस एक अक्षररूप ब्रह्मके नामका उच्चारण करता ओङ्कारके अर्थस्वरूप मुझको स्मरण करता हुआ, जो मनुष्य शरीरको हुआ और ( मरता ) है, वह परम गतिको प्राप्त हो जाता है ॥ १ ॥ हे हृषीकेश! छोड़ता

आपके

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* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २७३ ****************** KKKK

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ ३ ॥

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ ४ ॥

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ ५ ॥

गुणोंके कीर्तनसे जो जगत् प्रसन्न और प्रेमान्वित हो रहा है, यह उचित ही है, ये राक्षसलोग भयभीत होकर सब दिशाओंमें भाग रहे हैं और सब सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं यह भी युक्त ही है ॥ २ ॥ ' वह ' सब ओर रहनेवाले हाथों

और चरणोंसे युक्त है तथा सब ओर रहनेवाले आँखों, सिरों और मुखोंसे युक्त है एवं सब ओर व्यापकरूपसे रहनेवाली श्रवणेन्द्रियोंसे भी युक्त है और समस्त जगत्को व्याप्त कर स्थित है ॥ ३ ॥ जो सर्वज्ञ है और सबसे प्राचीन, जगत्का

शासन करनेवाला सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है, सबका धाता ( सब प्राणियोंको कर्मानुसार पृथक् - पृथक् फल देनेवाला ) है, जिसके रूपका चिन्तन अशक्य है, जो सूर्यके समान प्रकाशमय वर्णवाला है और जो अज्ञानसे अतीत है, उसको जो स्मरण करता है [ वह उस परमपुरुषको प्राप्त होता है ] ॥ ४ ॥ जिसका ऊर्ध्व ( ब्रह्म ' )

ही मूल है और नीचे शाखाएँ ( अहङ्कार ' तन्मात्रा आदि रूपवाली ) हैं, ऐसे इस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय ' ( अविनाशी ) कहते हैं, ऋक्, यजु और सामवेद जिसके पत्र हैं; जो संसार - वृक्षको इस रूपसे जानता है, वह वेदोंके अर्थोंका जाननेवाला है ॥ ५ ॥

१. कालसे भी सूक्ष्म, जगत्का कारण नित्य और महान् होनेसे ब्रह्मको ही ऊर्ध्व कहा गया है । २. महत् अहङ्कार, तन्मात्रा आदि इसके शाखाके समान नीचे होनेसे शाखा हैं । ३. संसारवृक्ष अनादिकालसे चला आता है इससे अव्यय है । ४. वेदोंसे इस वृक्षकी रक्षा है अतः इन ( वेदों ) को पत्ररूपसे कहा गया ।

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२७४ स्तोत्ररत्नावली *

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ ६ ॥

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ७ ॥

इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे. श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सप्तश्लोकी गीता सम्पूर्णा । ८१ - चतुःश्लोकी भागवतम् श्रीभगवानुवाच

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् ।

सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ १ ॥

यावानहं यथाभाव यद्रूपगुणकर्मकः । तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु मदनुग्रहात् ॥ २ ॥

मैं सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा होकर उनके हृदयोंमें प्रविष्ट हूँ, उनके स्मृति, ज्ञान और इन दोनोंका लोप भी मुझसे ही हुआ करते हैं, सम्पूर्ण वेदोंसे मैं ही जाननेयोग्य हूँ और वेदान्तका कर्ता तथा वेदार्थको जाननेवाला भी मैं ही हूँ ॥ ६ ॥

तू मेरेमें ही मन लगानेवाला, मेरा ही भक्त, मेरी ही पूजा करनेवाला हो और मुझको ही नमस्कार कर । इस प्रकार चित्तको मुझमें युक्त कर मत्परायण हुआ मुझे ही प्राप्त करेगा ॥ ७ ॥

श्रीभगवान् बोले— [ हे चतुरानन! ] मेरा जो ज्ञान परम गोप्य है, विज्ञान ( अनुभव ) से युक्त है और भक्तिके सहित है उसको और उसके साधनको मैं कहता हूँ सुनो ॥ १ ॥ मेरे जितने स्वरूप हैं, जिस प्रकार मेरी सत्ता है और जो मेरे

रूप, गुण, कर्म हैं, मेरी कृपासे तुमको उसी प्रकार तत्त्वका विज्ञान हो ॥ २ ॥

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** प्रकीर्णस्तोत्राणि, * २७५

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् ।

पश्चादहं यदेतच्च यो s वशिष्यत सोऽस्म्यहम् ॥ ३ ॥

ऋते ऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ४ ॥

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ५ ॥

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः ।

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ६ ॥

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना ।

भवान् कल्पविकल्पेषु न विमुह्यति कर्हिचित् ॥ ७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां द्वितीयस्कन्धे भगवद्ब्रह्मसंवादे चतुःश्लोकी भागवत समाप्तम् । सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था, मेरे अतिरिक्त जो स्थूल, सूक्ष्म या प्रकृति हैं-इनमेंसे कुछ भी न था, सृष्टिके पश्चात् भी मैं ही था, जो यह जगत् ( दृश्यमान ) है, यह भी मैं ही हूँ और प्रलयकालमें जो शेष रहता है वह मैं ही हूँ ॥ ३ ॥ जिसके कारण

आत्मामें वास्तविक अर्थके न रहते हुए भी उसकी प्रतीति हो और अर्थके रहते हुए भी उसकी प्रतीति न हो, उसीको मेरी माया जानो; जैसे आभास ( एक चन्द्रमामें दो चन्द्रमाका भ्रमात्मक ज्ञान ) और जैसे राहु ( राहु जैसे ग्रहमण्डलोंमें स्थित होकर भी नहीं दीख पड़ता ) ॥ ४॥ जैसे पाँच महाभूत उच्चावच भौतिक पदार्थोंमें कार्य और

कारणभावसे प्रविष्ट और अप्रविष्ट रहते हैं, उसी प्रकार मैं इन भौतिक पदार्थोंमें प्रविष्ट और अप्रविष्ट भी रहता हूँ । [ इस प्रकार मेरी सत्ता है ] ॥ ५ ॥ आत्माके तत्त्व

जिज्ञासुके लिये इतना ही जिज्ञास्य है, जो अन्वयव्यतिरेकसे सर्वत्र और सर्वदा रहे वही आत्मा है ॥ ६ ॥ चित्तकी परम एकाग्रता से इस मतका अनुष्ठान करें, कल्पकी विविध

सृष्टियोंमें आपको कभी भी कर्तापनका अभिमान न होगा ॥ ७ ॥

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२७६ * स्तोत्ररत्नावली * ************ £££££££££ 5555555555555 ८२ - श्रीमृत्युञ्जयस्तोत्रम् रत्नसानुशरासनं रजताद्रिशृङ्गनिकेतनं शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम् । क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवन्दितं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ १ ॥

पञ्चपादपपुष्पगन्धिपदाम्बुजद्वयशोभितं भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम् । भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशिनं भवमव्ययं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ २ ॥

कैलासके शिखरपर जिनका निवासगृह है, जिन्होंने मेरुगिरिका धनुष, नागराज वासुकिकी प्रत्यञ्चा और भगवान् विष्णुको अग्निमय बाण बनाकर तत्काल ही दैत्योंके तीनों पुरोंको दग्ध कर डाला था, सम्पूर्ण देवता जिनके चरणोंकी वन्दना करते हैं, उन भगवान् चन्द्रशेखरकी मैं शरण लेता हूँ । यमराज मेरा क्या करेगा? ॥ १ ॥ मन्दार, पारिजात, संतान, कल्पवृक्ष और

हरिचन्दन — इन पाँच दिव्य वृक्षोंके पुष्पोंसे सुगन्धित युगल चरण - कमल जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जिन्होंने अपने ललाटवर्ती नेत्रसे प्रकट हुई आगकी ज्वालामें कामदेवके शरीरको भस्म कर डाला था, जिनका श्रीविग्रह सदा भस्मसे विभूषित रहता है, जो भव - सबकी उत्पत्तिके कारण होते हुए भी भव - संसारके नाशक हैं तथा जिनका कभी विनाश नहीं होता, उन भगवान् चन्द्रशेखरकी मैं शरण लेता हूँ । यमराज मेरा क्या करेगा? ॥ २ ॥

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* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २७७ मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं पङ्कजासनपद्मलोचनपूजिता‌ङ्घ्रिसरोरुहम् देवसिद्धतरङ्गिणीकरसिक्तशीतजटाधरं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ ३ ॥

कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनं नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् । अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ ४ ॥

यक्षराजसखं भगाक्षिहर भुजङ्गविभूषणं शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम् क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ ५ ॥

जो मतवाले गजराजके मुख्य चर्मकी चादर ओढ़े परम मनोहर जान पड़ते हैं, ब्रह्मा और विष्णु भी जिनके चरण - कमलोंकी पूजा करते हैं त जो देवताओं और सिद्धोंकी नदी गङ्गाकी तरङ्गोंसे भीगी हुई शीतल जट ध, T करते हैं उन भगवान् चन्द्रशेखरकी मैं शरण लेता हूँ । यमराज मेरा क्या करेगा? ॥ ३ ॥ गेडुल मारे हुए सर्पराज जिनके कानोंमें कुण्डलका काम ' देते

हैं, जो वृषभपर सवारी करते हैं, नारद आदि मुनीश्वर जिनके वैभवकी स्तुति करते हैं, जो समस्त भुवनोंके स्वामी, अन्धकासुरका नाश करनेवाले, आश्रित जनोंके लिये कल्पवृक्षके समान और यमराजको भी शान्त करनेवाले हैं, उन

भगवान् चन्द्रशेखरकी मैं शरण लेता हूँ । यमराज मेरा क्या करेगा? ॥ ४ ॥

जो यक्षराज कुबेरके सखा, भग देवताकी आँख फोड़नेवाले और सर्पोंके

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२७८ * स्तोत्ररत्नावली * KKKKKKKK *************** 5555555555555555555555555555555555555 भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं दक्षयज्ञविनाशिनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् । भुक्तिमुक्तिफलप्रदं निखिलाघसंघनिबर्हणं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ ६ ॥

भक्तवत्सलमर्चतां निधिमक्षयं हरिदम्बरं सर्वभूतपति परात्परमप्रमेयमनूपमम् । भूमिवारिन भोहुताशनसोमपालितस्वाकृतिं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ ७ ॥

विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं संहरन्तमथ प्रपञ्चमशेषलोकनिवासिनम् । आभूषण धारण करनेवाले हैं, जिनके श्रीविग्रहके सुन्दर वामभागको गिरिराजकिशोरी उमाने सुशोभित कर रखा है, कालकूट विष पीनेके कारण जिनका कण्ठभाग नीले रंगका दिखायी देता है, जो एक हाथमें फरसा और दूसरेमें मृग लिये रहते हैं, उन भगवान् चन्द्रशेखरकी मैं शरण लेता हूँ । यमराज मेरा क्या करेगा? ॥ ५ ॥ जो जन्म - मरणके रोगसे ग्रस्त पुरुषोंके लिये

औषधरूप हैं, समस्त आपत्तियोंका निवारण और दक्ष - यज्ञका विनाश करने-वाले हैं, सत्त्व आदि तीनों गुण जिनके स्वरूप हैं, जो तीन नेत्र धारण करते, भोग और मोक्षरूपी फल देते तथा सम्पूर्ण पापराशिका संहार करते हैं, उन भगवान् चन्द्रशेखरकी मैं शरण लेता हूँ । यमराज मेरा क्या करेगा? ॥ ६ ॥ जो

भक्तोंपर दया करनेवाले हैं, अपनी पूजा करनेवाले मनुष्योंके लिये अक्षय निधि होते हुए भी जो स्वयं दिगम्बर रहते हैं, जो सब भूतोंके स्वामी, परात्पर, अप्रमेय और उपमारहित हैं, पृथ्वी, जल, आकाश अग्नि और चन्द्रमाके द्वारा जिनका श्रीविग्रह सुरक्षित है, उन भगवान् चन्द्रशेखरकी मैं शरण लेता हूँ । यमराज मेरा क्या करेगा? ॥ ७ ॥ जो ब्रह्मारूपसे सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करते, फिर

पृष्ठ 289

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* प्रकीर्णस्तोत्राणि * २७ ९ क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमावृतं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ ८ ॥

रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम् ।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ९ ॥

कालकण्ठं कलामूर्ति कालाग्निं कालनाशनम् ।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १० ॥

नीलकण्ठं विरूपाक्षं निर्मलं निरुपद्रवम् ।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ ११ ॥

वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम् ।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १२ ॥

विष्णुरूपसे सबके पालनमें संलग्न रहते और अन्तमें सारे प्रपञ्चका संहार करते हैं, सम्पूर्ण लोकोंमें जिनका निवास है तथा जो गणेशजीके पार्षदोंसे घिरकर दिन - रात भाँति - भाँतिके खेल किया करते हैं, उन भगवान् चन्द्रशेखरकी मैं शरण लेता हूँ । यमराज मेरा क्या करेगा? ॥ ८ ॥ ' रु ' अर्थात् दुःखको दूर

करनेके कारण जिन्हें रुद्र कहते हैं, जो जीवरूपी पशुओंका पालन करनेसे पशुपति, स्थिर होनेसे स्थाणु, गलेमें नीला चिह्न धारण करनेसे नीलकण्ठ और भगवती उमाके स्वामी होनेसे उमापति नाम धारण करते हैं, उन भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । मृत्यु मेरा क्या कर लेगी? ॥ ९ ॥ जिनके गलेमें काला दाग है, जो कलामूर्ति, कालाग्निस्वरूप

और कालके नाशक हैं, उन भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । मृत्यु मेरा क्या कर लेगी? ॥ १० ॥ जिनका कण्ठ नील और नेत्र विकराल

हो हुए जो अत्यन्त निर्मल और उपद्रवरहित हैं, उन भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । मृत्यु मेरा क्या कर लेगी? ॥ ११ ॥ जो

वामदेव, महादेव, विश्वनाथ और जगद्गुरु नाम धारण करते हैं, उन ,

पृष्ठ 290

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२८० * स्तोत्ररत्नावली * देवदेवं जगन्नाथं देवेशमृषभध्वजम् । नमामि शिरसा अनन्तमव्ययं नमामि शिरसा आनन्दं परमं नमामि शिरसा स्वर्गापवर्गदातारं नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १३

शान्तमक्षमालाधरं हरम् ।

देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १४

नित्यं कैवल्यपदकारणम् ।

देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १५ ।

सृष्टिस्थित्यन्तकारिणम् ।

देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ १६ ।

॥ इति श्रीपद्मपुराणान्तर्गत उत्तरखण्डे श्रीमृत्युञ्जयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

समाप्तेयं स्तोत्ररत्नावली भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । मृत्यु मेरा क्या क लेगी? ॥ १२ ॥ जो देवताओंके भी आराध्यदेव, जगत्के स्वामी औ

देवताओंपर भी शासन करनेवाले हैं, जिनकी ध्वजापर वृषभका चिह्न बन हुआ है, उन भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । मृत्यु मे क्या कर लेगी? ॥ १३ ॥ जो अनन्त, अविकारी, शान्त, रुद्राक्षमालाधारी अ

सबके दुःखोंका हरण करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाव प्रणाम करता हूँ । मृत्यु मेरा क्या कर लेगी? ॥ १४ ॥ जो परमानन्दस्वरूप

नित्य एवं कैवल्यपद - मोक्षकी प्राप्तिके कारण हैं, उन भगवान् शिवको मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । मृत्यु मेरा क्या कर लेगी? ॥ १५ ॥ उ

स्वर्ग और मोक्षके दाता तथा सृष्टि, पालन और संहारके कर्ता हैं, उन भगवा शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । मृत्यु मेरा क्या क ' लेगी? ॥ १६ ॥