वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री — पृष्ठ 101–110

वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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बंदार्थपारिजात. १००१ पश्चिमोत्तरजातीयानामुल्लेखमपि न कुर्वन्ति । किमिद न सम्भाव्यते यदुपर्युल्लिखितो वशो न केवलस्य दशमस्य, किन्तु पष्ठादिदशमपर्यन्तकाण्डपञ्चकेन सम्बद्ध ' स्यात् । तेषु यज्ञवेदिनिर्माणाग्निचयनविधीना विशेषेण तत्र वर्णन दृश्यते । तेषा चोत्पत्तिरुत्तरपश्चिमक्षेत्रेषु वक्ष्यमाणतथ्येन निश्चीयते । यद्यपि तद्विषयिणी विद्या पेसआर्यन् विद्याया भिन्नासीत्, तथाप्येतेषा सान्निध्याद् उत्तरपश्चिमक्षेत्रेष्वक्षुण्णासीत् । यदपि च – ' साख्याचार्यस्यासुरे शतपथे बहुधोल्लेख । मद्वदेशीयस्य काप्यपतञ्जलेश्चर्चा दृश्यते, यश्च ब्राह्मणीयतत्त्वज्ञाने नितरामुत्कर्षमाख्ढ आसीत् । तत्र कपिलस्य पतञ्जलेश्च नामसाम्यं प्रतीयते । यौ साख्ययोगा- चार्यत्वेन प्रसिद्धौ' ( पृ ० १२३ ) इति तदपि यत्किञ्चित्, तथोल्लेखेऽपि कालनिर्धारणासम्भवात्, अर्जुनफाल्गुनादि- शब्दवलात् कालनिर्धारणायोगात् । नामसाम्येनाभेदनिर्णयस्तु स्वजन- श्वजनादिशब्दबलेन क्रियमाणनिर्णय इव बाधित ---एव । यदपि -' कपिलवस्तुगतशाक्येन दशमकाण्डीयस्य शाकायनिन इत्यस्य मैत्रायणोपनिषदीयशाकायनेन च सम्वन्धो योजयितु शक्येत । शाक्योऽपि गौतम स्वात्मान गदति स्म । वंशनामेद तस्येति' इति, तदपि पूर्वोक्तहेतुनैवापास्तम् । चित्रमिदं यत् स्वाभिमतविरुद्धत्वादर्जुनफाल्गुनादिनामभि पाण्डवार्जुनस्य साम्येऽपि भेदः साध्यते । अत्र तु वैषम्येऽप्य- भेदः साध्यते । यदपि —'कोशलेषु विदेहेषु च बौद्धधर्मस्य जन्मवृद्धिदर्शनात् शतपथीयस्य श्वेतकेतोस्तुल्यमेव शाक्यस्य ' - - पूर्वभवीय नामासीत् । तथैव अर्हन्त -श्रमण महाब्राह्मण प्रतिबुद्ध अजातशत्रु ब्रह्मदत्तादिनाम्नामपि बौद्धाचार्यादि- तत्तन्नामभिस्तुल्यत्वमपि (पृ० १२५ ) न शतपथस्य वौद्धकालिकत्वसाघनायालम्, मन्त्रब्राह्मणात्मकवेदप्रोक्तयज्ञादि- विरोधिवौद्धेभ्यो वेदस्य पूर्वकालिकत्वसिद्धया वैदिकनाम्नामेव ते स्वीकरणसम्भवात् । राजा नग्नजित् के साथ गान्धारो, साल्वो और कैकयो के अतिरिक्त किसी दूसरी जाति का कही उल्लेख भी नही करते । क्या यह स्भव नही है कि ऊपर उल्लिखित वंश केवल दशवे काण्ड का नहीं है, अपितु इन पांचो काडो से संबद्ध है? चूँकि इन पाँचो काडो मे यज्ञीय वेदि का निर्माण और अग्निचयन की विधियो का विशेष रूप से वर्णन है, अतः उनकी सभावित उत्तरपश्चिमी क्षेत्र की उत्पत्ति इस तथ्य द्वारा स्पष्ट होती है कि यद्यपि इस विषय की विद्या ' पेस -आर्यनो' की विद्या से भिन्न थी, फिर भी इन लोगो के सान्निध्य के कारण वह उत्तर- पश्चिम में विशेष रूप से अक्षुण्ण बनी रही' ( पृ० ११८- ११ ९ ) । बेवर ने यह भी कहा है–' साध्य के एक प्रमुख आचार्य आसुरि के नाम के ही एक आचार्य का शतपथ ब्राह्मण मे बहुश: उल्लेख है । हम मद्र देश के एक काव्य पतंजलि का उल्लेख पाते है, जो ब्राह्मणीय तत्त्वज्ञान मे अपने प्रयत्नो द्वारा विशेष रूप से बढे- चढे थे । उनके नाम मे हम कपिल और पतजलि के नामो को झलक पाते है, जो परम्परा से साख्य और योग दर्शनों के प्रवतक कहे गये है ' ( पृ ० १२३ ) । किन्तु इससे भी कुछ बनता नहीं, क्योकि ऐसा उल्लेख होने पर भी उससे काल का निर्धारण नही किया जा सकता । अर्जुन, फाल्गुन आदि शब्दो के सहारे समय का निर्धारण नही हो पाता । नाम की समानता के आधार पर इनमे अभेद मानना उसी तरह की उपहासास्पद बात है, जैसा कि स्वजन और वजन आदि शब्दो को समानता के आधार पर एक माना जाय । इसी तरह से - कपिलवस्तु के शाक्य (जिसके नाम का सबन्ध सभवत. दसवें काड के शाकायनिन् और मैत्रायण उपनिषद् के शाकायन से जोडा जा सकता है ) अपने को गौतम कहा करते थे । यह उनका वंश नाम था' ( पृ ० १२४ ) | यह कथन भी पूर्वोक्त कारणो से ही निरस्त हो जाता है ॥ यह आश्चर्य की ही बात है कि अपने अभिप्राय के विरुद्ध होने से अर्जुन और फाल्गुन नामो से पाण्डव अजुन को समानता होते हुए भी भिन्नता सिद्ध की जाती है और यहाँ असमानता रहते हुए भी उनमे अभेद सिद्ध किया जाता है । इसी तरह से- 'कोसलो और विदेहो के देश को ही बौद्ध धर्म के जन्म और फलने -फूलने का स्थान मानना चाहिये । श्वेतकेतु ( आरुणि के पुत्र ) जो शतपथ में प्रायः उल्लिखित आचार्यों में एक का नाम है, बौद्धो में शाक्यमुनि के पूर्वकालीन जन्म का नाम है । इसी तरह से अर्हन्त, श्रमण, महाब्राह्मण, प्रतिबुद्ध, अजातशत्रु, ब्रह्मदत्त प्रभृति नाम भी बौद्ध आचार्यों के समान है' ( पृ० १२४ ) । इस कथन से भी नामो की समानता होते हुए भी शतपथ ब्राह्मण को बौद्धकालीन कृति नही सिद्ध किया जा सकता, क्योकि मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद के द्वारा उपदिष्ट यज्ञादि कर्मों के विरोधी होने से बौद्धो का समय निश्चित रूप से उनके बाद का ही मानना पड़ेगा । ऐसी स्थिति में यह सरलता से कहा जा सकता है कि बौद्धो ने पहले से चले आ रहे नामो को ले लिया । १२६

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१००२ वेदार्थपारिजाता वस्तुतस्तु शतं पन्यानो मार्गा अध्यायरूपा यस्य तस्य शताध्यायात्मकस्य शतपथब्राह्मणस्य शतपथेति ; ' सज्ञान्वर्थेव अत एव शतपथवत्ताण्ड्यभाल्लविना ब्राह्मणस्वरा इति भाषिकसूत्रव्याख्यानावसरे शतपथश्च शताध्यायैः' इत्युक्त तद्भाष्यकृता । काण्वीयणतपथस्य चतुरुत्तरशताध्यायवत्त्वेऽपि शतपथेति तत्रापि छत्रिन्यायेन रूढेय , सज्ञा । षष्टिपथ- शतपथेति भेदस्तु न बेवरादिभिरभ्यूहित किन्तु प्रतिज्ञापरिशिष्टे षष्टिपथोऽशीतिपथोऽनवद्यः सम्मितः पञ्चदशपथ इत्यनेनानेकेषामवान्तरविभागाना संज्ञाः प्रदर्शिताः । तत्र षष्ट्यध्यायसम्मितो भाग. षष्टिपथः, अशीत्यध्यायपर्यन्तो भागोऽशीतिपथः, पञ्चदशाध्यायपरिमितो भागः पञ्चदशपथः । प्रथम द्वितीयं च काण्ड पञ्च- दशाध्यायाः । अत्र हविर्यज्ञियनामकमैष्टिक याज्ञिक सर्व निरूपितम् । प्रथमहविर्यज्ञकाण्डादारम्य सचितिनामक- नवमकाण्डपर्यन्तं पष्टचध्यायाः षष्टिपथेतिसंज्ञया प्रसिद्धाः । तत्र तृतीयकाण्डान्नवम यावत्सौमिक सर्वं निरूपितम् । प्रथमकाण्डादारभ्य द्वादशकाण्डीय षडध्याय्यन्तमशीत्यध्यायाः सन्त्यतस्तत्परिमितभागस्याशोतिपथेति सज्ञा युक्तंव । अग्निरहस्याख्यदशमकाण्डमारभ्य मध्यमसज्ञकद्वादशकाण्डीयषडध्याय्यन्तेन ग्रन्थेनोत्तरऋतुयाज्ञिक सर्व निरूपितम् । अवशिष्टैरध्यायैः सौत्रामण्यश्वमेघादियागा पूर्वमनुक्ता ब्रह्मविद्या च निरूपिताः । तेनादितोऽध्यायगणनया समग्रो ग्रन्थः शतपथेति प्रसिद्धः । शतपथ- षष्टिपथशब्दाभ्या 'ऋतूक्थादिसूत्रान्ताट्ठक्' ( पा० सू० ४।२।६० ) इति स्थलीयेन 'शतषष्टे: षिकन् पथः' शतशब्दात् षष्टिशब्दाच्च परो यः पथिन्शब्दस्तदन्तात् षिकन्प्रत्ययो वाच्य इत्यर्थकेन वार्तिकेन पिकनि शतपथमधीते शतपथिकः, षष्टिपथमधीते षष्टिपथिक इति रूपसिद्धिः । अशीतिपथः, पञ्चदशपथ इति । तेन पाणिनेरपि पूर्वतना नित्या वैदिकाः शतपथादिशब्दाः । महाभारतेऽपि शतपथादिविभागा उक्ताः । ततः षष्टिपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससग्रहम् । चक्रे सपरिशेषं च सोत्तर व प्रहर्षतः । ' ( शा० प ० मोक्षधर्मपर्व ४३ | १६ ) । षष्टिपथः शतपथ इति पूर्वोक्तमेव । दशमं काण्ड रहस्यमग्नि- वास्तव मे तो जिसके सौ मार्ग अर्थात् अध्याय है, उस सो अध्याय वाले शतपथ ब्राह्मण का यह नाम उसके अर्थ के अनुरूप है । इसीलिये शतपथ के समान ही ताण्ड्य और भाल्लवियो के ब्राह्मणो के भी स्वर होते हैं, इस भाषिक सूत्र की व्याख्या करते समय उसके भाष्यकार ने कहा है कि सो अध्याय होने से इसको शतपथ कहा जाता है । काण्व शाखा के शतपथ मे यद्यपि १०४ अध्याय है, किन्तु माध्यन्दिन शतपथ में सौ अध्याय होने से इसके साथ काण्व शाखा के ब्राह्मण को भी शतपथ ही कहा जाता है, जैसा कि कई छत्रधारियो के साथ चलने पर जिसके पास छत्र नही होता, उसके लिये भी इस शब्द का प्रयोग लक्षणा से किया जाता है । षष्टिपथ और शतपथ की भेद- कल्पना बेवर प्रभृति पाश्चात्य विद्वानो ने नही की है, किन्तु प्रतिज्ञापरिशिष्ट मे षष्टिपथ, अशीतिपथ, पञ्चदशपथ प्रभृति अनेक प्रशंसनीय अवान्तर विभाग परिकल्पित है । इनमें गाठ अध्याय वाला भाग षष्टिपथ, अस्सी अध्याय पर्यन्त भाग अशीतिपथ और पन्द्रह अध्याय पर्यन्त भाग पञ्चदशपथ कहलाता है । प्रथम और द्वितीय काण्ड में मिलकर पन्द्रह अध्याय होते है । यहाँ हविर्यज्ञ के नाम से इष्टि और यज्ञ संबन्धी सारी बातें वर्गित है । प्रथम हविर्यज्ञ काण्ड से आरम्भ कर सचिति नामक नवम काण्ड पर्यन्त शतपथ के भाग में साठ अध्याय होने से यह षष्टिपथ के नाम से प्रसिद्ध हैं । यहाँ तृतीय काण्ड से लेकर नवम काण्ड पर्यन्त सोमयाग संबन्धी सभी बातें बताई गई है । प्रथम काण्ड से लेकर बारहवे काण्ड के छ: अध्याय पर्यन्त शतपथ मे अस्सी अध्याय पूरे होते हैं, अतः वहाँ तक का शतपथ अशीतिपथ के नाम से प्रसिद्ध है । अग्निरहस्य नाम के दसवें काण्ड से प्रारम्भ कर मध्यम नाम के बारहवें काण्ड के छठे अध्याय तक के ग्रन्थ में यज्ञ के संपन्न हो जाने के बाद की जाने वाली क्रियाओ का निरूपण किया गया है । बचे अध्यायो में सोत्रामणी, अश्वमेघ प्रभूति उन यागो का वर्णन है, जिनका कि वर्णन पहले नही हुआ है और अन्त मे ब्रह्मविद्या निरूपित है । इस तरह से सब जगह प्रारंभ से अध्यायों की गणना करने पर पूरे ग्रन्थ में सौ अध्याय होने से यह ब्राह्मण शतपथ कहलाता है । शतपथ और षष्टिपथ शब्दो से ४/२/६० संख्या के पाणिनि सूत्र में विद्यमान वार्तिक से शत और षष्टि शब्द से आगे आये पथिन् शब्द से षिकन् प्रत्यय का विधान होता है । षिकन् प्रत्यय होने पर शतपथ को पढने वाला शतपथिक और षष्टिपथ को पढने वाला षष्टिपथिक कहलाता है । अशीतिपथ और पञ्चदशपथ मे यह प्रत्यय नही होता । इस तरह से यह सिद्ध है कि शतपथ प्रभृति शब्द पाणिनि से भी प्राचीन है और ये वैदिक शब्द नित्य एवं अनादि हैं ।

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वेदार्थपरिजातः १००३ , रहस्यसज्ञकम् प्रागुक्तकर्मणा रहस्यावेदकत्वात् । एकादश काण्ड संग्रहप्रागुक्तकर्मापेक्षितानुक्तसंग्राहकत्वात् तत्सहित ससग्रहम् । द्वादशत्रयोदशे काण्डे चतुर्दशकाण्डान्तर्गतप्रवर्ग्यकाण्डं च परिशेष, उक्तकर्मणा परिशिष्टा- शाभिधायकत्वात् । तत्सहित सपरिशेषम् । चतुर्दशकाण्डगता षडध्यायी मधुयाज्ञवल्क्यखिलात्मकावान्तरकाण्डत्रयवती | बृहदारण्यकोपनिषद् उत्तर कर्मोत्तरकालिकब्रह्मात्मज्ञानप्रतिपादकत्वात् तत्सहित सोत्तर समग्र शतपथ याज्ञ- वल्क्यश्चक्रे । प्रवचनेन पृथिव्या तत्सम्प्रदाय प्रवर्तितवानित्यर्थः । द्वादशस्य काण्डस्य मध्यमकाण्डसंज्ञात्वेन एगलिङ्- महाशयरीत्या ( १०-१४ ) इमान्येव पञ्च काण्डानि प्रधानानि प्राचीनानि च समासन् । तदनन्तर १-६ काण्डानि सयोजितानि स्युः |। बेवररीत्या तु १ - ९ काण्डान्येव प्राचीनानि, १०-१४ पञ्च काण्डानि तुत्तरोत्तरमर्वाचीनान्येवेति, तदेतत्सर्वमप्यज्ञानविजृम्भितमेव, पूर्वोक्तमहाभारतश्लोकीत्या १ ९ प्रधानानि तदितराणि १०-१४ च तत्परिपोष- कानीत्यनुपदमेव प्रतिपादितत्वात् । द्वादशकाण्डस्य मध्यमसज्ञा तु तद्गतप्रतिपाद्यदीक्षादिविषयसाधारण्येन प्रधान- पोषाध्यायेषु पञ्चसु मध्यमत्वेन वा सङ्गच्छते । महाभारते शान्तिपर्वणि ३१८ अध्याये स्पष्टमेवोक्त यद् याज्ञवक्त्यस्य मुखे तप प्रीतेन भगवतादित्येन प्रेरिता सरस्वती वेदरूपा प्रविष्टा । 'मरस्वती ह वाग्भूता शरीर ते प्रवेक्ष्यति । ततो मामाह भगवानास्य एवं विवृतं कुरु । विवृत च ततो मेस्य प्रविष्टा च सरस्वती ॥ ' ( ६| ७ ) तत्रैव भगवतो भास्करस्य वचनम्- 'प्रतिष्ठास्यति ते बेद. सखिल सोत्तरो द्विज । कृत्स्न शतपय चैव प्रणेष्यसि द्विजर्षभ ॥ ( ११ ) एतेन सखिलो वेदो भगवत्कृपया प्राप्त, नखिलाश पश्चानिर्मितः । नीलवण्ठानुसार खिल परशाखीय स्वशाखायामपेक्षित प्रेक्षावशात् पठ्यते । यथा महाभारत में भी शतपथ प्रभृति विभाग बताये गये है - ' इसके बाद रहस्य और सग्रह, परिशेष और उत्तर भाग के साथ याज्ञवल्क्य ने षष्टिपथ नामक ब्राह्मण का प्रवचन किया । षष्टिपथ और शतपथ के बाबत अभो बताया जा चुका है । यहां अग्निरहस्य नाम का दसवाँ काण्ड रहस्य नाम से अभिहित है, क्योकि इसमे पूर्व प्रतिपादित क्रियाकाण्ड का रहस्य समझाया गया है । ग्यारहवीं काण्ड संग्रह नाम से सूचित है, क्योकि इसमे पूर्व प्रतिपादित क्रियाओ के संबन्ध मे जो बाते छूट गई है, उनका संग्रह किया गया है । बारहवाँ, तेरहवीं काण्ड पूरा और चतुर्दश काण्ड का प्रवर्ग्य काण्ड परिशेष नाम से यहाँ बोधित हुआ है, क्योकि इनमे प्रतिपादित सभी क्रियाकलाप परिशिष्ट अंश के रूप मे गिनाये गये है । उत्तर शब्द यहाँ क्रियाकाण्ड के बाद उत्तर काल में अनुष्ठेय ब्रह्मात्मज्ञान के प्रतिपादक उपनिषद् के लिये प्रयुक्त हुआ है । इस तरह से रहस्य, संग्रह, परिशेष और उत्तर भाग के साथ समग्र शतपथ ब्राह्मण को याज्ञवल्क्य ने बनाया, अर्थात् उसका प्रवचन कर पृथिवी मे इसके सम्प्रदाय को चलाया । बारहवे काण्ड का नाम ' मध्यम है | इससे एगलिंग यह अभिप्राय निकालते है कि इस ब्राह्मण के १०-१४ अध्याय ही प्रधान और प्राचीन थे । १० ९ अध्याय बाद मे जोडे गये । इनके विपरीत बेवर का कहना है कि १ - ९ काण्ड ही प्राचीन है और १०-१४ काण्डो की उत्तरोत्तर नवीन रचना हुई है । इस तरह की सारी बातें भी पाश्चात्य विद्वानो के अज्ञान को ही उजागर करती है । पूर्वोक्त महाभारत के श्लोक के प्रमाण पर हमने अभी स्पष्ट प्रतिपादित किया है कि इस ब्राह्मण के १० ९ अध्यायो मे प्रधान विषय प्रतिपादित है और बाद के १०-१४ अध्यायो मे इन पूर्वं प्रतिपादित विषयो को ही पुष्ट करने वाले विषय वर्णित है । बारहवें काण्ड का नाम ' मध्यम' इसलिये है कि यहाँ दीक्षा प्रभृति उन विषयों का प्रतिपादन हुआ है, जिनकी कि मध्य में स्थिति होने से वे पूर्वापर उभय भाग से परिपोषक होते है अथवा मध्यम' नाम इसलिये भी सार्थक हो सकता है कि इन अप्रधान पाँच अध्यायो के बीच में इसकी स्थिति है । महाभारत के शान्तिपर्व के ३१८ अध्याय में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि याज्ञवल्क्य के मुख में उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवान् भास्कर ने वेदवाणी सरस्वती को प्रविष्ट होने के लिये प्रेरित किया । 'तब भगवान् भास्कर ने मुझसे कहा कि तुम अपना मुँह खोलो, तुम्हारे शरीर मे वाणी बनकर सरस्वती प्रविष्ट होगी । जब मैने अपना मुँह खोला तो भगवान् सूर्य की आज्ञा के अनुसार सरस्वती मेरे मुँह मे प्रविष्ट हो गई । महाभारत में ही भगवान् भास्कर के ये वचन मिलते है -'हे द्विजश्रेष्ठ याज्ञवल्क्य, खिल और उत्तर भाग के साथ वेद तुममें प्रतिष्ठित होगा और है द्विज, तुम सम्पूर्ण शतपथ ब्राह्मण का प्रवचन करोगे' । इससे यह स्पष्ट है कि याज्ञवल्क्य ने भगवान् भास्कर की कृपा से खिल भाग के साथ वेद को प्राप्त किया था, खिल भाग बाद में नही बनाया

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वेदार्थपारिजाता१००४ बह्वचानां हिरण्यवर्णां हरिणीमिति श्रीसूक्तम् । सोत्तर सोपनिषत्कम् । कृत्स्नस्न शतपथस्य शताव्यायात्मकस्य याज्ञ-वल्क्यादेवाविर्भावः । पञ्चदशशाखा भास्करप्रभावादेव तेनावाप्ता इत्यपि तत्रैव वर्णितम् । 'शाखाः पञ्चदशेमास्तु विद्या भास्करदेशिताः' ( २४ ) इति । यत्तु माध्यन्दिनशब्दो मध्यमवाचक:, तेनेयं माध्यन्दिनी शाखा नातिप्राचीना' इति, तदपि यत्किञ्चित्, माध्यन्दिनशब्दस्य मध्यमवाचकत्वे मानाभावात् । किन्तु कण्वेन महर्षिणा दृष्टत्वान्माध्यन्दिनी शाखेति तन्निर्वचन-विरोधाच्च ॥ यदपि ६-१० काण्डेषु शाण्डिल्यस्य बहुवारोल्लेखात् तानि शाण्डिल्यप्रणीतानीति बेवरप्रभृतय इति, तदप्यसङ्गतम्, उक्तकाण्डेषु तन्नामोल्लेखपूर्वक तन्मतस्यानूदितत्वेन तन्नाम्ना प्रख्यातायाः शाण्डिल्याग्निविद्यायाः प्रति-पादितत्वेन तत्कर्तृकत्वासिद्धेः । पूर्वमीमांसायां ' बादरायणस्यानेपक्षत्वात्' इति बादरायणनामोल्लेखेऽपि यथा न बादरायणकर्तृकत्वम्, यथा वोत्तरमीमासाया जैमिनिमतोल्लेखेऽपि न जैमिनिकर्तृकत्वम्, तद्वत् प्रकृतेऽपि ज्ञेयम् । यदपि कैश्चित्- 'अमुक्या अमुक पुत्र इति जननीप्राधान्येन शतपथे यजुर्वेदाचार्या प्रतिपादिता:' इति, तदपि न किञ्चित्, ' अथेदानी समस्त प्रवचनवंशः, स्त्रीप्राधान्याद् गुणवान् पुत्रो भवतीति प्रस्तुतम्' इति शङ्करभगवत्पादै- स्तदभिप्रायस्य वर्णनात् । कल्पाध्ययनेन स्वशाखाता विशेषतया भिन्नशाखास्ववस्थितपदार्थोपस्मारकं मन्त्राध्ययन क्रियाप्रख्यायकं ब्राह्मणाध्ययन च कृत भवति । तेन यथाकथञ्चित् सकलशाखासमन्वितो वेदोऽप्यधीतो भवति । तेन सत्या शक्तौ गया था । नीलकण्ठ का कहना है कि खिल भाग में दूसरी शाखा के वे मन्त्र होते है, जिनका कि आवश्यकता के अनुसार अपनी शाखा में उपयोग होता है । जैसे ऋग्वेदी ' हिरण्यवर्णा' प्रभृति ऋचाओ से संबन्धित श्रीसूक्त को अपनी शाखा का खिल इसी अभिप्राय से मानते है । उत्तरपथ से उपनिषद् का ग्रहण किया जाता है । इस तरह से सौ अध्याय वाले संपूर्ण शतपथ ब्राह्मण का प्रथम प्रवचन याज्ञवल्क्य ने ही किया है । महाभारत मे ही यह बात वर्णित है कि भगवान् भास्कर की कृपा से याज्ञवल्क्य ने शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाएँ प्राप्त की । यह कहना कि माध्यन्दिन शब्द मध्यम का वाचक है, इसलिये यह माध्यन्दिनी शाखा बहुत प्राचीन नही है, इसलिये गलत है कि इसमे कोई प्रमाण नही है कि माध्यन्दिन शब्द मध्यम अर्थ का बोधक हो । माध्यन्दिनी शाखा कण्व महर्षि के द्वारा परिदृष्ट है, यह बात भी उसके निर्वचन से विरुद्ध पडती है । बेवर प्रभृति पाश्चात्य विद्वान् यह मानते है कि शतपथ ब्राह्मण के ६-१० काण्डो में शाण्डिल्य का अनेक बार उल्लेख होने से ऐसा प्रतीत होता है कि ये काण्ड शाण्डिल्य के बनाये हुए हैं, किन्तु यह कथन असंगत है, क्योकि इन काण्डों में शाण्डिल्य के नाम का उल्लेख करते हुए उनका मत बताया गया है और शाण्डिल्य के नाम से प्रसिद्ध अग्निविद्या का प्रतिपादन किया गया हैं । इससे यह भाग उनकी कृति नही माना जा सकता । पूर्व मीमासा में बादरायण के और उत्तर मीमासा मे जैमिनि के मत का उल्लेख किया गया मिलता है, किन्तु इतने मात्र से ये आचार्य उनके कर्ता नही माने जाते । यही बात शतपथ ब्राह्मण के इन अध्यायो में शाण्डिल्य के मत का उल्लेख होने में भी समझनी चाहिये, अर्थात् शाण्डिल्य के मत का उल्लेख होने मात्र से ये काण्ड उनकी कृति नही माने जा सकते । कुछ लोग कहते हैं कि ' अमुक स्त्री का अमुक पुत्र है, इस तरह मे माता को प्रधानता देकर शतपथ ब्राह्मण मे यजुर्वेद के अनेक आचार्यों का उल्लेख किया गया है, किन्तु यह कथन भी वास्तविक अभिप्राय को न समझने के कारण है । भगवान् शंकराचार्य ने अपने बृहदारण्यक भाष्य में यह स्पष्ट कहा है कि अब शाखाओं के समस्त प्रवचनकर्ताओं का वंश इस अभिप्राय से प्रस्तुत किया जा रहा है कि माता को प्रधानता देने पर पुत्र गुणवान् होता है । कल्प अर्थात् श्रौतसूत्र आदि के अध्ययन से अपनी शाखा में, विशेषतया भिन्न शाखाओ में विहित पदार्थों के स्मारक मन्त्रों का अध्ययन और क्रिया काण्ड के परिचायक ब्राह्मणों का अध्ययन भी ठीक से संपन्न होता है । इससे एक तरह से वेद की सभी शाखाओं का अध्ययन पूरा हो जाता है । अपनी सामर्थ्य के अनुसार सभी शाखाओं के साथ समग्र वेद का अध्ययन करना चाहिये ।

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वेदार्थपारिजातः १००५ सर्वशाखायुक्त. समग्रो वेदोऽध्येतव्य' । अन्यथा कल्पेन सहितां स्वशाखामवोत्यैव यथाकयचित् समग्रं वेदाध्ययनं सम्पादयितव्यम् । स्वाध्यायो वेदश्चेत्यनर्थान्तरम् । तस्मात् स्वाध्यायोऽध्येतव्य इत्यध्ययनविघेश्चारितार्थ्याय कल्पोऽवश्यमध्येतव्यः । ' वेदं समाप्य स्नायात्' ( पारस्करगृह्यसूत्र २।६।१ ) सहस्र शाखा ( साम्नो ) ह्यर्थतो वेद- शब्द इति प्रसिद्धेश्च । सर्वशाखोपबृंहितस्य वेदस्याध्ययन मुख्यम् । समुदायेषु प्रवृत्ता' शब्दा अवयवेष्वपि वर्तन्त इति महाभाष्योक्तदिशा स्वाध्यायो वेद इत्यादिशब्दाः स्वावयवभूतामु शाखास्वपि प्रवर्तिताः । एकवेदशाखानामपि परस्परा- पेक्षत्वमेव, अन्यथा कर्मासिद्धेः । अत एव दर्शपूर्णमासयागीयेषु मन्त्रेषु यो मन्त्रजाती माध्यन्दिनशाखायां नासीत् 'यस्ते प्राणः पशुषु प्रविष्ट:', ' आप्यायतां ध्रुवा हविषा', ' तनोऽसि तन्तुरसि' इत्यादिः, स कण्वशाखातः पूरितः सूत्रकृता । यदपि कात्यायनादिसूत्राण्याश्रित्य लौगाक्षि -भारद्वाज -जातुकर्ण्य वात्स्य- बादरि- काशकृत्स्नि- कार्ष्णाजिनि । प्रभूतिनाम्नामारण्ये प्रातिशाख्ये चोल्लेखान्मन्त्रब्राह्मणादिकालनिर्धारणायास, सोऽप्यपार्थक एव, सूत्रादिपौरुषेय- ग्रन्थानां कालनिर्धारणेऽपि नित्येषु मन्त्रब्राह्मणेषु तन्न सम्भवत्येव तेषामनादित्वात् । यदपि अत्रिपुत्र्या वंशजानां हालेय- वालेय- कौद्रेय- शौभ्रेय- वामरथ्य-गौपवनान् प्रत्याक्रोशस्तथा अत्रिवशजान् प्रति सम्मानादिकल्पनम्, तदपि , निर्मूलमेव ब्राह्मणनिर्दिष्टनाम्नामेव तत्राप्युल्लेखेन स्वातन्त्र्याभावात् । विजयशब्दोल्लेखस्तु यागादिसम्बन्धेनैव मन्तव्यः । कात्यायनपरिशिष्टान्यपि भाष्यादिसम्मतत्वात् प्रमाणान्येव । निगमपरिशिष्टप्रवराध्यायादीनि नामान्यपि वेदार्थनिर्णयानुष्ठानोपयोगित्वात् प्रमाणान्येव । यच्च - ' अथर्ववेदे देवीशक्तोनामशुभप्रभावाद् विषधरजोवेभ्यो रक्षणार्थमेते मन्त्रा निर्मिता: ' इति, तदपि तुच्छम्, हेत्वाभासैरनुमानासम्भवस्योक्तत्वात् । निश्वसितत्वादिनाऽथर्वाङ्गिरसामपि नित्यत्वाभ्युपगमात् ॥ यदपि अन्यथा कल्पसूत्र के साथ अपनी शाखा का अध्ययन करके भी समग्र वेदाध्ययन संपादित किया जा सकता है । स्वाध्याय और वेद परस्पर पर्यायवाची शब्द है । इसलिये 'स्वाध्याय करना चाहिये' इस अध्ययन विधि की चरितार्थता के लिये कल्प का अध्ययन अवश्य करना चाहिये । पारस्कर गृह्यसूत्र मे बताया गया है कि वेद का अध्ययन पूरा करके ही स्नातक बनना चाहिये यह प्रसिद्धि चली आ रही है कि शबरस्वामी सामवेद की एक हजार शाखाओ के अर्थतः जानकार थे । वेद की सभी शाखाओ का अध्ययन किया जाय, यह मुख्य पक्ष है । समुदाय के लिये प्रवृत्त हुए शब्द अवयवो के भी बोधक होते है, इस महाभाष्य की उक्ति के अनुसार स्वाध्याय, वेद इत्यादि शब्द अपनी अत्रयवभूत शाखाओ के लिये भी प्रवृत्त है । एक ही वेद की विभिन्न शाखाओ की भी परम्पर सापेक्षता रहती है, अन्यथा कोई अनुष्ठान पूरा नही हो सकता । इसी लिये दर्शपूर्णमास याग के मन्त्रो में जो मन्त्र माध्यन्दिन शाखा मे नही है, उनकी पूर्ति कल्पसूत्रकार ने काण्व शाखा से लेकर की है । कात्यायन श्रौतसूत्र के आधार पर लोगाक्षि और भारद्वाज तथा जातूकर्ण्य, वात्स्य, बादरि, काशकुनि और काष्र्णा -जिनि प्रभृति नामो का आरण्यक ओर प्रातिशाख्य मे उल्लेख देखकर मन्त्र और ब्राह्मण भाग का समय निर्धारित करने का प्रयत्न भी व्यर्थ ही है, क्योकि श्रौतसूत्र प्रभृति पुरुष रचित ग्रन्थो का समय निर्धारित किया भी जा सकता है, किन्तु नित्य मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद का उनके आधार पर कालनिर्णय नही किया जा सकता, क्योंकि वेद तो अनादि हैं । बेवर ने आगे कहा है-' अत्रि की पुत्री के वंशजो ( हालेय, वालेय, कौद्रेय, शौभ्रेय, वामरथ्य, गोपवन) के प्रति कुछ आक्राश व्यक्त करता है, जब कि स्वयं अत्रि के वंशजो को विशेष समान प्रदान किया गया है' ( पृ० १२६ ), किन्तु यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि ब्राह्मण भाग में निर्दिष्ट नामो का ही कल्प-सूत्रों में भी उल्लेख है, स्वतन्त्र रूप से इनकी विधायकता नही मानी जाती । कल्पसूत्रो में विजय शब्द का उल्लेख भी यज्ञ संबन्धी दिग्विजयो से संबद्ध है । कात्यायन के परिशिष्ट भी महाभाष्यकार प्रभृति की संमति के आधार पर प्रमाण माने जाते है । निगमपरिशिष्ट, प्रवराध्याय प्रभृति ग्रन्थ भी वेदार्थ के निर्णय और यज्ञीय अनुष्ठानो में सहायक होने से प्रमाणभूत है । अथर्ववेद के संबन्ध में बेवर का कहना है - 'इसमें प्रमुख रूप से इस प्रकार के मन्त्र है, जो दैवी शक्तियों के अशुभ प्रभाव से तथा रोगो एव विषधर जीवों से रक्षा करने के लिये रचे गये है ( पृ ० १३२-१३३ ), किन्तु यह कथन व्यर्थ ही है, क्योकि

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वेदार्थपारिजातः१००६ ,,!च अथर्वसूक्तानां सामाभ्यजनैरेव प्रायेण सबन्ध इति तदपि यत्किञ्चित् तज्ज्ञानामेव ब्रह्मत्वावधारणात् आभिचारिक्यस्तु क्रिया. सामादिष्वप्युपलभ्यन्ते । यदुक्तम् -' अथर्वसहिताया अधिकाशा भागा ब्राह्मणीययुगेषूत्पन्ना-स्तथापि तादृशान्यपि सूक्तानि पश्चात्तत्र योजितानि यानि पाश्चात्त्यैरब्राह्मणीयैरार्यैः सम्वद्धानि' इति, तदपि निर्मूलम्, ,तादृशप्रमाणानुपलम्भात् तादृशसम्भावनामात्रस्य पाश्चात्त्यैराविष्करणात् । अव्यभिचरितहेतुमन्तरा सम्भावनाया अकिञ्चित्करत्वात् । यदपि च -'व्रात्यजातीये. पञ्चदशकाण्डीयवात्येन विशिष्टः सम्बन्धो दृश्यते । अत्र परमात्मा व्रात्य उक्तः । स च तैविशेषैयजितो ये सामवेदीय व्रात्यलक्षणरूपेणोक्ताः । एवमथर्वाङ्गिरमामुपनिषत्सु व्रात्यशब्दः स्वतः पवित्रपरमार्थे प्रयुक्त.' इति, तदपि निर्मूलम्, वैदिकानां शब्दार्थसम्बन्धानामोत्पत्तिकत्वेनागन्तुक सम्वन्धासिद्धे । ब्राह्मणीययुगेषु ब्राह्मणानां प्रभुत्वमुपेयते पाश्चात्त्यैः । तेषा स्वीयव्यवस्थायामादरातिशयोऽपि तैरुपेयते । तथा सति स्वातन्त्र्यकथनैरपौरुषेयत्वेनाभिमतेषु निम्नकोटिकनिर्मितसूक्ताना तदभिमतव्रात्यतल्लक्षणाना च परमात्मनि योजन सम्भवति । किञ्चोभयसम्मताप्तजनसाक्षित्वाभावेन प्रत्यक्षानुमानागमानामन्यतमस्यापि प्रमाणस्याभावान्निर्मूलैवैषा कल्पना । 'मागधपदं ब्राह्मणीयव्यवस्थाविरोधिवौद्धाचार्यपरम्' इत्यपि निर्मूलमित्युक्तमेव । यदपि व्रात्यसूक्तेषु पाश्चात्त्यानां पञ्चजातीना पौरस्त्ययोश्च द्वयोरेव जात्योर्वर्णनात् तेषा प्रभावकाल - एव तेषा निर्माणमित्यादिकल्पनमपि निरर्थकम् वेदे नाम्नामुल्लेखस्य निर्माणकाल निर्धारणेऽतन्त्रत्वात् । यत्तु ' कृष्णकेशिन उल्लेख महत्त्वपूर्णो यस्य वधाद् आङ्गिरसदेवकीपुत्रो महाकाव्येषु केशिहन् केशिसूदनादिविशेषणैर्भूष्यते' ( ), १० १३४ इति तदपि तुच्छम् श्रीमद्भागवतादिषु केशिदैत्यस्यान्यस्य प्रसिद्धत्वेन तद्धन्तृत्वेनैव केशिसूदन- हम पहले ही कह चुके है कि गलत हेतुओ से अनुमान नही बन सकता । परमेश्वर के निश्वासस्वरूप अन्य वेदो की तरह अथर्ववेद भी नित्य ही माना जाता है । 'अथर्व सूक्तो का प्रायः सामान्य जनता से संबन्ध है' ( पृ ० १३३ ) यह कथन भी गलत है, क्योकि यज्ञ- यागादि मे ब्रह्मा का प्रधान स्थान अथर्ववेदी के लिये हो नियत है । आभिचारिक क्रियाएँ अथर्थवेद मे ही नही, सामवेद आदि में भी मिलती है । यह भी लिखा गया गया है कि ' यद्यपि अधिकाश अथर्वसंहिता की उत्पत्ति ब्राह्मणीय युग मे हुई थी, फिर भी इसमें इस प्रकार के सूक्त और मन्त्र संमिलित कर लिये गये होगे, जो वस्तुतः इन पश्चिम के अब्राह्मणीय आर्यों से संबद्ध थे' (पृ० १३३ ), किन्तु यह लिखना भी निर्मूल है, क्योकि इस तरह का कोई प्रमाण उपलब्ध नही है । इस तरह की संभावनाएँ केवल पाश्चात्यों के दिमाग की उपज है । अव्यभिचारी हेतु के बिना इस तरह की संभावनाएँ कुछ सिद्ध नही कर पाती । 'इन जातियो के साथ एक विशेष प्रकार का संबन्ध पन्द्रहवें काण्ड में नितान्त स्पष्ट रूप से प्रकट है । इसमें परमात्मा को स्पष्टत व्रात्य कहा गया है और उन विशेषताओ से संबद्ध किया गया है, जो सामवेद में व्रात्य के लक्षण के रूप में दी गई है । इसी प्रकार हम अथर्व उपनिषदों में इस 'व्रात्य' शब्द को 'स्वयं में पवित्र ' अर्थ में परमात्मा का बोध कराने के लिये प्रयुक्त पाते है' ( पृ ० १३३-१३४ ) यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि वैदिक शब्द, अर्थ और उनके संबन्ध नित्य माने जाते है । इनको कल्पित नही माना जाता । ब्राह्मणीय युग और ब्राह्मणों के प्रभुत्व की बात पाश्र्चात्य विद्वान् करते है । अपनी व्यवस्था के प्रति वे बडा आदर भी प्रदर्शित करते है । इस मनोवृत्ति के अनुकूल वे अपने स्वतन्त्र विचारो के आधार पर वेदो को पौरुषेय मानकर उनमें निम्न कोटि के सूक्तो की रचना तथा उनके द्वारा कल्पित व्रात्य के लक्षणो को परमात्मा के साथ जोडने की बात कह सकते है, किन्तु उभयवादीसंमत मान्य विद्वानों की साक्षी अथवा प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाणो मे से किसी भी प्रमाण के अभाव में इस तरह की कल्पनाएँ सर्वथा निर्मूल ही मानी जायेंगी । ' मागध' शब्द ब्राह्मणीय व्यवस्था के विरोधी बौद्ध आचायों की ओर संकेत करता है' ( पृ ० १३४ ) इस कथन की निःसारता पहले ही बताई जा चुकी है । 'व्रात्य सूक्त में पश्चिम में बसी हुई जातियों में पाँच का और पूर्व की केवल दो जातियो का उल्लेख होने से ऐसा पतीत ( ० १३४ ) इस तरह की कल्पनाएँ भी निरर्थक हैं, क्योकि वेदो में होता है कि उनके प्रभाव काल में ही इनकी रचना हुई थी' -'विशेषत. नामों का उल्लेख मात्र होने से उनका रचनाकाल की सिद्धि मे कोई उपयोग नही हो सकता । यह जो कहा गया है कि ( आगिरस? देवकीपुत्र ) को महाकाव्य और पुराणो में रोचक है असुर कृष्ण केशिन का उल्लेख, जिसका वध करने के कारण कृष्ण

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बंदार्य पारिजात १००७ स्वाद्युपपत्ते. । राथप्रभृतोना भाषाविज्ञानानुसारेण वैदिकनाम्ना पाश्चात्त्यनामनामपि साम्यदर्शनेनैक्यापत्तेः । न च तद्युक्तम्, गिरिजागृहगिर्जागृहादीनामैक्यस्यानिष्टत्वात् । यदुक्तम्- शतपथब्राह्मणस्य ११।१३: १४ काण्डाना छान्दोग्यो- पतिपदस्तैत्तिरीयारण्यकम्प च रचनाकाले यर्व सूक्तानामथर्ववेदस्य च प्रसिद्धि सञ्जातेति सामवेदस्य निदानसूत्रेष्व- पर्ववेदस्याथर्वाङ्गिरसस्य बोल्लेखाद्विज्ञायते' इति, तदपि तुच्छम् हेत्वसिद्धेः । अथर्ववेदशाखानामपि कौशिकसूत्र महायान्यत्रानुपलब्धिकथनमपि निर्मूलम्, मुक्तिकोपनिपत्सीतोपनिषदादिषु तच्छाखोल्लेखदर्शनात् । यदपि ' १३६ पृष्ठं ब्रह्मवेद इत्यथर्ववेदस्य प्रसिद्धिः परवर्तिकाले जाता' इति, तदप्यशुद्धम्, ऋग्वेदादिरीत्या नस्य ब्रह्मवेदत्वप्रसिद्धेः, ब्रह्माख्यस्य ऋत्विजस्तत्र प्रतिद्धे । मन्त्राणा ब्राह्मणाना वदाना च परस्पर सम्बन्धदर्शनात् समेषामनादित्वमेव क्रमिकाणा तदनुपपत्ते । यत्तु - 'ब्रह्मवेद ऋत्विजा प्रमुखस्य ब्रह्मणो वेदत्व स्वात्मानमभिमन्यते, अन्येतु वेदा होत्रादीना तत्सहकारिणा वेदा उच्यन्ते । महता चातुर्येणाथर्ववेदस्येदं प्राधान्य साधित यद् ब्रह्मण. कश्चिद्विशिष्टो वेदो नासीत्, तेन ब्रह्मणा त्रयोऽपि वेदा ज्ञातव्या आसन् । कौषीतकिब्राह्मणे ( २।३०५ ) अभ्यः कोऽप्याधारो नास्ति । तत्प्राधान्यस्य एता धारणा यावत्या मात्रया दुर्बलास्तावद्भिरेवाडम्बरैरथर्व रचनासु प्रस्तुता, यैरम्यान् वेदान् प्रति घोर वैमनस्यं व्यज्यते ( पृ० १३६ ) इति, तदेतत् सर्वं बेवरादीना पाश्चात्याना दौर्मनस्य- मूलकमेव, वैदिकविचारसरण्यज्ञानात् । सर्वत्र वेदेषु नहि निन्दा निन्द्य निन्दितु प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुमिति , न्यायस्य जागरूकत्वात् । न केवलमत्रैव सर्वत्र वेदेषु तादृशवाक्याना दर्शनात् । भार्गवपैप्पलादशौनकादय एव केशिहन् ओर केशिसूदन विशेषण दिये गये है ' ( पृ० १३४ ), किन्तु यह सारा कथन सारहीन है, क्योकि श्रीमद्भागवत प्रभृति ग्रन्थों मे एक भिन्न ही केशी नामक दैत्य प्रसिद्ध है । उसी को मारने के कारण कृष्ण केशिसूदन कहे जाते है । राथ प्रभूति की भाषाविज्ञान की पद्धति से तो वैदिक नामो की और पाश्चात्य नामो की भी समानता के आधार पर एकता सिद्ध होने लगेगी, किन्तु यह बात ठीक नही होगा, क्योकि तब तो गिरिजाघर और दुर्गा मन्दिर की एकता के आधार पर महान् अनर्थ की सृष्टि होने लगेगी । वही कहा गया है - ' शतपथ ब्राह्मण का ग्यारहवाँ, तेरहवाँ और चौदहवाँ काड, छान्दोग्योपनिपद् तथा तैत्तिरीय आरण्यक जिस काल की रचना है, उस समय तक अथर्व सूक्तो और अथर्ववेद का अस्तित्व पूर्णत पुष्ट हो चुका था । सामवेद के निदानसूत्र से भी अथर्ववेद या अधिक स्पष्ट रूप मे अथर्वागिरस ' आथर्वणिक ' का उल्लेख हुआ है' ( पृ० १३५ ) किन्तु यह कथन भी गलत है, क्योकि यहाँ हेतु ही सिद्ध नही हो पाता । 'अथर्ववेद की शाखाओ के नाम भी वैदिक साहित्य मे अन्यत्र नही मिलते ही कौशिक नाम अपवाद है' ( पृ० १३५ ), यह कथन भी निर्मूल है, क्योकि मुक्तिकोपनिषद्, सीतोपनिषद् आदि में इन शाखाओ का उल्लेख मिलता है । बेवर ने १३६ पृष्ठ पर कहा है कि 'ब्रह्मवेद के रूप मे अथर्ववेद को प्रसिद्धि परवती काल मे हुई थो ' ( पृ ० १३६ ) । किन्तु यह बात भी गलत है, क्योकि ऋग्वेद आदि की दृष्टि से भी उसको ब्रह्मवेद के रूप में ही प्रसिद्धि मिली है । ब्रह्मा नाम से प्रसिद्ध ऋत्विक् अथर्ववेद का ज्ञाता हो माना जाता है, अतः उसको 'ब्रह्मवेद' कहा जाय, यह उचित हो है । वेदो की विभिन्न शाखाओ के मन्त्रो और ब्राह्मणो मे परस्पर संबन्ध देखा जाता है? अतः इन सबको अनादि ही मानना पडेगा, क्योकि इनका क्रमिक विकास मानने पर यह सभव न हो सकेगा । यह कहना कि - 'इसका आधार यह है कि यह प्रमुख याज्ञिक ऋत्विक् ब्रह्मन् का वेद होने का दावा करता था, जब कि अन्य वेदो को उसके सहायक ऋत्विजो होता, उद्गाता और अध्वर्युं का कहा गया है । अथर्ववेद के इस ढावे का अधिकार बडी चतुराई के साथ यह बताया गया है कि ब्रह्मन् के लिये कोई विशिष्ट वेद नही था, अतः उसे तीनो वेदो का ज्ञान रखना पडता था, जैसा कि कोषतकि ब्राह्मण मे स्पष्ट रूप से कहा गया है । इसके अतिरिक्त इस कथन का कोई आधार नही । ये धारणायें जितनी ही दुर्बल है, उतने ही आडम्बर के साथ उन्हे अथर्वन् रचनाओ में प्रस्तुत किया गया है, जो स्पष्टतः अन्य वेदो के प्रति घोर वैमनस्य प्रकट करती हैं' ( पृ० १३६ ), किन्तु यह सारा कथन बेवर प्रभृति पाश्चात्य विद्वानों के ही वैमनस्य को प्रकट करने वाला है, उनको वेद- विचार की पद्धति का परिज्ञान नहीं है । वेद मे सर्वत्र यह न्याय माना जाता है कि जहाँ कही भी निन्दा वाक्यं प्रतीत हो, तो उनका तात्पर्य किसी की निन्दा में न होकर विधेय की स्तुति में माना जाता है । केवल यही नहीं, वेदो मे सभी जगह इस तरह के वाक्य मिलते है और उनका यही तात्पर्य मान्य भी है । भार्गव, पैप्पलाद और शौनक ब्राह्मण को ही राजा का

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वेदार्थपारिजात: १००८ तात्पर्यात् । राजपौरोहित्याय योगिन इति कथनमपि तद्वशीयेषु राजोपयुक्ताथर्वणिकप्रयोगवित्त्वेन तेषा प्राशस्त्याभिधाने किञ्च, यदि वैदिकसाहित्येषु वस्तुभूत वैमनस्य स्यात्, तदा वैदिकेष्वपि तत् स्यात् । वैदिकेषुभ्रान्तिरेव तादृशी ॥ तु सौमनस्यमेवास्ते । ब्रह्मणश्च प्राधान्य सर्वेष्वपि याज्ञिकेषु यज्ञबोधकग्रन्थेषु विद्यत एव । तस्मात् पाश्चात्त्यानां ( ), अत एव ब्राह्मणयुगेऽथर्ववेदस्य प्रतिनिधित्वमल्पमेवासीत् पृ० १३७ इति बेवरजल्पितमप्यसत् गोपथब्राह्मणस्य वैदिकेषु ब्राह्मणयुगस्य तत्कपोलकल्पितत्वात् । वेदतत्प्रतिपाद्ययज्ञादीनामेव प्रामाणिकत्वात् दिनैर्द्वादशमासंस्त्रयोदशमासंव। - ' पारम्पर्येणाध्ययनाध्यापनादिकमद्याप्यास्त एव । कोलब्रुकरीत्या यदुक्तम् अत्र ३६० । वर्षव्यवस्था त्रिशन्मुहूर्तेदिनव्यवस्था च विशेषेणोल्लेखनीया' इति, तदपि यत्किञ्चित्, यजुरादिषु चएवतदुपलम्भात्गृहीताः । यदपि तत्रैव त्या अत्र वर्ण्यविपया अस्तव्यस्ता श्रौतयज्ञसम्बद्धा पूर्वार्धे सृष्ट्यादिविषयाणि टिप्पण्याम् - "मैक्समूलरदार्शनिकविवेचनानि विविधाख्यानैः पूर्णानि शतपथानुकारीणि, आधिक्येनान्यरचनाभ्य, उत्तरार्धेमन्त्रब्राह्मणात्मकाना विचारास्ते च ऐतरेयब्राह्मणाद् गृहीता:' ( पृ ० ५३७ ) इति, तदपि मैक्समूलरस्याज्ञानविलसितम् वेदानां समेषामपौरुषेयत्वानादित्वनित्यत्वेभ्यः । तत्कल्पनाया प्रमाणाभावाच्च । प्रातिशाख्ये - ' यदपि पाण्डुलिपिषूपलब्धा चतुरध्यायिकाऽथर्वसंहितायाः प्रातिशाख्यग्रन्थ । शुक्लयजुः । अत्र तस्य नामोल्लेखः, ऋक्प्रातिशाख्यमप्ययमुपस्पृशति । चरणव्यूहे च शौनकीय शाखाऽथर्वशाखात्वेनोल्लिखितापरस्परोल्लेखेऽपि बाधा- शाकटायनस्यान्येषा च वैयाकरणानामुल्लेखो विद्यते ' इति, तत्तथास्तु, सर्वज्ञकल्पानामृवीणा । यदपि पृ० १३ ९ भावात् । शौनकीयशाखा च प्रसिद्धैव विद्यते । अथर्वसहितानुक्रमणी चेतरवेदानामिव युक्तैव उत्पन्न हुए आयर्वणिक प्रयोगो के जानकार, पुरोहित होने योग्य घोषित करने वाले वचनो का तात्पर्य इतना ही है कि इन वंशों वैमनस्यमे यदि विद्यमान होता तो उसकी झलक ब्राह्मणो को प्रशस्त माना जाय । मूल बात यह है कि वैदिक साहित्य में इस तरह का परस्पर सद्भाव ही दिखाई पडता है । सभी वैदिको में दिखाई पडती, किन्तु ऐसा तो कुछ है नही । इसके विपरीत वैदिको मे तो है । पाश्चात्य विद्वानो ने वैदिक साहित्य और याज्ञिक ग्रन्थो में और याज्ञिकों में भी ब्रह्मा को प्रधान मानने की परम्परा चली आ रही वैदिकों के प्रति इसी तरह की अनेक भ्रान्तियाँ पाल रक्खी है । कथन भी गलत है, इसलिये -'ब्राह्मण युग को अथर्ववेद मे बहुत अल्प प्रतिनिधित्व मित्रा' (पृ० १३७का ) हीबेवरसर्वोच्चका यहप्रामाण्य भारतीयो को - क्योकि ब्राह्मण युग उनकी कपोलकल्पना है । वेद और वेद द्वारा प्रतिपादित यज्ञअक्षुण्णयागादिरूप से विद्यमान है । वर्ष का ३६० दिनों के आज भी मान्य है । गोपथ ब्राह्मण के अध्ययन की परम्परा वैदिको में आज भी कोलब्रूक ने इसमें उल्लेखनीय बताया है. यजुस् के ( ), -- बारह या तेरह मासो में और प्रत्येक दिन का तीस मुहूर्तों ब्राह्मणो आदि मे भी समान रूप से पाया जाता है ॥ इसी पृष्ठ मे ( १३७विभाजन) की टिप्पणीजिसे में - ' मैक्समूलरसृष्टि कीके उत्पत्तिमत के काअनुसारदार्शनिकइस विवेचनगोपथ- - ब्राह्मण के वर्ण्य विषय अस्त व्यस्त है और अधिकाशतः दूसरी रचनाओं से उद्धृत है । पूर्वार्ध मे इसलिए संभवतः शतपथ:, है और यह विशेषत माख्यानो से परिपूर्ण है जिनमें से अनेक उसी रूप में शतपथ ब्राह्मण मे आते हैं और जो विशेषतः ऐतरेय, से ही नकल किये गये है । उत्तरार्ध मे श्रौत यज्ञों से संबद्ध अनेक विषयो पर संक्षेप में विचार किया गया हैअज्ञान को ही उजागर ब्राह्मण से लिया गया प्रतीत होता है ' ( पृ ० १३७) । इस तरह से दिया गया यह मैक्समूलर का मत भी उसकेकी इस तरह की कल्पनाओ करता है, क्योंकि मन्त्रब्राह्मणात्मक समस्त वंदराशि अपौरुषेय, अनादि अत एव नित्य भी है, अत: मैक्समूलर का कोई आधार नही है । प्रातिशाख्य है । यह संभवतः ऋक्- 'पांडुलिपि के रूप में उपलब्ध चतुरध्यायिका अथर्वसंहिता का एक प्रकार का चरणव्यूह मे शौनक शाखा का नाम प्रातिशाख्य के रचयिता तक पहुँचती है, जिसका नाम शुक्लयजुस् के प्रातिशाख्य मे भी आया है । किया गया है' ( पृ० १३८) । हमे बेवर अर्थवत् की शाखा के रूप में भाया है । यहाँ शाकटायन तथा अन्य वैयाकरणो का भी उल्लेख यह बात मान्य है, क्योंकि ऋषिगण सर्वज्ञकल्प है, वे त्रिकालदर्शी है, अतः उनके ग्रन्थों में परस्पर एक दूसरे का उल्लेख मिलना

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वेदार्थपारिजातः १००६ कौशिकसूत्रप्रसङ्ग उक्तम् -' अत्र भूमिकाया मन्त्राणा ब्राह्मणानां वासामध्ये सति सम्प्रदायस्य परम्पराया वा प्रामाण्यं स्थापितम् । पुस्तके ' इति ब्राह्मणम्' इति रोल्या ब्राह्मणान्युद्भूतानि । गोपथब्राह्मणनिर्देशोऽन्यस्य वेति वक्तुमसमर्थो ऽहमित्यादिकम्, तदपि तुच्छम्, सम्प्रदायस्य परम्पराया वा वैदिकेषु- ' सर्वेषु प्रामाण्याभ्युपगमात्( । सम्प्रदायाविच्छेदे) सत्यस्मर्यमाणकर्तृकत्वेनैव वेदापौरुषेयत्व निर्धारणात् । यदपि तृतीयेऽध्याये निर्ऋति दुर्भाग्यदेवी यज्ञविधानं चतुर्थे भैषज्य षष्ठादिषु जादुमन्त्रा. सन्तीति । दशमे विवाह, एकादशे पितृयज्ञ, १३-१४ उत्पातानामशुभघटनाना च दर्णनमुपलभ्यते । यथा सामवेदस्याद्भुतब्राह्मणे' इत्यादिकम्, तदपि न वैदिक सिद्धान्तप्रतिकूलम्, वैदिकग्रन्थाना परस्परसवादस्य समन्वयसूचकत्वात् । - - - नक्षत्रकल्प शान्तिकल्प वितानकल्प- सहिताकल्प अभिचारकल्प-आङ्गिरसकल्पाना चतुःसप्ततिपरि- शिष्टानाच चर्चा कृता । तथैव तत्र बृहस्पति अथर्वन् भृगु भार्गव- अङ्गिरस-आङ्गिरस - काव्य- उशनस - शौनक-नारद- - - - - - - गौतम काङ्कायन कर्मद्य पिप्पलाद भादवि वृद्धगर्ग आत्रेय पद्मयोनि क्रोष्टुकिप्रभृतिनाम्नामुल्लेखो दृश्यते । ज्योतिष साहित्येष्वप्येतेष्वनेकनाम्नामुल्लेखो दृश्यते' इति, तदपि न कालनिर्धारणायालम्, बृहस्पत्यादिदेवानामपरिमितायुषां प्राचीनार्वाचीनकालेष्वपि सत्त्वे बाधाभावात् । यदपि -आथर्वणिकोपनिषदां सम्बन्ध उक्तम्-इतरा उपनिषदः परमात्मस्वरूपादिवर्णन एव पर्यवस्यन्ति । एतास्तु साम्प्रदायिकोद्देश्यपूरणाय प्रयतन्ते । एतासा सख्या ५२ । ताश्च भेदभावमन्तरैवोपनिषत्सु योजिता दृश्यन्ते । स्वाभाविक है । अथर्ववेद की शौनकीय शाखा तो प्रसिद्ध हो है । अन्य वेदो की तरह अथर्ववेद की भी अनुक्रमणी होनी ही चाहिये । कोशिक सूत्र के विषय मे बेवर ने कहा है-'यहाँ भूमिका मे मन्त्रो और ब्राह्मणो को और उनके असमर्थ होने पर संप्रदाय या परम्परा को प्रमाण ठहराया गया है । पुस्तक के काय मे भी बार-बार ब्राह्मण का उद्धरण ( 'इति ब्राह्मणम्' द्वारा ) दिया गया है । इससे गोपथ- ब्राह्मण की ओर निर्देश किया गया है या नही, यह कहने में मैं असमर्थ हूँ' ( पृ० १३८- १३ ९ ), किन्तु यह सारा कथन भी व्यर्थ का ही है, क्योकि सम्प्रदाय अथवा परम्परा को वैदिको ने सर्वत्र प्रमाण रूप मे स्वीकार किया है । वेद की अपौरुषेयता इसी आधार पर निर्धारित की जाती है कि संप्रदाय की अविच्छिन्न प्रवृत्ति रहते हुए भी उसके कर्ता की स्मृति किसी को नही है । आगे का ' इस सूत्र के तीसरे अध्याय में निर्ऋति ( दुर्भाग्य की देवी ) के लिये यज्ञ का विधान है । चौथे में भैषज्य या रोग को दूर करने वाली औषधियाँ, छठें और उसके आगे के अध्यायो मे अभिचार और जादू के मन्त्र है । दसवें में विवाह का और ग्यारहवें में पितृयज्ञ का वर्णन आता है । तेरहवां और चौदहवां अनेक अशुभ घटनाओं और उत्पातो के लिये विहित प्रायश्चित्त कर्मों का वर्णन करते हैं, जैसा कि सामवेद के ' अद्भुत ब्राह्मण ' मे हुआ है' ( पृ० १३ ९ ), बेवर का यह कथन भी वैदिक सिद्धान्त के प्रतिकूल नही है, क्योकि वैदिक ग्रन्थों में एक दूसरे का संवाद उनकी समन्वय दृष्टि का सूचक है । इसके आगे बेवर ने नक्षत्रकल्प, शान्तिकल्प, वितानकल्प, संहिताकल्प, अभिचारकल्प, आमिरसकल्पो की तथा चौहत्तर छोटे परिशिष्टो की चर्चा की है । चरणव्यूह परिशिष्ट मे जिन आचार्यों का उल्लेख किया गया है, उनमें निम्नलिखित नाम मुख्य हैं -पहले बृहस्पति अथर्वन् स्वयं भगवन्त अथर्वन्, भृगु, भार्गव, अङ्गिरस, आङ्गिरस, काव्य ( या कवि ), उशनस्, तब शौनक, नारद, गौतम, काङ्कायन, कर्मद्य, पिप्पलाद, भादवि, गर्ग, गार्ग्य, वृद्धगर्ग, आत्रेय, पद्मयोनि, क्रोष्टुकि । इनमे से अनेक नाम हम ज्योतिष- शास्त्र में भी पाते हैं ' (पृ ० १३ ९ - १४० ) । किन्तु इससे समय का निर्धारण करने में कोई सहायता नही मिल सकती, क्योंकि बृहस्पति प्रभृति देवताओ और ऋषियो की बड़ी लम्बी आयु मानी गई है, अतः उनकी प्राचीन काल के समान नवीन काल में भी स्थिति मानने में कोई बाधा नही है । बेवर ने आगे अथर्ववेद के उपनिषदो की चर्चा चलाते हुए कहा है-' अन्य उपनिषदें किसी साम्प्रदायिक उद्देश्य को सिद्ध न करके परमात्मा के स्वरूप- विवेचन के क्षेत्र में ही रहती हैं । इसके विपरीत अथर्वन् उपनिषद् साम्प्रदायिक उद्देश्य को सिद्ध करने १२७

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वेदार्थ पारिजात - २ स्वामी करपात्री, पृष्ठ 110 का मूल पृष्ठ
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वेदार्थपारिजातः १०१० तासु मुक्तिकोपनिषदपि विद्यते' इत्यादिकम्, तदपि निरर्गलमेव, त्वदीयग्रन्थेषु वायवलादिषु तादृशस्यैव कुचोद्यस्य सम्भवात् । शतरुद्रियमपि साम्प्रदायिकमित्यपि कथनमशुद्धमेव, सर्वस्यैव वेदस्य साम्प्रदायिकत्वाविशेषात् । 'तुल्यं ' ( ) -' साम्प्रदायिकम् मी ० सू० इति जैमिनिसूत्रप्रामाण्यात् । यदपि श्वेताश्वतरोपनिषद्भ्रान्त्यैव कृष्ण- यजुर्वेदेन सम्बद्धा । तत्र कृष्णयजुर्मन्त्राणामनेकेषा समावेशात् कैवल्योपनिषत्कोटावेवेयमुपनिषद् | मंत्रायणीयोपनि- षदोऽपि कृष्णयजुःसम्बन्धस्तर्कसङ्गतो नास्ति' इति, तदपि निर्मूलम्, प्रमाणानुपस्थापनात् । मुक्तिकोपनिषदि तासा- मुल्लेखात् । ब्रह्मसूत्रतद्भाष्यकृद्भिः शङ्कराचार्य रामानुजाचार्यादिभिरुपनिषत्त्वेन तदङ्गीकाराच्च । यदपि -'उपनिषदा प्रथमो वर्गः परमात्मस्वरूपनिरूपणे सल्लग्न, द्वितीयो वर्गो योगसमाधिनिरूपणं कुर्वन् परमात्मसायुज्यसाधनानि वर्णयति, तृतीयस्त्वोपनिषदात्मस्थाने शिवविष्ण्वादीन् स्थापयति । तेन शिवविष्ण्वोः पूजा प्रचलिता' इति, तदपि तुच्छम् उपनिषच्छन्दस्य ब्रह्मविद्यार्थकत्वेन ब्रह्मविद्यायास्तदुपयोगिसाधनाना च तत्र वर्णने दोषाभावात् । नहि क्वचिदपि ब्रह्मविद्या चित्तैकाग्रमन्तरा सम्पद्यते । चित्तैकाग्रयाय च ध्यानादिकमपेक्षितमेव । शिवविष्ण्वादिस्वरूपं च तेषु तेषु ऋग्यजुरादिमन्त्रेषु वर्णित सस्तुत च दृश्यत एव । पाश्चात्त्यैस्तु निर्मूलमपि नित्येषु मन्त्रेषु सहितास्वर्वाचीनत्वादिक कल्प्यते, तेषा साहित्यस्यार्वाचीनत्वात् तत्तुल्यतैव तैः सर्वत्र व्यवस्थाप्यते, ' अशक्ता- स्तरपद गन्तुं ततो निन्दा प्रकुर्वते' इति न्यायात् । यदपि -'केनोपनिषदि हैमवती -उमानाम्नः सर्वप्रथमोल्लेखात् शैवमतेन समानत्वादेवाथर्वसाहित्ये ऽस्याः सन्निवेश:' इति, तदपि नोचितम, त्वदनुमानस्याव्यभिचरित हेत्वभावेनानुमानाभासत्वात् । यत्तु —'बृहन्नारायणोपनि मे लग जाते है । इनकी संख्या ५२ है । बिना भेदभाव के इन सबको उपनिषदों में गिना गया है । इनमे एक मुक्तिकोपनिषद् भी है' (पृ० १४० १४१) । इस तरह की बेलगाम कही गई बातो का कोई मूल्य नही हो सकता, क्योंकि इस तरह के कुतर्क आपके धर्मग्रन्थ बाइबिल प्रभृति के सबन्ध में भी किये जा सकते है । केवल शतरुद्रिय अध्याय को साम्प्रदायिक बताना भी गलत है, क्योदि वेद तो पूरा ही सम्प्रदाय परम्परा से प्राप्त होने से साम्प्रदायिक है हो । इसमें 'तुल्य साम्प्रदायिकम्' यह जैमिनि सूत्र भी प्रमाण है । यह -' कहना कि श्वेताश्वतर उपनिषद् को गलती से कृष्ण यजुर्वेद के अनेक मन्त्रो का समावेश होने के कारण ही उससे जोड़ दिया गया है । यह उसी कोटि और समय का है, जिस कोटि और समय का कैवल्योपनिषद् है । मैत्रायणी उपनिषद् को भी कृष्णयजुस् के साथ रखना तर्कसंगत नही होगा' ( पृ० १४२ ) सर्वथा निर्मूल है, क्योंकि इसमे कोई प्रमाण नही दिया गया है । मुक्तिकोपनिषद् में इन सबकी नामावली मिलती है और ब्रह्मसूत्र के भाष्यकार शंकराचार्य, रामानुजाचार्य प्रभृति ने इन सबको उपनिषद् माना भी हैं । बेवर आगे लिखते है - 'प्रथम वर्ग के उपनिषद् प्रत्यक्षतः आत्मा या परमात्मा के स्वरूप के विवेचन मे रत है, दूसरे वर्ग के उपनिषद् योग और समाधि का वर्णन करते हैं और मनुष्य जिन साधनो द्वारा और जिस अवस्था में पहुँच कर परमात्मा से सायुज्य प्राप्त कर सकता है, उनका विवेचन करते है, अन्तत• तीसरे वर्ग के उपनिषद् आत्मा के स्थान पर शिव और विष्णु के अनेक रूपों में किसी रूप को ला बैठाते है । इस प्रकार इन दोनो प्रमुख देवताओ की पूजा चल पड़ी' ( पृ० १४२ ) किन्तु यह भी गलत बात है, क्योंकि उपनिषद् शब्द की प्रवृत्ति ब्रह्मविद्या के अर्थ में होती है, अत ब्रह्मविद्या के लिये उपयोगी साधनों की भी चर्चा वहाँ हो, इसमें कोई दोष नही माना जा सकता । चित्त की एकाग्रता के बिना ब्रह्मविद्या की प्राप्ति कभी नही हो सकती । चित्त की एकाग्रता के लिये ध्यान प्रभृति की अपेक्षा रहती हैं । इस ध्यान की स्थिरता के लिये हो शिव और विष्णु प्रभृति के स्वरूपों का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद प्रभृति के मन्त्रों में मिलता है और उस स्वरूप की वहीं स्तुति भी की गई है । पाश्चात्य विद्वान् नित्य मन्त्री, सूक्तो और संहिताओं को नवीनJ काल की रचना बनाने का अथक प्रयास इसलिये करते है कि उनके यहाँ उपलब्ध साहित्य बहुत नया है । अपने साहित्य की ही तरह वे दुनिया भर के सारे साहित्य को भी नया ही घोषित करते हैं । वे पाश्चात्य विद्वान् 'अंगूर खट्टे है' इस कहावत को हो चरितार्थ करते हैं । 'केनोपनिषद् का अथर्वन् पाठ सामवेदीय पाठ से बहुत थोडा अन्तर रखता है । इस उपनिषद् को अथर्वन् साहित्य के संग्रह में क्यों संमिलित कर लिया गया है? इसका यही कारण प्रतीत होता है कि इसमें उमा हैमवती का (पहली बार) उल्लेख उसी t