जन्तूपाख्यान : क्या किसी दूसरे के कर्म का फल स्वयं भुगतने की इच्छा धर्म है?
सहयोग और त्याग की पराकाष्ठा
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 127–128 · पृष्ठ 871–880
लोमश ने युधिष्ठिर से कहा
राजा सोमक के वास्तविक चरित्र और उनके कर्मों के प्रभाव को जानने हेतु
युधिष्ठिर ने पूछा— "वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे! राजा सोमक का बल और पराक्रम कैसा था? मैं उनके कर्म और प्रभाव का यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ।"
लोमश ऋषि बोले— "युधिष्ठिर! सोमक नाम से प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उनकी सौ रानियाँ थीं, जो सभी रूप और अवस्था में प्रायः एक समान थीं। परन्तु दीर्घकाल तक महान प्रयत्न करने के बाद भी वे अपनी उन रानियों के गर्भ से कोई पुत्र प्राप्त नहीं कर सके। राजा वृद्धावस्था में भी इसके लिए निरन्तर यत्नशील थे; अतः किसी समय उनकी उन सौ स्त्रियों में से किसी एक के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम रखा गया— जन्तु।"
कदाचित् तस्य वृद्धस्य घटमानस्य यत्नतः ।
जन्तुर्नाम सुतस्तस्मिन् स्त्रीशते समजायत ॥
राजा सोमक वृद्धावस्थामें भी इसके लिये निरन्तर यत्नशील थे; अतः किसी समय उनकी सौ स्त्रियोंमेंसे किसी एकके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था जन्तु ।
"राजन्! उसके जन्म लेने के पश्चात् सभी माताएँ काम-भोग की ओर से मुँह मोड़कर सदा उसी बच्चे के पास उसे सब ओर से घेरकर बैठी रहती थीं। एक दिन एक चींटी ने जन्तु के कटिभाग में डँस लिया। चींटी के काटने पर वह पीड़ा से विकल होकर सहसा रोने लगा। उसकी सब माताएँ भी सहसा जन्तु के शरीर से उस चींटी को हटाकर अत्यन्त दुखी हुईं और जोर-जोर से रोने लगीं। उनके रोदन की वह सम्मिलित ध्वनि बड़ी भयङ्कर प्रतीत हुई।"
"उस समय राजा सोमक पुरोहित के साथ मन्त्रियों की सभा में बैठे थे। उन्होंने अकस्मात् वह आर्तनाद सुना। सुनकर राजा ने 'यह क्या हो गया?' इस बात का पता लगाने के लिए द्वारपाल को भेजा। द्वारपाल लौटकर राजकुमार से सम्बन्ध रखने वाली घटना का यथावत् वृत्तान्त सुना गया। तब शत्रुदमन राजा सोमक मन्त्रियों सहित बड़ी उतावली के साथ अन्तःपुर में प्रवेश कर गए। वहाँ पुत्र को आश्वासन देकर राजा अन्तःपुर से बाहर निकले और पुरोहित तथा मन्त्रियों के साथ पुनः मन्त्रणा-गृह में जा बैठे।"
"उस समय सोमक ने कहा— 'इस संसार में किसी पुरुष के एक ही पुत्र का होना धिक्कार का विषय है। एक पुत्र होने की अपेक्षा तो पुत्रहीन रह जाना ही अच्छा है। एक ही सन्तान हो तो सब प्राणी उसके लिये सदा आकुल-व्याकुल रहते हैं, अतः एक पुत्र का होना शोक ही है। ब्रह्मन्! मैंने अच्छी तरह जाँच-बूझकर पुत्र की इच्छा से अपने योग्य सौ स्त्रियों के साथ विवाह किया, किन्तु उनके कोई सन्तान नहीं हुई। यद्यपि मेरी सभी रानियाँ सन्तान के लिये यत्नशील थीं, तथापि किसी तरह मेरा यही एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम जन्तु है। इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? द्विजश्रेष्ठ! मेरी तथा इन रानियों की अधिक अवस्था बीत गयी, किन्तु अभी तक मेरे और इन पत्नियों के प्राण केवल इस एक पुत्र में ही बसते हैं। क्या कोई ऐसा उपयोगी कर्म हो सकता है जिससे मेरे सौ पुत्र हो जाएँ? भले ही वह कर्म महान हो, लघु हो अथवा अत्यन्त दुष्कर हो'।"
स्यात्तु कर्म तथा युक्तं येन पुत्रशतं भवेत् ।
महता लघुना वापि कर्मणा दुष्करेण वा ॥
क्या कोई ऐसा उपयोगी कर्म हो सकता है जिससे मेरे सौ पुत्र हो जायँ । भले ही वह कर्म महान् हो, लघु हो अथवा अत्यन्त दुष्कर हो ।
"पुरोहित ने कहा— 'सोमक! ऐसा कर्म है जिससे तुम्हें सौ पुत्र हो सकते हैं। यदि तुम उसे कर सको तो मैं बताऊँगा'।"
ऋत्विगुवाच अस्ति चैतादृशं कर्म येन पुत्रशतं भवेत् ।
यदि शक्नोषि तत् कर्तुमथ वक्ष्यामि सोमक ॥
पुरोहितने कहा- सोमक! ऐसा कर्म है जिससे तुम्हें सौ पुत्र हो सकते हैं । यदि तुम उसे कर सको तो बताऊँगा ।
"सोमक ने कहा— 'भगवन्! आप वह कर्म मुझे बताइये जिससे सौ पुत्र हो सकते हैं। वह करने योग्य हो या न हो, मेरे द्वारा उसे किया हुआ ही जानिये'।"
कार्यं वा यदि वाकार्यं येन पुत्रशतं भवेत् ।
कृतमेवेति तद् विद्धि भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥
सोमकने कहा — भगवन्! आप वह कर्म मुझे बताइये जिससे सौ पुत्र हो सकते हैं । वह करनेयोग्य हो या न हो, मेरेद्वारा उसे किया हुआ ही जानिये ।
"पुरोहित ने निर्देश दिया— 'राजन्! मैं एक यज्ञ आरम्भ करवाऊँगा, उसमें तुम अपने पुत्र जन्तु की आहुति देकर यजन करो। इससे शीघ्र ही तुम्हें सौ परम सुन्दर पुत्र प्राप्त होंगे। जिस समय उसकी चर्बी की आहुति दी जाएगी, उस समय उसके धूएँ को सूँघ लेने पर सब माताएँ गर्भवती होकर आपके लिये अत्यन्त पराक्रमी पुत्रों को जन्म देंगी। आपका पुत्र जन्तु पुनः अपनी माता के ही पेट से उत्पन्न होगा। उस समय उसकी बायीं पसली में एक सुनहरा चिह्न होगा'।"
"सोमक ने कहा— 'ब्रह्मन्! जो-जो कार्य जैसे-जैसे करना हो, वह उसी प्रकार कीजिये। मैं पुत्र की कामना से आपकी समस्त आज्ञाओं का पालन करूँगा'।"
ब्रह्मन् यद् यद् यथा कार्यं तत् कुरुष्व तथा तथा ।
पुत्रकामतया सर्वं करिष्यामि वचस्तव ॥
सोमकने कहा — ब्रह्मन्! जो - जो कार्य जैसे - जैसे करना हो, वह उसी प्रकार कीजिये । मैं पुत्रकी कामनासे आपकी समस्त आज्ञाओंका पालन करूँगा ।
"रानियाँ शोक से आतुर होकर कुररी पक्षी की भाँति विलाप कर रही थीं और पुरोहित ने उस बालक को छीनकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले तथा विधिपूर्वक उसकी चर्बियों की आहुति दी। चर्बी की आहुति के समय बालक की माताएँ धूम की गन्ध सूँघकर सहसा शोक-पीड़ित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। तदनन्तर वे सब सुन्दरी रानियाँ गर्भवती हो गयीं। दस मास बीतने पर उन सबके गर्भ से राजा सोमक के सौ पुत्र हुए। सोमक का ज्येष्ठ पुत्र जन्तु अपनी माता के ही गर्भ से प्रकट हुआ, वही उन सब रानियों को विशेष प्रिय था। उसकी दाहिनी पसली में पूर्वोक्त सुनहरा चिह्न स्पष्ट दिखाई देता था। वह अवस्था और गुणों की दृष्टि से भी श्रेष्ठ था।"
"कुछ काल के पश्चात् सोमक के पुरोहित परलोकवासी हो गये। थोड़े दिनों के बाद राजा सोमक भी परलोकवासी हो गये। यमलोक में जाने पर सोमक ने देखा कि उनके पुरोहित घोर नरक की अग्नि में पकाये जा रहे हैं। उन्हें उस अवस्था में देखकर सोमक ने पूछा— 'ब्रह्मन्! आप नरक की आग में कैसे पकाये जा रहे हैं?'"
"पुरोहित ने कहा— 'राजन्! कर्ता के सिवा दूसरा कोई उसके किये हुए कर्मों का फल कभी नहीं भोगता है। तुम्हें अपने पुण्यकर्मों के फलस्वरूप ये पुण्य लोक प्राप्त हुए हैं, यह प्रत्यक्ष दिखायी देता है'।"
नान्यः कर्तुः फलं राजन्नुपभुङ्क्ते कदाचन ।
इमानि तव दृश्यन्ते फलानि वदतां वर ॥
धर्मने कहा — राजन्! कर्ताके सिवा दूसरा कोई उसके किये हुए कर्मोंका फल कभी नहीं भोगता है । वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप जो ये पुण्य लोक प्राप्त हुए हैं, प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं ।
"सोमक बोले— 'धर्मराज! मैं अपने वेदवेत्ता पुरोहित के बिना पुण्यलोकों में जाने की इच्छा नहीं रखता। स्वर्गलोक हो या नरक— मैं कहीं भी इन्हीं के साथ रहना चाहता हूँ। देव! मेरे पुण्यकर्मों पर इनका मेरे समान ही अधिकार है। हम दोनों को यह पुण्य और पाप का फल समान रूप से मिलना चाहिये'।"
पुण्यान्न कामये लोकानृतेऽहं ब्रह्मवादिनम् ।
इच्छाम्यहमनेनैव सह वस्तुं सुरालये ॥
नरके वा धर्मराज कर्मणास्य समो ह्यहम् ।
पुण्यापुण्यफलं देव सममस्त्वावयोरिदम् ॥
सोमक बोले — धर्मराज! मैं अपने वेदवेत्ता पुरोहितके बिना पुण्यलोकोंमें जानेकी इच्छा नहीं रखता । स्वर्गलोक हो या नरक - मैं कहीं भी इन्हींके साथ रहना चाहता हूँ । देव! मेरे पुण्यकर्मोंपर इनका मेरे समान ही अधिकार है । हम दोनोंको यह पुण्य और पापका फल समानरूपसे मिलना चाहिये ।
"धर्मराज ने कहा— 'राजन्! यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो इनके साथ रहकर उतने ही समय तक तुम भी पापकर्मों का फल भोगो, इसके बाद तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी'।"
यद्येवमीप्सितं राजन् भुङ्क्ष्वास्य सहितः फलम् ।
तुल्यकालं सहानेन पश्चात् प्राप्स्यसि सद्गतिम् ॥
धर्मराज बोले — राजन्! यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो इनके साथ रहकर उतने ही समयतक तुम भी पापकर्मोंका फल भोगो, इसके बाद तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी ।
"तब कमलनयन राजा सोमक ने धर्मराज के कथनानुसार सब कार्य किया और भोग द्वारा पाप नष्ट हो जाने पर वे पुरोहित के साथ ही मुक्त होकर पुण्यलोक के शुभ भोगों का उपभोग करने लगे।"
स चकार तथा सर्वं राजा राजीवलोचनः ।
क्षीणपापश्च तस्मात् स विमुक्तो गुरुणा सह ॥
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तब कमलनयन राजा सोमकने धर्मराजके कथनानुसार सब कार्य किया और भोगद्वारा पाप नष्ट हो जानेपर वे पुरोहितके साथ ही नरकसे छूट गये ।
In English
The Story of King Somaka and his son Jantu
King Somaka has only one son named Jantu, which causes great anxiety among his hundred queens. To have a hundred sons, the king follows a priest's advice to sacrifice Jantu in a ritual so that the queens can become pregnant by smelling the smoke of his sacrifice. After many years, Somaka and his priest die and meet in the afterlife, where Somaka chooses to share in his priest's punishment in hell before returning to heaven.
This page answers
- How did king somaka get a hundred sons?
- Who was jantu?
- Why did somaka choose to go to hell with his priest?
- What was the sign on jantu's body?
Also written: Jantupakhyana, Janta, Somaka, Jantu, Purohita, Dharmaraja, Yudhishthira, Lomasha, जन्तूपाख्यान