मान्धातोपाख्यान : असाधारण शक्ति प्राप्त करने के लिए क्या आवश्यक है?
तपस्या और दैवीय विधान
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 126 · पृष्ठ 864–871
लोमश ने युधिष्ठिर से कहा
मान्धाता के अद्भुत जन्म और चरित्र की जिज्ञासा हेतु
युधिष्ठिर ने पूछा— "ब्राह्मणश्रेष्ठ! इक्ष्वाकुवंश के राजा युवनाश्व के पुत्र, नृपश्रेष्ठ मान्धाता तीनों लोकों में विख्यात थे। उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई थी? अमित तेजस्वी मान्धाता ने यह सर्वोच्च स्थिति कैसे प्राप्त कर ली थी? सुना है, परमात्मा विष्णु के समान महाराज मान्धाता के वश में तीनों लोक थे। हे निष्पाप महर्षे! मैं आपके मुख से उन सत्यकीर्ति एवं बुद्धिमान राजा मान्धाता का वह सब चरित्र सुनना चाहता हूँ। इन्द्र के समान तेजस्वी और अनुपम पराक्रमी उन नरेश का 'मान्धाता' नाम कैसे हुआ? और उनके जन्म का वृत्तान्त क्या है? बताइये; क्योंकि आप ये सब बातें बताने में कुशल हैं।"
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं चरितं तस्य धीमतः ।
( सत्यकीर्तेर्हि मान्धातुः कथ्यमानं त्वयानघ ।
) यथा मान्धातृशब्दश्च तस्य शक्रसमद्युतेः ।
जन्म चाप्रतिवीर्यस्य कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥
निष्पाप महर्षे! मैं आपके मुखसे उन सत्यकीर्ति एवं बुद्धिमान् राजा मान्धाताका वह सब चरित्र सुनना चाहता हूँ। इन्द्रके समान तेजस्वी और अनुपम पराक्रमी उन नरेशका ‘ मान्धाता ’ नाम कैसे हुआ? और उनके जन्मका वृत्तान्त क्या है? बताइये; क्योंकि आप ये सब बातें बतानेमें कुशल हैं ।
लोमश ऋषि ने कहा— "राजन्! लोक में उन महामना नरेश का 'मान्धाता' नाम कैसे प्रचलित हुआ, यह बतलाता हूँ, ध्यान देकर सुनो। इक्ष्वाकुवंश में युवनाश्व नाम से प्रसिद्ध एक राजा हुए। भूपाल युवनाश्व ने प्रचुर दक्षिणा वाले बहुत से यज्ञों का अनुष्ठान किया; वे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ थे। उन्होंने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करके और दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ यज्ञों द्वारा भगवान की आराधना की। किन्तु, एक समय राजा युवनाश्व उपवास के कारण दुःखित हो गए। प्यास से उनका हृदय सूखने लगा। रात का समय था, वे जल पीने की तीव्र इच्छा लेकर महर्षि भृगु के आश्रम में प्रवेश कर गए।"
"राजेन्द्र! उसी रात महात्मा भृगुनन्दन महर्षि च्यवन ने सुद्युम्न कुमार युवनाश्व को पुत्र प्राप्ति कराने के लिये एक इष्टि की थी। उस इष्टिके समय महर्षि ने मन्त्रपूत जल से एक बहुत बड़े कलश को भरकर रख दिया था। वह कलश इस उद्देश्य से रखा गया था कि उसे पीकर राजा युवनाश्व की रानी इन्द्र के समान शक्तिशाली पुत्र को जन्म दे सके। वे सभी ऋषि वेदी पर कलश रखकर सो गए थे, क्योंकि रात भर जागने के कारण वे थके हुए थे। प्यास से पीड़ित युवनाश्व ने उन मुनियों को लाँघकर आश्रम के भीतर प्रवेश किया। उनका कण्ठ सूख रहा था और वे जल के लिए व्याकुल होकर चिल्ला रहे थे, परन्तु उस समय पक्षियों की चहचहाहट में उनकी चीख कोई सुन न सका।"
"तभी उनकी दृष्टि जल से भरे उस कलश पर पड़ी। वे बड़े वेग से उसकी ओर दौड़े और प्यास बुझाने के लिये वह जल पी लिया, फिर बचा हुआ जल वहीं गिरा दिया। शीतल जल पीकर उन्हें बड़ी शान्ति मिली। कुछ देर बाद तपोधन च्यवन मुनि सहित अन्य ऋषि जाग उठे। उन्होंने देखा कि कलश जल से शून्य है। वे एकत्र होकर पूछने लगे— 'यह किसका कर्म है?' तब युवनाश्व ने सामने आकर सत्य स्वीकार करते हुए कहा— 'यह मेरा ही कर्म है।' तब भगवान च्यवन ने क्रोधित स्वर में कहा— 'महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न राजर्षि युवनाश्व! यह तुमने ठीक नहीं किया। इस कलश में मैंने तुम्हें ही पुत्र प्रदान करने के लिये तपस्या से संस्कारयुक्त किया हुआ जल रखा था। मैंने इसमें ऐसा ब्रह्मतेज स्थापित किया था कि इसे पीने से एक महाबली और तपोबल सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हो, जो देवराज इन्द्र को भी यमलोक पहुँचा सके। तुमने उस जल को पी लिया, यह अच्छा नहीं किया! अब हम इसके प्रभाव को बदल नहीं सकते; यह दैव की प्रेरणा है। इस मन्त्रपूत जल के कारण तुम अपने ही पेट से इन्द्रविजयी पुत्र को जन्म दोगे।'"
न युक्तमिति तं प्राह भगवान् भार्गवस्तदा ।
सुतार्थं स्थापिता ह्यापस्तपसा चैव सम्भृताः ॥
मया ह्यत्राहितं ब्रह्म तप आस्थाय दारुणम् ।
पुत्रार्थं तव राजर्षे महाबलपराक्रम ॥
तब भगवान् च्यवनने कहा- ' महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न राजर्षि युवनाश्व! यह तुमने ठीक नहीं किया । इस कलशमें मैंने तुम्हें ही पुत्र प्रदान करनेके लिये तपस्यासे संस्कारयुक्त किया हुआ जल रखा था और कठोर तपस्या करके उसमें ब्रह्मतेजकी स्थापना की थी ।
"राजन्! उसके बाद पूरे सौ वर्ष बीतने पर एक अद्भुत घटना घटी। राजा युवनाश्व की बायीं कोख फटी और उसमें से एक सूर्य के समान महातेजस्वी बालक बाहर निकला। राजा की मृत्यु भी नहीं हुई, यह अत्यन्त विस्मयकारी था। स्वयं महातेजस्वी इन्द्र उस बालक को देखने आए। देवताओं ने पूछा कि यह बालक क्या पीयेगा? तब इन्द्र ने अपनी तर्जनी अङ्गुली बालक के मुख में डाल दी और कहा— 'माम् अयं धाता' अर्थात् यह मुझे ही पीयेगा। इन्द्र के ऐसे कहने पर देवताओं ने मिलकर उस बालक का नाम 'मान्धाता' रख दिया। इन्द्र की दी हुई तर्जनी अङ्गुलिका का रसास्वादन करते ही वह शिशु तेरह बित्ता बढ़ गया।"
प्रदेशिनीं ततोऽस्यास्ये शक्रः समभिसंदधे ।
मामयं धास्यतीत्येवं भाषिते चैव वज्रिणा ॥
मान्धातेति च नामास्य चक्रुः सेन्द्रा दिवौकसः ॥
प्रदेशिनीं शक्रदत्तामास्वाद्य स शिशुस्तदा ।
अवर्धत महातेजाः किष्कून् राजंस्त्रयोदश ॥
तब इन्द्रने अपनी तर्जनी अंगुली बालकके मुँहमें डाल दी और कहा- ' माम् अयं धाता । ' ‘ अर्थात् यह मुझे ही पीयेगा' वज्रधारी इन्द्रके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि सब देवताओंने मिलकर उस बालकका नाम ' मान्धाता' रख दिया । राजन्! इन्द्रकी दी हुई प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुलिका रसास्वादन करके वह महातेजस्वी शिशु तेरह बित्ता बढ़ गया ।
"उस महातेजस्वी मान्धाता के चिन्तन मात्र से धनुर्वेद सहित सम्पूर्ण वेद और दिव्य अस्त्र उपस्थित हो गये; आजगव नामक धनुष, सींग के बने बाण और अभेद्य कवच उनकी सेवा में आ गये। साक्षात् देवराज इन्द्र ने मान्धाता का राज्याभिषेक किया। जैसे भगवान विष्णु ने तीन पगों से त्रिलोकी को नाप लिया था, वैसे ही मान्धाता ने धर्म के द्वारा तीनों लोकों को जीत लिया। उनका शासनचक्र सर्वत्र चलने लगा। वे पर्याप्त दक्षिणा वाले नाना प्रकार के यज्ञ करते थे और उनके यज्ञ-मण्डपों से पूरी पृथ्वी भर गई थी। उन्होंने दस हजार पद्म गौएँ दान में दीं और बारह वर्षों की अनावृष्टि के समय स्वयं पानी की वर्षा कर प्रजा की रक्षा की। उन्होंने महामेघ के समान गरजते हुए गान्धारराज को बाणों से मारकर समाप्त कर दिया। उन्होंने अपने तपोबल से देवता, मनुष्य, तिर्यक् और स्थावर— चारों प्रकार की प्रजा की रक्षा की।"
एकाहात् पृथिवी तेन धर्मनित्येन धीमता ।
विजिता शासनादेव सरत्नाकरपत्तना ॥
उन धर्मपरायण बुद्धिमान् नरेशने केवल शासनमात्रसे एक ही दिनमें समुद्र, खान और नगरोंसहित सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर ली ।
"महाराज! सूर्य के समान तेजस्वी उन्हीं महाराज मान्धाता के देवयज्ञ का यह स्थान है, जो कुरुक्षेत्र के परम पवित्र प्रदेश में स्थित है। इसका दर्शन करो। धर्मपूर्वक पृथ्वी की रक्षा करते हुए तुम भी अक्षय स्वर्ग प्राप्त कर लोगे। भूपाल! तुम मुझसे जिसके विषय में पूछ रहे थे, मैं तुम्हें मान्धाता का उत्तम जन्म-वृत्तान्त और उनका महान चरित्र सब सुना चुका हूँ।"
In English
The Birth and Reign of Mandhata
King Yuvashva accidentally drinks consecrated water intended for his future heir while visiting Rishi Chyavana's ashram. This causes him to give birth to a powerful son named Mandhata, who grows rapidly after tasting Indra's finger. Mandhata becomes a great ruler who conquers the three worlds through righteousness.
This page answers
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Also written: Mandhatopakhyana, Mandhata, Yudhishthira, Lomasha, Indra, मान्धातोपाख्यान