03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 101–110

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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उनके लिये वायु मनोहर, सुखद, शीतल और सुगन्धित होकर बहते थे । इस प्रकार क्रीड़ा करते हुए दुरात्मा राजा नहुषकी दृष्टि एक दिन देवराज इन्द्रकी प्यारी महारानी शचीपर पड़ी ॥ १६३ ॥

स तां संदृश्य दुष्टात्मा प्राह सर्वान् सभासदः ॥ १७ ॥

इन्द्रस्य महिषी देवी कस्मान्मां नोपतिष्ठति ।

अहमिन्द्रोऽस्मि देवानां लोकानां च तथेश्वरः ॥ १८ ॥

आगच्छतु शची मह्यं क्षिप्रमद्य निवेशनम् । उन्हें देखकर दुष्टात्मा नहुषने समस्त सभासदोंसे कहा - ' इन्द्रकी महारानी शची मेरी सेवामें क्यों नहीं उपस्थित होतीं? मैं देवताओंका इन्द्र हूँ और सम्पूर्ण लोकोंका अधीश्वर हूँ। अतः शचीदेवी आज मेरे महलमें शीघ्र पधारें' ॥ १७-१८ ॥ तच्छ्रुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह ॥ १ ९ ॥

रक्ष मां नहुषाद् ब्रह्मंस्त्वामस्मि शरणं गता ।

सर्वलक्षणसम्पन्नां ब्रह्मंस्त्वं मां प्रभाषसे ॥ २० ॥

देवराजस्य दयितामत्यन्तं सुखभागिनीम् ।

अवैधव्येन युक्तां चाप्येकपत्नीं पतिव्रताम् ॥ २१ ॥

यह सुनकर शचीदेवी मन -ही- मन बहुत दुःखी हुईं और बृहस्पतिसे बोलीं — ‘ ब्रह्मन्! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ, आप नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये । विप्रवर! आप मुझसे कहा करते हैं कि तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, देवराज इन्द्रकी प्राणवल्लभा, अत्यन्त सुखभागिनी, सौभाग्यवती, एकपत्नी और पतिव्रता हो ॥ १ ९ –२१ ॥

उक्तवानसि मां पूर्वमृतां तां कुरु वै गिरम् ।

नोक्तपूर्वं च भगवन् वृथा ते किंचिदीश्वर ॥ २२ ॥

तस्मादेतद् भवेत् सत्यं त्वयोक्तं द्विजसत्तम । ‘ भगवन्! आपने पहले जो वैसी बातें कही हैं, अपनी उन वाणियोंको सत्य कीजिये । देवगुरो! आपके मुखसे पहले कभी कोई व्यर्थ या असत्य वचन नहीं निकला है, अतः द्विजश्रेष्ठ! आपका यह पूर्वोक्त वचन भी सत्य होना चाहिये ' ॥ २२ ॥

पृष्ठ 102

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बृहस्पतिरथोवाच शक्राणीं भयमोहिताम् ॥ २३ ॥

यदुक्तासि मया देवि सत्यं तद् भविता ध्रुवम् ।

द्रक्ष्यसे देवराजानमिन्द्रं शीघ्रमिहागतम् ॥ २४ ॥

न भेतव्यं च नहुषात् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।

समानयिष्ये शक्रेण न चिराद् भवतीमहम् ॥ २५ ॥

यह सुनकर बृहस्पतिने भयसे व्याकुल हुई इन्द्राणीसे कहा– ' देवि! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अवश्य सत्य होगा । तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्रको यहाँ आया हुआ देखोगी । नहुषसे तुम्हें डरना नहीं चाहिये । मैं सच्ची बात कहता हूँ, थोड़े ही दिनोंमें तुम्हें इन्द्रसे मिला दूँगा' ॥ २३–२५ ॥

अथ शुश्राव नहुषः शक्राणीं शरणं गताम् ।

बृहस्पतेरङ्गिरसश्चुक्रोध स नृपस्तदा ॥ २६ ॥

जब राजा नहुषने सुना कि इन्द्राणी अंगिराके पुत्र बृहस्पतिकी शरणमें गयी है, तब वे बहुत कुपित हुए ॥

पृष्ठ 103

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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीभये एकादशोऽध्यायः ॥ ११ || इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें इन्द्राणीभयविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ११ ॥

पृष्ठ 104

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द्वादशोऽध्यायः देवता - नहुष - संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके पास कुछ समयकी अवधि माँगनेके लिये जाना शल्य उवाच

क्रुद्धं तु नहुषं दृष्ट्वा देवा ऋषिपुरोगमाः ।

अब्रुवन् देवराजानं नहुषं घोरदर्शनम् ॥ १ ॥

शल्य कहते हैं - युधिष्ठिर! देवराज नहुषको क्रोधमें भरे हुए देख देवतालोग ऋषियोंको आगे करके उनके पास गये । उस समय उनकी दृष्टि बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी । देवताओं तथा ऋषियोंने कहा- ॥ १ ॥

देवराज जहि क्रोधं त्वयि क्रुद्धे जगद् विभो ।

त्रस्तं सासुरगन्धर्वं सकिन्नरमहोरगम् ॥। २ ॥

‘ देवराज! आप क्रोध छोड़ें। प्रभो! आपके कुपित होनेसे असुर, गन्धर्व, किन्नर और महानागगणोंसहित सम्पूर्ण जगत् भयभीत हो उठा है ॥ २ ॥

जहि क्रोधमिमं साधो न कुप्यन्ति भवद्विधाः ।

परस्य पत्नी सा देवी प्रसीदस्व सुरेश्वर ॥ ३ ॥

‘ साधो! आप इस क्रोधको त्याग दीजिये । आप जैसे श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंपर कोप नहीं

करते हैं । अतः प्रसन्न होइये । सुरेश्वर! शची देवी दूसरे इन्द्रकी पत्नी हैं ॥ ३ ॥

निवर्तय मनः पापात् परदाराभिमर्शनात् ।

देवराजोऽसि भद्रं ते प्रजा धर्मेण पालय ॥ ४ ॥

‘ परायी स्त्रियोंका स्पर्श पापकर्म है । उससे मनको हटा लीजिये । आप देवताओंके राजा

हैं । आपका कल्याण हो । आप धर्मपूर्वक प्रजाका पालन कीजिये' ॥ ४ ॥

एवमुक्तो न जग्राह तद्वचः काममोहितः ।

अथ देवानुवाचेदमिन्द्रं प्रति सुराधिपः ॥ ५ ॥

उनके ऐसा कहनेपर भी काममोहित नहुषने उनकी बात नहीं मानी । उस समय देवेश्वर नहुषने इन्द्रके विषयमें देवताओंसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

अहल्या धर्षिता पूर्वमृषिपत्नी यशस्विनी ।

जीवतो भर्तुरिन्द्रेण स वः किं न निवारितः ॥ ६ ॥

‘देवताओ! जब इन्द्रने पूर्वकालमें यशस्विनी ऋषि-पत्नी अहल्याका उसके पति गौतमके जीते - जी सतीत्व नष्ट किया था, उस समय आपलोगोंने उन्हें क्यों नहीं

पृष्ठ 105

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रोका? ॥ ६ ॥

बहूनि च नृशंसानि कृतानीन्द्रेण वै पुरा ।

वैधर्म्याण्युपधाश्चैव स वः किं न निवारितः ॥ ७ ॥

‘ प्राचीनकालमें इन्द्रने बहुत- से क्रूरतापूर्ण कर्म किये हैं। अनेक अधार्मिक कृत्य तथा

छल- कपट उनके द्वारा हुए हैं । उन्हें आपलोगोंने क्यों नहीं रोका था? ॥ ७ ॥

उपतिष्ठतु देवी मामेतदस्या हितं परम् ।

युष्माकं च सदा देवाः शिवमेवं भविष्यति ॥ ८ ॥

‘ शची देवी मेरी सेवामें उपस्थित हों । इसीमें इनका परम हित है तथा देवताओ! ऐसा होनेपर ही सदा तुम्हारा कल्याण होगा ' ॥ ८ ॥

देवा ऊचुः

इन्द्राणीमानयिष्यामो यथेच्छसि दिवस्पते ।

जहि क्रोधमिमं वीर प्रीतो भव सुरेश्वर ॥ ९ ॥

देवता बोले- स्वर्गलोकके स्वामी वीर देवेश्वर! आपकी जैसी इच्छा है, उसके अनुसार हमलोग इन्द्राणीको आपकी सेवामें ले आयेंगे । आप यह क्रोध छोड़िये और प्रसन्न होइये ॥ ९ ॥

शल्य उवाच

इत्युक्त्वा तं तदा देवा ऋषिभिः सह भारत ।

जग्मुर्बृहस्पतिं वक्तुमिन्द्राणीं चाशुभं वचः ॥ १० ॥

शल्यने कहा — युधिष्ठिर! नहुषसे ऐसा कहकर उस समय सब देवता ऋषियोंके साथ इन्द्राणीसे यह अशुभ वचन कहनेके लिये बृहस्पतिजीके पास गये ॥

जानीमः शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि ।

दत्ताभयां च विप्रेन्द्र त्वया देवर्षिसत्तम ॥ ११ ॥

उन्होंने कहा — ‘ देवर्षिप्रवर! विप्रेन्द्र! हमें पता लगा है कि इन्द्राणी आपकी शरणमें

आयी हैं और आपके ही भवनमें रह रही हैं । आपने उन्हें अभय -दान दे रखा है ॥ ११ ॥

ते त्वां देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च महाद्युते ।

प्रसादयन्ति चेन्द्राणी नहुषाय प्रदीयताम् ॥ १२ ॥

' महाद्युते! अब ये देवता, गन्धर्व तथा ऋषि आपको इस बातके लिये प्रसन्न करा रहे हैं कि आप इन्द्राणीको राजा नहुषकी सेवामें अर्पण कर दीजिये ॥ १२ ॥

इन्द्राद् विशिष्टो नहुषो देवराजो महाद्युतिः ।

वृणोत्विमं वरारोहा भर्तृत्वे वरवर्णिनी ॥ १३ ॥

‘ इस समय महातेजस्वी नहुष देवताओंके राजा हैं । अतः इन्द्रसे बढ़कर हैं । सुन्दर रूप-रंगवाली शची इन्हें अपना पति स्वीकार कर लें ' ॥ १३ ॥

पृष्ठ 106

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एवमुक्ता तु सा देवी बाष्पमुत्सृज्य सस्वनम् ।

उवाच रुदती दीना बृहस्पतिमिदं वचः ॥ १४ ॥

देवताओंके यह बात कहनेपर शची देवी आँसू बहाती हुई फूट- फूटकर रोने लगीं और दीन- भावसे बृहस्पतिजीको सम्बोधित करके इस प्रकार बोलीं— ॥ १४ ॥

नाहमिच्छामि नहुषं पतिं देवर्षिसत्तम ।

शरणागतास्मि ते ब्रह्मंस्त्रायस्व महतो भयात् ॥ १५ ॥

‘ देवर्षियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! मैं नहुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती; इसीलिये

आपकी शरणमें आयी हूँ । आप इस महान् भयसे मेरी रक्षा कीजिये ' ॥ १५ ॥

बृहस्पतिरुवाच

शरणागतं न त्यजेयमिन्द्राणि मम निश्चयः ।

धर्मज्ञां सत्यशीलां च न त्यजेयमनिन्दिते ॥ १६ ॥

बृहस्पतिने कहा – इन्द्राणी! मैं शरणागतका त्याग नहीं कर सकता, यह मेरा दृढ़ निश्चय है । अनिन्दिते! तुम धर्मज्ञ और सत्यशील हो; अतः मैं तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा ॥ १६ ॥

नाकार्यं कर्तुमिच्छामि ब्राह्मणः सन् विशेषतः ।

श्रुतधर्मा सत्यशीलो जानन् धर्मानुशासनम् ॥ १७ ॥

नाहमेतत् करिष्यामि गच्छध्वं वै सुरोत्तमाः ।

अस्मिंश्चार्थे पुरा गीतं ब्रह्मणा श्रूयतामिदम् ॥ १८ ॥

विशेषतः ब्राह्मण होकर मैं यह न करने योग्य कार्य नहीं कर सकता । मैंने धर्मकी बातें सुनी हैं और सत्यको अपने स्वभावमें उतार लिया है । शास्त्रोंमें जो धर्मका उपदेश किया गया है, उसे भी जानता हूँ; अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा! सुरश्रेष्ठगण! आपलोग लौट जायँ। इस विषयमें ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जो गीत गाया था, वह इस प्रकार है, सुनिये ॥ १७-१८ ॥ न तस्य बीजं रोहति रोहकाले न तस्य वर्षं वर्षति वर्षकाले । भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे न स त्रातारं लभते त्राणमिच्छन् ॥ १ ९ ॥ ‘ जो भयभीत होकर शरणमें आये हुए प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसका हुआबीज समयपर नहीं जमता है । उसके यहाँ ठीक समयपर वर्षा नहीं होती और वह जब कभी अपनी रक्षा चाहता है, तो उसे कोई रक्षक नहीं मिलता है ॥ १ ९ ॥ मोघमन्नं विन्दति चाप्यचेताः स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति नष्टचेष्टः ।

पृष्ठ 107

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भीतं प्रपन्नं प्रददाति यो वै न तस्य हव्यं प्रतिगृह्णन्ति देवाः ॥ २० ॥

‘ जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें सौंप देता है, वह दुर्बलचित्त मानव जो अन्न ग्रहण करता है, वह व्यर्थ हो जाता है । उसके सारे उद्यम नष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्गलोकसे नीचे गिर जाता है । इतना ही नहीं, देवतालोग उसके दिये हुए हविष्यको स्वीकार नहीं करते हैं ॥ २० ॥

प्रमीयते चास्य प्रजा ह्यकाले सदा विवासं पितरोऽस्य कुर्वते । भीतं प्रपन्नं प्रददाति शत्रवे सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ॥ २१ ॥

‘ उसकी संतान अकालमें ही मर जाती है । उसके पितर सदा नरकमें निवास करते हैं । जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें दे देता है, उसपर इन्द्र आदि देवता वज्रका प्रहार करते हैं ' ॥ २१ ॥

एतदेवं विजानन् वै न दास्यामि शचीमिमाम् ।

इन्द्राणीं विश्रुतां लोके शक्रस्य महिषीं प्रियाम् ॥ २२ ॥

इस प्रकार ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार शरणागतके त्यागसे होनेवाले अधर्मको मैं निश्चितरूपसे जानता हूँ; अतः जो सम्पूर्ण विश्वमें इन्द्रकी पत्नी तथा देवराजकी प्यारी पटरानीके रूपमें विख्यात हैं, उन्हीं इन शची देवीको मैं नहुषके हाथमें नहीं दूँगा ॥ २२ ॥

अस्या हितं भवेद् यच्च मम चापि हितं भवेत् ।

क्रियतां तत् सुरश्रेष्ठा न हि दास्याम्यहं शचीम् ॥ २३ ॥

श्रेष्ठ देवताओ! जो इनके लिये हितकर हो, जिससे मेरा भी हित हो, वह कार्य आपलोग करें । मैं शचीको कदापि नहीं दूँगा ॥ २३ ॥

शल्य उवाच

अथ देवाः सगन्धर्वा गुरुमाहुरिदं वचः ।

कथं सुनीतं नु भवेन्मन्त्रयस्व बृहस्पते ॥ २४ ॥

शल्य कहते हैं— राजन्! तब देवताओं तथा गन्धर्वोंने गुरुसे इस प्रकार कहा -' बृहस्पते! आप ही सलाह दीजिये कि किस उपायका अवलम्बन करनेसे शुभ परिणाम होगा? ' ॥ २४ ॥

बृहस्पतिरुवाच

नहुषं याचतां देवी किंचित् कालान्तरं शुभा ।

इन्द्राणी हितमेतद्धि तथास्माकं भविष्यति ॥ २५ ॥

पृष्ठ 108

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बृहस्पतिजीने कहा— देवगण! शुभलक्षणा शची देवी नहुषसे कुछ समयकी अवधि माँगें । इसीसे इनका और हमारा भी हित होगा ॥ २५ ॥

बहुविघ्नः सुराः कालः कालः कालं नयिष्यति ।

गर्वितो बलवांश्चापि नहुषो वरसंश्रयात् ॥ २६ ॥

देवताओ! समय अनेक प्रकारके विघ्नोंसे भरा होता है । इस समय नहुष आपलोगोंके वरदानके प्रभावसे बलवान् और गर्वीला हो गया है । काल ही उसे कालके गालमें पहुँचा देगा ॥ २६ ॥

शल्य उवाच

ततस्तेन तथोक्ते तु प्रीता देवास्तथाब्रुवन् ।

ब्रह्मन् साध्विदमुक्तं ते हितं सर्वदिवौकसाम् ॥ २७ ॥

शल्य कहते हैं — राजन्! उनके इस प्रकार सलाह देनेपर देवता बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले — ‘ ब्रह्मन्! आपने बहुत अच्छी बात कही है। इसीमें सम्पूर्ण देवताओंका हित है ॥ २७ ॥

एवमेतद् द्विजश्रेष्ठ देवी चेयं प्रसाद्यताम् ।

ततः समस्ता इन्द्राणीं देवाश्चाग्निपुरोगमाः ।

ऊचुर्वचनमव्यग्रा लोकानां हितकाम्यया ॥ २८ ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! इसी बात के लिये शची देवीको राजी कीजिये । ' तदनन्तर अग्नि आदि सब देवता इन्द्राणीके पास जा समस्त लोकोंके हितके लिये शान्तभावसे इस प्रकार बोले ॥ २८ ॥

देवा ऊचुः

त्वया जगदिदं सर्वं धृतं स्थावरजङ्गमम् ।

एकपत्न्यसि सत्या च गच्छस्व नहुषं प्रति ॥ २९ ॥

क्षिप्रं त्वामभिकामश्च विनशिष्यति पापकृत् ।

नहुषो देवि शक्रश्च सुरैश्वर्यमवाप्स्यति ॥ ३० ॥

देवता बोले — देवि! यह समस्त चराचर जगत् तुमने ही धारण कर रखा है, क्योंकि तुम पतिव्रता और सत्यपरायणा हो । अतः तुम नहुषके पास चलो । देवेश्वरि! तुम्हारी कामना करनेके कारण पापी नहुष शीघ्र नष्ट हो जायगा और इन्द्र पुनः अपने देवसाम्राज्यको प्राप्त कर लेंगे ||

एवं विनिश्चयं कृत्वा इन्द्राणी कार्यसिद्धये ।

अभ्यगच्छत सव्रीडा नहुषं घोरदर्शनम् ॥ ३१ ॥

अपनी कार्य- सिद्धिके लिये ऐसा निश्चय करके इन्द्राणी भयंकर दृष्टिवाले नहुषके पास बड़े संकोचके साथ गयी ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 109

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दृष्ट्वा तां नहुषश्चापि वयोरूपसमन्विताम् ।

समहृष्यत दुष्टात्मा कामोपहतचेतनः ॥ ३२ ॥

नयी अवस्था और सुन्दर रूपसे सुशोभित इन्द्राणीको देखकर दुष्टात्मा नहुष बहुत प्रसन्न हुआ । कामभावनासे उसकी बुद्धि मारी गयी थी ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीकालावधियाचने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें इन्द्राणीकी नहुषसे समययाचनासे सम्बन्ध रखनेवाला बारहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२ ॥

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पृष्ठ 110

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त्रयोदशोऽध्यायः नहुषका इन्द्राणीको कुछ कालकी अवधि देना, इन्द्रका ब्रह्महत्यासे उद्धार तथा शचीद्वारा रात्रिदेवीकी उपासना शल्य उवाच

अथ तामब्रवीद् दृष्ट्वा नहुषो देवराट् तदा ।

त्रयाणामपि लोकानामहमिन्द्रः शुचिस्मिते ॥ १ ॥

भजस्व मां वरारोहे पतित्वे वरवर्णिनि । शल्य कहते हैं — युधिष्ठिर! उस समय देवराज नहुषने इन्द्राणीको देखकर कहा ——शुचिस्मिते! मैं तीनों लोकोंका स्वामी इन्द्र हूँ। उत्तम रूप- रंगवाली सुन्दरी! तुम मुझे अपना पति बना लो ' ॥ १६ ॥

एवमुक्ता तु सा देवी नहुषेण पतिव्रता ॥ २ ॥

प्रावेपत भयोद्विग्ना प्रवाते कदली यथा ।

प्रणम्य सा हि ब्रह्माणं शिरसा तु कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥

देवराजमथोवाच नहुषं घोरदर्शनम् ।

कालमिच्छाम्यहं लब्धुं त्वत्तः कंचित् सुरेश्वर ॥ ४ ॥

नहुषके ऐसा कहनेपर पतिव्रता देवी शची भयसे उद्विग्न हो तेज हवामें हिलनेवाले केलेके वृक्षकी भाँति काँपने लगीं। उन्होंने मस्तक झुकाकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और -भयंकर दृष्टिवाले देवराज नहुषसे हाथ जोड़कर कहा– ' देवेश्वर! मैं आपसे कुछ समयकी अवधि लेना चाहती हूँ ॥ २–४ ॥

न हि विज्ञायते शक्रः किं वा प्राप्तः क्व वा गतः ।

तत्त्वमेतत् तु विज्ञाय यदि न ज्ञायते प्रभो ॥ ५ ॥

ततोऽहं त्वामुपस्थास्ये सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।

एवमुक्तः स इन्द्राण्या नहुषः प्रीतिमानभूत् ॥ ६ ॥

' अभी यह पता नहीं है कि देवेन्द्र किस अवस्थामें पड़े हैं? अथवा कहाँ चले गये हैं? प्रभो! इसका ठीक - ठीक पता लगानेपर यदि कोई बात मालूम नहीं हो सकी, तो मैं आपकी सेवामें उपस्थित हो जाऊँगी । यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ । ' इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर नहुषको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ५-६ ॥ नहुषउवाच

एवं भवतु सुश्रोणि यथा मामिह भाषसे ।

ज्ञात्वा चागमनं कार्यं सत्यमेतदनुस्मरेः ॥ ७ ॥