महाभारत — खण्ड ३
Mahabharata - 3 · Gita Press, Gorakhpur · 2343 पृष्ठ · 235 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीहरिः । 34 श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत महाभारत ( तृतीय खण्ड ) उद्योगपर्व और भीष्मपर्व, सचित्र, सरल हिन्दी - अनुवादसहित गीताप्रेस गोरखपुरGITA PRESS,… 1–10
- १३९- भीष्मसे वार्तालाप आरम्भ करके द्रोणाचार्यका दुर्योधनको पुनः संधिके लिये समझाना १४०- भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको पाण्डवपक्षमें आ जानेके लिये समझाना १४१-… 11–20
- ११८- भीष्मका अद्भुत पराक्रम करते हुए पाण्डव - सेनाका भीषण संहार ११९- कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना,… 21–30
- धर्मार्थयुक्तं मधुरं समं च । २५ । समाददे वाक्यमथाग्रजोऽस्य सम्पूज्य वाक्यं तदतीव राजन् । २६ । राजन्! भगवान् श्रीकृष्णका धर्म और अर्थसे युक्त, मधुर एवं… 31–40
- चतुर्थोऽध्यायः राजा द्रुपदकी सम्मति द्रुपदउवाच एवमेतन्महाबाहो भविष्यति न संशयः । न हि दुर्योधनो राज्यं मधुरेण प्रदास्यति । १… 41–50
- वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महामना राजा द्रुपदके द्वारा इस प्रकार अनुशासित होकर सदाचार- सम्पन्न पुरोहितने हस्तिनापुरको प्रस्थान किया । १८… 51–60
- गीताप्रेस गोरखपुर कौरव - सभामें विराट् रूप गीताप्रेस गोरखपुर संजयको दिव्य दृष्टि गीताप्रेस, गोरखपुर सबमें भगवत् - दर्शन गीताप्रेस गोरखपुर भक्तोंके द्वारा… 61–70
- बनूँगा । वैशम्पायन उवाच कृतमित्यब्रवीच्छल्यः किमन्यत् क्रियतामिति । कृतमित्येव गान्धारिः प्रत्युवाच पुनः पुनः । १ ९… 71–80
- तास्तु यत्नं परं कृत्वा पुनः शक्रमुपस्थिताः । १७ । कृताञ्जलिपुटाः सर्वा देवराजमथाब्रुवन् । न स शक्यः सुदुर्धर्षो धैर्याच्चालयितुं प्रभो । १८… 81–90
- ‘ आप ही सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हैं । आपसे ही यह समस्त चराचर जगत् व्याप्त है । महादेव! आप ही अखिलविश्ववन्दित देवता हैं । ८… 91–100
- उनके लिये वायु मनोहर, सुखद, शीतल और सुगन्धित होकर बहते थे । इस प्रकार क्रीड़ा करते हुए दुरात्मा राजा नहुषकी दृष्टि एक दिन देवराज इन्द्रकी प्यारी महारानी… 101–110
- नहुष बोले- सुन्दरी! तुम मुझसे यहाँ जैसा कह रही हो ऐसा ही हो । इसके अनुसार पता लगाकर तुम्हें मेरे पास आ जाना चाहिये; इस सत्यको सदा याद रखना… 111–120
- क्यों न हो, आपके सामने ठहर नहीं सकता है । १४ । शल्य उवाच एवमुक्तस्तु नहुषः प्राहृष्यत तदा किल । उवाच वचनं चापि सुरेन्द्रस्तामनिन्दिताम् । १५… 121–130
- वैवस्वतं पितॄणां च वरुणं चाप्यपां तथा । आधिपत्यं ददौ शक्रः संचिन्त्य वरदस्तथा । ३४ । इसी प्रकार वरदायक इन्द्रने खूब सोच- समझकर वैवस्वत यमको पितरोंका तथा… 131–140
- शल्यकी बात सुनकर कुन्तीपुत्र महाबाहु युधिष्ठिर मद्रराजसे यह वचन बोले । २२ । भवान् कर्णस्य सारथ्यं करिष्यति न संशयः… 141–150
- एकविंशोऽध्यायः भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धृतराष्ट्रद्वारा… 151–160
- ( युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें ) चेदि और करूषदेशके भूपाल सब प्रकारकी तैयारीसे संगठित होकर आये थे… 161–170
- था और स्वयं सकुशल लौट आये थे । क्या कौरव कभी उनकी याद करते हैं? । २७ । न कर्मणा साधुनैकेन नूनं सुखं शक्यं वै भवतीह संजय… 171–180
- य इन्द्रियाणां प्रीतिरसानुगामी । ४ । हमलोग वही सुख चाहते हैं, जो धर्मकी प्राप्ति करानेवाला हो… 181–190
- राजानश्च ये विजिताः पुरस्तात् त्वामेव ते संश्रयेयुः समस्ताः । १८ । प्रहार करनेमें कुशल वीर सैनिकों तथा पुत्रोंके साथ सुवर्णमय रथसे सुशोभित मत्स्यदेशके… 191–200
- विद्वान् पुरुष भी इस जगत् में भक्ष्य - भोज्य पदार्थोंको भोजन किये बिना तृप्त नहीं हो सकता, अतएव विद्वान् ब्राह्मणके लिये भी क्षुधानिवृत्तिके लिये भोजन… 201–210
- द्यूतके समय जब पाण्डव हार गये थे, तब दुर्योधनने उनके प्रति बड़ी भयानक और कड़वी बातें कही थीं; अतः सदा सावधान रहनेवाले भीमसेन युद्धके समय गदा हाथमें लेकर… 211–220
- संजय! तुम वहाँ उन स्त्रियोंको भी जानते हो, जो हमारी पुत्रवधुएँ लगती हैं, जो उत्तम कुलोंसे आयी हैं तथा सर्वगुणसम्पन्न और संतानवती हैं… 221–230
- द्वाःस्थ उवाच संजयोऽथ भूमिपते नमस्ते दिदृक्षया द्वारमुपागतस्ते । प्राप्तो दूतः पाण्डवानां सकाशात् प्रशाधि राजन् किमयं करोतु । ५… 231–240
- धृतराष्ट्रका भेजा हुआ वह दूत जाकर विदुरसे बोला- ' महामते! हमारे स्वामी महाराज धृतराष्ट्र आपसे मिलना चाहते हैं ' । २… 241–250
- दूसरेके धनका हरण, दूसरेकी स्त्रीका संसर्ग तथा सुहृद् मित्रका परित्याग – ये तीनों ही दोष ( मनुष्यके आयु, धर्म तथा कीर्तिका ) क्षय करनेवाले होते हैं । ६५… 251–260
- चतुस्त्रिंऽध्यायः धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन धृतराष्ट्रउवाच जाग्रतो दह्यमानस्य यत् कार्यमनुपश्यसि… 261–270
- वक्ता पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्यते । ७४ । मूर्ख मनुष्य विद्वानोंको गाली और निन्दासे कष्ट पहुँचाते हैं… 271–280
- विदुरजी कहते हैं - इसलिये राजेन्द्र! आप पृथ्वीके लिये झूठ न बोलें । बेटेके स्वार्थवश सच्ची बात न कहकर पुत्र और मन्त्रियोंके साथ विनाशके मुखमें न जायँ… 281–290
- रूक्षां वाचं रुषतीं वर्जयीत । ६ । दूसरोंको न तो गाली दे और न उनका अपमान करे, मित्रोंसे द्रोह तथा नीच पुरुषोंकी सेवा न करे, सदाचारसे हीन एवं अभिमानी न हो,… 291–300
- पापानुबन्धं परुषं तीक्ष्णमुष्णम् । सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य । ६८… 301–310
- इन्द्रके समान पराक्रमी महाराज! आकाशमें तिरछा उदित हुआ धूमकेतु जैसे सारे संसारमें अशान्ति और उपद्रव खड़ा कर देता है, उसी तरह भीष्म, आप, द्रोणाचार्य और राजा… 311–320
- येऽर्थाः स्त्रीषु समायुक्ताः प्रमत्तपतितेषु च । ये चानार्ये समासक्ताः सर्वे ते संशयं गताः । ४२… 321–330
- रतिपुत्रफला नारी दत्तभुक्तफलं धनम् । ६५ । वेदोंका फल है अग्निहोत्र करना, शास्त्राध्ययनका फल है सुशीलता और सदाचार, स्त्रीका फल है रतिसुख और पुत्रकी… 331–340
- (सनत्सुजातपर्व) एकचत्वारिंशोऽध्यायः विदुरजीके द्वारा स्मरण करनेपर आये हुए सनत्सुजात ऋषिसे धृतराष्ट्रको उपदेश देनेके लिये उनकी प्रार्थना धृतराष्ट्रउवाच… 341–350
- येऽस्मिन् धर्मान् नाचरन्तीह केचित् तथा धर्मान् केचिदिहाचरन्ति । धर्मः पापेन प्रतिहन्यते स्वि- दुताहो धर्मः प्रतिहन्ति पापम् । २२… 351–360
- विस्मृति, अधिक बकवाद और अपनेको बड़ा समझना – इन दोषोंसे जो मुक्त है, उसीको सत्पुरुष दाना ( जितेन्द्रिय) कहते हैं… 361–370
- आचार्यने जो अपना उपकार किया, उसे ध्यानमें रखकर तथा उससे जो प्रयोजन सिद्ध हुआ, उसका भी विचार करके मन- ही- मन प्रसन्न होकर शिष्य आचार्यके प्रति जो ऐसा भाव… 371–380
- देखने और पीनेवाले लोग उसीमें गोता लगाते रहते हैं । इससे मुक्त करनेवाले उस सनातन परमात्माका योगीजन साक्षात्कार करते । ७… 381–390
- द्वारपालके इतना कहते ही कानोंमें कुण्डल धारण किये संजय रथसे नीचे उतरकर राजसभाके निकट आया और महामना महीपालोंसे भरी हुई उस सभाके भीतर प्रविष्ट हुआ । १४… 391–400
- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् । ३२ । अभिमन्यु साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके समान पराक्रमी तथा अस्त्रविद्यामें निपुण है, वह शत्रुपक्षके वीरोंका… 401–410
- अयं कपाटेन जघान पाण्ड्यं तथा कलिङ्गान् दन्तकूरे ममर्द । अनेन दग्धा वर्षपूगान् विनाथा वाराणसी नगरी सम्बभूव । ७६… 411–420
- द्विधाभूतौ महाप्राज्ञौ विद्धि ब्रह्मन् परंतपौ । असुराणां विनाशाय देवगन्धर्वपूजितौ । ९ । इन्होंने अपने सत्कर्मोंसे निश्चय ही सम्पूर्ण लोकोंका आनन्द बढ़ाया… 421–430
- बाहुबलमें जिनकी समानता करनेवाला इस भूमण्डलमें दूसरा कोई नहीं है, जिन्होंने केवल धनुष धारण करके युद्धमें काशी, अंग, मगध और कलिंग आदि देशोंके समस्त… 431–440
- सृक्किणी लेलिहानस्य बाष्पमुत्सृजतो मुहुः । २ ९ । उद्दिश्य नागान् पततः कुर्वतो भैरवान् रवान् । प्रतीपं पततो मत्तान् कुञ्जरान् प्रतिगर्जतः । ३०… 441–450
- त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः कौरवसभामें धृतराष्ट्रका युद्धसे भय दिखाकर शान्तिके लिये प्रस्ताव करना धृतराष्ट्रउवाच यथैव पाण्डवाः सर्वे पराक्रान्ता जिगीषवः… 451–460
- ‘ उन्होंने मेरे लिये अनन्त क्लेश और दुःख सहन किये हैं । ' नरश्रेष्ठ पिताजी! आपके पुत्रों तथा मेरे भाइयोंने केवल मेरी प्रसन्नताके लिये शत्रुओंको सदा ही… 461–470
- भीमसेनके अनुरोधकी रक्षाके लिये पवननन्दन हनुमान्जी उस ध्वजमें युद्धके समय अपने स्वरूपको स्थापित करेंगे । ९… 471–480
- तुम क्षत्रियधर्ममें प्रतिष्ठित हो और युद्धकी इच्छासे सामने आये हुए समस्त कौरवोंको अकेले ही कैद कर लेनेकी पूरी शक्ति रखते हो । ५१–५३… 481–490
- अञ्जलिं मूर्ध्नि संधाय तौ संदेशमचोदयम् । १३ । तत्पश्चात् अन्न और जलके द्वारा मेरा सत्कार किया गया… 491–500
- नान्यथा भूतपूर्वं च सत्यवागिति मां विदुः । २२ । ' शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! मैं जो बात मुँहसे कह देता हूँ कि यह इसी प्रकार होगा, मेरा वह कथन पहले… 501–510
- यदा परिकरिष्यन्ति ऐणेयानिव तन्तुना । अतरित्रानिव जले बाहुभिर्मामका रणे । ७ । पश्यन्तस्ते परांस्तत्र रथनागसमाकुलान्… 511–520
- एकस्य च बहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् । १५ । विराटनगरमें तुम्हारे भाइयोंसहित जो सारी सेना युद्धके लिये गयी थी, वह वहाँकी समस्त गौओंको छोड़कर अत्यन्त… 521–530
- एकोनसप्ततितमोऽध्यायः संजयका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्ण-प्राप्ति एवं तत्त्वज्ञानका साधन बताना धृतराष्ट्रउवाच कथं त्वं माधवं वेत्थ सर्वलोकमहेश्वरम्… 531–540
- जनार्दनं समासाद्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । ) अभ्यभाषत दाशार्हमृषभं सर्वसात्वताम् । १ । समस्त यदुवंशियोंमें श्रेष्ठ दशार्हकुलनन्दन जनार्दन श्रीकृष्णके पास… 541–550
- और धन - सम्पत्तिसे वंचित होनेके कारण अपने विनाशकी सम्भावना भी रहती ही है । ६७ । न च त्यक्तुं तदिच्छामो न चेच्छामः कुलक्षयम्… 551–560
- निशम्य विनिवर्तिष्ये जयाय तव भारत । ३७ । भारत! मैं जाकर कौरवोंकी युद्धविषयक तैयारीकी बातें जान-सुनकर आपकी विजयके लिये पुनः यहाँ लौट आऊँगा । ३७… 561–570
- भारत! तुम अपने कर्मोंकी ओर देखकर और जिस कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है, उसपर भी दृष्टिपात करके खड़े हो जाओ… 571–580
- अधर्मेण जितान् दृष्ट्वा वने प्रव्रजितांस्तथा । १४ । वध्यतां मम वार्ष्णेय निर्गतोऽसौ सुयोधनः । वृष्णिकुलनन्दन! हमलोग अधर्मपूर्वक जूएमें पराजित किये गये और… 581–590
- द्वयशीतितमोऽध्यायः द्रौपदीका श्रीकृष्णसे अपना दुःख सुनाना और श्रीकृष्णका उसे आश्वासन देना वैशम्पायन उवाच राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम्… 591–600
- ततस्तन्मतमाज्ञाय केशवस्य पुरःसराः । प्रसस्रुर्योजयिष्यन्तो रथं चक्रगदाभृतः । १४ । तब चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके अभिप्रायको जानकर उनके… 601–610
- चतुरशीतितमोऽध्यायः मार्गके शुभाशुभ शकुनोंका वर्णन तथा मार्गमें लोगोंद्वारा सत्कार पाते हुए श्रीकृष्णका वृकस्थल पहुँचकर वहाँ विश्राम करना वैशम्पायन उवाच… 611–620
- नित्यप्रभिन्नान् मातङ्गानीषादन्तान् प्रहारिणः । अष्टानुचरमेकैकमष्टौ दास्यामि कौरव । ७ । कुरुनन्दन! इनके सिवा मैं उन्हें आठ मतवाले हाथी भी दूँगा, जिनके… 621–630
- इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि दुर्योधनवाक्ये अष्टाशीतितमोऽध्यायः । ८८ । इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें… 631–640
- ‘ जब वे अपनी राजधानीमें ऊँची अट्टालिकाओंके भीतर रंकुमृगके चर्मसे बने हुए बिछौनोंसे युक्त सुकोमल शय्याओंपर शयन करते थे, उन दिनों हाथियोंके चिग्घाड़ने,… 641–650
- वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर अर्जुनके मित्र भगवान् श्रीकृष्णने पुत्रोंकी चिन्ताओंमें डूबकर शोक करती हुई अपनी बुआ कुन्तीको इस प्रकार आश्वासन दिया… 651–660
- [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं । ] FUEL O FUTE १. जो दुष्ट नहीं है, उसे भी दुष्ट समझना मोह है… 661–670
- चतुर्नवतितमोऽध्यायः दुर्योधन एवं शकुनिके द्वारा बुलाये जानेपर भगवान् श्रीकृष्णका रथपर बैठकर प्रस्थान एवं कौरवसभामें प्रवेश और स्वागतके पश्चात् आसनग्रहण… 671–680
- वहाँ सभामें पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका भूमण्डलके राजाओं तथा सभी कौरवोंने भलीभाँति पूजन किया । ४०… 681–690
- प्रमुञ्चेमान् मृत्युपाशात् क्षत्रियान् पुरुषर्षभ । ५३ । जनेश्वर! आपसे पाण्डवोंका राज्य लौटा देनेके सिवा दूसरी कौन- सी बात यहाँ कही जा सकती है… 691–700
- उछलते - कूदते और छींकते हैं । कितने ही मल - मूत्र करने लग जाते हैं और कुछ लोग निरंतर रोते - हँसते रहते हैं । ४४-४५… 701–710
- एकोनशततमोऽध्यायः नारदजीके द्वारा पाताललोकका प्रदर्शण नारद उवाच एतत् तु नागलोकस्य नाभिस्थाने स्थितं पुरम् । पातालमिति विख्यातं दैत्यदानवसेवितम् । १… 711–720
- निवसन्ति दिशां पाल्यो धारयन्त्यो दिशः स्म ताः । ७ । मातले! सुरभिकी पुत्रीस्वरूपा चार अन्य धेनुएँ हैं, जो सब दिशाओं में निवास करती हैं… 721–730
- विष्णुरुवाच ईशस्त्वं सर्वलोकानां चराणामचराश्च ये । त्वया दत्तमदत्तं कः कर्तुमुत्सहते विभो । २७… 731–740
- ‘ वत्स गालव! अब मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ । ' उनके इस प्रकार आदेश देनेपर गालवने प्रसन्नता प्रकट करते हुए मधुर वाणीमें… 741–750
- अत्र गत्वा सुखस्यान्तं दुःखस्यान्तं प्रपद्यते । अत्रावृत्तो दिनकरः सुरसं क्षरते पयः । १५ । काष्ठां चासाद्य वासिष्ठीं हिममुत्सृजते पुनः… 751–760
- खेचर! तुम्हारे पंखोंकी हवासे उखड़कर ये वृक्ष पीछे - पीछे चले आ रहे हैं । मैं इनकी भी ऐसी तीव्र गति देख रहा हूँ, मानो ये भी हमलोगोंके साथ चलनेके लिये… 761–770
- इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः । ११४ । इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमेंगालव… 771–780
- गालव! मेरे पास भी दो ही सौ श्यामकर्ण घोड़े हैं; अतः मैं भी इसके गर्भसे एक ही राजकुमारको उत्पन्न करूँगा । ६… 781–790
- विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः माधवीका वनमें जाकर तप करना तथा ययातिका स्वर्गमें जाकर सुखभोगके पश्चात् मोहवश तेजोहीन होना नारद उवाच स तु राजा पुनस्तस्याः कर्तुकामः… 791–800
- वीरशब्दफलं चैव तेन संयुज्यतां भवान् । ७ । तदनन्तर क्षत्रियशिरोमणि प्रतर्दनने यह बात कही - ' मैं जिस प्रकार सदा धर्ममें तत्पर रहा हूँ, सर्वदा न्याययुक्त… 801–810
- भ्रातॄणामथ भृत्यानां मित्राणां च परंतप । १४ । ‘ परंतप! यदि तुम उस अनर्थकारी दुराग्रहको छोड़ दो तो अपने कल्याणके साथ ही भाइयों, सेवकों तथा मित्रोंका भी… 811–820
- तत्पश्चात् राजा धृतराष्ट्रने राजाओंसे घिरकर भाइयोंके साथ बैठे हुए दुर्योधनसे कहा - । २२ । दुर्योधन निबोधेदं शौरिणोक्तं महात्मना… 821–830
- 'उन दिनों पाण्डव अपनी माताके साथ सुदीर्घ कालतक एकचक्रा नगरीमें किसी ब्राह्मणके घरमें छिपे रहे । १४ । विषेण सर्पबन्धैश्च यतिताः पाण्डवास्त्वया… 831–840
- भवेद् द्रोणमुखानां च सुहृदां शाम्यता त्वया । २१ । 'यदि तुम शान्त हो जाओगे तो तुम्हारे द्वारा भीष्मकी, पिताजीकी, मेरी तथा द्रोण आदि अन्य हितैषी सुहृदोंकी… 841–850
- क्षिप्रमानय तं पापं राज्यलुब्धं सुयोधनम् । ३० । सहमित्रं सहामात्यं ससोदर्यं सहानुगम् । शक्नुयां यदि पन्थानमवतारयितुं पुनः । ३१… 851–860
- द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः श्रीकृष्णके पूछनेपर कुन्तीका उन्हें पाण्डवोंसे कहनेके लिये संदेश देना वैशम्पायन उवाच प्रविश्याथ गृहं तस्याश्चरणावभिवाद्य च… 861–870
- पराजयके कारण जो लोकमें तेरी निन्दा और तिरस्कार हो रहे हैं, इन सब दोषोंसे तू स्वयं ही अपने - आपको मुक्त कर और अपने हृदयको लोहेके समान दृढ़ बनाकर पुनः अपने… 871–880
- संजय! इस लोकमें युद्ध एवं विजयके लिये ही विधाताने क्षत्रियकी सृष्टि की है । वह विजय प्राप्त करे या युद्धमें मारा जाय, सभी दशाओंमें उसे इन्द्रलोककी… 881–890
- दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्ण! आकाशवाणीने जैसा कहा है, वैसा ही हो, यही मेरी भी इच्छा है । वृष्णिनन्दन! यदि धर्मकी सत्ता है तो वह सब उसी रूपमें सत्य होगा… 891–900
- अपने अस्त्र- शस्त्रधारी भाइयोंसे घिरे हुए द्रौपदी- सहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर वनमें रहें तो भी उन्हें राज्यसिंहासनपर बैठा हुआ कौन नरेश युद्धमें जीत सकेगा?… 901–910
- वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! दुर्योधनने मेरे ही भरोसे हथियार उठाने तथा पाण्डवोंके साथ विग्रह करनेका साहस किया है । १५… 911–920
- त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन संजय उवाच केशवस्य तु तद्… 921–930
- ' युद्धमें निश्चय ही मुझे बड़ा भारी दोष दिखायी देता है; परंतु युद्ध न होनेपर भी पाण्डवोंका पराभव स्पष्ट है… 931–940
- सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरके पूछनेपर श्रीकृष्णका कौरवसभामें व्यक्त किये हुए भीष्मजीके वचन सुनाना वैशम्पायन उवाच आगम्य… 941–950
- यथा ते न प्रणश्येयुर्महाराज तथा कुरु । मां चैव धृतराष्ट्रं च पूर्वमेव महामते । २२ । चित्रकार इवालेख्यं कृत्वा स्थापितवानसि… 951–960
- प्रजानाथ! अब तुम्हें भी जो उचित जान पड़े, वह करो । भारत! कौरवसभामें भीष्म, द्रोण, विदुर, गान्धारी तथा धृतराष्ट्रने मेरे सामने जो बातें कही थीं, वे सब आपको… 961–970
- हर्षमें भरे हुए और कवच आदिसे सुसज्जित वे समस्त सैनिक शत्रु सेनाको विदीर्ण करनेका उत्साह रखते थे… 971–980
- हुआ । १५३ । Papa चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने समयोचित कर्तव्यके विषयमें पूछना, भगवान्का युद्धको ही कर्तव्य बताना तथा… 981–990
- पृथगक्षौहिणीनां च प्रणेतॄन् नरसत्तमान् । विधिवत् पूर्वमानीय पार्थिवानभ्यषेचयत् । ३१ । कृपं द्रोणं च शल्यं च सैन्धवं च जयद्रथम्… 991–1000
- युधिष्ठिरेण सहित उपाविशदरिंदमः । पाण्डवोंके डेरेमें बलरामजी श्रीकृष्ण आदि सब लोगोंने उन्हें प्रणाम किया… 1001–1010
- महाराज! उस युद्धसे दो ही वीर अलग हो गये थे – एक तो वृष्णिवंशी रोहिणीनन्दन बलराम और दूसरा राजा रुक्मी । ३८ । गते रामे तीर्थयात्रां भीष्मकस्य सुते तथा… 1011–1020
- प्रमार्जाश्रु रणे जित्वा सम्मानं परमावह । ४६ । ' तुम्हारी माता वर्षोंसे कष्ट भोग रही है; अतः माताके हितमें तत्पर हो उसके आँसू पोंछो और युद्धमें विजय… 1021–1030
- आत्तशस्त्रस्य संग्रामे वहन्ति प्रतिगर्जनाः । ११८ । ‘ माया, इन्द्रजाल अथवा भयानक छलना संग्रामभूमिमें हथियार उठाये हुए वीरके क्रोध और सिंहनादको ही बढ़ाती… 1031–1040
- पुनरेव महाप्राज्ञं युधिष्ठिरमुदैक्षत । ७ । नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर महाबाहु केशवने पुनः परम बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरकी ओर देखा । ७… 1041–1050
- ‘ इसीलिये तू घमंडमें भरकर अपने ऊपर आये हुए वर्तमान संकटको नहीं देख पाता है, अतः मैं सबसे पहले तेरे सेनासमूहमें प्रवेश करके कुरुकुलके वृद्ध पुरुष भीष्मका… 1051–1060
- संजय उवाच सैनापत्यमनुप्राप्य भीष्मः शान्तनवो नृप । दुर्योधनमुवाचेदं वचनं हर्षयन्निव । ६ । संजय बोले— नरेश्वर! सेनापतिका पद प्राप्त करके शान्तनुनन्दन… 1061–1070
- सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः कौरवपक्षके रथी, महारथी और अतिरथियोंका वर्णन भीष्म उवाच शकुनिर्मातुलस्तेऽसौ रथ एको नराधिप… 1071–1080
- भीष्म उवाच समुद्यतोऽयं भारो मे सुमहान् सागरोपमः । धार्तराष्ट्रस्य संग्रामे वर्षपूगाभिचिन्तितः । ३० । तस्मिन्नभ्यागते काले प्रतप्ते लोमहर्षणे… 1081–1090
- O mmi पाण्डव -सेनापति-२ धृष्टद्युम्न उसके साथ पांचालों और प्रभद्रकोंकी बहुत बड़ी सेना है । वह उन रथियोंके समूहद्वारा युद्धमें महान् कर्म कर दिखायेगा । ३… 1091–1100
- तस्मिंश्च निधनं प्राप्ते सत्यवत्या मते स्थितः । विचित्रवीर्यं राजानमभ्यषिञ्चं यथाविधि । ६ । तदनन्तर जब चित्रांगदकी भी मृत्यु हो गयी; तब माता सत्यवतीकी… 1101–1110
- उसने पुण्यशील तपस्वी महात्माओंके आश्रमपर जाकर वहीं वह रात बितायी । उस आश्रममें तपस्वी - लोगोंने सब ओरसे घेरकर उसकी रक्षा की थी । ३६… 1111–1120
- तपोधन! महामुने! लज्जा और अपमानके भयसे अपने नगरको जानेके लिये मेरे मनमें उत्साह नहीं है । यत् तु मां भगवान् रामो वक्ष्यति द्विजसत्तम… 1121–1130
- ‘ महामुने राम! प्रभो! ऐसा होनेसे आपकी कही हुई बात सत्य सिद्ध होगी । वीरवर भार्गव! आपने समस्त क्षत्रियोंको जीतकर ब्राह्मणोंके बीचमें यह प्रतिज्ञा की थी कि… 1131–1140
- सर्वं तद् भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं स्वयंवरे । ९ ० । तब मैंने हाथ जोड़कर गंगादेवीको प्रणाम किया और स्वयंवरमें जैसी घटना घटित हुई थी, वह सब वृत्तान्त उनसे… 1141–1150
- भरतश्रेष्ठ! उससे घायल होकर मैं उस श्रेष्ठ रथपर बैठ गया, उस समय मुझे मूर्च्छित अवस्थामें देखकर सारथि शीघ्र ही अन्यत्र हटा ले गया । १५… 1151–1160
- ततस्तेषामहं वाग्भिस्तर्पितः सहसोत्थितः मातरं सरितां श्रेष्ठामपश्यं रथमास्थिताम् । १५ । उन सबने एक साथ ही बार-बार कहा- ' तुम्हारा कल्याण हो… 1161–1170
- पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी… 1171–1180
- इस प्रकार बारह वर्षोंतक कठोर तपस्यामें संलग्न हो उसने पृथ्वी और आकाशको संतप्त कर दिया । उसके जातिवालोंने आकर उसे उस कठोर व्रतसे निवृत्त करनेकी चेष्टा की;… 1181–1190
- रानीने कहा — महाराज! भगवान् शिवका दिया हुआ वर किसी तरह मिथ्या नहीं होगा । भला, तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् झूठी बात कैसे कह सकते हैं? राजन्! यदि… 1191–1200
- राजन्! वह वन समृद्धिशाली यक्ष स्थूणाकर्णके द्वारा सुरक्षित था । इसीके भयसे साधारण लोगोंने उस वनमें आना- जाना छोड़ दिया था । २०… 1201–1210
- द्रुपदः सह पुत्रेण सिद्धार्थेन शिखण्डिना । मुदं च परमां लेभे पाञ्चाल्यः सह बान्धवैः । ५ ९ । पूर्ण मनोरथ होकर लौटे हुए अपने पुत्र शिखण्डीके साथ पांचालराज… 1211–1220
- पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः कौरव सेनाका रणके लिये प्रस्थान वैशम्पायन उवाच ततः प्रभाते विमले धार्तराष्ट्रेण चोदिताः… 1221–1230
- शय्याश्च विविधास्तात तेषां रात्रौ युधिष्ठिरः । एवंवेदी वेदितव्यः पाण्डवेयोऽयमित्युत । ११ । अभिज्ञानानि सर्वेषां संज्ञाश्चाभरणानि च… 1231–1240
- कुछ स्त्रियाँ एक ही साथ चार-चार या पाँच- पाँच कन्याएँ पैदा करती हैं । वे कन्याएँ पैदा होते ही नाचती, गाती तथा हँसती हैं । ७… 1241–1250
- ही निश्चित कर लेते हैं । इसके विपरीत जिन्हें शत्रुसेनामें प्रवेश करते समय सामनेसे निषेधसूचक वचन सुननेको मिलते हैं, उनकी पराजय होती है । ७१… 1251–1260
- करनेवाला शृंगवान् पर्वत । राजन्! ये छ: पर्वत सिद्धों तथा चारणोंके निवास स्थान हैं । ४-५ । एषामन्तरविष्कम्भो योजनानि सहस्रशः… 1261–1270
- उसके फलोंमें जब रस आ जाता है अर्थात् जब वे पक जाते हैं, तब अपने - आप टूटकर गिर जाते हैं । उन फलोंकी लंबाई ढाई हजार अरत्नि* मानी गयी है । २२… 1271–1280
- राजन्! पूर्वोक्त सभी नदियाँ सम्पूर्ण विश्वकी माताएँ हैं, वे सब की सब महान् पुण्य फल देनेवाली हैं… 1281–1290
- रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि मे शृणु । संजय बोले — राजन्! शाकद्वीपमें भी मणियोंसे विभूषित सात पर्वत हैं… 1291–1300
- सर्वमुक्तं यथातत्त्वं तस्माच्छममवाप्नुहि । भारत! यहाँ सूर्यका प्रमाण बताया गया, इन दोनोंसे अधिक विस्तार रखनेके कारण राहु यथासमय इन सूर्य और चन्द्रमाको… 1301–1310
- पवित्र और वेदवेदांगोंके तत्त्वज्ञ बताये गये हैं, उन्हीं भीष्मको तुम मारा गया कैसे बता रहे हो? । सर्वास्त्रविनयोपेतं शान्तं दान्तं मनस्विनम्… 1311–1320
- जाम्बूनद नामक सुवर्णसे विभूषित आपके हाथी और रथ बिजलियोंसहित मेघोंकी घटाके समान प्रकाशमान दिखायी देते थे । ७ । रथानीकान्यदृश्यन्त नगराणीव भूरिशः… 1321–1330
- काञ्चनैः कवचैर्वीरा ज्वलनार्कसमप्रभैः । संनद्धाः समदृश्यन्त ज्वलनार्कसमप्रभाः । ८ । अग्नि और सूर्यके समान कान्तिमान् कांचनमय कवच धारण किये वीर सैनिक अग्नि… 1331–1340
- भारत! दोनों ओरकी सेनाएँ विशाल, भयंकर और दुःसह थीं, मानो विधाताने दोनों सेनाओंको स्वर्गकी प्राप्तिके लिये ही रचा था । दोनोंमें ही सत्पुरुष भरे हुए थे । ४… 1341–1350
- मतीव रौद्रं स बिभर्ति रूपम् । अनायुधो यः सुभुजो भुजाभ्यां नराश्वनागान् युधि भस्म कुर्यात् । ११… 1351–1360
- ‘ हे आचार्य! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नद्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रोंकी इस बड़ी भारी सेनाको देखिये । ३… 1361–1370
- महाभारत- शरणागत अर्जुन Crowy कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां… 1371–1380
- यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च । ५२ । जिस कालमें तेरी बुद्धि मोहरूप दलदलको भलीभाँति पार कर जायगी, उस… 1381–1390
- २. अर्जुनके पूछनेपर पचपनवें श्लोकसे यहाँतक स्थितप्रज्ञ पुरुषकी जिस स्थितिका जगह -जगह वर्णन किया गया है, उसमें सर्वथा निर्विकार और निश्चलभावसे नित्य… 1391–1400
- १८-ज्ञानीके लिये कोई कर्तव्य नहीं है, तो भी उसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करना चाहिये (गीता ३ । २५)… 1401–1410
- हे परंतप अर्जुन! इस प्रकार परम्परासे प्राप्त इस योगको राजर्षियोंने जाना; किंतु उसके बाद वह योग बहुत कालसे इस पृथ्वीलोकमें लुप्तप्राय हो गया । २… 1411–1420
- अतीत और अकर्ता हैं— इस बातको भलीभाँति समझ लेना, इसमें किंचिन्मात्र भी असम्भावना या विपरीत भावना न रहकर पूर्ण विश्वास हो जाना ही भगवान्के कर्मोंको… 1421–1430
- इन्द्रियाँ अपने - अपने अर्थोंमें बरत रही हैं— इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ । ८ - ९… 1431–1440
- त्रिंशोऽध्यायः ( श्रीमद्भगवद्गीतायां षष्ठोऽध्यायः ) निष्काम कर्मयोगका प्रतिपादन करते हुए आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा तथा मनोनिग्रहपूर्वक ध्यानयोग एवं… 1441–1450
- नहीं किया । अतः अब भगवान् अपनेमें अनन्यप्रेम करनेवाले भक्त योगीकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनको अपनी ओर आकर्षित करते हैं— योगिनामपि सर्वेषां… 1451–1460
- एकत्रिंशोऽध्यायः (श्रीमद्भगवद्गीतायां सप्तमोऽध्यायः ) ज्ञान -विज्ञान, भगवान्की व्यापकता, अन्य देवताओंकी उपासना एवं भगवान्को प्रभावसहित न जाननेवालोंकी… 1461–1470
- द्वात्रिंशोऽध्यायः ( श्रीमद्भगवद्गीतायामष्टमोऽध्यायः ) ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विषयमें अर्जुनके सात प्रश्न और उनका उत्तर एवं भक्तियोग तथा शुक्ल और… 1471–1480
- गीताके नवें अध्यायमें (श्लोक ७ से १० ) और चौदहवें अध्यायमें (श्लोक ३, ४ ) जो सृष्टिरचनाका प्रसंग है, वह महाप्रलयके बाद महासर्गके आदिकालका है और यहाँका… 1481–1490
- पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युहृतमश्नामि ३ प्रयतात्मनः । २६ । जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेमसे पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण… 1491–1500
- भक्तोंका विशुद्ध अन्तःकरण भगवत्प्रेमसे परिपूर्ण हो जाता है, इससे उनके हृदयमें भगवान् सदा- सर्वदा प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं — यही भाव दिखलानेके लिये… 1501–1510
- सात्त्विकभाव हूँ । ३६ । वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः । ३७… 1511–1520
- इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा हैं और देवताओंको हवि पहुँचानेवाले हैं । इसके अतिरिक्त वे भगवान्के मुख भी माने जाते हैं… 1521–1530
- अर्जुनके प्रति भगवान्का विराट्रूप प्रदर्शन किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्… 1531–1540
- दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः । ५१ । अर्जुन बोले- हे जनार्दन! आपके इस अति शान्त मनुष्यरूपको देखकर अब… 1541–1550
- महर्षि और अन्यान्य समर्थ पुरुष हैं, उन सबमें सबकी अपेक्षा बड़े ब्रह्माजी हैं; क्योंकि सबसे पहले उन्हींका प्रादुर्भाव होता है और वे ही आपके नित्य ज्ञानके… 1551–1560
- २. ‘ अक्षरम्’ विशेषणके सहित ' अव्यक्तम्' पद यहाँ निर्गुण- निराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका वाचक है… 1561–1570
- वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारोंवाला है और जिस कारणसे जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है - वह सब संक्षेपमें मुझसे सुन । ३… 1571–1580
- ९. अन्तःकरणमें जो ज्ञानशक्ति है, जिसके द्वारा प्राणी सुख-दुःख और समस्त पदार्थोंका अनुभव करते हैं, जिसे गीताके दसवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें ' चेतना '… 1581–1590
- हे अर्जुन! रागरूप रजोगुणको कामना और आसक्तिसे उत्पन्न जानँ । वह इस जीवात्माको कर्मोंके और उनके फलके सम्बन्धसे बाँधता है । ७… 1591–1600
- गुणोंका कोई प्रभाव नहीं रह जाता । गुणोंके कार्यरूप शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरणकी अवस्थाओंका परिवर्तन तथा नाना प्रकारके सांसारिक पदार्थोंका संयोग - वियोग… 1601–1610
- ५. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि जो मनुष्य मूलसहित इस संसारवृक्षको इस प्रकार तत्त्वसे जानता है कि सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी मायासे उत्पन्न यह संसार वृक्षकी… 1611–1620
- २. अपने धर्मका पालन करनेके लिये कष्ट सहन करके जो अन्तःकरण और इन्द्रियोंको तपाना है, उसीका नाम यहाँ ‘ तपः ' पद है… 1621–1630
- दुर्गतिकी प्राप्ति होती है और जिनके कर्म अच्छे होते हैं, उन पुरुषोंको शास्त्रविधिका त्याग कर देनेके कारण कोई भी फल नहीं मिलता… 1631–1640
- प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि । १ ९ । गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रमें ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणोंके भेदसे तीन- तीन प्रकारके ही कहे गये… 1641–1650
- कच्चिदेतच्छुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय । ७२ । हे पार्थ! क्या इस ( गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्तसे श्रवण किया?… 1651–1660
- ६. जिसके मन और इन्द्रियाँ वशमें किये हुए नहीं हैं, बल्कि जो स्वयं उनके वशीभूत हो रहा है तथा जिसमें श्रद्धा और आस्तिकताका अभाव है - ऐसे पुरुषको ' अयुक्त'… 1661–1670
- तुम जो यह मानते हो कि ' मैं युद्ध नहीं करूँगा', तुम्हारा यह मानना केवल अहंकारमात्र है; युद्ध न करना तुम्हारे हाथकी बात नहीं है… 1671–1680
- नोवाच वाग्यतः किंचिद् गच्छत्येव युधिष्ठिरः । २० । संजय कहते हैं— राजन्! भाइयोंके इस प्रकार कहनेपर भी कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले राजा युधिष्ठिर उनसे कुछ… 1681–1690
- Brijan अनुमानये त्वां योत्स्येऽहं गुरो विगतकल्मषः । जयेयं च रिपून् सर्वाननुज्ञातस्त्वयानघ । ६ ९… 1691–1700
- महान् मेघके समान अपने भयंकर रूपको प्रकट करते, गर्जते तथा आपके पुत्रोंको डराते हुए भीमसेन कौरव सेनापर चढ़ आये । १३… 1701–1710
- ईक्षणप्रीतिजननं शुक्राङ्गारकयोरिव । ५७ । उन दोनोंका वह घोर एवं अत्यन्त भयंकर युद्ध शुक्र और मंगलके संघर्षकी भाँति नेत्रोंके लिये हर्ष उत्पन्न करनेवाला था… 1711–1720
- भारत! बहुतोंकी आँतें बाहर निकलकर बिखर गयी थीं, जाँघें टूट गयी थीं, कितनोंकी बाहें कट गयी थीं, बहुतोंकी पसलियाँ फट गयी थीं और कितने ही घायल अवस्थामें… 1721–1730
- भारत! तब सेनापति श्वेतको शीघ्रतापूर्वक शल्यके रथकी ओर जाते देख आपकी सेनाओंमें हाहाकार मच गया ६३ । ततो भीष्मं पुरस्कृत्य तव पुत्रो महाबलः… 1731–1740
- हतं श्वेतेन मन्यन्ते श्वेतस्य वशमागतम् । ७१ । श्वेतने वीरवर भीष्मको कुण्ठित कर दिया और उनका शरीर बाणोंसे क्षत -विक्षत हो गया है, यह देखकर सब लोग यह मानने… 1741–1750
- मन्ये शरैः शरीराणि शत्रूणां प्रमथिष्यति । १५ । तात! अर्जुनसे मुझे अधिक भय बना रहता है और वह भय कभी शान्त नहीं होता; क्योंकि कुन्ती-नन्दन अर्जुन शूरवीर तथा… 1751–1760
- शिखण्डी च महाबाहो भीष्मस्य निधनं किल । ३० । ( करिष्यति न संदेहो नृपाणां युधि पश्यताम् । ) ' महाबाहो! निश्चय ही इन समस्त राजाओंके देखते - देखते यह शिखण्डी… 1761–1770
- द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः भीष्म और अर्जुनका युद्ध धृतराष्ट्रउवाच एवं व्यूढेष्वनीकेषु मामकेष्वितरेषु च । कथं प्रहरतां श्रेष्ठाः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे । १… 1771–1780
- त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका युद्ध धृतराष्ट्रउवाच कथं द्रोणो महेष्वासः पाञ्चाल्यश्चापि पार्षतः… 1781–1790
- भीमसेनो द्विधा राजंश्चिच्छेद विपुलासिना । ३० । उदक्रोशच्च संहृष्टस्त्रासयानो वरूथिनीम् । राजन्! भीमसेनने अपने विशाल खड्गसे उसके वेगपूर्वक चलाये हुए तीखे… 1791–1800
- भीष्मके उस सुवर्णभूषित रथपर सात्यकि, भीमसेन तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने एक साथ ही धावा किया । १०७ । परिवार्य तु ते सर्वे गाङ्गेयं तरसा रणे… 1801–1810
- शूरसेनदेशके योद्धा उस महाव्यूहके पुच्छ भागमें खड़े हुए । ६-७ । मागधाश्च कलिङ्गाश्च दासेरकगणैः सह । दक्षिणं पक्षमासाद्य स्थिता व्यूहस्य दंशिताः । ८… 1811–1820
- तत्र सौबलकाः क्रुद्धा वार्ष्णेयस्य रथोत्तमम् । तिलशश्चिच्छिदुः क्रोधाच्छस्त्रैर्नानाविधैर्युधि । ८… 1821–1830
- गजकण्टकसंनद्धं वज्रेणेव शिलोच्चयम् । भीष्म कंकपत्रसे युक्त बहुसंख्यक तीखे बाणोंको युद्धमें बिखेर रहे थे… 1831–1840
- क्षयं कुरूणामिव चिन्तयित्वा । ९ ३ । महेन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण कुपित हो हाथमें चक्र उठाये बड़े चोरसे गरज रहे थे… 1841–1850
- षष्टितमोऽध्यायः चौथे दिन -– दोनों सेनाओंका व्यूह - निर्माण तथा भीष्म और अर्जुनका द्वैरथ - युद्ध संजय उवाच व्युष्टां निशां भारत भारताना- मनीकिनीनां प्रमुखे… 1851–1860
- राजन्! तत्पश्चात् उन्होंने शीघ्र ही पचीस बाणोंसे शलपुत्रको घायल कर दिया तथा उसके घोड़ों एवं दोनों पृष्ठरक्षकोंको भी मृत्युके मुखमें डाल दिया । २३… 1861–1870
- क्रोधमें भरे हुए भीमसेन हाथियोंको मथे डालते थे; अतः वे उनके द्वारा अत्यन्त क्लेश पाकर आपकी सेनाको कुचलते हुए सहसा युद्धस्थलसे भाग चले । ५७… 1871–1880
- उस बाणसे अत्यन्त घायल हो भीमसेन व्यथाके मारे रथकी बैठकमें बैठ गये । वहाँ बैठते ही उन्हें मूर्च्छा आ गयी । २३ । तं दृष्ट्वा व्यथितं भीममभिमन्युपुरोगमाः… 1881–1890
- यथावध्याः पाण्डुसुता यथा वध्याश्च मे सुताः । ७ । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन संजय । दैववश मेरे ही ऊपर अत्यन्त भयंकर दण्ड पड़ रहा है… 1891–1900
- षट्षष्टितमोऽध्यायः नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन भीष्म उवाच ततः स भगवान् देवो लोकानामीश्वरेश्वरः… 1901–1910
- तपसा नियतो देवं विधानं सर्वदेहिनाम् । १ ९ । ब्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च । योगभूतं परिचरन् केशवं महदाप्नुयात् । २०… 1911–1920
- उस युद्धमें विजय तथा अत्यन्त अद्भुत यशकी अभिलाषा रखनेवाले पाण्डवोंका कौरवोंके साथ उसी प्रकार भयंकर युद्ध हुआ, जैसे देवताओंका दानवोंके साथ हुआ था । ३४… 1921–1930
- वीरबाहुविसृष्टानां सर्वावरणभेदिनाम् । संघातः शरजालानां तुमुलः समपद्यत । २८ । वीरोंकी भुजाओंसे छूटकर सब प्रकारके आवरणों ( कवच आदि) -का भेदन करनेवाले… 1931–1940
- शत्रुओंको संताप देनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ वीर अर्जुनने यह सोचकर कि अश्वत्थामा मेरे आचार्यका पुत्र है, द्रोणका लाड़ला बेटा है तथा ब्राह्मण होनेके कारण भी… 1941–1950
- अवहारं ततश्चक्रे पिता देवव्रतस्तव । संध्याकाले महाराज सैन्यानां श्रान्तवाहनः । ३७ । महाराज! तब आपके ताऊ देवव्रतने संध्याके समय अपनी सेनाको पीछे हटा लिया… 1951–1960
- सप्तसप्ततितमोऽध्यायः भीमसेन, धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका पराक्रम संजय उवाच आत्मदोषात् त्वया राजन् प्राप्तं व्यसनमीदृशम्… 1961–1970
- हताश्वात् स रथात् तूर्णमवप्लुत्य महारथः । आरुरोह महाबाहुरभिमन्योर्महारथम् । ७१ । घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर महारथी महाबाहु धृष्टद्युम्न तुरंत उस रथसे… 1971–1980
- तत्पश्चात् उस महाबली वीरने अत्यन्त कुपित हो शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए अप्रतिहत धारवाले दूसरे पानीदार बाण विकर्णपर चलाये । ३०… 1981–1990
- तदाज्ञया तानि विनिर्ययुर्द्रुतं गजाश्वपादातरथायुतानि । १३ । तदनन्तर दुर्योधनने हर्षमें भरकर सम्पूर्ण राजाओं तथा सारी सेनाओंसे कहा — ' युद्धके लिये निकलो… 1991–2000
- ‘ सारी सेनाके साथ युद्धके लिये यात्रा करते हुए मेरे वीर पितामह भरतनन्दन भीष्मकी आप सब लोग प्रयत्नपूर्वक रक्षा करें' । ६… 2001–2010
- युध्यतां हि तथा राजन् विशेषो न व्यदृश्यत । यततां शत्रुनाशाय कृतप्रतिकृतैषिणाम् । १५ । नरेश्वर! दोनों ही पक्षवाले अपने शत्रुका नाश करनेके लिये प्रयत्नशील… 2011–2020
- अश्वांश्चास्यावधीद् राजन्नुभौ तौ पार्ष्णिसारथी । सोऽवप्लुत्य रथात् तूर्णं गदां जग्राह सात्वतः । २३… 2021–2030
- क्व यास्यसे नानुरूपं तवेदम् । २३ । ' युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मने तुम्हारा धनुष काटकर तुम्हें पराजित कर दिया; फिर भी तुम उनकी ओरसे निरपेक्ष हो रहे हो… 2031–2040
- आर्य! इसी प्रकार आपका पुत्र दुर्योधन भी सम्पूर्ण उद्योगसे समरभूमिमें विन्द और अनुविन्दकी रक्षाके लिये उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ा हो गया । ३७… 2041–2050
- अपश्याम महाराज भीष्मास्त्रेण प्रमोहितान् । ७ । महाराज! हमने देखा, भीष्मके अस्त्रसे मूर्च्छित हो बहुत-से पर्वताकार गजराज रणभूमिमें पड़े हैं और उनके पास कोई… 2051–2060
- तथेतरेषु क्रुद्धेषु तावकानामपि क्षयः । ४० । भारत! शान्तनुनन्दन भीष्म, रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा—इनके कुपित होनेसे… 2061–2070
- इरावानपि संक्रुद्धो मायां स्रष्टुं प्रचक्रमे । युद्धके मुहानेपर समस्त योद्धाओंके देखते -देखते वह इरावान्को पकड़ना चाहता था… 2071–2080
- कुञ्जरं गिरिसंकाशं राक्षसं प्रत्यचोदयत् । ७ । महाबाहु घटोत्कच आपके पुत्रको मार डालनेकी इच्छासे वह शक्ति ऊपरको उठा रहा था… 2081–2090
- सुमहानभवच्छब्दः प्रेतानामिव भारत । २६ । भरतश्रेष्ठ! शस्त्रोंके आघात और मनुष्योंकी गर्जनाका महान् शब्द भूत-प्रेतोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था । २६… 2091–2100
- पञ्चनवतितमोऽध्यायः दुर्योधनके अनुरोध और भीष्मजीकी आज्ञासे भगदत्तका घटोत्कच, भीमसेन और पाण्डव- सेनाके साथ घोर युद्ध संजय उवाच तस्मिन् महति संक्रन्दे राजा… 2101–2110
- यत्र तौ पुरुषव्याघ्रौ पितापुत्रौ महाबलौ । प्राग्ज्योतिषेण संयुक्तौ भीमसेनघटोत्कचौ । ८० । महाराज! इसी समय श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, वे पाण्डुनन्दन अर्जुन… 2111–2120
- भिन्न हुई जाँघोंसे तथा उत्तम चूड़ामणि ( मुकुट ) - से आबद्ध कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे वहाँकी भूमि अद्भुत शोभा पा रही थी । ६०-६१… 2121–2130
- स एवमुक्त्वा नृपतिः पुत्रो दुर्योधनस्तव । नोवाच वचनं किञ्चिद् भीष्मं सत्यपराक्रमम् । ४३ । सत्यपराक्रमी भीष्मसे ऐसा कहकर आपका पुत्र राजा दुर्योधन और कुछ… 2131–2140
- अभ्युद्ययू रणे पार्थान् भीष्मं कृत्वाग्रतो नृप । तथैव पाण्डवा राजन् भीमसेनपुरोगमाः । १६ । राजन्! आपकी सेनाके नरेश अपनी- अपनी सेनाओंके साथ युद्धके लिये… 2141–2150
- महाबलौ महाराज क्रोधसंरक्तलोचनौ । ५२ । परस्परमवेक्षेतां कालानलसमौ युधि । तयोः समागमो घोरो बभूव कटुकोदयः । ५३ । यथा देवासुरे युद्धे शक्रशम्बरयोः पुरा । ५४… 2151–2160
- शरवृष्ट्या पुनः पार्थश्छादयामास तं रणे । स प्रजज्वाल रोषेण गहनेऽग्निरिवोर्जितः । ७ । तब अर्जुनने समरभूमिमें अपने बाणोंकी वर्षासे पुनः द्रोणाचार्यको ढक… 2161–2170
- गुणवत्सु कथं द्वेषं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । कृतवान् पाण्डुपुत्रेषु पापात्मा लोभमोहितः । ४० । पापात्मा राजा धृतराष्ट्रने लोभसे मोहित होकर गुणवान् पाण्डवोंसे… 2171–2180
- राजन्! उन घोड़ोंकी टापसे आहत होकर यह पृथ्वी काँपने और भयंकर शब्द करने लगी । १२ । खुरशब्दश्च सुमहान् वाजिनां शुश्रुवे तदा… 2181–2190
- धनुष कट जानेपर आपके ताऊ कुरुकुलरत्न भीष्मने पुनः दूसरा धनुष हाथमें ले पलक मारते - मारते उसके ऊपर प्रत्यंचा चढ़ा दी । ४६३… 2191–2200
- यस्य ते भ्रातरः शूरा दुर्जयाः शत्रुसूदनाः । २६ । ‘ धर्मपुत्र! सत्यप्रतिज्ञ कुन्तीकुमार! विषाद न कीजिये, आपके भाई बड़े ही शूरवीर, दुर्जय तथा शत्रुओंका… 2201–2210
- दुर्धर्ष वीर भीष्म मुँह फैलाये हुए कालके समान प्रतीत होते हैं । तुम्हारे सिवा दूसरा कोई, भले ही वह साक्षात् वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उनके साथ युद्ध… 2211–2220
- भीष्मजीका शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी इच्छा प्रकट करना ‘ महाबाहो! युद्धमें महाबली भीष्म तुम्हें पीड़ा नहीं दे सकते, इसलिये आज यत्नपूर्वक इनके ऊपर धावा करो… 2221–2230
- सुदक्षिणो महाराज काम्बोजः प्रत्यवारयत् । १५ । महाराज! भीष्मके रथकी ओर अग्रसर होनेवाले अभिमन्युको काम्बोजराज सुदक्षिणने रोका । १५… 2231–2240
- भीमसेनसुतं चापि दुर्मुखः सुमुखैः शरैः । षष्ट्या वीरो नदन् हृष्टो विव्याध रणमूर्धनि । ३ ९ । तब वीर दुर्मुखने हर्षपूर्वक गर्जना करते हुए अपने तीखी नोकवाले… 2241–2250
- जघान समरे वीरः पाण्डवः परवीरहा । ८ । महाराज! तब शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुकुमार वीर भीमसेनने सम्पूर्ण जगत्के उन समस्त राजाओं, प्रमुख वीरों तथा आपके… 2251–2260
- नरेश्वर! तदनन्तर दुर्योधनकी आज्ञा पाकर द्रोण तथा महारथी मगधनरेश उसी स्थानपर आये, जहाँ पाण्डुकुमार अर्जुन और भीमसेन - ये दोनों महारथी दुर्योधनकी विशाल… 2261–2270
- भरतनन्दन! उन दोनोंका वह भयंकर युद्ध विचित्र एवं सम्पूर्ण इन्द्रियोंको प्रसन्न करनेवाला था । समस्त भूपाल उस युद्धकी प्रशंसा करते थे । ७… 2271–2280
- सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः उभय पक्षकी सेनाओंका युद्ध, दुःशासनका पराक्रम तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मका मूर्च्छित होना संजय उवाच शिखण्डी तु रणे भीष्ममासाद्य… 2281–2290
- रथोंपर बैठकर पाण्डवोंपर चढ़ आये और रणक्षेत्रमें उनकी सेनाको कँपाने लगे । ५-६ । सा वध्यमाना समरे पाण्डुसेना महात्मभिः… 2291–2300
- अचिन्तयद् रणे वीरो बुद्धया परपुरंजयः । अपनी उस शक्तिको छिन्न -भिन्न हुई देख भीष्मजी क्रोधमें निमग्न हो गये और शत्रुनगरविजयी उन वीर शिरोमणिने रणक्षेत्रमें… 2301–2310
- उनका वह वरदान सफल हो । मैं प्राणत्यागका नियत समय आनेतक अवश्य इन प्राणोंको रोक रखूँगा ' । १०७-१०८ । इत्युक्त्वा तांस्तदा हंसान् स शेते शरतल्पगः… 2311–2320
- तदनन्तर विभिन्न जनपदोंके स्वामी नरेशगण अमिततेजस्वी भीष्मकी यह धर्मविषयक उत्तम निष्ठा देखकर बड़े विस्मित हुए । ६०… 2321–2330
- मोहाविष्टः प्रतिपत्स्यस्यबुद्धया । तप्स्यस्यन्ते एतदन्ताः स्थ सर्वे सत्यामेतां भारतीमीरयामि । ५५… 2331–2340
- | महाभारत - सार मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च । संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे । ' मनुष्य इस जगत्में हजारों माता- पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री… 2341–2343