03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 121–130
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
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क्यों न हो, आपके सामने ठहर नहीं सकता है ॥ १४ ॥
शल्य उवाच
एवमुक्तस्तु नहुषः प्राहृष्यत तदा किल ।
उवाच वचनं चापि सुरेन्द्रस्तामनिन्दिताम् ॥ १५ ॥
शल्य कहते हैं — युधिष्ठिर! इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर देवराज नहुष बड़े प्रसन्न हुए और उस सती - साध्वी देवीसे इस प्रकार बोले ॥ १५ ॥
नहुष उवाच
अपूर्वं वाहनमिदं त्वयोक्तं वरवर्णिनि ।
दृढं मे रुचितं देवि त्वद्वशोऽस्मि वरानने ॥ १६ ॥
- नहुषने कहा – सुन्दरि! तुमने तो यह अपूर्व वाहन बताया । देवि! मुझे भी वही सवारी अधिक पसंद है । सुमुखि! मैं तुम्हारे वशमें हूँ ॥ १६ ॥
न ह्यल्पवीर्यो भवति यो वाहान् कुरुते मुनीन् ।
अहं तपस्वी बलवान् भूतभव्यभवत्प्रभुः ॥ १७ ॥
जो ऋषियोंको भी अपना वाहन बना सके, उस पुरुषमें थोड़ी शक्ति नहीं होती है । मैं तपस्वी, बलवान् तथा भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका स्वामी हूँ ॥ १७ ॥
मयि क्रुद्धे जगन्न स्यान्मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
देवदानवगन्धर्वाः किन्नरोरगराक्षसाः ॥ १८ ॥
न मे क्रुद्धस्य पर्याप्ताः सर्वे लोकाः शुचिस्मिते ।
चक्षुषा यं प्रपश्यामि तस्य तेजो हराम्यहम् ॥ १ ९ ॥
मेरे कुपित होनेपर यह संसार मिट जायगा। मुझपर ही सब कुछ टिका हुआ है । शुचिस्मिते! यदि मैं क्रोधमें भर जाऊँ तो यह देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस और सम्पूर्ण लोक मेरा सामना नहीं कर सकते हैं । मैं अपनी आँखसे जिसको देख लेता हूँ, उसका तेज हर लेता हूँ ॥ १८-१९ ॥ तस्मात् ते वचनं देवि करिष्यामि न संशयः ।
सप्तर्षयो मां वक्ष्यन्ति सर्वे ब्रह्मर्षयस्तथा ।
पश्य माहात्म्ययोगं मे ऋद्धिं च वरवर्णिनि ॥ २० ॥
अतः देवि! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा, इसमें संशय नहीं है । सम्पूर्ण सप्तर्षि और ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोयेंगे । वरवर्णिनि! मेरे माहात्म्य तथा समृद्धिको तुम प्रत्यक्ष देख लो ॥ २० ॥
शल्य उवाच एवमुक्त्वा तु तां देवीं विसृज्य च वराननाम् ।
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विमाने योजयित्वा च ऋषीन् नियममास्थितान् ॥ २१ ॥
अब्रह्मण्यो बलोपेतो मत्तो मदबलेन च ।
कामवृत्तः स दुष्टात्मा वाहयामास तानृषीन् ॥ २२ ॥
शल्य कहते हैं — राजन्! सुन्दर मुखवाली शची देवीसे ऐसा कहकर नहुषने उन्हें विदा कर दिया और यम - नियमका पालन करनेवाले बड़े - बड़े ऋषि-मुनियोंका अपमान करके अपनी पालकीमें जोत दिया । वह ब्राह्मणद्रोही नरेश बल पाकर उन्मत्त हो गया था । मद और बलसे गर्वित हो स्वेच्छाचारी दुष्टात्मा नहुषने उन महर्षियोंको अपना वाहन बनाया ॥ २१-२२ ॥
नहुषेण विसृष्टा च बृहस्पतिमथाब्रवीत् ।
समयोऽल्पावशेषो मे नहुषेणेह यः कृतः ॥ २३ ॥
उधर नहुषसे विदा लेकर इन्द्राणी बृहस्पतिके यहाँ गयीं और इस प्रकार बोलीं - ' देवगुरो! नहुषने मेरे लिये जो समय निश्चित किया है, उसमें थोड़ा ही शेष रह गया है ॥ २३ ॥
शक्रं मृगय शीघ्रं त्वं भक्तायाः कुरु मे दयाम् ।
बाढमित्येव भगवान् बृहस्पतिरुवाच ताम् ॥ २४ ॥
' आप शीघ्र इन्द्रका पता लगाइये । मैं आपकी भक्त हूँ । मुझपर दया कीजिये । ' तब भगवान् बृहस्पतिने ‘ बहुत अच्छा ' कहकर उनसे इस प्रकार कहा- ॥ २४ ॥
न भेतव्यं त्वया देवि नहुषाद् दुष्टचेतसः ।
न ह्येष स्थास्यति चिरं गत एष नराधमः ॥ २५ ॥
'देवि! तुम दुष्टात्मा नहुषसे डरो मत । यह नराधम अब अधिक समयतक यहाँ ठहर नहीं सकेगा । इसे गया हुआ ही समझो ॥ २५ ॥
अधर्मज्ञो महर्षीणां वाहनाच्च ततः शुभे ।
इष्टिं चाहं करिष्यामि विनाशायास्य दुर्मतेः ॥ २६ ॥
शक्रं चाधिगमिष्यामि मा भैस्त्वं भद्रमस्तु ते । ' शुभे! यह पापी धर्मको नहीं जानता । अतः महर्षियोंको अपना वाहन बनानेके कारण शीघ्र नीचे गिरेगा । इसके सिवा मैं भी इस दुर्बुद्धि नहुषके विनाशके लिये एक यज्ञ करूँगा ।
साथ ही इन्द्रका भी पता लगाऊँगा । तुम डरो मत। तुम्हारा कल्याण होगा' ॥ २६३ ॥
ततः प्रज्वाल्य विधिवज्जुहाव परमं हविः ॥ २७ ॥
बृहस्पतिर्महातेजा देवराजोपलब्धये ।
हुत्वाग्निं सोऽब्रवीद् राजञ्छक्रमन्विष्यतामिति ॥ २८ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी बृहस्पतिने देवराजकी प्राप्तिके लिये विधिपूर्वक अग्निको प्रज्वलित करके उसमें उत्तम हविष्यकी आहुति दी । राजन्! अग्निमें आहुति देकर उन्होंने अग्निदेवसे कहा — ‘ आप इन्द्रदेवका पता लगाइये ' ॥ २७-२८ ॥
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तस्माच्च भगवान् देवः स्वयमेव हुताशनः ।
स्त्रीवेषमद्भुतं कृत्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ २ ९ ॥
उस हवनकुण्डसे साक्षात् भगवान् अग्निदेव प्रकट होकर अद्भुत स्त्रीवेष धारण करके वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २ ९ ॥ H स दिशः प्रदिशश्चैव पर्वतानि वनानि च ।
पृथिवीं चान्तरिक्षं च विचिन्त्याथ मनोगतिः ।
निमेषान्तरमात्रेण बृहस्पतिमुपागमत् ॥ ३० ॥
मनके समान तीव्र गतिवाले अग्निदेव सम्पूर्ण दिशाओं, विदिशाओं, पर्वतों और वनोंमें तथा भूतल और आकाशमें भी इन्द्रकी खोज करके पलभरमें बृहस्पतिके पास लौट आये ॥ ३० ॥
अग्निरुवाच
बृहस्पते न पश्यामि देवराजमिह क्वचित् ।
आपः शेषताः सदा चापः प्रवेष्टुं नोत्सहाम्यहम् ॥ ३१ ॥
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अग्निदेव बोले — बृहस्पते! मैं देवराजको तो इस संसारमें कहीं नहीं देख रहा हूँ, केवल जल शेष रह गया है, जहाँ उनकी खोज नहीं की है । परंतु मैं कभी भी जलमें प्रवेश करनेका साहस नहीं कर सकता ॥ ३१ ॥
न मे तत्र गतिर्ब्रह्मन् किमन्यत् करवाणि ते ।
तमब्रवीद् देवगुरुरपो विश महाद्युते ॥ ३२ ॥
ब्रह्मन्! जलमें मेरी गति नहीं है । इसके सिवा तुम्हारा दूसरा कौन कार्य मैं करूँ? तब देवगुरुने कहा - ' महाद्युते! आप जलमें भी प्रवेश कीजिये ' ॥ ३२ ॥
अग्निरुवाच
नापः प्रवेष्टुं शक्ष्यामि क्षयो मेऽत्र भविष्यति ।
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि स्वस्ति तेऽस्तु महाद्युते ॥ ३३ ॥
अग्निदेव बोले — मैं जलमें नहीं प्रवेश कर सकूँगा; क्योंकि उसमें मेरा विनाश हो जायगा । महातेजस्वी बृहस्पते! मैं तुम्हारी शरणमें आया हूँ । तुम्हारा कल्याण हो ( मुझे जलमें जानेके लिये न कहो ) ॥। ३३ ॥
अद्भयोऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् ।
तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ ३४ ॥
जलसे अग्नि, ब्राह्मणसे क्षत्रिय तथा पत्थरसे लोहेकी उत्पत्ति हुई है । इनका तेज सर्वत्र काम करता है । परंतु अपने कारणभूत पदार्थोंमें आकर बुझ जाता है ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि बृहस्पत्यग्निसंवादे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें बृहस्पति-अग्निसंवादविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
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षोडशोऽध्यायः बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत बृहस्पतिरुवाच
त्वमग्ने सर्वदेवानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् ।
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि साक्षिवत् ॥१ ॥
बृहस्पति बोले — अग्निदेव! आप सम्पूर्ण देवताओंके मुख हैं । आप ही देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाले हैं । आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीकी भाँति गूढ़भावसे विचरते हैं ॥ १ ॥
त्वामाहुरेकं कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः ।
त्वया त्यक्तं जगच्चेदं सद्यो नश्येद्धुताशन ॥ २ ॥
विद्वान् पुरुष आपको एक बताते हैं । फिर वे ही आपको तीन प्रकारका कहते हैं ।
हुताशन! आपके त्याग देनेपर यह सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा ॥ २ ॥
कृत्वा तुभ्यं नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् ।
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् ॥ ३ ॥
ब्राह्मणलोग आपकी पूजा और वन्दना करके अपनी पत्नियों तथा पुत्रोंके साथ अपने कर्मोंद्वारा प्राप्त चिरस्थायी स्वर्गीय सुख लाभ करते हैं ॥ ३ ॥
त्वमेवाग्ने हव्यवाहस्त्वमेव परमं हविः ।
यजन्ति सत्रैस्त्वामेव यज्ञैश्च परमाध्वरे ॥ ४ ॥
अग्ने! आप ही हविष्यको वहन करनेवाले देवता हैं । आप ही उत्कृष्ट हवि हैं । याज्ञिक विद्वान् पुरुष बड़े - बड़े यज्ञोंमें अवान्तर सत्रों और यज्ञोंद्वारा आपकी ही आराधना करते हैं ॥ ४ ॥
सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह
प्राप्ते काले पचसि पुनः समिद्धः ।
त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति- स्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा ॥ ५ ॥
हव्यवाहन! आप ही सृष्टिके समय इन तीनों लोकोंको उत्पन्न करके प्रलयकाल आनेपर पुनः प्रज्वलित हो इन सबका संहार करते हैं । अग्ने! आप ही सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थान हैं और आप ही पुनः इसके प्रलयकालमें आधार होते हैं ॥ ५ ॥
त्वामग्ने जलदानाहुर्विद्युतश्च मनीषिणः ।
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दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः ॥ ६ ॥
अग्निदेव! मनीषी पुरुष आपको ही मेघ और विद्युत् कहते हैं । आपसे ही ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध करती हैं ॥ ६ ॥
त्वय्यापो निहिताः सर्वास्त्वयि सर्वमिदं जगत् ।
न तेऽस्त्यविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु पावक ॥ ७ ॥
पावक! आपमें ही सारा जल संचित है । आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है । तीनों लोकोंमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ॥ ७ ॥
स्वयोनिं भजते सर्वो विशस्वापोऽविशङ्कितः ।
अहं त्वां वर्धयिष्यामि ब्राह्मैर्मन्त्रैः सनातनैः ॥ ८ ॥
समस्त पदार्थ अपने- अपने कारणमें प्रवेश करते हैं । अतः आप भी निःशंक होकर जलमें प्रवेश कीजिये । मैं सनातन वेदमन्त्रोंद्वारा आपको बढ़ाऊँगा ॥ ८ ॥
एवं स्तुतो हव्यवाट् स भगवान् कविरुत्तमः ।
बृहस्पतिमथोवाच प्रीतिमान् वाक्यमुत्तमम् ।
दर्शयिष्यामि ते शक्रं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ९ ॥
इस प्रकार स्तुति की जानेपर हविष्य वहन करनेवाले श्रेष्ठ एवं सर्वज्ञ भगवान् अग्निदेव प्रसन्न होकर बृहस्पतिसे यह उत्तम वचन बोले— ' ब्रह्मन्! मैं आपको इन्द्रका दर्शन कराऊँगा, यह मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ ' ॥ ९ ॥
शल्य उवाच
प्रविश्यापस्ततो वह्निः ससमुद्राः सपल्वलाः ।
आससाद सरस्तच्च गूढो यत्र शतक्रतुः ॥ १० ॥
शल्य कहते हैं — युधिष्ठिर! तदनन्तर अग्निदेव छोटे गड्ढेसे लेकर बड़े - से -बड़े समुद्रतकके जलमें प्रवेश करके पता लगाते हुए क्रमशः उस सरोवरमें जा पहुँचे, जहाँ इन्द्र छिपे हुए थे ॥ १० ॥
अथ तत्रापि पद्मानि विचिन्वन् भरतर्षभ ।
अपश्यत् स तु देवेन्द्रं बिसमध्यगतं स्थितम् ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! उसमें भी कमलोंके भीतर खोज करते हुए अग्निदेवने एक कमलके नालमें बैठे हुए देवेन्द्रको देखा ॥ ११ ॥
आगत्य च ततस्तूर्णं तमाचष्ट बृहस्पतेः ।
अणुमात्रेण वपुषा पद्मतन्त्वाश्रितं प्रभुम् ॥ १२ ॥
वहाँसे तुरंत लौटकर अग्निदेवने बृहस्पतिको बताया कि भगवान् इन्द्र सूक्ष्म शरीर धारण करके एक कमलनालका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ १२ ॥
गत्वा देवर्षिगन्धर्वैः सहितोऽथ बृहस्पतिः ।
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पुराणैः कर्मभिर्देवं तुष्टाव बलसूदनम् ॥ १३ ॥
तब बृहस्पतिजीने देवर्षियों और गन्धर्वोंके साथ वहाँ जाकर बलसूदन इन्द्रके पुरातन कर्मोंका वर्णन करते हुए उनकी स्तुति की- ॥ १३ ॥
महासुरो हतः शक्र नमुचिर्दारुणस्त्वया ।
शम्बरश्च बलश्चैव तथोभौ घोरविक्रमौ ॥। १४ ॥
‘इन्द्र! आपने अत्यन्त भयंकर नमुचि नामक महान् असुरको मार गिराया है । शम्बर और बल दोनों भयंकर पराक्रमी दानव थे; परंतु उन्हें भी आपने मार डाला ॥ १४ ॥
शतक्रतो विवर्धस्व सर्वाञ्छत्रून् निषूदय ।
उत्तिष्ठ शक्र सम्पश्य देवर्षीश्च समागतान् ॥ १५ ॥
‘ शतक्रतो! आप अपने तेजस्वी स्वरूपसे बढ़िये और समस्त शत्रुओंका संहार कीजिये ।
इन्द्रदेव! उठिये और यहाँ पधारे हुए देवर्षियोंका दर्शन कीजिये ॥ १५ ॥
महेन्द्र दानवान् हत्वा लोकास्त्रातास्त्वया विभो ।
अपां फेनं समासाद्य विष्णुतेजोऽतिबृंहितम् ।
त्वया वृत्रो हतः पूर्वं देवराज जगत्पते ॥ १६ ॥
‘ प्रभो महेन्द्र! आपने कितने ही दानवोंका वध करके समस्त लोकोंकी रक्षा की है । जगदीश्वर देवराज! भगवान् विष्णुके तेजसे अत्यन्त शक्तिशाली बने हुए समुद्रफेनको लेकर आपने पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध किया ॥ १६ ॥
त्वं सर्वभूतेषु शरण्य ईड्य- स्त्वया समं विद्यते नेह भूतम् । त्वया धार्यन्ते सर्वभूतानि शक्र त्वं देवानां महिमानं चकर्थ ॥ १७ ॥
‘ आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्तवन करने योग्य और सबके शरणदाता हैं । आपकी समानता करनेवाला जगत्में दूसरा कोई प्राणी नहीं है । शक्र! आप ही सम्पूर्ण भूतोंको धारण करते हैं और आपने ही देवताओंकी महिमा बढ़ायी है ॥ १७ ॥
पाहि सर्वांश्च लोकांश्च महेन्द्र बलमाप्नुहि ।
एवं संस्तूयमानश्च सोऽवर्धत शनैः शनैः ॥ १८ ॥
' महेन्द्र! आप शक्ति प्राप्त कीजिये और सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा कीजिये । ' इस प्रकार स्तुति की जानेपर देवराज इन्द्र धीरे- धीरे बढ़ने लगे ॥ १८ ॥
स्वं चैव वपुरास्थाय बभूव स बलान्वितः ।
अब्रवीच्च गुरुं देवो बृहस्पतिमवस्थितम् ॥ १ ९ ॥
अपने पूर्व शरीरको प्राप्त करके वे बल - पराक्रमसे सम्पन्न हो गये । तत्पश्चात् इन्द्रने वहाँ खड़े हुए अपने गुरु बृहस्पतिसे कहा- ॥ १ ९ ॥ किं कार्यमवशिष्टं वो हतस्त्वाष्ट्रो महासुरः ।
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वृत्रश्च सुमहाकायो यो वै लोकाननाशयत् ॥ २० ॥
‘ ब्रह्मन्! त्वष्टाका पुत्र विशालकाय महासुर वृत्र, जो सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर रहा था, मेरे द्वारा मारा गया; अब आपलोगोंका कौन- सा बचा हुआ कार्य करूँ? ' ॥ २० ॥
बृहस्पतिरुवाच
मानुषो नहुषो राजा देवर्षिगणतेजसा ।
देवराज्यमनुप्राप्तः सर्वान् नो बाधते भृशम् ॥ २१ ॥
बृहस्पति बोले – देवेन्द्र! मनुष्य- लोकका राजा नहुष देवर्षियोंके प्रभावसे देवताओंका राज्य पा गया है, जो हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है ॥ २१ ॥
इन्द्र उवाच
कथं च नहुषो राज्यं देवानां प्राप दुर्लभम् ।
तपसा केन वा युक्तः किंवीर्यो वा बृहस्पते ॥ २२ ॥
( तत् सर्वं कथयध्वं मे यथेन्द्रत्वमुपेयिवान् । ) इन्द्र बोले- बृहस्पते! नहुषने देवताओंका दुर्लभ राज्य कैसे प्राप्त किया? वह किस तपस्यासे संयुक्त है? अथवा उसमें कितना बल और पराक्रम है? उसे किस प्रकार इन्द्रपदकी प्राप्ति हुई है? ये सारी बातें आप सब लोग मुझे बताइये ॥ २२ ॥
बृहस्पतिरुवाच देवा भीताः शक्रमकामयन्त त्वया त्यक्तं महदैन्द्रं पदं तत् । तदा देवाः पितरोऽथर्षयश्च गन्धर्वमुख्याश्च समेत्य सर्वे ॥ २३ ॥
गत्वाब्रुवन् नहुषं तत्र शक्र त्वं नो राजा भव भुवनस्य गोप्ता । तानब्रवीन्नहुषो नास्मि शक्त आप्यायध्वं तपसा तेजसा माम् ॥ २४ ॥
बृहस्पति बोले – शक्र! आपने जब उस महान् इन्द्र- पदका परित्याग कर दिया, तब देवतालोग भयभीत होकर दूसरे किसी इन्द्रकी कामना करने लगे । तब देवता, पितर, ऋषि तथा मुख्य गन्धर्व — सब मिलकर राजा नहुषके पास गये । शक्र! वहाँ उन्होंने नहुषसे इस प्रकार कहा — ‘ आप हमारे राजा होइये और सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा कीजिये । ' यह सुनकर नहुषने उनसे कहा – ' मुझमें इन्द्र बननेकी शक्ति नहीं है, अतः आपलोग अपने तप और तेजसे मुझे आप्यायित ( पुष्ट ) कीजिये ' ॥ २३-२४ ॥ एवमुक्तैर्वर्धितश्चापि देवै
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राजाभवन्नहुषो घोरवीर्यः । त्रैलोक्ये च प्राप्य राज्यं महर्षीन् कृत्वा वाहान् याति लोकान् दुरात्मा ॥ २५ ॥
उसके ऐसा कहनेपर देवताओंने उसे तप और तेजसे बढ़ाया । फिर भयंकर पराक्रमी राजा नहुष स्वर्गका राजा बन गया । इस प्रकार त्रिलोकीका राज्य पाकर वह दुरात्मा नहुष महर्षियोंको अपना वाहन बनाकर सब लोकोंमें घूमता है ॥ २५ ॥
जोहरं दृष्टिविषं सुघोरं मा त्वं पश्येर्नहुषं वै कदाचित् । देवाश्च सर्वे नहुषं भृशार्ता न पश्चन्ते गूढरूपाश्चरन्तः ॥ २६ ॥
वह देखनेमात्रसे सबका तेज हर लेता है । उसकी दृष्टिमें भयंकर विष है । वह अत्यन्त घोर स्वभावका हो गया है । तुम नहुषकी ओर कभी देखना नहीं । सब देवता भी अत्यन्त पीड़ित हो गूढरूपसे विचरते रहते हैं; परंतु नहुषकी ओर कभी देखते नहीं हैं ॥ २६ ॥
शल्यउवाच एवं वदत्यङ्गिरसां वरिष्ठे बृहस्पतौ लोकपालः कुबेरः । वैवस्वतश्चैव यमः पुराणो देवश्च सोमो वरुणश्चाजगाम ॥ २७ ॥
शल्य कहते हैं — राजन्! अंगिराके पुत्रोंमें श्रेष्ठ बृहस्पति जब ऐसा कह रहे थे, उसी समय लोकपाल कुबेर, सूर्यपुत्र यम, पुरातन देवता चन्द्रमा तथा वरुण भी वहाँ आ पहुँचे ॥ २७ ॥
ते वै समागम्य महेन्द्रमूचु- र्दिष्ट्या त्वाष्ट्रो निहतश्चैव वृत्रः । दिष्ट्या च त्वां कुशलिनमक्षतं च पश्यामो वै निहतारिं च शक्र ॥ २८ ॥
वे सब देवराज इन्द्रसे मिलकर बोले- ' शक्र! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपने त्वष्टाके पुत्र वृत्रासुरका वध किया। हमलोग आपको शत्रुका वध करनेके पश्चात् सकुशल और अक्षत देखते हैं, यह भी बड़े आनन्दकी बात है ' ॥ २८ ॥
स तान् यथावच्च हि लोकपालान् समेत्य वै प्रीतमना महेन्द्रः । उवाच चैनान् प्रतिभाष्य शक्रः संचोदयिष्यन्नहुषस्यान्तरेण ॥ २ ९ ॥
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उन लोकपालोंसे यथायोग्य मिलकर महेन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने उन सबको सम्बोधित करके राजा नहुषके भीतर बुद्धिभेद उत्पन्न करनेके लिये प्रेरणा देते हुए कहा ॥ २ ९ ॥ राजा देवानां नहुषो घोररूप- स्तत्र साह्यं दीयतां मे भवद्भिः । ते चाब्रुवन् नहुषो घोररूपो दृष्टीविषस्तस्य बिभीम ईश ॥ ३० ॥
‘ इन देवताओंका राजा नहुष बड़ा भयंकर हो रहा है । उसे स्वर्गसे हटानेके कार्यमें आपलोग मेरी सहायता करें। ' यह सुनकर उन्होंने उत्तर दिया–' देवेश्वर! नहुष तो बड़ा
भयंकर रूपवाला है । उसकी दृष्टिमें विष है । अतः हमलोग उससे डरते हैं ॥ ३० ॥
त्वं चेद् राजानं नहुषं पराजये- ततो वयं भागमर्हाम शक्र ।
इन्द्रोऽब्रवीद् भवतु भवानपां पति- र्यमः कुबेरश्च मयाभिषेकम् ॥ ३१ ॥
सम्प्राप्नुवन्त्वद्य सहैव दैवतै रिपुं जयाम तं नहुषं घोरदृष्टिम् । ततः शक्रं ज्वलनोऽप्याह भागं प्रयच्छ मह्यं तव साह्यं करिष्ये । तमाह शक्रो भविताग्ने तवापि चेन्द्राग्न्योर्वे भाग एको महाक्रतौ ॥ ३२ ॥
‘ शक्र! यदि आप हमारी सहायतासे राजा नहुषको पराजित करनेके लिये उद्यत हैं तो हम भी यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी हों । ' इन्द्रने कहा– ' वरुणदेव! आप जलके स्वामी हों, यमराज और कुबेर भी मेरे द्वारा अपने - अपने पदपर अभिषिक्त हों । देवताओंसहित हम सब लोग भयंकर दृष्टिवाले अपने शत्रु नहुषको परास्त करेंगे । ' तब अग्निने भी इन्द्रसे कहा - ' प्रभो! मुझे भी भाग दीजिये, मैं आपकी सहायता करूँगा । ' तब इन्द्रने उनसे कहा ——अग्निदेव! महायज्ञमें इन्द्र और अग्निका एक सम्मिलित भाग होगा, जिसपर तुम्हारा भी अधिकार रहेगा ' ॥ ३२ ॥
शल्य उवाच
एवं संचिन्त्य भगवान् महेन्द्रः पाकशासनः ।
कुबेरं सर्वयक्षाणां धनानां च प्रभुं तथा ॥ ३३ ॥
शल्य कहते हैं— राजन्! इस प्रकार सोच-विचारकर पाकशासन भगवान् महेन्द्रने कुबेरको सम्पूर्ण यक्षों तथा धनका अधिपति बना दिया ॥ ३३ ॥