03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1341–1350
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1341–1350
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भारत! दोनों ओरकी सेनाएँ विशाल, भयंकर और दुःसह थीं, मानो विधाताने दोनों सेनाओंको स्वर्गकी प्राप्तिके लिये ही रचा था । दोनोंमें ही सत्पुरुष भरे हुए थे ॥ ४ ॥
पश्चान्मुखाः कुरवो धार्तराष्ट्राः स्थिताः पार्थाः प्राङ्मुखा योत्स्यमानाः । दैत्येन्द्रसेनेव च कौरवाणां देवेन्द्रसेनेव च पाण्डवानाम् ॥ ५ ॥
आपके पुत्र कौरवोंका मुख पश्चिम दिशाकी ओर था और कुन्तीके पुत्र उनसे युद्ध करनेके लिये पूर्वाभिमुख खड़े थे । कौरवसेना दैत्यराजकी सेनाके समान जान पड़ती थी और पाण्डववाहिनी देवराज इन्द्रकी सेनाके तुल्य प्रतीत होती थी ॥ ५ ॥
चक्रे वायुः पृष्ठतः पाण्डवानां धार्तराष्ट्राञ्शवापदा व्याहरन्त । गजेन्द्राणां मदगन्धांश्च तीव्रान् न सेहिरे तव पुत्रस्य नागाः ॥ ६ ॥
पाण्डवसेनाके पीछेकी ओरसे हवा चल रही थी और आपके पुत्रोंकी ओर देखकर हिंसक जन्तु बोल रहे थे । आपके पुत्रकी सेनामें जो हाथी थे, वे पाण्डवपक्षके गजराजोंके मदोंकी तीव्र गन्ध नहीं सहन कर पाते थे ॥ दुर्योधनो हस्तिनं पद्मवर्णं सुवर्णकक्षं जालवन्तं प्रभिन्नम् । समास्थितो मध्यगतः कुरूणां संस्तूयमानो वन्दिभिर्मागधैश्च ॥ ७ ॥
दुर्योधन कमलके समान कान्तिवाले मदस्रावी गजराजपर बैठकर कौरवसेनाके मध्यभागमें खड़ा था । उसके हाथीपर सोनेका हौदा कसा हुआ था और पीठपर सोनेकी जाली बिछी हुई थी । उस समय बन्दी और मागधजन उसकी स्तुति कर रहे थे ॥ ७ ॥
चन्द्रप्रभं श्वेतमथातपत्रं सौवर्णस्रग् भ्राजति चोत्तमाङ्गे । तं सर्वतः शकुनिः पर्वतीयैः सार्धं गान्धारैर्याति गान्धारराजः ॥ ८ ॥
उसके मस्तकपर चन्द्रमाके समान कान्तिमान् श्वेत छत्र तना हुआ था और कण्ठमें सोनेकी माला सुशोभित हो रही थी । गान्धारराज शकुनि गान्धारदेशके पर्वतीय योद्धाओंके साथ आकर दुर्योधनको सब ओरसे घेरकर चल रहा था ॥ ८ ॥
भीष्मोऽग्रतः सर्वसैन्यस्य वृद्धः श्वेतच्छत्रः श्वेतधनुः सखड्गः । श्वेतोष्णीषः पाण्डुरेण ध्वजेन
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श्वेतैरश्वैः श्वेतशैलप्रकाशैः ॥ ९ ॥
हमारी सम्पूर्ण सेनाके आगे बूढ़े पितामह भीष्म थे । उनके सिरपर श्वेत रंगकी पगड़ी थी और श्वेत वर्णका ही छत्र तना हुआ था । उनके धनुष और खड्ग भी श्वेत ही थे । वे श्वेत शैलके समान प्रकाशित होनेवाले श्वेत घोड़ों और श्वेत ध्वजसे सुशोभित हो रहे थे ॥ ९ ॥
तस्य सैन्ये धार्तराष्ट्राश्च सर्वे बाह्लीकानामेकदेशः शलश्च । ये चाम्बष्ठाः क्षत्रिया ये च सिन्धो- स्तथा सौवीराः पञ्चनदाश्च शूराः ॥ १० ॥
उनकी सेनामें आपके सभी पुत्र, बाह्लीकसेनाका एक अंश, शल और अम्बष्ठ, सौवीर, सिन्धु तथा पंचनद देशके शूरवीर क्षत्रिय विद्यमान थे ॥ १० ॥
शोणैर्हयै रुक्मरथो महात्मा द्रोणो धनुष्पाणिरदीनसत्त्वः । आस्ते गुरुः प्रायशः सर्वराज्ञां पश्चाच्च भूमीन्द्र इवाभियाति ॥ ११ ॥
उनके पीछे प्रायः समस्त राजाओंके गुरु, उदार हृदयवाले महामना द्रोणाचार्य हाथमें धनुष लिये लाल घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णमय रथमें बैठकर भूमिपालकी भाँति युद्धके लिये जा रहे थे ॥ ११ ॥
वार्धक्षत्रिः सर्वसैन्यस्य मध्ये भूरिश्रवाः पुरुमित्रो जयश्च । शाल्वा मत्स्याः केकयाश्चेति सर्वे गजानीकैर्भ्रातरो योत्स्यमानाः ॥ १२ ॥
वृद्धक्षत्रका पुत्र जयद्रथ, भूरिश्रवा, पुरुमित्र, जय, शाल्व और मत्स्यदेशीय क्षत्रिय तथा सब भाई केकय- राजकुमार युद्धकी इच्छासे हाथियोंके समूहोंको साथ ले सम्पूर्ण सेनाके मध्यभागमें स्थित थे ॥ १२ ॥
शारद्वतश्चोत्तरधूर्महात्मा महेष्वासो गौतमश्चित्रयोधी । शकैः किरातैर्यवनैः पह्नवैश्च सार्धं चमूमुत्तरतोऽभियाति ॥ १३ ॥
महान् धनुर्धर और विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले गौतमवंशीय महामना कृपाचार्य गुरुतर भार ग्रहण करके शक, किरात, यवन तथा पल्लव सैनिकोंके साथ कौरवसेनाके बाँयें भागमें होकर चल रहे थे ॥ १३ ॥
महारथैर्वृष्णिभोजैः सुगुप्तं सुराष्ट्रकैर्विहितैरात्तशस्त्रैः ।
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बृहद् बलं कृतवर्माभिगुप्तं बलं त्वदीयं दक्षिणेनाभियाति ॥ १४ ॥
हाथमें हथियार लिये सुशिक्षित सुराष्ट्रदेशीय वीरों तथा वृष्णि और भोजवंशके महारथियोंद्वारा पालित विशाल सेना कृतवर्माद्वारा सुरक्षित होकर आपकी सेनाके दाहिने भागसे होकर युद्धके लिये यात्रा कर रही थी ॥ १४ ॥
संशप्तकानामयुतं रथानां मृत्युर्जयो वार्जुनस्येति सृष्टाः । येनार्जुनस्तेन राजन् कृतास्त्राः प्रयातारस्ते त्रिगर्ताश्च शूराः ॥ १५ ॥
‘ या तो हम अर्जुनपर विजय प्राप्त करेंगे अथवा हमारी मृत्यु हो जायगी' ऐसी प्रतिज्ञा करके दस हजार संशप्तक रथी तथा बहुत- से अस्त्रवेत्ता त्रिगर्तदेशीय शूरवीर जिस ओर अर्जुन थे, उसी ओर जा रहे थे ॥ १५ ॥
साग्रं शतसहस्रं तु नागानां तव भारत ।
नागे नागे रथशतं शतमश्वा रथे रथे ॥ १६ ॥
भारत! आपकी सेनामें एक लाखसे अधिक हाथी थे । एक-एक हाथीके साथ सौ - सौ रथ थे और एक- एक रथके साथ सौ - सौ घोड़े थे ॥ १६ ॥
अश्वेऽश्वे दश धानुष्का धानुष्के शतचर्मिणः ।
एवं व्यूढान्यनीकानि भीष्मेण तव भारत ॥ १७ ॥
प्रत्येक अश्वके पीछे दस-दस धनुर्धर और प्रत्येक धनुर्धरके साथ सौ- सौ पैदल सैनिक नियुक्त किये गये थे, जो ढाल- तलवार लिये रहते थे । भरतनन्दन! इस प्रकार भीष्मजीने आपकी सेनाओंका व्यूह रचा था ॥ १७ ॥
संव्यूह्य मानुषं व्यूहं दैवं गान्धर्वमासुरम् ।
दिवसे दिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवोऽग्रणीः ॥ १८ ॥
महारथौघविपुलः समुद्र इव घोषवान् ।
भीष्मेण धार्तराष्ट्राणां व्यूहः प्रत्यङ्मुखो युधि ॥ १ ९ ॥
शान्तनुनन्दन सेनापति भीष्म प्रत्येक दिन मानुष, दैव, गान्धर्व और आसुर प्रणालीके अनुसार व्यूह- रचना करके सेनाके अग्रभागमें स्थित होते थे । भीष्मद्वारा रचित कौरवसेनाका वह व्यूह महारथियोंके समुदायसे सम्पन्न हो समुद्रके समान गर्जना करता था । युद्धमें उसका मुख पश्चिमकी ओर था ॥ १८-१९ ॥ अनन्तरूपा ध्वजिनी नरेन्द्र भीमा त्वदीया न तु पाण्डवानाम् । तां चैव मन्ये बृहतीं दुष्प्रधर्षां यस्या नेता केशवश्चार्जुनश्च ॥ २० ॥
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नरेन्द्र! आपकी सेना अनन्त रूपवाली एवं भयंकर थी; पाण्डवोंकी वैसी नहीं थी । परंतु मैं तो उसी सेनाको विशाल और दुर्जय मानता हूँ, जिसके नेता साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि सैन्यवर्णने विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत श्रीमद्भगवद्गीतापर्वमें सैन्यवर्णनविषयक बीसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ २० ॥
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एकविंशोऽध्यायः कौरवसेनाको देखकर युधिष्ठिरका विषाद करना और ' श्रीकृष्णकी कृपासे ही विजय होती है ' यह कहकर अर्जुनका उन्हें आश्वासन देना संजय उवाच
बृहतीं धार्तराष्ट्रस्य सेनां दृष्ट्वा समुद्यताम् ।
विषादमगमद् राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! युद्धके लिये उद्यत हुई दुर्योधनकी विशाल सेनाको देखकर कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें विषाद छा गया ॥ १ ॥
व्यूहं भीष्मेण चाभेद्यं कल्पितं प्रेक्ष्य पाण्डवः ।
अक्षोभ्यमिव सम्प्रेक्ष्य विवर्णोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ २ ॥
भीष्मने जिस व्यूहकी रचना की थी, उसका भेदन करना असम्भव था । उसे अक्षोभ्य-सा देखकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी अंगकान्ति फीकी पड़ गयी । वे अर्जुनसे इस प्रकार बोले – ॥ २ ॥
धनंजय कथं शक्यमस्माभिर्योद्धुमाहवे ।
धार्तराष्ट्रैर्महाबाहो येषां योद्धा पितामहः ॥३ ॥
‘ महाबाहु धनंजय! जिनके प्रधान योद्धा पितामह भीष्म हैं, उन धृतराष्ट्रपुत्रोंके साथ हम समरभूमिमें कैसे युद्ध कर सकते हैं? ॥ ३ ॥
अक्षोभ्योऽयमभेद्यश्च भीष्मेणामित्रकर्षिणा ।
कल्पितः शास्त्रदृष्टेन विधिना भूरिवर्चसा ॥। ४ ॥
' महातेजस्वी शत्रुसूदन भीष्मने शास्त्रीय विधिके अनुसार यह अक्षोभ्य एवं अभेद्य व्यूह रचा है ॥ ४ ॥
ते वयं संशयं प्राप्ताः ससैन्याः शत्रुकर्षण ।
कथमस्मान्महाव्यूहादुत्थानं नो भविष्यति ॥ ५ ॥
‘शत्रुनाशन अर्जुन! हमलोग अपनी सेनाओंके साथ प्राणसंकटकी स्थितिमें पहुँच गये हैं । इस महान् व्यूहसे हमारा उद्धार कैसे होगा? ' ॥ ५ ॥
अथार्जुनोऽब्रवीत् पार्थं युधिष्ठिरममित्रहा ।
विषण्णमिव सम्प्रेक्ष्य तव राजन्ननीकिनीम् ॥ ६ ॥
राजन्! तब शत्रुओंका नाश करनेवाले अर्जुनने आपकी सेनाको देखकर विषादग्रस्त- से हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको सम्बोधित करके कहा— ॥ ६ ॥
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प्रज्ञयाभ्यधिकाञ्शूरान् गुणयुक्तान् बहूनपि ।
जयन्त्यल्पतरा येन तन्निबोध विशाम्पते ॥ ७ ॥
‘ प्रजानाथ! अधिक बुद्धिमान्, उत्तम गुणोंसे युक्त तथा बहुसंख्यक शूरवीरोंको भी बहुत थोड़े योद्धा जिस प्रकार जीत लेते हैं, उसे बताता हूँ, सुनिये – ॥ ७ ॥
तत्र ते कारणं राजन् प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
नारदस्तमृषिर्वेद भीष्मद्रोणौ च पाण्डव ॥ ८ ॥
‘ राजन्! आप दोषदृष्टिसे रहित हैं, अतः आपको वह युक्ति बताता हूँ । पाण्डुनन्दन! उसे केवल देवर्षि नारद, भीष्म तथा द्रोणाचार्य जानते हैं ॥ ८ ॥
एनमेवार्थमाश्रित्य युद्धे देवासुरेऽब्रवीत् ।
पितामहः किल पुरा महेन्द्रादीन् दिवौकसः ॥ ९ ॥
' कहते हैं, पूर्वकालमें जब देवासुर संग्राम हो रहा था, उस समय इसी विषयको लेकर पितामह ब्रह्माने इन्द्र आदि देवताओंसे इस प्रकार कहा था- ॥ ९ ॥
न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः ।
यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च ॥ १० ॥
‘ विजयकी इच्छा रखनेवाले शूरवीर अपने बल और पराक्रमसे वैसी विजय नहीं पाते, जैसी कि सत्य, सज्जनता, धर्म तथा उत्साहसे प्राप्त कर लेते हैं ॥ १० ॥
त्यक्त्वाधर्मं च लोभं च मोहं चोद्यममास्थिताः ।
युद्धयध्वमनहंकारा यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ११ ॥
' देवताओ! अधर्म, लोभ और मोह त्यागकर उद्यमका सहारा ले अहंकारशून्य होकर युद्ध करो । जहाँ धर्म है उसी पक्षकी विजय होती है ' ॥ ११ ॥
एवं राजन् विजानीहि ध्रुवोऽस्माकं रणे जयः ।
यथा तु नारदः प्राह यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ १२ ॥
‘ राजन्! इसी नियमके अनुसार आप भी यह निश्चितरूपसे जान लें कि युद्धमें हमारी विजय अवश्यम्भावी है । जैसा कि नारदजीने कहा है, जहाँ कृष्ण हैं, वहीं विजय है ॥ १२ ॥
गुणभूतो जयः कृष्णे पृष्ठतोऽभ्येति माधवम् ।
तद् यथा विजयश्चास्य सन्नतिश्चापरो गुणः ॥ १३ ॥
‘ विजय तो श्रीकृष्णका एक गुण है, अतः वह उनके पीछे - पीछे चलता है । जैसे विजय गुण है, उसी प्रकार विनय भी उनका द्वितीय गुण है ॥ १३ ॥
अनन्ततेजा गोविन्दः शत्रुपूगेषु निर्व्यथः ।
पुरुषः सनातनमयो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ १४ ॥
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‘ भगवान् गोविन्दका तेज अनन्त है । वे शत्रुओंके समुदायमें भी कभी व्यथित नहीं होते;
क्योंकि वे सनातन पुरुष ( परमात्मा ) हैं । अतः जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है ॥
पुरा ह्येष हरिर्भूत्वा विकुण्ठोऽकुण्ठसायकः ।
सुरासुरानवस्फूर्जन्नब्रवीत् के जयन्त्विति ॥ १५ ॥
' ये श्रीकृष्ण कहीं भी प्रतिहत या अवरुद्ध न होनेवाले ईश्वर हैं । इनका बाण अमोघ है । ये ही पूर्वकालमें श्रीहरिरूपमें प्रकट हो वज्रगर्जनके समान गम्भीर वाणीमें देवताओं और असुरोंसे बोले — तुमलोगोंमेंसे किसकी विजय हो? ॥ १५ ॥
कथं कृष्ण जयेमेति यैरुक्तं तत्र तैर्जितम् ।
तत् प्रसादाद्धि त्रैलोक्यं प्राप्तं शक्रादिभिः सुरैः ॥ १६ ॥
‘ उस समय जिन लोगोंने उनका आश्रय लेकर पूछा- ' कृष्ण! हमारी जीत कैसे होगी? ' उन्हींकी जीत हुई । इस प्रकार श्रीकृष्णकी कृपासे ही इन्द्र आदि देवताओंने त्रिलोकीका राज्य प्राप्त किया है ॥ १६ ॥
तस्य ते न व्यथां काञ्चिदिह पश्यामि भारत ।
यस्य ते जयमाशास्ते विश्वभुक् त्रिदिवेश्वरः ॥ १७ ॥
‘ अतः भारत! मैं आपके लिये किसी प्रकारकी व्यथा या चिन्ता होनेका कारण नहीं देखता; क्योंकि देवेश्वर तथा विश्वम्भर भगवान् श्रीकृष्ण आपके लिये विजयकी आशा करते हैं ' ॥ १७ ॥
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि युधिष्ठिरार्जुनसंवादे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत श्रीमद्भगवद्गीतापर्वमें युधिष्ठिर- अर्जुनसंवादविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
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द्वाविंशोऽध्यायः युधिष्ठिरकी रणयात्रा, अर्जुन और भीमसेनकी प्रशंसा तथा श्रीकृष्णका अर्जुनसे कौरवसेनाको मारनेके लिये कहना संजय उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा स्वां सेनां समनोदयत् ।
प्रतिव्यूहन्ननीकानि भीष्मस्य भरतर्षभ ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने भीष्मजीकी सेनाका सामना करनेके लिये अपनी सेनाकी व्यूहरचना करते हुए उसे युद्धके लिये प्रेरित किया ॥ १ ॥
यथोद्दिष्टान्यनीकानि प्रत्यव्यूहन्त पाण्डवाः ।
स्वर्गं परममिच्छन्तः सुयुद्धेन कुरूद्वहाः ॥ २ ॥
कुरुकुलके धुरन्धर वीर पाण्डवोंने उत्तम युद्धके द्वारा उत्कृष्ट स्वर्गलोककी इच्छा रखकर शास्त्रोक्त विधिसे शत्रुके मुकाबिलेमें अपनी सेनाका व्यूह निर्माण किया ॥ २ ॥
मध्ये शिखण्डिनोऽनीकं रक्षितं सव्यसाचिना ।
धृष्टद्युम्नश्चरन्नग्रे भीमसेनेन पालितः ॥ ३ ॥
व्यूहके मध्यभागमें सव्यसाची अर्जुनद्वारा सुरक्षित शिखण्डीकी सेना थी और अग्रभागमें भीमसेनद्वारा पालित धृष्टद्युम्न विचरण कर रहे थे ॥ ३ ॥
अनीकं दक्षिणं राजन् युयुधानेन पालितम् ।
श्रीमता सात्वताग्र्येण शक्रेणेव धनुष्मता ॥ ४ ॥
राजन्! उस व्यूहके दक्षिणभागकी रक्षा इन्द्रके समान धनुर्धर सात्वतशिरोमणि श्रीमान् सात्यकि कर रहे थे ॥ ४ ॥
महेन्द्रयानप्रतिमं रथं तु सोपस्करं हाटकरत्नचित्रम् । युधिष्ठिरः काञ्चनभाण्डयोक्त्रं समास्थितो नागपुरस्य मध्ये ॥ ५ ॥
राजा युधिष्ठिर हाथियोंकी सेनाके बीचमें खड़े एक सुन्दर रथपर आरूढ़ हुए, जो देवराज इन्द्रके रथकी समानता कर रहा था । उस रथमें सब आवश्यक सामग्री रखी गयी थी । भाँति - भाँतिके सुवर्ण तथा रत्नोंसे विभूषित होनेके कारण उस रथकी विचित्र शोभा हो रही थी । उसमें सुवर्णमय भाण्ड तथा रस्सियाँ रखी हुई थीं ॥ ५ ॥
समुच्छ्रितं दन्तशलाकमस्य सुपाण्डुरं छत्रमतीव भाति ।
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प्रदक्षिणं चैनमुपाचरन्त महर्षयः संस्तुतिभिर्महेन्द्रम् ॥ ६ ॥
उस समय किसी सेवकने युधिष्ठिरके ऊपर हाथीके दाँतोंकी बनी हुई शलाकाओंसे युक्त श्वेत छत्र लगा रखा था, जिसकी बड़ी शोभा हो रही थी । कुछ महर्षिगणोंने नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा महाराज युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की ॥ ६ ॥
पुरोहिताः शत्रुवधं वदन्तो ब्रह्मर्षिसिद्धाः श्रुतवन्त एनम् । जप्यैश्च मन्त्रैश्च महौषधीभिः समन्ततः स्वस्त्ययनं ब्रुवन्तः ॥ ७ ॥
शास्त्रोंके विद्वान् पुरोहित, ब्रह्मर्षि और सिद्धगण जप, मन्त्र तथा उत्तम ओषधियोंद्वारा सब ओरसे युधिष्ठिरके कल्याण और शत्रुओंके संहारका शुभ आशीर्वाद देने लगे ॥ ७ ॥
ततः स वस्त्राणि तथैव गाश्च फलानि पुष्पाणि तथैव निष्कान् । कुरूत्तमो ब्राह्मणसान्महात्मा कुर्वन् ययौ शक्र इवामरेशः ॥ ८ ॥
उस समय देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी कुरुश्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिर बहुत - से वस्त्र, गाय, फल - फूल और स्वर्णमय आभूषण ब्राह्मणोंको दान करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ८ ॥
सहस्रसूर्यः शतकिङ्किणीकः परार्द्धयजाम्बूनदहेमचित्रः । रथोऽर्जुनस्याग्निरिवार्चिमाली विभ्राजते श्वेतहयः सुचक्रः ॥ ९ ॥
अर्जुनका रथ ज्वालमालाओंसे युक्त अग्निके समान शोभा पा रहा था । उसमें सूर्यकी आकृतिके सहस्रों चक्र विद्यमान थे । सैकड़ों क्षुद्र घंटिकाएँ लगी थीं । बहुमूल्य जाम्बूनद नामक सुवर्णसे भूषित होनेके कारण उस रथकी विचित्र शोभा हो रही थी । उसमें श्वेत रंगके घोड़े और सुन्दर पहिये लगे थे ॥ ९ ॥
तमास्थितः केशवसंगृहीतं कपिध्वजो गाण्डिवबाणपाणिः । धनुर्धरो यस्य समः पृथिव्यां न विद्यते नो भविता कदाचित् ॥ १० ॥
गाण्डीव धनुष और बाण हाथमें लिये हुए कपिध्वज अर्जुन उस रथपर आरूढ़ थे । भगवान् श्रीकृष्णने उसकी बागडोर सँभाल रखी थी । अर्जुनके समान धनुर्धर इस भूतलपर न तो कोई है और न होगा ही ॥ १० ॥
उद्वर्तयिष्यंस्तव पुत्रसेना-