03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1511–1520

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1511–1520

पृष्ठ 1511

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सात्त्विकभाव हूँ ॥ ३६ ॥

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥

वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवोंमें धनंजय अर्थात् तू, मुनियोंमें वेदव्यास' और कवियोंमें शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ ॥ ३७ ॥

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।

मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥

मैं दमन करनेवालोंका दण्ड' अर्थात् दमन करनेकी शक्ति हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ, गुप्त रखनेयोग्य भावोंका रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानोंका तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ ॥ ३८ ॥

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।

न तदस्ति विना यत् स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३ ९ ॥

और हे अर्जुन! जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका कारण है, वह भी मैं ही हूँ; ३ क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित ह४ ॥ ३ ९ ॥

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप ।

एष तद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥

हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है, मैंने अपनी विभूतियोंका यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेशसे अर्थात् संक्षेपसे कहा है ॥ ४० ॥

सम्बन्ध— अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से उनकी विभूति और योगशक्तिका वर्णन करनेकी प्रार्थना की थी, उसके अनुसार भगवान् अपनी दिव्य विभूतियोंका वर्णन समाप्त करके अब संक्षेपमें अपनी योगशक्तिका वर्णन करते हैं- यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ॥ तत् तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥

जो- जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस - उसको तूतू मेरे तेजके अंशकी ही अभिव्यक्ति' जान ॥ ४१ ॥

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञानेत तवार्जुन ।

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥

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अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जाननेसे तेरा क्या प्रयोजन है? 3 मैं इस सम्पूर्ण जगत्को अपनी योगशक्तिके एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हूँ ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ भीष्मपर्वणि तु

चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌गीतोपनिषद् श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें विभूतियोग नामक दसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १० ॥ भीष्मपर्वमें चौंतीसवाँ अध्याय पूरा

हुआ ॥ ३४ ॥

0 ६. ‘ प्रीयमाणाय ' विशेषणका प्रयोग करके भगवान्ने यह दिखलाया है कि हे अर्जुन! तुम्हारा मुझमें अतिशय प्रेम है, मेरे वचनोंको तुम अमृततुल्य समझकर अत्यन्त श्रद्धा और प्रेमके साथ सुनते हो; इसीलिये मैं किसी प्रकारका संकोच न करके बिना पूछे भी तुम्हारे सामने अपने परम गोपनीय गुण, प्रभाव और तत्त्वका रहस्य बार- बार खोल रहा हूँ । इसमें तुम्हारा प्रेम ही कारण है । 3. इस अध्यायमें भगवान्ने अपने गुण, प्रभाव और तत्त्वका रहस्य समझानेके लिये जो उपदेश दिया है, वही ' परम वचन ' है और उसे फिरसे सुननेके लिये कहकर भगवान्ने यह भाव दिखलाया है कि मेरी भक्तिका तत्त्व अत्यन्त ही गहन है; अतः उसे बार- बार सुनना परम आवश्यक समझकर बड़ी सावधानीके साथ श्रद्धा और प्रेमपूर्वक सुनना चाहिये । २. ‘ सुरगणाः ’ पद एकादश रुद्र, आठ वसु, बारह आदित्य, प्रजापति, उनचास मरुद्गण, अश्विनीकुमार और इन्द्र आदि जितने भी शास्त्रीय देवताओंके समुदाय हैं - उन सबका वाचक है । ३. ‘ महर्षयः ’ पदसे यहाँ सप्त महर्षियोंको समझना चाहिये । ४. भगवान्का अपने अतुलनीय प्रभावसे जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेके लिये ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रके रूपमें; दुष्टोंके विनाश, धर्मके संस्थापन तथा नाना प्रकारकी लीलाओंके द्वारा जगत्के प्राणियोंके उद्धारके लिये श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि दिव्य अवतारोंके रूपमें; भक्तोंको दर्शन देकर उन्हें कृतार्थ करनेके लिये उनके इच्छानुरूप नाना रूपोंमें तथा लीलावैचित्र्यकी अनन्त धारा प्रवाहित करनेके लिये समस्त विश्वके रूपमें जो प्रकट होना है— उसीका वाचक यहाँ ' प्रभव' शब्द है । उसे देवसमुदाय और महर्षिलोग नहीं जानते, इस कथनसे भगवान्ने यह भाव दिखलाया है कि मैं किस - किस समय किन- किन रूपोंमें किन- किन हेतुओंसे किस प्रकार प्रकट होता हूँ— इसके रहस्यको साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, अतीन्द्रिय विषयोंको समझनेमें समर्थ देवता और महर्षिलोग भी यथार्थरूपसे नहीं जानते । ५. इस कथनसे भगवान्ने यह भाव दिखलाया है कि जिन देवता और महर्षियोंसे इस सारे जगत्की उत्पत्ति हुई है, वे सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं; उनका निमित्त और उपादान कारण मैं ही हूँ और उनमें जो विद्या, बुद्धि, शक्ति, तेज आदि प्रभाव हैं - वे सब भी उन्हें मुझसे ही मिलते हैं । ६. भगवान् अपनी योगमायासे नाना रूपोंमें प्रकट होते हुए भी अजन्मा हैं ( गीता ४।६ ), अन्य जीवोंकी भाँति उनका जन्म नहीं होता, वे अपने भक्तोंको सुख देने और धर्मकी स्थापना करनेके लिये केवल जन्मधारणकी लीला किया करते हैं - इस बातको श्रद्धा और विश्वासके साथ ठीक- ठीक समझ लेना तथा इसमें जरा भी संदेह न करना - यही ' भगवान्‌को अजन्मा जानना ' है तथा भगवान् ही सबके आदि अर्थात् महाकारण हैं, उनका आदि कोई नहीं है; वे नित्य हैं तथा सदासे हैं, अन्य पदार्थोंकी भाँति उनका किसी

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कालविशेषसे आरम्भ नहीं हुआ है - इस बातको श्रद्धा और विश्वासके साथ ठीक- ठीक समझ लेना —‘भगवान्‌को अनादि जानना' है । एवं जितने भी ईश्वरकोटिमें गिने जानेवाले इन्द्र, वरुण, यम, प्रजापति आदि लोकपाल हैं — भगवान् उन सबके महान् ईश्वर हैं; वे ही सबके नियन्ता, प्रेरक, कर्ता, हर्ता, सब प्रकारसे सबका भरण - पोषण और संरक्षण करनेवाले सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं - इस बातको श्रद्धापूर्वक संशयरहित ठीक - ठीक समझ लेना, ' भगवान्‌को लोकोंका महान् ईश्वर जानना ' है । ७. कर्तव्य- अकर्तव्य, ग्राह्य- अग्राह्य और भले- बुरे आदिका निर्णय करके निश्चय करनेवाली जो वृत्ति है, उसे ‘ बुद्धि' कहते हैं । ८. किसी भी पदार्थको यथार्थ जान लेना ' ज्ञान' है; यहाँ 'ज्ञान' शब्द साधारण ज्ञानसे लेकर भगवान्के स्वरूपज्ञानतक सभी प्रकारके ज्ञानका वाचक है । ९. भोगासक्त मनुष्योंको नित्य और सुखप्रद प्रतीत होनेवाले समस्त सांसारिक भोगोंको अनित्य, क्षणिक और दुःखमूलक समझकर उनमें मोहित न होना- यही ' असम्मोह' है । 3. किसी भी प्राणीको किसी भी समय किसी भी प्रकारसे मन, वाणी या शरीरके द्वारा जरा भी कष्ट न पहुँचानेके भावको ' अहिंसा ' कहते हैं । २. सुख-दुःख, लाभ -हानि, जय- पराजय, निन्दा -स्तुति, मान- अपमान, मित्र- शत्रु आदि जितने भी क्रिया, पदार्थ और घटना आदि विषमताके हेतु माने जाते हैं, उन सबमें निरन्तर राग- द्वेषरहित समबुद्धि रहनेके भावको ' समता ' कहते हैं । ३. जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसे प्रारब्धका भोग या भगवान्का विधान समझकर सदा संतुष्ट रहनेके भावको ' तुष्टि' कहते हैं । ४. बुरा चाहना, बुरा करना, धनादि हर लेना, अपमान करना, आघात पहुँचाना, कड़ी जबान कहना या गाली देना, निन्दा या चुगली करना, आग लगाना, विष देना, मार डालना और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षमें क्षति पहुँचाना आदि जितने भी अपराध हैं, इनमेंसे एक या अधिक किसी प्रकारका भी अपराध करनेवाला कोई भी प्राणी क्यों न हो, अपनेमें बदला लेनेका पूरा सामर्थ्य रहनेपर भी उससे उस अपराधका किसी प्रकार भी बदला लेनेकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर देना और उस अपराधके कारण उसे इस लोक या परलोकमें कोई भी दण्ड न मिले - ऐसा भाव होना ' क्षमा ' है । ५. इन्द्रिय और अन्तःकरणद्वारा जो बात जिस रूपमें देखी, सुनी और अनुभव की गयी हो, ठीक उसी रूपमें दूसरेको समझानेके उद्देश्यसे हितकर प्रिय शब्दोंमें उसको प्रकट करना ‘ सत्य ' है । ६. ' सुख ' शब्द यहाँ प्रिय ( अनुकूल ) वस्तुके संयोगसे और अप्रिय ( प्रतिकूल ) - के वियोगसे होनेवाले सब प्रकारके सुखोंका वाचक है । इसी प्रकार प्रियके वियोगसे और अप्रियके संयोगसे होनेवाले आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक – सब प्रकारके दुःखोंका वाचक यहाँ ' दुःख ' शब्द है । मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि प्राणियोंके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले कष्टोंको 'आधिभौतिक', अनावृष्टि, अतिवृष्टि, भूकम्प, वज्रपात और अकाल आदि दैवीप्रकोपसे होनेवाले कष्टोंको ' आधिदैविक ’ और शरीर, इन्द्रिय तथा अन्तःकरणमें किसी प्रकारके रोगसे होनेवाले कष्टोंको ' आध्यात्मिक ' दुःख कहते हैं । ७. सर्गकालमें समस्त चराचर जगत्का उत्पन्न होना ' भव' है, प्रलयकालमें उसका लीन हो जाना ‘ अभाव' है । किसी प्रकारकी हानि या मृत्युके कारणको देखकर अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाले भावका नाम ' भय ' है और सर्वत्र एक परमेश्वरको व्याप्त समझ लेनेसे अथवा अन्य किसी कारणसे भयका जो सर्वथा अभाव हो जाना है वह ' अभय' है । ८. स्वधर्म - पालनके लिये कष्ट सहन करना ' तप ' है । ९. अपने स्वत्वको दूसरोंके हितके लिये वितरण करना ‘ दान' है । १०. इस कथनसे भगवान्ने यह भाव दिखलाया है कि विभिन्न प्राणियोंके उनकी प्रकृतिके अनुसार उपर्युक्त प्रकारके जितने भी विभिन्न भाव होते हैं, वे सब मुझसे ही होते हैं, अर्थात् वे सब मेरी ही सहायता, शक्ति और सत्तासे होते हैं । ११. ‘ चत्वारः पूर्वे’ से सबसे पहले होनेवाले सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार —इन चारोंको लेना चाहिये । ये भी भगवान्‌के ही स्वरूप हैं और ब्रह्माजीके तप करनेपर स्वेच्छासे प्रकट हुए हैं । ब्रह्माजीने स्वयं कहा है-

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तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे आदौ सनात् स्वतपसः स चतुःसनोऽभूत् ।

प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्त्वं सम्यग् जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥

(श्रीमद्भागवत २ | ७ | ५ ) ‘ मैंने विविध प्रकारके लोकोंको उत्पन्न करनेकी इच्छासे जो सबसे पहले तप किया, उस मेरी अखण्डित तपस्यासे ही भगवान् स्वयं सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार– इन चार ' सन ' नामवाले रूपोंमें प्रकट हुए और पूर्वकल्पमें प्रलयकालके समय जो आत्मतत्त्वके ज्ञानका प्रचार इस संसारमें नष्ट हो गया था, उसका इन्होंने भलीभाँति उपदेश किया, जिससे उन मुनियोंने अपने हृदयमें आत्मतत्त्वका साक्षात्कार किया । ' 3. सप्तर्षियोंके लक्षण बतलाते हुए कहा गया है— एतान् भावानधीयाना ये चैत ऋषयो मताः । सप्तैते सप्तभिश्चैव गुणैः सप्तर्षयः स्मृताः ॥ दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरा दिव्यचक्षुषः । वृद्धाः प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकाश्च ये ॥ (वायुपुराण ६१।९३ - ९ ४ ) ‘ तथा देवर्षियोंके इन ( उपर्युक्त) भावोंका जो अध्ययन ( स्मरण ) करनेवाले हैं, वे ऋषि माने गये हैं; इन ऋषियोंमें जो दीर्घायु, मन्त्रकर्ता, ऐश्वर्यवान्, दिव्य - दृष्टियुक्त, गुण, विद्या और आयुमें वृद्ध, धर्मका प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) करनेवाले और गोत्र चलानेवाले हैं -ऐसे सातों गुणोंसे युक्त सात ऋषियोंको ही सप्तर्षि कहते हैं । ' इन्हींसे प्रजाका विस्तार होता है और धर्मकी व्यवस्था चलती है । यहाँ जिन सप्तर्षियोंका वर्णन है, उनको भगवान्ने ' महर्षि' कहा है और उन्हें संकल्पसे उत्पन्न बतलाया है । इसलिये यहाँ उन्हींका लक्ष्य है, जो ऋषियोंसे भी उच्चस्तरके हैं । ऐसे सप्तर्षियोंका उल्लेख महाभारत - शान्तिपर्वमें मिलता है; इनके लिये साक्षात् परम पुरुष परमेश्वरने देवताओंसहित ब्रह्माजीसे कहा है— मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥ एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः । प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्ये च कल्पिताः ॥ (महा०, शान्ति० ३४०।६ ९ -७० ) ‘ मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ- ये सातों महर्षि तुम्हारे ( ब्रह्माजीके ) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं । ये सातों वेदके ज्ञाता हैं, इनको मैंने मुख्य वेदाचार्य बनाया है । ये प्रवृतिमार्गका संचालन करनेवाले हैं और ( मेरे ही द्वारा) प्रजापतिके कर्ममें नियुक्त किये गये हैं । ' इस कल्पके सर्वप्रथम स्वायम्भुव मन्वन्तरके सप्तर्षि यही हैं ( हरिवंश० ७।८, ९) । अतएव यहाँ सप्तर्षियोंसे इन्हींका ग्रहण करना चाहिये । २. ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं, प्रत्येक मनुके अधिकारकालको ' मन्वन्तर' कहते हैं । इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है । मानवी वर्षगणनाके हिसाब से एक मन्वन्तर तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षसे और दिव्य - वर्षगणनाके हिसाब से आठ लाख बावन हजार वर्षसे कुछ अधिक कालका होता है ( विष्णुपुराण १।३ ) । सूर्यसिद्धान्तमें मन्वन्तर आदिका जो वर्णन है, उसके अनुसार इस प्रकार समझना चाहिये— सौरमानसे ४३,२०,००० वर्षकी अथवा देवमानसे १२,००० वर्षकी एक चतुर्युगी होती है। इसीको महायुग कहते हैं । ऐसे इकहतर युगोंका एक मन्वन्तर होता है । प्रत्येक मन्वन्तरके अन्तमें सत्ययुगके मानकी अर्थात् १७,२८,००० वर्षकी संध्या होती है । मन्वन्तर बीतनेपर जब संध्या होती है, तब सारी पृथ्वी जलमें डूब जाती है । प्रत्येक कल्पमें (ब्रह्माके एक दिनमें) चौदह मन्वन्तर अपनी- अपनी संध्याओंके मानके सहित होते हैं । इसके सिवा कल्पके आरम्भकालमें भी एक सत्ययुगके मानकालकी संध्या होती है । इस प्रकार एक कल्पके चौदह मनुओंमें ७१ चतुर्युगीके अतिरिक्त सत्ययुगके मानकी १५ संध्याएँ होती हैं । ७१ महायुगोंके मानसे १४ मनुओंमें ९९४ महायुग होते हैं और सत्ययुगके मानकी १५ संध्याओंका काल पूरा ६ महायुगोंके समान हो जाता है । दोनोंका योग मिलानेपर पूरे एक हजार महायुग या दिव्ययुग बीत जाते हैं । इस हिसाबसे निम्नलिखित अंकोंके द्वारा इसको समझिये—

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सौरमान या मानव वर्ष देवमान या दिव्य वर्ष एक चतुर्युगी ( महायुग या दिव्ययुग ) ४३,२०,००० १२,००० इकहत्तर चतुर्युगी ३०,६७,२०,००० ८,५२,००० कल्पकी संधि १७,२८,००० ४,८०० मन्वन्तरकी चौदह संध्या २,४१, ९२,००० ६७,२०० संधिसहित एक मन्वन्तर ३०,८४,४८,००० ८,५६,८०० चौदह संध्यासहित चौदह मन्वन्तर ४,३१,८२,७२,००० १,१ ९, ९ ६,२०० कल्पकी संधिसहित चौदह मन्वन्तर या एक कल्प ४,३२,००,००,००० १,२०,००,००० ब्रह्माजीका दिन ही कल्प है, इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि है । इस अहोरात्रके मानसे ब्रह्माजीकी परमायु एक सौ वर्ष है । इसे ‘ पर' कहते हैं । इस समय ब्रह्माजी अपनी आयुका आधा भाग अर्थात् एक परार्द्ध बिताकर दूसरे परार्द्धमें चल रहे हैं । यह उनके ५१ वें वर्षका प्रथम दिन या कल्प है । वर्तमान कल्पके आरम्भसे अबतक स्वायम्भुव आदि छः मन्वन्तर अपनी - अपनी संध्याओंसहित बीत चुके हैं, कल्पकी संध्यासमेत सात संध्याएँ बीत चुकी हैं । वर्तमान सातवें वैवस्वत मन्वन्तरके २७चतुर्युग बीत चुके हैं । इस समय अट्ठाईसवें चतुर्युगके कलियुगका संध्याकाल चल रहा है ( सूर्यसिद्धान्त, मध्यमाधिकार, श्लोक १५ से २४ देखिये ) । इस २०१३ वि० तक कलियुगके ५०५७ वर्ष बीते हैं । कलियुगके आरम्भमें ३६,००० वर्ष संध्याकालका मान होता है । इस हिसाबसे अभी कलियुगकी संध्याके ३०, ९ ४३ सौर वर्ष बीतने बाकी हैं । प्रत्येक मन्वन्तरमें धर्मकी व्यवस्था और लोकरक्षणके लिये भिन्न- भिन्न सप्तर्षि होते हैं । एक मन्वन्तरके बीत जानेपर जब मनु बदल जाते हैं, तब उन्हींके साथ सप्तर्षि, देवता, इन्द्र और मनुपुत्र भी बदल जाते हैं । वर्तमान कल्पके मनुओंके नाम ये हैं - स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इन्द्रसावर्णि । श्रीमद्भातावतके आठवें स्कन्दके पहले, पाँचवें और तेरहवें अध्यायोंमें इनका विस्तारसे वर्णन पढ़ना चाहिये । विभिन्न पुराणोंमें इनके नामभेद मिलते हैं । यहाँ ये नाम श्रीमद्भागवतके अनुसार दिये गये हैं । चौदह मनुओंका एक कल्प बीत जानेपर सब मनु भी बदल जाते हैं । 3. ये सभी भगवान्‌में श्रद्धा और प्रेम रखनेवाले हैं, यही भाव दिखलानेके लिये इनको मुझमें भाववाले बतलाया गया है तथा इनकी जो ब्रह्माजीसे उत्पत्ति होती है, वह वस्तुतः भगवान्से ही होती है; क्योंकि स्वयं भगवान् ही जगत्की रचनाके लिये ब्रह्माका रूप धारण करते हैं । अतएव ब्रह्माके मनसे उत्पन्न होनेवालोंको भगवान् ‘ अपने मनसे उत्पन्न होनेवाले ' कहें तो इसमें कोई विरोधकी बात नहीं है । २. भगवान्की जो अनन्यभक्ति है ( गीता ११।५५ ), जिसे ' अव्यभिचारिणी भक्ति' ( गीता १३ | १० ) और ‘ अव्यभिचारी भक्तियोग' ( गीता १४ । २६ ) भी कहते हैं; उस ' अविचल भक्तियोग' का वाचक यहाँ ‘ अविकम्पेन' विशेषणके सहित ' योगेन ' पद है और उसमें संलग्न रहना ही उससे युक्त हो जाना है । ३. इसी अध्यायके चौथे, पाँचवें और छठे श्लोकोंमें भगवान्ने जिन बुद्धि आदि भावोंको और महर्षि आदिको अपनेसे उत्पन्न बतलाया है तथा गीताके सातवें अध्यायमें ' जलमें मैं रस हूँ ' ( ७८ ) एवं नवें अध्यायमें ‘ क्रतु मैं हूँ', यज्ञ मैं हूँ ' ( ९ ।१६ ) इत्यादि वाक्योंसे जिन- जिन पदार्थोंका, भावोंका और देवता आदिका वर्णन किया है - उन सबका वाचक ' विभूति' शब्द है । ४. भगवान्की जो अलौकिक शक्ति है, जिसे देवता और महर्षिगण भी पूर्णरूपसे नहीं जानते ( गीता १०।२, ३ ); जिसके कारण स्वयं सात्त्विक, राजस और तामस भावोंके अभिन्न- निमित्तोपादान कारण होनेपर भी भगवान् सदा उनसे न्यारे बने रहते हैं और यह कहा जाता है कि ' न तो वे भाव भगवान्में हैं और न भगवान् ही उनमें हैं' ( गीता ७/१२ ); जिस शक्तिसे सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार आदि समस्त कर्म करते हुए भगवान् सम्पूर्ण जगत्‌को नियममें चलाते हैं; जिसके कारण वे समस्त लोकोंके महान् ईश्वर, समस्त भूतोंके सुहृद्, समस्त यज्ञादिके भोक्ता, सर्वाधार और सर्वशक्तिमान् हैं; जिस शक्तिसे भगवान् इस समस्त जगत्को अपने एक अंशमें धारण किये हुए हैं ( गीता १०।४२ ) और युग- युगमें अपने इच्छानुसार विभिन्न कार्योंके लिये अनेक रूप धारण करते हैं तथा सब कुछ करते हुए भी समस्त कर्मोंसे,

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महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1516 का मूल पृष्ठ
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सम्पूर्ण जगत्से एवं जन्मादि समस्त विकारोंसे सर्वथा निर्लेप रहते हैं और गीताके नवम अध्यायके पाँचवें

श्लोकमें जिसको ‘ ऐश्वर्य योग' कहा गया है— उस अद्भुत शक्ति (प्रभाव ) का वाचक यहाँ ' योग ' शब्द है ।

५. इस प्रकार समस्त जगत् भगवान्‌की ही रचना है और सब उन्हींके एक अंशमें स्थित हैं । इसलिये जगत्में जो भी वस्तु शक्तिसम्पन्न प्रतीत हो, जहाँ भी कुछ विशेषता दिखलायी दे, उसे – अथवा समस्त जगत्‌को ही भगवान्की विभूति अर्थात् उन्हींका स्वरूप समझना एवं उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्‌को समस्त जगत्के कर्ता- हर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वेश्वर, सर्वाधार, परम दयालु, सबके सुहृद् और सर्वान्तर्यामी मानना —यही ‘ भगवान्की विभूति और योगको तत्त्वसे जानना ' है । 3. भगवान्‌के ही योगबलसे यह सृष्टिचक्र चल रहा है; उन्हींकी शासन - शक्तिसे सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और पृथ्वी आदि नियम- पूर्वक घूम रहे हैं; उन्हींके शासनसे समस्त प्राणी अपने - अपने कर्मानुसार अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म धारण करके अपने - अपने कर्मोंका फल भोग:हैं - इस प्रकारसे भगवान्‌को सबका नियन्ता और प्रवर्तक समझना ही ' सम्पूर्ण जगत् भगवान्से चेष्टा करता है ' यह समझना है । २. उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्‌को सम्पूर्ण जगत्‌का कर्ता, हर्ता और प्रवर्तक समझकर अगले श्लोकमें कहे हुए प्रकारसे अतिशय श्रद्धा और प्रेमपूर्वक मन, बुद्धि और समस्त इन्द्रियोंद्वारा निरन्तर भगवान्का स्मरण और सेवन करना ही भगवान्‌को निरन्तर भजना है । ३. भगवान्‌को ही अपना परम प्रेमी, परम सुहृद्, परम आत्मीय, परम गति और परम प्रिय समझनेके कारण जिनका चित्त अनन्यभावसे भगवान्‌में लगा हुआ है ( गीता ८।१४; ९ ।२२ ) । भगवान्‌के सिवा किसी भी वस्तुमें जिनकी प्रीति, आसक्ति या रमणीय बुद्धि नहीं है; जो सदा- सर्वदा ही भगवान्‌के नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपका चिन्तन करते रहते हैं और ` शास्त्रविधिके अनुसार कर्म करते हुए उठते-बैठते, सोते-जागते, चलते- फिरते, खाते- पीते, व्यवहारकालमें और ध्यानकालमें कभी क्षणमात्र भी भगवान्को नहीं भूलते, ऐसे नित्य- निरन्तर चिन्तन करनेवाले भक्तोंके लिये ही यहाँ भगवान्ने ' मच्चित्ताः ’ विशेषणका प्रयोग किया है । ४. जिनका जीवन और इन्द्रियोंकी समस्त चेष्टाएँ केवल भगवान्‌के ही लिये हैं; जिनको क्षणमात्रका भी भगवान्‌का वियोग असह्य है; जो भगवान्‌के लिये ही प्राण धारण करते हैं; खाना- पीना, चलना- फिरना, सोना- जागना आदि जितनी भी चेष्टाएँ हैं, उन सबमें जिनका अपना कुछ भी प्रयोजन नहीं रह गया है — जो सब कुछ भगवान्के लिये ही करते हैं, उनके लिये भगवान्ने ' मद्गतप्राणाः ' का प्रयोग किया है । ५. भगवान्‌में श्रद्धा - भक्ति रखनेवाले प्रेमी भक्तोंका जो अपने - अपने अनुभवके अनुसार भगवान्के गुण, प्रभाव, तत्त्व, लीला, माहात्म्य और रहस्यको परस्पर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे समझानेकी चेष्टा करना है —यही परस्पर भगवान्का बोध कराना है । ६. श्रद्धा - भक्तिपूर्वक भगवान्के नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपका कीर्तन और गायन करना तथा कथा- व्याख्यानादिद्वारा लोगोंमें प्रचार करना और उनकी स्तुति करना आदि सब भगवान्‌का कथन करना है । ७. प्रत्येक क्रिया करते हुए निरन्तर परम आनन्दका अनुभव करना ही 'नित्य संतुष्ट रहना' है । इस प्रकार संतुष्ट रहनेवाले भक्तकी शान्ति, आनन्द और संतोषका कारण केवल भगवान्‌के नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूप आदिका श्रवण, मनन और कीर्तन तथा पठन- पाठन आदि ही होता है । सांसारिक वस्तुओंसे उसके आनन्द और संतोषका कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता । ८. भगवान्के नाम, गुण, प्रभाव, लीला, स्वरूप, तत्त्व और रहस्यका यथायोग्य श्रवण, मनन और कीर्तन करते हुए एवं उनकी रुचि, आज्ञा और संकेतके अनुसार केवल उनमें प्रेम होनेके लिये ही प्रत्येक क्रिया करते हुए, मनके द्वारा उनको सदा- सर्वदा प्रत्यक्षवत् अपने पास समझकर निरन्तर प्रेमपूर्वक उनके दर्शन, स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप आदि क्रीड़ा करते रहना - यही भगवान्‌में निरन्तर रमण करना है । 3. इससे यह भाव दिखलाया है कि पूर्वश्लोकमें भगवान्‌के जिन भक्तोंका वर्णन हुआ है, वे भोगोंकी कामनाके लिये भगवान्‌को भजनेवाले नहीं हैं, किंतु किसी प्रकारका भी फल न चाहकर केवल निष्काम अनन्य प्रेमभावपूर्वक ही भगवान्का, उस श्लोकमें कहे हुए प्रकारसे, निरन्तर भजन करनेवाले हैं । २. भगवान्का जो भक्तोंके अन्तःकरणमें अपने प्रभाव और महत्त्वादिके रहस्यसहित निर्गुण-निराकार तत्त्वको तथा लीला, रहस्य, महत्त्व और प्रभाव आदिके सहित सगुण-निराकार और साकार तत्त्वको यथार्थरूपसे समझनेकी शक्ति प्रदान करना है - वही ' बुद्धि ( तत्त्वज्ञानरूप) योगका प्रदान करना' है ।

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३. पूर्वश्लोकमें जिसे बुद्धियोग कहा गया है; जिसके द्वारा प्रभाव और महिमा आदिके सहित निर्गुण-निराकारतत्त्वका तथा लीला, रहस्य, महत्त्व और प्रभाव आदिके सहित सगुण- निराकार और साकारतत्त्वका स्वरूप भलीभाँति जाना जाता है, ऐसे संशय, विपर्यय आदि दोषोंसे रहित ' दिव्य बोध ' का वाचक यहाँ ' भास्वता' विशेषणके सहित 'ज्ञानदीपेन ' पद है । ४. अनादिसिद्ध अज्ञानसे उत्पन्न जो आवरणशक्ति है— जिसके कारण मनुष्य भगवान्‌के गुण, प्रभाव और स्वरूपको यथार्थ नहीं जानता - उसको यहाँ ' अज्ञानजनित अन्धकार' कहा है । ' उसे मैं भक्तोंके अन्तःकरणमें स्थित हुआ नष्ट कर देता हूँ' भगवान्‌के इस कथनका अभिप्राय यह है कि मैं सबके हृदयदेशमें अन्तर्यामीरूपसे सदा - सर्वदा स्थित रहता हूँ, तो भी लोग मुझे अपनेमें स्थित नहीं मानते; इसी कारण मैं उनका अज्ञानजनित अन्धकार नाश नहीं कर सकता । परंतु मेरे प्रेमी भक्त मुझे अपना अन्तर्यामी समझते हुए पूर्वश्लोकोंमें कहे हुए प्रकारसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं, इस कारण उनके अज्ञानजनित अन्धकारका मैं सहज ही नाश कर देता हूँ। ५. ऋषीत्येष गतौ धातुः श्रुतौ सत्ये तपस्यथ । एतत् संनियतं यस्मिन् ब्रह्मणा स ऋषिः स्मृतः ॥ गर्त्यर्थादृषतेर्धातोर्नामनिर्वृत्तिरादितः । यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋषिता स्मृता ॥ (वायुपुराण ५ ९ ।७९, ८१ ) 'ऋष् ' धातु गमन ( ज्ञान ), श्रवण, सत्य और तप- इन अर्थोंमें प्रयुक्त होता है । ये सब बातें जिसके अंदर एक साथ निश्चित- रूपसे हों, उसीका नाम ब्रह्माने 'ऋषि' रखा है । गत्यर्थक 'ऋष' धातुसे ही 'ऋषि' शब्दकी निष्पत्ति हुई है और आदिकालमें चूँकि यह ऋषिवर्ग स्वयं उत्पन्न होता है, इसीलिये इसकी ‘ ऋषि’ संज्ञा है । ' 3. इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि जिस निर्गुण परमात्माको ' परम ब्रह्म ' कहते हैं, वे आपके ही स्वरूप हैं तथा आपका जो नित्यधाम है, वह भी सच्चिदानन्दमय दिव्य और आपसे अभिन्न होनेके कारण आपका ही स्वरूप है तथा आपके नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपोंके श्रवण, मनन और कीर्तन आदि सबको सर्वथा परम पवित्र करनेवाले हैं; इसलिये आप ‘ परम पवित्र ' हैं । २. यहाँ ‘ ऋषिगण' शब्दसे मार्कण्डेय, अंगिरा आदि समस्त ऋषियोंको समझना चाहिये । अपनी मान्यताके समर्थनमें अर्जुन उनके कथनका प्रमाण दे रहे हैं । अभिप्राय यह है कि वे लोग आपको सनातन —नित्य एकरस रहनेवाले, क्षय- विनाशरहित, दिव्य - स्वतः प्रकाश और ज्ञानस्वरूप, सबके आदिदेव तथा अजन्मा — उत्पत्तिरूप विकारसे रहित और सर्वव्यापी बतलाते हैं । अतः आप ' परम ब्रह्म ’, ‘ परम धाम ’ और ' परम पवित्र ' हैं— इसमें कुछ भी संदेह नहीं है । परम सत्यवादी धर्ममूर्ति पितामह भीष्मजीने भी दुर्योधनको भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव बतलाते हुए कहा है — ‘ भगवान् वासुदेव सब देवताओंके देवता और सबसे श्रेष्ठ हैं; ये ही धर्म हैं, धर्मज्ञ हैं, वरद हैं, सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं और ये ही कर्ता, कर्म और स्वयंप्रभु हैं । भूत, भविष्यत्, वर्तमान, संध्या, दिशाएँ, आकाश और सब नियमोंको इन्हीं जनार्दनने रचा है। इन महात्मा अविनाशी प्रभुने ऋषि, तप और जगत्की सृष्टि करनेवाले प्रजापतिको रचा । सब प्राणियोंके अग्रज संकर्षणको भी इन्होंने ही रचा । लोक जिनको ‘ अनन्त' कहते हैं और जिन्होंने पहाड़ोसमेत सारी पृथ्वीको धारण कर रखा है, वे शेषनाग भी इन्हींसे उत्पन्न हैं; ये ही वाराह, नृसिंह और वामनका अवतार धारण करनेवाले हैं; ये ही सबके माता- पिता हैं, इनसे श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है; ये ही केशव परम तेजरूप हैं और सब लोगोंके पितामह हैं, मुनिगण इन्हें हृषीकेश कहते हैं, ये ही आचार्य, पितर और गुरु हैं । ये श्रीकृष्ण जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसे अक्षय लोककी प्राप्ति होती है। भय प्राप्त होनेपर जो इन भगवान् केशवके शरण जाता है और इनकी स्तुति करता है, वह मनुष्य परम सुखको प्राप्त होता है । जो लोग भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें चले जाते हैं, वे कभी मोहको नहीं प्राप्त होते । महान् भय ( संकट ) में डूबे हुए लोगोंकी भी भगवान् जनार्दन नित्य रक्षा करते हैं । '

( महा०, भीष्म० अ० ६७ ) ।

३. देवर्षिके लक्षण ये हैं- । देवलोकप्रतिष्ठाश्च ज्ञेया देवर्षयः शुभाः ॥

देवर्षयस्तथान्ये च तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् । भूतभव्यभवज्ज्ञानं सत्याभिव्याहृतं तथा ॥ सम्बुद्धास्तु स्वयं ये तु सम्बद्धा ये च वै स्वयम् । तपसेह प्रसिद्धा ये गर्भे यैश्च प्रणोदितम् ॥

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मन्त्रव्याहारिणो ये च ऐश्वर्यात् सर्वगाश्च ये । इत्येते ऋषिभिर्युक्ता देवद्विजनृपास्तु ये ॥ (वायुपुराण ६१।८८, ९ ०, ९ १, ९ २ ) ‘ जिनका देवलोकमें निवास है, उन्हें शुभ देवर्षि समझना चाहिये । इनके सिवा वैसे ही जो दूसरे और भी देवर्षि हैं, उनके लक्षण कहता हूँ । भूत, भविष्यत् और वर्तमानका ज्ञान होना तथा सब प्रकारसे सत्य बोलना - देवर्षिका लक्षण है । जो स्वयं भलीभाँति ज्ञानको प्राप्त हैं तथा जो स्वयं अपनी इच्छासे ही संसारसे सम्बद्ध हैं, जो अपनी तपस्याके कारण इस संसारमें विख्यात हैं, जिन्होंने ( प्रह्लादादिको ) गर्भमें ही उपदेश दिया है, जो मन्त्रोंके वक्ता हैं और ऐश्वर्य ( सिद्धियों ) के बलसे सर्वत्र सब लोकोंमें बिना किसी बाधाके जा- आ सकते हैं और जो सदा ऋषियोंसे घिरे रहते हैं, वे देवता, ब्राह्मण और राजा- ये सभी देवर्षि हैं । ' देवर्षि अनेकों हैं, जिनमें से कुछके नाम ये हैं— देवर्षी धर्मपुत्रौ तु नरनारायणाचुभौ । बालखिल्याः क्रतोः पुत्राः कर्दमः पुलहस्य तु ॥ पर्वतो नारदश्चैव कश्यपस्यात्मजावुभौ । ऋषन्ति देवान् यस्मात्ते तस्माद् देवर्षयः स्मृताः ॥ (वायुपुराण ६१।८३, ८४, ८५ ) ' धर्मके दोनों पुत्र नर और नारायण, क्रतुके पुत्र बालखिल्य ऋषि, पुलहके कर्दम, पर्वत और नारद तथा कश्यपके दोनों ब्रह्मवादी पुत्र असित और वत्सल – ये चूँकि देवताओंको अधीन रख सकते हैं, इसलिये इन्हें ' देवर्षि' कहते हैं । ' १. देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास – ये चारों ही भगवान्‌के यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले, उनके महान् प्रेमी भक्त और परम ज्ञानी महर्षि हैं । ये अपने कालके बहुत ही सम्मान्य तथा महान् सत्यवादी महापुरुष माने जाते हैं, इसीसे इनके नाम खास तौरपर गिनाये गये हैं और भगवान्की महिमा तो ये नित्य ही गाया करते हैं । इनके जीवनका प्रधान कार्य है भगवान्‌की महिमाका ही विस्तार करना । महाभारतमें भी इनके तथा अन्यान्य ऋषि-महर्षियोंके भगवान्‌की महिमा गानेके कई प्रसंग आये हैं । २. इस कथनसे अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि केवल उपर्युक्त ऋषिलोग ही कहते हैं, यह बात नहीं है; स्वयं आप भी मुझसे अपने अतुलनीय प्रभावकी बातें इस समय भी कह रहे हैं ( गीता ४।६ से ९ तक; ५ । २ ९; ७।७ से १२ तक; ९ ।४ से ११ और १६ से १ ९ तक; तथा १०।२, ३, ८) । अतः मैं जो आपको साक्षात् परमेश्वर समझता हूँ, यह ठीक ही है । ३. ब्रह्मा, विष्णु और महेश– इन तीनों शक्तियोंको क्रमशः ' क', ' अ' और ' ईश ' ( केश) कहते हैं और ये तीनों जिसके वपु यानी स्वरूप हों, उसे ' केशव' कहते हैं । ४. गीताके चौथे अध्यायके आरम्भसे लेकर इस अध्यायके ग्यारहवें श्लोकतक भगवान्ने जो अपने गुण, प्रभाव, स्वरूप, महिमा, रहस्य और ऐश्वर्य आदिकी बातें कही हैं, जिनसे श्रीकृष्णका अपनेको साक्षात् परमेश्वर स्वीकार करना सिद्ध होता है - उन समस्त वचनोंका संकेत करनेवाले 'एतत्' और ' यत्र' पद हैं तथा भगवान् श्रीकृष्णको समस्त जगत्के हर्ता, कर्ता, सर्वाधार, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके आदि, सबके नियन्ता, सर्वान्तर्यामी, देवोंके भी देव, सच्चिदानन्दघन, साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा समझना और उनके उपदेशको सत्य मानना तथा उसमें किंचिन्मात्र भी संदेह न करना ' उन सब वचनोंको सत्य मानना ’ है । ५. विष्णुपुराणमें कहा है—

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥

(६।५।७४ ) ‘ सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री, सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण वैरण्य- इन छहोंका नाम ‘ भग ' है । ये सब जिसमें हों, उसे भगवान् कहते हैं । ' वहीं यह भी कहा है— उत्पत्तिं प्रलयं चैवं भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥ (६|५| ७८ ) ‘ उत्पत्ति और प्रलयको भूतोंके आने और जानेको तथा विद्या और अविद्याको जो जानता है, उसे ‘ भगवान्’ कहना चाहिये। ' अतएव यहाँ अर्जुन श्रीकृष्णको ' भगवन्' सम्बोधन देकर यह भाव दिखलाते हैं कि आप सर्वैश्वर्यसम्पन्न और सर्वज्ञ, साक्षात् परमेश्वर हैं— इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ।

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६. जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेके लिये, धर्मकी स्थापना और भक्तोंको दर्शन देकर उनका उद्धार करनेके लिये, देवताओंका संरक्षण और राक्षसोंका संहार करनेके लिये एवं अन्यान्य कारणोंसे भगवान् भिन्न - भिन्न लीलामय स्वरूप धारण किया करते हैं । उन सबको देवता और दानव नहीं जानते— यह कहकर अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि मायासे नाना रूप धारण करनेकी शक्ति रखनेवाले दानवलोग तथा इन्द्रियातीत विषयोंका प्रत्यक्ष करनेवाले देवतालोग भी आपके उन लीलामय रूपोंको, उनके धारण करनेकी दिव्य शक्ति और युक्तिको, उनके निमित्तको और उनकी लीलाओंके रहस्यको नहीं जान सकते; फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ७. यहाँ अर्जुनने इन पाँच सम्बोधनोंका प्रयोग करके यह भाव दिखलाया है कि आप समस्त जगत्को उत्पन्न करनेवाले, सबके नियन्ता, सबके पूजनीय, सबका पालन- पोषण करनेवाले तथा ' अपरा ' और ‘ परा’ प्रकृति नामक जो क्षर और अक्षर पुरुष हैं, उनसे उत्तम साक्षात् पुरुषोत्तम भगवान् हैं । ८. इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आप समस्त जगत्के आदि हैं, आपके गुण, प्रभाव, लीला, माहात्म्य और रूप आदि अपरिमित हैं - इस कारण आपके गुण, प्रभाव, लीला, माहात्म्य, रहस्य और स्वरूप आदिको कोई भी दूसरा पुरुष पूर्णतया नहीं जान सकता, स्वयं आप ही अपने प्रभाव आदिको जानते हैं । १. किन- किन पदार्थोंमें किस प्रकारसे निरन्तर चिन्तन करके सहज ही भगवान्‌के गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको समझा जा सकता है - इसके सम्बन्धमें अर्जुन पूछ रहे हैं । २. सभी मनुष्य अपनी- अपनी इच्छित वस्तुओंके लिये जिससे याचना करें, उसे 'जनार्दन ' कहते हैं । ३. इससे अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि आपके वचनोंमें ऐसी माधुरी भरी है, उनसे आनन्दकी वह सुधाधारा बह रही है, जिसका पान करते - करते मन कभी अघाता ही नहीं । इस दिव्य अमृतका जितना ही पान किया जाता है, उतनी ही उसकी प्यास बढ़ती जा रही है । मन करता है कि यह अमृतमय रस निरन्तर ही पीता रहूँ । ४. जब सारा जगत् भगवान्‌का स्वरूप है, तब साधारणतया तो सभी वस्तुएँ उन्हींकी विभूति हैं; परंतु वे सब- के - सब दिव्य विभूति नहीं हैं । दिव्य विभूति उन्हीं वस्तुओं या प्राणियोंको समझना चाहिये, जिनमें भगवान्‌के तेज, बल, विद्या, ऐश्वर्य, कान्ति और शक्ति आदिका विशेष विकास हो । भगवान् यहाँ ऐसी ही विभूतियोंके लिये कहते हैं कि मेरी ऐसी विभूतियाँ अनन्त हैं, अतएव सबका तो पूरा वर्णन हो ही नहीं सकता; उनमेंसे जो प्रधान- प्रधान हैं, यहाँ मैं उन्हींका वर्णन करूँगा । विश्वमें अनन्त पदार्थों, भावों और विभिन्नजातीय प्राणियोंका विस्तार है । इन सबका यथाविधि नियन्त्रण और संचालन करनेके लिये जगत्स्रष्टा भगवान्‌के अटल नियमके द्वारा विभिन्नजातीय पदार्थों, भावों और जीवोंके विभिन्न समष्टि- विभाग कर दिये गये हैं और उन सबका ठीक नियमानुसार सृजन, पालन तथा संहारका कार्य चलता रहे - इसके लिये प्रत्येक समष्टि -विभागके अधिकारी नियुक्त हैं । रुद्र, वसु आदित्य, इन्द्र, साध्य, विश्वेदेव, मरुत्, पितृदेव, मनु और सप्तर्षि आदि इन्हीं अधिकारियोंकी विभिन्न संज्ञाएँ हैं । इनके मूर्त और अमूर्त दोनों ही रूप माने गये हैं । ये सभी भगवान्की विभूतियाँ हैं ।

सर्वे च देवा मनवः समस्ताः सप्तर्षयो ये `मनुसूनवश्च ।

इन्द्रश्च योऽयं त्रिदशेशभूतो विष्णोरशेषास्तु विभूतयस्ताः ॥

( श्रीविष्णुपुराण ३।१।४६ ) ‘ सभी देवता, समस्त मनु, सप्तर्षि तथा जो मनुके पुत्र हैं और जो ये देवताओंके अधिपति इन्द्र हैं — ये सभी भगवान् विष्णुकी ही विभूतियाँ हैं। ' ५. ‘ गुडाका' निद्राको कहते हैं । उसके स्वामीको ' गुडाकेश ' कहते हैं । भगवान् अर्जुनको ‘ गुडाकेश’ नामसे सम्बोधित करके यह भाव दिखलाते हैं कि तुम निद्रापर विजय प्राप्त कर चुके हो; अतएव मेरे उपदेशको धारण करके अज्ञाननिद्राको भी जीत सकते हो । 3. समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित जो ' चेतन ' है, जिसको परा 'प्रकृति' और ' क्षेत्रज्ञ' भी कहते हैं ( गीता ७।५; १३।१ ), उसीको यहाँ ' सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा' बतलाया है । वह भगवान्का ही अंश होनेके कारण ( गीता १५/७ ) वस्तुतः भगवत्स्वरूप ही है ( गीता १३ । २ ) । इसीलिये भगवान्ने कहा है कि ' वह आत्मा मैं हूँ। '

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२. यहाँ ‘ भूत' शब्दसे चराचर समस्त देहधारी प्राणी समझने चाहिये । ये सब प्राणी भगवान्से ही उत्पन्न होते हैं, उन्हींमें स्थित हैं और प्रलयकालमें भी उन्हींमें लीन होते हैं; भगवान् ही सबके मूल कारण और आधार हैं — यही भाव दिखलानेके लिये भगवान्‌ने अपनेको उन सबका आदि, मध्य और अन्त बतलाया है । ३. अदितिके धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु नामक बारह पुत्रोंको द्वादश आदित्य कहते हैं—

धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ॥

एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते । जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः ॥ ( महा०, आदि० ६५।१५-१६) इनमें जो विष्णु हैं, वे इन सबके राजा हैं और अन्य सबसे श्रेष्ठ हैं । इसीलिये भगवान्ने विष्णुको अपना स्वरूप बतलाया है । ४. सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि आदि जितने भी प्रकाशमान पदार्थ हैं, उन सबमें सूर्य प्रधान हैं; इसलिये भगवान्ने समस्त ज्योतियोंमें सूर्यको अपना स्वरूप बतलाया है । ५. उनचास मरुतोंके नाम ये हैं-' सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यग्ज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्, हरित, ऋतजित् सत्यजित्, सुषेण, सेनजित्, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधारय, ध्वान्त, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक्, अन्यादृक्, यादृक्, प्रतिकृत्, ऋक्, समिति, संरम्भ, ईदृक्ष, पुरुष, अन्यादृक्ष, चेतस, समिता, समिदृक्ष, प्रतिदृक्ष, मरुति, सरत, देव, दिश, यजुः, अनुदृक्, साम, मानुष और विश् ( वायुपुराण ६७ । १२३ से १३० ) । गरुडपुराण तथा अन्यान्य पुराणोंमें कुछ नामभेद पाये जाते हैं; परंतु ' मरीचि' नाम कहीं भी नहीं मिला है । इसीलिये ' मरीचि ' को मरुत् न मानकर समस्त मरुद्गणोंका तेज या किरणें माना गया है । ' दक्षकन्या मरुत्वतीसे उत्पन्न पुत्रोंको भी मरुद्गण कहते हैं ( हरिवंश) । भिन्न-भिन्न मन्वन्तरोंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे तथा विभिन्न प्रकारसे इनकी उत्पत्तिके वर्णन पुराणोंमें मिलते हैं । दितिपुत्र उनचास मरुद्गण दिति देवीके भगवद्ध्यानरूप व्रतके तेजसे उत्पन्न हैं । उस तेजके ही कारण इनका गर्भमें विनाश नहीं हो सका था । इसलिये उनके इस तेजको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है । ६. अश्विनी, भरणी और कृतिका आदि जो सत्ताईस नक्षत्र हैं, उन सबके स्वामी और सम्पूर्ण तारा-मण्डलके राजा होनेसे चन्द्रमा भगवान्‌की प्रधान विभूति हैं । इसलिये यहाँ उनको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है । ७. ऋक्, यजुः, साम और अथर्व– इन चारों वेदोंमें सामवेद अत्यन्त मधुर संगीतमय तथा परमेश्वरकी अत्यन्त रमणीय स्तुतियोंसे युक्त है; अतः वेदोंमें उसकी प्रधानता है । इसलिये भगवान्‌ने उसको अपना स्वरूप बतलाया है । ८. समस्त प्राणियोंकी जो ज्ञानशक्ति है, जिसके द्वारा उनको दुःख सुखका और समस्त पदार्थोंका अनुभव होता है, जो अन्तःकरणकी वृत्तिविशेष है, गीताके तेरहवें अध्यायके छठे श्लोकमें जिसकी गणना क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है, उस ज्ञान- शक्तिका नाम 'चेतना' है । यह प्राणियोंके समस्त अनुभवोंकी हेतुभूता प्रधान शक्ति है, इसलिये इसको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है । 3. हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली — ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं—

हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः । वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा ॥

मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशाम्पते । एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः ॥

(हरिवंश० १।३।५१, ५२ ) इनमें शम्भु अर्थात् शंकर सबके अधीश्वर ( राजा) हैं तथा कल्याणप्रदाता और कल्याणस्वरूप हैं । इसलिये उन्हें भगवान्ने अपना स्वरूप कहा है । २. धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास - इन आठोंको वसु कहते हैं— धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ ( महा०, आदि० ६६।१८ )