03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1571–1580
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1571–1580
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वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारोंवाला है और जिस कारणसे जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है - वह सब संक्षेपमें मुझसे सुन ॥ ३ ॥
सम्बन्ध—तीसरे श्लोकमें ' क्षेत्र' और ' क्षेत्रज्ञ' के जिस तत्त्वको संक्षेपमें सुननेके लिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा है- अब उसके विषयमें ऋषि, वेद और ब्रह्म-सूत्रकी उक्तिका प्रमाण देकर भगवान्ऋषि, वेद और ब्रह्मसूत्रको आदर देते हैं— ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ॥ ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ऋषियोंद्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और विविध वेदमन्त्रोंद्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है ॥
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणिद शैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥५
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी; तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियोंके विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध— ॥ ५ ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना और धृति —इस प्रकार विकारोंके सहित यह क्षेत्र संक्षेपमें कहा गया? ॥ ६ ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार क्षेत्रके स्वरूप और उसके विकारोंका वर्णन करनेके बाद अब जो दूसरे श्लोकमें यह बात कही थी कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतसे ज्ञान है -उस ज्ञानको प्राप्त करनेके साधनोंका ‘ज्ञान' के ही नामसे पाँच श्लोकोंद्वारा वर्णन करते हैं-
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा१ २ १३ क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥
श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन- वाणी आदिकी सरलता, श्रद्धा- भक्तिसहित गुरुकी सेवा, बाहर- भीतरकी शुद्धि, अन्तःकरणकी स्थिरता और मन- इन्द्रियों सहित शरीरका निग्रहँ ॥ ७ ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार ९ एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥
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इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अहंकारका भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदिमें दुःख और दोषोंका बार- बार विचार करना ॥
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चार अवस्था जन्म व्याधि मृत्यु जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ( गीता १३।८ )
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असक्तिरनभिष्वङ्गः१२ पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु३ ॥ ९ ॥
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव, ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना ॥ ९ ॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि४ ५ ॥ १० ॥
मुझ परमेश्वरमें अनन्य योगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना ॥ १० ॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥
अध्यात्मज्ञानमें नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना – यह सब ज्ञान है? और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है - ऐसा कहा है ॥ ११ ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार ज्ञानके साधनोंका 'ज्ञान' के नामसे वर्णन सुननेपर यह जिज्ञासा हो सकती है कि इन साधनोंद्वारा प्राप्त 'ज्ञान' से जाननेयोग्य वस्तु क्या है और उसे जान लेनेसे क्या होता है । उसका उत्तर देनेके लिये भगवान् अब जाननेके योग्य वस्तुके स्वरूपका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसके जाननेका फल ‘ अमरत्वकी प्राप्ति’ बतलाकर छः श्लोकोंमें जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं—
ज्ञेयं यत् तत् प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत् परं ब्रह्म न सत् तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥
जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्दको प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा । वह अनादिवाला परम ब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही ॥ १२ ॥
सर्वतःपाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥१
वह सब ओर हाथ- पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ १३ ॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥
वह सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है, परंतु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित है º तथा आसक्ति- रहित होनेपर भी सबका धारण -पोषण करनेवाला और निर्गुण होनेपर भी
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गुणोंको भोगनेवाला है ॥ १४ ॥
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥६
वह चराचर सब भूतोंके बाहर - भीतर परिपूर्ण है और चर - अचररूप भी वही है एवं वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है' तथा अति समीपमें और दूरमें भी स्थित वही है ॥ १५ ॥
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥
वह परमात्मा विभागरहित एक रूपसे आकाशके सदृश परिपूर्ण होनेपर भी चराचर सम्पूर्ण भूतोंमें विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है तथा वह जाननेयोग्य परमात्मा विष्णुरूपसे भूतोंको धारण- पोषण करनेवाला और रुद्ररूपसे संहार करनेवाला तथा ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करनेवाला है ॥ १६ ॥
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
वह परब्रह्म ज्योतियोंका भी ज्योति एवं मायासे अत्यन्त परे कहा जाता है । वह परमात्मा बोधस्वरूप, जाननेके योग्य एवं तत्त्वज्ञानसे प्राप्त करनेयोग्य है और सबके हृदयमें विशेषरूपसे स्थित है ॥ १७ ॥
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद् विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥
इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और जाननेयोग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेपसे कहा गया ।
मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है ॥ १८ ॥
सम्बन्ध— इस अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रके विषयमें चार बातें और क्षेत्रज्ञके विषयमें दो बातें संक्षेपमें सुननेके लिये अर्जुनसे कहा था, फिर विषय आरम्भ करते ही क्षेत्रके स्वरूपका और उसके विकारोंका वर्णन करनेके अनन्तर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके तत्त्वको भलीभाँति जाननेके उपायभूत साधनोंका और जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन प्रसंगवश किया गया । इससे क्षेत्रके विषयमें उसके स्वभावका और किस कारणसे कौन कार्य उत्पन्न होता है, इस विषयका तथा प्रभावसहित क्षेत्रज्ञके स्वरूपका भी वर्णन नहींहुआ। अतः अब उन सबका वर्णन करनेके लिये भगवान् पुनः प्रकृति और पुरुषके नामसे प्रकरण आरम्भ करते हैं—
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १ ९ ॥
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प्रकृति और पुरुष, इन दोनोंको ही तू अनादि जान और राग - द्वेषादि विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थोंको भी प्रकृतिसे ही उत्पन्न जान ॥ १ ९ ॥ सम्बन्ध—इस अध्यायके तीसरे श्लोकमें, जिससे जो उत्पन्न हुआ है, यह बात सुननेके लिये कहा गया था, उसका वर्णन पूर्वश्लोकके उत्तरार्द्धमें कुछ किया गया । अब उसीकी कुछ बात इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें कहते हुए इसके उत्तरार्द्धमें और इक्कीसवें श्लोकमें प्रकृतिमें स्थित पुरुषके स्वरूपका वर्णन किया जाता है—
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥
कार्य और करणको उत्पन्न करनेमें हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखोंके भोक्तापनमें अर्थात् भोगनेमें हेतु कहा जाता है ॥ २० ॥
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥
प्रकृतिमें स्थित ही पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है? और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी -बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है ॥ २१ ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार प्रकृतिस्थ पुरुषके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब जीवात्मा और परमात्माकी एकता करते हुए आत्माके गुणातीत स्वरूपका वर्णन करते हैं—
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः ॥ २२ ॥
इस देहमें स्थित यह आत्मा वास्तवमें परमात्मा ही है । वही साक्षी होनेसे उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देनेवाला होनेसे अनुमन्ता, सबका धारण - पोषण करनेवाला होनेसे भर्ता, जीवरूपसे भोक्ता, ब्रह्मा आदिका भी स्वामी होनेसे महेश्वर और शुद्ध सच्चिदा- नन्दघन होनेसे परमात्मा — ऐसा कहा गया है ४ ॥ २२ ॥
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥
इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य तत्त्वसे जानता है-“, वह सब प्रकारसे कर्तव्य - कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता° ॥ २३ ॥
सम्बन्ध— इस प्रकार गुणोंके सहित प्रकृति और पुरुषके ज्ञानका महत्त्व सुनकर यह इच्छा हो सकती है कि ऐसा ज्ञान कैसे होता है । इसलिये अब दो श्लोकोंद्वारा भिन्न-भिन्न अधिकारियोंके लिये तत्त्वज्ञानके भिन्न-भिन्न साधनोंका प्रतिपादन करते हैं- ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥
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उस परमात्माको कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिके ध्यानके द्वारा हृदयमें देखते हैं; अन्य कितने ही ज्ञानयोगके द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोगके द्वारा देखते हैं अर्थात् प्राप्त करते हैं ॥ २४ ॥
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । ± तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
परंतु इनसे दूसरे अर्थात् जो मन्दबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरोंसे अर्थात् तत्त्वके जाननेवाले पुरुषोंसे सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार- सागरको निःसंदेह तर जाते हैं ॥ २५ ॥
सम्बन्ध— इस प्रकार परमात्मसम्बन्धी तत्त्वज्ञानके भिन्न-भिन्न साधनोंका प्रतिपादन करके अब तीसरे श्लोकमें जो ‘ यादृक् पदसे क्षेत्रके स्वभावको सुननेके लिये कहा था, उसके अनुसार भगवान्दो श्लोकोंद्वारा उस क्षेत्रको उत्पत्ति-विनाशशील बतलाकर उसके स्वभावका वर्णन करते हुए आत्माके यथार्थ तत्त्वको जाननेवालेकी प्रशंसा करते हैं—
यावत् संजायते किंचित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद् विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
हे अर्जुन! जितने भी स्थावर- जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही उत्पन्न जान ॥ २६ ॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतोंमें परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है ॥ २७ ॥
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
क्योंकि जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समान देखता हुआ अपनेद्वारा अपनेको नष्ट नहीं करता, इससे वह परमगतिको प्राप्त होता है ॥ २८ ॥
सम्बन्ध— इस प्रकार नित्य विज्ञानानन्दघन आत्मतत्त्वको सर्वत्र समभावसे देखनेका महत्त्व और फल बतलाकर अब अगले श्लोकमें उसे अकर्ता देखनेवालेकी महिमा कहते हैं
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २ ९ ॥
और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही किये जाते हुए देखता है और आत्माको अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है ॥ २ ९ ॥
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यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥
जिस क्षण यह पुरुष भूतोंके पृथक् - पृथक् भावको एक परमात्मामें ही स्थित तथा उस परमात्मासे ही सम्पूर्ण भूतोंका विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ३० ॥
सम्बन्ध—इस प्रकार आत्माको सब प्राणियोंमें समभावसे स्थित, निर्विकार और अकर्ता बतलाया जानेपर यह शंका होती है कि समस्त शरीरोंमें रहता हुआ भी आत्मा उनके दोषोंसे निर्लिप्त और अकर्ता कैसे रह सकता है; इस शंकाका निवारण करनेके लिये अब भगवान्—इस अध्यायके तीसरे श्लोकमें जो ‘ यत्प्रभावश्च' पदसे क्षेत्रज्ञका प्रभाव सुननेका संकेत किया गया था, उसके अनुसार—तीन श्लोकोंद्वारा आत्माके प्रभावका वर्णन करते हैं—
अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥
हे अर्जुन! अनादि होनेसे और निर्गुण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा शरीरमें स्थित होनेपर भी वास्तवमें न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है ॥ ३१ ॥
सम्बन्ध— शरीरमें स्थित होनेपर भी आत्मा क्यों नहीं लिप्त होता? इसपर कहते हैं—
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देहमें सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होनेके कारण देहके गुणोंसे लिप्त नहीं होता' ॥ सम्बन्ध— शरीरमें स्थित होनेपर भी आत्मा कर्ता क्यों नहीं है? इसपर कहते हैं—
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥
हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता है ॥ ३३ ॥
सम्बन्ध— तीसरे श्लोकमें जिन छः बातोंको कहनेका भगवान्ने संकेत किया था, उनका वर्णन करके अब इस अध्यायमें वर्णित समस्त उपदेशको भलीभाँति समझनेका फल परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति बतलाते हुए अध्यायका उपसंहार करते हैं- क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥
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इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको तथा कार्यसहित प्रकृतिसे मुक्त होनेको जो पुरुष ज्ञाननेत्रोंद्वारा तत्त्वसे जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ भीष्मपर्वणि तु सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग नामक तेरहवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १३ ॥ भीष्मपर्वमें सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
१. जैसे खेतमें बोये हुए बीजोंका उनके अनुरूप फल समयपर प्रकट होता है, वैसे ही इस शरीरमें बोये हुए कर्म- संस्काररूप बीजोंका फल भी समयपर प्रकट होता रहता है । इसके अतिरिक्त इसका प्रतिक्षण क्षय होता रहता है, इसलिये भी इसे ' क्षेत्र ' कहते हैं और इसीलिये गीताके पंद्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें इसको ' क्षर' पुरुष कहा गया है । २. इससे भगवान्ने अन्तरात्मा द्रष्टाका लक्ष्य करवाया है । मन, बुद्धि, इन्द्रिय, महाभूत और इन्द्रियोंके विषय आदि जितना भी ज्ञेय ( जाननेमें आनेवाला) दृश्यवर्ग है— सब जड, विनाशी, परिवर्तनशील है । चेतन आत्मा उस जड दृश्यवर्गसे सर्वथा विलक्षण है । यह उसका ज्ञाता है, उसमें अनुस्यूत है और उसका अधिपति है । इसीलिये इसे ' क्षेत्रज्ञ ' कहते हैं । इसी ज्ञाता चेतन आत्माको गीताके सातवें अध्यायमें ' परा प्रकृति' ( ७५ ), आठवेंमें ' अध्यात्म ' ( ८1३ ) और पंद्रहवें अध्यायमें ‘ अक्षर पुरुष ' ( १५।१६ ) कहा गया है । यह आत्मतत्त्व बड़ा ही गहन है, इसीसे भगवान्ने भिन्न-भिन्न प्रकरणोंके द्वारा कहीं स्त्रीवाचक, कहीं नपुंसकवाचक और कहीं पुरुषवाचक नामसे इसका वर्णन किया है। वास्तवमें आत्मा विकारोंसे सर्वथा रहित, अलिंग, नित्य, निर्विकार एवं चेतन-ज्ञानस्वरूप है । ३. इससे ‘ आत्मा' और ' परमात्मा' की एकताका प्रतिपादन किया गया है । आत्मा और परमात्मामें वस्तुतः कुछ भी भेद नहीं है, प्रकृतिके संगसे भेद -सा प्रतीत होता है; इसीलिये गीताके दूसरे अध्यायके चौबीसवें और पचीसवें श्लोकोंमें आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए जिन शब्दोंका प्रयोग किया है, बारहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें निर्गुण- निराकार परमात्माके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी प्रायः उन्हींके भावोंके द्योतक शब्दोंका प्रयोग किया गया है । ४. ‘ यत्’ पदसे भगवान्ने क्षेत्रका स्वरूप बतलानेका संकेत किया है और उसे पाँचवें श्लोकमें बतलाया है । ५. ‘ यादृक् पदसे क्षेत्रका स्वभाव बतलानेका संकेत किया है और उसका वर्णन छब्बीसवें और सत्ताईसवें श्लोकोंमें समस्त भूतोंको उत्पत्ति - विनाशशील बतलाकर किया है । ६. ‘ यद्विकारि' पदसे क्षेत्रके विकारोंका वर्णन करनेका संकेत किया है और उनका वर्णन छठे श्लोकमें किया है । ७. जिन पदार्थोंके समुदायका नाम ' क्षेत्र' है, उनमें से कौन पदार्थ किससे उत्पन्न हुआ - यह बतलानेका संकेत ‘ यतः च यत्' पदोंसे किया है और उसका वर्णन उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्द्धमें तथा बीसवेंके पूर्वार्द्धमें किया गया है । ८. ‘ सः ’ पद ‘ क्षेत्रज्ञ' का वाचक है तथा ' यः ' पदसे उसका स्वरूप बतलानेका संकेत किया गया है और आगे चलकर उसके प्रकृतिस्थ एवं वास्तविक दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया गया है - जैसे उन्नीसवें श्लोकमें उसे ‘ अनादि’ बीसवेंमें ' सुख- दुःखोंका भोक्ता ' एवं इक्कीसवेंमें ' अच्छी- बुरी योनियोंमें जन्म ग्रहण करनेवाला' बतलाकर तो प्रकृतिस्थ पुरुषका स्वरूप बतलाया गया है और बाईसवेंमें तथा सत्ताईसवें से तीसवेंतक परमात्माके साथ एकता करके उसके वास्तविक स्वरूपका निरूपण किया गया है । ९. ‘ यत्प्रभावः ' से क्षेत्रज्ञका प्रभाव बतलानेके लिये संकेत किया गया है और उसे इकतीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक बतलाया गया है । 3. ‘ विविधैः ’ विशेषणके सहित 'छन्दोभिः ' पद ऋक्, यजुः, साम और अथर्व–इन चारों वेदोंके ‘ संहिता' और ' ब्राह्मण ' दोनों ही भागोंका वाचक है; समस्त उपनिषद् और भिन्न- भिन्न शाखाओंको भी इन्हींके अन्तर्गत समझ लेना
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चाहिये । २. ‘ ब्रह्मसूत्रपदैः ’ पद ‘ वेदान्तदर्शन ' के जो ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' आदि सूत्ररूप पद हैं, उन्हींका वाचक प्रतीत होता है; क्योंकि उपर्युक्त सब लक्षण उनमें ठीक -ठीक मिलते हैं । यहाँ इस कथनका यह भाव है कि श्रुति- स्मृति आदिमें वर्णित जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा युक्तिपूर्वक समझाया गया है, उसका निचोड़ भी भगवान् यहाँ संक्षेपमें कह रहे हैं । ३. मन्त्रोंके द्रष्टा एवं शास्त्र और स्मृतियोंके रचयिता ऋषिगणोंने ' क्षेत्र' और ' क्षेत्रज्ञ ' के स्वरूपको और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी बातोंको अपने - अपने ग्रन्थोंमें और पुराण- इतिहासोंमें बहुत प्रकारसे वर्णन करके विस्तारपूर्वक समझाया है; उन्हींका सार यहाँ बहुत थोड़े शब्दोंमें भगवान् कहते हैं । ४. स्थूल भूतोंके और शब्दादि विषयोंके कारणरूप जो पंचतन्मात्राएँ यानी सूक्ष्मपंचमहाभूत हैं — गीताके सातवें अध्यायके चौथे श्लोकमें जिनका ' भूमिः ', ' आपः ', ' अनलः', ' वायुः ' और ' खम्' के नामसे वर्णन हुआ है — उन्हीं पाँचोंका वाचक यहाँ ‘ महाभूतानि' पद है । ५. इसीसे मिलता- जुलता वर्णन सांख्यकारिका और योगदर्शनमें भी आता है, जैसे—
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥
( सांख्यकारिका ३ ) अर्थात् एक मूल प्रकृति है, वह किसीकी विकृति ( विकार ) नहीं है । महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धतन्मात्रा ) – ये सात प्रकृति- विकृति हैं अर्थात् ये सातों पंचभूतादिके कारण होनेसे ' प्रकृति' भी हैं और मूल प्रकृतिके कार्य होनेसे ' विकृति' भी हैं । पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय और मन– ये ग्यारह इन्द्रिय और पंचमहाभूत —ये सोलह केवल विकृति ( विकार) हैं, वे किसीकी प्रकृति अर्थात् कारण नहीं हैं । इनमें ग्यारह इन्द्रिय तो अहंकारके तथा पाँच स्थूल महाभूत पंचतन्मात्राओंके कार्य हैं; किंतु पुरुष न किसीका कारण है और न किसीका कार्य है, वह सर्वथा असंग है । योगदर्शनमें कहा है — ‘ विशेषाविशेषलिंगमात्रालिंगानि गुणपर्वाणि । ' ( २।१ ९ ) विशेष यानी पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय, एक मन और पंच स्थूल भूत; अविशेष यानी अहंकार और पंचतन्मात्राएँ; लिंगमात्र यानी महत्तत्त्व और अलिंग यानी मूल प्रकृति— ये चौबीस तत्त्व गुणोंकी अवस्थाविशेष हैं; इन्हींको ' दृश्य' कहते हैं । योगदर्शनमें जिसको ‘ दृश्य ' कहा है, उसीको गीतामें ‘ क्षेत्र ' कहा गया है । ६. यह समष्टि अन्तःकरणका एक भेद है । अहंकार ही पंचतन्मात्राओं, मन और समस्त इन्द्रियोंका कारण है तथा महत्तत्त्वका कार्य है; इसीको ' अहंभाव' भी कहते हैं । यहाँ ' अहंकार' शब्द उसीका वाचक है । ७. जिसे ‘ महत्तत्त्व ' ( महान्) और ' समष्टि बुद्धि' भी कहते हैं, जो समष्टि अन्तःकरणका एक भेद है, निश्चय ही जिसका स्वरूप है — उसको यहाँ ' बुद्धि ' कहा गया है । 3. यहाँ ‘ अव्यक्त' का अर्थ मूल प्रकृति समझना चाहिये, जो महत्तत्त्व आदि समस्त पदार्थोंकी कारणरूपा है, सांख्यशास्त्रमें जिसको ‘ प्रधान' कहते हैं, भगवान्ने गीताके चौदहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें जिसको ‘ महद्ब्रह्म ' कहा है तथा इस अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिसको ' प्रकृति' नाम दिया गया है । २. वाक्, पाणि ( हाथ ), पाद ( पैर), उपस्थ और गुदा - ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं तथा श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और घ्राण— ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । ये सब मिलकर दस इन्द्रियाँ हैं । इन सबका कारण अहंकार है । ३. यहाँ ' एक' शब्दसे उस मनको ही बतलाया गया है जो समष्टि अन्तःकरणकी मनन करनेवाली शक्तिविशेष है, संकल्प - विकल्प ही जिसका स्वरूप है । यह भी अहंकारका कार्य है । ४. यहाँ ‘ पञ्च इन्द्रियगोचराः ' पदोंका अर्थ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध समझना चाहिये, जो कि पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके स्थूल विषय हैं । ये सूक्ष्म भूतोंके कार्य हैं । ५. जिन पदार्थोंको मनुष्य सुखके हेतु और दुःखनाशक समझता है, उनको प्राप्त करनेकी जो आसक्तियुक्त कामना है –जिसके वासना, तृष्णा, आशा, लालसा और स्पृहा आदि अनेकों भेद हैं— उसीका वाचक यहाँ ' इच्छा' शब्द है । ६. जिन पदार्थोंको मनुष्य दुःखमें हेतु या सुखमें बाधक समझता है, उनमें जो विरोधबुद्धि होती है — उसका नाम ‘ द्वेष ’ है । इसके स्थूल रूप वैर, ईर्ष्या, घृणा और क्रोध आदि हैं । ७. अनुकूलकी प्राप्ति और प्रतिकूलकी निवृत्तिसे अन्तःकरणमें जो प्रसन्नताकी वृत्ति होती है, उसका नाम ‘ सुख ' है । ८. प्रतिकूलकी प्राप्ति और अनुकूलके विनाशसे जो अन्तःकरणमें व्याकुलता होती है, जिसे व्यथा भी कहते हैं— उसका वाचक ' दुःख ' है ।