03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1931–1940

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1931–1940

पृष्ठ 1931

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वीरबाहुविसृष्टानां सर्वावरणभेदिनाम् ।

संघातः शरजालानां तुमुलः समपद्यत ॥ २८ ॥

वीरोंकी भुजाओंसे छूटकर सब प्रकारके आवरणों ( कवच आदि) -का भेदन करनेवाले बाणसमूहोंके भयानक आघात सब ओर हो रहे थे ॥ २८ ॥

प्रकाशं चक्रुराकाशमुद्यतानि भुजोत्तमैः ।

नक्षत्रविमलाभानि शस्त्राणि भरतर्षभ ॥ २ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! उत्तम भुजाओंद्वारा ऊपर उठाये हुए नक्षत्रोंके समान निर्मल एवं चमकीले अस्त्र आकाशमें प्रकाश फैला रहे थे ॥ २ ९ ॥

आर्षभाणि विचित्राणि रुक्मजालावृतानि च ।

सम्पेतुर्दिक्षु सर्वासु चर्माणि भरतर्षभ ॥ ३० ॥

भरतभूषण! सोनेकी जालीसे ढकी और ऋषभ- चर्मकी बनी हुई विचित्र ढालें सम्पूर्ण दिशाओंमें गिर रही थीं ॥ ३० ॥

सूर्यवर्णैश्च निस्त्रिंशैः पात्यमानानि सर्वशः ।

दिक्षु सर्वास्वदृश्यन्त शरीराणि शिरांसि च ॥ ३१ ॥

सूर्यके समान चमकीले खड्गोंसे सब ओर काटकर गिराये जानेवाले शरीर और मस्तक सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ३१ ॥

भग्नचक्राक्षनीडाश्च निपातितमहाध्वजाः ।

हताश्वाः पृथिवीं जग्मुस्तत्र तत्र महारथाः ॥ ३२ ॥

कितने ही महारथियोंके रथोंके पहिये, धुरे और भीतरकी बैठकें टूट - फूटकर नष्ट हो गयीं, बड़ी - बड़ी ध्वजाएँ खण्डित होकर गिर गयीं, घोड़े मार दिये गये और वे महारथी स्वयं भी मारे जाकर धरतीपर जहाँ- तहाँ गिर पड़े ॥ ३२ ॥

परिपेतुर्हयाश्चात्र केचिच्छस्त्रकृतव्रणाः ।

रथान् विपरिकर्षन्तो हतेषु रथयोधिषु ॥ ३३ ॥

उस युद्धस्थलमें कितने ही घोड़े अस्त्र- शस्त्रोंके आघातसे घायल होकर अपने रथियोंके मारे जानेके बाद भी रथ खींचते हुए भागते और गिर पड़ते थे ॥ ३३ ॥

शराहता भिन्नदेहा बद्धयोक्त्रा हयोत्तमाः ।

युगानि पर्यकर्षन्त तत्र तत्र स्म भारत ॥ ३४ ॥

भारत! कितने ही उत्तम घोड़ोंके शरीर बाणोंसे आहत होकर क्षत- विक्षत हो गये थे, तो भी रथके साथ रस्सीमें बँधे हुए थे, इसलिये रथके जूओंको इधर-उधर खींचते रहते थे ॥ ३४ ॥

अदृश्यन्त ससूताश्च साश्वाः सरथयोधिनः ।

एकेन बलिना राजन् वारणेन विमर्दिताः ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 1932

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राजन्! कितने ही रथारोही युद्धस्थलमें एक ही महाबली गजराजके द्वारा घोड़ों और सारथियोंसहित कुचले हुए दिखायी पड़ते थे ॥ ३५ ॥

गन्धहस्तिमदस्रावमाघ्राय बहवो रणे ।

संनिपाते बलौघानां वीतमाददिरे गजाः ॥ ३६ ॥

समस्त सेनाओंमें भीषण मार- काट मची हुई थी और बहुत- से हाथी गन्धयुक्त गजराजके मदकी गन्ध सूँघकर उसीके भ्रमसे निर्बल हाथीको भी मार गिरानेके लिये पकड़ लेते थे ॥ ३६ ॥

सतोमरैर्महामात्रैर्निपतद्भिर्गतासुभिः ।

बभूवायोधनं छन्नं नाराचाभिहतैर्गजैः ॥ ३७ ॥

तोमरोंसहित प्राणशून्य होकर गिरे हुए महावतों और नाराचोंकी मारसे मरकर गिरनेवाले हाथियोंसे वह रणभूमि आच्छादित हो गयी थी ॥ ३७ ॥

संनिपाते बलौघानां प्रेषितैर्वरवारणैः ।

निपेतुर्युधि सम्भग्नाः सयोधाः सध्वजा गजाः ॥ ३८ ॥

सैन्यसमूहोंके उस भीषण संघर्षमें आगे बढ़ाये हुए बड़े - बड़े हाथियोंसे टकराकर युद्धमें कितने ही छोटे- छोटे हाथी अंग- भंग हो जानेके कारण सवारों और ध्वजोंसहित गिर जाते थे ॥ ३८ ॥

नागराजोपमैर्हस्तैर्नागैराक्षिप्य संयुगे ।

व्यदृश्यन्त महाराज सम्भग्ना रथकूबराः ॥ ३ ९ ॥

महाराज! उस युद्धमें कितने ही हाथियोंके द्वारा विशाल सर्पराजके समान सूँड़ोंसे खींचकर फेंके हुए रथोंके ध्वज और कूबर चूर - चूर होकर गिरते देखे जाते थे ॥

विशीर्णरथसंघाश्च केशेष्वाक्षिप्य दन्तिभिः ।

द्रुमशाखा इवाविध्य निष्पिष्टा रथिनो रणे ॥ ४० ॥

कितने ही दन्तार हाथी रथसमूहोंको तोड़- फोड़कर उनमें बैठे हुए रथियोंको उनके केश पकड़कर खींच लेते और वृक्षकी शाखाकी भाँति उन्हें घुमाकर धरतीपर दे मारते थे । इस प्रकार उस युद्धमें उन रथियोंकी धज्जियाँ उड़ जाती थीं ॥ ४० ॥

रथेषु च रथात् युद्धे संसक्तान् वरवारणाः ।

विकर्षन्तो दिशः सर्वाः सम्पेतुः सर्वशब्दगाः ॥ ४१ ॥

कितने ही बड़े - बड़े गजराज रथसमूहोंमें घुसकर युद्धमें उलझे हुए रथोंको पकड़ लेते और सब प्रकारके शब्दोंका अनुसरण करते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें उन रथोंको खींचे फिरते थे ॥ ४१ ॥

तेषां तथा कर्षतां तु गजानां रूपमाबभौ ।

सरःसु नलिनीजालं विषक्तमिव कर्षताम् ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 1933

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इस प्रकार रथोंसे रथियोंको खींचनेवाले उन हाथियोंका स्वरूप ऐसा जान पड़ता था, मानो वे तालाबमें वहाँ उगे हुए कमलोंका समूह खींच रहे हों ॥

एवं संछादितं तत्र बभूवायोधनं महत् ।

सादिभिश्च पदातैश्च सध्वजैश्च महारथैः ॥ ४३ ॥

इस तरह सवारों, पैदलों और ध्वजोंसहित महारथियोंके शरीरोंसे वह विशाल युद्धस्थल पट गया था ॥ ४३ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥

[ दाक्षिणात्य अधिक पाठका १३ श्लोक मिलाकर कुल ४४३ श्लोक हैं । ] OPIL

पृष्ठ 1934

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द्विसप्ततितमोऽध्यायः दोनों सेनाओंका परस्पर घोर युद्ध संजय उवाच

शिखण्डी सह मत्स्येन विराटेन विशाम्पते ।

भीष्ममाशु महेष्वासमाससाद सुदुर्जयम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! मत्स्यनरेश विराटके साथ मिलकर शिखण्डीने अत्यन्त दुर्जय महाधनुर्धर भीष्मपर शीघ्रतापूर्वक चढ़ाई की ॥ १ ॥

द्रोणं कृपं विकर्णं च महेष्वासं महाबलम् ।

राज्ञश्चान्यान् रणे शूरान् बहूनार्च्छद् धनंजयः ॥ २ ॥

उस समय अर्जुनने उस रणभूमिमें महाधनुर्धर एवं महाबली द्रोण, कृपाचार्य, विकर्ण तथा अन्यान्य बहुत - से शूरवीर नरेशोंको अपने बाणोंद्वारा पीड़ा पहुँचायी ॥ २ ॥

सैन्धवं च महेष्वासं सामात्यं सह बन्धुभिः ।

प्राच्यांश्च दाक्षिणात्यांश्च भूमिपान् भूमिपर्षभ ॥ ३ ॥

पुत्रं च ते महेष्वासं दुर्योधनममर्षणम् ।

दुःसहं चैव समरे भीमसेनोऽभ्यवर्तत ॥ ४ ॥

नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार मन्त्री और बन्धुओंसहित महाधनुर्धर सिंधुराज जयद्रथपर, पूर्व और दक्षिणके भूमिपालोंपर तथा आपके अमर्षशील पुत्र महाधनुर्धर दुर्योधन एवं दुःसहपर भीमसेनने आक्रमण किया ॥

सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं च महारथम् ।

पितापुत्रौ महेष्वासावभ्यवर्तत दुर्जयौ ॥ ५ ॥

सहदेवने शकुनि और महारथी उलूक- इन दोनों दुर्जय महाधनुर्धर पिता- पुत्रोंपर धावा किया ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरो महाराज गजानीकं महारथः ।

समवर्तत संग्रामे पुत्रेण निकृतस्तव ॥ ६ ॥

महाराज! आपके पुत्रद्वारा ठगे गये महारथी राजा युधिष्ठिरने संग्राममें गजसेनापर आक्रमण किया ॥ ६ ॥

माद्रीपुत्रस्तु नकुलः शूरसंक्रन्दनो युधि ।

त्रिगर्तानां बलैः सार्धं समसज्जत पाण्डवः ॥ ७ ॥

माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल युद्धमें बड़े - बड़े शूरवीरोंको रुलानेवाले थे । उन्होंने त्रिगर्तोंकी सेनाके साथ युद्ध ठाना ॥ ७ ॥

अभ्यवर्तन्त संक्रुद्धाः समरे शाल्वकेकयान् ।

पृष्ठ 1935

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सात्यकिश्चेकितानश्च सौभद्रश्च महारथः ॥ ८ ॥

सात्यकि, चेकितान और महारथी अभिमन्युने समरभूमिमें कुपित होकर शाल्वों तथा केकयोंपर धावा किया ॥ ८ ॥

धृष्टकेतुश्च समरे राक्षसश्च घटोत्कचः । (नाकुलिश्च शतानीकः समरे रथपुङ्गवः । ) पुत्राणां ते रथानीकं प्रत्युद्याताः सुदुर्जयाः ॥ ९ ॥

धृष्टकेतु, राक्षस घटोत्कच और नकुलपुत्र श्रेष्ठ रथी शतानीक– इन अत्यन्त दुर्जय वीरोंने समरांगणमें आपकी रथसेनापर आक्रमण किया ॥ ९ ॥

सेनापतिरमेयात्मा धृष्टद्युम्नो महाबलः ।

द्रोणेन समरे राजन् समियायोग्रकर्मणा ॥ १० ॥

राजन्! अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डव- सेनापति महाबली धृष्टद्युम्नने संग्रामभूमिमें भयंकर कर्म करनेवाले द्रोणाचार्यसे लोहा लिया ॥ १० ॥

एवमेते महेष्वासास्तावकाः पाण्डवैः सह ।

समेत्य समरे शूराः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ ११ ॥

इस प्रकार ये आपके महाधनुर्धर शूरवीर योद्धा पाण्डवोंके साथ समरभूमिमें युद्ध करने लगे ॥ ११ ॥

मध्यंदिनगते सूर्ये नभस्याकुलतां गते ।

कुरवः पाण्डवेयाश्च निजघ्नुरितरेतरम् ॥ १२ ॥

सूर्यदेव दिनके मध्यभागमें आ गये । आकाश तपने लगा । परंतु उस समय भी कौरव तथा पाण्डव एक- दूसरेको मार रहे थे ॥ १२ ॥

ध्वजिनो हेमचित्राङ्गा विचरन्तो रणाजिरे ।

सपताका रथा रेजुर्वैयाघ्रपरिवारणाः ॥ १३ ॥

समेतानां च समरे जिगीषूणां परस्परम् ।

बभूव तुमुलः शब्दः सिंहानामिव नर्दताम् ॥ १४ ॥

जिनपर ध्वजा और पताकाएँ फहरा रही थीं, जिनका एक- एक अवयव सुवर्णभूषित हो विचित्र शोभा धारण करता था तथा जिनपर व्याघ्रके चर्मका आवरण पड़ा हुआ था, ऐसे अनेक रथ उस समरांगणमें विचरते हुए शोभा पा रहे थे । समरमें एक-दूसरेसे भिड़कर परस्पर विजय पानेकी इच्छावाले शूरवीर सिंहके समान गर्जना कर रहे थे और उनका वह तुमुल नाद सब ओर गूँज रहा था ॥ १३-१४ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम सम्प्रहारं सुदारुणम् ।

यदकुर्वन् रणे शूराः सृजयाः कुरुभिः सह ॥ १५ ॥

नैव खं न दिशो राजन् न सूर्यं शत्रुतापन ।

विदिशो वापि पश्यामः शरैर्मुक्तैः समन्ततः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1936

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राजन्! हमने वहाँ अत्यन्त भयंकर और अद्भुत संग्राम देखा, जिसे रणवीर सृजयोंने कौरवोंके साथ किया था । शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! वहाँ चारों ओर इतने बाण छोड़े गये थे कि उनसे आच्छादित हो जानेके कारण हम आकाश, सूर्य, दिशा तथा विदिशाओंको भी नहीं देख पाते थे ॥ १५-१६ ॥

शक्तीनां विमलाग्राणां तोमराणां तथास्यताम् ।

निस्त्रिंशानां च पीतानां नीलोत्पलनिभाः प्रभाः ॥ १७ ॥

चमकती हुई धारवाली शक्तियाँ, चलाये जाते हुए तोमरों और पानीदार तलवारोंकी प्रभा नील कमलके समान सुशोभित हो रही थीं ॥ १७ ॥

कवचानां विचित्राणां भूषणानां प्रभास्तथा ।

खं दिशः प्रदिशश्चैव भासयामासुरोजसा ॥ १८ ॥

वे तथा विचित्र कवचों और आभूषणोंके प्रभा- समूह आकाश, दिशा एवं कोणोंको अपने तेजसे प्रकाशित कर रहे थे ॥ १८ ॥

वपुर्भिश्च नरेन्द्राणां चन्द्रसूर्यसमप्रभैः ।

विरराज तदा राजंस्तत्र तत्र रणाङ्गणम् ॥ १ ९ ॥

राजन्! चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले राजाओंके शरीरोंसे वह समरांगण यत्र - तत्र सर्वत्र शोभा पा रहा था ॥ १ ९ ॥

रथसङ्घा नरव्याघ्राः समायान्तश्च संयुगे ।

विरेजुः समरे राजन् ग्रहा इव नभस्तले ॥ २० ॥

राजन्! रथोंके समूह और नरश्रेष्ठ नरेशगण युद्धमें आते हुए उसी प्रकार शोभा पा रहे थे, जैसे आकाशमें ग्रह- नक्षत्र सुशोभित होते हैं ॥ २० ॥

भीष्मस्तु रथिनां श्रेष्ठो भीमसेनं महाबलम् ।

अवारयत संक्रुद्धः सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ २१ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने कुपित होकर सब सेनाओंके देखते - देखते महाबली भीमसेनको रोक दिया ॥ २१ ॥

ततो भीष्मविनिर्मुक्ता रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ।

अभ्यघ्नन् समरे भीमं तैलधौताः सुतेजनाः ॥ २२ ॥

उस समय पत्थरपर रगड़कर तेज किये हुए, सुवर्णमय पंखसे युक्त और तेलके धोये तीखे बाण भीष्मके हाथोंसे छूटकर समरभूमिमें भीमसेनको चोट पहुँचाने लगे ॥ २२ ॥

तस्य शक्तिं महावेगां भीमसेनो महाबलः ।

क्रुद्धाशीविषसंकाशां प्रेषयामास भारत ॥ २३ ॥

भारत! तब महाबली भीमसेनने क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पके समान भयंकर महावेगशालिनी शक्ति भीष्मपर छोड़ी ॥ २३ ॥

तामापतन्तीं सहसा रुक्मदण्डां दुरासदाम् ।

पृष्ठ 1937

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चिच्छेद समरे भीष्मः शरैः संनतपर्वभिः ॥ २४ ॥

उसमें सोनेका डंडा लगा हुआ था । उसको सह लेना बहुत ही कठिन था । उसे सहसा आते देख भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा युद्धभूमिमें काट गिराया ॥

ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च ।

कार्मुकं भीमसेनस्य द्विधा चिच्छेद भारत ॥ २५ ॥

भरतनन्दन! तदनन्तर एक तीखे और पानीदार भल्लसे उन्होंने भीमसेनके धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥ ( अपास्य तु धनुश्छिन्नं भीमसेनो महाबलः । शरैर्बहुभिरानर्च्छद् भीष्मं शान्तनवं युधि । ) महाबली भीमसेनने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष ले बहुत - से बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शान्तनुनन्दन भीष्मको अत्यन्त पीड़ा दी ।

सात्यकिस्तु ततस्तूर्णं भीष्ममासाद्य संयुगे ।

आकर्णप्रहितैस्तीक्ष्णैर्निशितैस्तिग्मतेजनैः ॥ २६ ॥

शरैर्बहुभिरानर्च्छत् पितरं ते जनेश्वर । जनेश्वर! तत्पश्चात् उस युद्धमें सात्यकिने शीघ्र ही आपके ताऊ भीष्मके पास पहुँचकर धनुषको कानोंतक खींचकर चलाये हुए बहुत-से तीखे एवं तेज सायकोंद्वारा उन्हें बहुत पीड़ा दी ॥ २६३ ॥

ततः संधाय वै तीक्ष्णं शरं परमदारुणम् ॥ २७ ॥

वार्ष्णेयस्य रथाद् भीष्मः पातयामास सारथिम् । तब भीष्मने अत्यन्त भयंकर तीक्ष्ण बाणका संधान करके सात्यकिके रथसे उनके सारथिको मार गिराया ॥ तस्याश्वाः प्रद्रुता राजन् निहते रथसारथौ ॥ २८ ॥

राजन्! रथ - सारथिके मारे जानेपर सात्यकिके घोड़े वहाँसे भाग चले ॥ २८ ॥

तेन तेनैव धावन्ति मनोमारुतरंहसः ।

ततः सर्वस्य सैन्यस्य निस्वनस्तुमुलोऽभवत् ॥ २ ९ ॥

मन और वायुके समान वेगवाले वे घोड़े जिधर राह मिली, उधर ही दौड़ने लगे । इससे सारी सेनामें कोलाहल मच गया ॥ २ ९ ॥

हाहाकारश्च संजज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् ।

अभ्यद्रवत गृह्णीत हयान् यच्छत धावत ॥ ३० ॥

इत्यासीत् तुमुलः शब्दो युयुधानरथं प्रति । महात्मा पाण्डवोंके दलमें हाहाकार होने लगा । अरे! दौड़ो, पकड़ो, घोड़ोंको रोको, भागो । सात्यकिके रथकी ओर इस तरहका शब्द गूँजने लगा ॥ ३०३ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1938

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न्यहनत् पाण्डवीं सेनामासुरीमिव वृत्रहा । - सेनाका उसी प्रकार विनाश आरम्भ किया, इसी बीचमें शान्तनुनन्दन भीष्मने पाण्डव-जैसे देवराज इन्द्र आसुरीसेनाका संहार करते हैं ॥ ३१३ ॥

ते वध्यमाना भीष्मेण पञ्चालाः सोमकैः सह ॥ ३२ ॥

स्थिरां युद्धे मतिं कृत्वा भीष्ममेवाभिदुद्रुवुः । भीष्मके द्वारा पीड़ित हुए पांचाल और सोमक युद्धका दृढ़ निश्चय लेकर भीष्मकी ही ओर दौड़े ॥ धृष्टद्युम्नमुखाश्चापि पार्थाः शान्तनवं रणे ॥ ३३ ॥

अभ्यधावञ्जिगीषन्तस्तव पुत्रस्य वाहिनीम् । धृष्टद्युम्न आदि समस्त पाण्डव योद्धा आपके पुत्रकी सेनाको जीतनेकी इच्छासे युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मपर ही चढ़ आये ॥ ३३ ॥

तथैव कौरवा राजन् भीष्मद्रोणपुरोगमाः ॥ ३४ ॥

अभ्यधावन्त वेगेन ततो युद्धमवर्तत ॥ ३५ ॥

राजन्! इसी प्रकार भीष्म, द्रोण आदि कौरव योद्धा भी बड़े वेगसे पाण्डव- सेनापर टूट पड़े; फिर तो दोनों दलोंमें भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ३४-३५ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि पञ्चमदिवसयुद्धे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें पाँचवें दिनके युद्धसे सम्बन्ध रखनेवाला बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥

[ दाक्षिणात्य अधिक पाठका १३ श्लोक मिलाकर कुल ३६३ श्लोक हैं । ]

पृष्ठ 1939

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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः विराट - भीष्म, अश्वत्थामा- अर्जुन, दुर्योधन- भीमसेन तथा अभिमन्यु और लक्ष्मणके द्वन्द्व - युद्ध संजय उवाच

विराटोऽथ त्रिभिर्बाणैर्भीष्ममार्च्छन्महारथम् ।

विव्याध तुरगांश्चास्य त्रिभिर्बाणैर्महारथः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! महारथी राजा विराटने तीन बाण मारकर महारथी भीष्मको पीड़ित किया और तीन ही बाणोंसे उनके घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ १ ॥

तं प्रत्यविध्यद् दशभिर्भीष्मः शान्तनवः शरैः ।

रुक्मपुङ्खैर्महेष्वासः कृतहस्तो महाबलः ॥ २ ॥

तब महाधनुर्धर महाबली तथा शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने सोनेके पंखवाले दस बाण मारकर विराटको भी घायल कर दिया ॥ २ ॥

द्रौणिर्गाण्डीवधन्वानं भीमधन्वा महारथः ।

अविध्यदिषुभिः षड्भिर्दृढहस्तः स्तनान्तरे ॥ ३ ॥

भयंकर धनुष धारण करनेवाले महारथी अश्वत्थामाने अपने हाथकी दृढ़ताका परिचय देते हुए गाण्डीवधारी अर्जुनकी छातीमें छः बाणोंसे प्रहार किया ॥ ३ ॥

कार्मुकं तस्य चिच्छेद फाल्गुनः परवीरहा ।

अविध्यच्च भृशं तीक्ष्णैः पत्रिभिः शत्रुकर्शनः ॥ ४ ॥

तब शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले शत्रुसूदन अर्जुनने अश्वत्थामाका धनुष काट दिया और उसे तीन तीखे बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल कर दिया ॥ ४ ॥

सोऽन्यत् कार्मुकमादाय वेगवान् क्रोधमूर्च्छितः ।

अमृष्यमाणः पार्थेन कार्मुकच्छेदमाहवे ॥ ५ ॥

अविध्यत् फाल्गुनं राजन् नवत्या निशितैः शरैः ।

वासुदेवं च सप्तत्या विव्याध परमेषुभिः ॥ ६ ॥

राजन्! युद्धमें अर्जुनके द्वारा अपने धनुषका काटा जाना अश्वत्थामाको सहन नहीं हुआ । उस वेगशाली वीरने क्रोधसे मूर्च्छित होकर तुरंत ही दूसरा धनुष ले नब्बे पैने बाणोंद्वारा अर्जुनको और सत्तर श्रेष्ठ सायकोंद्वारा श्रीकृष्णको घायल कर दिया ॥ ५-६ ॥

ततः क्रोधाभिताम्राक्षः कृष्णेन सह फाल्गुनः ।

दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य चिन्तयित्वा पुनः पुनः ॥ ७ ॥

धनुःप्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः ।

पृष्ठ 1940

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गाण्डीवधन्वा संक्रुद्धः शितान् संनतपर्वणः ॥ ८ ॥

जीवितान्तकरान् घोरान् समादत्त शिलीमुखान् ।

तैस्तूर्णं समरेऽविध्यद् द्रौणिं बलवतां वरः ॥ ९ ॥

तब श्रीकृष्णसहित अर्जुनने क्रोधसे लाल आँखें करके बारंबार गरम - गरम लंबी साँस खींचकर सोच- विचार करनेके पश्चात् धनुषको बायें हाथसे दबाया । फिर उन शत्रुसूदन गाण्डीवधारी पार्थने कुपित हो झुकी हुई गाँठवाले कुछ भयंकर बाण हाथमें लिये, जो जीवनका अन्त कर देनेवाले थे। बलवानोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने उन बाणोंद्वारा तुरंत ही समरांगणमें अश्वत्थामाको घायल किया ॥ ७ – ९ ॥

तस्य ते कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ।

न विव्यथे च निर्भिन्नो द्रौणिर्गाण्डीवधन्वना ॥ १० ॥

वे बाण उसका कवच फाड़कर उस युद्धस्थलसे उसके शरीरका रक्त पीने लगे, किंतु गाण्डीवधारी अर्जुनके द्वारा विदीर्ण किये जानेपर भी अश्वत्थामा व्यथित नहीं हुआ ॥ १० ॥

तथैव च शरान् द्रौणिः प्रविमुञ्चन्नविह्वलः ।

तस्थौ स समरे राजंस्त्रातुमिच्छन् महाव्रतम् ॥ ११ ॥

राजन्! द्रोणकुमार तनिक भी विह्वल हुए बिना ही पूर्ववत् समरभूमिमें बाणोंकी वर्षा करता रहा और अपने महान् व्रतकी रक्षाकी इच्छासे समरांगणमें डटा रहा ॥ ११ ॥

तस्य तत् सुमहत् कर्म शशंसुः कुरुसत्तमाः ।

यत् कृष्णाभ्यां समेताभ्यामभ्यापतत संयुगे ॥ १२ ॥

अश्वत्थामा युद्धभूमिमें जो श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंका सामना करता रहा, उसके इस महान् कर्मकी श्रेष्ठ कौरवोंने बड़ी प्रशंसा की ॥ १२ ॥

( तथार्जुनोऽपि संहृष्ट अश्वत्थामानमाहवे । शशंस सर्वभूतानां शृण्वतामपि भारत ॥ ) भारत! अर्जुनने भी अत्यन्त हर्षमें भरकर रण- भूमिमें सम्पूर्ण भूतोंके सुनते हुए अश्वत्थामाकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ।

स हि नित्यमनीकेषु युध्यतेऽभयमास्थितः ।

अस्त्रग्रामं ससंहारं द्रोणात् प्राप्य सुदुर्लभम् ॥ १३ ॥

वह द्रोणाचार्यसे उपसंहारसहित सुदुर्लभ अस्त्र- समुदायकी शिक्षा पाकर निर्भय हो सदा ही पाण्डव - सैनिकोंके साथ युद्ध करता था ॥ १३ ॥

ममैष आचार्यसुतो द्रोणस्यापि प्रियः सुतः ।

ब्राह्मणश्च विशेषेण माननीयो ममेति च ॥ १४ ॥

समास्थाय मतिं वीरो बीभत्सुः शत्रुतापनः ।

कृपां चक्रे रथश्रेष्ठो भारद्वाजसुतं प्रति ॥ १५ ॥