03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1951–1960

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1951–1960

पृष्ठ 1951

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अवहारं ततश्चक्रे पिता देवव्रतस्तव ।

संध्याकाले महाराज सैन्यानां श्रान्तवाहनः ॥ ३७ ॥

महाराज! तब आपके ताऊ देवव्रतने संध्याके समय अपनी सेनाको पीछे हटा लिया ।

उनके वाहन बहुत थक गये थे ॥ ३७ ॥

पाण्डवानां कुरूणां च परस्परसमागमे ।

ते सेने भृशसंविग्ने ययतुः स्वं निवेशनम् ॥ ३८ ॥

पाण्डवों और कौरवोंके पारस्परिक संघर्षमें दोनों ही सेनाएँ अत्यन्त उद्विग्न हो उठी थीं । अतः वे अपनी- अपनी छावनीको चली गयीं ॥ ३८ ॥

ततः स्वशिबिरं गत्वा न्यविशंस्तत्र भारत ।

पाण्डवाः सृजयैः सार्धं कुरवश्च यथाविधि ॥ ३ ९ ॥

भारत! तदनन्तर सृजयोंसहित पाण्डव और कौरव अपने शिविरमें जाकर वहाँ विधिपूर्वक विश्राम करने लगे ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि पञ्चमदिवसावहारे चतुःसप्ततितमोध्यायः ॥ ७४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें पाँचवें दिवसके युद्धकी समाप्तिविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

[ दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ श्लोक मिलाकर कुल ४१३ श्लोक हैं । ] OFFL FULL

पृष्ठ 1952

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः छठे दिनके युद्धका आरम्भ, पाण्डव तथा कौरव सेनाका क्रमशः मकरव्यूह एवं क्रौंचव्यूह बनाकर युद्धमें प्रवृत्त होना संजय उवाच

ते विश्रम्य ततो राजन् सहिताः कुरुपाण्डवाः ।

व्यतीतायां तु शर्वर्यां पुनर्युद्धाय निर्ययुः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! रातको विश्राम करनेके अनन्तर जब वह रात बीत गयी, तब कौरव और पाण्डव पुनः युद्धके लिये साथ- साथ निकले ॥ १ ॥

तत्र शब्दो महानासीत् तव तेषां च भारत ।

युज्यतां रथमुख्यानां कल्प्यतां चैव दन्तिनाम् ॥ २ ॥

संनह्यतां पदातीनां हयानां चैव भारत ।

शङ्खदुन्दुभिनादश्च तुमुलः सर्वतोऽभवत् ॥ ३ ॥

भारत! उस समय वहाँ आपके और पाण्डव पक्षके सैनिकोंमें बड़ा कोलाहल मचा । कुछ लोग श्रेष्ठ रथोंको जोत रहे थे, कुछ लोग हाथियोंको सुसज्जित करते थे, कहीं पैदल सैनिक और घोड़े कवच बाँधकर साज- बाज धारण कर तैयार किये जा रहे थे । शंखों और दुन्दुभियोंकी ध्वनि बड़े चोर- जोरसे हो रही थी । इन सबका सम्मिलित शब्द सब ओर गूँज उठा था ॥ २-३ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा धृष्टद्युम्नमभाषत ।

व्यूहं व्यूह महाबाहो मकरं शत्रुनाशनम् ॥। ४ ॥

तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने धृष्टद्युम्नसे कहा -' महाबाहो! तुम शत्रुनाशक मकरव्यूहकी रचना करो ' ॥ ४ ॥

एवमुक्तस्तु पार्थेन धृष्टद्युम्नो महारथः ।

व्यादिदेश महाराज रथिनो रथिनां वरः ॥ ५ ॥

महाराज! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर रथियोंमें श्रेष्ठ महारथी धृष्टद्युम्नने अपने समस्त रथियोंको मकरव्यूह बनानेके लिये आज्ञा दे दी ॥ ५ ॥

शिरोऽभूद् द्रुपदस्तस्य पाण्डवश्च धनंजयः ।

चक्षुषी सहदेवश्च नकुलश्च महारथः ॥ ६ ॥

उसके मस्तकके स्थानपर राजा द्रुपद तथा पाण्डुपुत्र अर्जुन खड़े हुए । महारथी नकुल और सहदेव नेत्रोंके स्थानमें स्थित हुए ॥ ६ ॥

तुण्डमासीन्महाराज भीमसेनो महाबलः ।

पृष्ठ 1953

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सौभद्रो द्रौपदेयाश्च राक्षसश्च घटोत्कचः ॥ ७ ॥

सात्यकिर्धर्मराजश्च व्यूहग्रीवां समास्थिताः । महाराज! महाबली भीमसेन उसके मुखकी जगह खड़े हुए । सुभद्राकुमार अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँच पुत्र, राक्षस घटोत्कच, सात्यकि और धर्मराज युधिष्ठिर – ये उस मकरव्यूहके ग्रीवाभागमें स्थित हुए ॥ ७३ ॥

पृष्ठमासीन्महाराज विराटो वाहिनीपतिः ॥ ८ । धृष्टद्युम्नेन सहितो महत्या सेनयावृतः । नरेश्वर! सेनापति विराट विशाल सेनासे घिरकर धृष्टद्युम्नके साथ उस व्यूहके पृष्ठ भागमें खड़े हुए ॥ केकया भ्रातरः पञ्च वामपार्श्वं समाश्रिताः ॥ ९ ॥

धृष्टकेतुर्नरव्याघ्रश्चेकितानश्च वीर्यवान् ।

दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थितौ व्यूहस्य रक्षणे ॥ १० ॥

पाँच भाई केकयराजकुमार उनके वामपार्श्वमें खड़े थे । नरश्रेष्ठ धृष्टकेतु और पराक्रमी चेकितान — ये व्यूहके दाहिने भागमें स्थित होकर उसकी रक्षा करते थे ॥ ९ -१० ॥

पादयोस्तु महाराज स्थितः श्रीमान् महारथः ।

कुन्तिभोजः शतानीको महत्या सेनयावृतः ॥ ११ ॥

महाराज! उसके दोनों पैरोंकी जगह महारथी श्रीमान् कुन्तिभोज और विशाल सेनासहित शतानीक खड़े थे ॥ ११ ॥

शिखण्डी तु महेष्वासः सोमकैः संवृतो बली ।

इरावांश्च ततः पुच्छे मकरस्य व्यवस्थितौ ॥ १२ ॥

सोमकोंसे घिरा हुआ महाधनुर्धर शिखण्डी और बलवान् इरावान्– ये दोनों उस मकरव्यूहके पुच्छ - भागमें खड़े थे ॥ १२ ॥

एवमेतं महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः ।

सूर्योदये महाराज पुनर्युद्धाय दंशिताः ॥ १३ ॥

महाराज! भरतनन्दन! इस प्रकार उस महान् मकरव्यूहकी रचना करके पाण्डव कवच बाँधकर सूर्योदयके समय पुनः युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १३ ॥

कौरवानभ्ययुस्तूर्णं हस्त्यश्वरथपत्तिभिः ।

समुच्छ्रितैर्ध्वजैश्छत्रैः शस्त्रैश्च विमलैः शितैः ॥ १४ ॥

ऊँची - ऊँची ध्वजाओं, छत्रों तथा चमकीले और तीखे अस्त्र- शस्त्रोंसे युक्त हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंकी चतुरंगिणी सेनाके साथ पाण्डवोंने कौरवोंपर शीघ्रतापूर्वक आक्रमण किया ॥ १४ ॥

व्यूढं दृष्ट्वा तु तत् सैन्यं पिता देवव्रतस्तव ।

क्रौञ्चेन महता राजन् प्रत्यव्यूहत वाहिनीम् ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1954

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राजन्! तब आपके ताऊ देवव्रतने पाण्डवोंका वह व्यूह देखकर उसके मुकाबिलेमें अपनी सेनाको महान् क्रौंचव्यूहके रूपमें संगठित किया ॥ १५ ॥

तस्य तुण्डे महेष्वासो भारद्वाजो व्यरोचत ।

अश्वत्थामा कृपश्चैव चक्षुरासीन्नरेश्वर ॥ १६ ॥

उसकी चोंचके स्थानमें महाधनुर्धर द्रोणाचार्य सुशोभित हुए। नरेश्वर! अश्वत्थामा और कृपाचार्य नेत्रोंके स्थानमें खड़े हुए ॥ १६ ॥

कृतवर्मा तु सहितः काम्बोजवरबाह्निकैः ।

शिरस्यासीन्नरश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ १७ ॥

काम्बोज और बाह्लिकदेशके उत्तम सैनिकोंके साथ समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ नरप्रवर कृतवर्मा व्यूहके शिरोभागमें स्थित हुए ॥ १७ ॥

ग्रीवायां शूरसेनश्च तव पुत्रश्च मारिष ।

दुर्योधनो महाराज राजभिर्बहुभिर्वृतः ॥ १८ ॥

आर्य! महाराज! राजा शूरसेन तथा आपका पुत्र दुर्योधन- ये दोनों बहुत - से राजाओंके साथ क्रौंचव्यूहके ग्रीवाभागमें स्थित हुए ॥ १८ ॥

प्राग्ज्योतिषस्तु सहितो मद्रसौवीरकेकयैः ।

उरस्यभून्नरश्रेष्ठ महत्या सेनयावृतः ॥ १ ९ ॥

नरश्रेष्ठ! मद्र, सौवीर और केकय योद्धाओंके साथ विशाल सेनासे घिरे हुए प्राग्ज्योतिषपुरके राजा भगदत्त उस व्यूहके वक्षःस्थलमें स्थित हुए ॥ १ ९ ॥

स्वसेनया च सहितः सुशर्मा प्रस्थलाधिपः ।

वामपक्षं समाश्रित्य दंशितः समवस्थितः ॥ २० ॥

प्रस्थलाधिपति ( त्रिगर्तराज ) सुशर्मा कवच धारण करके अपनी सेनाके साथ व्यूहके वामपक्षका आश्रय लेकर खड़े थे ॥ २० ॥

तुषारा यवनाश्चैव शकाश्च सह चूचुपैः ।

दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य भारत ॥ २१ ॥

भारत! तुषार, यवन, शक और चूचुपदेशके सैनिक व्यूहके दाहिने पक्षका आश्रय लेकर स्थित हुए ॥

श्रुतायुश्च शतायुश्च सौमदत्तिश्च मारिष ।

व्यूहस्य जघने तस्थू रक्षमाणाः परस्परम् ॥ २२ ॥

मारिष! श्रुतायु, शतायु तथा सोमदत्तकुमार भूरिश्रवा -ये परस्पर एक-दूसरेकी रक्षा करते हुए व्यूहके जघनप्रदेशमें स्थित हुए ॥ २२ ॥

ततो युद्धाय संजग्मुः पाण्डवाः कौरवैः सह ।

सूर्योदये महाराज ततो युद्धमभून्महत् ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1955

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महाराज! तत्पश्चात् सूर्योदयकालमें पाण्डवोंने कौरवोंके साथ युद्धके लिये उनकी सेनापर आक्रमण किया; फिर तो बड़ा भयंकर युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥ २३ ॥

प्रतीयू रथिनो नागा नागांश्च रथिनो ययुः ।

हयारोहान् रथारोहा रथिनश्चापि सादिनः ॥ २४ ॥

रथियोंकी ओर हाथी और हाथियोंकी ओर रथी बढ़े । घुड़सवारोंपर रथारोही तथा रथारोहियोंपर घुड़- सवार चढ़ आये ॥ २४ ॥

सादिनश्च हयान् राजन् रथिनश्च महारणे ।

हस्त्यारोहान् हयारोहा रथिनः सादिनस्तथा ॥ २५ ॥

राजन्! उस महायुद्धमें घुड़सवार योद्धा घुड़सवारों तथा रथियोंपर भी चढ़ दौड़े । इसी प्रकार अश्वारोही हाथीसवारों तथा रथियोंपर भी टूट पड़े ॥ २५ ॥

रथिनः पत्तिभिः सार्धं सादिनश्चापि पत्तिभिः ।

अन्योन्यं समरे राजन् प्रत्यधावन्नमर्षिताः ॥ २६ ॥

रथी और घुड़सवार दोनों ही पैदल सेनाओंपर आक्रमण करने लगे । राजन्! इस प्रकार अमर्षमें भरे हुए ये समस्त सैनिक एक- दूसरेपर धावा करने लगे ॥

भीमसेनार्जुनयमैर्गुप्ता चान्यैर्महारथैः ।

शुशुभे पाण्डवी सेना नक्षत्रैरिव शर्वरी ॥ २७ ॥

भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा अन्य महारथियोंसे सुरक्षित हुई पाण्डवसेना नक्षत्रोंसे रात्रिकी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥ २७ ॥

तथा भीष्मकृपद्रोणशल्यदुर्योधनादिभिः ।

तवापि च बभौ सेना ग्रहैर्धोरिव संवृता ॥ २८ ॥

इसी प्रकार भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, शल्य और दुर्योधन आदिसे घिरी हुई आपकी सेना ग्रहोंसे आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥ २८ ॥

भीमसेनस्तु कौन्तेयो द्रोणं दृष्ट्वा पराक्रमी ।

अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्भारद्वाजस्य वाहिनीम् ॥ २ ९ ॥

पराक्रमी कुन्तीकुमार भीमसेनने द्रोणाचार्यको देखकर वेगशाली अश्वोंद्वारा द्रोणकी सेनापर धावा किया ॥ २ ९ ॥

द्रोणस्तु समरे क्रुद्धो भीमं नवभिरायसैः ।

विव्याध समरश्लाघी मर्माण्युद्दिश्य वीर्यवान् ॥ ३० ॥

युद्धकी स्पृहा रखनेवाले पराक्रमी द्रोणाचार्यने रणभूमिमें कुपित हो भीमके मर्मस्थानोंको लोहेके नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३० ॥

दृढाहतस्ततो भीमो भारद्वाजस्य संयुगे ।

सारथिं प्रेषयामास यमस्य सदनं प्रति ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1956

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तब युद्धमें द्रोणाचार्यके द्वारा अत्यन्त आहत होकर भीमसेनने उनके सारथिको यमलोक भेज दिया ॥ ३१ ॥

स संगृह्य स्वयं वाहान् भारद्वाजः प्रतापवान् ।

व्यधमत् पाण्डवीं सेनां तूलराशिमिवानलः ॥ ३२ ॥

तब प्रतापी द्रोणाचार्य स्वयं ही घोड़ोंकी बागडोर सँभालते हुए पाण्डवसेनाका उसी प्रकार संहार करने लगे, जैसे आग रुईके ढेरको भस्म कर डालती है ॥ ३२ ॥

ते वध्यमाना द्रोणेन भीष्मेण च नरोत्तमाः ।

सृञ्जयाः केकयैः सार्धं पलायनपराऽभवन् ॥ ३३ ॥

वे नरश्रेष्ठ सृंजय और केकय द्रोणाचार्य तथा भीष्मकी मार खाकर रणभूमिसे भागने लगे ॥ ३३ ॥

तथैव तावकं सैन्यं भीमार्जुनपरिक्षतम् ।

मुह्यते तत्र तत्रैव समदेव वराङ्गना ॥ ३४ ॥

इसी प्रकार भीम और अर्जुनके बाणोंसे क्षत - विक्षत हुई आपकी सेना मतवाली स्त्रीकी भाँति जहाँ- तहाँ मूर्च्छित होने लगी ॥ ३४ ॥

अभिद्येतां ततो व्यूहौ तस्मिन् वीरवरक्षये ।

आसीद् व्यतिकरो घोरस्तव तेषां च भारत ॥ ३५ ॥

भारत! बड़े - बड़े वीरोंका संहार करनेवाले उस युद्धमें दोनों सेनाओंके व्यूह टूट गये और आपके तथा पाण्डवोंके सैनिकोंका भयंकर सम्मिश्रण हो गया ॥ ३५ ॥

तदद्भुतमपश्याम तावकानां परैः सह ।

एकायनगताः सर्वे यदयुध्यन्त भारत ॥ ३६ ॥

भरतनन्दन! हमने आपके पुत्रोंका शत्रुओंके साथ अद्भुत पराक्रम देखा था । वे सब - के-सब एक पंक्तिमें खड़े होकर युद्ध कर रहे थे ॥ ३६ ॥

प्रतिसंवार्य चास्त्राणि तेऽन्योन्यस्य विशाम्पते ।

युयुधुः पाण्डवाश्चैव कौरवाश्च महाबलाः ॥ ३७ ॥

प्रजानाथ! महाबली कौरव तथा पाण्डव एक- दूसरेके अस्त्र- शस्त्रोंका निवारण करते हुए जूझ रहे थे ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि षष्ठदिवसयुद्धारम्भे पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें छठे दिनके युद्धका आरम्भविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

पृष्ठ 1957

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः धृतराष्ट्रकी चिन्ता धृतराष्ट्रउवाच

एवं बहुगुणं सैन्यमेवं बहुविधं पुरा ।

व्यूढमेवं यथाशास्त्रममोघं चैव संजय ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले — संजय! इस प्रकार हमारी सेना अनेक गुणोंसे सम्पन्न है । अनेक अंगोंसे युक्त और अनेक प्रकारसे संगठित है तथा शास्त्रीय विधिसे उसकी व्यूहरचना की गयी है । अतः वह अमोघ ( विजय पानेमें विफल न होनेवाली ) है ॥ १ ॥

हृष्टमस्माकमत्यन्तमभिकामं च नः सदा ।

प्रह्वमव्यसनोपेतं पुरस्ताद् दृष्टविक्रमम् ॥ २ ॥

हमारी यह सेना हमलोगोंपर सदा प्रसन्न और अनुरक्त रहनेवाली है । हमारे प्रति सर्वदा विनीतभाव रखती आयी है । यह किसी भी व्यसनमें नहीं फँसी है । पूर्वकालमें इसका पराक्रम देखा जा चुका है ॥ २ ॥

नातिवृद्धमबालं च न कृशं न च पीवरम् ।

लघुवृत्तायतप्रायं सारयोधमनामयम् ॥ ३ ॥

इसमें न कोई अत्यन्त बूढ़ा है, न बालक है, न अत्यन्त दुबला है और न अत्यन्त मोटा ही है । इसमें शीघ्र कार्य करनेवाले, प्रायः ऊँचे कदके लोग हैं । इस सेनाका प्रत्येक सैनिक सारवान् योद्धा और नीरोग है ॥

आत्तसंनाहशस्त्रं च बहुशस्त्रपरिग्रहम् ।

असियुद्धे नियुद्धे च गदायुद्धे च कोविदम् ॥ ४ ॥

यहाँ सबने कवच एवं अस्त्र- शस्त्र धारण कर रखा है । अनेक प्रकारके बहुसंख्यक शस्त्रोंका संग्रह किया गया है । यहाँका एक- एक योद्धा खड्गयुद्ध, मल्लयुद्ध और गदायुद्धमें कुशल है ॥ ४ ॥

प्रासर्ष्टितोमरेष्वाजी परिघेष्वायसेषु च ।

भिन्दिपालेषु शक्तीषु मुसलेषु च सर्वशः ॥ ५ ॥

कम्पनेषु च चापेषु कणपेषु च सर्वशः ।

क्षेपणीयेषु चित्रेषु मुष्टियुद्धेषु च क्षमम् ॥ ६ ॥

ये सैनिक प्रास, ऋष्टि, तोमर, लोहमय परिघ, भिन्दिपाल, शक्ति, मुसल, कम्पन, चाप तथा कणप आदि दूसरोंपर चलानेयोग्य विचित्र अस्त्रोंका युद्धमें प्रयोग करनेकी कलामें कुशल तथा मुष्टियुद्धमें भी सब प्रकारसे समर्थ हैं ॥ ५-६ ॥ अपरोक्षं च विद्यासु व्यायामे च कृतश्रमम् ।

पृष्ठ 1958

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शस्त्रग्रहणविद्यासु सर्वासु परिनिष्ठितम् ॥ ७ ॥

हमारी इस सेनाको धनुर्वेदका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त है । इसके सैनिकोंने व्यायाम ( अस्त्र- शस्त्रोंके अभ्यास) -में भी अधिक परिश्रम किया है । ये शस्त्रग्रहणसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी विद्याओंमें पारंगत हैं ॥ ७ ॥

आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तप्लुते ।

सम्यक् प्रहरणे याने व्यपयाने च कोविदम् ॥ ८ ॥

ये हाथी, घोड़े आदि सवारियोंपर चढ़ने, उतरने, आगे बढ़ने, बीचमें ही कूद पड़ने, अच्छी तरह प्रहार करने, चढ़ाई करने और पीछे हटने में भी प्रवीण हैं ॥

नागाश्वरथयानेषु बहुशः सुपरीक्षितम् ।

परीक्ष्य च यथान्यायं वेतनेनोपपादितम् ॥ ९ ॥

हाथी, घोड़े, रथ आदिकी सवारियोंद्वारा रणयात्रा करनेमें इस सेनाकी अनेक प्रकार परीक्षा की जा चुकी है । परीक्षा करके प्रत्येक सैनिकको उसकी योग्यताके अनुकूल यथोचित वेतन दे दिया गया है ॥ ९ ॥

न गोष्ठ्या नोपकारेण न च बन्धुनिमित्ततः ।

न सौहृदबलैर्वापि नाकुलीनपरिग्रहैः ॥ १० ॥

इनमेंसे किसीको मित्रोंकी गोष्ठीसे लाकर, सामान्य उपकार करके, भाई-बन्धु होनेके कारण, सौहार्दवश अथवा बलप्रयोग करके सेनामें सम्मिलित नहीं किया गया है । जो कुलीन नहीं हैं, ऐसे लोगोंका भी इस सेनामें संग्रह नहीं हुआ है ॥ १० ॥

समृद्धजनमार्यं च तुष्टसम्बन्धिबान्धवम् ।

कृतोपकारभूयिष्ठं यशस्वि च मनस्वि च ॥ ११ ॥

हमारी सेनामें जो लोग हैं, वे सब समृद्धिशाली और श्रेष्ठ हैं । उनके सगे - सम्बन्धी, भाई-बन्धु भी संतुष्ट हैं । इन सबपर हमारी ओरसे विशेष उपकार किया गया है । ये सभी यशस्वी और मनस्वी हैं ॥ ११ ॥

स्वजनैस्तु नरैर्मुख्यैर्बहुशो दृष्टकर्मभिः ।

लोकपालोपमैस्तात पालितं लोकविश्रुतम् ॥ १२ ॥

तात! जिनके कार्य और व्यवहारको कई बार देखा गया है, ऐसे मुख्य-मुख्य स्वजनोंद्वारा, जो लोकपालके समान पराक्रमी हैं, इस सेनाका पालन- पोषण होता है । यह सम्पूर्ण जगत्में विख्यात है ॥ १२ ॥

बहुभिः क्षत्रियैर्गुप्तं पृथिव्यां लोकसम्मतैः ।

अस्मानभिगतैः कामात् सबलैः सपदानुगैः ॥ १३ ॥

जो अपने वीरताके लिये भूमण्डलमें विख्यात तथा लोकमें सम्मानित हैं, ऐसे बहुत - से क्षत्रिय अपनी इच्छासे ही सेना और सेवकोंके साथ हमारे पास आये हैं, उनके द्वारा यह कौरव - सेना सुरक्षित है ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1959

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महोदधिमिवापूर्णमापगाभिः समन्ततः ।

अपक्षैः पक्षिसंकाशै रथैर्नागैश्च संवृतम् ॥ १४ ॥

हमारी यह सेना महासागरके समान सब ओरसे परिपूर्ण है । इसमें बिना पंखके ही पक्षियोंके समान तीव्र गति से चलनेवाले रथ और हाथी इस प्रकार आकर मिलते हैं, जैसे समुद्रमें सब ओरसे नदियाँ आकर गिरती हैं ॥

नानायोधजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गिणम् ।

क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्राससमाकुलम् ॥ १५ ॥

नाना प्रकारके योद्धा ही इस सैन्यसागरके जल हैं, वाहन ही उसमें उठती हुई छोटी-बड़ी तरंगें हैं । इसमें क्षेपणी, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और प्रास आदि अस्त्र- शस्त्र जल-जन्तुओंके समान भरे पड़े हैं ॥ १५ ॥

ध्वजभूषणसम्बाधं रत्नपट्टसुसंचितम् ।

परिधावद्भिरश्वैश्च वायुवेगविकम्पितम् ॥ १६ ॥

अपारमिव गर्जन्तं सागरप्रतिमं महत् । ध्वज और आभूषणोंसे भरी हुई यह सेना रत्नजटित पताकाओंसे व्याप्त है । दौड़ते हुए घोड़ोंसे जो इस सेनाका चंचल होना है, वही वायुवेगसे इस समुद्रका कम्पन है । सागरसदृश यह विशाल सेना देखनेमें अपार है और निरन्तर गर्जन करती रहती है ॥ १६३ ॥

द्रोणभीष्माभिसंगुप्तं गुप्तं च कृतवर्मणा ॥ १७ ॥

कृपदुःशासनाभ्यां च जयद्रथमुखैस्तथा ।

भगदत्तविकर्णाभ्यां द्रौणिसौबलबाह्लिकैः ॥ १८ ॥

गुप्तं प्रवीरैर्लोकैश्च सारवद्भिर्महात्मभिः ।

यदहन्यत संग्रामे दैवमत्र पुरातनम् ॥ १ ९ ॥

द्रोणाचार्य, भीष्म, कृतवर्मा, कृपाचार्य, दुःशासन, जयद्रथ, भगदत्त, विकर्ण, अश्वत्थामा, शकुनि तथा बाह्निक आदि प्रमुख वीरों तथा अन्य शक्तिशाली महामनस्वी लोगोंद्वारा मेरी सेना सदा सुरक्षित रहती है । ऐसी सेना भी यदि संग्राममें मारी गयी तो इसमें हमलोगोंका पुरातन प्रारब्ध ही कारण है ॥ १७–१९ ॥

नैतादृशं समुद्योगं दृष्टवन्तो हि मानुषाः ।

ऋषयो वा महाभागाः पुराणा भुवि संजय ॥। २० ॥

संजय! इस भूतलपर इतनी बड़ी सेनाका जमाव मनुष्योंने कभी नहीं देखा होगा अथवा प्राचीन महाभाग ऋषियोंने भी नहीं देखा होगा ॥ २० ॥

ईदृशोऽपि बलौघस्तु संयुक्तः शस्त्रसम्पदा ।

वध्यते यत्र संग्रामे किमन्यद् भागधेयतः ॥ २१ ॥

इतना बड़ा सैन्यसमुदाय शस्त्रसम्पत्तिसे संयुक्त होनेपर भी यदि संग्राममें विनष्ट हो रहा है, तो इसमें भाग्यके सिवा और क्या कारण हो सकता है? ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1960

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विपरीतमिदं सर्वं प्रतिभाति हि संजय ।

यत्रेदृशं बलं घोरं पाण्डवान्नातरद् रणे ॥ २२ ॥

संजय! यह सब कुछ मुझे विपरीत जान पड़ता है कि ऐसा भयंकर सैन्यसमूह भी वहाँ युद्धमें पाण्डवोंसे पार नहीं पा सका ॥ २२ ॥

पाण्डवार्थाय नियतं देवास्तत्र समागताः ।

युध्यन्ते मामकं सैन्यं यथावध्यत संजय ॥ २३ ॥

संजय! निश्चय ही पाण्डवोंके लिये देवता आकर मेरी सेनाके साथ युद्ध करते हैं, तभी तो वह प्रतिदिन मारी जा रही है ॥ २३ ॥

उक्तो हि विदुरेणाहं हितं पथ्यं च नित्यशः ।

न च जग्राह तन्मन्दः पुत्रो दुर्योधनो मम ॥ २४ ॥

तस्य मन्ये मतिः पूर्वं सर्वज्ञस्य महात्मनः ।

आसीद् यथागतं तात येन दृष्टमिदं पुरा ॥ २५ ॥

विदुरने नित्य ही हित और लाभकी बातें बतायीं; परंतु मेरे मूर्ख पुत्र दुर्योधनने नहीं माना । तात! मैं समझता हूँ, महात्मा विदुर सर्वज्ञ हैं । इसीलिये पहले ही उनकी बुद्धिमें ये सब बातें आ गयी थीं । आज जो कुछ प्राप्त हुआ है, यह पहले ही उनकी दृष्टिमें आ गया था ॥ २४-२५ ॥

अथवा भाव्यमेवं हि संजयैतेन सर्वथा ।

पुरा धात्रा यथा सृष्टं तत् तथा नैतदन्यथा ॥ २६ ॥

संजय! अथवा यह सब प्रकारसे ऐसा ही होनेवाला था । विधाताने जो पहलेसे रच रखा है, वह उसी रूपमें होता है, उसे कोई बदल नहीं सकता ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि धृतराष्ट्रचिन्तायां षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें धृतराष्ट्रकी चिन्ताविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥