03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 21–30
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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११८- भीष्मका अद्भुत पराक्रम करते हुए पाण्डव - सेनाका भीषण संहार ११९- कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना १२०- भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिविरमें जाना और श्रीकृष्ण- युधिष्ठिर- संवाद १२१- अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना १२२- भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद
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चित्र - सूची सादा 3 - दुर्योधन और अर्जुनका श्रीकृष्णसे युद्धके लिये सहायता माँगना २- नहुषका स्वर्गसे पतन ३- आकाशचारी भगवान् सूर्यदेव ४- विदुर और धृतराष्ट्र ५- प्रह्लादजीका न्याय ६- आत्रेय मुनि और साध्यगण ७- श्रीसनत्सुजात और महाराज धृतराष्ट्र ८- धृतराष्ट्रकी सभामें संजय पाण्डवोंका संदेश सुना रहे हैं ९- भीमसेनका बल बखानते हुए धृतराष्ट्रका विलाप १०- धृतराष्ट्रके द्वारा श्रीकृष्णका स्वागत ११- श्रीकृष्णका कौरव - सभामें प्रवेश १४- ययातिका स्वर्गारोहण १५- दुर्योधनको गान्धारीकी फटकार १६- भगवान् श्रीकृष्ण कर्णको समझा रहे हैं १७- पाण्डवोंके डेरेमें बलरामजी १८- पाण्डवोंकी विशाल सेना १९- भीष्म- दुर्योधन- संवाद २०- पाण्डव- सेनापति धृष्टद्युम्न २१- भीष्म और परशुरामके युद्धमें नारदजीद्वारा बीच - बचाव २२- शरणागत अर्जुन २३- पंचमहायज्ञ २४- अर्जुनके प्रति भगवान्का विराट्रूप प्रदर्शन २५- भगवान्के द्वारा भक्तका संसारसागरसे उद्धार २६- चार अवस्था २७- संसार-वृक्ष २८- मोह-नाश २९- श्रीकृष्ण एवं भाइयोंसहित युधिष्ठिरका भीष्मको प्रणाम करके उनसे र आज्ञा माँगना ३०- भीमसेन और भीष्मका युद्ध
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३१ - अभिमन्युका युद्ध - कौशल ३२- भीमसेनके बाणसे मूर्च्छित दुर्योधन ३३- अर्जुनका व्यूहबद्ध कौरव सेनाकी ओर श्रीकृष्णका ध्यान आकृष्ट करना ३४- आकाशमें स्थित हुए घटोत्कचकी गर्जना और दुर्योधनके साथ उसका युद्ध ३५- भीष्मजीका शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी इच्छा प्रकट करना ३६- अर्जुनका बाणद्वारा पृथ्वीसे जल प्रकट करके भीष्मजीको पिलाना Face
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ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीमहाभारतम् उद्योगपर्व सेनोद्योगपर्व प्रथमोऽध्यायः राजा विराटकी सभामें भगवान् श्रीकृष्णका भाषण
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायण स्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्य सखा ) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, ( उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और ( उन लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत ) -का पाठ करना चाहिये । वैशम्पायन उवाच कृत्वा विवाहं तु कुरुप्रवीरा- स्तदाभिमन्योर्मुदिताः स्वपक्षाः । विश्रम्य रात्रावुषसि प्रतीताः सभां विराटस्य ततोऽभिजग्मुः ॥ १ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय अभिमन्युका विवाह करके कुरुवीर पाण्डव तथा उनके अपने पक्षके लोग ( यादव पांचाल आदि ) अत्यन्त आनन्दित हुए । रात्रिमें विश्राम करके वे प्रातः काल जो और ( नित्यकर्म करके ) विराटकी सभामें उपस्थित हुए ॥ १ ॥
सभा तु सा मत्स्यपतेः समृद्धा मणिप्रवेकोत्तमरत्नचित्रा । न्यस्तासना माल्यवती सुगन्धा तामभ्ययुस्ते नरराजवृद्धाः ॥ २ ॥
मत्स्यदेशके अधिपति विराटकी वह सभा अत्यन्त समृद्धिशालिनी थी । उसमें मणियों (मोती- मूँगे आदि ) -की खिड़कियाँ और झालरें लगी थीं । उसके फर्श और दीवारोंमें उत्तम-उत्तम रत्नों ( हीरे - पन्ने आदि) की पच्चीकारी की गयी थी । इन सबके कारण उसकी विचित्र शोभा हो रही थी । उस सभाभवनमें यथायोग्य स्थानोंपर आसन लगे हुए थे, जगह - जगह मालाएँ लटक रही थीं और सब ओर सुगन्ध फैल रही थी । वे श्रेष्ठ नरपतिगण उसी सभामें एकत्र हुए ॥ २ ॥
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अथासनान्याविशतां पुरस्ता- दुभौ विराटद्रुपदौ नरेन्द्रौ । वृद्धौ च मान्यौ पृथिवीपतीनां पित्रा समं रामजनार्दनौ च ॥ ३ ॥
वहाँ सबसे पहले राजा विराट और द्रुपद आसनपर विराजमान हुए; क्योंकि वे दोनों समस्त भूपतियोंमें वृद्ध और माननीय थे । तत्पश्चात् अपने पिता वसुदेवके साथ बलराम और श्रीकृष्णने भी आसन ग्रहण किये ॥ ३ ॥
पाञ्चालराजस्य समीपतस्तु शिनिप्रवीरः सहरौहिणेयः । मत्स्यस्य राज्ञस्तु सुसंनिकृष्टो जनार्दनश्चैव युधिष्ठिरश्च ॥ ४ ॥
पांचालराज द्रुपदके पास शिनिवंशके श्रेष्ठ वीर सात्यकि तथा रोहिणीनन्दन बलरामजी बैठे थे और मत्स्यराज विराटके अत्यन्त निकट श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिर विराजमान थे ॥ ४ ॥
सुताश्च सर्वे द्रुपदस्य राज्ञो भीमार्जुनौ माद्रवतीसुतौ च । प्रद्युम्नसाम्बौ च युधि प्रवीरौ विराटपुत्रैश्च सहाभिमन्युः ॥ ५ ॥
सर्वे च शूराः पितृभिः समाना वीर्येण रूपेण बलेन चैव । उपाविशन् द्रौपदेयाः कुमाराः सुवर्णचित्रेषु वरासनेषु ॥ ६ ॥
राजा द्रुपदके सब पुत्र, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, युद्धवीर प्रद्युम्न और साम्ब, विराटके पुत्रोंसहित अभिमन्यु तथा द्रौपदीके सभी पुत्र सुवर्णजटित सुन्दर सिंहासनोंपर आसपास ही बैठे थे । द्रौपदीके पाँचों पुत्र पराक्रम, सौन्दर्य और बलमें अपने पिता
पाण्डवोंके ही समान थे । वे सब - के - सब शूरवीर थे ॥ ५-६ ॥
तथोपविष्टेषु महारथेषु विराजमानाभरणाम्बरेषु । रराज सा राजवती समृद्धा ग्रहैरिव द्यौर्विमलैरुपेता ॥ ७ ॥
इस प्रकार चमकीले आभूषणों तथा सुन्दर वस्त्रोंसे विभूषित उन समस्त महारथियोंके बैठ जानेपर राजाओंसे भरी हुई वह समृद्धिशालिनी सभा ऐसी शोभा पा रही थी, मानो उज्ज्वल ग्रह - नक्षत्रोंसे भरा आकाश जगमगा रहा हो ॥ ७ ॥
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ततः कथास्ते समवाययुक्ताः कृत्वा विचित्राः पुरुषप्रवीराः । तस्थुर्मुहूर्तं परिचिन्तयन्तः कृष्णं नृपास्ते समुदीक्षमाणाः ॥ ८ ॥
तदनन्तर उन शूरवीर पुरुषोंने समाजमें जैसी बातचीत करनी उचित है, वैसी ही विविध प्रकारकी विचित्र बातें कीं । फिर वे सब नरेश भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखते हुए दो घड़ीतक कुछ सोचते हुए चुप बैठे रहे ॥ ८ ॥
कथान्तमासाद्य च माधवेन संघट्टिताः पाण्डवकार्यहेतोः । ते राजसिंहाः सहिता ह्यशृण्वन् वाक्यं महार्थं सुमहोदयं च ॥ ९ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंके कार्यके लिये ही उन श्रेष्ठ राजाओंको संगठित किया था । जब उन सब लोगोंकी बातचीत बंद हो गयी, तब वे सिंहके समान पराक्रमी नरेश एक साथ श्रीकृष्णके सारगर्भित तथा श्रेष्ठ फल देनेवाले वचन सुनने लगे ॥ ९ ॥
श्रीकृष्णउवाच सर्वैर्भवद्भिर्विदितं यथायं युधिष्ठिरः सौबलेनाक्षवत्याम् । जितो निकृत्यापहृतं च राज्यं वनप्रवासे समयः कृतश्च ॥ १० ॥
श्रीकृष्णने भाषण देना प्रारम्भ किया— उपस्थित सुहृद्गण! आप सब लोगोंको यह मालूम ही है कि सुबलपुत्र शकुनिने द्यूतसभामें किस प्रकार कपट करके धर्मात्मा युधिष्ठिरको परास्त किया और इनका राज्य छीन लिया है । उस जूएमें यह शर्त रख दी गयी थी कि जो हारे, वह बारह वर्षोंतक वनवास और एक वर्षतक अज्ञातवास करे ॥ १० ॥
शक्तैर्विजेतुं तरसा महीं च सत्ये स्थितैः सत्यरथैर्यथावत् । पाण्डोः सुतैस्तद् व्रतमुग्ररूपं वर्षाणि षट् सप्त च चीर्णमग्रयैः ॥ ११ ॥
पाण्डव सदा सत्यपर आरूढ़ रहते हैं । सत्य ही इनका रथ ( आश्रय ) है । इनमें वेगपूर्वक समस्त भूमण्डल - को जीत लेनेकी शक्ति है तथापि इन वीराग्रगण्य पाण्डु- कुमारोंने सत्यका खयाल करके तेरह वर्षोंतक वनवास और अज्ञातवासके उस कठोर व्रतका धैर्यपूर्वक पालन किया है, जिसका स्वरूप बड़ा ही उग्र है ॥ ११ ॥
त्रयोदशश्चैव सुदुस्तरोऽय-
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मज्ञायमानैर्भवतां समीपे ।
क्लेशानसह्यान् विविधान् सहद्भि- र्महात्मभिश्चापि वने निविष्टम् ॥ १२ ॥
इस तेरहवें वर्षको पार करना बहुत ही कठिन था, परंतु इन महात्माओंने आपके पास ही अज्ञातरूपसे रहकर भाँति- भाँतिके असह्य क्लेश सहते हुए यह वर्ष बिताया है, इसके अतिरिक्त बारह वर्षोंतक ये वनमें भी रह चुके हैं ॥ १२ ॥
एतैः परप्रेष्यनियोगयुक्तै- रिच्छद्भिराप्तं स्वकुलेन राज्यम् । एवंगते धर्मसुतस्य राज्ञो दुर्योधनस्यापि च यद्धितं स्यात् ॥ १३ ॥
तच्चिन्तयध्वं कुरुपुङ्गवानां धर्म्यं च युक्तं च यशस्करं च । अधर्मयुक्तं न च कामयेत राज्यं सुराणामपि धर्मराजः ॥ १४ ॥
अपनी कुलपरम्परासे प्राप्त हुए राज्यकी अभिलाषासे ही इन वीरोंने अबतक अज्ञातावस्थामें दूसरोंकी सेवामें संलग्न रहकर तेरहवाँ वर्ष पूरा किया है । ऐसी परिस्थितिमें जिस उपायसे धर्मपुत्र युधिष्ठिर तथा राजा दुर्योधनका भी हित हो, उसका आपलोग विचार करें । आप कोई ऐसा मार्ग ढूँढ़ निकालें, जो इन कुरुश्रेष्ठ वीरोंके लिये धर्मानुकूल, न्यायोचित तथा यशकी वृद्धि करनेवाला हो । धर्मराज युधिष्ठिर यदि धर्मके विरुद्ध देवताओंका भी राज्य प्राप्त होता हो, तो उसे लेना नहीं चाहेंगे ॥ १३-१४ ॥ धर्मार्थयुक्तं तु महीपतित्वं ग्रामेऽपि कस्मिंश्चिदयं बुभूषेत् । पित्र्यं हि राज्यं विदितं नृपाणां यथापकृष्टं धृतराष्ट्रपुत्रैः ॥ १५ ॥
किसी छोटेसे गाँवका राज्य भी यदि धर्म और अर्थके अनुकूल प्राप्त होता हो, तो ये उसे लेनेकी इच्छा कर सकते हैं । आप सभी नरेशोंको यह विदित ही है कि धृतराष्ट्रके पुत्रोंने पाण्डवोंके पैतृक राज्यका किस प्रकार अपहरण किया है ॥ १५ ॥
मिथ्योपचारेण यथा ह्यनेन कृच्छ्रं महत् प्राप्तमसह्यरूपम् । न चापि पार्थो विजितो रणे तैः स्वतेजसा धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः ॥ १६ ॥
कौरवोंके इस मिथ्या व्यवहार तथा छल-कपटके कारण पाण्डवोंको कितना महान् और असह्य कष्ट भोगना पड़ा है, यह भी आपलोगोंसे छिपा नहीं है । धृतराष्ट्रके उन पुत्रोंने
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अपने बल और पराक्रमसे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको किसी युद्धमें पराजित नहीं किया था (छलसे ही इनका राज्य छीना ) ॥ १६ ॥
तथापि राजा सहितः सुहृद्भि- रभीप्सतेऽनामयमेव तेषाम् । यत् तु स्वयं पाण्डुसुतैर्विजित्य समाहृतं भूमिपतीन् प्रपीड्य ॥ १७ ॥
तत् प्रार्थयन्ते पुरुषप्रवीराः कुन्तीसुता माद्रवतीसुतौ च । बालास्त्विमे तैर्विविधैरुपायैः सम्प्रार्थिता हन्तुममित्रसंघैः ॥ १८ ॥
राज्यं जिहीर्षद्भिरसद्भिरुग्रैः सर्वं च तद् वो विदितं यथावत् । तथापि सुहृदोंसहित राजा युधिष्ठिर उनकी भलाई ही चाहते हैं । पाण्डवोंने दूसरे- दूसरे राजाओंको युद्धमें जीतकर उन्हें पीड़ित करके जो धन स्वयं प्राप्त किया था, उसीको कुन्ती और माद्रीके ये वीर पुत्र माँग रहे हैं । जब पाण्डव बालक थे - अपना हित - अहित कुछ नहीं समझते थे, तभी इनके राज्यको हर लेनेकी इच्छासे उन उग्र प्रकृतिके दुष्ट शत्रुओंने संघबद्ध होकर भाँति- भाँतिके षड्यन्त्रोंद्वारा इन्हें मार डालनेकी पूरी चेष्टा की थी; ये सब बातें आपलोग अच्छी तरह जानते होंगे ॥ १७-१८३ ॥ तेषां च लोभं प्रसमीक्ष्य वृद्धं धर्मज्ञतां चापि युधिष्ठिरस्य ॥ १ ९ ॥ सम्बन्धितां चापि समीक्ष्य तेषां मतिं कुरुध्वं सहिताः पृथक् च । इमे च सत्येऽभिरताः सदैव तं पालयित्वा समयं यथावत् ॥ २० ॥
अतः सभी सभासद् कौरवोंके बढ़े हुए लोभको, युधिष्ठिरकी धर्मज्ञताको तथा इन दोनोंके पारस्परिक सम्बन्धको देखते हुए अलग- अलग तथा एक रायसे भी कुछ निश्चय करें । ये पाण्डवगण सदा ही सत्यपरायण होनेके कारण पहले की हुई प्रतिज्ञाका यथावत् पालन करके हमारे सामने उपस्थित हैं ॥ १ ९ -२० ॥ अतोऽन्यथा तैरुपचर्यमाणा हन्युः समेतान् धृतराष्ट्रपुत्रान् । तैर्विप्रकारं च निशम्य कार्ये सुहृज्जनास्तान् परिवारयेयुः ॥ २१ ॥
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यदि अब भी धृतराष्ट्रके पुत्र इनके साथ विपरीत व्यवहार ही करते रहेंगे — इनका राज्य नहीं लौटायेंगे, तो पाण्डव उन सबको मार डालेंगे । कौरवलोग पाण्डवोंके कार्यमें विघ्न डाल रहे हैं और उनकी बुराईपर ही तुले हुए हैं; यह बात निश्चितरूपसे जान लेनेपर सुहृदों और सम्बन्धियोंको उचित है कि वे उन दुष्ट कौरवोंको ( इस प्रकार अत्याचार करनेसे ) रोकें ॥ २१ ॥
युद्धेन बाधेयुरिमांस्तथैव तैर्बाध्यमाना युधि तांश्च हन्युः । तथापि नेमेऽल्पतया समर्था- स्तेषां जयायेति भवेन्मतं वः ॥ २२ ॥
यदि धृतराष्ट्रके पुत्र इस प्रकार युद्ध छेड़कर इन पाण्डवोंको सतायेंगे, तो उनके बाध्य करनेपर ये भी डटकर युद्धमें उनका सामना करेंगे और उन्हें मार गिरायेंगे । सम्भव है, आपलोग यह सोचते हों कि ये पाण्डव अल्पसंख्यक होनेके कारण उनपर विजय पानेमें समर्थ नहीं हैं ॥ २२ ॥
समेत्य सर्वे सहिताः सुहृद्भि- स्तेषां विनाशाय यतेयुरेव ।
दुर्योधनस्यापि मतं यथाव- न्न ज्ञायते किं नु करिष्यतीति ॥ २३ ॥
तथापि ये सब लोग अपने हितैषी सुहृदोंके साथ मिलकर शत्रुओंके विनाशके लिये प्रयत्न तो करेंगे ही । ( अतः इन्हें आपलोग दुर्बल न समझें) युद्धका भी निश्चय कैसे किया जाय; क्योंकि दुर्योधनके भी मतका अभी ठीक-ठीक पता नहीं है कि वह क्या करेगा? ॥ २३ ॥
अज्ञायमाने च मते परस्य किं स्यात् समारभ्यतमं मतं वः । तस्मादितो गच्छतु धर्मशीलः शुचिः कुलीनः पुरुषोऽप्रमत्तः ॥ २४ ॥
शत्रुपक्षका विचार जाने बिना आपलोग कोई ऐसा निश्चय कैसे कर सकते हैं? जिसे अवश्य ही कार्यरूपमें परिणत किया जा सके। अतः मेरा विचार है कि यहाँसे कोई धर्मशील, पवित्रात्मा, कुलीन और सावधान पुरुष दूत बनकर वहाँ जाय ॥ २४ ॥
दूतः समर्थः प्रशमाय तेषां राज्यार्धदानाय युधिष्ठिरस्य । वह दूत ऐसा होना चाहिये, जो उनके जोश तथा रोषको शान्त करनेमें समर्थ हो और उन्हें युधिष्ठिरको इनका आधा राज्य दे देनेके लिये विवश कर सके ॥ २४ ॥
निशम्य वाक्यं तु जनार्दनस्य