03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 221–230

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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संजय! तुम वहाँ उन स्त्रियोंको भी जानते हो, जो हमारी पुत्रवधुएँ लगती हैं, जो उत्तम कुलोंसे आयी हैं तथा सर्वगुणसम्पन्न और संतानवती हैं। वहाँ जाकर उनसे कहना —'बहुओ! युधिष्ठिर प्रसन्न होकर तुमलोगों का कुशल- समाचार पूछते थे ' ॥ ३६ ॥

कन्याः स्वजेथाः सदनेषु संजय अनामयं मद्वचनेन पृष्ट्वा । कल्याणा वः सन्तु पतयोऽनुकूला यूयं पतीनां भवतानुकूलाः ॥ ३७ ॥

संजय! राजमहलमें जो छोटी- छोटी बालिकाएँ हैं, उन्हें हृदयसे लगाना और मेरी ओरसे उनका आरोग्य - समाचार पूछकर उन्हें कहना - ' पुत्रियो! तुम्हें कल्याणकारी पति प्राप्त हों

और वे तुम्हारे अनुकूल बने रहें । साथ ही तुम भी पतियोंके अनुकूल बनी रहो' ॥ ३७ ॥

अलंकृता वस्त्रवत्यः सुगन्धा अबीभत्साः सुखिता भोगवत्यः । लघु यासां दर्शनं वाक् च लघ्वी वेशस्त्रियः कुशलं तात पृच्छेः ॥ ३८ ॥

तात संजय! जिनका दर्शन मनोहर और बातें मनको प्रिय लगनेवाली होती हैं, जो वेश-भूषासे अलंकृत, सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित, उत्तम सुगन्ध धारण करनेवाली, घृणित व्यवहारसे रहित, सुखशालिनी और भोग- सामग्रीसे सम्पन्न हैं, उन वेश ( शृंगार) धारण करानेवाली स्त्रियोंकी भी कुशल पूछना ॥ ३८ ॥

दास्यः स्युर्या ये च दासाः कुरूणां

तदाश्रया बहवः कुब्जखञ्जाः ।

आख्याय मां कुशलिनं स्म तेभ्यो- ऽप्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम् ॥ ३ ९ ॥

कौरवोंके जो दास - दासियाँ हों तथा उनके आश्रित जो बहुत -से कुबड़े और लँगड़े मनुष्य रहते हों, उन सबसे मुझे सकुशल बताकर अन्तमें मेरी ओरसे उनकी भी कुशल पूछना ॥ ३ ९ ॥ कच्चिद् वृत्तिं वर्तते वै पुराणीं कच्चिद् भोगान् धार्तराष्ट्रो ददाति । अंगहीनान् कृपणान् वामनान् वा यानानृशंस्यो धृतराष्ट्रो बिभर्ति ॥ ४० ॥

( और कहना — ) क्या राजा धृतराष्ट्र दयावश जिन अंगहीनों, दीनों और बौने मनुष्योंका पालन करते हैं, उन्हें दुर्योधन भरण- पोषणकी सामग्री देता है? क्या वह उनकी प्राचीन जीविका - वृत्तिका निर्वाह करता है? ॥ ४० ॥

अन्धांश्च सर्वान् स्थविरांस्तथैव

पृष्ठ 222

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हस्त्याजीवा बहवो येऽत्र सन्ति ।

आख्याय मां कुशलिनं स्म तेभ्यो- ऽप्यनामयं परिपृच्छेर्जघन्यम् ॥ ४१ ॥

हस्तिनापुरमें जो बहुत- से हाथीवान हैं तथा जो अन्धे और बूढ़े हैं, उन सबको मेरी कुशल बताकर अन्तमें मेरी ओरसे उनके भी आरोग्य आदिका समाचार पूछना ॥ मा भैष्ट दुःखेन कुजीवितेन नूनं कृतं परलोकेषु पापम् । निगृह्य शत्रून् सुहृदोऽनुगृह्य वासोभिरन्नेन च वो भरिष्ये ॥ ४२ ॥

साथ ही उन्हें आश्वासन देते हुए मेरा यह संदेश सुना देना । तुम्हें जो दुःख प्राप्त होता है अथवा कुत्सित जीवन बिताना पड़ता है, इसके कारण तुमलोग भयभीत न होना । निश्चय ही यह दूसरे जन्मोंमें किये हुए पापका फल प्रकट हुआ है । मैं कुछ ही दिनोंमें अपने शत्रुओंको कैद करके हितैषी सुहृदोंपर अनुग्रह करते हुए अन्न और वस्त्रद्वारा तुमलोगोंका भरण-पोषण करूँगा ॥ ४२ ॥

सन्त्येव मे ब्राह्मणेभ्यः कृतानि भावीन्यथो नो बत वर्तयन्ति । तान् पश्यामि युक्तरूपांस्तथैव तामेव सिद्धिं श्रावयेथा नृपं तम् ॥ ४३ ॥

राजा दुर्योधनसे कहना, मैंने कुछ ब्राह्मणोंके लिये वार्षिक जीविका- वृत्तियाँ नियत कर रखी थीं, किंतु खेद है कि तुम्हारे कर्मचारीगण उन्हें ठीकसे नहीं चला रहे हैं । मैं उन ब्राह्मणोंको पुनः पूर्ववत् उन्हीं वृत्तियोंसे युता देखना चाहता हूँ । तुम किसी दूतके द्वारा मुझे यह समाचार सुना दो कि उन वृत्तियोंका अब यथावत्रूपसे पालन होने लगा है ॥ ४३ ॥

ये चानाथा दुबलाः सर्वकाल- मात्मन्येव प्रयतन्तेऽथ मूढाः । तांश्चापि त्वं कृपणान् सर्वथैव ह्यस्मद्वाक्यात् कुशलं तात पृच्छेः ॥ ४४ ॥

संजय! जो अनाथ, दुर्बल एवं मूर्खजन सदा अपने शरीरका पोषण करनेके लिये ही प्रयत्न करते हैं, तुम मेरे कहनेसे उन दीनजनोंके पास भी जाकर सब प्रकारसे उनका कुशल- समाचार पूछना ॥ ४४ ॥

ये चाप्यन्ये संश्रिता धार्तराष्ट्रान् नानादिग्भ्योऽभ्यागताः सूतपुत्र । दृष्ट्वा तांश्चैवार्हतश्चापि सर्वान् सम्पृच्छेथाः कुशलं चाव्ययं च ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 223

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सूतपुत्र! इनके सिवा विभिन्न दिशाओंसे आये हुए दूसरे दूसरे लोग धृतराष्ट्रपुत्रोंका आश्रय लेकर रहते हैं । उन सब माननीय पुरुषोंसे भी मिलकर उनकी कुशल और क्या वे जीवित बचे रहेंगे, इस सम्बन्धमें भी प्रश्न करना ॥ ४५ ॥

एवं सर्वानागताभ्यागतांश्च राज्ञो दूतान् सर्वदिग्भ्योऽभ्युपेतान् । पृष्ट्वा सर्वान् कुशलं तांश्च सूत पश्चादहं कुशली तेषु वाच्यः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार वहाँ सब दिशाओंसे पधारे हुए राजदूतों तथा अन्य सब अभ्यागतोंसे कुशल-मंगल पूछकर अन्तमें उनसे मेरा कुशल- समाचार भी निवेदन करना ॥ ४६ ॥

नहीदृशाः सन्त्यपरे पृथिव्यां ये योधका धार्तराष्ट्रेण लब्धाः । धर्मस्तु नित्यो मम धर्म एव महाबलः शत्रुनिबर्हणाय ॥ ४७ ॥

यद्यपि दुर्योधनने जिन योद्धाओंका संग्रह किया है, वैसे वीर इस भूमण्डलमें दूसरे नहीं हैं, तथापि धर्म ही नित्य है और मेरे पास शत्रुओंका नाश करनेके लिये धर्मका ही सबसे महान् बल है ॥ ४७ ॥

इदं पुनर्वचनं धार्तराष्ट्रं सुयोधनं संजय श्रावयेथाः । यस्ते शरीरे हृदयं दुनोति कामः कुरूनसपत्नोऽनुशिष्याम् ॥ ४८ ॥

न विद्यते युक्तिरेतस्य काचि- न्नैवंविधाः स्याम यथा प्रियं ते । ददस्व वा शक्रपुरीं ममैव युध्यस्व वा भारतमुख्य वीर ॥ ४ ९ ॥ संजय! दुर्योधनको तुम मेरी यह बात पुनः सुना देना-' तुम्हारे शरीरके भीतर मनमें जो यह अभिलाषा उत्पन्न हुई है कि मैं कौरवोंका निष्कण्टक राज्य करूँ, वह तुम्हारे हृदयको पीड़ा - मात्र दे रही है । उसकी सिद्धिका कोई उपाय नहीं है । हम ऐसे पौरुषहीन नहीं हैं कि तुम्हारा यह प्रिय कार्य होने दें । भरतवंशके प्रमुख वीर! तुम इन्द्रप्रस्थपुरी फिर मुझे ही लौटा दो अथवा युद्ध करो ' ॥ ४८-४९ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरसंदेशे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 224

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इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरसंदेशविषयक तीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३० ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं । ]

पृष्ठ 225

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एकत्रिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरका मुख्य - मुख्य कुरुवंशियोंके प्रति संदेश युधिष्ठिर उवाच

उत सन्तमसन्तं वा बालं वृद्धं च संजय ।

उताबलं बलीयांसं धाता प्रकुरुते वशे ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले — संजय! साधु - असाधु, बालक - वृद्ध तथा निर्बल एवं बलिष्ठ — सबको विधाता अपने वशमें रखता है ॥ १ ॥

उत बालाय पाण्डित्यं पण्डितायोत बालताम् ।

ददाति सर्वमीशानः पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन् ॥ २ ॥

वही सबका नियन्ता है और प्राणियोंके पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार उन्हें सब प्रकारका फल देता है । वही मूर्खको विद्वान् और विद्वान्‌को मूर्ख बना देता है ॥ २ ॥

बलं जिज्ञासमानस्य आचक्षीथा यथातथम् ।

अथ मन्त्रं मन्त्रयित्वा याथातथ्येन हृष्टवत् ॥ ३ ॥

दुर्योधन अथवा धृतराष्ट्र यदि मेरे बल और सेनाका समाचार पूछें तो तुम उन्हें सब ठीक- ठीक बता देना । जिससे वे प्रसन्न होकर आपसमें सलाह करके यथार्थरूपसे अपने कर्तव्यका निश्चय कर सकें ॥ ३ ॥

गावल्गणे कुरून् गत्वा धृतराष्ट्रं महाबलम् ।

अभिवाद्योपसंगृह्य ततः पृच्छेरनामयम् ॥। ४ ॥

संजय! तुम कुरुदेशमें जाकर मेरी ओरसे महाबली धृतराष्ट्रको प्रणाम करके उनके दोनों पैर पकड़ लेना और उनसे स्वास्थ्यका समाचार पूछना ॥ ४ ॥

ब्रूयाश्चैनं त्वमासीनं कुरुभिः परिवारितम् ।

तवैव राजन् वीर्येण सुखं जीवन्ति पाण्डवाः ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् कौरवोंसे घिरकर बैठे हुए इन महाराज धृतराष्ट्रसे कहना —'राजन्! पाण्डवलोग आपकी ही सामर्थ्यसे सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं ॥ ५ ॥

तव प्रसादाद् बालास्ते प्राप्ता राज्यमरिंदम ।

राज्ये तान् स्थापयित्वाग्रे नोपेक्षस्व विनश्यतः ॥ ६ ॥

‘ शत्रुदमन नरेश! जब वे बालक थे, तब आपकी ही कृपासे उन्हें राज्य मिला था । पहले उन्हें राज्यपर बिठाकर अब अपने ही आगे उन्हें नष्ट होते देख उपेक्षा न कीजिये ' ॥

सर्वमप्येतदेकस्य नालं संजय कस्यचित् ।

तात संहत्य जीवामो द्विषतां मा वशं गमः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 226

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संजय! उन्हें यह भी बताना कि ' तात! यह सारा राज्य किसी एकके ही लिये पर्याप्त हो, ऐसी बात नहीं है । हम सब लोग मिलकर एक साथ रहकर सुखपूर्वक जीवन - निर्वाह करें, इसके विपरीत करके आप शत्रुओंके वशमें न पड़ें' ॥ ७ ॥

तथा भीष्मं शान्तनवं भारतानां पितामहम् ।

शिरसाभिवदेथास्त्वं मम नाम प्रकीर्तयन् ॥ ८ ॥

अभिवाद्य च वक्तव्यस्ततोऽस्माकं पितामहः ।

भवता शन्तनोर्वंशो निमग्नः पुनरुद्धृतः ॥ ९ ॥

स त्वं कुरु तथा तात स्वमतेन पितामह ।

यथा जीवन्ति ते पौत्राः प्रीतिमन्तः परस्परम् ॥ १० ॥

इसी तरह भरतवंशियोंके पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मजीको भी मेरा नाम लेते हुए सिर झुकाकर प्रणाम करना और प्रणामके पश्चात् हमारे उन पितामहसे इस प्रकार कहना ——दादाजी! आपने शान्तनुके डूबते हुए वंशका पुनरुद्धार किया था । अब फिर अपनी बुद्धिसे विचार करके कोई ऐसा काम कीजिये, जिससे आपके सभी पौत्र परस्पर प्रेमपूर्वक जीवन बिता सकें ' ॥ ८–१० ॥

तथैव विदुरं ब्रूयाः कुरूणां मन्त्रधारिणम् ।

अयुद्धं सौम्य भाषस्व हितकामो युधिष्ठिरे ॥ ११ ॥

संजय! इसी प्रकार कौरवोंके मन्त्री विदुरजीसे कहना- ' सौम्य! आप युद्ध न होनेकी ही सलाह दें; क्योंकि आप युधिष्ठिरका हित चाहनेवाले हैं ' ॥ ११ ॥

अथ दुर्योधनं ब्रूया राजपुत्रममर्षणम् ।

मध्ये कुरूणामासीनमनुनीय पुनः पुनः ॥ १२ ॥

तदनन्तर कौरवोंकी सभा में बैठे हुए अमर्षमें भरे रहनेवाले राजकुमार दुर्योधनसे बार-बार अनुनय - विनय करके कहना- ॥ १२ ॥

अपापां यदुपैक्षस्त्वं कृष्णामेतां सभागताम् ।

तत् दुःखमतितिक्षाम मा वधिष्म कुरूनिति ॥ १३ ॥

' तुमने द्रौपदीको बिना किसी अपराधके सभामें बुलाकर जो उसका तिरस्कार किया, उस दुःखको हमलोगोंने इसलिये चुपचाप सह लिया है कि हमें कौरवोंका वध न करना पड़े ॥ १३ ॥

एवं पूर्वापरान् क्लेशानतितिक्षन्त पाण्डवाः ।

बलीयांसोऽपि सन्तो यत् तत् सर्वं कुरवो विदुः ॥ १४ ॥

' इसी प्रकार पाण्डवोंने अत्यन्त बलिष्ठ होते हुए भी जो ( तुम्हारे दिये हुए ) पहले और पीछेके सभी क्लेशोंको सहन किया है, उसे सब कौरव जानते हैं ॥ १४ ॥

यन्नः प्राव्राजयः सौम्य अजिनैः प्रतिवासितान् ।

तद् दुःखमतितिक्षाम मा वधिष्म कुरूनिति ॥ १५ ॥

पृष्ठ 227

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उस ‘ सौम्य! तुमने हमलोगोंको मृगछाला पहनाकर जो वनमें निर्वासित कर दिया, दुःखको भी हम इसलिये सह लेते हैं कि हमें कौरवोंका वध न करना पड़े ॥ १५ ॥

यत् कुन्तीं समतिक्रम्य कृष्णां केशेष्वधर्षयत् ।

दुःशासनस्तेऽनुमते तच्चास्माभिरुपेक्षितम् ॥ १६ ॥

' तुम्हारी अनुमतिसे दुःशासनने माता कुन्तीकी उपेक्षा करके जो द्रौपदीके केश पकड़ लिये, उस अपराधकी भी हमने इसीलिये उपेक्षा कर दी है ॥ १६ ॥

अथोचितं स्वकं भागं लभेमहि परंतप ।

निवर्तय परद्रव्याद् बुद्धिं गृद्धां नरर्षभ ॥ १७ ॥

‘ परंतप! परंतु अब हम अपना उचित भाग निश्चय ही लेंगे । नरश्रेष्ठ! तुम दूसरोंके धनसे अपनी लोभयुक्त बुद्धि हटा लो ॥ १७ ॥

शान्तिरेवं भवेद् राजन् प्रीतिश्चैव परस्परम् ।

राज्यैकदेशमपि नः प्रयच्छ शममिच्छताम् ॥ १८ ॥

' राजन्! इस प्रकार हमलोगोंमें परस्पर शान्ति एवं प्रीति बनी रह सकती है । हम शान्ति चाहते हैं; भले ही तुम हमें राज्यका एक हिस्सा ही दे दो ॥ १८ ॥

अविस्थलं वृकस्थलं माकन्दीं वारणावतम् ।

अवसानं भवत्वत्र किंचिदेकं च पञ्चमम् ॥ १ ९ ॥

‘ अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत तथा पाँचवाँ कोई भी एक गाँव दे दो ।

इसीपर युद्धकी समाप्ति हो जायगी ॥ १ ९ ॥

भ्रातॄणां देहि पञ्चानां पञ्च ग्रामान् सुयोधन ।

शान्तिर्नोऽस्तु महाप्राज्ञ ज्ञातिभिः सह संजय ॥ २० ॥

‘ सुयोधन! हम पाँच भाइयोंको पाँच गाँव दे दो । ' महाप्राज्ञ संजय! ऐसा हो जानेपर अपने कुटुम्बीजनोंके साथ हमलोगोंकी शान्ति बनी रहेगी ॥ २० ॥

भ्राता भ्रातरमन्वेतु पिता पुत्रेण युज्यताम् ।

स्मयमानाः समायान्तु पञ्चालाः कुरुभिः सह ॥ २१ ॥

अक्षतान् कुरुपाञ्चालान् पश्येयमिति कामये ।

सर्वे सुमनसस्तात शाम्याम भरतर्षभ ॥ २२ ॥

‘ भाई - भाईसे मिले और पिता पुत्रसे मिले । पांचालदेशीय क्षत्रिय कुरुवंशियोंके साथ मुसकराते हुए मिलें। मेरी यही कामना है कि कौरवों तथा पांचालोंको अक्षतशरीर देखूँ । तात! भरतश्रेष्ठ दुर्योधन! हम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर शान्त हो जायँ, ऐसी चेष्टा करो ' ॥ २१-२२ ॥

अलमेव शमायास्मि तथा युद्धाय संजय ।

धर्मार्थयोरलं चाहं मृदवे दारुणाय च ॥ २३ ॥

पृष्ठ 228

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संजय! मैं शान्ति रखनेमें भी समर्थ हूँ और युद्ध करनेमें भी । धर्म और अर्थके विषयका भी मुझे ठीक-ठीक ज्ञान है । मैं समयानुसार कोमल भी हो सकता हूँ और कठोर भी ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरसंदेशे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरसंदेशविषयक इकतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 229

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द्वात्रिंशोऽध्यायः अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना वैशम्पायन उवाच

( धर्मराजस्य तु वचः श्रुत्वा पार्थो धनंजयः ।

उवाच संजयं तत्र वासुदेवस्य शृण्वतः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरकी बात सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए वहाँ संजयसे इस प्रकार कहा । अर्जुन उवाच

पितामहं शान्तनवं धृतराष्ट्रं च संजय ।

द्रोणं सपुत्रं शल्यं च महाराजं च बाह्निकम् ॥

विकर्णं सोमदत्तं च शकुनिं चापि सौबलम् ।

विविंशतिं चित्रसेनं जयत्सेनं च संजय ॥

भगदत्तं तथा चैव शूरं रणकृतां वरम् ॥

ये चाप्यन्ये कुरवस्तत्र सन्ति राजानश्चेद् भूमिपालाः समेताः । युयुत्सवः पार्थिवाः सैन्धवाश्च समानीता धार्तराष्ट्रेण सूत । यथान्यायं कुशलं वन्दनं च समागमे मद्वचनेन वाच्याः । ततो ब्रूयाः संजय राजमध्ये दुर्योधनं पापकृतां प्रधानम् ॥ अर्जुन बोले- संजय! शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, धृतराष्ट्र, पुत्रसहित द्रोणाचार्य, महाराज शल्य, बाह्लीक, विकर्ण, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, विविंशति, चित्रसेन, जयत्सेन तथा योद्धाओंमें श्रेष्ठ शूरवीर भगदत्त- इन सबसे और दूसरे भी जो कौरव वहाँ रहते हैं, युद्धकी इच्छासे जो - जो राजा वहाँ एकत्र हुए हैं तथा दुर्योधनने जिन - जिन भूमिपालों और सिंधुदेशीय वीरोंको बुला रखा है, उन सबसे भी यथोचित रीतिसे मिलकर मेरी ओरसे कुशल और अभिवादन कहना । तत्पश्चात् राजाओंकी मण्डलीमें पापियोंके सिरमौर दुर्योधनको मेरा संदेश सुनादेना ।

पृष्ठ 230

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वैशम्पायन उवाच एवं प्रतिष्ठाप्य धनंजयस्तं ततोऽर्थवद् धर्मवच्चैव पार्थः । उवाच वाक्यं स्वजनप्रहर्षं वित्रासनं धृतराष्ट्रात्मजानाम् ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार कुन्तीपुत्र धनंजयने संजयको जानेकी अनुमति देकर अर्थ और धर्मसे युक्त बात कही, जो स्वजनोंको हर्ष देनेवाली तथा धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भयभीत करनेवाली थी । अर्जुनेन समादिष्टस्तथेत्युक्त्वा तु संजयः । पार्थानामन्त्रयामास केशवं च यशस्विनम् ॥ ) अर्जुनके इस प्रकार आदेश देनेपर संजयने ' तथास्तु' कहकर उसे शिरोधार्य किया । तत्पश्चात् उसने अन्य कुन्तीकुमारों तथा यशस्वी भगवान् श्रीकृष्णसे जानेकी अनुमति माँगी ।

अनुज्ञातः पाण्डवेन प्रययौ संजयस्तदा ।

शासनं धृतराष्ट्रस्य सर्वं कृत्वा महात्मनः ॥ १ ॥

पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर संजय महामना राजा धृतराष्ट्रके सम्पूर्ण आदेशोंका पालन करके उस समय वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ १ ॥

सम्प्राप्य हास्तिनपुरं शीघ्रमेव प्रविश्य च ।

अन्तःपुरं समास्थाय द्वाःस्थं वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥

हस्तिनापुर पहुँचकर उन्होंने शीघ्र ही राजभवनमें प्रवेश किया और अन्तःपुरके निकट जाकर द्वारपालसे कहा— ॥ २ ॥

आचक्ष्व धृतराष्ट्राय द्वाःस्थ मां समुपागतम् ।

सकाशात् पाण्डुपुत्राणां संजयं मा चिरं कृथाः ॥ ३ ॥

‘द्वारपाल! तुम राजा धृतराष्ट्रको मेरे आनेकी सूचना दो और कहो — ' पाण्डवोंके पाससे

संजय आया है । ' विलम्ब न करो ॥ ३ ॥

जागर्ति चेदभिवदेस्त्वं हि द्वाःस्थ प्रविशेयं विदितो भूमिपस्य । निवेद्यमत्रात्ययिकं हि मेऽस्ति द्वाःस्थोऽथ श्रुत्वा नृपतिं जगाम ॥ ४ ॥

‘ द्वारपाल! यदि महाराज जागते हों तो तुम उन्हें मेरा प्रणाम कहना । उनकी सूचना मिल जानेपर मैं भीतर प्रवेश करूँगा । मुझे उनसे एक आवश्यक निवेदन करना है । ' यह सुनकर द्वारपाल महाराजके पास गया और इस प्रकार बोला ॥ ४ ॥