03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 2321–2330
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2321–2330
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तदनन्तर विभिन्न जनपदोंके स्वामी नरेशगण अमिततेजस्वी भीष्मकी यह धर्मविषयक उत्तम निष्ठा देखकर बड़े विस्मित हुए ॥ ६० ॥
उपधानं ततो दत्त्वा पितुस्ते मनुजेश्वराः ॥ ६१ ॥
सहिताः पाण्डवाः सर्वे कुरवश्च महारथाः ।
उपगम्य महात्मानं शयानं शयने शुभे ॥ ६२ ॥
तेऽभिवाद्य ततो भीष्मं कृत्वा च त्रिः प्रदक्षिणम् ।
विधाय रक्षां भीष्मस्य सर्व एव समन्ततः ॥ ६३ ॥
वीराः स्वशिबिराण्येव ध्यायन्तः परमातुराः ।
निवेशायाभ्युपागच्छन् सायाह्ने रुधिरोक्षिताः ॥ ६४ ॥
राजन्! आपके पितृतुल्य भीष्मको उपर्युक्त तकिया देकर उन नरेश, पाण्डव तथा महारथी कौरव सभीने एक साथ सुन्दर बाणशय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके उनकी तीन बार प्रदक्षिणा की और सब ओरसे भीष्मकी रक्षाकी व्यवस्था करके सभी वीर अपने शिविरको ही चल दिये । वे अत्यन्त आतुर होकर भीष्मका ही चिन्तन कर रहे थे । सायंकालमें खूनसे लथपथ हुए वे सब लोग अपने निवासस्थानपर गये ॥ ६१–६४ ॥
निविष्टान् पाण्डवांश्चैव प्रीयमाणान् महारथान् ।
भीष्मस्य पतने हृष्टानुपगम्य महाबलः ॥ ६५ ॥
उवाच माधवः काले धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
दिष्ट्या जयसि कौरव्य दिष्ट्या भीष्मो निपातितः ॥ ६६ ॥
पाण्डव महारथी भीष्मके गिर जानेसे बहुत प्रसन्न थे और हर्षमें भरकर विश्राम कर रहे थे । उस समय महाबली भगवान् श्रीकृष्ण यथासमय उनके पास पहुँचकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले — ' कुरुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि तुम जीत रहे हो । यह भी भाग्यकी ही बात है कि भीष्म रथसे गिरा दिये गये ॥ ६५-६६ ॥
अवध्यो मानुषैरेव सत्यसंधो महारथः ।
अथवा दैवतैः सार्धं सर्वशास्त्रस्य पारगः ॥ ६७ ॥
त्वां तु चक्षुर्हणं प्राप्य दग्धो घोरेण चक्षुषा । ‘ ये सत्यप्रतिज्ञ महारथी भीष्म सम्पूर्ण शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् थे । इन्हें मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता मिलकर भी मार नहीं सकते थे। आप दृष्टिपातमात्रसे ही दूसरोंको भस्म करनेमें समर्थ हैं । आपके पास पहुँचकर भीष्म आपकी घोर दृष्टिसे ही नष्ट हो गये हैं ' ॥ ६७ ॥ एवमुक्तो धर्मराजः प्रत्युवाच जनार्दनम् ॥ ६८ ॥
तव प्रसादाद् विजयः क्रोधात् तव पराजयः ।
त्वं हि नः शरणं कृष्ण भक्तानामभयंकरः ॥ ६ ९ ॥
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उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णको इस प्रकार उत्तर दिया -' श्रीकृष्ण! आप हमारे आश्रय हैं तथा आप ही भक्तोंको अभय दान करनेवाले हैं । आपके ही कृपा- प्रसादसे विजय होती है और आपके ही रोषसे पराजय प्राप्त होती है ॥ ६८-६९ ॥
अनाश्चर्यो जयस्तेषां येषां त्वमसि केशव ।
रक्षिता समरे नित्यं नित्यं चापि हिते रतः ॥ ७० ॥
सर्वथा त्वां समासाद्य नाश्चर्यमिति मे मतिः । ‘ केशव! आप समरभूमिमें सदा जिनकी रक्षा करते हैं और नित्यप्रति जिनके हितमें तत्पर रहते हैं, उनकी विजय हो तो यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । आपकी शरण लेनेपर सर्वथा विजयकी प्राप्ति कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, ऐसा मेरा निश्चय है ' ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच स्मयमानो जनार्दनः ।
तवैवैतद् युक्तरूपं वचनं पार्थिवोत्तम ॥ ७१ ॥
युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर जनार्दन श्रीकृष्णने मुसकराते हुए कहा – ' नृपश्रेष्ठ! आपका कथन सर्वथा युक्तिसंगत है ' ॥ ७१ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मोपधानदाने विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
इसप्रकारश्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्मको तकिया देनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥
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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना संजय उवाच
व्युष्टायां तु महाराज शर्वर्यां सर्वपार्थिवाः ।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च उपातिष्ठन् पितामहम् ॥ १ ॥
तं वीरशयने वीरं शयानं कुरुसत्तम ।
अभिवाद्योपतस्थुर्वै क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! जब रात बीती और सबेरा हुआ, उस समय सब राजा, पाण्डव तथा आपके पुत्र पुनः वीर- शय्यापर सोये हुए वीर पितामह भीष्मकी सेवामें उपस्थित हुए । कुरुश्रेष्ठ! वे सब क्षत्रिय क्षत्रियशिरोमणि भीष्मजीको प्रणाम करके उनके समीप खड़े हो गये ॥ १-२ ॥
कन्याश्चन्दनचूर्णैश्च लाजैर्माल्यैश्च सर्वशः ।
अवाकिरञ्छान्तनवं तत्र गत्वा सहस्रशः ॥ ३ ॥
सहस्रों कन्याएँ वहाँ जाकर चन्दन - चूर्ण, लाजा ( खील) और माला- फूल आदि सब प्रकारकी शुभ सामग्री शान्तनुनन्दन भीष्मके ऊपर बिखेरने लगीं ॥ ३ ॥
स्त्रियो वृद्धास्तथा बालाः प्रेक्षकाश्च पृथग्जनाः ।
समभ्ययुः शान्तनवं भूतानीव तमोनुदम् ॥ ४ ॥
स्त्रियाँ, बूढ़े, बालक तथा अन्य साधारण जन शान्तनुकुमार भीष्मजीका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये, मानो समस्त प्रजा अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यकी उपासनाके लिये उपस्थित हुई हो ॥ ४ ॥
तूर्याणि शतसंख्यानि तथैव नटनर्तकाः ।
शिल्पिनश्च तथाऽऽजग्मुः कुरुवृद्धं पितामहम् ॥ ५ ॥
सैकड़ों बाजे और बजानेवाले, नट, नर्तक और बहुत- से शिल्पी कुरुवंशके वृद्ध पुरुष पितामह भीष्मके पास आये ॥ ५ ॥
उपारम्य च युद्धेभ्यः संनाहान् विप्रमुच्य ते ।
आयुधानि न निक्षिप्य सहिताः कुरुपाण्डवाः ॥ ६ ॥
अन्वासन्त दुराधर्षं देवव्रतमरिंदमम् ।
अन्योन्यं प्रीतिमन्तस्ते यथापूर्वं यथावयः ॥ ७ ॥
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कौरव तथा पाण्डव युद्धसे निवृत्त हो कवच खोलकर अस्त्र- शस्त्र नीचे डालकर पहलेकी भाँति परस्पर प्रेमभाव रखते हुए अवस्थाकी छोटाई-बड़ाईके अनुसार यथोचित क्रमसे शत्रुदमन दुर्जय वीर देवव्रत भीष्मके समीप एक साथ बैठ गये ॥ ६-७ ॥
सा पार्थिवशताकीर्णा समितिर्भीष्मशोभिता ।
शुशुभे भारती दीप्ता दिवीवादित्यमण्डलम् ॥ ८ ॥
सैकड़ों राजाओंसे भरी और भीष्मसे सुशोभित हुई वह भरतवंशियोंकी दीप्तिशालिनी सभा आकाशमें सूर्यमण्डलकी भाँति उस रणभूमिमें शोभा पाने लगी ॥ ८ ॥
विबभौ च नृपाणां सा गंगासुतमुपासताम् ।
देवानामिव देवेशं पितामहमुपासताम् ॥ ९ ॥
गंगानन्दन भीष्मके पास बैठी हुई राजाओंकी वह मण्डली देवेश्वर ब्रह्माजीकी उपासना करनेवाले देवताओंके समान सुशोभित हो रही थी ॥ ९ ॥
भीष्मस्तु वेदनां धैर्यान्निगृह्य भरतर्षभ ।
अभितप्तः शरैश्चैव निःश्वसन्नुरगो यथा ॥ १० ॥
शराभितप्तकायोऽपि शस्त्रसम्पातमूर्च्छितः ।
पानीयमिति सम्प्रेक्ष्य राज्ञस्तान् प्रत्यभाषत ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! भीष्मजी बाणोंसे संतप्त होकर सर्पके समान लम्बी साँस खींच रहे थे । वे अपनी वेदनाको धैर्यपूर्वक सह रहे थे । बाणोंकी जलनसे उनका सारा शरीर जल रहा था । वे शस्त्रोंके आघातसे मूर्च्छित- से हो रहे थे । उस समय उन्होंने राजाओंकी ओर देखकर केवल इतना ही कहा ' पानी' ॥ १०-११ ॥
ततस्ते क्षत्रिया राजन्नुपाजहुः समन्ततः ।
भक्ष्यानुच्चावचान् राजन् वारिकुम्भांश्च शीतलान् ॥ १२ ॥
राजन्! तब वे क्षत्रियनरेश चारों ओरसे भोजनकी उत्तमोत्तम सामग्री और शीतल जलसे भरे हुए घड़े ले आये ॥ १२ ॥
उपानीतं तु पानीयं दृष्ट्वा शान्तनवोऽब्रवीत् ।
नाद्यातीता मया शक्या भोगाः केचन मानुषाः ॥ १३ ॥
अपक्रान्तो मनुष्येभ्यः शरशय्यां गतो ह्यहम् ।
प्रतीक्षमाणस्तिष्ठामि निवृत्तिं शशिसूर्ययोः ॥ १४ ॥
उनके द्वारा लाये हुए उस जलको देखकर शान्तनुनन्दन भीष्मने कहा — ‘ अब मैं मनुष्यलोकके कोई भी भोग अपने उपयोगमें नहीं ला सकता, मैं उन्हें छोड़ चुका हूँ । यद्यपि यहाँ बाणशय्यापर सो रहा हूँ, तथापि मनुष्यलोकसे ऊपर उठ चुका हूँ । केवल सूर्य-चन्द्रमाके उत्तरपथपर आनेकी प्रतीक्षामें यहाँ रुका हुआ हूँ' ॥ १३-१४ ॥
एवमुक्त्वा शान्तनवो निन्दन् वाक्येन पार्थिवान् ।
अर्जुनं द्रष्टुमिच्छामीत्यभ्यभाषत भारत ॥ १५ ॥
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भारत! ऐसा कहकर शान्तनुनन्दन भीष्मने अपनी वाणीद्वारा अन्य राजाओंकी निन्दा करते हुए कहा — ' अब मैं अर्जुनको देखना चाहता हूँ' ॥ १५ ॥
अथोपेत्य महाबाहुरभिवाद्य पितामहम् ।
अतिष्ठत् प्राञ्जलिः प्रह्नः किं करोमीति चाब्रवीत् ॥ १६ ॥
तब महाबाहु अर्जुन पितामह भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़े खड़े हो गये और विनयपूर्वक बोले - ' मेरे लिये क्या आज्ञा है, मैं कौन - सी सेवा करूँ? ' ॥ १६ ॥
तं दृष्ट्वा पाण्डवं राजन्नभिवाद्याग्रतः स्थितम् ।
अभ्यभाषत धर्मात्मा भीष्मः प्रीतो धनंजयम् ॥ १७ ॥
राजन्! प्रणाम करके आगे खड़े हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनको देखकर धर्मात्मा भीष्म बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले- ॥ १७ ॥
दह्यतीव शरीरं मे संवृतस्य तवेषुभिः ।
मर्माणि परिदूयन्ते मुखं च परिशुष्यति ॥ १८ ॥
' अर्जुन! तुम्हारे बाणोंसे मेरे सम्पूर्ण अंग बिंधे हुए हैं; अतः मेरा यह शरीर दग्ध - सा हो रहा है । सारे मर्मस्थानोंमें अत्यन्त पीड़ा हो रही है । मुँह सूखता जा रहा है ॥ १८ ॥
वेदनार्तशरीरस्य प्रयच्छापो ममार्जुन ।
त्वं हि शक्तो महेष्वास दातुमापो यथाविधि ॥ १ ९ ॥
‘ महाधनुर्धर अर्जुन! वेदनासे पीड़ित शरीरवाले मुझ वृद्धको तुम पानी लाकर दो । तुम्हीं विधिपूर्वक मेरे लिये दिव्य जल प्रस्तुत करनेमें समर्थ हो ' ॥ १ ९ ॥
अर्जुनस्तु तथेत्युक्त्वा रथमारुह्य वीर्यवान् ।
अधिज्यं बलवत् कृत्वा गाण्डीवं व्याक्षिपद् धनुः ॥ २० ॥
तब ' बहुत अच्छा ' कहकर पराक्रमी अर्जुन रथपर आरूढ़ हो गये और गाण्डीव धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे खींचने लगे ॥ २० ॥
तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।
वित्रेसुः सर्वभूतानि सर्वे श्रुत्वा च पार्थिवाः ॥ २१ ॥
उनके धनुषकी टंकारध्वनि वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी । उसे सुनकर सभी प्राणी और समस्त भूपाल डर गये ॥ २१ ॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा रथेन रथिनां वरः ।
शयानं भरतश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ २२ ॥
संधाय च शरं दीप्तमभिमन्त्र्य स पाण्डवः पर्जन्यास्त्रेण संयोज्य सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ २३ ॥
अविध्यत् पृथिवीं पार्थः पार्श्वे भीष्मस्य दक्षिणे ।
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अर्जुनका बाणद्वारा पृथ्वीसे जल प्रकट करके भीष्मजीको पिलाना तब रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र अर्जुनने शरशय्यापर सोये हुए सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें उत्तम भरतशिरोमणि भीष्मकी रथद्वारा ही परिक्रमा करके अपने धनुषपर एक तेजस्वी बाणका संधान किया और सब लोगोंके देखते - देखते मन्त्रोच्चारणपूर्वक उस बाणको पर्जन्यास्त्रसे संयुक्त करके भीष्मके दाहिने पार्श्वमें पृथ्वीपर उसे चलाया ॥ २२-२३३ ॥ उत्पपात ततो धारा वारिणो विमला शुभा ॥ २४ ॥
शीतस्यामृतकल्पस्य दिव्यगन्धरसस्य च ।
अतर्पयत् ततः पार्थः शीतया जलधारया ॥ २५ ॥
भीष्मं कुरूणामृषभं दिव्यकर्मपराक्रमम् । फिर तो शीतल, अमृतके समान मधुर तथा दिव्य सुगन्ध एवं दिव्यरससे संयुक्त जलकी सुन्दर स्वच्छ धारा ऊपरकी ओर उठ - ( कर भीष्मके मुखमें पड़ )-ने लगी । उस शीतल जलधारासे अर्जुनने दिव्यकर्म एवं पराक्रमवाले कुरुश्रेष्ठ भीष्मको तृप्त कर दिया ॥ २४-२५ कर्मणा तेन पार्थस्य शक्रस्येव विकुर्वतः ॥ २६ ॥
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विस्मयं परमं जग्मुस्ततस्ते वसुधाधिपाः । इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनके उस अद्भुत कर्मसे वहाँ बैठे हुए समस्त भूपाल बड़े विस्मयको प्राप्त हुए ॥ २६३ ॥
तत् कर्म प्रेक्ष्य बीभत्सोरतिमानुषविक्रमम् ॥ २७ ॥
सम्प्रावेपन्त कुरवो गावः शीतार्दिता इव । अर्जुनका वह अलौकिक कर्म देखकर समस्त कौरव सर्दीकी सतायी हुई गौओंके समान थर- थर काँपने लगे ॥ २७ ॥
विस्मयाच्चोत्तरीयाणि व्याविध्यन् सर्वतो नृपाः ॥ २८ ॥
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् । वहाँ बैठे हुए नरेशगण आश्चर्यसे चकित हो सब ओर अपने दुपट्टे हिलाने लगे । चारों ओर शंख और नगाड़ोंकी गम्भीर ध्वनि गूँज उठी ॥ २८३ ॥
तृप्तः शान्तनवश्चापि राजन् बीभत्सुमब्रवीत् ॥ २ ९ ॥ सर्वपार्थिववीराणां संनिधौ पूजयन्निव । राजन्! उस जलसे तृप्त होकर शान्तनुनन्दन भीष्मने अर्जुनसे समस्त वीरनरेशोंके समीप उनकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा- ॥ २ ९ ३ ॥ नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन ॥ ३० ॥
कथितो नारदेनासि पूर्वर्षिरमितद्युते ।
वासुदेवसहायस्त्वं महत् कर्म करिष्यसि ॥ ३१ ॥
यन्नोत्सहति देवेन्द्रः सह देवैरपि ध्रुवम् । ' महाबाहु कौरवनन्दन! तुममें ऐसे पराक्रमका होना आश्चर्यकी बात नहीं है । अमिततेजस्वी वीर! मुझे नारदजीने पहले ही बता दिया था कि तुम पुरातन महर्षि नर हो और नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे इस भूतलपर ऐसे - ऐसे महान् कर्म करोगे, जिन्हें निश्चय ही सम्पूर्ण देवताओंके साथ देवराज इन्द्र भी नहीं कर सकते ॥ ३०-३१ ॥ विदुस्त्वां निधनं पार्थ सर्वक्षत्रस्य तद्विदः ॥ ३२ ॥
धनुर्धराणामेकस्त्वं पृथिव्यां प्रवरो नृषु ॥ ३३ ॥
‘ पार्थ! जानकार लोग तुम्हें सम्पूर्ण क्षत्रियोंकी मृत्युरूप जानते हैं । तुम भूतलपर मनुष्योंमें श्रेष्ठ और धनुर्धरोंमें प्रधान हो ॥ ३२-३३ ॥
मनुष्या जगति श्रेष्ठाः पक्षिणां पतगेश्वरः ।
सरितां सागरः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् ॥ ३४ ॥
' जंगम प्राणियोंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं, पक्षियोंमें पक्षिराज गरुड़ श्रेष्ठ माने जाते हैं, सरिताओंमें समुद्र श्रेष्ठ हैं और चौपायोंमें गौ उत्तम मानी गयी है ॥ ३४ ॥
आदित्यस्तेजसां श्रेष्ठो गिरीणां हिमवान् वरः ।
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जातीनां ब्राह्मणः श्रेष्ठः श्रेष्ठस्त्वमसि धन्विनाम् ॥ ३५ ॥
‘ तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य श्रेष्ठ हैं, पर्वतोंमें हिमालय महान् है, जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ है और तुम सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ हो ॥ ३५ ॥
न वै श्रुतं धार्तराष्ट्रेण वाक्यं मयोच्यमानं विदुरेण चैव । द्रोणेन रामेण जनार्दनेन मुहुर्मुहुः संजयेनापि चोक्तम् ॥ ३६ ॥
‘ मैंने, विदुरने, द्रोणाचार्यने, परशुरामजीने, भगवान् श्रीकृष्णने तथा संजयने भी बारंबार युद्ध न करनेकी सलाह दी है; परंतु दुर्योधनने हमलोगोंकी बातें नहीं सुनीं ॥ परीतबुद्धिर्हि विसंज्ञकल्पो दुर्योधनो न च तच्छ्रद्दधाति । स शेष्यते वै निहतश्चिराय शास्त्रातिगो भीमबलाभिभूतः ॥ ३७ ॥
' दुर्योधनकी बुद्धि विपरीत हो गयी है, वह अचेत- सा हो रहा है; इसलिये हमलोगोंकी बातपर विश्वास नहीं करता है । वह शास्त्रोंकी मर्यादाका उल्लंघन कर रहा है । इसलिये भीमसेनके बलसे पराजित हो मारा जाकर रणभूमिमें दीर्घकालके लिये सो जायगा' ॥ ३७ ॥
एतच्छ्रुत्वा तद्वचः कौरवेन्द्रो दुर्योधनो दीनमना बभूव । तमब्रवीच्छान्तनवोऽभिवीक्ष्य निबोध राजन् भव वीतमन्युः ॥ ३८ ॥
बात सुनकर कौरवराज दुर्योधन मन -ही--मन बहुत दुःखी हो गया भीष्मजीकी यह । तबशान्तनुनन्दन भीष्मने उसकी ओर देखकर कहा - ' राजन्! मेरी बातपर ध्यान दो और क्रोधशून्य हो जाओ ॥ ३८ ॥
दृष्टं दुर्योधनैतत् ते यथा पार्थेन धीमता ।
जलस्य धारा जनिता शीतस्यामृतगन्धिनः ॥ ३ ९ ॥
' दुर्योधन! बुद्धिमान् अर्जुनने जिस प्रकार शीतल, अमृतके समान मधुर गन्धयुक्त जलकी धारा प्रकट की है, उसे तुमने प्रत्यक्ष देख लिया है ॥ ३ ९ ॥
एतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन् नान्यः कश्चन विद्यते ।
आग्नेयं वारुणं सौम्यं वायव्यमथ वैष्णवम् ॥ ४० ॥
ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं पारमेष्ठ्यं प्रजापतेः ।
धातुस्त्वष्टुश्च सवितुर्वैवस्वतमथापि वा ॥ ४१ ॥
सर्वस्मिन् मानुषे लोके वेत्त्येको हि धनंजयः ।
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कृष्णो वा देवकीपुत्रो नान्यो वेदेह कश्चन ॥ ४२ ॥
‘ इस संसारमें ऐसा पराक्रम करनेवाला दूसरा कोई नहीं है | आग्नेय, वारुण, सौम्य, वायव्य, वैष्णव, ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म, पारमेष्ठ्य, प्राजापत्य, धात्र, त्वाष्ट्र, सावित्र और वैवस्वत आदि सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंको इस समस्त मानव जगत्में एकमात्र अर्जुन अथवा देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण जानते हैं । दूसरा कोई यहाँ इन अस्त्रोंको नहीं जानता है ॥ ४०–४२ ॥
अशक्यः पाण्डवस्तात युद्धे जेतुं कथंचन ।
अमानुषाणि कर्माणि यस्यैतानि महात्मनः ॥ ४३ ॥
तेन सत्त्ववता संख्ये शूरेणाहवशोभिना ।
कृतिना समरे राजन् संधिर्भवतु मा चिरम् ॥ ४४ ॥
'तात! पाण्डुपुत्र अर्जुनको युद्धमें किसी प्रकार भी जीतना असम्भव है । जिन महामनस्वी पुरुषके ये अलौकिक कर्म प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं; जो धैर्यवान्, युद्धमें शूरता दिखानेवाले तथा संग्राममें सुशोभित होनेवाले हैं, राजन्! उन अस्त्र-विद्याके विद्वान् अर्जुनके साथ इस समरभूमिमें तुम्हारी शीघ्र संधि हो जानी चाहिये। इसमें विलम्ब न हो ॥ ४३-४४ ॥
यावत् कृष्णो महाबाहुः स्वाधीनः कुरुसत्तम ।
तावत् पार्थेन शूरेण संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४५ ॥
'तात! कुरुश्रेष्ठ! जबतक महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण अपने लोगोंके प्रेमके अधीन हैं, तभीतक शूरवीर अर्जुनके साथ तुम्हारी संधि हो जाय तो ठीक है ॥ ४५ ॥
यावन्न ते चमूः सर्वाः शरैः संनतपर्वभिः ।
नाशयत्यर्जुनस्तावत् संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४६ ॥
‘ तात! जबतक अर्जुन झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा तुम्हारी सारी सेनाका विनाश नहीं कर डालते हैं, तभीतक उनके साथ तुम्हारी संधि हो जानी चाहिये ॥ ४६ ॥
यावत् तिष्ठन्ति समरे हतशेषाः सहोदराः ।
नृपाश्च बहवो राजंस्तावत् संधिः प्रयुज्यताम् ॥ ४७ ॥
‘ राजन्! इस समरभूमिमें मरनेसे बचे हुए तुम्हारे सहोदर भाई जबतक मौजूद हैं और जबतक बहुत - से नरेश भी जीवन धारण कर रहे हैं, तभीतक तुम अर्जुनके साथ संधि कर लो ॥ ४७ ॥
न निर्दहति ते यावत् क्रोधदीप्तेक्षणश्चमूम् ।
युधिष्ठिरो रणे तावत् संधिस्ते तात युज्यताम् ॥ ४८ ॥
‘ तात! जबतक युधिष्ठिर रणभूमिमें क्रोधसे प्रज्वलितनेत्र होकर तुम्हारी सारी सेनाको भस्म नहीं कर डालते हैं, तभीतक उनके साथ तुम्हें संधि कर लेनी चाहिये ॥ ४८ ॥
नकुलः सहदेवश्च भीमसेनश्च पाण्डवः ।
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यावच्चमूं महाराज नाशयन्ति न सर्वशः ॥ ४ ९ ॥
तावत् ते पाण्डवैर्वीरः सौहार्दं मम रोचते ।
युद्धं मदन्तमेवास्तु तात संशाम्य पाण्डवैः ॥ ५० ॥
‘ महाराज! नकुल- सहदेव तथा पाण्डुपुत्र भीमसेन – ये सब मिलकर जबतक तुम्हारी सेनाका सर्वनाश नहीं कर डालते हैं, तभीतक पाण्डववीरोंके साथ तुम्हारा सौहार्द स्थापित हो जाय, यही मुझे अच्छा लगता है । तात! मेरे साथ ही इस युद्धका भी अन्त हो जाय । तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ॥ ४ ९ -५० ॥
एतत् तु रोचतां वाक्यं यदुक्तोऽसि मयानघ ।
एतत् क्षेममहं मन्ये तव चैव कुलस्य च ॥ ५१ ॥
‘ अनघ! मैंने जो बातें तुमसे कही हैं, वे तुम्हें रुचिकर प्रतीत हों । मैं संधिको ही तुम्हारे तथा कौरवकुलके लिये कल्याणकारी मानता हूँ ॥ ५१ ॥
त्यक्त्वा मन्युं व्युपशाम्यस्व पार्थैः पर्याप्तमेतद् यत् कृतं फाल्गुनेन । भीष्मस्यान्तादस्तु वः सौहृदं च जीवन्तु शेषाः साधु राजन् प्रसीद ॥ ५२ ॥
'राजन्! तुम क्रोध छोड़कर कुन्तीकुमारोंके साथ संधि स्थापित कर लो । अर्जुनने आजतक जो कुछ किया है, उतना ही बहुत है । मुझ भीष्मके जीवनका अन्त होनेसे ( तुम्हारे वैरका भी अन्त हो जाय ) तुमलोगोंमें प्रेम- सम्बन्ध स्थापित हो और जो लोग मरनेसे बचे हैं,
वे अच्छी तरह जीवित रहें । इसके लिये तुम प्रसन्न हो जाओ ॥ ५२ ॥
राज्यस्यार्धं दीयतां पाण्डवाना- मिन्द्रप्रस्थं धर्मराजोऽभियातु । मा मित्रध्रुक् पार्थिवानां जघन्यः पापां कीर्तिं प्राप्स्यसे कौरवेन्द्र ॥ ५३ ॥
‘ तुम पाण्डवोंका आधा राज्य दे दो । धर्मराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ चले जायँ । कौरवराज! ऐसा करनेसे तुम राजाओंमें मित्रद्रोही और नीच नहीं कहलाओगे तथा तुम्हें पापपूर्ण अपयश नहीं प्राप्त होगा ॥ ५३ ॥
ममावसानाच्छान्तिरस्तु प्रजानां संगच्छन्तां पार्थिवाः प्रीतिमन्तः । पिता पुत्रं मातुलं भागिनेयो भ्राता चैव भ्रातरं प्रैतु राजन् ॥ ५४ ॥
‘ राजन्! मेरे जीवनका अन्त होनेसे प्रजाओंमें शान्ति हो जाय। सब राजा प्रसन्नतापूर्वक एक- दूसरेसे मिलें । पिता पुत्रसे, भानजा मामासे और भाई भाईसे मिले ॥ ५४ ॥
न चेदेवं प्राप्तकालं वचो मे