03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 741–750

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750

पृष्ठ 741

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‘ वत्स गालव! अब मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ । ' उनके इस प्रकार आदेश देनेपर गालवने प्रसन्नता प्रकट करते हुए मधुर वाणीमें महातेजस्वी मुनिवर विश्वामित्रसे इस प्रकार पूछा — ' भगवन्! मैं आपको गुरुदक्षिणाके रूपमें क्या दूँ? ॥

दक्षिणाभिरुपेतं हि कर्म सिद्धयति मानद ।

दक्षिणानां हि दाता वै अपवर्गेण युज्यते ॥ २२ ॥

' मानद! दक्षिणायुक्त कर्म ही सफल होता है । दक्षिणा देनेवाले पुरुषको ही सिद्धि प्राप्त होती है ॥

स्वर्गे क्रतुफलं तद्धि दक्षिणा शान्तिरुच्यते ।

किमाहरामि गुर्वर्थं ब्रवीतु भगवानिति ॥ २३ ॥

'दक्षिणा देनेवाला मनुष्य ही स्वर्गमें यज्ञका फल पाता है । वेदमें दक्षिणाको ही शान्तिप्रद बताया गया है । अतः पूज्य गुरुदेव! बतावें कि मैं क्या गुरुदक्षिणा ले आऊँ? ॥ २३ ॥

जानानस्तेन भगवाञ्जितः शुश्रूषणेन वै ।

विश्वामित्रस्तमसकृद् गच्छ गच्छेत्यचोदयत् ॥ २४ ॥

गालवकी सेवा- शुश्रूषासे भगवान् विश्वामित्र उनके वशमें हो गये थे । अतः उनके उपकारको समझते हुए विश्वामित्रने उनसे बार- बार कहा - ' जाओ, जाओ ' ॥

असकृद् गच्छ गच्छेति विश्वामित्रेण भाषितः ।

किं ददानीति बहुशो गालवः प्रत्यभाषत ॥ २५ ॥

उनके द्वारा बारंबार 'जाओ, जाओ' की आज्ञा मिलनेपर भी गालवने अनेक बार आग्रहपूर्वक पूछा — ‘ मैं आपको क्या गुरुदक्षिणा दूँ? ' ॥ २५ ॥

निर्बन्धतस्तु बहुशो गालवस्य तपस्विनः ।

किंचिदागतसंरम्भो विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम् ॥ २६ ॥

तपस्वी गालवके बहुत आग्रह करनेपर विश्वामित्रको कुछ क्रोध आ गया; अतः उन्होंने इस प्रकार कहा- ॥

एकतः श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् ।

अष्टौ शतानि मे देहि गच्छ गालव मा चिरम् ॥ २७ ॥

' गालव! तुम मुझे चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनके कान

एक ओरसे श्याम वर्णके हों । जाओ, देर न करो ' ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ । इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६ ॥

पृष्ठ 742

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पृष्ठ 743

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सप्ताधिकशततमोऽध्यायः गालवकी चिन्ता और गरुड़का आकर उन्हें आश्वासन देना नारद उवाच

एवमुक्तस्तदा तेन विश्वामित्रेण धीमता ।

नास्ते न शेते नाहारं कुरुते गालवस्तदा ॥ १ ॥

नारदजीने कहा — राजन्! उस समय परम बुद्धिमान् विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर गालव मुनि तबसे न कहीं बैठते, न सोते और न भोजन ही करते थे ॥ १ ॥

त्वगस्थिभूतो हरिणश्चिन्ताशोकपरायणः ।

शोचमानोऽतिमात्रं स दह्यमानश्च मन्युना ।

गालवो दुःखितो दुःखाद् विललाप सुयोधन ॥ २ ॥

वे चिन्ता और शोकमें डूबे रहनेके कारण पाण्डुवर्णके हो गये । उनके शरीरमें अस्थि-चर्ममात्र ही शेष रह गये थे । सुयोधन! अत्यन्त शोक करते और चिन्ताकी आगमें दग्ध होते हुए दुःखी गालव मुनि दुःखसे विलाप करने लगे — ॥ २ ॥

कुतः पुष्टानि मित्राणि कुतोऽर्थाः संचयः कुतः ।

हयानां चन्द्रशुभ्राणां शतान्यष्टौ कुतो मम ॥ ३ ॥

‘ मेरे ऐसे मित्र कहाँ, जो धनसे पुष्ट हों? मुझे कहाँसे धन प्राप्त होगा? कहाँ मेरे लिये धन संग्रह करके रखा हुआ है? और कहाँसे मुझे चन्द्रमाके समान श्वेतवर्णवाले आठ सौ घोड़े प्राप्त होंगे? ॥ ३ ॥

कुतो मे भोजने श्रद्धा सुखश्रद्धा कुतश्च मे ।

श्रद्धा'मे जीवितस्यापि छिन्ना किं जीवितेन मे ॥ ४ ॥

' ऐसी दशामें मुझे भोजनकी रुचि कहाँसे हो? सुख भोगनेकी इच्छा कहाँसे हो? और इस जीवनसे भी मुझे क्या प्रयोजन है? इस जीवनको सुरक्षित रखनेके लिये मेरा जो उत्साह था, वह भी नष्ट हो गया ॥ ४ ॥

अहं पारे समुद्रस्य पृथिव्या वा परम्परात् ।

गत्वाऽऽत्मानं विमुञ्चामि किं फलं जीवितेन मे ॥ ५ ॥

‘ मैं समुद्रके उस पार अथवा पृथ्वीसे बहुत दूर जाकर इस शरीरको त्याग दूँगा । अब मेरे जीवित रहनेसे क्या लाभ है? ॥ ५ ॥

अधनस्याकृतार्थस्य त्यक्तस्य विविधैः फलैः ।

ऋणं धारयमाणस्य कुतः सुखमनीहया ॥ ६ ॥

‘ जो निर्धन है, जिसके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि नहीं हुई है तथा जो नाना प्रकारके शुभ कर्मफलोंसे वंचित होकर केवल ऋणका बोझ ढो रहा है, ऐसे मनुष्यको बिना उद्यमके

पृष्ठ 744

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जीवन धारण करनेसे क्या सुख होगा? ॥ ६ ॥

सुहृदां हि धनं भुक्त्वा कृत्वा प्रणयमीप्सितम् ।

प्रतिकर्तुमशक्तस्य जीवितान्मरणं वरम् ॥ ७ ॥

‘ जो इच्छानुसार प्रेम- सम्बन्ध स्थापित करके सुहृदोंका धन भोगकर उनका प्रत्युपकार करनेमें असमर्थ हो, उसके जीनेसे मर जाना ही अच्छा है ॥ ७ ॥

प्रतिश्रुत्य करिष्येति कर्तव्यं तदकुर्वतः ।

मिथ्यावचनदग्धस्य इष्टापूर्तं प्रणश्यति ॥ ८ ॥

‘ जो ‘ करूँगा' ऐसा कहकर किसी कार्यको पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ले, परंतु आगे चलकर उस कर्तव्यका पालन न कर सके, उस असत्यभाषणसे दग्ध हुए पुरुषके ‘ इष्ट ' और ‘ आपूर्त ’ सभी नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ ॥

न रूपमनृतस्यास्ति नानृतस्यास्ति संततिः ।

नानृतस्याधिपत्यं च कुत एव गतिः शुभा ॥ ९ ॥

' सत्यसे शून्य मनुष्यका जीवन नहींके बराबर है । मिथ्यावादीको संतति नहीं प्राप्त होती । झूठेको प्रभुत्व नहीं मिलता, फिर उसे शुभ गति कैसे प्राप्त हो सकती है? ॥ ९ ॥

कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् ।

अश्रद्धेयः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ १० ॥

'कृतघ्न मनुष्यको सुयश कहाँ? स्थान या प्रतिष्ठा कहाँ और सुख भी कहाँ है? कृतघ्न मानव अविश्वसनीय होता है, उसका कभी उद्धार नहीं होता है ॥ १० ॥

न जीवत्यधनः पापः कुतः पापस्य तन्त्रणम् ।

पापो ध्रुवमवाप्नोति विनाशं नाशयन् कृतम् ॥ ११ ॥

'निर्धन एवं पापी मनुष्यका जीवन वास्तवमें जीवन नहीं है । पापी मनुष्य अपने कुटुम्बका पोषण भी कैसे कर सकता है? पापात्मा ( निर्धन ) पुरुष अपने पुण्य कर्मोंका नाश करता हुआ स्वयं भी निश्चय ही नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥

सोऽहं पापः कृतघ्नश्च कृपणश्चानृतोऽपि च ।

गुरोर्यः कृतकार्यः संस्तत् करोमि न भाषितम् ॥ १२ ॥

‘ मैं पापी, कृतघ्न, कृपण और मिथ्यावादी हूँ, जिसने गुरुसे तो अपना काम करा लिया, परंतु स्वयं जो उन्हें देनेकी प्रतिज्ञा की है, उसकी पूर्ति नहीं कर पा रहा हूँ ॥ १२ ॥

सोऽहं प्राणान् विमोक्ष्यामि कृत्वा यत्नमनुत्तमम् ।

अर्थिता न मया काचित् कृतपूर्वा दिवौकसाम् ।

मानयन्ति च मां सर्वे त्रिदशा यज्ञसंस्तरे ॥ १३ ॥

‘ अतः मैं कोई उत्तम प्रयत्न करके अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा । मैंने आजसे पहले देवताओंसे भी कभी कोई याचना नहीं की है । सब देवता यज्ञमें मेरा समादर करते हैं ॥ १३ ॥

पृष्ठ 745

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अहं तु विबुधश्रेष्ठं देवं त्रिभुवनेश्वरम् ।

विष्णुं गच्छाम्यहं कृष्णं गतिं गतिमतां वरम् ॥ १४ ॥

‘ अब मैं त्रिभुवनके स्वामी एवं जंगम जीवोंके सर्वश्रेष्ठ आश्रय सुरश्रेष्ठ सच्चिदानन्दघन भगवान् विष्णुकी शरणमें जाता हूँ ॥ १४ ॥

भोगा यस्मात् प्रतिष्ठन्ते व्याप्य सर्वान् सुरासुरान् ।

प्रणतो द्रष्टुमिच्छामि कृष्णं योगिनमव्ययम् ॥ १५ ॥

' जिनकी कृपासे समस्त देवताओं और असुरोंको भी यथेष्ट भोग प्राप्त होते हैं, उन्हीं अविनाशी योगी भगवान् विष्णुका मैं प्रणतभावसे दर्शन करना चाहता हूँ' ॥ १५ ॥

एवमुक्ते सखा तस्य गरुडो विनतात्मजः ।

दर्शयामास तं प्राह संहृष्टः प्रियकाम्यया ॥ १६ ॥

गालवके इस प्रकार कहनेपर उनके सखा विनतानन्दन गरुड़ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका प्रिय करनेकी इच्छासे उन्हें दर्शन दिया और इस प्रकार कहा— ॥ १६ ॥

सुहृद् भवान् मम मतः सुहृदां च मतः सुहृत् ।

ईप्सितेनाभिलाषेण योक्तव्यो विभवे सति ॥ १७ ॥

‘ गालव! तुम मेरे प्रिय सुहृद् हो और मेरे सुहृदोंके भी प्रिय सुहृद् हो । सुहृदोंका यह कर्तव्य है कि यदि उनके पास धन - वैभव हो तो वे उसका अपने सुहृद्का अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करनेके लिये उपयोग करें ॥ १७ ॥

विभवश्चास्ति मे विप्र वासवावरजो द्विज ।

पूर्वमुक्तस्त्वदर्थं च कृतः कामश्च तेन मे ॥ १८ ॥

‘ ब्रह्मन्! मेरे सबसे बड़े वैभव हैं इन्द्रके छोटे भाई भगवान् विष्णु । मैंने पहले तुम्हारे लिये उनसे निवेदन किया था और उन्होंने मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार करके मेरा मनोरथ पूर्ण किया था ॥ १८ ॥

स भवानेतु गच्छाव नयिष्ये त्वां यथासुखम् ।

देशं पारं पृथिव्या वा गच्छ गालव मा चिरम् ॥ १ ९ ॥

‘ अतः आओ ’ हम दोनों चलें । गालव! मैं तुम्हें सुखपूर्वक ऐसे देशमें पहुँचा दूँगा, जो

पृथ्वीके अन्तर्गत तथा समुद्रके उस पार है । चलो, विलम्ब न करो ' ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥

पृष्ठ 746

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः गरुड़का गालवसे पूर्व दिशाका वर्णन करना सुपर्णउवाच

अनुशिष्टोऽस्मि देवेन गालवाज्ञातयोनिना ।

ब्रूहि कामं तु कां यामि द्रष्टुं प्रथमतो दिशम् ॥ १ ॥

गरुड़ने कहा — गालव! अनादिदेव भगवान् विष्णुने मुझे आज्ञा दी है कि मैं तुम्हारी सहायता करूँ । अतः तुम अपनी इच्छाके अनुसार बताओ कि मैं सबसे पहले किस दिशाकी ओर चलूँ? ॥ १ ॥

पूर्वां वा दक्षिणां वाहमथवा पश्चिमां दिशम् ।

उत्तरां वा द्विजश्रेष्ठ कुतो गच्छामि गालव ॥ २ ॥

द्विजश्रेष्ठ गालव! बोलो, मैं पूर्व, दक्षिण, पश्चिम अथवा उत्तरमेंसे किस दिशाकी ओर चलूँ? ॥ २ ॥

यस्यामुदयते पूर्वं सर्वलोकप्रभावनः ।

सविता यत्र संध्यायां साध्यानां वर्तते तपः ॥ ३ ॥

यस्यां पूर्वं मतिर्याता यया व्याप्तमिदं जगत् ।

चक्षुषी यत्र धर्मस्य यत्र चैष प्रतिष्ठितः ॥ ४ ॥

कृतं यतो हुतं हव्यं सर्पते सर्वतोदिशम् ।

एतद् द्वारं द्विजश्रेष्ठ दिवसस्य तथाध्वनः ॥ ५ ॥

विप्रवर! जिस दिशामें सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न एवं प्रभावित करनेवाले भगवान् सूर्य प्रथम उदित होते हैं, जिस दिशामें संध्याके समय साध्यगण तपस्या करते हैं, जिस दिशामें ( गायत्रीजपके द्वारा) पहले वह बुद्धि प्राप्त हुई है, जिसने सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है, धर्मके युगल- नेत्रस्वरूप चन्द्रमा और सूर्य पहले जिस दिशामें उदित होते हैं और ( प्रायः पूर्वाभिमुख होकर धर्मानुष्ठान किये जानेके कारण ) जहाँ धर्म प्रतिष्ठित हुआ है तथा जिस दिशामें पवित्र हविष्यका हवन करनेपर वह आहुति सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल जाती है, वही यह पूर्वदिशा दिन एवं सूर्यमार्गका द्वार है ॥

अत्र पूर्वं प्रसूता वै दाक्षायण्यः प्रजाः स्त्रियः ।

यस्यां दिशि प्रवृद्धाश्च कश्यपस्यात्मसम्भवाः ॥ ६ ॥

इसी दिशामें प्रजापति दक्षकी अदिति आदि कन्याओं ने सबसे पहले प्रजावर्गको उत्पन्न किया था और इसीमें प्रजापति कश्यपकी संतानें वृद्धिको प्राप्त हुई हैं ॥ ६ ॥

अदोमूला सुराणां श्रीर्यत्र शक्रोऽभ्यषिच्यत ।

पृष्ठ 747

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सुरराज्येन विप्रर्षे देवैश्चात्र तपश्चितम् ॥ ७ ॥

ब्रह्मर्षे! देवताओंकी लक्ष्मीका मूलस्थान पूर्व दिशा ही है । इसीमें इन्द्रका देवसम्राट्के पदपर प्रथम अभिषेक हुआ है और इसी दिशामें देवताओंने तपस्या की है ॥ ७ ॥

एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मन् पूर्वेत्येषा दिगुच्यते ।

यस्मात् पूर्वतरे काले पूर्वमेवावृता सुरैः ॥ ८ ॥

अत एव च सर्वेषां पूर्वामाशां प्रचक्षते । ब्रह्मन्! इन्हीं सब कारणोंसे इस दिशाको ' पूर्वा ' कहते हैं; क्योंकि अत्यन्त पूर्वकालमें पहले यही दिशा देवताओंसे आवृत हुई थी, अतएव इसे सबकी आदि दिशा कहते हैं ॥ ८३ || पूर्वं सर्वाणि कार्याणि दैवानि सुखमीप्सता ॥ ९ ॥

सुखकी अभिलाषा रखनेवाले लोगोंको देवसम्बन्धी सारे कार्य पहले इसी दिशामें करने चाहिये ॥ ९ ॥

अत्र वेदाञ्जगौ पूर्वं भगवाँल्लोकभावनः ।

अत्रैवोक्ता सवित्राऽऽसीत् सावित्री ब्रह्मवादिषु ॥ १० ॥

लोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माने पहले इसी दिशामें वेदोंका गान किया था और सविता देवताने ब्रह्मवादी मुनियोंको यहीं सावित्रीमन्त्रका उपदेश किया था ॥ १० ॥

अत्र दत्तानि सूर्येण यजूंषि द्विजसत्तम ।

अत्र लब्धवरः सोमः सुरैः क्रतुषु पीयते ॥ ११ ॥

द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशामें सूर्यदेवने महर्षि याज्ञवल्क्यको शुक्लयजुर्वेदके मन्त्र दिये थे और इसी दिशामें देवतालोग यज्ञोंमें उस सोमरसका पान करते हैं, जो उन्हें वरदानमें प्राप्त हो चुका है ॥ ११ ॥

अत्र तृप्ता हुतवहाः स्वां योनिमुपभुञ्जते ।

अत्र पातालमाश्रित्य वरुणः श्रियमाप च ॥ १२ ॥

इसी दिशामें यज्ञोंद्वारा तृप्त हुए अग्निगण अपने योनिस्वरूप जलका उपभोग करते हैं ।

यहीं वरुणने पातालका आश्रय लेकर लक्ष्मीको प्राप्त किया था ॥

अत्र पूर्वं वसिष्ठस्य पौराणस्य द्विजर्षभ ।

सूतिश्चैव प्रतिष्ठा च निधनं च प्रकाशते ॥ १३ ॥

द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशामें पुरातन महर्षि वसिष्ठकी उत्पत्ति हुई है । यहीं उन्हें प्रतिष्ठा ( सप्तर्षियोंमें स्थान ) -की प्राप्ति हुई है और इसी दिशामें उन्हें निमिके शापसे देहत्याग करना पड़ा है ॥ १३ ॥

ओङ्कारस्यात्र जायन्ते सृतयो दशतीर्दश ।

पिबन्ति मुनयो यत्र हविर्धूमं स्म धूमपाः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 748

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इसी दिशामें प्रणव अर्थात् वेदकी सहस्रों शाखाएँ प्रकट हुई हैं और उसीमें धूमपायी महर्षिगण हविष्यके धूमका पान करते हैं ॥ १४ ॥

प्रोक्षिता यत्र बहवो वराहाद्या मृगा वने ।

शक्रेण यज्ञभागार्थे दैवतेषु प्रकल्पिताः ॥ १५ ॥

इसी दिशामें देवराज इन्द्रने यज्ञभागकी सिद्धिके लिये वनमें जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओंको प्रोक्षित करके देवताओंको सौंपा था ॥ १५ ॥

अत्राहिताः कृतघ्नाश्च मानुषाश्चासुराश्च ये ।

उदयंस्तान् हि सर्वान् वै क्रोधाद्धन्ति विभावसुः ॥ १६ ॥

इस दिशामें उदित होनेवाले भगवान् सूर्य जो दूसरोंका अहित करनेवाले एवं कृतघ्न मनुष्य और असुर होते हैं, उन सबका क्रोधपूर्वक विनाश करते ( उनकी आयु क्षीण कर देते ) हैं ॥ १६ ॥

एतद् द्वारं त्रिलोकस्य स्वर्गस्य च सुखस्य च ।

एष पूर्वो दिशां भागो विशावोऽत्र यदीच्छसि ॥ १७ ॥

गालव! यह पूर्व दिग्विभाग ही त्रिलोकीका, स्वर्गका और सुखका भी द्वार है । तुम्हारी इच्छा हो तो हम दोनों इसमें प्रवेश करें ॥ १७ ॥

प्रियं कार्यं हि मे तस्य यस्यास्मि वचने स्थितः ।

ब्रूहि गालव यास्यामि शृणु चाप्यपरां दिशम् ॥ १८ ॥

मैं जिनकी आज्ञाके अधीन हूँ, उन भगवान् विष्णुका प्रिय कार्य मुझे अवश्य करना है; अतः गालव! बताओ, क्या मैं पूर्व दिशामें चलूँ अथवा दूसरी दिशाका भी वर्णन सुन लो ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥

पृष्ठ 749

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नवाधिकशततमोऽध्यायः दक्षिणदिशाका वर्णन सुपर्णउवाच

इयं विवस्वता पूर्वं श्रौतेन विधिना किल ।

गुरवे दक्षिणा दत्ता दक्षिणेत्युच्यते च दिक् ॥ १ ॥

गरुड़ कहते हैं — गालव! यह प्रसिद्ध है कि पूर्वकालमें भगवान् सूर्यने वेदोक्त विधिके अनुसार यज्ञ करके आचार्य कश्यपको दक्षिणारूपसे इस दिशाका दान किया था, इसीलिये इसे दक्षिण दिशा कहते हैं ॥

अत्र लोकत्रयस्यास्य पितृपक्षः प्रतिष्ठितः ।

अत्रोष्मपाणां देवानां निवासः श्रूयते द्विज ॥ २ ॥

ब्रह्मन्! तीनों लोकोंके पितृगण इसी दिशामें प्रतिष्ठित हैं तथा ‘ ऊष्मप ' नामक देवताओंका निवास भी इसी दिशामें सुना जाता है ॥ २ ॥

अत्र विश्वे सदा देवाः पितृभिः सार्धमासते ।

इज्यमानाः स्म लोकेषु सम्प्राप्तास्तुल्यभागताम् ॥ ३ ॥

पितरोंके साथ विश्वेदेवगण सदा दक्षिण दिशामें ही वास करते हैं । वे समस्त लोकोंमें पूजित हो श्राद्धमें पितरोंके समान ही भाग प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥

एतद् द्वितीयं देवस्य द्वारमाचक्षते द्विज ।

त्रुटिशो लवशश्चापि गण्यते कालनिश्चयः ॥ ४ ॥

विप्रवर! विद्वान् पुरुष इस दक्षिण दिशाको धर्म- देवताका दूसरा द्वार कहते हैं । यहीं ( चित्रगुप्त आदिके द्वारा ) ' त्रुटि ' और ' लव ' आदि सूक्ष्म से सूक्ष्म कालांशों - पर दृष्टि रखते हुए प्राणियोंकी आयुकी निश्चित गणना की जाती है ॥ ४ ॥

अत्र देवर्षयो नित्यं पितृलोकर्षयस्तथा ।

तथा राजर्षयः सर्वे निवसन्ति गतव्यथाः ॥ ५ ॥

देवर्षि, पितृलोकके ऋषि तथा समस्त राजर्षिगण दुःखरहित हो सदा इसी दिशामें निवास करते हैं ॥ ५ ॥

अत्र धर्मश्च सत्यं च कर्म चात्र निगद्यते ।

गतिरेषा द्विजश्रेष्ठ कर्मणामवसायिनाम् ॥ ६ ॥

द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशामें ( रहकर चित्रगुप्त आदिके द्वारा धर्मराजके निकट प्राणियोंके ) धर्म, सत्य तथा साधारण कर्मोंके विषयमें कहा जाता है । मृत प्राणी तथा उनके कर्म इसी दिशाका आश्रय लेते हैं ॥ ६ ॥

एषा दिक् सा द्विजश्रेष्ठ यां सर्वः प्रतिपद्यते ।

पृष्ठ 750

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वृता त्वनवबोधेन सुखं तेन न गम्यते ॥ ७ ॥

विप्रवर! यह वह दिशा है, जिसमें मृत्युके पश्चात् सभी प्राणियोंको जाना पड़ता है । यह सदा अज्ञानान्धकारसे आवृत रहती है, इसलिये इसमें सुखपूर्वक यात्रा सम्भव नहीं हो पाती है ॥ ७ ॥

नैर्ऋतानां सहस्राणि बहून्यत्र द्विजर्षभ ।

सृष्टानि प्रतिकूलानि द्रष्टव्यान्यकृतात्मभिः ॥ ८ ॥

द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने इस दिशामें प्रतिकूल स्वभाव एवं आचरणवाले सहस्रों राक्षसोंकी सृष्टि की है, जिनका दर्शन अशुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषोंको ही होता है ॥ ८ ॥

अत्र मन्दरकुञ्जेषु विप्रर्षिसदनेषु च ।

गायन्ति गाथा गन्धर्वाश्चित्तबुद्धिहरा द्विज ॥ ९ ॥

ब्रह्मन्! इसी दिशामें गन्धर्वगण मन्दराचलके कुंजों और ब्रह्मर्षियोंके आश्रमोंमें मन और बुद्धिको आकर्षित करनेवाली गाथाओंका गान करते हैं ॥ ९ ॥

अत्र सामानि गाथाभिः श्रुत्वा गीतानि रैवतः ।

गतदारो गतामात्यो गतराज्यो वनं गतः ॥ १० ॥

पूर्वकालमें यहीं राजा रैवत गाथाओंके रूपमें सामगान सुनते - सुनते अपनी स्त्री, मन्त्री तथा राज्यसे भी वियुक्त हो वनमें चले गये थे* ॥ १० ॥

अत्र सावर्णिना चैव यवक्रीतात्मजेन च ।

मर्यादा स्थापिता ब्रह्मन् यां सूर्यो नातिवर्तते ॥ ११ ॥

ब्रह्मन्! इस दिशामें सावर्णि मनु तथा यवक्रीतके पुत्रने सूर्यकी गतिके लिये मर्यादा ( सीमा ) स्थापित की थी, जिसका सूर्यदेव कभी उल्लंघन नहीं करते हैं ॥

अत्र राक्षसराजेन पौलस्त्येन महात्मना ।

रावणेन तपश्चीर्त्वा सुरेभ्योऽमरता वृता ॥ १२ ॥

पुलस्त्यवंशी राक्षसराज महामना रावणने इसी दिशामें तपस्या करके देवताओंसे अवध्य होनेका वरदान प्राप्त किया था ॥ १२ ॥

अत्र वृत्तेन वृत्रोऽपि शक्रशत्रुत्वमीयिवान् ।

अत्र सर्वासवः प्राप्ताः पुनर्गच्छन्ति पञ्चधा ॥ १३ ॥

इसी दिशामें घटित हुई घटनाके कारण वृत्रासुर देवराज इन्द्रका शत्रु बन बैठा था । दक्षिण दिशामें ही आकर सबके प्राण पुनः ( प्राण- अपान आदिके भेदसे ) पाँच भागोंमें बँट जाते हैं ( अर्थात् प्राणी नूतन देह धारण करते हैं ) ॥ १३ ॥

अत्र दुष्कृतकर्माणो नराः पच्यन्ति गालव ।

अत्र वैतरणी नाम नदी वितरणैर्वृता ॥ १४ ॥

गालव! इसी दिशामें पापाचारी मनुष्य नरकोंकी आगमें पकाये जाते हैं । दक्षिणमें ही वह वैतरणी नदी है, जो वैतरणी नरकके अधिकारी पापियोंसे घिरी रहती है ॥ १४ ॥