03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 791–800
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
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विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः माधवीका वनमें जाकर तप करना तथा ययातिका स्वर्गमें जाकर सुखभोगके पश्चात् मोहवश तेजोहीन होना नारद उवाच
स तु राजा पुनस्तस्याः कर्तुकामः स्वयंवरम् ।
उपगम्याश्रमपदं गङ्गायमुनसंगमे ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं - तदनन्तर राजा ययाति पुनः माधवीके स्वयंवरका विचार करके गंगा- यमुनाके संगम- पर बने हुए अपने आश्रममें जाकर रहने लगे ॥ १ ॥
गृहीतमाल्यदामां तां रथमारोप्य माधवीम् ।
पूरुर्यदुश्च भगिनीमाश्रमे पर्यधावताम् ॥ २ ॥
फिर हाथमें हार लिये बहिन माधवीको रथपर बिठाकर पूरु और यदु — ये दोनों भाई आश्रमपर गये ॥
नागयक्षमनुष्याणां गन्धर्वमृगपक्षिणाम् ।
शैलद्रुमवनौकानामासीत् तत्र समागमः ॥ ३ ॥
उस स्वयंवरमें नाग, यक्ष, मनुष्य, गन्धर्व, पशु, पक्षी तथा पर्वत, वृक्ष और वनोंमें निवास करनेवाले प्राणियोंका शुभागमन हुआ ॥ ३ ॥
नानापुरुषदेश्यानामीश्वरैश्च समाकुलम् ।
ऋषिभिर्ब्रह्मकल्पैश्च समन्तादावृतं वनम् ॥ ४ ॥
प्रयागका वह वन अनेक जनपदोंके राजाओंसे व्याप्त हो गया और ब्रह्माजीके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियोंने उस स्थानको सब ओरसे घेर लिया ॥ ४ ॥
निर्दिश्यमानेषु तु सा वरेषु वरवर्णिनी ।
वरानुत्क्रम्य सर्वांस्तान् वरं वृतवती वनम् ॥ ५ ॥
उस समय जब माधवीको वहाँ आये हुए वरोंका परिचय दिया जाने लगा, तब उस वरवर्णिनी कन्याने सारे वरोंको छोड़कर तपोवनका ही वररूपमें वरण कर लिया ॥ ५ ॥
अवतीर्य रथात् कन्या नमस्कृत्य च बन्धुषु ।
उपगम्य वनं पुण्यं तपस्तेपे ययातिजा ॥ ६ ॥
ययातिनन्दिनी कुमारी माधवी रथसे उतरकर अपने पिता, भाई, बन्धु आदि कुटुम्बियोंको नमस्कार करके पुण्य तपोवनमें चली गयी और वहाँ तपस्या करने लगी ॥ ६ ॥
उपवासैश्च विविधैर्दीक्षाभिर्नियमैस्तथा ।
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आत्मनो लघुतां कृत्वा बभूव मृगचारिणी ॥ ७ ॥
वह उपवासपूर्वक विविध प्रकारकी दीक्षाओं तथा नियमोंका पालन करती हुई अपने मनको राग - द्वेषादि दोषोंसे रहित करके वनमें मृगीके समान विचरने लगी ॥ ७ ॥
वैदूर्याङ्कुरकल्पानि मृदूनि हरितानि च ।
चरन्तीश्लक्ष्णशष्पाणि तिक्तानि मधुराणि च ॥ ८ ॥
स्रवन्तीनां च पुण्यानां सुरसानि शुचीनि च ।
पिबन्ती वारिमुख्यानि शीतानि विमलानि च ॥ ९ ॥
वनेषु मृगवासेषु व्याघ्रविप्रोषितेषु च ।
दावाग्निविप्रयुक्तेषु शून्येषु गहनेषु च ॥ १० ॥
चरन्ती हरिणैः सार्धं मृगीव वनचारिणी ।
चचार विपुलं धर्मं ब्रह्मचर्येण संवृतम् ॥ ११ ॥
इस क्रम माधवी वैदूर्यमणिके अंकुरोंके समान सुशोभित, कोमल, चिकनी, तिक्त, मधुर एवं हरी- हरी घास चरती, पवित्र नदियोंके शुद्ध, शीतल, निर्मल एवं सुस्वादु जल पीती और मृगोंके आवासभूत, व्याघ्ररहित एवं दावानलशून्य निर्जन वनोंमें मृगोंके साथ वनचारिणी मृगीकी भाँति विचरण करती थी । उसने ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक महान् धर्मका आचरण किया ॥ ८–११ ॥
ययातिरपि पूर्वेषां राज्ञां वृत्तमनुष्ठितः ।
बहुवर्षसहस्रायुर्युयुजे कालधर्मणा ॥ १२ ॥
राजा ययाति भी पूर्ववर्ती राजाओंके सदाचारका पालन करते हुए'अनेक सहस्र वर्षोंकी आयु पूरी करके मृत्युको प्राप्त हुए ॥ १२ ॥
पूरुर्यदुश्च द्वौ वंशे वर्धमानौ नरोत्तमौ ।
ताभ्यां प्रतिष्ठितो लोके परलोके च नाहुषः ॥ १३ ॥
उनके ( पुत्रोंमेंसे ) दो पुत्र नरश्रेष्ठ पूरु और यदु उस कुलमें अभ्युदयशील थे । उन्हीं दोनोंसे नहुषपुत्र ययाति इस लोक और परलोकमें भी प्रतिष्ठित हुए ॥
महीपते नरपतिर्ययातिः स्वर्गमास्थितः ।
महर्षिकल्पो नृपतिः स्वर्गाग्रयफलभुग् विभुः ॥ १४ ॥
राजन्! महाराज ययाति महर्षियोंके समान पुण्यात्मा एवं तपस्वी थे । वे स्वर्गमें जाकर वहाँके श्रेष्ठ फलका उपभोग करने लगे ॥ १४ ॥
बहुवर्षसहस्राख्ये काले बहुगुणे गते ।
राजर्षिषु निषण्णेषु महीयस्सु महर्धिषु ॥ १५ ॥
अवमेने नरान् सर्वान् देवानृषिगणांस्तथा ।
ययातिर्मूढविज्ञानो विस्मयाविष्टचेतनः ॥ १६ ॥
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इस प्रकार वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त कई हजार वर्षोंका समय व्यतीत हो गया । ययातिका चित्त अपना स्वर्गीय वैभव देखकर स्वयं ही आश्चर्यचकित हो उठा । उनकी बुद्धिपर मोह छा गया और वे महान् समृद्धिशाली महत्तम राजर्षियोंके अपने समीप बैठे होनेपर भी सम्पूर्ण देवताओं, मनुष्यों तथा महर्षियोंकी भी अवहेलना करने लगे ॥ १५-१६ । |
ततस्तं बुबुधे देवः शक्रो बलनिषूदनः ।
ते च राजर्षयः सर्वे धिग्धिगित्येवमब्रुवन् ॥ १७ ॥
तदनन्तर बलसूदन इन्द्रदेवको ययातिकी इस अवस्थाका पता लग गया। वे सम्पूर्ण राजर्षिगण भी उस समय ययातिको धिक्कारने लगे ॥ १७ ॥
विचारश्च समुत्पन्नो निरीक्ष्य नहुषात्मजम् ।
को वयं कस्य वा राज्ञः कथं वा स्वर्गमागतः ॥ १८ ॥
- नहुषपुत्र ययातिको देखकर स्वर्गवासियोंमें यह विचार खड़ा हो गया – ' यह कौन है? किस राजाका पुत्र है? और कैसे स्वर्गमें आ गया है? ॥ १८ ॥
कर्मणा केन सिद्धोऽयं क्व वानेन तपश्चितम् ।
कथं वा ज्ञायते स्वर्गे केन वा ज्ञायतेऽप्युत ॥ १ ९ ॥
‘ इसे किस कर्मसे सिद्धि प्राप्त हुई है? इसने कहाँ तपस्या की है? स्वर्गमें किस प्रकार इसे जाना जाय अथवा कौन यहाँ इसको जानता है? ' ॥ १ ९ ॥
एवं विचारयन्तस्ते राजानं स्वर्गवासिनः ।
दृष्ट्वा पप्रच्छुरन्योन्यं ययातिं नृपतिं प्रति ॥ २० ॥
इस प्रकार विचार करते हुए स्वर्गवासी ययातिके विषयमें एक- दूसरेकी ओर देखकर प्रश्न करने लगे ॥ २० ॥
विमानपालाः शतशः स्वर्गद्वाराभिरक्षिणः ।
पृष्टा आसनपालाश्च न जानीमेत्यथाब्रुवन् ॥ २१ ॥
सैकड़ों विमानरक्षकों, स्वर्गके द्वारपालों तथा सिंहासनके रक्षकोंसे पूछा गया; किंतु सबने यही उत्तर दिया- ' हम इन्हें नहीं जानते ' ॥ २१ ॥
सर्वे ते ह्यावृतज्ञाना नाभ्यजानन्त तं नृपम् ।
स मुहूर्तादथ नृपो हतौजाश्चाभवत् तदा ॥ २२ ॥
उन सबके ज्ञानपर पर्दा पड़ गया था; अतः वे उन राजाको नहीं पहचान सके । फिर तो दो ही घड़ीमें राजा ययातिका तेज नष्ट हो गया ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते ययातिमोहे विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
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इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रके प्रसंगमें ययातिमोहविषयक एक सौ बीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥
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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौहित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना- अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना नारद उवाच
अथ प्रचलितः स्थानादासनाच्च परिच्युतः ।
कम्पितेनेव मनसा धर्षितः शोकवह्निना ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं - राजन्! तत्पश्चात् ययाति अपने सिंहासनसे गिरकर उस स्वर्गीय स्थानसे भी विचलित हो गये । उनका हृदय काँप- सा उठा और शोकाग्नि उन्हें दग्ध करने लगी ॥ १ ॥
म्लानस्रग्भ्रष्टविज्ञानः प्रभ्रष्टमुकुटाङ्गदः ।
विघूर्णन् स्रस्तसर्वाङ्गः प्रभ्रष्टाभरणाम्बरः ॥ २ ॥
उन्होंने जो दिव्य कुसुमोंकी माला पहन रखी थी, वह मुरझा गयी । उनकी ज्ञानशक्ति लुप्त होने लगी । मुकुट और बाजूबन्द शरीरसे अलग हो गये । उन्हें चक्कर आने लगा । उनके सारे अंग शिथिल हो गये और वस्त्र तथा आभूषण भी खिसक- खिसककर गिरने लगे ॥ २ ॥
अदृश्यमानस्तान् पश्यन्नपश्यंश्च पुनः पुनः ।
शून्यः शून्येन मनसा प्रपतिष्यन् महीतलम् ॥ ३ ॥
किं मया मनसा ध्यातमशुभं धर्मदूषणम् ।
येनाहं चलितः स्थानादिति राजा व्यचिन्तयत् ॥ ४ ॥
वे अन्धकारसे आवृत होनेके कारण स्वयं स्वर्गवासियोंको नहीं दिखायी देते थे; परंतु वे उन्हें बार- बार देखते और कभी नहीं भी देख पाते थे । पृथ्वीपर गिरनेसे पहले शून्य - से होकर शून्य हृदयसे राजा यह चिन्ता करने लगे कि मैंने अपने मनसे किस धर्मदूषक अशुभ वस्तुका चिन्तन किया है, जिसके कारण मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट होना पड़ा है ॥ ३-४ ॥
ते तु तत्रैव राजानः सिद्धाश्चाप्सरसस्तथा ।
अपश्यन्त निरालम्बं तं ययातिं परिच्युतम् ॥ ५ ॥
स्वर्गके राजर्षि, सिद्ध और अप्सरा- सभीने स्वर्गसे भ्रष्ट हो अवलम्बशून्य हुए राजा ययातिको देखा ॥ ५ ॥
अथैत्य पुरुषः कश्चित् क्षीणपुण्यनिपातकः ।
ययातिमब्रवीद् राजन् देवराजस्य शासनात् ॥ ६ ॥
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राजन्! इतनेमें ही पुण्यरहित पुरुषोंको स्वर्गसे नीचे गिरानेवाला कोई पुरुष'देवराजकी आज्ञासे वहाँ आकर ययातिसे इस प्रकार बोला- ॥ ६ ॥
अतीव मदमत्तस्त्वं न कंचिन्नावमन्यसे ।
मानेन भ्रष्टः स्वर्गस्ते नार्हस्त्वं पार्थिवात्मज ॥ ७ ॥
' राजपुत्र! तुम अत्यन्त मदमत्त हो और कोई भी ऐसा महान् पुरुष यहाँ नहीं है,
जिसका तुम तिरस्कार न करते हो । इस मानके कारण ही तुम अपने स्थानसे गिर रहे हो ।
अब तुम यहाँ रहनेके योग्य नहीं हो ॥ ७ ॥
न च प्रज्ञायसे गच्छ पतस्वेति तमब्रवीत् ।
पतेयं सत्स्विति वचस्त्रिरुक्त्वा नहुषात्मजः ॥ ८ ॥
' तुम्हें यहाँ कोई नहीं जानता है; अतः जाओ, नीचे गिरो । ' जब उसने ऐसा कहा, तब नहुषपुत्र ययाति तीन बार ऐसा कहकर नीचे जाने लगे कि मैं सत्पुरुषोंके बीचमें गिरूँ ॥
पतिष्यंश्चिन्तयामास गतिं गतिमतां वरः ।
एतस्मिन्नेव काले तु नैमिषे पार्थिवर्षभान् ॥ ९ ॥
चतुरोऽपश्यत नृपस्तेषां मध्ये पपात ह । जंगम प्राणियोंमें श्रेष्ठ ययाति गिरते समय अपनी गतिके विषयमें चिन्ता कर रहे थे । इसी समय उन्होंने नैमिषारण्यमें चार श्रेष्ठ राजाओंको देखा और उन्हींके बीचमें वे गिरने लगे ॥ ९ ३ ॥ प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनरोऽष्टकः ॥ १० ॥
वाजपेयेन यज्ञेन तर्पयन्ति सुरेश्वरम् । वहाँ प्रतर्दन, वसुमना, औशीनर शिबि तथा अष्टक- ये चार नरेश वाजपेययज्ञके द्वारा देवेश्वर श्रीहरिको तृप्त करते थे ॥ १०३ ॥
तेषामध्वरजं धूमं स्वर्गद्वारमुपस्थितम् ॥ ११ ॥
ययातिरुपजिघ्रन् वै निपपात महीं प्रति । उनके यज्ञका धूम मानो स्वर्गका द्वार बनकर उपस्थित हुआ था । ययाति उसीको सूँघते हुए पृथ्वीकी ओर गिर रहे थे ॥ ११३ ॥
भूमौ स्वर्गे च सम्बद्धां नदीं धूममयीमिव ।
गङ्गां गामिव गच्छन्तीमालम्ब्य जगतीपतिः ॥ १२ ॥
श्रीमत्स्ववभृथाग्रयेषु चतुर्षु प्रतिबन्धुषु ।
मध्ये निपतितो राजा लोकपालोपमेषु सः ॥ १३ ॥
भूतलसे स्वर्गतक धूममयी नदी- सी प्रवाहित हो रही थी, मानो आकाशगंगा भूमिपर जा रही हों । भूपाल ययाति उसी धूमलेखाका अवलम्बन करके लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा अवभृथ स्नानसे पवित्र अपने चारों सम्बन्धियोंके बीचमें गिरे ॥ १२-१३ ॥ चतुर्षु हुतकल्पेषु राजसिंहमहाग्निषु ।
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पपात मध्ये राजर्षिर्ययातिः पुण्यसंक्षये ॥ १४ ॥
वे चारों श्रेष्ठ राजा उन चार विशाल अग्नियोंके समान तेजस्वी थे, जो हविष्यकी आहुति पाकर प्रज्वलित हो रहे हों । राजर्षि ययाति अपना पुण्य क्षीण होनेपर उन्हींके मध्यभागमें गिरे ॥ १४ ॥
तमाहुः पार्थिवाः सर्वे दीप्यमानमिव श्रिया ।
को भवान् कस्य वा बन्धुर्देशस्य नगरस्य वा ॥ १५ ॥
यक्षो वाप्यथवा देवो गन्धर्वो राक्षसोऽपि वा ।
न हि मानुषरूपोऽसि को वार्थः काङ्क्ष्यते त्वया ॥ १६ ॥
अपनी दिव्य कान्तिसे उद्भासित होनेवाले उन महाराजसे सभी भूपालोंने पूछा — ‘ आप कौन हैं? किसके भाई- बन्धु हैं तथा किस देश और नगरमें आपका निवास - स्थान है? आप यक्ष हैं या देवता? गन्धर्व हैं या राक्षस? आपका स्वरूप मनुष्यों जैसा नहीं है । बताइये, आप कौन - सा प्रयोजन सिद्ध करना चाहते हैं ' ॥ १५-१६ ॥ ययातिरुवाच
ययातिरस्मि राजर्षिः क्षीणपुण्यश्युतो दिवः ।
पतेयं सत्स्विति ध्यायन् भवत्सु पतितस्ततः ॥ १७ ॥
ययातिने कहा- मैं राजर्षि ययाति हूँ। अपना पुण्य क्षीण होनेके कारण स्वर्गसे नीचे गिर गया हूँ । गिरते समय मेरे मनमें यह चिन्तन चल रहा था कि मैं सत्पुरुषोंके बीचमें गिरूँ । अतः आपलोगोंके बीचमें आ पड़ा हूँ ॥ १७ ॥
राजान ऊचुः
सत्यमेतद् भवतु ते काङ्क्षितं पुरुषर्षभ ।
सर्वेषां नः क्रतुफलं धर्मश्च प्रतिगृह्यताम् ॥ १८ ॥
वे राजा बोले — पुरुषशिरोमणे! आपका यह मनोरथ सफल हो । आप हम सब लोगोंके यज्ञोंका फल और धर्म ग्रहण करें ॥ १८ ॥
ययातिरुवाच
नाहं प्रतिग्रहधनो ब्राह्मणः क्षत्रियो ह्यहम् ।
न च मे प्रवणा बुद्धिः परपुण्यविनाशने ॥ १ ९ ॥
ययातिने कहा — प्रतिग्रह ही जिसका धन है, वह ब्राह्मण मैं नहीं हूँ। मैं तो क्षत्रिय हूँ । अतः मेरी बुद्धि पराये पुण्यका ( ग्रहण करके उनका पुण्य) क्षय करनेके लिये उद्यत नहीं है ॥ १ ९ ॥ नारद उवाच एतस्मिन्नेव काले तु मृगचर्याक्रमागताम् ।
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माधवीं प्रेक्ष्य राजानस्तेऽभिवाद्येदमब्रुवन् ॥ २० ॥
किमागमनकृत्यं ते किं कुर्मः शासनं तव ।
आज्ञाप्या हि वयं सर्वे तव पुत्रास्तपोधने ॥ २१ ॥
नारदजी कहते हैं - इसी समय उन राजाओंने अपनी माता माधवीको देखा, जो मृगोंकी भाँति उन्हींके साथ विचरती हुई क्रमशः वहाँ आ पहुँची थी । उसे प्रणाम करके राजाओंने इस प्रकार पूछा- ' तपोधने! यहाँ आपके पधारनेका क्या प्रयोजन है? हम आपकी किस आज्ञाका पालन करें? हम सभी आपके पुत्र हैं; अतः हमें आप योग्य सेवाके लिये आज्ञा प्रदान करें' ।
तेषां तद् भाषितं श्रुत्वा माधवी परया मुदा ।
पितरं समुपागच्छद् ययातिं सा ववन्द च ॥ २२ ॥
उनकी ये बातें सुनकर माधवीको बड़ी प्रसन्नता हुई । वह अपने पिता ययातिके पास गयी और उसने उन्हें प्रणाम किया ॥ २२ ॥
स्पृष्ट्वा मूर्धनि तान् पुत्रांस्तापसी वाक्यमब्रवीत् ।
दौहित्रास्तव राजेन्द्र मम पुत्रा न ते पराः ॥ २३ ॥
तदनन्तर तपस्विनी माधवीने उन पुत्रोंके सिरपर हाथ रखकर अपने पितासे कहा —‘राजेन्द्र! ये सभी आपके दौहित्र ( नाती ) और मेरे पुत्र हैं, पराये नहीं हैं ॥
इमे त्वां तारयिष्यन्ति दृष्टमेतत् पुरातने ।
अहं ते दुहिता राजन् माधवी मृगचारिणी ॥ २४ ॥
' ये आपको तार देंगे । दौहित्रोंके द्वारा मातामह ( नाना)-)-का यह उद्धार पुरातन वेदशास्त्रमें स्पष्ट देखा गया है । राजन्! मैं आपकी पुत्री माधवी हूँ और इस तपोवनमें मृगोंके समान जीवनचर्या बनाकर विचरती हूँ ॥
मयाप्युपचितो धर्मस्ततोऽर्थं प्रतिगृह्यताम् ।
यस्माद् राजन् नराः सर्वे अपत्यफलभागिनः ॥ २५ ॥
तस्मादिच्छन्ति दौहित्रान् यथा त्वं वसुधाधिप । ' पृथ्वीनाथ! मैंने भी महान् धर्मका संचय किया है । उसका आधा भाग आप ग्रहण करें । राजन्! सब मनुष्य अपनी संतानोंके किये हुए सत्कर्मोंके फलके भागी होते हैं । इसीलिये वे दौहित्रोंकी इच्छा करते हैं, जैसे आपने की थी ' ॥ २५ ॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे शिरसा जननीं तदा ॥ २६ ॥
अभिवाद्य नमस्कृत्य मातामहमथाब्रुवन् ।
उच्चैरनुपमैः स्निग्धैः स्वरैरापूर्य मेदिनीम् ॥ २७ ॥
मातामहं नृपतयस्तारयन्तो दिवश्च्युतम् ।
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तब उन सभी राजाओंने अपनी माताके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और स्वर्गभ्रष्ट नानाको भी नमस्कार करके अपने उच्च, अनुपम और स्नेहपूर्ण स्वरसे पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए उन्हें तारनेके उद्देश्यसे उनसे कुछ कहनेका विचार किया ॥ २६-२७३ ||
अथ तस्मादुपगतो गालवोऽप्याह पार्थिवम् ।
तपसो मेऽष्टभागेन स्वर्गमारोहतां भवान् ॥ २८ ॥
इसी बीचमें उस वनसे गालव मुनि भी वहाँ आ पहुँचे तथा राजासे इस प्रकार बोले –' महाराज! आप मेरी तपस्याका आठवाँ भाग लेकर उसके बलसे स्वर्गलोकमें पहुँच जायँ' ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते ययातिस्वर्गभ्रंशे एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रके प्रसंगमें ययातिका स्वर्गलोकसे पतनविषयक एक सौ इक्कीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥
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द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः सत्संग एवं दौहित्रोंके पुण्यदानसे ययातिका पुनः स्वर्गारोहण नारदउवाच प्रत्यभिज्ञातमात्रोऽथ सद्भिस्तैर्नरपुङ्गवः ।
समारुरोह नृपतिरस्पृशन् वसुधातलम् ।
ययातिर्दिव्यसंस्थानो बभूव विगतज्वरः ॥ १ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः ।
दिव्यगन्धगुणोपेतो न पृथ्वीमस्पृशत् पदा ॥ २ ॥
नारदजी कहते हैं - उन सत्पुरुषोंके द्वारा पहचाने जानेमात्रसे नरश्रेष्ठ राजा ययाति पृथ्वीतलका स्पर्श न करते हुए ऊपरकी ओर उठने लगे । उस समय उनकी आकृति दिव्य हो गयी थी । वे शोक और चिन्तासे रहित थे । उन्होंने दिव्य हार और दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे । दिव्य आभूषण उनके अंगोंकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा वे दिव्य सुगन्धसे सुवासित हो रहे थे । वे अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे थे ॥ १-२ ॥
ततो वसुमनाः पूर्वमुच्चैरुच्चारयन् वचः ।
ख्यातो दानपतिर्लोके व्याजहार नृपं तदा ॥ ३ ॥
तदनन्तर लोकमें दानपतिके नामसे विख्यात राजा वसुमना पहले उच्चस्वरसे शब्दोंका उच्चारण करते हुए महाराज ययातिसे इस प्रकार बोले— ॥ ३ ॥
प्राप्तवानस्मि यल्लोके सर्ववर्णेष्वगर्हया ।
तदप्यथ च दास्यामि तेन संयुज्यतां भवान् ॥ ४ ॥
‘ मैंने जगत्में सभी वर्णोंकी निन्दासे दूर रहकर जो पुण्य प्राप्त किया है, वह भी
आपको दे रहा हूँ । आप उस पुण्यसे संयुक्त हों ॥ ४ ॥
यत् फलं दानशीलस्य क्षमाशीलस्य यत् फलम् ।
यच्च मे फलमाधाने तेन संयुज्यतां भवान् ॥ ५ ॥
‘ दानशील पुरुषको जो पुण्यफल प्राप्त होता है, क्षमाशील मनुष्यको जो फल मिलता है तथा अग्निस्थापन आदि वेदोक्त कर्मोंके अनुष्ठानसे मुझे जिस फलकी प्राप्ति होनेवाली है, उन सभी प्रकारके पुण्यफलोंसे आप सम्पन्न हों ' ॥ ५ ॥
ततः प्रतर्दनोऽप्याह वाक्यं क्षत्रियपुङ्गवः ।
यथा धर्मरतिर्नित्यं नित्यं युद्धपरायणः ॥ ६ ॥
प्राप्तवानस्मि यल्लोके क्षत्रवंशोद्भवं यशः ।