04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1001–1010

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010

पृष्ठ 1001

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असत्यो विक्रमः पार्थ यत्र भूरिश्रवा रणे ।

विशेषयति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम् ॥ ६५ ॥

‘पार्थ! पराक्रम मिथ्या है, जिसका आश्रय लेनेपर भी वृष्णिवंशी सत्यपराक्रमी सात्यकिसे रणभूमिमें भूरिश्रवा बढ़ गये हैं ' ॥ ६५ ॥

एवमुक्तो महाबाहुर्वासुदेवेन पाण्डवः ।

मनसा पूजयामास भूरिश्रवसमाहवे ॥ ६६ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पाण्डुपुत्र महाबाहु अर्जुनने मन- ही- मन युद्धस्थलमें भूरिश्रवाकी प्रशंसा की ॥

विकर्षन् सात्वतश्रेष्ठं क्रीडमान इवाहवे ।

संहर्षयति मां भूयः कुरूणां कीर्तिवर्धनः ॥ ६७ ॥

कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले भूरिश्रवा इस युद्ध-स्थलमें सात्वतकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिको घसीटते हुए खेल-सा कर रहे हैं और बारंबार मेरा हर्ष बढ़ा रहे हैं ॥ ६७ ॥

प्रवरं वृष्णिवीराणां यन्न हन्याद्धि सात्यकिम् ।

महाद्विपमिवारण्ये मृगेन्द्र इव कर्षति ॥ ६८ ॥

पृष्ठ 1002

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जैसे सिंह वनमें किसी महान् गजराजको खींचता है, उसी प्रकार ये भूरिश्रवा वृष्णिवंशके प्रमुख वीर सात्यकिको खींच रहे हैं, उसे मार नहीं रहे हैं ॥ ६८ ॥

एवं तु मनसा राजन् पार्थः सम्पूज्य कौरवम् ।

वासुदेवं महाबाहुरर्जुनः प्रत्यभाषत ॥ ६ ९ ॥

राजन्! इस प्रकार मन-ही- मन उस कुरुवंशी वीरकी प्रशंसा करके महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा– ॥ ६ ९ ॥

सैन्धवे सक्तदृष्टित्वान्नैनं पश्यामि माधवम् ।

एतत् त्वसुकरं कर्म यादवार्थे करोम्यहम् ॥ ७० ॥

' प्रभो! मेरी दृष्टि सिन्धुराज जयद्रथपर लगी हुई थी । इसलिये मैं सात्यकिको नहीं देख रहा था; परंतु अब मैं इस यदुवंशी वीरकी रक्षाके लिये यह दुष्कर कर्म करता हूँ' ॥ ७० ॥

इत्युक्त्वा वचनं कुर्वन् वासुदेवस्य पाण्डवः ।

ततः क्षुरप्रं निशितं गाण्डीवे समयोजयत् ॥ ७१ ॥

ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करते हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनने गाण्डीव धनुषपर एक तीखा क्षुरप्र रखा ॥ ७१ ॥

पार्थबाहुविसृष्टः स महोल्केव नभश्च्युता ।

सखड्गं यज्ञशीलस्य साङ्गदं बाहुमच्छिनत् ॥ ७२ ॥

अर्जुनकी भुजाओंसे छोड़े गये उस क्षुरप्रने आकाशसे गिरी हुई बहुत बड़ी उल्काके समान उन यज्ञशील भूरिश्रवाकी बाजूबंदविभूषित ( दाहिनी ) भुजाको खड्गसहित काट गिराया ॥ ७२ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भूरिश्रवोबाहुच्छेदे द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भूरिश्रवाकी भुजाका उच्छेदविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४२ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ७३३ श्लोक हैं । ) O १. पृथ्वीपर घुमाना । २. प्रतिद्वन्द्वीकी ओर बढ़ना । ३. पीछे लौटना । ४. पछाड़ना । ५. पृथ्वीपर पटकना । ६. उछलकर खड़ा होना । ७. पीठ लगाना ।

पृष्ठ 1003

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त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः भूरिश्रवाका अर्जुनको उपालम्भ देना, अर्जुनका उत्तर और आमरण अनशनके लिये बैठे हुए भूरिश्रवाका सात्यकिके द्वारा वध संजय उवाच

स बाहुर्न्यपतद् भूमौ सखड्गः सशुभाङ्गदः ।

आदधज्जीवलोकस्य दुःखमद्भुतमुत्तमः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! भूरिश्रवाकी सुन्दर बाजूबंदसे विभूषित वह उत्तम बाँह समस्त प्राणियोंके मनमें अद्भुत दुःखका संचार करती हुई खड्गसहित कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १ ॥

प्रहरिष्यन् हृतो बाहुरदृश्येन किरीटिना ।

वेगेन न्यपतद् भूमौ पञ्चास्य इव पन्नगः ॥ २ ॥

प्रहार करनेके लिये उद्यत हुई वह भुजा अलक्ष्य अर्जुनके बाणसे कटकर पाँच मुखवाले सर्पकी भाँति बड़े वेगसे पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २ ॥

स मोघं कृतमात्मानं दृष्ट्वा पार्थेन कौरवः ।

उत्सृज्य सात्यकिं क्रोधाद् गर्हयामास पाण्डवम् ॥ ३ ॥

कुन्तीकुमार अर्जुनके द्वारा अपनेको असफल किया हुआ देख कुरुवंशी भूरिश्रवाने कुपित हो सात्यकिको छोड़कर पाण्डुनन्दन अर्जुनकी निन्दा करते हुए कहा ॥ ३ ॥

( स विबाहुर्महाराज एकपक्ष इवाण्डजः । एकचक्रो रथो यद्वद् धरणीमास्थितो नृपः । उवाच पाण्डवं चैव सर्वक्षत्रस्य शृण्वतः ॥ ) महाराज! वे राजा भूरिश्रवा एक बाँहसे रहित हो एक पाँखके पक्षी और एक पहियेके रथकी भाँति पृथ्वीपर खड़े हो सम्पूर्ण क्षत्रियोंके सुनते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनसे बोले । भूरिश्रवा उवाच

नृशंसं बत कौन्तेय कर्मेदं कृतवानसि ।

अपश्यतो विषक्तस्य यन्मे बाहुमचिच्छिदः ॥ ४ ॥

भूरिश्रवा बोले – कुन्तीकुमार! तुमने यह बड़ा कठोर कर्म किया है; क्योंकि मैं तुम्हें देख नहीं रहा था और दूसरेसे युद्ध करनेमें लगा हुआ था, उस दशामें तुमने मेरी बाँह काट दी है ॥ ४ ॥

किं नु वक्ष्यसि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।

पृष्ठ 1004

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किं कुर्वाणो मया संख्ये हतो भूरिश्रवा रणे ॥ ५ ॥

तुम धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरसे क्या कहोगे? यही न कि ' भूरिश्रवा किसी और कार्यमें लगे थे और मैंने उसी दशामें उन्हें युद्धमें मार डाला है ' ॥ ५ ॥

इदमिन्द्रेण ते साक्षादुपदिष्टं महात्मना ।

अस्त्रं रुद्रेण वा पार्थ द्रोणेनाथ कृपेण वा ॥ ६ ॥

पार्थ! इस अस्त्र- विद्याका उपदेश तुम्हें साक्षात् महात्मा इन्द्रने दिया है, या रुद्र, द्रोण अथवा कृपाचार्यने? ॥ ६ ॥

ननु नामास्त्रधर्मज्ञस्त्वं लोकेऽभ्यधिकः परैः ।

सोऽयुध्यमानस्य कथं रणे प्रहृतवानसि ॥ ७ ॥

तुमतो इसलोकमें दूसरोंसे अधिक अस्त्र- धर्मके ज्ञाता हो, फिर जो तुम्हारे साथ युद्ध नहीं कर रहा था, उसपर संग्राममें तुमने कैसे प्रहार किया? ॥ ७ ॥

न प्रमत्ताय भीताय विरथाय प्रयाचते ।

व्यसने वर्तमानाय प्रहरन्ति मनस्विनः ॥ ८ ॥

मनस्वी पुरुष असावधान, डरे हुए, रथहीन, प्राणों की भिक्षा माँगनेवाले तथा संकटमें पड़े हुए मनुष्यपर प्रहार नहीं करते हैं ॥ ८ ॥

इदं तु नीचाचरितमसत्पुरुषसेवितम् ।

कथमाचरितं पार्थ पापकर्म सुदुष्करम् ॥ ९ ॥

पार्थ! यह नीच पुरुषोंद्वारा आचरित और दुष्ट पुरुषोंद्वारा सेवित अत्यन्त दुष्कर पापकर्म तुमने कैसे किया? ॥ ९ ॥

आर्येण सुकरं त्वाहुरार्यकर्म धनंजय ।

अनार्यकर्म त्वार्येण सुदुष्करतमं भुवि ॥ १० ॥

धनंजय! श्रेष्ठ पुरुषके लिये श्रेष्ठ कर्म ही सुकर बताया गया है । नीच कर्मका आचरण तो इस पृथ्वीपर उसके लिये अत्यन्त दुष्कर माना गया है ॥ १० ॥

येषु येषु नरव्याघ्र यत्र यत्र च वर्तते ।

आशु तच्छीलतामेति तदिदं त्वयि दृश्यते ॥ ११ ॥

नरव्याघ्र! मनुष्य जहाँ - जहाँ जिन -जिन लोगोंके समीप रहता है, उसमें शीघ्र ही उन लोगोंका शीलस्वभाव आ जाता है; यही बात तुममें भी देखी जाती है ॥ ११ ॥

कथं हि राजवंश्यस्त्वं कौरवेयो विशेषतः ।

क्षत्रधर्मादपक्रान्तः सुवृत्तश्चरितव्रतः ॥ १२ ॥

अन्यथा राजाके वंशज और विशेषतः कुरुकुलमें उत्पन्न होकर भी तुम क्षत्रिय- धर्मसे कैसे गिर जाते? तुम्हारा शील- स्वभाव तो बहुत उत्तम था और तुमने श्रेष्ठ व्रतोंका पालन भी किया था ॥ १२ ॥

इदं तु यदतिक्षुद्रं वार्ष्णेयार्थे कृतं त्वया ।

पृष्ठ 1005

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वासुदेवमतं नूनं नैतत् त्वय्युपपद्यते ॥ १३ ॥

तुमने सात्यकिको बचानेके लिये जो यह अत्यन्त नीच कर्म किया है, यह निश्चय ही वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णका मत है, तुममें यह नीच विचार सम्भव नहीं है ॥ १३ ॥

को हि नाम प्रमत्ताय परेण सह युध्यते ।

ईदृशं व्यसनं दद्याद् यो न कृष्णसखो भवेत् ॥ १४ ॥

कौन ऐसा मनुष्य है, जो दूसरेके साथ युद्ध करनेवाले असावधान योद्धाको ऐसा संकट प्रदान कर सकता है । जो श्रीकृष्णका मित्र न हो, उससे ऐसा कर्म नहीं बन सकता ॥ १४ ॥

व्रात्याः संक्लिष्टकर्माणः प्रकृत्यैव च गर्हिताः ।

वृष्ण्यन्धकाः कथं पार्थ प्रमाणं भवता कृताः ॥ १५ ॥

कुन्तीनन्दन! वृष्णि और अन्धकवंशके लोग तो संस्कारभ्रष्ट हिंसा-प्रधान कर्म करनेवाले और स्वभावसे ही निन्दित हैं। फिर उनको तुमने प्रमाण कैसे मान लिया? ॥ १५ ॥

एवमुक्तो रणे पार्थो भूरिश्रवसमब्रवीत् ।

रणभूमिमें भूरिश्रवाके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उससे कहा ॥ १५ ॥

अर्जुनउवाच व्यक्तं हि जीर्यमाणोऽपि बुद्धिं जरयते नरः ॥ १६ ॥

अनर्थकमिदं सर्वं यत् त्वया व्याहृतं प्रभो ।

जानन्नेव हृषीकेशं गर्हसे मां च पाण्डवम् ॥ १७ ॥

अर्जुन बोले- प्रभो! यह स्पष्ट है कि मनुष्यके बूढ़े होनेके साथ - साथ उसकी बुद्धि भी बूढ़ी हो जाती है । तुमने इस समय जो कुछ कहा है, वह सब व्यर्थ है । तुम सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता भगवान् श्रीकृष्णको और मुझ पाण्डुपुत्र अर्जुनको भी जानते हो, तो भी हमारी निन्दा करते हो ॥ १६-१७ ॥

संग्रामाणां हि धर्मज्ञः सर्वशास्त्रार्थपारगः ।

न चाधर्ममहं कुर्यां जानंश्चैव हि मुह्यसे ॥ १८ ॥

मैं संग्रामके धर्मोंको जानता हूँ और सम्पूर्ण वेद- शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें पारंगत हूँ। मैं किसी प्रकार अधर्म नहीं कर सकता; यह जानते हुए भी तुम मेरे विषयमें मोहित हो रहे हो ॥ १८ ॥

युध्यन्ति क्षत्रियाः शत्रून् स्वैः स्वैः परिवृता नराः ।

भ्रातृभिः पितृभिः पुत्रैस्तथा सम्बन्धिबान्धवैः ॥ १ ९ ॥

वयस्यैरथ मित्रैश्च ते च बाहुं समाश्रिताः ।

पृष्ठ 1006

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क्षत्रियलोग अपने - अपने भाई, पिता, पुत्र, सम्बन्धी, बन्धु बान्धवों, समान अवस्थावाले साथी और मित्रोंसे घिरकर शत्रुओंके साथ युद्ध करते हैं । वे सब लोग उस प्रधान योद्धाके बाहुबलके आश्रित होते हैं ॥ १ ९ ३ ॥ स कथं सात्यकिं शिष्यं सुखसम्बन्धमेव च ॥ २० ॥

अस्मदर्थे च युध्यन्तं त्यक्त्वा प्राणान् सुदुस्त्यजान् ।

मम बाहुं रणे राजन् दक्षिणं युद्धदुर्मदम् ॥ २१ ॥

( निकृष्यमाणं तं दृष्ट्वा कथं शत्रुवशं गतम् । त्वया विकृष्यमाणं च दृष्टवानस्मि निष्क्रियम् ॥ ) सात्यकि मेरा शिष्य और सुखप्रद सम्बन्धी है । वह मेरे ही लिये अपने दुस्त्यज प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध कर रहा है । राजन्! रणदुर्मद सात्यकि युद्धस्थलमें मेरी दाहिनी भुजाके समान है । उसे तुम्हारे द्वारा कष्ट पाते देख मैं कैसे उसकी उपेक्षा कर सकता था । मैंने देखा है तुम उसे घसीट रहे थे और वह शत्रुके अधीन होकर निश्चेष्ट हो गया था ॥ २०-२१ ॥

न चात्मा रक्षितव्यो वै राजन् रणगतेन हि ।

यो यस्य युज्यतेऽर्थेषु स वै रक्ष्यो नराधिप ॥ २२ ॥

राजन्! रणभूमिमें गये हुए वीरके लिये केवल अपनी ही रक्षा करना उचित नहीं है । नरेश्वर! जो जिसके कार्योंमें संलग्न होता है, वह अवश्य ही उसके द्वारा रक्षणीय हुआ करता ॥ २२ ॥

तै रक्ष्यमाणैः स नृपो रक्षितव्यो महामृधे ।

यद्यहं सात्यकिं पश्ये वध्यमानं महारणे ॥ २३ ॥

ततस्तस्य वियोगेन पापं मेऽनर्थतो भवेत् ।

रक्षितश्च मया यस्मात् तस्मात् क्रुध्यसि किं मयि ॥ २४ ॥

इसी प्रकार उन सुरक्षित होनेवाले सुहृदोंका भी कर्तव्य है कि वे महासमरमें अपने राजाकी रक्षा करें । यदि मैं इस महायुद्ध में सात्यकिको अपने सामने मरते देखता तो उसके वियोगसे मुझे अनर्थकारी पाप लगता । इसीलिये मैंने उसकी रक्षा की है । अतः तुम मुझपर क्यों क्रोध करते हो? ॥ २३-२४ ॥

यच्च मे गर्हसे राजन्नन्येन सह संगतम् ।

अहं त्वया विनिकृतस्तत्र मे बुद्धिविभ्रमः ॥ २५ ॥

राजन्! आप जो यह कहकर मेरी निन्दा कर रहे हैं कि ' अर्जुन! मैं दूसरेके साथ युद्धमें लगा हुआ था, उस दशामें तुमने मेरे साथ छल किया ' आपकी इस बातसे मेरी बुद्धिमें भ्रम पैदा हो गया है ॥ २५ ॥

कवचं धुन्वतस्तुभ्यं रथं चारोहतः स्वयम् ।

धनुर्ज्या कर्षतश्चैव युध्यतः सह शत्रुभिः ॥ २६ ॥

एवं रथगजाकीर्णे हयपत्तिसमाकुले ।

पृष्ठ 1007

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सिंहनादोद्धतरवे गम्भीरे सैन्यसागरे ॥ २७ ॥

स्वैः परैश्च समेतेभ्यः सात्वतेन च संगमे ।

एकस्यैकेन हि कथं संग्रामः सम्भविष्यति ॥ २८ ॥

तुम स्वयं कवच हिलाते हुए रथपर चढ़े थे, धनुषकी प्रत्यंचा खींचते थे और अपने बहुसंख्यक शत्रुओंके साथ युद्ध कर रहे थे । इस प्रकार रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदलोंसे भरे हुए सिंहनादकी भैरव गर्जनासे व्याप्त गम्भीर सैन्य - समुद्रमें जहाँ अपने और शत्रुपक्षके एकत्र हुए लोगोंका परस्पर युद्ध चल रहा था, तुम्हारी सात्यकिके साथ मुठभेड़ हुई थी । ऐसे तुमुलयुद्धमें किसी भी एक योद्धाका एक ही योद्धाके साथ संग्राम कैसे माना जा सकता है? ॥ २६–२८ ॥

बहुभिः सह संगम्य निर्जित्य च महारथान् ।

श्रान्तश्च श्रान्तवाहश्च विमनाः शस्त्रपीडितः ॥ २ ९ ॥

सात्यकि बहुत - से योद्धाओंके साथ युद्ध करके कितने ही महारथियोंको पराजित करनेके बाद थक गया था। उसके घोड़े भी परिश्रमसे चूर- चूर हो रहे थे और वह अस्त्र- शस्त्रोंसे पीड़ित हो खिन्नचित्त हो गया था ॥ २ ९ ॥

ईदृशं सात्यकिं संख्ये निर्जित्य च महारथम् ।

अधिकत्वं विजानीषे स्ववीर्यवशमागतम् ॥ ३० ॥

ऐसी अवस्थामें महारथी सात्यकिको युद्धमें जीतकर तुम यह समझने लगे कि मैं सात्यकिसे बड़ा वीर हूँ और वह मेरे पराक्रमसे वशमें आ गया है ॥ ३० ॥

यदिच्छसि शिरश्चास्य असिना हन्तुमाहवे ।

तथा कृच्छ्रगतं चैव सात्यकिं कः क्षमिष्यति ॥ ३१ ॥

इसलिये तुम युद्धस्थलमें तलवारसे उसका सिर काट लेना चाहते थे । सात्यकिको वैसे संकटमें देखकर मेरे पक्षका कौन वीर सहन करेगा? ॥ ३१ ॥

त्वं वै विगर्हयात्मानमात्मानं यो न रक्षसि ।

कथं करिष्यसे वीर यो वा त्वां संश्रयेज्जनः ॥ ३२ ॥

तुम अपनी ही निन्दा करो, जो कि अपनी भी रक्षातक नहीं कर सकते । वीरवर! फिर जो तुम्हारे आश्रयमें होगा, उसकी रक्षा कैसे कर सकोगे? ॥ ३२ ॥

संजय उवाच

एवमुक्तो महाबाहुर्यूपकेतुर्महायशाः ।

युयुधानं समुत्सृज्य रणे प्रायमुपाविशत् ॥ ३३ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! अर्जुनके ऐसा कहनेपर यूपके चिह्नसे युक्त ध्वजावाले महायशस्वी महाबाहु भूरिश्रवा सात्यकिको छोड़कर रणभूमिमें आमरण अनशनका नियम लेकर बैठ गये ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 1008

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शरानास्तीर्य सव्येन पाणिना पुण्यलक्षणः ।

यियासुर्ब्रह्मलोकाय प्राणान् प्राणेष्वथाजुहोत् ॥ ३४ ॥

पवित्र लक्षणोंवाले भूरिश्रवाने बायें हाथसे बाण बिछाकर ब्रह्मलोकमें जानेकी इच्छासे प्राणायामके द्वारा प्राणोंको प्राणोंमें ही होम दिया ॥ ३४ ॥

सूर्ये चक्षुः समाधाय प्रसन्नं सलिले मनः ।

ध्यायन् महोपनिषदं योगयुक्तोऽभवन्मुनिः ॥ ३५ ॥

वे नेत्रोंको सूर्यमें और प्रसन्न मनको जलमें समाहित करके महोपनिषत्प्रतिपादित परब्रह्मका चिन्तन करते हुए योगयुक्त मुनि हो गये ॥ ३५ ॥

ततः स सर्वसेनायां जनः कृष्णधनंजयौ ।

गर्हयामास तं चापि शशंस पुरुषर्षभम् ॥ ३६ ॥

तदनन्तर सारी कौरव - सेनाके लोग श्रीकृष्ण और अर्जुनकी निन्दा तथा नरश्रेष्ठ भूरिश्रवाकी प्रशंसा करने लगे ॥ ३६ ॥

निन्द्यमानौ तथा कृष्णौ नोचतुः किंचिदप्रियम् ।

ततः प्रशस्यमानश्च नाहृष्यद् यूपकेतनः ॥ ३७ ॥

उनके द्वारा निन्दित होनेपर भी श्रीकृष्ण और अर्जुनने कोई अप्रिय बात नहीं कही तथा प्रशंसित होनेपर भी यूपकेतु भूरिश्रवाने हर्ष नहीं प्रकट किया ॥

तांस्तथावादिनो राजन् पुत्रांस्तव धनंजयः ।

अमृष्यमाणो मनसा तेषां तस्य च भाषितम् ॥ ३८ ॥

राजन्! आपके पुत्र जब भूरिश्रवाकी ही भाँति निन्दाकी बातें कहने लगे, तब अर्जुन उनके तथा भूरिश्रवाके उस कथनको मन-ही- मन सहन न कर सके ॥ ३८ ॥

असंक्रुद्धमना वाचः स्मारयन्निव भारत ।

उवाच पाण्डुतनयः साक्षेपमिव फाल्गुनः ॥ ३ ९ ॥

भरतनन्दन! पाण्डुपुत्र अर्जुनके मनमें तनिक भी क्रोध नहीं हुआ । उन्होंने मानो पुरानी बातें याद दिलाते हुए, कौरवोंपर आक्षेप करते हुए - से कहा— ॥ ३ ९ ॥

मम सर्वेऽपि राजानो जानन्त्येव महाव्रतम् ।

न शक्यो मामको हन्तुं यो मे स्याद् बाणगोचरे ॥ ४० ॥

' सब राजा मेरे इस महान् व्रतको जानते ही हैं कि जो कोई मेरा आत्मीयजन मेरे बाणोंकी पहुँचके भीतर होगा, वह किसी शत्रुके द्वारा मारा नहीं जा सकता ॥ ४० ॥

यूपकेतो निरीक्ष्यैतन्न मामर्हसि गर्हितुम् ।

न हि धर्ममविज्ञाय युक्तं गर्हयितुं परम् ॥ ४१ ॥

'यूपध्वज भूरिश्रवाजी! इस बातपर ध्यान देकर आपको मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये । धर्मके स्वरूपको जाने बिना दूसरे किसीकी निन्दा करना उचित नहीं है ॥ ४१ ॥

आत्तशस्त्रस्य हि रणे वृष्णिवीरं जिघांसतः ।

पृष्ठ 1009

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यदहं बाहुमच्छेत्सं न स धर्मो विगर्हितः ॥ ४२ ॥

‘ आप तलवार हाथमें लेकर रणभूमिमें वृष्णिवीर सात्यकिका वध करना चाहते थे । उस दशामें मैंने जो आपकी बाँह काट डाली है, वह आश्रित-रक्षारूप धर्म निन्दित नहीं है ॥ ४२ ॥

न्यस्तशस्त्रस्य बालस्य विरथस्य विवर्मणः ।

अभिमन्योर्वधं तात धार्मिकः को नु पूजयेत् ॥ ४३ ॥

तात! बालक अभिमन्यु शस्त्र, कवच और रथसे हीन हो चुका था, उस दशामें जो उसका वध किया गया, उसकी कौन धार्मिक पुरुष प्रशंसा कर सकता है ॥ ४३ ॥

( दुर्योधनस्य क्षुद्रस्य न प्रमाणेऽवतिष्ठतः ।

सौमदत्तेर्वधः साधुः स वै साहाय्यकारिणः ॥

' जो शास्त्रीय मर्यादामें स्थित नहीं रहता, उस नीच दुर्योधनकी सहायता करनेवाले सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाका जो इस प्रकार वध हुआ है, वह ठीक ही है ।

अस्मदीया मया रक्ष्याः प्राणबाध उपस्थिते ।

ये मे प्रत्यक्षतो वीरा हन्येरन्निति मे मतिः ॥

' मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि मुझे प्राण- संकट उपस्थित होनेपर आत्मीय जनोंकी रक्षा करनी चाहिये; विशेषतः उन वीरोंकी जो मेरी आँखोंके सामने मारे जा रहे हों ।

सात्यकिश्च वशं नीतः कौरवेण महात्मना ।

ततो मयैतच्चरितं प्रतिज्ञारक्षणं प्रति ॥

'कुरुवंशी महामना भूरिश्रवाने सात्यकिको अपने वशमें कर लिया था । इसीसे अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये मैंने यह कार्य किया है ' । संजय उवाच

पुनश्च कृपयाऽऽविष्टो बहु तत्तद् विचिन्तयन् ।

उवाच चैनं कौरव्यमर्जुनः शोकपीडितः ॥

संजय कहते हैं — राजन्! फिर बहुत - सी भिन्न-भिन्न बातें सोचकर अर्जुन दयासे द्रवित और शोकसे पीड़ित हो उठे तथा कुरुवंशी भूरिश्रवासे इस प्रकार बोले । अर्जुनउवाच धिगस्तु क्षत्रधर्मं तु यत्र त्वं पुरुषेश्वरः । अवस्थामीदृशीं प्राप्तः शरण्यः शरणप्रदः । अर्जुनने कहा –— उस क्षत्रिय धर्मको धिक्कार है, जहाँ दूसरोंको शरण देनेवाले आप-जैसे शरणागतवत्सल नरेश एसी अवस्थाको जा पहुँचे हैं । को हि नाम पुमाँल्लोके मादृशः पुरुषोत्तमः । प्रहरेत् त्वद्विधं त्वद्य प्रतिज्ञा यदि नो भवेत् ॥ )

पृष्ठ 1010

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यदि पहलेसे प्रतिज्ञा न की गयी होती तो संसारमें मेरे जैसा कौन श्रेष्ठ पुरुष आप - जैसे गुरुजनपर आज ऐसा प्रहार कर सकता था ।

एवमुक्तः स पार्थेन शिरसा भूमिमस्पृशत् ।

पाणिना चैव सव्येन प्राहिणोदस्य दक्षिणम् ॥ ४४ ॥

कुन्तीकुमार अर्जुनके ऐसा कहनेपर भूरिश्रवाने अपने मस्तकसे भूमिका स्पर्श किया ।

बायें हाथसे अपना दाहिना हाथ उठाकर अर्जुनके पास फेंक दिया ॥ ४४ ॥

एतत् पार्थस्य तु वचस्ततः श्रुत्वा महाद्युतिः ।

यूपकेतुर्महाराज तूष्णीमासीदवाङ्मुखः ॥ ४५ ॥

महाराज! पार्थकी उपर्युक्त बात सुनकर यूप- चिह्नित ध्वजावाले महातेजस्वी भूरिश्रवा नीचे मुँह किये मौन रह गये ॥ ४५ ॥

अर्जुन उवाच

या प्रीतिर्धर्मराजे मे भीमे च बलिनां वरे ।

नकुले सहदेवे च सा मे त्वयि शलाग्रज ॥ ४६ ॥

उस समय अर्जुनने कहा - शलके बड़े भाई भूरिश्रवाजी! मेरा जो प्रेम धर्मराज युधिष्ठिर, बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन, नकुल और सहदेवमें है, वही आपमें भी है ॥ ४६ ॥

मया त्वं समनुज्ञातः कृष्णेन च महात्मना ।

गच्छ पुण्यकृताँल्लोकान् शिबिरौशीनरो यथा ॥ ४७ ॥

मैं और महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण आपको यह आज्ञा देते हैं कि आप उशीनरपुत्र शिबिके समान पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकोंमे जायँ ॥ ४७ ॥

वासुदेव उवाच ये लोका मम विमलाः सकृद् विभाता ब्रह्माद्यैः सुरवृषभैरपीष्यमाणाः । तान् क्षिप्रं व्रज सतताग्निहोत्रयाजिन् मत्तुल्यो भव गरुडोत्तमाङ्गयानः ॥ ४८ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- निरन्तर अग्निहोत्रद्वारा यजन करनेवाले भूरिश्रवाजी! मेरे जो निरन्तर प्रकाशित होनेवाले निर्मल लोक हैं और ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी जहाँ जानेकी सदैव अभिलाषा रखते हैं, उन्हीं लोकोंमें आप शीघ्र पधारिये और मेरे ही समान गरुड़की पीठपर बैठकर विचरनेवाले होइये ॥ ४८ ॥

संजय उवाच

उत्थितः स तु शैनेयो विमुक्तः सौमदत्तिना ।

खड्गमादाय चिच्छित्सुः शिरस्तस्य महात्मनः ॥ ४ ९ ॥