महाभारत — खण्ड ४
Mahabharata - 4 · Gita Press, Gorakhpur · 3237 पृष्ठ · 324 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीहरिः । 35 श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत महाभारत ( चतुर्थ खण्ड ) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक और स्त्रीपर्व [ सचित्र, सरल हिन्दी अनुवादसहित ]… 1–10
- ८२- युधिष्ठिरका प्रातःकाल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए… 11–20
- ५५- अश्वत्थामाका घोर युद्ध, सात्यकिके सारथिका वध एवं युधिष्ठिरका अश्वत्थामाको छोड़कर दूसरी ओर चले जाना ५६- नकुल - सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध,… 21–30
- चित्र -सूची (सादा) १ - दुर्योधनद्वारा द्रोणाचार्यका सेनापतिके पदपर अभिषेक २- अर्जुनके द्वारा भगदत्तका वध ३- चक्रव्यूह ४- अभिमन्युके द्वारा कौरव सेनाके… 31–40
- यत्तद् विनिहते भीष्मे कौरवाणामपाकृतम् । ५१ । भीष्मके मारे जानेपर युद्धस्थलमें कौरवोंके पक्षमें जो कमी आ गयी थी, क्या उसे धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ कर्णने… 41–50
- गीताप्रेस गोरखपुर सेनापति द्रोणाचार्य गीताप्रेस गोरखपुर अर्जुनका जयद्रथके मस्तकको काटकर समन्त पञ्चक क्षेत्रसे बाहर फेंकना गीताप्रेस गोरखपुर व्यासजी… 51–60
- तृतीयोऽध्यायः भीष्मजीके प्रति कर्णका कथन संजय उवाच शरतल्पे महात्मानं शयानममितौजसम् । महावातसमूहेन समुद्रमिव शोषितम् । १… 61–70
- कर्णने कहा — राजन्! ये सभी महामनस्वी पुरुष- प्रवर नरेश सेनापति होनेके योग्य हैं । इस विषयमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है । १३… 71–80
- एवं तौ सुमहात्मानौ बलसेनाग्रगावुभौ । ३१ । श्वेत घोड़ोंसे सुशोभित वह रथ इन चार तेजोंको धारण करता हुआ शत्रुओंके सामने उठे हुए कालचक्रके समान खड़ा हुआ… 81–90
- नवमोऽध्यायः द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना धृतराष्ट्रउवाच किं कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नुः पाण्डवसृजयाः… 91–100
- यद्वः सभैरवं कुर्वन्नर्जुनो भृशमन्वयात् । २२ । जिस समय अर्जुनने अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करते हुए तुमलोगोंका पीछा किया था, उस समय गाण्डीवकी टंकार सुनकर हमारी… 101–110
- उन्होंने रणक्षेत्रमें अंग, वंग, कलिंग, मगध, काशि, कोसल, वत्स, गर्ग, करूष तथा पौण्ड्र आदि देशोंपर विजय पायी थी । १५… 111–120
- त्रयोदशोऽध्यायः अर्जुनका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा युद्धमें द्रोणाचार्यका पराक्रम संजय उवाच सान्तरे तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे… 121–130
- सात्यकिः कृतवर्माणं नाराचेन स्तनान्तरे । विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनरन्यैः स्मयन्निव । ३५ । सात्यकिने मुसकराते हुए - से एक नाराचद्वारा कृतवर्माकी… 131–140
- ततो गदाग्राभिहतौ क्षणेन रुधिरोक्षितौ । ददृशाते महात्मानौ किंशुकाविव पुष्पितौ । २३ । एक ही क्षणमें गदाके अग्रभागसे घायल होकर वे दोनों महामनस्वी वीर खूनसे… 141–150
- और छोड़ते थे कि किसीको इन दोनों क्रियाओंमें तनिक भी अन्तर नहीं दिखायी देता था । ४५-४६ । न दिशो नान्तरिक्षं च न द्यौर्नैव च मेदिनी… 151–160
- भगवान् हृषीकेशसे ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने युद्धमें त्रिगर्तोंकी व्यूहाकार खड़ी हुई सेनापर आक्रमण किया । ७ । स देवदत्तमादाय शङ्खं हेमपरिष्कृतम्… 161–170
- रक्तकी वर्षासे वहाँकी उड़ती हुई भारी धूलराशि शान्त हो गयी और सैकड़ों कबन्धों ( बिना सिरकी लाशों) -से आच्छादित होनेके कारण उस भूमिपर चलना कठिन हो गया । ३४… 171–180
- एकविंशोऽध्यायः द्रोणाचार्यके द्वारा सत्यजित्, शतानीक, दृढसेन, क्षेम, वसुदान तथा पांचालराजकुमार आदिका वध और पाण्डव- सेनाकी पराजय संजय उवाच ततो युधिष्ठिरो… 181–190
- द्रोणचापविमुक्तेन शरौघेणाशुहारिणा । सिन्धोरिव महौघेन ह्रियमाणान् यथा प्लवान् । ८ । कौरवाः सिंहनादेन नानावाद्यस्वनेन च । रथद्विपनरांश्चैव सर्वतः समवारयन्… 191–200
- भीषयन्तो द्विषत्सैन्यं यमवैश्रवणोपमाः । ४२ । ये सब- के - सब यम और कुबेरके समान पराक्रमी योद्धा वेगशाली, सुवर्णमालाओंसे अलंकृत एवं सुशिक्षित, उत्तम काबुली… 201–210
- इति मामब्रवीत् सूत मन्दो दुर्योधनः पुरा । ८ । सूत संजय! आजसे बहुत पहलेकी बात है, मूर्ख दुर्योधनने मुझसे कहा था कि ' पिताजी! इस समय केकय, काशी, कोसल तथा… 211–220
- महाराज! भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यने देखा कि पाण्डव सेनापति महारथी धृष्टद्युम्न दूसरे शत्रुओंको लाँघकर अपने मन्त्रियों तथा सेवकोंसहित मेरी ही ओर आ रहा है और… 221–230
- तस्याभिद्रवतो वाहान् हस्तमुक्तेन वारिणा । ५० । सिक्त्वा व्यत्रासयन्नागस्ते पार्थमहरंस्ततः । उस समय आक्रमण करनेवाले भीमसेनके घोड़ोंपर उस हाथीने सूँड़से जल… 231–240
- ततोऽर्जुनः सुशर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । ध्वजं धनुश्चास्य तथा क्षुराभ्यां समकृन्तत । ७ । तत्पश्चात् अर्जुनने सुशर्माको सात बाणोंसे घायल करके दो… 241–250
- अभ्यगात् सह पुखेन वल्मीकमिव पन्नगः । ४१ । वह नाराच उस हाथीके मस्तकपर पहुँचकर उसी प्रकार लगा, जैसे वज्र पर्वतपर चोट करता है… 251–260
- क्रूर स्वभाववाले पांचालसैनिक एक-दूसरेको प्रेरित करने लगे, अरे! द्रोणाचार्यको पकड़ लो, द्रोणाचार्यको बंदी बना लो और आपके पुत्र समस्त कौरवोंको आदेश दे रहे… 261–270
- संशप्तक योद्धा महान् सरोवरोंके समान थे, बाणोंके समूह ही उनके जल - प्रवाह थे, धनुष ही उनमें उठी हुई बड़ी - बड़ी भँवरोंके समान जान पड़ते थे तथा प्रवाहित… 271–280
- यत्र राज्येप्सवः शूरा बाले शस्त्रमपातयन् । २३ । धर्मशास्त्रके निर्माताओंने यह क्षत्रिय धर्म अत्यन्त कठोर बनाया है, जिसमें स्थित होकर राज्यके लोभी शूर-… 281–290
- अहं त्वानुगमिष्यामि धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः । पञ्चालाः केकया मत्स्यास्तथा सर्वे प्रभद्रकाः । २२ । भीमसेन बोले- बेटा! मैं तुम्हारे साथ चलूँगा… 291–300
- प्रातिष्ठन्त समुत्सृज्य त्वरयन्तो हयद्विपान् । ४६ । वे जीवनकी इच्छा रखकर अपने - अपने सगे - सम्बन्धियोंके गोत्र और नामका उच्चारण करके एक- दूसरेके लिये… 301–310
- जैसे सूर्य अपनी सहस्रों किरणोंको सब ओर बिखेर देते हैं, उसी प्रकार क्रोधमें भरा हुआ अभिमन्यु सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखसे युक्त सैकड़ों विचित्र… 311–320
- विजय पानेकी इच्छा रखनेवाला, सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें मानी, अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परशुरामजीके शिष्य और प्रतापी वीर कर्णने अपने उत्तम अस्त्रोंका प्रदर्शन… 321–330
- पाण्डवेयानहं संख्ये भीमवीर्यपराक्रमान् । वारयेयं रथेनैकः समस्तानिति भारत । १७ । एवमुक्तस्तु देवेशो जयद्रथमथाब्रवीत्… 331–340
- पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः अभिमन्युके द्वारा सत्यश्रवा, क्षत्रियसमूह, रुक्मरथ तथा उसके मित्रगणों और सैकड़ों राजकुमारोंका वध और दुर्योधनकी पराजय संजय उवाच… 341–350
- सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः अभिमन्युका पराक्रम, छः महारथियोंके साथ घोर युद्ध और उसके द्वारा वृन्दारक तथा दस हजार अन्य राजाओंके सहित कोसलनरेश बृहद्बलका वध… 351–360
- Gray अभिमन्युपर अनेक महारथियोंद्वारा एक साथ प्रहार स चक्ररेणूज्ज्वलशोभिताङ्गो बभावतीवोज्ज्वलचक्रपाणिः… 361–370
- पिशाचसंघाश्च सुदारुणा रणे । ९ । कुत्ते, सियार, कौए, बगुले, गरुड़, भेड़िये, तेंदुए, रक्त पीनेवाले पक्षी, राक्षसोंके समुदाय तथा अत्यन्त भयंकर पिशाचगण उस… 371–380
- व्यस्यन् बाणसहस्राणि योधेषु च गजेषु च । २८ । वह रणक्षेत्रमें शत्रुओंद्वारा घिर जानेपर शत्रुपक्षके योद्धाओं और गजारोहियोंपर बारंबार सहस्रों बाणोंकी वर्षा… 381–390
- इच्छेयं त्वत्प्रसादाद्धि तपस्तप्तुं प्रजेश्वर । प्रदिशेमं वरं देव त्वं मह्यं भगवन् प्रभो । ७ । प्रजेश्वर! मैं आपकी कृपासे तपस्या करना चाहती हूँ… 391–400
- विधिवच्चार्चितौ तेन प्रीतौ तत्रोषतुः सुखम् । ६ । एक दिन वे दोनों महर्षि सृजयसे मिलनेके लिये उसके घर पधारे… 401–410
- सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः राजा पौरवके अद्भुत दानका वृत्तान्त नारद उवाच राजानं पौरवं वीरं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । सहस्रं यः सहस्राणांश्वेतानश्वानवासृजत् । १… 411–420
- इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये एकोनषष्टितमोऽध्यायः । ५ ९ । इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें… 421–430
- वहाँ भक्ष्य - भोज्य अन्न और पीनेयोग्य पदार्थोंकी अनेक राशियाँ संचित थीं । अन्नके तो पहाड़ों - जैसे ढेर सुशोभित होते थे… 431–440
- षट्षष्टितमोऽध्यायः राजा गयका चरित्र नारद उवाच गयं चामूर्तरयसं मृतं सृञ्जय शुश्रुम । यो वै वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् । १… 441–450
- जाम्बूनदस्य शुद्धस्य कनकस्य महायशाः । इसके बाद भरतने अग्निष्टोम और अतिरात्र याग करके विश्वजित् नामक यज्ञ किया… 451–460
- कश्यपके इस आदेशसे योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामने जितनी दूर बाण फेंका जा सकता है, समुद्रको उतनी ही दूर पीछे हटाकर ब्राह्मणकी आज्ञाका पालन करते हुए उत्तम… 461–470
- कच्चिन्न निहतः संख्ये सौभद्रः परवीरहा । २२ । ‘ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला महाधनुर्धर सुभद्राकुमार अभिमन्यु युद्धमें शत्रुओंके उस व्यूहका अनेकों बार भेदन… 471–480
- त्रिसप्ततितमोऽध्यायः युधिष्ठिरके मुखसे अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनकर अर्जुनकी जयद्रथको मारनेके लिये शपथपूर्ण प्रतिज्ञा युधिष्ठिर उवाच त्वयि याते महाबाहो… 481–490
- चतुःसप्ततितमोऽध्यायः जयद्रथका भय तथा दुर्योधन और द्रोणाचार्यका उसे आश्वासन देना संजय उवाच श्रुत्वा तु तं महाशब्दं पाण्डूनां जयगृद्धिनाम्… 491–500
- मन्त्रज्ञैः सचिवैः सार्धं सुहृद्भिः कार्यसिद्धये । ३१ । ' अब मैं पुनः अपने हितका ध्यान रखते हुए कार्यकी सिद्धिके लिये मन्त्रज्ञ मन्त्रियों और हितैषी… 501–510
- अष्टसप्ततितमोऽध्यायः सुभद्राका विलाप और श्रीकृष्णका सबको आश्वासन संजय उवाच एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य केशवस्य महात्मनः… 511–520
- ‘ यह सब सुनकर दुर्योधन अपने मन्त्रियोंके साथ ऐसी मन्त्रणा करेगा' जिससे अर्जुन समरभूमिमें जयद्रथको मार न सकें । २२३… 521–530
- SP अर्जुनका स्वप्नदर्शन स्तूयमानं स्तवैर्दिव्यैर्ऋषिभिर्ब्रह्मवादिभिः । गोप्तारं सर्वभूतानामिष्वासधरमच्युतम् । ४२… 531–540
- उत्थायावश्यकार्यार्थं ययौ स्नानगृहं नृपः । ७ । बहुमूल्य एवं उत्तम शय्यापर सुखपूर्वक सोकर जगे हुए राजा युधिष्ठिर वहाँसे उठकर आवश्यक कार्यके लिये स्नान करने… 541–550
- यों कहकर अर्जुन अपने सुहृदोंके आश्वासनके लिये जिस प्रकार भगवान् शंकरसे मिलनका स्वप्न देखा था, वह सब कह सुनाया । ६… 551–560
- नान्यथा प्रकरिष्यन्ति धर्मात्मानो हि पाण्डवाः । ३७ । ‘ मेरे कहनेपर भी वे मेरे धर्मयुक्त वचनकी अवहेलना नहीं करेंगे; क्योंकि वीर पाण्डव धर्मात्मा हैं '… 561–570
- उस चक्रशकटव्यूहके पिछले भागमें पद्म नामक एक गर्भव्यूह बनाया गया था, जो अत्यन्त दुर्भेद्य था । उस पद्मव्यूहके मध्यभागमें सूची नामक एक गूढ़ व्यूह और बनाया… 571–580
- महाभुजगसंकाशा बाहवः परिघोपमाः । १८ । उद्वेष्टन्ति विचेष्टन्ति संचेष्टन्ति च सर्वशः । वेगं कुर्वन्ति संरब्धा निकृत्ताः परमेषुभिः । १ ९… 581–590
- संजय उवाच एवमुक्तस्तदाचार्यः प्रत्युवाच स्मयन्निव । मामजित्वा न बीभत्सो शक्यो जेतुं जयद्रथः । ७… 591–600
- तावप्येनं विविधतुर्दशभिर्दशभिः शरैः । त्रिभिरेव युधामन्युरुत्तमौजास्त्रिभिस्तथा । ३० । तब उन दोनोंने भी कृतवर्माको दस - दस बाणोंसे बींध दिया… 601–610
- अपने बाणोंके वेगसे शत्रुओंके बाणोंको नष्ट करके पाण्डुकुमार अर्जुनने जहाँ -तहाँ अन्य महारथियोंसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थान किया । २३… 611–620
- किं न पश्यसि बाणौघान् क्रोशमात्रे किरीटिनः । पश्चाद् रथस्य पतितान् क्षिप्तान् शीघ्रं हि गच्छतः । २१… 621–630
- इसी प्रकार दूसरे महाबली शूरवीर नरेश भी उस युद्धस्थलमें सब ओरसे लौटकर पांचालोंका ही प्रतिरोध करने लगे । १४ । ततो रणे नरव्याघ्रः पार्षतः पाण्डवैः सह… 631–640
- सप्तनवतितमोऽध्यायः द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिद्वारा धृष्टद्युम्नकी रक्षा संजय उवाच तथा तस्मिन् प्रवृत्ते तु संग्रामे लोमहर्षणे… 641–650
- सज्यं सज्यं धनुश्चास्य चिच्छेद निशितैः शरैः । तब द्रोणाचार्य पुनः बड़ी उतावलीके साथ दूसरा धनुष हाथमें लेकर खड़े हो गये; परंतु ज्यों ही वे धनुषपर डोरी… 651–660
- उस समय अर्जुनने उस असंख्य, अपार, दुर्लङ्घ्य एवं अक्षोभ्य रण- समुद्रको सीमावर्ती तटप्रान्तके समान होकर अपने बाणोंद्वारा रोक दिया… 661–670
- विमुक्तौ शस्त्रसम्बाधाद् द्रोणानीकात् सुदुर्भिदात् । अदृश्येतां महात्मानौ कालसूर्याविवोदितौ । ७… 671–680
- ‘ पार्थ! यदि तुम पाण्डुके बेटे हो तो तुमने जो लौकिक एवं दिव्य अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है, उन सबको मेरे ऊपर शीघ्र दिखाओ । ३६… 681–690
- मृदङ्गेष्वपि राजेन्द्र वाद्यमानेष्वनेकशः । महारथाः समाख्याता दुर्योधनहितैषिणः । १६ । अमृष्यमाणास्तं शब्दं क्रुद्धाः परमधन्विनः… 691–700
- तमभ्ययाद् बृहत्क्षत्रः केकयानां महारथः । प्रवपन् निशितान् बाणान् महेन्द्राशनिसंनिभान् । ७ । केकयदेशके महारथी वीर बृहत्क्षत्रने महेन्द्रके वज्रके समान तीखे… 701–710
- फिर दूसरे पानीदार एवं तीखे भल्लसे उसके सारथिके चमकीले कुण्डलवाले मस्तकको धड़से काट गिराया । क्षुरप्रेण च तीक्ष्णेन कौरव्यस्य महद् धनुः… 711–720
- इस प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए वे दोनों महाबली राक्षसराज परस्पर मायाओंको प्रयोग करते हुए समानरूपसे युद्ध करने लगे । ६३… 721–730
- कौरवाश्च यथा हृष्टा विनदन्ति मुहुर्मुहुः । तब पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर मोहके वशीभूत होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगे —'जिस प्रकार शंखराज पांचजन्यकी ध्वनि… 731–740
- विजेष्ये च रणे राजन् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । ७ । ' राजन्! मैं रणक्षेत्रमें आज चारों ओर घूमकर दुर्योधनकी सेनाके साथ युद्ध करूँगा और उसपर विजय पाऊँगा; यह मैं… 741–750
- ' महाराज! जिन दूसरे इन सात सौ हाथियोंको आप देख रहे हैं, जो कवचसे आच्छादित हैं और जिनपर किरात योद्धा चढ़े हुए हैं, ये वे ही हाथी हैं, जिन्हें दिग्विजयके… 751–760
- ऊरुभिः पृथिवी च्छन्ना मनुजानां नराधिप । माननीय नरेश! सारे कौरव- सैनिक सात्यकिके तेजसे मोहित हो अकेले होनेपर भी उन्हें अनेक रूपोंमें देखने लगे… 761–770
- क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम् । १३ । ध्वजभूषणसम्बाधरत्नोपलसुसंचितम् । वाहनैरभिधावद्भिर्वायुवेगविकम्पितम् । १४ । द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्रदम्… 771–780
- जैसे दो सूर्य पृथक् - पृथक् अपनी किरणोंका विस्तार करते हों, उसी प्रकार वे दोनों वीर अपने श्रेष्ठ धनुष हिलाते और उनपर सैकड़ों बाणोंका संधान करके छोड़ते थे… 781–790
- खूनसे भीगे शरीरवाला जलसंधका वह हाथी अपनी पीठसे सटकर लटकते हुए उस हौदेको ढो रहा था । ५५ । शरार्दितः सात्वतेन मर्दमानः स्ववाहिनीम् । ५६… 791–800
- धनुश्चिच्छेद समरे माधवस्य महात्मनः । १५ । इसके बाद सुवर्णमय पंखवाले दूसरे भल्लसे आचार्यने समरांगणमें महामनस्वी सात्यकिके धनुषको भी खण्डित कर दिया । १५… 801–810
- सात्यकिका कौरव - सेनामें प्रवेश और युद्ध दंशिताः क्रूरकर्माणः काम्बोजा युद्धदुर्मदाः । शरबाणासनधरा यवनाश्च प्रहारिणः । १४… 811–820
- मेघजालनिभं सैन्यं तव पुत्रस्य मारिष । प्रत्यगृह्णाच्छिनेः पौत्रः शरैराशीविषोपमैः । २३ । माननीय नरेश! शिनिपौत्र सात्यकिने अपने विषधर सर्पके समान भयंकर… 821–830
- पत्थरके चूर्णोंसे व्याप्त हुए मनुष्य, हाथी और घोड़े वहाँ ठहर न सके, मानो उन्हें भ्रमरोंने डस लिया हो । ४५ । हतशिष्टाः सरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिकाः… 831–840
- स च्छाद्यमानो बहुधा पार्षतेन महात्मना । न विव्यथे ततो द्रोणः स्मयन्नेवान्वयुध्यत । ५४ । महामना धृष्टद्युम्नके द्वारा बाणोंसे आच्छादित किये जानेपर भी… 841–850
- कथं च युध्यमानानामपक्रान्तो महात्मनाम् । एको बहूनां शैनेयस्तन्ममाचक्ष्व संजय । ७ । संजय! जब बहुत - से महामनस्वी वीर युद्ध कर रहे थे, उस समय अकेले सात्यकि… 851–860
- बृहत्क्षत्रे हते राजन् केकयानां महारथे । शैशुपालिरभिक्रुद्धो यन्तारमिदमब्रवीत् । २३ । राजन्! केकय महारथी बृहत्क्षत्रके मारे जानेपर शिशुपालपुत्र… 861–870
- यथैव च मम प्रीतिरर्जुने शत्रुसूदने । १५ । तथैव वृष्णिवीरेऽपि सात्वते युद्धदुर्मदे । अतिभारे नियुक्तश्च मया शैनेयनन्दनः । १६… 871–880
- आहत्य दुन्दुभिं भीमः शङ्ख प्रध्माप्य चासकृत् । विनद्य सिंहनादेन ज्यां विकर्षन् पुनः पुनः । २८… 881–890
- परंतु द्रोणाचार्य पुनः पलक मारते- मारते अपने रथपर बैठे दिखायी देते थे । उस समय आपके योद्धा विस्मयसे आँखें फाड़ - फाड़कर यह दृश्य देख रहे थे । २२… 891–900
- तदनन्तर वे दोनों वीर एक- दूसरेपर पृथक् - पृथक् सीधे जानेवाले बाणोंका प्रहार करने लगे । राधानन्दन कर्ण मृदुतापूर्वक बाण चलाता था और पाण्डुनन्दन भीमसेन… 901–910
- अनेकान् विप्रकारांश्च सूतपुत्रसमुद्भवान् । स्मरमाणः कथं भीमो युयुधे सूतसूनुना । १५ । सूतपुत्रके द्वारा किये गये अनेक अपकारोंको स्मरण करके भीमसेनने उसके… 911–920
- पाण्डवोंको तिनकोंके समान समझकर जो आपका पुत्र दुर्योधन उछलता - कूदता था, स्वयं सुखमयी परिस्थितिमें रहते हुए भी जो उस अचेत मूर्खने संकटमें पड़े हुए… 921–930
- चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन और कर्णका युद्ध, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्मुखका वध तथा कर्णका पलायन संजय उवाच सर्वथा विरथः कर्णः पुनर्भीमेन निर्जितः… 931–940
- भरतनन्दन! कर्णको भीमसेनसे पराजित हुआ देख आपके पाँच महाधनुर्धर पुत्र जो परस्पर सगे भाई थे, सह न सके । २ ९ । दुर्मर्षणो दुःसहश्च दुर्मदो दुर्धरो जयः… 941–950
- भरतनन्दन! युद्धमें भीमसेनका वह पराक्रम देखकर आपके योद्धाओं तथा चारणोंने भी प्रसन्न होकर उनका अभिनन्दन किया । १४… 951–960
- एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध, पहले भीमकी और पीछे कर्णकी विजय, उसके बाद अर्जुनके बाणोंसे व्यथित होकर कर्ण और अश्वत्थामाका… 961–970
- तं च दृष्ट्वा रथोपस्थे निलीनं व्यथितेन्द्रियम् । ७६ । ध्वजमस्य समासाद्य तस्थौ भीमो महीतले । कर्णकी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो गयी थीं… 971–980
- एकः प्रविष्टः संक्रुद्धो नलिनीमिव कुञ्जरः । ७ । तस्य मे वृष्णिवीरस्य ब्रूहि युद्धं यथातथम् । धनंजयार्थे यत्तस्य कुशलो ह्यसि संजय । ८… 981–990
- गोष्पदं प्राप्य सीदेत महौजाः शिनिपुङ्गवः । ‘ क्या इन दोनोंके इस संघर्षमें इस समय सात्यकि सकुशल विजयी हो सकेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि सत्यपराक्रमी… 991–1000
- असत्यो विक्रमः पार्थ यत्र भूरिश्रवा रणे । विशेषयति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम् । ६५ । ‘पार्थ! पराक्रम मिथ्या है, जिसका आश्रय लेनेपर भी वृष्णिवंशी… 1001–1010
- संजय कहते हैं - राजन्! सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाके छोड़ देनेपर शिनिपौत्र सात्यकि उठकर खड़े हो गये… 1011–1020
- पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनका जयद्रथपर आक्रमण, कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत, कर्णके साथ अर्जुनका युद्ध और कर्णकी पराजय तथा सब योद्धाओंके साथ… 1021–1030
- कर्ण पार्थोऽस्मि तिष्ठ त्वं कर्णोऽहं तिष्ठ फाल्गुन । ७६ । वे दोनों एक- दूसरेपर चोट करते हुए स्वयं बाण- समूहोंसे ढककर अदृश्य हो गये थे और एक- दूसरेको… 1031–1040
- अर्जुनने कायरोंका भय बढ़ानेवाली वैतरणीके समान एक अत्यन्त भयंकर रौद्र और घोर रक्तकी नदी बहा दी, जो प्राणशून्य योद्धाओंके सैकड़ों निश्चेष्ट शरीरोंको बहाये… 1041–1050
- समन्तपञ्चकादस्माद् बहिर्वानरकेतन । ११४ । ‘ कपिध्वज अर्जुन! वे तेजस्वी राजा वृद्धक्षत्र इस समय इस समन्तपंचक - क्षेत्रसे बाहर घोर एवं दुर्धर्ष तपस्या कर रहे… 1051–1060
- ' पूर्वकालमें मुझे अस्त्रविद्याकी शिक्षा देकर कृपाचार्यने जो मुझसे यह कहा था कि ‘ कुरुनन्दन! तुम्हें गुरुके ऊपर किसी प्रकार भी प्रहार नहीं करना चाहिये '… 1061–1070
- अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनका कर्णको फटकारना और वृषसेनके वधकी प्रतिज्ञा करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको बधाई देकर उन्हें रणभूमिका भयानक दृश्य दिखाते… 1071–1080
- एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे विजयका समाचार सुनाना और युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णाकी स्तुति तथा अर्जुन, भीम एवं सात्यकिका अभिनन्दन संजय… 1081–1090
- सर्वथा हतमेवेदं कौरवाणां महद् बलम् । न ह्यस्य विद्यते त्राता साक्षादपि पुरंदरः । ७ । ‘ कौरवोंकी यह विशाल सेना अब सर्वथा नष्टप्राय ही है… 1091–1100
- ' विनयपूर्ण दृष्टि और श्रद्धायुत्ह हृदयसे ब्राह्मणोंको संतुष्ट रखना, यथाशक्ति उनका आदर - सत्कार करते रहना… 1101–1110
- भारत! पाण्डव - सैनिकों तथा दुर्योधनका वह भयंकर संग्राम समस्त सेनाओंका महान् विनाश करनेवाला था । (धृतराष्ट्र उवाच द्रोणः कर्णः कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः… 1111–1120
- उस सेनाके आसपास सियारोंके समूह अपनी भयंकर बोली बोल रहे थे । शक्तियों तथा ध्वजोंसे सारी सेना व्याप्त थी… 1121–1130
- ‘ ओ दुराचारी मूर्ख! उस पापकर्मका फल तुम इस युद्धस्थलमें ही प्राप्त करो । आज मैं पराक्रम करके एक बाणसे तुम्हारा सिर काट डालूँगा ' । ६… 1131–1140
- राजन्! तब घटोत्कचपुत्रने तुरंत ही सोनेके अंगदसे विभूषित गदा घुमाकर अश्वत्थामापर दे मारी; परंतु अश्वत्थामाके बाणोंसे आहत होकर वह भी पृथ्वीपर गिर पड़ी । ८५… 1141–1150
- तब अश्वत्थामाने भी उनपर सहस्रों नाराच चलाये । धृष्टद्युम्न और घटोत्कचने भी अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा अश्वत्थामाके नाराचोंको काट डाला । १६३… 1151–1160
- बीभत्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं च वृकोदरः । भारद्वाजं शरौघाभ्यां महद्भ्यामभ्यवर्षताम् । ४६ । अर्जुनने द्रोणाचार्यके दाहिने पार्श्वमें और भीमसेनने बायें… 1161–1170
- निहताः समरे शूराः पाण्डवैर्बलवत्तराः । किमन्यद् दैवसंयोगान्मन्यसे पुरुषाधम । ६७ । ‘ परंतु उन अत्यन्त प्रबल तथा शूरवीर नरेशोंको भी पाण्डवोंने युद्धमें मार… 1171–1180
- जीवितार्थमभिप्रेप्सुः कृपस्य रथमारुहत् । अर्जुनके बाणसमूहोंसे पीड़ित और व्याप्त होकर वह काँटोंसे भरे हुए साहीके समान जान पड़ता था… 1181–1190
- ‘जो ब्राह्मण ब्राह्मणत्वका परित्याग करके क्षत्रियधर्ममें तत्पर हो, जैसा कि मनुष्योंमें अधम तू है, वह सब लोगोंके लिये वध्य है ' । ३८३… 1191–1200
- अर्धचन्द्रेण चिच्छेद माधवस्य महद् धनुः । १५ । महाराज! तदनन्तर युद्धस्थलमें महारथी सोमदत्तने अर्धचन्द्राकार बाणसे सात्यकिके विशाल धनुषको काट दिया । १५… 1201–1210
- व्यायच्छतां तत्र तदा विरेजुः । २२ । राजन्! छत्र, चँवर, खड्ग, प्रज्वलित विशाल उल्काएँ तथा वहाँ युद्ध करते हुए वीरोंकी हिलती हुई सुवर्णमालाएँ उस समय… 1211–1220
- पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः दोनों सेनाओंका युद्ध और कृतवर्माद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय संजय उवाच वर्तमाने तदा रौद्रे रात्रियुद्धे विशाम्पते… 1221–1230
- अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए घटोत्कचने युद्धस्थलमें कालाग्निके समान दस तेजस्वी बाणोंद्वारा अश्वत्थामाकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी । ३०… 1231–1240
- था । वह भयंकर रथ काले लोहेका बना था और उसके ऊपर रीछकी खाल मढ़ी हुई थी । ३८-३९ । रौद्रेण चित्रपक्षेण विवृताक्षेण कूजता… 1241–1250
- तावुभौ समरे शूरौ शरकण्टकिनौ तदा । व्यराजेतां महाराज कण्टकैरिव शाल्मली । ७ । महाराज! जैसे काँटोंसे सेमरका वृक्ष सुशोभित होता है, उसी प्रकार वे दोनों शूरवीर… 1251–1260
- वहाँ आते हुए महाधनुर्धर युद्धदुर्मद सात्यकिको राधापुत्र कर्णने सीधे जानेवाले दस बाणोंसे बींध डाला । तं सात्यकिर्महाराज विव्याध दशभिः शरैः… 1261–1270
- डाला । ३१ । भुजैश्छिन्नैर्महीपाल हस्तिहस्तोपमैर्मृधे । समाकीर्णा मही भाति पञ्चास्यैरिव पन्नगैः । ३२… 1271–1280
- त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः कर्णद्वारा धृष्टद्युम्न एवं पांचालोंकी पराजय, युधिष्ठिरकी घबराहट तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनका घटोत्कचको प्रोत्साहन देकर कर्णके साथ… 1281–1290
- अलमेवास्मि कर्णाय द्रोणायालं च भारत । अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणां महात्मनाम् । ६३ । घटोत्कचने कहा — महाबाहो! प्रभो! आप मुझे जैसा कह रहे हैं,… 1291–1300
- जीभ और ओठ ताँबेके समान लाल और लम्बे थे, भौंहें बड़ी - बड़ी, नाक मोटी, शरीरका रंग काला, गर्दन लाल और शरीर पर्वताकार था… 1301–1310
- इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षं रक्षः क्रूरपराक्रमम् ६८ । उत्पपातान्तरिक्षं च जहास च सुविस्तरम् । कर्णमभ्यहनच्चैव गजेन्द्रमिव केसरी । ६ ९… 1311–1320
- सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन और अलायुधका घोर युद्ध संजय उवाच तमागतमभिप्रेक्ष्य भीमकर्माणमाहवे । हर्षमाहारयांचक्रुः कुरवः सर्व एव ते । १… 1321–1330
- चूर्णयामास वेगेन विसृष्टा भीमकर्मणा । १५ । भयंकर कर्म करनेवाले उस राक्षसद्वारा वेगपूर्वक फेंकी गयी उस भारी आवाज करनेवाली गदाने अलायुधके रथ, सारथि और… 1331–1340
- ते त्वार्यभावात् पुरुषप्रवीराः पराङ्मुखा नो बभूवुस्तदानीम् । ३२ । साधारण सैनिक विषादकी मूर्ति बनकर हाहाकार करते हुए सब ओर भाग - भागकर छिपने लगे; परंतु जो… 1341–1350
- ‘ घटोत्कचको मारा गया देख हमारी सेनाएँ यहाँ युद्धसे विमुख होकर भागी जा रही हैं । हिडिम्बाकुमारके धराशायी होनेसे हमलोग भी अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं । ७… 1351–1360
- द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः कर्णने अर्जुनपर शक्ति क्यों नहीं छोड़ी, इसके उत्तरमें संजयका धृतराष्ट्रसे और श्रीकृष्णका सात्यकिसे रहस्ययुक्त कथन धृतराष्ट्रउवाच… 1361–1370
- कथं प्रत्युद्ययुर्द्रोणमस्यन्तं पाण्डुसृञ्जयाः । १५ । भूरिश्रवा तथा जयद्रथके वधसे कुपित हो जब द्रोणाचार्य आये और जीवनका मोह छोड़कर पाण्डव - सेनामें उसका… 1371–1380
- सहस्रयामप्रतिमा बभूव प्राणहारिणी । यह तीन पहरकी रात उनके लिये सहस्रों प्रहरोंकी रात्रिके समान घोर, भयानक एवं प्राणहारिणी प्रतीत होती थी । १४३… 1381–1390
- अक्षयं क्षपयेत् कश्चित् क्षत्रियः क्षत्रियर्षभम् । ' नरेश्वर! अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले क्षत्रिय - शिरोमणि गाण्डीवधारी अविनाशी अर्जुनको कौन क्षत्रिय… 1391–1400
- द्रुपदस्य कुले जातः सर्वास्त्रेष्वस्त्रवित्तमः । ५१ । कः क्षत्रियो मन्यमानः प्रेक्षेतारिमवस्थितम्… 1401–1410
- अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः दुःशासन और सहदेवका, कर्ण और भीमसेनका तथा द्रोणाचार्य और अर्जुनका घोर युद्ध संजय उवाच ततो दुःशासनः क्रुद्धः सहदेवमुपाद्रवत्… 1411–1420
- आपके चार योद्धाओंका तीन पाण्डववीरोंके साथ जो घमासान युद्ध चल रहा था, वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित था । १४… 1421–1430
- राजन्! कुन्तीपुत्र अर्जुनको यह बात अच्छी नहीं लगी, किंतु अन्य सब लोगोंने इस युक्तिको पसंद कर लिया… 1431–1440
- तब धृष्टद्युम्नने हँसकर फिर दूसरा धनुष उठाया और तीखे बाणद्वारा आचार्यकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी । १५ । सोऽतिविद्धो महेष्वासोऽसम्भ्रान्त इव संयुगे… 1441–1450
- ततश्चतुर्दिशं सैन्यैर्द्वपदस्याभिसंवृतः । निर्दहन् क्षत्रियव्रातान् द्रोणः पर्यचरद् रणे । २३ । तदनन्तर द्रुपदकी सेनाओंद्वारा चारों ओरसे घिरे हुए… 1451–1460
- राजन्! तदनन्तर भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न एक- दूसरेको हृदयसे लगाकर सेनाके बीचमें हर्षके मारे नाचने लगे । ७ ९ ३… 1461–1470
- अनघ! इस प्रकार तुम्हारे पिताके मारे जानेपर समस्त सैनिक भयसे पीड़ित होकर भाग चले हैं और हमलोग उत्साहशून्य होकर लौटे आ रहे हैं । ६७… 1471–1480
- निपतेयुः सपत्नेषु विक्रमत्स्वपि भारत । ‘ भारत! मैं जैसा - जैसा चाहूँगा, वैसा ही रूप धारण करके मेरे बाण शत्रुओंके पराक्रम करनेपर भी उनपर पड़ेंगे । ४१३… 1481–1490
- सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनके वीरोचित उद्गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन संजय उवाच अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नोचुस्तत्र महारथाः… 1491–1500
- 'तुझे ब्रह्महत्याका पाप लगा है । तुझ ब्रह्महत्यारेको देखकर लोग अपने प्रायश्चित्तके लिये सूर्यदेवका दर्शन करते हैं । २१३… 1501–1510
- तथापरे द्योतमाना ज्योतींषीवामलाम्बरे । प्रादुरासन् महाराज कार्ष्णायसमया गुडाः । १८ । महाराज! इसी प्रकार वहाँ निर्मल आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ज्योतिर्मय… 1511–1520
- माननीय नरेश! भीमसेन तथा उनके रथ, घोड़े और सारथि -ये सभी अश्वत्थामाके अस्त्रसे आच्छादित हो आगकी लपटोंके भीतर आ गये थे । ५… 1521–1530
- किया । ७८ । युवराजश्च विंशत्या दौणिं विव्याध पत्रिभिः । पार्थश्च पुनरष्टाभिस्तथा सर्वे त्रिभिस्त्रिभिः । ७ ९… 1531–1540
- डालीं । १३ । एवमुक्तः श्वसन् क्रोधान्महेष्वासतमो नृप । पार्थेन परुषं वाक्यं सर्वमर्मभिदा गिरा । १४… 1541–1550
- अक्षौहिणी सेनाको जलाकर शान्त हो गया । ५२-५३ । सर्वघाति मया मुक्तमस्त्रं परमदारुणम् । केनेमौ मर्त्यधर्माणौ नावधीत् केशवार्जुनौ । ५४… 1551–1560
- ब्रह्मलोकं गतो राजन् ब्राह्मणो वेदपारगः । १०० । राजन्! इस प्रकार वेदोंके पारंगत विद्वान् द्रोणाचार्य पाँच दिनोंतक युद्ध तथा शत्रुसेनाका संहार करके… 1561–1570
- राजन्! सब देवता भयभीत हो भगवान् शंकरकी शरणमें आये । तब क्रोध शान्त होनेपर उन्होंने उस यज्ञको पूर्ण किया… 1571–1580
- उनका जो शिव शरीर है, वह तेजोमय और परम कान्तिमान् है । वह देवताओंके उपयोगमें आता है तथा मनुष्यलोकमें उनका प्रकाशमान घोर शरीर ‘ अग्नि ’ कहलाता है । १४२… 1581–1590
- ‘ सभामें परशुराम, नारद और महर्षि कण्व आदिकी कही हुई हितकर बातें आपने नहीं मानी थीं । अब उन्हें स्मरण करके क्या आपके मनमें कष्ट नहीं हो रहा है? । ७… 1591–1600
- पञ्चमोऽध्यायः संजयका धृतराष्ट्रको कौरवपक्षके मारे गये प्रमुख वीरोंका परिचय देना वैशम्पायन उवाच इति श्रुत्वा महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः… 1601–1610
- सामुद्रश्चित्रसेनश्च सह पुत्रेण भारत । १५ । समुद्रसेनेन बलाद् गमितो यमसादनम् । भारत! समुद्रतटवर्ती राज्यके अधिपति चित्रसेन अपने पुत्रके साथ युद्धमें आकर… 1611–1620
- अष्टमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका विलाप जनमेजय उवाच श्रुत्वा कर्णं हतं युद्धे पुत्रांश्चैव निपातितान् । नरेन्द्रः किंचिदाश्वस्तो द्विजश्रेष्ठ किमब्रवीत् । १… 1621–1630
- संजय! युद्धस्थलमें किरीटधारी अर्जुनके द्वारा उस महाधनुर्धर कर्णके मारे जानेपर कौन - कौन - से वीर ठहर सके; यह मुझे बताओ । ३५… 1631–1640
- सुनीतैरिह सर्वार्थैर्देवमप्यनुलोम्यते । ते वयं प्रवरं नृणां सर्वैर्गुणगणैर्युतम् । १५ । कर्णमेवाभिषेक्ष्यामः सैनापत्येन भारत… 1641–1650
- कर्णेन विहिता वीर गुप्ता वीरैर्महारथैः । २३ । ‘ वीर पार्थ! देखो, इस समय युद्धस्थलमें धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेना कैसी स्थितिमें है? कर्णने वीर… 1651–1660
- त्रयोदशोऽध्यायः दोनों सेनाओंका परस्पर घोर युद्ध तथा सात्यकिके द्वारा विन्द और अनुविन्दका वध संजय उवाच ततः कर्णो महेष्वासः पाण्डवानामनीकिनीम्… 1661–1670
- प्रेषयामास संक्रुद्धश्चित्रस्य वधकाङ्क्षया । ३१ । राजन्! तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए प्रतिविन्ध्यने चित्रके वधकी इच्छासे उसके ऊपर एक सुवर्णभूषित तोमरका… 1671–1680
- अर्जुनने समरभूमिमें अपने क्षुरोंद्वारा शत्रुओंकी उन भुजाओंको भी काट डाला, जो पाँच मुखवाले सर्पोंके समान दिखायी देती थीं, जो गोल, लंबी, पुष्ट तथा अगुरु एवं… 1681–1690
- किरीटमाल्याभरणोज्ज्वलानि । भल्लार्धचन्द्रक्षुरकर्तितानि प्रपेतुरुर्व्या नृशिरांस्यजस्रम् । ११… 1691–1700
- एकोनविंशोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा संशप्तक - सेनाका संहार, श्रीकृष्णका अर्जुनको युद्धस्थलका दृश्य दिखाते हुए उनके पराक्रमकी प्रशंसा करना तथा पाण्ड्यनरेशका… 1701–1710
- कौरव - सेनामें रथ, घोड़े और हाथियोंकी संख्या बढ़ी चढ़ी थी, श्रेष्ठ पैदल सैनिकोंसे भी वह सेना भरी हुई थी, तथापि पाण्ड्यनरेशके द्वारा बलपूर्वक आहत होकर वह… 1711–1720
- ज्यातलत्रधनुःशब्दः कुञ्जराणां च बृंहताम् । पादातानां च पततां नृणां नादो महानभूत् । १५ । प्रत्यंचा, हस्तत्राण और धनुषका शब्द, चिग्घाड़ते हुए हाथियोंकी आवाज… 1721–1730
- त्रयोविंशोऽध्यायः सहदेवके द्वारा दुःशासनकी पराजय संजय उवाच सहदेवं तथा क्रुद्धं दहन्तं तव वाहिनीम् । दुःशासनो महाराज भ्राता भ्रातरमभ्ययात् । १… 1731–1740
- दृष्ट्वा सेनापतिं यान्तं पञ्चालानां रथव्रजान् । ५५ । प्रजानाथ! कौरव- सेनापति कर्णको पांचाल रथियोंकी ओर जाते देख पाण्डव-सैनिकोंमें महान् कोलाहल मच गया… 1741–1750
- षड्विंशोऽध्यायः कृपाचार्यसे धृष्टद्युम्नका भय तथा कृतवर्माके द्वारा शिखण्डीकी पराजय संजय उवाच धृष्टद्युम्नं कृपो राजन् वारयामास संयुगे… 1751–1760
- प्रजानाथ! फिर तो वहाँ हजारों बाण प्रकट होने लगे । माननीय भरतवंशी प्रजापालक नरेश! उस समय कट- कटकर गिरनेवाले ध्वज, धनुष, रथ, पताका, तरकस, जूए, धुरे, पहिये,… 1761–1770
- एकोनत्रिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरके द्वारा दुर्योधनकी पराजय धृतराष्ट्रउवाच अतितीव्राणि दुःखानि दुःसहानि बहूनि च… 1771–1780
- इसके बाद कुन्तीपुत्रोंकी सेनाके सभी प्रमुख वीर कर्णको पीड़ा देने लगे । युधामन्यु, शिखण्डी, द्रौपदीके पाँचों पुत्र प्रभद्रकगण, उत्तमौजा, युयुत्सु, नकुल-… 1781–1790
- भूपाल! आज उस वीरके मारे जानेपर पर्वत, वन, द्वीप और समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी तुम्हारे पुत्र- पौत्रोंकी परम्परामें प्रतिष्ठित हो जायगी । ४ ९… 1791–1800
- शल्यने कहा — गान्धारीपुत्र! तुम मेरा अपमान कर रहे हो, निश्चय ही तुम्हारे मनमें मेरे प्रति संदेह है, तभी तुम निर्भय होकर कह रहे हो कि आप ‘ सारथिका कार्य… 1801–1810
- उक्त तीनों पुरोंमें निवास करनेवाला जो भी असुर अपने मनसे जिस अभीष्ट भोगका चिन्तन करता था, उसके लिये मयासुर अपनी मायासे वह वह भोग तत्काल प्रस्तुत कर देता था… 1811–1820
- वषट्कारः प्रतोदोऽभूद् गायत्री शीर्षबन्धना । ३५ । वषट्कार घोड़ोंका चाबुक हुआ और गायत्री उस रथके ऊपरी भागकी बन्धन-रज्जु बनीं । ३५… 1821–1830
- हयानां च स्तना राजंस्तदाप्रभृति नाभवन् । १०६ । पीडितानां बलवता रुद्रेणाद्भुतकर्मणा । राजन्! आपका कल्याण हो… 1831–1840
- ‘ महाबाहो! तुम रणक्षेत्रमें वैकर्तन कर्णका अपमान न करो । वह सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका पारंगत विद्वान् है । १३३… 1841–1850
- मेघोंकी छायाके समान छाया कर रहे हैं, निरन्तर बाण- वर्षा करते और शत्रुओंका संहार किये डालते हैं, तब तुम ऐसी बातें मुँहसे न निकाल सकोगे । ३१-३२… 1851–1860
- यदि न रिपुभयात् पलायसे समरगतोऽद्य हतोऽसि सूतज । ४० । सूतपुत्र! अब आज तुम्हारे वधके लिये पुनः यह दूसरा उत्तम युद्ध उपस्थित हुआ है… 1861–1870
- ‘ अरे! तुम चन्द्रोदयके समय बढ़ते हुए, जलजन्तुओंसे पूर्ण तथा उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त अगाध जलराशिवाले भयंकर समुद्रको बिना किसी नावके ही केवल दोनों हाथोंके… 1871–1880
- एकचत्वारिंशोऽध्यायः राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना संजय उवाच… 1881–1890
- वयं काकाः कुतो नाम चरामः काकवाशिकाः । हंस प्राणैः प्रपद्ये त्वामुदकान्तं नयस्व माम् । ५८ । ' भाई हंस! हम तो कौए हैं । व्यर्थ काँव- काँव किया करते हैं… 1891–1900
- 'रथके मार्गोंपर विचरनेमें कुशल, शक्तिशाली, समरांगणमें सदा महान् भार वहन करनेवाले, संसारके समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ, प्रमुख वीर अर्जुनका आज युद्धस्थलमें… 1901–1910
- ‘ मदसे उन्मत्त होकर परस्पर सरस विनोदयुक्त बातें करती हुई वे एक- दूसरीको ' ओ घायल की हुई! ओ किसीकी मारी हुई! हे पतिमर्दिते! ' इत्यादि कहकर पुकारती और नृत्य… 1911–1920
- महाराज! राक्षस, पिशाच और गुह्यक- ये गिरिराज हिमालय तथा गन्धमादन पर्वतकी रक्षा करते हैं और अविनाशी एवं सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन समस्त प्राणियोंका पालन… 1921–1930
- वृषसेनं च नकुलः सहदेवोऽपि सौबलम् । ३४ । दुःशासनं शतानीको हार्दिक्यं शिनिपुङ्गवः । धृष्टद्युम्नो द्रोणसुतं स्वयं योत्स्याम्यहं कृपम् । ३५… 1931–1940
- सेनाओंकी उस विशाल भँवरमें जो पातालतलके समान प्रतीत होता था, अर्जुनके उस रथको निमग्न हुआ मानकर संशप्तक सैनिक प्रसन्न हो सिंहनाद करने लगे । १३३… 1941–1950
- राजेन्द्र! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले इन प्रमुख वीरों तथा दूसरोंने भी उस महासमरमें महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्णको बाणोंद्वारा पीड़ित कर दिया । ५५… 1951–1960
- ततो बाह्वोर्ललाटे च हृदि चैव युधिष्ठिरः । चतुर्भिस्तोमरैः कर्णं ताडयित्वानदन्मुदा । ४६ । तत्पश्चात् युधिष्ठिरने कर्णकी दोनों भुजाओं, ललाट और छातीमें चार… 1961–1970
- शल्य बोले — कर्ण! क्रोधमें भरे हुए पाण्डुनन्दन महाबाहु भीमसेनको देखो, जो दीर्घकालसे संचित किये हुए क्रोधको आज तुम्हारे ऊपर छोड़नेका दृढ़ निश्चय किये हुए… 1971–1980
- नरेश्वर! वे दोनों थे विकट ( विकटानन ) और सम । देवपुत्रोंके समान सुशोभित होनेवाले वे दोनों वीर आँधीके उखाड़े हुए दो वृक्षोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े । १५३… 1981–1990
- यस्य यद्धि रणे व्यङ्गं पितृतो मातृतोऽपि वा । ७७ । कर्मतः शीलतो वापि स तच्छ्रावयते युधि । रणभूमिमें जिसकी जो कुछ पिता- माता, कर्म अथवा शील- स्वभावके कारण… 1991–2000
- संचचाल महाराज वित्रस्ता चाद्रवद् भृशम् । २३ । महाराज! उस शंखनादको सुनकर संशप्तकोंकी सेना काँप उठी और भयभीत होकर जोर - जोरसे भागने लगी । २३… 2001–2010
- राजन्! तब धृष्टद्युम्नने गदा हाथमें लेकर पुनः बड़े वेगसे महाधनुर्धर कृतवर्मापर शीघ्र ही आघात किया । सोऽतिविद्धो बलवता न्यपतन्मूर्च्छया हतः… 2011–2020
- तदनन्तर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न आपके अमर्षशील पुत्रने पैंसठ बाणोंसे धृष्टद्युम्नको घायल करके बड़े जोरसे गर्जना की । २१ । तथास्य सशरं चापं हस्तावापं च मारिष… 2021–2030
- जैसे यज्ञमें ऋत्विजोंद्वारा विधिपूर्वक आवाहन किये जानेपर दोनों अश्विनीकुमार नामक देवता पदार्पण करते हैं, उसी प्रकार युद्धनिपुण वे श्रीकृष्ण और अर्जुन भी… 2031–2040
- नवाकिरन्नप्सरसः प्रहृष्टाः । १४ । रणभूमिमें अपने कर्मका ठीक -ठीक भार वहन करनेवाले मनुष्योंमें श्रेष्ठ प्रमुख वीरोंपर हर्षमें भरी हुई अप्सराएँ दिव्य हारों,… 2041–2050
- महाराज! तब कर्णने अत्यन्त कुपित हो धृष्टद्युम्नपर द्वितीय मृत्युदण्डके समान एक सुवर्ण- भूषित बाण चलाया । १४ । तमापतन्तं सहसा घोररूपं विशाम्पते… 2051–2060
- 'कर्णने शत्रुओंको संताप देनेवाले, शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले, बलवान्, विद्वान् और युद्धकुशल राजा युधिष्ठिरको युद्ध से विमुख कर दिया है । १४… 2061–2070
- संजय कहते हैं - राजन्! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे यह सब सुनकर और भीमसेनके द्वारा किये हुए उस अत्यन्त दुष्कर कर्मको अपनी आँखों देखकर महाबाहु… 2071–2080
- दुद्रुवुः शतशः संख्ये भीमसेनशराहताः । तदनन्तर भीमसेनके बाणोंसे आहत हो फूटे गण्डस्थल, विदीर्ण कुम्भस्थल और छिन्न-भिन्न शुण्डदण्डवाले सैकड़ों हाथी… 2081–2090
- ' तुम चलकर जीवनके भारी संशयमें पड़े हुए राजा दुर्योधनको बचाओ । आज माद्रीकुमार नकुल- सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरका वध करके क्या होगा? ' । २८३… 2091–2100
- 'महाबाहु श्रीकृष्ण! यह भार्गवास्त्रका पराक्रम देखिये । समरांगणमें किसी तरह इस अस्त्रको नष्ट नहीं किया जा सकता । ६१… 2101–2110
- पातालमिव गम्भीरं सुहृदां नन्दिवर्धनम् । ७ । अन्तकं मम मित्राणां हत्वा कर्णं महामृधे । दिष्ट्या युवामनुप्राप्तौ जित्वासुरमिवामरौ । ८… 2111–2120
- स्तदा कर्णः प्राहिणोन्मृत्युसद्म । १४ । राजन्! मृत्युके फैले हुए मुँहके समान कर्णके पास पहुँचकर प्रभद्रकगण भारी संकटमें पड़ गये… 2121–2130
- एकोनसप्ततितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका वध करनेके लिये उद्यत हुए अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णका बलाकव्याध और कौशिक मुनिकी कथा सुनाते हुए धर्मका तत्त्व बताकर समझाना… 2131–2140
- अबमैं पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको वधके योग्य नहीं मानता । मेरी इस मानसिक प्रतिज्ञाके विषयमें आप ही कोई अनुग्रह ( भाईका वध किये बिना ही प्रतिज्ञाकी… 2141–2150
- अहं हनिष्ये स्वशरीरमेव प्रसह्य येनाहितमाचरं वै । पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर अर्जुन अत्यन्त दुःखी हो उनसे इस प्रकार बोले — ‘ भगवन्!… 2151–2160
- तव बुद्ध्या हि भद्रं ते वधस्तस्य दुरात्मनः - राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले – ' श्रीकृष्ण! आज रणभूमिमें मैं कर्णका वध करूँगा,… 2161–2170
- को हि शक्तो रणे जेतुं कौरवांस्तात संयुगे । अन्यत्र पाण्डवान् युद्धे त्वया गुप्तान् महारथान् । ७… 2171–2180
- ‘ अन्य सब नरेश इन्हींके योग- क्षेममें लगे हुए हैं । भद्रे! देख, इस समय पाण्डव दुर्योधनके तेजसे एक साथ ही नष्टप्राय होकर एक- दूसरेका मुँह देख रहे हैं । ८७… 2181–2190
- अद्य तीक्ष्णैर्विपाठैश्च क्षुरैश्च मधुसूदन । ३ ९ । रणे छेत्स्यामि गात्राणि राधेयस्य दुरात्मनः… 2191–2200
- प्रीतो भविष्यामि सह त्वयाद्य । १४ । ' अच्छा, अब मैं अत्यन्त विश्वस्त होकर शत्रुओंकी प्रचण्ड सेनाका विनाश करूँगा… 2201–2210
- ते वध्यमानाः समरे पार्थचापच्युतैः शरैः । तत्र तत्र स्म लीयन्ते भये जाते महारथाः । १७ । अर्जुनके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा समरांगणमें मारे जाते हुए कौरव… 2211–2220
- परिवव्रुर्महेष्वासाः पाण्डवानां महारथाः । १५ । संग्राममें ऐसा पराक्रम प्रकट करनेवाले उस अपराजित वीरको महाधनुर्धर पाण्डव महारथियोंने चारों ओरसे घेर लिया… 2221–2230
- दृश्यते वानरो भीमो वीराणां भयवर्धनः । २२ । 'कुन्तीकुमार अर्जुनकी ध्वजाके अग्रभागमें एक भयंकर वानर दिखायी देता है, जो सब ओर देखता हुआ कौरववीरोंका भय बढ़ा… 2231–2240
- राजेन्द्र! जैसे ज्येष्ठ और आषाढ़के मध्यवर्ती प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेव धरतीके जलसमूहोंको अनायास ही सोख लेते हैं, उसी प्रकार अर्जुन अपने बाणसमूहोंका… 2241–2250
- एकाशीतितमोऽध्यायः अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कौरव वीरोंका संहार तथा कर्णका पराक्रम संजय उवाच तं प्रयान्तं महावेगैरश्वैः कपिवरध्वजम्… 2251–2260
- सुसंशितेनाधिरथिर्महात्मा । ९ । फिर भयंकर वीर कर्णने छः बाणोंसे शिखण्डीको घायल कर दिया और धृष्टद्युम्नके पुत्रका मस्तक काट डाला… 2261–2270
- अथाशु भीमं च शरेण भूयो गाढं स विव्याध सुतस्त्वदीयः । चुक्रोध भीमः पुनराशु तस्मै भृशं प्रजज्वाल रुषाभिवीक्ष्य । ५… 2271–2280
- चतुरशीतितमोऽध्यायः धृतराष्ट्रके दस पुत्रोंका वध, कर्णका भय और शल्यका समझाना तथा नकुल और वृषसेनका युद्ध संजय उवाच दुःशासने तु निहते तव पुत्रा महारथाः… 2281–2290
- उन कुलिन्द वीरोंके मारे जानेपर आपके महारथी बड़े प्रसन्न हुए । वे जोर- जोरसे शंख बजाने लगे और हाथमें धनुष - बाण लिये शत्रुओंपर टूट पड़े । ८… 2291–2300
- पुनरप्याह तेजस्वी पार्थः कृष्णमरिंदमम् । चोदयाश्वान् हृषीकेश कालोऽयमतिवर्तते । २२ । उस समय तेजस्वी पार्थने शत्रुदमन श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार कहा — '… 2301–2310
- महामना कर्ण और अर्जुनको युद्धके लिये एकत्र हुआ देख देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंसहित तीनों लोकके प्राणी काँपने लगे । ६१… 2311–2320
- रहे, जैसे पूर्वकालमें देवता और असुर, इन्द्र और शम्बरासुरको घेरकर खड़े हुए थे । मृदङ्गभेरीपणवानकस्वनैः ससिंहनादैर्नदतुर्नरोत्तमौ । ९… 2321–2330
- विचित्रवर्माभरणाम्बरायुधे । चकम्पतुर्विस्मयनीयरूपे वियद्गताश्चार्जुनकर्णसंयुगे । ८ । विचित्र कवच, आभूषण, वस्त्र और आयुध धारण करनेवाली, हाथी, घोड़े, रथ और… 2331–2340
- ‘ सव्यसाचिन्! सब लोग कहते हैं कि तुम परम उत्तम एवं मनके द्वारा प्रयोग करनेयोग्य महान् ब्रह्मास्त्रके ज्ञाता हो; इसलिये तुम दूसरे किसी श्रेष्ठ अस्त्रका… 2341–2350
- नवतितमोऽध्यायः अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण… 2351–2360
- दृष्टश्च कर्णेन ततोऽब्रवीत् तम् । ४४ । अर्जुनका वह मुकुट सुवर्णमय होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करता था… 2361–2370
- ऐन्द्रं ततोऽर्जुनश्चापि तं दृष्ट्वाभ्युपमन्त्रयत् । ९ १ । उसने बलपूर्वक धैर्य धारण करके ब्रह्मास्त्र प्रकट किया… 2371–2380
- जग्राह बाणं यमदण्डकल्पम् । ३२ । ततोऽर्जुनः प्राञ्जलिकं महात्मा ततोऽब्रवीद वासुदेवोऽपि पार्थम् । छिन्ध्यस्य मूर्धानमरेः शरेण न यावदारोहति वै रथं वृषः । ३३… 2381–2390
- यथायथैषां प्रकृतिस्तथाभवन् । ४ । कोई प्रसन्न था तो कोई भयभीत । कोई विषादग्रस्त था तो कोई आश्चर्यचकित तथा दूसरे बहुत - से लोग शोकसे मृतप्राय हो रहे थे… 2391–2400
- अल्पं च बलमेतेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ । ५३ । अद्य सर्वान् हनिष्यामि ध्रुवो हि विजयो भवेत् । ‘ योद्धाओ! तुम भयसे पीड़ित हो रहे हो… 2401–2410
- जैसे प्रज्वलित आग जलको पाकर बुझ जाती है, उसी प्रकार समरांगणमें कर्णरूपी अग्निको अर्जुनरूपी मेघने बुझा दिया । ४०… 2411–2420
- 'जब यह महायुद्ध चल रहा था, उस समय तुम्हारा और कर्णका युद्ध देखनेके लिये धर्मनन्दन युधिष्ठिर पहले आये थे । ६ । भृशं तु गाढविद्धत्वान्नाशकत् स्थातुमाहवे… 2421–2430
- ततः कर्णे हते राजन् धार्तराष्ट्रः सुयोधनः । भृशं शोकार्णवे मग्नो निराशः सर्वतोऽभवत् । ४ । वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! कर्णके मारे जानेपर धृतराष्ट्रपुत्र… 2431–2440
- एकोऽप्येषां महाराज समर्थः संनिवारणे । समरे पाण्डवेयानां संक्रुद्धो ह्यभिधावताम् । २४ । किं पुनः सहिता वीराः कृतवैराश्च पाण्डवैः… 2441–2450
- तब क्रोधमें भरे हुए भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने अपनी चतुरंगिणी सेनाके द्वारा उन्हें तितर - बितर करके बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल कर दिया । २१३… 2451–2460
- कृतवर्मा कहाँ चले गये थे और भाइयोंसहित तुम्हारा भ्राता दुःशासन भी कहाँ था? । ३०-३१ । सम्बन्धिनस्ते भ्रातॄंश्च सहायान् मातुलांस्तथा… 2461–2470
- इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि दुर्योधनवाक्ये पञ्चमोऽध्यायः । ५ । इसप्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें दुर्योधनका वाक्यविषयक पाँचवाँअध्याय पूरा हुआ । ५… 2471–2480
- प्रहर्षं प्राप्य सेना तु तावकी भरतर्षभ । तां रात्रिमुषिता सुप्ता हर्षचित्ता च साभवत् । २३ । भरतश्रेष्ठ! आपकी सेना महान् हर्ष पाकर उस रातमें वहीं रही और सो… 2481–2490
- इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि व्यूहनिर्माणेऽष्टमोऽध्यायः । ८ । इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें व्यूह-निर्माणविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ । ८… 2491–2500
- तथा ध्वजं सारथिं च त्रिभिस्त्रिभिरपातयत् । उसने अपने तीखे बाणोंद्वारा नकुलके घोड़ोंको भी मृत्युके हवाले कर दिया तथा तीन-तीन बाणोंसे उनके ध्वज और सारथिको… 2501–2510
- सब- की - सब चारों ओर बिखरी पड़ती थीं । १५ । मृगाश्च महिषाश्चापि पक्षिणश्च विशाम्पते । अपसव्यं तदा चक्रुः सेनां ते बहुशो नृप । १६… 2511–2520
- तावाजघ्नतुरन्योन्यं मण्डलानि विचेरतुः । २२ । तदनन्तर वे पुनः अपनी भयंकर गदाएँ उठाकर शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान परस्पर आघात करने और मण्डलाकार गतिसे विचरने… 2521–2530
- उस समय राजा दुर्योधन शल्यका वह पराक्रम देखकर ऐसा समझने लगा कि अब पाण्डव, पांचाल और सृजय अवश्य मार डाले जायँगे । ३१… 2531–2540
- पञ्चदशोऽध्यायः दुर्योधन और धृष्टद्युम्नका एवं अर्जुन और अश्वत्थामाका तथा शल्यके साथ नकुल और सात्यकि आदिका घोर संग्राम संजय उवाच दुर्योधनो महाराज… 2541–2550
- उन कुरुकुलके श्रेष्ठ वीरोंने रोषमें भरकर महान् हर्षनादके साथ वेगशाली वीर मद्रराज शल्यपर धावा किया । ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च । ३०… 2551–2560
- तब महात्मा राजा युधिष्ठिरने समरांगणमें दूसरे नये और अत्यन्त भयंकर धनुषको हाथमें लेकर तीखी धारवाले बाणोंसे शल्यको उसी प्रकार सब ओरसे घायल कर दिया, जैसे… 2561–2570
- हार्दिक्यस्त्वरितो राजन् प्रत्यगृह्णादभीतवत् । राजन्! दुःसह एवं दुर्जय महाधनुर्धर सात्यकिको आक्रमण करते देख कृतवर्माने शीघ्रतापूर्वक एक निर्भय वीरकी भाँति… 2571–2580
- एकोनविंशोऽध्यायः पाण्डवसैनिकोंका आपसमें बातचीत करते हुए पाण्डवोंकी प्रशंसा और धृतराष्ट्रकी निन्दा करना तथा कौरव- सेनाका पलायन, भीमद्वारा इक्कीस हजार… 2581–2590
- विंशोऽध्यायः धृष्टद्युम्नद्वारा राजा शाल्वके हाथीका और सात्यकिद्वारा राजा शाल्वका वध संजय उवाच संनिवृत्ते जनौघे तु शाल्वो म्लेच्छगणाधिपः… 2591–2600
- राजन्! जब सात्यकि युद्धके लिये डटे रहे और कृतवर्मा रथहीन होकर भाग गया, तब दुर्योधनकी सारी सेना पुनः युद्धसे विमुख हो वहाँसे पलायन करने लगी । ३०… 2601–2610
- चतुर्भिर्निजघानाश्वान् नाराचैः कृतवर्मणः । ७ । उन्होंने शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तीन बाणोंसे कृपाचार्यको घायल करके चार नाराचोंसे कृतवर्माके… 2611–2620
- तब विजयाभिलाषी पाण्डवोंने भी तुरंत उसपर धावा कर दिया । पाण्डव युद्धसे पार होना चाहते थे; अतः उनके पैदल, हाथीसवार और घुड़सवार सभी हथियार उठाये आगे बढ़े तथा… 2621–2630
- पञ्चविंशोऽध्यायः अर्जुन और भीमसेनद्वारा कौरवोंकी रथसेना एवं गजसेनाका संहार, अश्वत्थामा आदिके द्वारा दुर्योधनकी खोज, कौरवसेनाका पलायन तथा सात्यकिद्वारा… 2631–2640
- ते कीर्यमाणा भीमेन पुत्रास्तव महारणे । ८ । भीमसेनमपाकर्षन् प्रवणादिव कुञ्जरम् । उस महासमरमें जब भीमसेन आपके पुत्रोंपर बाणोंका प्रहार करने लगे, तब वे… 2641–2650
- प्रतिलभ्य ततः संज्ञां सहदेवो विशाम्पते । ३४ । दुर्योधनं शरैस्तीक्ष्णैः संक्रुद्धः समवाकिरत् । प्रजानाथ! थोड़ी देरमें सचेत होनेपर क्रोधमें भरे हुए सहदेव… 2651–2660
- रथेन काञ्चनाङ्गेन सहदेवः समभ्ययात् । नरेश्वर! शकुनिको अपना अवशिष्ट भाग मानकर सहदेवने सुवर्णमय अंगोंवाले रथके द्वारा उसका पीछा किया । ४७… 2661–2670
- चतुःसागरपर्यन्ता पृथिवी रत्नभूषिता । कर्णेनैकेन यस्यार्थे करमाहारिता पुरा । यस्याज्ञा परराष्ट्रेषु कर्णेनैव प्रसारिता… 2671–2680
- (गदापर्व) त्रिंशोऽध्यायः अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यका सरोवरपर जाकर दुर्योधनसे युद्ध करनेके विषयमें बातचीत करना, व्याधोंसे दुर्योधनका पता पाकर… 2681–2690
- भगवान् श्रीकृष्णने कहा - भारत! मायावी दुर्योधनकी इस मायाको आप मायाद्वारा ही नष्ट कर डालिये! युधिष्ठिर! मायावीका वध मायासे ही करना चाहिये, यह सच्ची नीति है… 2691–2700
- युधिष्ठिरेण राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितेन ह । ७ । श्रुत्वा स कटुका वाचो विषमस्थो नराधिपः । दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य सलिलस्थः पुनः पुनः । ८… 2701–2710
- तदिदं द्यूतमारब्धं पुनरेव यथा पुरा । ७ । विषमं शकुनेश्चैव तव चैव विशाम्पते । ‘ इस समय आपने पहलेके समान ही पुनः यह जूएका खेल आरम्भ कर दिया है… 2711–2720
- पाण्डवोंद्वारा बलरामजीकी पूजा परिष्वज्य तदा रामः पाण्डवान् सहसृञ्जयान् । अपृच्छत् कुशलं सर्वान् पार्थिवांश्चामितौजसः । १४… 2721–2730
- और आलस्य छोड़कर अपने पिताके पास जाकर बोलीं- ' प्रभो! चन्द्रमा हमारे पास नहीं आते । वे सदा रोहिणीका ही सेवन करते हैं । ५०… 2731–2740
- स एवमभिनिश्चित्य तस्मिन् कूपे महातपाः । ददर्श वीरुधं तत्र लम्बमानां यदृच्छया । ३२ । इस प्रकार विचार करते- करते महातपस्वी त्रितने उस कुएँमें एक लता देखी,… 2741–2750
- वायुभक्षा जलाहाराः पर्णभक्षाश्च तापसाः । नानानियमयुक्ताश्च तथा स्थण्डिलशायिनः । ४ ९ । आसन् वै मुनयस्तत्र सरस्वत्याः समीपतः… 2751–2760
- ‘ शंकर! आप सबके प्रभु हैं । अपने उत्कृष्ट ऐश्वर्यसे आपकी अधिक शोभा हो रही है । ब्रह्मा और इन्द्र सम्पूर्ण लोकोंको धारण करके आपमें ही स्थित हैं… 2761–2770
- उनके ऐसा कहनेपर गाधिने सम्पूर्ण प्रजाओंसे कहा - ' मेरा पुत्र सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाला होगा ( अतः तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिये ) ' । १५… 2771–2780
- सैनापत्येन महता सुरारिविनिबर्हणम् । ७ । नरेश्वर! उसी तीर्थमें देवताओंने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले स्कन्दको महान् सेनापतिके पदपर अभिषिक्त किया था । ७… 2781–2790
- तब लोकगुरु ब्रह्माने उनसे कहा – ' देवेन्द्र! अरुणा तीर्थ पाप- भयको दूर करनेवाला है । तुम वहाँ विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणाके जलमें स्नान करो । ३ ९… 2791–2800
- सर्पैर्विद्याधरैः पुण्यैर्योगसिद्धेस्तथा वृतः । विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्यगण, पितृगण, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, नाग, असंख्य देवर्षि, ब्रह्मर्षि,… 2801–2810
- कोई विचित्र माला धारण किये हुए थे और किन्हींके मुखपर बहुत - से रोयें जमे हुए थे । उन सबको लड़ाई - झगड़ेमें ही रस आता था… 2811–2820
- ययौ दैत्यविनाशाय ह्लादयन् सुरपुङ्गवान् । तदनन्तर अपने पार्षदों तथा मातृकागणोंके साथ कुमार कार्तिकेयने देवेश्वरोंको आनन्द प्रदान करते हुए दैत्योंके विनाशके… 2821–2830
- निष्पाप नरेश! जब शमीके गर्भमें छिप जानेके कारण कहीं अग्निदेवका दर्शन नहीं हो रहा था और सम्पूर्ण जगत्के प्रकाश अथवा दृष्टिशक्तिके विनाशकी घड़ी उपस्थित हो… 2831–2840
- ‘ कठोर व्रतका पालन करनेवाली महाभागे! इस प्रकार विशुद्धहृदया अरुन्धती देवीने यहाँ परम सिद्धि प्राप्त की थी, जैसी कि तुमने मेरे लिये तप करके सिद्धि पायी है… 2841–2850
- राजेन्द्र! जैगीषव्यकी तपस्याका वह योगजनित प्रभाव देखकर ये मुनिश्रेष्ठ देवल फिर सोचने लगे — ' मैंने इन्हें अभी- अभी समुद्रतटपर देखा है, फिर ये आश्रममें… 2851–2860
- ‘ यह सारस्वत नामसे विख्यात महातपस्वी होगा । महाभागे! इस संसारमें बारह वर्षोंतक जब वर्षा बंद हो जायगी, उस समय यह सारस्वत ही श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वेद… 2861–2870
- राजर्षे किमभिप्रेतं येनेयं कृष्यते क्षितिः । ५ । इन्द्रने प्रश्न किया — राजन्! यह महान् प्रयत्नके साथ क्या हो रहा है? राजर्षे! आप क्या चाहते हैं, जिसके… 2871–2880
- पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः बलरामजीकी सलाहसे सबका कुरुक्षेत्रके समन्तपंचक तीर्थमें जाना और वहाँ भीम तथा दुर्योधनमें गदायुद्धकी तैयारी वैशम्पायन उवाच एवं तदभवद्… 2881–2890
- एकाह्ना विनिहत्येमं भविष्याम्यात्मनोऽनृणः । अद्यायुर्धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेरकृतात्मनः । २३ । समाप्तं भरतश्रेष्ठ मातापित्रोश्च दर्शनम्… 2891–2900
- परिवृत्तेऽहनि क्रूरं वृत्रवासवयोरिव । इस प्रकार दिनकी समाप्तिके समय, उन दोनों वीरोंमें प्रकटरूपमें वृत्रासुर और इन्द्रके समान क्रूरतापूर्ण एवं भयंकर युद्ध… 2901–2910
- उस समय उस अत्यन्त भयंकर घमासान युद्धमें शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर परस्पर युद्ध करते हुए बहुत थक गये । ३० । तौ मुहूर्तं समाश्वस्य पुनरेव परंतप… 2911–2920
- षष्टितमोऽध्यायः क्रोधमें भरे हुए बलरामको श्रीकृष्णका समझाना और युधिष्ठिरके साथ श्रीकृष्णकी तथा भीमसेनकी बातचीत धृतराष्ट्रउवाच अधर्मेण हतं दृष्ट्वा राजानं… 2921–2930
- तथा त्वां निहतामित्रं वयं नन्दाम भारत । १५ । ‘ भारत! निश्चय ही वृत्रासुरके मारे जानेपर वन्दीजनोंने जिस प्रकार इन्द्रका अभिनन्दन किया था, उसी प्रकार हम… 2931–2940
- द्विषष्टितमोऽध्यायः पाण्डवोंका कौरव शिबिरमें पहुँचना, अर्जुनके रथका दग्ध होना और पाण्डवोंका भगवान् श्रीकृष्णको हस्तिनापुर भेजना संजय उवाच ततस्ते प्रययुः… 2941–2950
- ‘ गोविन्द! अच्युत! जिसे मनके द्वारा भी प्राप्त करना असम्भव था, वही यह अकण्टक राज्य हमें आपकी कृपासे प्राप्त हो गया । १५… 2951–2960
- भीष्मे शान्तनवे नाथे कर्णे शस्त्रभृतां वरे । ७ । गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे । अश्वत्थाम्नि तथा शल्ये शूरे च कृतवर्मणि । ८… 2961–2970
- ‘ आपलोगोंने अपने स्वरूपके अनुरूप योग्य पराक्रम प्रकट किया और सदा मुझे विजय दिलानेकी ही चेष्टा की; तथापि दैवके विधानका उल्लंघन करना किसीके लिये भी सर्वथा… 2971–2980
- प्रतिज्ञा की है, वह मेरा ही विनाश करनेवाली है । इसमें संदेह नहीं कि यदि मैं न्यायके अनुसार युद्ध करूँगा तो मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा… 2981–2990
- तृतीयोऽध्यायः अश्वत्थामाका कृपाचार्य और कृतवर्माको उत्तर देते हुए उन्हें अपना क्रूरतापूर्ण निश्चय बताना संजय उवाच कृपस्य वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं शुभम्… 2991–3000
- यश्चायं मित्रपक्षो मे मयि जीवति निर्जितः । २ ९ । शोकं मे वर्धयत्येष वारिवेग इवार्णवम् । एकाग्रमनसो मेऽद्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् । ३०… 3001–3010
- प्राणजडान्धेषु सुप्तभीतोत्थितेषु च । मत्तोन्मत्तप्रमत्तेषु न शस्त्राणि च पातयेत् । २२ । ' गौ, ब्राह्मण, राजा, स्त्री, मित्र, माता, गुरु, दुर्बल, जड,… 3011–3020
- गुणानां हि प्रधानानामेकत्वं त्वयि तिष्ठति । ५८ । प्रभो! सम्पूर्ण भूत आपमें स्थित हैं और आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित हैं… 3021–3030
- वह कोलाहल सुनकर वीर महारथी श्रुतकीर्ति अश्वत्थामाके पास आकर उसके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा । ६१ । तस्यापि शरवर्षाणि चर्मणा प्रतिवार्य सः… 3031–3040
- दिखायी देते थे । उनके स्त्री और पुत्र भी साथ ही थे । वे अत्यन्त क्रूर और निर्दय थे । उनकी ओर देखना भी बहुत कठिन था… 3041–3050
- ' महारथी राजा बाह्लिक, सिन्धुराज जयद्रथ, सोमदत्त तथा भूरिश्रवाका भी आप मेरी ओरसे आलिंगन करें । तथा पूर्वगतानन्यान् स्वर्गे पार्थिवसत्तमान् । ४५… 3051–3060
- एकादशोऽध्यायः युधिष्ठिरका शोकमें व्याकुल होना, द्रौपदीका विलाप तथा द्रोणकुमारके वधके लिये आग्रह, भीमसेनका अश्वत्थामाको मारनेके लिये प्रस्थान वैशम्पायन… 3061–3070
- एतावदुक्त्वा द्रौणिर्मां युग्यानश्वान् धनानि च । आदायोपययौ काले रत्नानि विविधानि च । ४० । 'मुझसे इतना ही कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा रथमें जोतने योग्य… 3071–3080
- पञ्चदशोऽध्यायः वेदव्यासजीकी आज्ञासे अर्जुनके द्वारा अपने अस्त्रका उपसंहार तथा अश्वत्थामाका अपनी मणि देकर पाण्डवोंके गर्भोपर दिव्यास्त्र छोड़ना वैशम्पायन… 3081–3090
- उस दिव्य एवं उत्तम मणिको मस्तकपर धारण करके शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर चन्द्रोदयकी शोभासे युक्त उदयाचलके समान सुशोभित हुए । ३६… 3091–3100
- वैशम्पायन उवाच हते पुत्रशते दीनं छिन्नशाखमिव द्रुमम् । पुत्रशोकाभिसंतप्तं धृतराष्ट्रं महीपतिम् । ४… 3101–3110
- मन्दबुद्धि मनुष्य ही अप्रिय वस्तुका संयोग और प्रिय वस्तुका वियोग होनेपर मानसिक दुःखोंसे दग्ध होने लगते हैं । २८३ । नार्थो न धर्मो न सुखं यदेतदनुशोचसि… 3111–3120
- वह उस वनका अनुसरण करता इधर- उधर दौड़ता तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें ढूँढ़ता फिरता था कि कहीं मुझे शरण मिले । ६३ । स तेषां छिद्रमन्विच्छन् प्रद्रुतो भयपीडितः… 3121–3130
- फलकी प्राप्ति होगी । २ ९ । इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे सप्तमोऽध्यायः । ७… 3131–3140
- पुत्राणामथ पौत्राणां पितॄणां च महीपते । आनुपूर्व्येण सर्वेषां प्रेतकार्याणि कारय । ७ । महाराज! अब आप क्रमशः अपने ताऊ, चाचा, पुत्र और पौत्रोंका… 3141–3150
- द्वादशोऽध्यायः पाण्डवोंका धृतराष्ट्रसे मिलना, धृतराष्ट्रके द्वारा भीमकी लोहमयी प्रतिमाका भंग होना और शोक करनेपर श्रीकृष्णका उन्हें समझाना वैशम्पायन उवाच… 3151–3160
- चतुर्दशोऽध्यायः पाण्डवोंको शाप देनेके लिये उद्यत हुई गान्धारीको व्यासजीका समझाना वैशम्पायन उवाच धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातास्ततस्ते कुरुपाण्डवाः… 3161–3170
- समझती हूँ, समयके उलट - फेरसे प्रेरित होकर यह सम्पूर्ण जगत्का विनाश हुआ है, जो स्वभावसे ही रोमांचकारी है । यह काण्ड अवश्यम्भावी था, इसीलिये प्राप्त हुआ है… 3171–3180
- सप्तदशोऽध्यायः दुर्योधन तथा उसके पास रोती हुई पुत्रवधूको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप वैशम्पायन उवाच दुर्योधनं हतं दृष्ट्वा गान्धारी… 3181–3190
- दुर्मुखोऽभिमुखः शेते हतोऽरिगणहा रणे । ७ । जो शत्रुसमूहोंका संहार करनेवाला था, वह दुर्मुख प्रतिज्ञा पालन करनेवाले संग्राम- शूर भीमसेनके हाथों मारा जाकर… 3191–3200
- द्वाविंशोऽध्यायः अपनी - अपनी स्त्रियोंसे घिरे हुए अवन्ती- नरेश और जयद्रथको देखकर तथा दुःशलापर दृष्टिपात करके गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप… 3201–3210
- ‘ महाराज! समुद्रतटपर चीत्कार करनेवाली सारसियोंके समान इस युद्धस्थलमें आप अपने इन पुत्रवधुओंका अत्यन्त भयानक विलाप नहीं सुन रहे हैं, यह भाग्यकी ही बात है… 3211–3220
- मधुसूदन! आजसे छत्तीसवाँ वर्ष उपस्थित होनेपर तुम्हारे कुटुम्बी, मन्त्री और पुत्र सभी आपसमें लड़कर मर जायँगे… 3221–3230
- युद्धमें काम आये हुए वीरोंको उनके सम्बन्धियोंद्वारा जलदान तन्महोदधिसंकाशं निरानन्दमनुत्सवम् । ५ । वीरपत्नीभिराकीर्णं गङ्गातीरमशोभत… 3231–3237