04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1091–1100
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1091–1100
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सर्वथा हतमेवेदं कौरवाणां महद् बलम् ।
न ह्यस्य विद्यते त्राता साक्षादपि पुरंदरः ॥ ७ ॥
‘ कौरवोंकी यह विशाल सेना अब सर्वथा नष्टप्राय ही है। साक्षात् देवराज इन्द्र भी इसकी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ७ ॥
यमुपाश्रित्य संग्रामे कृतः शस्त्रसमुद्यमः ।
स कर्णो निर्जितः संख्ये हतश्चैव जयद्रथः ॥ ८ ॥
‘जिसका भरोसा करके मैंने युद्धके लिये शस्त्र- संग्रहकी चेष्टा की, वह कर्ण भी युद्धस्थलमें परास्त हो गया और जयद्रथ भी मारा ही गया ॥ ८ ॥
यस्य वीर्यं समाश्रित्य शमं याचन्तमच्युतम् ।
तृणवत् तमहं मन्ये स कर्णो निर्जितो युधि ॥ ९ ॥
‘ जिसके पराक्रमका आश्रय लेकर मैंने संधिकी याचना करनेवाले श्रीकृष्णको तिनकेके समान समझा था, वह कर्ण युद्धमें पराजित हो गया ' ॥ ९ ॥
एवं क्लान्तमना राजन्नुपायाद् द्रोणमीक्षितुम् ।
आगस्कृत् सर्वलोकस्य पुत्रस्ते भरतर्षभ ॥ १० ॥
राजन्! भरतश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का अपराध करनेवाला आपका पुत्र जब इस प्रकार सोचते - सोचते मन - ही- मन बहुत खिन्न हो गया, तब आचार्य द्रोणका दर्शन करनेके लिये उनके पास गया ॥ १० ॥
ततस्तत्सर्वमाचख्यौ कुरूणां वैशसं महत् ।
परान् विजयतश्चापि धार्तराष्ट्रान् निमज्जतः ॥ ११ ॥
तदनन्तर वहाँ उसने कौरवोंके महान् संहारका वह सारा समाचार कहा और यह भी बताया कि शत्रु विजयी हो रहे हैं और महाराज धृतराष्ट्रके सभी पुत्र विपत्तिके समुद्रमें डूब रहे हैं ॥ ११ ॥
दुर्योधन उवाच
पश्य मूर्धाभिषिक्तानामाचार्य कदनं महत् ।
कृत्वा प्रमुखतः शूरं भीष्मं मम पितामहम् ॥ १२ ॥
दुर्योधन बोला- आचार्य! जिनके मस्तकपर विधिपूर्वक राज्याभिषेक किया गया था, उन राजाओंका यह महान् संहार देखिये । मेरे शूरवीर पितामह भीष्मसे लेकर अबतक कितने ही नरेश मारे गये ॥ १२ ॥
तं निहत्य प्रलुब्धोऽयं शिखण्डी पूर्णमानसः ।
पाञ्चाल्यैः सहितः सर्वैः सेनाग्रमभिवर्तते ॥ १३ ॥
व्याधों -जैसा बर्ताव करनेवाला यह शिखण्डी भीष्मको मारकर मन- ही -मन उत्साहसे भरा हुआ है और समस्त पांचाल सैनिकोंके साथ सेनाके मुहानेपर खड़ा है ॥ १३ ॥
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अपरश्चापि दुर्धर्षः शिष्यस्ते सव्यसाचिना ।
अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जयद्रथः ॥ १४ ॥
अस्मद्विजयकामानां सुहृदामुपकारिणाम् ।
गन्तास्मि कथमानृण्यं गतानां यमसादनम् ॥ १५ ॥
सव्यसाची अर्जुनने मेरी सात अक्षौहिणी सेनाओंका संहार करके आपके दूसरे दुर्धर्ष शिष्य राजा जयद्रथको भी मार डाला है । मुझे विजय दिलानेकी इच्छा रखनेवाले मेरे जो-जो उपकारी सुहृद् युद्धमें प्राण देकर यमलोकमें जा पहुँचे हैं, उनका ऋण मैं कैसे चुका सकूँगा? ॥ १४-१५ ॥
ये मदर्थं परीप्सन्ते वसुधां वसुधाधिपाः ।
ते हित्वा वसुधैश्वर्यं वसुधामधिशेरते ॥ १६ ॥
जो भूमिपाल मेरे लिये इस भूमिको जीतना चाहते थे, वे स्वयं भूमण्डलका ऐश्वर्य त्यागकर भूमिपर सो रहे हैं ॥
सोऽहं कापुरुषः कृत्वा मित्राणां क्षयमीदृशम् ।
अश्वमेधसहस्रेण पावितुं न समुत्सहे ॥ १७ ॥
मैं कायर हूँ, अपने मित्रोंका ऐसा संहार कराकर हजारों अश्वमेध यज्ञोंसे भी अपनेको पवित्र नहीं कर सकता ॥ १७ ॥
मम लुब्धस्य पापस्य तथा धर्मापचायिनः ।
व्यायामेन जिगीषन्तः प्राप्ता वैवस्वतक्षयम् ॥ १८ ॥
हाय! मुझ लोभी तथा धर्मनाशक पापीके लिये युद्धके द्वारा विजय चाहनेवाले मेरे मित्रगण यमलोक चले गये ॥ १८ ॥
कथं पतितवृत्तस्य पृथिवी सुहृदां द्रुहः ।
विवरं नाशकद् दातुं मम पार्थिवसंसदि ॥ १ ९ ॥
मुझ आचारभ्रष्ट और मित्रद्रोहीके लिये राजाओंके समाजमें यह पृथ्वी फट क्यों नहीं जाती, जिससे मैं उसीमें समा जाऊँ ॥ १ ९ ॥
योऽहं रुधिरसिक्ताङ्गं राज्ञां मध्ये पितामहम् ।
शयानं नाशकं त्रातुं भीष्ममायोधने हतम् ॥ २० ॥
मेरे पितामह भीष्म राजाओंके बीच युद्धस्थलमें मारे गये और अब खूनसे लथपथ होकर बाणशय्यापर पड़े हैं; परंतु मैं उनकी रक्षा न कर सका ॥ २० ॥
तं मामनार्यपुरुषं मित्रद्रुहमधार्मिकम् ।
किं वक्ष्यति हि दुर्धर्षः समेत्य परलोकजित् ॥ २१ ॥
ये परलोक - विजयी दुर्धर्ष वीर भीष्म यदि मैं उनके पास जाऊँ तो मुझ नीच, मित्रद्रोही तथा पापात्मा पुरुषसे क्या कहेंगे? ॥ २१ ॥
जलसंधं महेष्वासं पश्य सात्यकिना हतम् ।
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मदर्थमुद्यतं शूरं प्राणांस्त्यक्त्वा महारथम् ॥ २२ ॥
आचार्य! देखिये तो सही, मेरे लिये प्राणोंका मोह छोड़कर राज्य दिलानेको उद्यत हुए महाधनुर्धर शूरवीर महारथी जलसंधको सात्यकिने मार डाला ॥ २२ ॥
काम्बोजं निहतं दृष्ट्वा तथालम्बुषमेव च ।
अन्यान् बहूंश्च सुहृदो जीवितार्थोऽद्य को मम ॥ २३ ॥
काम्बोजराज, अलम्बुष तथा अन्यान्य बहुत- से सुहृदोंको मारा गया देखकर भी अब मेरे जीवित रहनेका क्या प्रयोजन है? ॥ २३ ॥
व्यायच्छन्तो हताः शूरा मदर्थे येऽपराङ्मुखाः ।
यतमानाः परं शक्त्या विजेतुमहितान् मम ॥ २४ ॥
तेषां गत्वाहमानृण्यमद्य शक्त्या परंतप ।
तर्पयिष्यामि तानेव जलेन यमुनामनु ॥ २५ ॥
शत्रुओंके संताप देनेवाले आचार्य! जो युद्धसे विमुख न होनेवाले शूरवीर सुहृद् मेरे लिये जूझते और मेरे शत्रुओंको जीतनेके लिये यथाशक्ति पूरी चेष्टा करते हुए मारे गये हैं, उनका अपनी शक्तिभर ऋण उतारकर आज मैं यमुनाके जलसे उन सभीका तर्पण करूँगा ॥ २४-२५ ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि सर्वशस्त्रभृतां वर ।
इष्टापूर्तेन च शपे वीर्येण च सुतैरपि ॥ २६ ॥
निहत्य तान् रणे सर्वान् पञ्चालान् पाण्डवैः सह ।
शान्तिं लब्धास्मि तेषां वा रणे गन्ता सलोकताम् ॥ २७ ॥
समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ गुरुदेव! आज मैं अपने यज्ञ-यागादि तथा कुँआ, बावली बनवाने आदि शुभ कर्मोंकी, पराक्रमकी तथा पुत्रोंकी शपथ खाकर आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब मैं पाण्डवोंके सहित समस्त पांचालोंको युद्धमें मारकर ही शान्ति पाऊँगा अथवा मेरे वे सुहृद् युद्धमें मरकर जिन लोकोंमें गये हैं, उसीमें मैं भी चला जाऊँगा ॥ २६-२७ ॥
सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र ते पुरुषर्षभाः ।
हता मदर्थे संग्रामे युध्यमानाः किरीटिना ॥ २८ ॥
वे पुरुषशिरोमणि सुहृद् रणभूमिमें मेरे लिये युद्ध करते- करते अर्जुनके हाथसे मारे जाकर जिन लोकों में गये हैं, वहीं मैं भी जाऊँगा ॥ २८ ॥
न हीदानीं सहाया मे परीप्सन्त्यनुपस्कृताः ।
श्रेयो हि पाण्डून् मन्यन्ते न तथास्मान् महाभुज ॥ २ ९ ॥
महाबाहो! इस समय जो मेरे सहायक हैं, वे अरक्षित होनेके कारण हमारी सहायता करना नहीं चाहते हैं । वे जैसा पाण्डवोंका कल्याण चाहते हैं, वैसा हमलोगोंका नहीं ॥ २ ९ ॥
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स्वयं हि मृत्युर्विहितः सत्यसंधेन संयुगे ।
भवानुपेक्षां कुरुते शिष्यत्वादर्जुनस्य हि ॥ ३० ॥
युद्धस्थलमें सत्यप्रतिज्ञ भीष्मने स्वयं ही अपनी मृत्यु स्वीकार कर ली और आप भी हमारी इसलिये उपेक्षा करते हैं कि अर्जुन आपके प्रिय शिष्य हैं ॥ ३० ॥
अतो विनिहताः सर्वे येऽस्मज्जयचिकीर्षवः ।
कर्णमेव तु पश्यामि सम्प्रत्यस्मज्जयैषिणम् ॥ ३१ ॥
इसलिये हमारी विजय चाहनेवाले सभी योद्धा मारे गये । इस समय तो मैं केवल कर्णको ही ऐसा देखता हूँ, जो सच्चे हृदयसे मेरी विजय चाहता है ॥ ३१ ॥
यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः ।
मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ॥ ३२ ॥
जो मूर्ख मनुष्य मित्रको ठीक- ठीक पहचाने बिना ही उसे मित्रके कार्यमें नियुक्त कर देता है, उसका वह काम बिगड़ जाता है ॥ ३२ ॥
तादृग् रूपं कृतमिदं मम कार्यं सुहृत्तमैः ।
मोहाल्लुब्धस्य पापस्य जिह्मस्य धनमीहतः ॥ ३३ ॥
मेरे परम सुहृद् कहलानेवालोंने मोहवश धन ( राज्य) चाहनेवाले मुझ लोभी, पापी और कुटिलके इस कार्यको उसी प्रकार चौपट कर दिया है ॥ ३३ ॥
हतो जयद्रथश्चैव सौमदत्तिश्च वीर्यवान् ।
अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥ ३४ ॥
जयद्रथ और सोमदत्तकुमार भूरिश्रवा मारे गये । अभीषाह, शूरसेन, शिबि तथा वसातिगण भी चल बसे ॥ ३४ ॥
सोऽहमद्य गमिष्यामि यत्र ते पुरुषर्षभाः ।
हता मदर्थे संग्रामे युध्यमानाः किरीटिना ॥ ३५ ॥
वे नरश्रेष्ठ सुहृद् रणभूमिमें मेरे लिये युद्ध करते - करते अर्जुनके हाथसे मारे जाकर जिन लोकोंमें गये हैं, वहीं आज मैं भी जाऊँगा ॥ ३५ ॥
न हि मे जीवितेनार्थस्तानृते पुरुषर्षभान् ।
आचार्यः पाण्डुपुत्राणामनुजानातु नो भवान् ॥ ३६ ॥
उन पुरुषरत्न मित्रोंके बिना अब मेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है । आप हम पाण्डुपुत्रोंके आचार्य हैं, अतः मुझे जानेकी आज्ञा दें ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनानुतापे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनका अनुतापविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५० ॥
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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोणाचार्यका दुर्योधनको उत्तर और युद्धके लिये प्रस्थान धृतराष्ट्रउवाच
सिन्धुराजे हते तात समरे सव्यसाचिना ।
तथैव भूरिश्रवसि किमासीद् वो मनस्तदा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा — तात! समरांगणमें सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सिंधुराज जयद्रथके तथा सात्यकिद्वारा भूरिश्रवाके मारे जानेपर उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥
दुर्योधनेन च द्रोणस्तथोक्तः कुरुसंसदि ।
किमुक्तवान् परं तस्मै तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २ ॥
संजय! दुर्योधनने जब कौरव- सभामें द्रोणाचार्यसे वैसी बातें कहीं, तब उन्होंने उसे क्या उत्तर दिया? यह मुझे बताओ ॥ २ ॥
संजय उवाच
निष्टानको महानासीत् सैन्यानां तव भारत ।
सैन्धवं निहतं दृष्ट्वा भूरिश्रवसमेव च ॥ ३ ॥
संजयने कहा— भारत! सिंधुराज जयद्रथ तथा भूरिश्रवाको मारा गया देखकर आपकी सेनाओंमें महान् आर्तनाद होने लगा ॥ ३ ॥
मन्त्रितं तव पुत्रस्य ते सर्वमवमेनिरे ।
येन मन्त्रेण निहताः शतशः क्षत्रियर्षभाः ॥ ४ ॥
वे सब लोग आपके पुत्र दुर्योधनकी उस सारी मन्त्रणाका अनादर करने लगे, जिससे सैकड़ों क्षत्रिय- शिरोमणि कालके गालमें चले गये ॥ ४ ॥
द्रोणस्तु तद् वचः श्रुत्वा पुत्रस्य तव दुर्मनाः ।
मुहूर्तमिव तद् ध्यात्वा भृशमार्तोऽभ्यभाषत ॥ ५ ॥
-मन दुःखी - आपके पुत्रका पूर्वोक्त वचन सुनकर द्रोणाचार्य मन ही- हो उठे । उन्होंने दो घड़ीतक कुछ सोच - विचारकर अत्यन्त आर्तभावसे इस प्रकार कहा ॥ द्रोणउवाच
दुर्योधन किमेवं मां वाक्शरैरपि कृन्तसि ।
अजय्यं सततं संख्ये ब्रुवाणं सव्यसाचिनम् ॥ ६ ॥
द्रोणाचार्य बोले – दुर्योधन! तुम क्यों इस प्रकार अपने वचनरूपी बाणोंसे मुझे छेद रहे हो? मैं तो सदासे ही कहता आया हूँ कि सव्यसाची अर्जुन युद्धमें अजेय हैं ॥ ६ ॥
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एतेनैवार्जुनं ज्ञातुमलं कौरव संयुगे ।
यच्छिखण्ड्यवधीद् भीष्मं पाल्यमानः किरीटिना ॥ ७ ॥
कुरुनन्दन! अर्जुनको तो केवल इसी बातसे समझ लेना चाहिये था कि उनके द्वारा सुरक्षित होकर शिखण्डीने भी युद्धके मैदानमें भीष्मको मार डाला ॥ ७ ॥
अवध्यं निहतं दृष्ट्वा संयुगे देवदानवैः ।
तदैवाज्ञासिषमहं नेयमस्तीति भारती ॥ ८ ॥
जो देवताओं और दानवोंके लिये भी अवध्य थे, उन्हें युद्धमें मारा गया देख मैंने उसी समय यह जान लिया कि यह कौरव सेना अब नहीं रह सकेगी ॥ ८ ॥
यं पुंसां त्रिषु लोकेषु सर्वशूरममंस्महि ।
तस्मिन् निपतिते शूरे किं शेषं पर्युपास्महे ॥ ९ ॥
हमलोग जिन्हें तीनों लोकोंके पुरुषोंमें सबसे अधिक शूरवीर मानते थे, उन शौर्यसम्पन्न भीष्मके मारे जानेपर हम दूसरोंका क्या भरोसा करें? ॥ ९ ॥
यान् स्म तान् ग्लहते तात शकुनिः कुरुसंसदि ।
अक्षान् न तेऽक्षा निशिता बाणास्ते शत्रुतापनाः ॥ १० ॥
द्यूतक्रीड़ाके समय विदुरजीने तुमसे कहा था कि 'तात! कौरव सभामें शकुनि जिन पासोंको फेंक रहा है, उन्हें पासे न समझो, वे किसी दिन शत्रुओंको संताप देनेवाले तीखे बाण बन सकते हैं ' ॥ १० ॥
त एते घ्नन्ति नस्तात विशिखाः पार्थचोदिताः ।
तांस्तदाऽऽख्यायमानस्त्वं विदुरेण न बुद्धवान् ॥ ११ ॥
परंतु वत्स! उस समय विदुरजीकी कही हुई बातोंको तुमने कुछ नहीं समझा । तात! वे ही पासे ये अर्जुनके चलाये हुए बाण बनकर हमें मार रहे हैं ॥
यास्ता विजयतश्चापि विदुरस्य महात्मनः ।
धीरस्य वाचो नाश्रौषीः क्षेमाय वदतः शिवाः ॥ १२ ॥
तदिदं वर्तते घोरमागतं वैशसं महत् ।
तस्यावमानाद् वाक्यस्य दुर्योधन कृते तव ॥ १३ ॥
दुर्योधन! विदुरजी धीर हैं, महात्मा पुरुष हैं । उन्होंने तुम्हारे कल्याणके लिये जो मंगलकारक वचन कहे थे और जिन्हें तुमने विजयके उल्लासमें अनसुना कर दिया था, उनके उन वचनोंके अनादरसे ही तुम्हारे लिये यह घोर महासंहार प्राप्त हुआ है ॥ १२-१३ ॥
योऽवमन्य वचः पथ्यं सुहृदामाप्तकारिणाम् ।
स्वमतं कुरुते मूढः स शोच्यो नचिरादिव ॥ १४ ॥
जो मूर्ख अपने हितैषी मित्रोंके हितकर वचनकी अवहेलना करके मनमाना बर्ताव करता है, वह थोड़े ही समयमें शोचनीय दशाको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥
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यच्च नः प्रेक्षमाणानां कृष्णामानाय्य तत्सभाम् ।
अनर्हन्तीं कुले जातां सर्वधर्मानुचारिणीम् ॥ १५ ॥
तस्याधर्मस्य गान्धारे फलं प्राप्तमिदं महत् ।
नो चेत् पापं परे लोके त्वमर्च्छथास्ततोऽधिकम् ॥ १६ ॥
इसके सिवा तुमने हमलोगोंके सामने ही जो द्रौपदीको सभामें बुलाकर अपमानित किया, वह अपमान उसके योग्य नहीं था । वह उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई है और सम्पूर्ण धर्मोंका निरन्तर पालन करती है । गान्धारीनन्दन! द्रौपदीके अपमानरूपी तुम्हारे अधर्मका ही यह महान् फल प्राप्त हुआ है कि तुम्हारे दलका विनाश हो रहा है । यदि यहाँ यह फल नहीं मिलता तो परलोकमें तुम्हें उस पापका इससे भी अधिक दण्ड भोगना पड़ता ॥ १५-१६ ॥
यच्च तान् पाण्डवान् द्यूते विषमेण विजित्य ह ।
प्राव्राजयस्तदारण्ये रौरवाजिनवाससः ॥ १७ ॥
इतना ही नहीं, तुमने पाण्डवोंको जूएमें बेईमानीसे जीतकर और मृगचर्ममय वस्त्र पहनाकर उन्हें वनवास दे दिया ( इस अधर्मका भी फल तुम्हें भोगना पड़ता है ) ॥ १७ ॥
पुत्राणामिव चैतेषां धर्ममाचरतां सदा ।
द्रुह्येत् को नु नरो लोके मदन्यो ब्राह्मणब्रुवः ॥ १८ ॥
पाण्डव मेरे पुत्रके समान हैं और वे सदा धर्मका आचरण करते रहते हैं । संसारमें मेरे सिवा दूसरा कौन मनुष्य है, जो ब्राह्मण कहलाकर भी उनसे द्रोह करे ॥ १८ ॥
पाण्डवानामयं कोपस्त्वया शकुनिना सह ।
आहृतो धृतराष्ट्रस्य सम्मते कुरुसंसदि ॥ १ ९ ॥
तुमने राजा धृतराष्ट्रकी सम्मतिसे कौरवोंकी सभामें शकुनिके साथ बैठकर पाण्डवोंका यह क्रोध मोल लिया है ॥ १ ९ ॥
दुःशासनेन संयुक्तः कर्णेन परिवर्धितः ।
क्षत्तुर्वाक्यमनादृत्य त्वयाभ्यस्तः पुनः पुनः ॥ २० ॥
इस कार्यमें दुःशासनने तुम्हारा साथ दिया है, कर्णसे भी उस क्रोधको बढ़ावा मिला है और विदुरजीके उपदेशकी अवहेलना करके तुमने बारंबार पाण्डवोंके उस क्रोधको बढ़नेका अवसर दिया है ॥ २० ॥
यत्ताः सर्वे पराभूताः पर्यवारयताऽर्जुनम् ।
सिन्धुराजानमाश्रित्य स वो मध्ये कथं हतः ॥ २१ ॥
तुम सब लोगोंने बड़ी सावधानीसे अर्जुनको घेर लिया था । फिर सब- के - सब पराजित कैसे हो गये? तुमने सिंधुराजको आश्रय दिया था। फिर तुम्हारे बीचमें वह कैसे मारा गया? ॥ २१ ॥
कथं त्वयि च कर्णे च कृपे शल्ये च जीवति ।
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अश्वत्थाम्नि च कौरव्य निधनं सैन्धवोऽगमत् ॥ २२ ॥
कुरुनन्दन! तुम और कर्ण तो नहीं मर गये थे, कृपाचार्य, शल्य और अश्वत्थामा तो जीवित थे; फिर तुम्हारे रहते सिंधुराजकी मृत्यु क्यों हुई? ॥ २२ ॥
युध्यन्तः सर्वराजानस्तेजस्तिग्ममुपासते ।
सिन्धुराजं परित्रातुं स वो मध्ये कथं हतः ॥ २३ ॥
युद्ध करते हुए समस्त राजा सिंधुराजकी रक्षाके लिये प्रचण्ड तेजका आश्रय लिये हुए थे । फिर वह आपलोगोंके बीचमें कैसे मारा गया? ॥ २३ ॥
मय्येव हि विशेषेण तथा दुर्योधन त्वयि ।
आशंसत परित्राणमर्जुनात् स महीपतिः ॥ २४ ॥
दुर्योधन! राजा जयद्रथ विशेषतः मुझपर और तुमपर ही अर्जुनसे अपनी जीवन-रक्षाका भरोसा किये बैठा था ॥
ततस्तस्मिन् परित्राणमलब्धवति फाल्गुनात् ।
न किंचिदनुपश्यामि जीवितस्थानमात्मनः ॥ २५ ॥
तो भी जब अर्जुनसे उसकी रक्षा न की जा सकी, तब मुझे अब अपने जीवनकी रक्षाके लिये भी कोई स्थान दिखायी नहीं देता ॥ २५ ॥
मज्जन्तमिव चात्मानं धृष्टद्युम्नस्य किल्बिषे ।
पश्याम्यहत्वा पञ्चालान् सह तेन शिखण्डिना ॥ २६ ॥
मैं धृष्टद्युम्न और शिखण्डीसहित समस्त पांचालोंका वध न करके अपने - आपको धृष्टद्युम्नके पापपूर्ण संकल्पमें डूबता- सा देख रहा हूँ ॥ २६ ॥
तन्मां किमभितप्यन्तं वाक्शरैरेव कृन्तसि ।
अशक्तः सिन्धुराजस्य भूत्वा त्राणाय भारत ॥ २७ ॥
भारत! ऐसी दशामें तुम स्वयं सिंधुराजकी रक्षामें असमर्थ होकर मुझे अपने वाग्बाणोंसे क्यों छेद रहे हो? मै तो स्वयं ही संतप्त हो रहा हूँ ॥ २७ ॥
सौवर्णं सत्यसंधस्य ध्वजमक्लिष्टकर्मणः ।
अपश्यन् युधि भीष्मस्य कथमाशंससे जयम् ॥ २८ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले सत्यप्रतिज्ञ भीष्मके सुवर्णमय ध्वजको अब युद्धस्थलमें फहराता न देखकर भी तुम विजयकी आशा कैसे करते हो? ॥ २८ ॥
मध्ये महारथानां च यत्राहन्यत सैन्धवः ।
हतो भूरिश्रवाश्चैव किं शेषं तत्र मन्यसे ॥ २ ९ ॥
जहाँ बड़े - बड़े महारथियोंके बीच सिंधुराज जयद्रथ और भूरिश्रवा मारे गये, वहाँ तुम किसके बचनेकी आशा करते हो? ॥ २ ९ ॥
कृप एव च दुर्धर्षो यदि जीवति पार्थिव ।
यो नागात् सिन्धुराजस्य वर्त्म तं पूजयाम्यहम् ॥ ३० ॥
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पृथ्वीपते! दुर्धर्ष वीर कृपाचार्य यदि जीवित हैं, यदि सिंधुराजके पथपर नहीं गये हैं तो मैं उनके बल और सौभाग्यकी प्रशंसा करता हूँ ॥ ३० ॥
यत्रापश्यं हतं भीष्मं पश्यतस्तेऽनुजस्य वैवै ।
दुःशासनस्य कौरव्य कुर्वाणं कर्म दुष्करम् ॥ ३१ ॥
अवध्यकल्पं संग्रामे देवैरपि सवासवैः ।
न ते वसुन्धरास्तीति तदाहं चिन्तये नृप ॥ ३२ ॥
कुरुनन्दन! नरेश! जिन्हें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी युद्धमें नहीं मार सकते थे, दुष्कर कर्म करनेवाले उन्हीं भीष्मको जबसे मैंने तुम्हारे छोटे भाई दुःशासनके देखते - देखते मारा गया देखा है, तबसे मैं यही सोचता हूँ कि अब यह पृथ्वी तुम्हारे अधिकारमें नहीं रह सकती ॥ ३१-३२ ॥
इमानि पाण्डवानां च सृञ्जयानां च भारत ।
अनीकान्याद्रवन्ते मां सहितान्यद्य भारत ॥ ३३ ॥
भारत! वह देखो, पाण्डवों और सृजयोंकी सेनाएँ एक साथ मिलकर इस समय मुझपर चढ़ी आ रही हैं ॥ ३३ ॥
नाहत्वा सर्वपञ्चालान् कवचस्य विमोक्षणम् ।
कर्तास्मि समरे कर्म धार्तराष्ट्र हितं तव ॥ ३४ ॥
दुर्योधन! अब मैं समस्त पांचालोंको मारे बिना अपना कवच नहीं उतारूंगा । मैं समरांगणमें वही कार्य करूँगा, जिससे तुम्हारा हित हो ॥ ३४ ॥
राजन् ब्रूयाः सुतं मे त्वमश्वत्थामानमाहवे ।
न सोमकाः प्रमोक्तव्या जीवितं परिरक्षता ॥ ३५ ॥
राजन्! तुम मेरे पुत्र अश्वत्थामासे जाकर कहना कि 'वह युद्धमें अपने जीवनकी रक्षा करते हुए जैसे भी हो, सोमकोंको जीवित न छोड़े ' ॥ ३५ ॥
यच्च पित्रानुशिष्टोऽसि तद् वचः परिपालय ।
आनृशंस्ये दमे सत्ये चार्जवे च स्थिरो भव ॥ ३६ ॥
यह भी कहना कि ‘ पिताने जो तुम्हें उपदेश दिया है, उसका पालन करो । दया, दम, सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंमें स्थिर रहो ॥ ३६ ॥
धर्मार्थकामकुशलो धर्मार्थावप्यपीडयन् ।
धर्मप्रधानकार्याणि कुर्याश्चेति पुनः पुनः ॥ ३७ ॥
' तुम धर्म, अर्थ और कामके साधनमें कुशल हो । अतः धर्म और अर्थको पीड़ा न देते हुए बारंबार धर्मप्रधान कर्मोंका ही अनुष्ठान करो ॥ ३७ ॥
चक्षुर्मनोभ्यां संतोष्या विप्राः पूज्याश्च शक्तितः ।
न चैषां विप्रियं कार्यं ते हि वह्निशिखोपमाः ॥ ३८ ॥