04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1131–1140

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1131–1140

पृष्ठ 1131

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‘ ओ दुराचारी मूर्ख! उस पापकर्मका फल तुम इस युद्धस्थलमें ही प्राप्त करो । आज मैं पराक्रम करके एक बाणसे तुम्हारा सिर काट डालूँगा ' ॥ ६ ॥

शपे सात्वत पुत्राभ्यामिष्टेन सुकृतेन च ।

अनतीतामिमां रात्रिं यदि त्वां वीरमानिनम् ॥ ७ ॥

अरक्ष्यमाणं पार्थेन जिष्णुना ससुतानुजम् ।

न हन्यां नरके घोरे पतेयं वृष्णिपांसन ॥ ८ ॥

‘ वृष्णिकुलकलंक सात्वत! मैं अपने दोनों पुत्रोंकी तथा यज्ञ और पुण्यकर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि यदि आज रात्रि बीतनेके पहले ही कुन्तीपुत्र अर्जुनसे अरक्षित रहनेपर अपनेको वीर माननेवाले तुम्हें पुत्रों और भाइयोंसहित न मार डालूँ तो घोर नरकमें पहुँ' ॥

एवमुक्त्वा सुसंक्रुद्धः सोमदत्तो महाबलः ।

दध्मौ शङ्खं च तारेण सिंहनादं ननाद च ॥ ९ ॥

ऐसा कहकर महाबली सोमदत्तने अत्यन्त कुपित हो उच्चस्वरसे शंख बजाया और सिंहनाद किया ॥ ९ ॥

ततः कमलपत्राक्षः सिंहदंष्ट्रो दुरासदः ।

सात्यकिर्भृशसंक्रुद्धः सोमदत्तमथाब्रवीत् ॥ १० ॥

तब कमलके समान नेत्र और सिंहके सदृश दाँतवाले दुर्धर्ष वीर सात्यकि भी अत्यन्त कुपित हो सोमदत्तसे इस प्रकार बोले- ॥ १० ॥

कौरवेय न मे त्रासः कथंचिदपि विद्यते ।

त्वया सार्धमथान्यैश्च युध्यतो हृदि कश्चन ॥ ११ ॥

‘ कौरवेय! तुम्हारे या किसी दूसरेके साथ युद्ध करते समय मेरे हृदयमें किसी तरह भी कोई भय नहीं होगा ||

यदि सर्वेण सैन्येन गुप्तो मां योधयिष्यसि ।

तथापि न व्यथा काचित् त्वयि स्यान्मम कौरव ॥ १२ ॥

‘ कौरव! यदि सारी सेनासे सुरक्षित होकर तुम मेरे साथ युद्ध करोगे तो भी तुम्हारे कारण मुझे कोई व्यथा नहीं होगी ॥ १२ ॥

युद्धसारेण वाक्येन असतां सम्मतेन च ।

नाहं भीषयितुं शक्यः क्षत्रवृत्ते स्थितस्त्वया ॥ १३ ॥

‘ मैं सदा क्षत्रियोचित आचारमें स्थित हूँ । युद्ध ही जिसका सार है तथा दुष्ट पुरुष ही जिसे आदर देते हैं; ऐसे कटुवाक्यसे तुम मुझे डरा नहीं सकते ॥ १३ ॥

यदि तेऽस्ति युयुत्साद्य मया सह नराधिप ।

निर्दयो निशितैर्बाणैः प्रहर प्रहरामि ते ॥ १४ ॥

नरेश्वर! यदि मेरे साथ तुम्हारी युद्ध करनेकी इच्छा है तो निर्दयतापूर्वक पैने बाणोंद्वारा

मुझपर प्रहार करो । मैं भी तुमपर प्रहार करूँगा ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1132

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हतो भूरिश्रवा वीरस्तव पुत्रो महारथः ।

शलश्चैव महाराज भ्रातृव्यसनकर्षितः ॥ १५ ॥

‘ महाराज! तुम्हारा वीर महारथी पुत्र भूरिश्रवा मारा गया । भाईके दुःखसे दुःखी होकर शल भी वीरगतिको प्राप्त हुआ है ॥ १५ ॥

त्वां चाप्यद्य वधिष्यामि सहपुत्रं सबान्धवम् ।

तिष्ठेदानीं रणे यत्तः कौरवोऽसि महारथः ॥ १६ ॥

' अब पुत्रों और बान्धवोंसहित तुम्हें भी मार डालूँगा । तुम कुरुकुलके महारथी वीर हो। इस समय रणभूमिमें सावधान होकर खड़े रहो ॥ १६ ॥

यस्मिन् दानं दमः शौचमहिंसा ह्रीर्धृतिः क्षमा ।

अनपायानि सर्वाणि नित्यं राज्ञि युधिष्ठिरे ॥ १७ ॥

मृदङ्गकेतोस्तस्य त्वं तेजसा निहतः पुरा ।

सकर्णसौबलः संख्ये विनाशमुपयास्यसि ॥ १८ ॥

‘ जिन महाराज युधिष्ठिरमें दान, दम, शौच, अहिंसा, लज्जा, धृति और क्षमा आदि सारे सद्गुण अविनश्वरभावसे सदा विद्यमान रहते हैं, अपनी ध्वजामें मृदंगका चिह्न धारण करनेवाले उन्हीं धर्मराजके तेजसे तुम पहले ही मर चुके हो । अतः कर्ण और शकुनिके साथ ही इस युद्धस्थलमें तुम विनाशको प्राप्त होओगे ॥ १७-१८ ॥

शपेऽहं कृष्णचरणैरिष्टापूर्तेन चैव ह ।

यदि त्वां ससुतं पापं न हन्यां युधि रोषितः ॥ १ ९ ॥

' मैं श्रीकृष्णके चरणों तथा अपने इष्टापूर्तकर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि यदि मैं युद्धमें क्रुद्ध होकर तुम जैसे पापीको पुत्रोंसहित न मार डालूँ तो मुझे उत्तम गति न मिले ॥ १ ९ ॥

अपयास्यसि चेत्युक्त्वा रणं मुक्तो भविष्यसि ।

एवमाभाष्य चान्योन्यं क्रोधसंरक्तलोचनौ ॥ २० ॥

प्रवृत्तौ शरसम्पातं कर्तुं पुरुषसत्तमौ । 'यदि तुम उपर्युक्त बातें कहकर भी युद्ध छोड़कर भाग जाओगे तभी मेरे हाथसे छुटकारा पा सकोगे । ' परस्पर ऐसा कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंने एक- दूसरेपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २० ॥

ततो रथसहस्रेण नागानामयुतेन च ॥ २१ ॥

दुर्योधनः सोमदत्तं परिवार्य समन्ततः । तदनन्तर दुर्योधन एक हजार रथों और दस हजार हाथियोंद्वारा सोमदत्तको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करने लगा ॥ २१३ ॥

शकुनिश्च सुसंक्रुद्धः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ २२ ॥

पुत्रपौत्रैः परिवृतो भ्रातृभिश्चेन्द्रविक्रमैः ।

पृष्ठ 1133

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स्यालस्तव महाबाहुर्वज्रसंहननो युवा ॥ २३ ॥

समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और वज्रके समान सुदृढ़ शरीरवाला आपका नवयुवक साला महाबाहु शकुनि भी अत्यन्त कुपित हो इन्द्रके समान पराक्रमी भाइयों तथा पुत्र- पौत्रोंसे घिरकर वहाँ आ पहुँचा ॥ २२-२३ ॥

साग्रं शतसहस्रं तु हयानां तस्य धीमतः ।

सोमदत्तं महेष्वासं समन्तात् पर्यरक्षत ॥ २४ ॥

बुद्धिमान् शकुनिके एक लाखसे अधिक घुड़सवार महाधनुर्धर सोमदत्तकी सब ओरसे रक्षा करने लगे ॥ २४ ॥

रक्ष्यमाणश्च बलिभिश्छादयामास सात्यकिम् ।

तं छाद्यमानं विशिखैर्दृष्ट्वा संनतपर्वभिः ॥ २५ ॥

धृष्टद्युम्नोऽभ्ययात् क्रुद्धः प्रगृह्य महतीं चमूम् । बलवान् सहायकोंसे सुरक्षित हो सोमदत्तने अपने बाणोंसे सात्यकिको आच्छादित कर दिया । झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे सात्यकिको आच्छादित होते देख क्रोधमें भरे हुए धृष्टद्युम्न विशाल सेना साथ लेकर वहाँ आ पहुँचे ॥ २५३ ॥

चण्डवाताभिसृष्टानामुदधीनामिव स्वनः ॥ २६ ॥

आसीद् राजन् बलौघानामन्योन्यमभिनिघ्नताम् । राजन्! उस समय परस्पर प्रहार करनेवाली सेनाओंका कोलाहल प्रचण्ड वायुसे विक्षुब्ध हुए समुद्रोंकी गर्जनाके समान प्रतीत होता था ॥ २६३ ॥

विव्याध सोमदत्तस्तु सात्वतं नवभिः शरैः ॥ २७ ॥

सात्यकिर्नवभिश्चैनमवधीत् कुरुपुङ्गवम् । सोमदत्तने सात्यकिको नौ बाणोंसे बींध डाला । फिर सात्यकिने भी कुरुश्रेष्ठ सोमदत्तको नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २७३ ॥

सोऽतिविद्धो बलवता समरे दृढधन्विना ॥ २८ ॥

रथोपस्थं समासाद्य मुमोह गतचेतनः । सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले बलवान् सात्यकिके द्वारा समरभूमिमें अत्यन्त घायल किये जानेपर सोमदत्त रथकी बैठकमें जा बैठे और सुध- बुध खोकर मूर्च्छित हो गये ॥ २८ ¾ ॥ तं विमूढं समालक्ष्य सारथिस्त्वरया युतः ॥ २ ९ ॥ अपोवाह रणाद् वीरं सोमदत्तं महारथम् । तब महारथी वीर सोमदत्तको मूर्च्छित हुआ देख सारथि बड़ी उतावलीके साथ उन्हें रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ २ ९ ३ ॥ तं विसंज्ञं समालक्ष्य युयुधानशरार्दितम् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1134

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अभ्यद्रवत् ततो द्रोणो यदुवीरजिघांसया । सोमदत्तको युयुधानके बाणोंसे पीड़ित एवं अचेत हुआ देख द्रोणाचार्य यदुवीर सात्यकिका वध करनेकी इच्छासे उनकी ओर दौड़े ॥ ३०३ ॥

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ ३१ ॥

परिवव्रुर्महात्मानं परीप्सन्तो यदूत्तमम् । द्रोणाचार्यको आते देख युधिष्ठिर आदि पाण्डववीर यदुकुलतिलक महामना सात्यकिकी रक्षाके लिये उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ३१३ ॥

ततः प्रववृते युद्धं द्रोणस्य सह पाण्डवैः ॥ ३२ ॥

बलेरिव सुरैः पूर्वं त्रैलोक्यजयकाङ्क्षया । जैसे पूर्वकालमें त्रिलोकीपर विजय पानेकी इच्छासे राजा बलिका देवताओंके साथ युद्ध हुआ था, उसी प्रकार द्रोणाचार्यका पाण्डवोंके साथ घोर संग्राम आरम्भ हुआ ॥ ३२ || ततः सायकजालेन पाण्डवानीकमावृणोत् ॥ ३३ ॥

भारद्वाजो महातेजा विव्याध च युधिष्ठिरम् । तत्पश्चात् महातेजस्वी द्रोणाचार्यने अपने बाणसमूह से पाण्डव सेनाको आच्छादित कर दिया और युधिष्ठिरको बींध डाला ॥ ३३ ॥

सात्यकिं दशभिर्बाणैर्विंशत्या पार्षतं शरैः ॥ ३४ ॥

भीमसेनं च नवभिर्नकुलं पञ्चभिस्तथा ।

सहदेवं तथाष्टाभिः शतेन च शिखण्डिनम् ॥ ३५ ॥

द्रौपदेयान् महाबाहुः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ।

विराटं मत्स्यमष्टाभिर्दुपदं दशभिः शरैः ॥ ३६ ॥

युधामन्युं त्रिभिः षड्भिरुत्तमौजसमाहवे ।

अन्यांश्च सैनिकान् विद्ध्वा युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ३७ ॥

फिर महाबाहु द्रोणने सात्यकिको दस, धृष्टद्युम्नको बीस, भीमसेनको नौ, नकुलको पाँच, सहदेवको आठ, शिखण्डीको सौ, द्रौपदी - पुत्रोंको पाँच - पाँच, मत्स्यराज विराटको आठ, द्रुपदको दस, युधामन्युको तीन, उत्तमौजाको छः तथा अन्य सैनिकोंको अन्यान्य बाणोंसे घायल करके युद्धस्थलमें राजा युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥

ते वध्यमाना द्रोणेन पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ।

प्राद्रवन् वै भयाद् राजन् सार्तनादा दिशो दश ॥ ३८ ॥

राजन्! द्रोणाचार्यकी मार खाकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके सैनिक आर्तनाद करते हुए भयके मारे दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ३८ ॥

काल्यमानं तु तत् सैन्यं दृष्ट्वा द्रोणेन फाल्गुनः ।

किंचिदागतसंरम्भो गुरुं पार्थोऽभ्ययाद् द्रुतम् ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 1135

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द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डव- सेनाका संहार होता देख कुन्तीकुमार अर्जुनके हृदयमें कुछ क्रोध हो आया । वे तुरंत ही आचार्यका सामना करनेके लिये चल दिये ॥

दृष्ट्वा द्रोणं तु बीभत्सुमभिधावन्तमाहवे ।

संन्यवर्तत तत् सैन्यं पुनर्यौधिष्ठिरं बलम् ॥ ४० ॥

अर्जुनको युद्धमें द्रोणाचार्यपर धावा करते देख युधिष्ठिरकी सेना पुनः वापस लौट आयी ॥ ४० ॥

ततो युद्धमभूद् भूयो भारद्वाजस्य पाण्डवैः ।

द्रोणस्तव सुतै राजन् सर्वतः परिवारितः ॥ ४१ ॥

व्यधमत् पाण्डुसैन्यानि तूलराशिमिवानलः । राजन्! तदनन्तर भरद्वाजनन्दन द्रोणका पाण्डवोंके साथ पुनः युद्ध आरम्भ हुआ । आपके पुत्रोंने द्रोणाचार्यको सब ओरसे घेर रखा था । जैसे आग रूईके ढेरको जला देती है, उसी प्रकार वे पाण्डव - सेनाको तहस -नहस करने लगे ॥ ४१ ॥

तं ज्वलन्तमिवादित्यं दीप्तानलसमद्युतिम् ॥ ४२ ॥

राजन्ननिशमत्यन्तं दृष्ट्वा द्रोणं शरार्चिषम् ।

मण्डलीकृतधन्वानं तपन्तमिव भास्करम् ॥ ४३ ॥

दहन्तमहितान् सैन्ये नैनं कश्चिदवारयत् । नरेश्वर! प्रज्वलित अग्निके समान कान्तिमान् तथा निरन्तर बाणरूपी किरणोंसे युक्त सूर्यके समान अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले द्रोणाचार्यको धनुषको मण्डलाकार करके तपते हुए प्रभाकरके समान शत्रुओंको दग्ध करते देख पाण्डव- सेनामें कोई वीर उन्हें रोक न सका ॥ ४२-४३ ॥ यो यो हि प्रमुखे तस्य तस्थौ द्रोणस्य पूरुषः ॥ ४४ ॥

तस्य तस्य शिरश्छित्त्वा ययुर्द्रोणशराः क्षितिम् । जो-जो योद्धा पुरुष द्रोणाचार्यके सामने खड़ा होता, उसी -उसीका सिर काटकर द्रोणाचार्यके बाण धरतीमें समा जाते थे ॥ ४४ ॥

एवं सा पाण्डवी सेना वध्यमाना महात्मना ॥ ४५ ॥

प्रदुद्राव पुनर्भीता पश्यतः सव्यसाचिनः । इस प्रकार महात्मा द्रोणके द्वारा मारी जाती हुई पाण्डव सेना पुनः भयभीत हो सव्यसाची अर्जुनके देखते- देखते भागने लगी ॥ ४५३ ॥

सम्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा द्रोणेन निशि भारत ॥ ४६ ॥

गोविन्दमब्रवीज्जिष्णुर्गच्छ द्रोणरथं प्रति । भरतनन्दन! रातमें द्रोणाचार्यके द्वारा अपनी सेनाको भगायी हुई देख अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा — ' आप द्रोणाचार्यके रथके समीप चलिये ' ॥ ४६३ ॥

पृष्ठ 1136

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ततो रजतगोक्षीरकुन्देन्दुसदृशप्रभान् ॥ ४७ ॥

चोदयामास दाशार्हो हयान् द्रोणरथं प्रति । तब दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णने चाँदी, गोदुग्ध, कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिवाले घोड़ोंको द्रोणाचार्यके रथकी ओर हाँका ॥ ४७३ ॥

भीमसेनोऽपि तं दृष्ट्वा यान्तं द्रोणाय फाल्गुनम् ॥ ४८ ॥

स्वसारथिमुवाचेदं द्रोणानीकाय मा वह । अर्जुनको द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये जाते देख भीमसेनने भी अपने सारथिसे कहा — ‘ तुम द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर मुझे ले चलो ' ॥ ४८३ ॥

सोऽपि तस्य वचः श्रुत्वा विशोकोऽवाहयद्धयान् ॥ ४ ९ ॥ पृष्ठतः सत्यसंधस्य जिष्णोर्भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! उनके सारथि विशोकने उनकी बात सुनकर सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनके पीछे अपने घोड़ोंको बढ़ाया ॥ ४ ९ ॥ तौ दृष्ट्वा भ्रातरौ यत्तौ द्रोणानीकमभिद्रुतौ ॥ ५० ॥

पञ्चालाः सृञ्जयाः मत्स्याश्चेदिकारूषकोसलाः ।

अन्वगच्छन् महाराज केकयाश्च महारथाः ॥ ५१ ॥

महाराज! उन दोनों भाइयोंको द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर युद्धके लिये उद्यत होकर जाते देख पांचाल, संजय, मत्स्य, चेदि, कारूष, कोसल तथा केकय महारथियोंने भी उन्हींका अनुसरण किया ॥ ५०-५१ ॥

ततो राजन्नभूद् घोरः संग्रामो लोमहर्षणः ।

बीभत्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं च वृकोदरः ॥ ५२ ॥

महद्भयां रथवृन्दाभ्यां बलं जगृहतुस्तव । राजन्! फिर तो वहाँ रोंगटे खड़े कर देनेवाला घोर संग्राम आरम्भ हो गया । अर्जुनने द्रोणाचार्यकी सेनाके दक्षिण- भागको और भीमसेनने वामभागको अपना लक्ष्य बनाया । उन दोनों भाइयोंके साथ विशाल रथ तथा सेनाएँ थीं ॥ ५२ ॥

तौ दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रौ भीमसेनधनंजयौ ॥ ५३ ॥

धृष्टद्युम्नोऽभ्ययाद् राजन् सात्यकिश्च महाबलः । राजन्! पुरुषसिंह भीमसेन और अर्जुनको द्रोणाचार्यपर धावा करते देख धृष्टद्युम्न और महाबली सात्यकि भी वहीं जा पहुँचे ॥ ५३३ ॥

चण्डवाताभिपन्नानामुदधीनामिव स्वनः ॥ ५४ ॥

आसीद् राजन् बलौघानां तदान्योन्यमभिघ्नताम् । महाराज! उस समय परस्पर आघात-प्रतिघात करते हुए उन सैन्यसमूहोंका कोलाहल प्रचण्ड वायुसे विक्षुब्ध हुए समुद्रकी गर्जनाके समान प्रतीत होता था ॥ ५४३ ॥

पृष्ठ 1137

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सौमदत्तिवधात् क्रुद्धो दृष्ट्वा सात्यकिमाहवे ॥ ५५ ॥

द्रौणिरभ्यद्रवद् राजन् वधाय कृतनिश्चयः । नरेश्वर! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाके वधसे अत्यन्त कुपित हो उठा था । उसने युद्धस्थलमें सात्यकिको देखकर उनके वधका दृढ़ निश्चय करके उनपर आक्रमण किया ॥ ५५३ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैनेयस्य रथं प्रति ॥ ५६ ॥

भैमसेनिः सुसंक्रुद्धः प्रत्यमित्रमवारयत् । अश्वत्थामाको शिनिपौत्रके रथकी ओर जाते देख अत्यन्त कुपित हुए भीमसेनके पुत्र घटोत्कचने अपने उस शत्रुको रोका ॥ ५६३ ॥

कार्ष्णायसं महाघोरमृक्षचर्मपरिच्छदम् ॥ ५७ ॥

महान्तं रथमास्थाय त्रिंशन्नल्वान्तरान्तरम् ।

विक्षिप्तयन्त्रसंनाहं महामेघौघनिःस्वनम् ॥ ५८ ॥

युक्तं गजनिभैर्वाहैर्न हयैर्नापि वारणैः ।

विक्षिप्तपक्षचरणविवृताक्षेण कूजता ॥ ५ ९ ॥

ध्वजेनोच्छ्रितदण्डेन गृध्रराजेन राजितम् ।

लोहितार्द्रपताकं तु अन्त्रमालाविभूषितम् ॥ ६० ॥

घटोत्कच जिस विशाल रथपर बैठकर आया था, वह काले लोहेका बना हुआ और अत्यन्त भयंकर था । उसके ऊपर रीछकी खाल मढ़ी हुई थी । उसके भीतरी भागकी लंबाई-चौड़ाई तीस नल्व * ( बारह हजार हाथ ) थी । उसमें यन्त्र और कवच रखे हुए थे । चलते समय उससे मेघोंकी भारी घटाके समान गम्भीर शब्द होता था। उसमें हाथी - जैसे विशालकाय वाहन जुते हुए थे, जो वास्तवमें न घोड़े थे और न हाथी । उस रथकी ध्वजाका डंडा बहुत ऊँचा था । वह ध्वज पंख और पंजे फैलाकर आँखें फाड़-फाड़कर देखने और कूजनेवाले एक गृध्रराजसे सुशोभित था । उसकी पताका खूनसे भीगी हुई थी और उस रथको आँतोंकी मालासे विभूषित किया गया था ॥ ५७–६० ॥

अष्टचक्रसमायुक्तमास्थाय विपुलं रथम् ।

शूलमुद्गरधारिण्या शैलपादपहस्तया ॥ ६१ ॥

रक्षसां घोररूपाणामक्षौहिण्या समावृतः । ऐसे आठ पहियोंवाले विशाल रथपर बैठा हुआ घटोत्कच भयंकर रूपवाले राक्षसोंकी एक अक्षौहिणी सेनासे घिरा हुआ था । उस समस्त सेनाने अपने हाथोंमें शूल, मुद्गर, पर्वत-शिखर और वृक्ष ले रखे थे ॥ ६१३ ॥

तमुद्यतमहाचापं निशम्य व्यथिता नृपाः ॥ ६२ ॥

युगान्तकालसमये दण्डहस्तमिवान्तकम् ।

पृष्ठ 1138

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प्रलयकालमें दण्डधारी यमराजके समान विशाल धनुष उठाये घटोत्कचको देखकर समस्त राजा व्यथित हो उठे ॥ ६२ ॥

ततस्तं गिरिशृङ्गाभं भीमरूपं भयावहम् ॥ ६३ ॥

दंष्ट्राकरालोग्रमुखं शङ्कुकर्णं महाहनुम् ।

ऊर्ध्वकेशं विरूपाक्षं दीप्तास्यं निम्नितोदरम् ॥ ६४ ॥

महाश्वभ्रगलद्वारं किरीटच्छन्नमूर्धजम् ।

त्रासनं सर्वभूतानां व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ ६५ ॥

वीक्ष्य दीप्तमिवायान्तं रिपुविक्षोभकारिणम् ।

तमुद्यतमहाचापं राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् ॥ ६६ ॥

भयार्दिता प्रचुक्षोभ पुत्रस्य तव वाहिनी ।

वायुना क्षोभितावर्ता गङ्गेवोर्ध्वतरङ्गिणी ॥ ६७ ॥

वह देखनेमें पर्वत -शिखरके समान जान पड़ता था । उसका रूप भयानक होनेके कारण वह सबको भयंकर प्रतीत होता था । उसका मुख यों ही बड़ा भीषण था; किंतु दाढ़ोंके कारण और भी विकराल हो उठा था । उसके कान कील या खूँटेके समान जान पड़ते थे । ठोढ़ी बहुत बड़ी थी। बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे । आँखें डरावनी थीं । मुख आगके समान प्रज्वलित था, पेट भीतरकी ओर धँसा हुआ था । उसके गलेका छेद बहुत बड़े गड्ढेके समान जान पड़ता था । सिरके बाल किरीटसे ढके हुए थे । वह मुँह बाये हुए यमराजके समान समस्त प्राणियोंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला था । शत्रुओंको क्षुब्ध कर देनेवाले प्रज्वलित अग्निके समान राक्षसराज घटोत्कचको विशाल धनुष उठाये आते देख आपके पुत्रकी सेना भयसे पीड़ित एवं क्षुब्ध हो उठी, मानो वायुसे विक्षुब्ध हुई गंगामें भयानक भँवरें और ऊँची - ऊँची लहरें उठ रही हों ॥ ६३-६७ ॥

घटोत्कचप्रयुक्तेन सिंहनादेन भीषिताः ।

प्रसुस्रुवुर्गजा मूत्रं विव्यथुश्च नरा भृशम् ॥ ६८ ॥

घटोत्कचके द्वारा किये हुए सिंहनादसे भयभीत हो हाथियोंके पेशाब झड़ने लगे और मनुष्य भी अत्यन्त व्यथित हो उठे ॥ ६८ ॥

ततोऽश्मवृष्टिरत्यर्थमासीत् तत्र समन्ततः ।

संध्याकालाधिकबलैः प्रयुक्ता राक्षसैः क्षितौ ॥ ६ ९ ॥

तदनन्तर उस रणभूमिमें चारों ओर संध्याकालसे ही अधिक बलवान् हुए राक्षसोंद्वारा की हुई पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी ॥ ६ ९ ॥

आयसानि च चक्राणि भुशुण्ड्यः प्रासतोमराः ।

पतन्त्यविरताः शूलाः शतघ्न्यः पट्टिशास्तथा ॥ ७० ॥

लोहेके चक्र, भुशुण्डी, प्रास, तोमर, शूल, शतघ्नी और पट्टिश आदि अस्त्र अविराम गतिसे गिरने लगे ॥ ७० ॥

पृष्ठ 1139

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तदुग्रमतिरौद्रं च दृष्ट्वा युद्धं नराधिपाः ।

तनयास्तव कर्णश्च व्यथिताः प्राद्रवन् दिशः ॥ ७१ ॥

उस अत्यन्त भयंकर और उग्र संग्रामको देखकर समस्त नरेश, आपके पुत्र और कर्ण — ये सभी पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ७१ ॥

तत्रैकोऽस्त्रबलश्लाघी दौणिर्मानी न विव्यथे ।

व्यधमच्च शरैर्मायां घटोत्कचविनिर्मिताम् ॥ ७२ ॥

उस समय वहाँ अपने अस्त्र- बलपर अभिमान करनेवाला एकमात्र द्रोणकुमार स्वाभिमानी अश्वत्थामा तनिक भी व्यथित नहीं हुआ । उसने घटोत्कचकी रची हुई माया अपने बाणोंद्वारा नष्ट कर दी ॥ ७२ ॥

विहतायां तु मायायाममर्षी स घटोत्कचः ।

विससर्ज शरान् घोरांस्तेऽश्वत्थामानमाविशन् ॥ ७३ ॥

माया नष्ट हो जानेपर अमर्षमें भरे हुए घटोत्कचने बड़े भयंकर बाण छोड़े । वे सभी बाण अश्वत्थामाके शरीरमें घुस गये ॥ ७३ ॥

भुजङ्गा इव वेगेन वल्मीकं क्रोधमूर्च्छिताः ।

ते शरा रुधिराक्ताङ्गा भित्त्वा शारद्वतीसुतम् ॥ ७४ ॥

विविशुर्धरणीं शीघ्रा रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः । जैसे क्रोधातुर सर्प बड़े वेगसे बाँबीमें घुसते हैं, उसी प्रकार शिलापर तेज किये हुए वे सुवर्णमय पंखवाले शीघ्रगामी बाण कृपीकुमारको विदीर्ण करके खूनसे लथपथ हो धरतीमें घुस गये ॥ ७४ ॥

अश्वत्थामा तु संक्रुद्धो लघुहस्तः प्रतापवान् ॥ ७५ ॥

घटोत्कचमभिक्रुद्धं बिभेद दशभिः शरैः । इससे अश्वत्थामाका क्रोध बहुत बढ़ गया। फिर तो शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस प्रतापी वीरने क्रोधी घटोत्कचको दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ७५३ ॥

घटोत्कचोऽतिविद्धस्तु द्रोणपुत्रेण मर्मसु ॥ ७६ ॥

चक्रं शतसहस्रारमगृह्णाद् व्यथितो भृशम् ।

क्षुरान्तं बालसूर्याभं मणिवज्रविभूषितम् ॥ ७७ ॥

द्रोणपुत्रके द्वारा मर्मस्थानोंमें गहरी चोट लगनेके कारण घटोत्कच अत्यन्त व्यथित हो उठा और उसने एक ऐसा चक्र हाथमें लिया, जिसमें एक लाख अरे थे । उसके प्रान्तभागमें छुरे लगे हुए थे । मणियों तथा हीरोंसे विभूषित वह चक्र प्रातःकालके सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ७६-७७ ॥

अश्वत्थाम्नि च चिक्षेप भैमसेनिर्जिघांसया ।

वेगेन महताऽऽगच्छद् विक्षिप्तं द्रौणिना शरैः ॥ ७८ ॥

अभाग्यस्येव संकल्पस्तन्मोघमपतद् भुवि ।

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भीमसेनकुमारने अश्वत्थामाका वध करनेकी इच्छासे वह चक्र उसके ऊपर चला दिया, परंतु अश्वत्थामाने अपने बाणोंद्वारा बड़े वेगसे आते हुए उस चक्रको दूर फेंक दिया । वह भाग्यहीनके संकल्प ( मनोरथ) -की भाँति व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ७८३ ॥

घटोत्कचस्ततस्तूर्णं दृष्ट्वा चक्रं निपातितम् ॥ ७९ ॥

दौणिं प्राच्छादयद् बाणैः स्वर्भानुरिव भास्करम् । तदनन्तर अपने चक्रको धरतीपर गिराया हुआ देख घटोत्कचने अपने बाणोंकी वर्षासे अश्वत्थामाको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे राहु सूर्यको आच्छादित कर देता है ॥ घटोत्कचसुतः श्रीमान् भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥ ८० ॥

रुरोध द्रौणिमायान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् । घटोत्कचके तेजस्वी पुत्र अंजनपर्वाने, जो कटे हुए कोयलेके ढेरके समान काला था, अपनी ओर आते हुए अश्वत्थामाको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे गिरिराज हिमालय आँधीको रोक देता है ॥ ८० ॥

पौत्रेण भीमसेनस्य शरैरञ्जनपर्वणा ॥ ८१ ॥

बभौ मेघेन धाराभिर्गिरिर्मेरुरिवावृतः । भीमसेनके पौत्र अंजनपर्वाके बाणोंसे आच्छादित हुआ अश्वत्थामा मेघकी जलधारासे आवृत हुए मेरुपर्वतके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ८१३ ॥

अश्वत्थामा त्वसम्भ्रान्तो रुद्रोपेन्द्रेन्द्रविक्रमः ॥ ८२ ॥

ध्वजमेकेन बाणेन चिच्छेदाञ्जनपर्वणः । रुद्र, विष्णु तथा इन्द्रके समान पराक्रमी अश्वत्थामाके मनमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई । उसने एक बाणसे अंजनपर्वाकी ध्वजा काट डाली ॥ ८२३ ॥

द्वाभ्यां तु रथयन्तारौ त्रिभिश्चास्य त्रिवेणुकम् ॥ ८३ ॥

धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिश्चतुरो हयान् । फिर दो बाणोंसे उसके दो सारथियोंको, तीनसे त्रिवेणुको, एकसे धनुषको और चारसे चारों घोड़ोंको काट डाला ॥ ८३३३ ॥

विरथस्योद्यतं हस्ताद्धेमबिन्दुभिराचितम् ॥ ८४ ॥

विशिखेन सुतीक्ष्णेन खड्गमस्य द्विधाकरोत् । तत्पश्चात् रथहीन हुए राक्षसपुत्रके हाथसे उठे हुए सुवर्ण- बिन्दुओंसे व्याप्त खड्गको उसने एक तीखे बाणसे मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ८४ ॥

गदा हेमाङ्गदा राजंस्तूर्ण हैडिम्बिसूनुना ॥ ८५ ॥

भ्राम्योत्क्षिप्ता शरैः साऽपि द्रौणिनाभ्याहताऽपतत् ।