04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1171–1180

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1171–1180

पृष्ठ 1171

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1171 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

निहताः समरे शूराः पाण्डवैर्बलवत्तराः ।

किमन्यद् दैवसंयोगान्मन्यसे पुरुषाधम ॥ ६७ ॥

‘ परंतु उन अत्यन्त प्रबल तथा शूरवीर नरेशोंको भी पाण्डवोंने युद्धमें मार डाला ।

पुरुषाधम! तुम इसमें दैवसंयोगके सिवा दूसरा कौन- सा कारण मानते हो? ॥

यांश्च तान् स्तौषि सततं दुर्योधनरिपून् द्विज ।

तेषामपि हताः शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६८ ॥

'ब्रह्मन्! तुम दुर्योधनके जिन शत्रुओंकी सदा स्तुति करते रहते हो, उनके भी तो सैकड़ों और सहस्रों शूरवीर मारे गये हैं ॥ ६८ ॥

क्षीयन्ते सर्वसैन्यानि कुरूणां पाण्डवैः सह ।

प्रभावं नात्र पश्यामि पाण्डवानां कथंचन ॥ ६ ९ ॥

' कौरव तथा पाण्डव दोनों दलोंकी सारी सेनाएँ प्रतिदिन नष्ट हो रही हैं। मुझे इसमें किसी प्रकार भी पाण्डवोंका कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखायी देता है ॥ यस्तान् बलवतो नित्यं मन्यसे त्वं द्विजाधम ।

यतिष्येऽहं यथाशक्ति योद्धुं तैः सह संयुगे ।

दुर्योधनहितार्थाय 'जयो दैवे प्रतिष्ठितः ' ॥ ७० ॥

'द्विजाधम! तुम जिन्हें सदा बलवान् मानते रहते हो, उन्हींके साथ मैं संग्रामभूमिमें दुर्योधनके हितके लिये यथाशक्ति युद्ध करनेका प्रयत्न करूँगा । विजय तो दैवके अधीन है ' ॥ ७० ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कृपकर्णवाक्येऽष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें कृपाचार्य और कर्णका विवादविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५८ ॥

पृष्ठ 1172

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1172 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः अश्वत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाञ्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध संजय उवाच

तथा परुषितं दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मातुलम् ।

खड्गमुद्यम्य वेगेन द्रौणिरभ्यपतद् द्रुतम् ॥। १ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! इस प्रकार अपने मामाके प्रति सूतपुत्र कर्णको कटु वचन सुनाते देख अश्वत्थामा बड़े वेगसे तलवार उठाकर तुरंत कर्णपर टूट पड़ा ॥ १ ॥

ततः परमसंक्रुद्धः सिंहो मत्तमिव द्विपम् ।

प्रेक्षतः कुरुराजस्य द्रौणिः कर्णं समभ्ययात् ॥ २ ॥

जैसे सिंह मतवाले हाथीपर झपटता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणकुमार अश्वत्थामाने कुरुराज दुर्योधनके देखते - देखते कर्णपर आक्रमण किया ॥ अश्वत्थामोवाच

यदर्जुनगुणांस्तथ्यान् कीर्तयानं नराधम ।

शूरं द्वेषात् सुदुर्बुद्धे त्वं भर्त्सयसि मातुलम् ॥ ३ ॥

विकत्थमानः शौर्येण सर्वलोकधनुर्धरम् ।

दर्पोत्सेधगृहीतोऽद्य न कञ्चिद् गणयन् मृधे ॥ ४ ॥

अश्वत्थामाने कहा — दुर्बुद्धि! नराधम! मेरे मामा सम्पूर्ण जगत्के श्रेष्ठ धनुर्धर एवं शूरवीर हैं । ये अर्जुनके सच्चे गुणोंका बखान कर रहे थे, तो भी तू द्वेषवश अपनी शूरताकी डींग हाँकता हुआ और घमण्डमें आकर आज युद्धमें किसीको कुछ न समझता हुआ जो इन्हें फटकार रहा है, उसका क्या कारण है? ॥ ३-४ ॥

क्व ते वीर्यं क्व चास्त्राणि यत्त्वां निर्जित्य संयुगे ।

गाण्डीवधन्वा हतवान् प्रेक्षतस्ते जयद्रथम् ॥ ५ ॥

जब युद्धस्थलमें गाण्डीवधारी अर्जुनने तुझे परास्त करके तेरे देखते -देखते जयद्रथको मार डाला था, उस समय तेरा पराक्रम कहाँ था? तेरे वे अस्त्र - शस्त्र कहाँ चले गये

पृष्ठ 1173

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1173 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

थे? ॥ ५ ॥

येन साक्षान्महादेवो योधितः समरे पुरा ।

तमिच्छसि वृथा जेतुं सूताधम मनोरथैः ॥ ६ ॥

सूताधम! जिन्होंने समरांगणमें पहले साक्षात् महादेवजीके साथ युद्ध किया है, उन्हें केवल मनोरथोंद्वारा जीतनेकी तू व्यर्थ इच्छा प्रकट कर रहा है ॥ ६ ॥

यं हि कृष्णेन सहितं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।

जेतुं न शक्ताः सहिताः सेन्द्रा अपि सुरसुराः ॥ ७ ॥

लोकैकवीरमजितमर्जुनं सूत संयुगे ।

किं पुनस्त्वं सुदुर्बुद्धे सहैभिर्वसुधाधिपैः ॥ ८ ॥

दुर्बुद्धि! सूत! जो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा श्रीकृष्णके साथ रहनेपर जिन्हें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी जीतनेमें समर्थ नहीं हैं, उन्हीं लोकके एकमात्र अपराजित वीर अर्जुनको जीतनेके लिये इन राजाओंसहित तेरी क्या शक्ति है? ॥ ७-८ ॥

कर्ण पश्य सुदुर्बुद्धे तिष्ठेदानीं नराधम ।

एष तेऽद्य शिरः कायादुद्धरामि सुदुर्मते ॥ ९ ॥

दुर्बुद्धि नराधम! कर्ण! तू देख और खड़ा रह । दुर्मते! मैं अभी तेरा सिर धड़से उतार लेता हूँ ॥ ९ ॥

संजय उवाच

तमुद्यतं तु वेगेन राजा दुर्योधनः स्वयम् ।

न्यवारयन्महातेजाः कृपश्च द्विपदां वरः ॥ १० ॥

संजय कहते हैं — राजन्! इस प्रकार वेगपूर्वक उठे हुए अश्वत्थामाको महातेजस्वी स्वयं राजा दुर्योधन तथा मनुष्योंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने रोका ॥ १० ॥

कर्णउवाच

शूरोऽयं समरश्लाघी दुर्मतिश्च द्विजाधमः ।

आसादयतु मद्वीर्यं मुञ्चेमं कुरुसत्तम ॥ ११ ॥

कर्ण बोला – कुरुश्रेष्ठ! यह दुर्बुद्धि एवं नीच ब्राह्मण बड़ा शूरवीर बनता है और

युद्धकी श्लाघा रखता है । तुम इसे छोड़ दो । आज यह मेरे पराक्रमका सामना करे ॥ ११ ॥

अश्वत्थामोवाच

तवैतत् क्षम्यतेऽस्माभिः सूतात्मज सुदुर्मते ।

दर्पमुत्सिक्तमेतत् ते फाल्गुनो नाशयिष्यति ॥ १२ ॥

अश्वत्थामाने कहा — दुर्बुद्धि सूतपुत्र! हमलोग तेरे इस अपराधको क्षमा करते हैं । तेरे इस बढ़े हुए घमण्डका नाश अर्जुन करेंगे ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1174

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1174 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दुर्योधन उवाच

अश्वत्थामन् प्रसीदस्व क्षन्तुमर्हसि मानद ।

कोपः खलु न कर्तव्यः सूतपुत्रं कथंचन ॥ १३ ॥

दुर्योधन बोला – दूसरोंको मान देनेवाले ( भाई) अश्वत्थामा! प्रसन्न होओ । तुम्हें क्षमा करना चाहिये । सूतपुत्र कर्णपर तुम्हें किसी प्रकार भी क्रोध करना उचित नहीं है ॥ १३ ॥

त्वयि कर्णे कृपे द्रोणे मद्रराजेऽथ सौबले ।

महत् कार्यं समासक्तं प्रसीद द्विजसत्तम ॥ १४ ॥

द्विजश्रेष्ठ! तुमपर, कर्णपर तथा कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, मद्रराज शल्य और शकुनिपर महान् कार्यभार रखा गया है; तुम प्रसन्न होओ ॥ १४ ॥

एते ह्यभिमुखाः सर्वे राधेयेन युयुत्सवः ।

आयान्ति पाण्डवा ब्रह्मन्नाह्वयन्तः समन्ततः ॥ १५ ॥

ब्रह्मन्! ये सामने राधापुत्र कर्णके साथ युद्धकी अभिलाषा रखकर समस्त पाण्डव-सैनिक सब ओरसे ललकारते आ रहे हैं ॥ १५ ॥

संजय उवाच

प्रसाद्यमानस्तु ततो राज्ञा द्रौणिर्महामनाः ।

प्रससाद महाराज क्रोधवेगसमन्वितः ॥ १६ ॥

संजय कहते हैं — महाराज! राजा दुर्योधनके मनानेपर क्रोधके वेगसे युक्त महामना अश्वत्थामा शान्त एवं प्रसन्न हो गया ॥ १६ ॥

ततः कृपोऽप्युवाचेदमाचार्यः सुमहामनाः ।

सौम्यस्वभावाद् राजेन्द्र क्षिप्रमागतमार्दवः ॥ १७ ॥

राजेन्द्र! तत्पश्चात् सौम्य स्वभावके कारण शीघ्र ही मृदुता आ जानेसे महामना कृपाचार्य भी शान्त हो गये और इस प्रकार बोले ॥ १७ ॥

कृपउवाच

तवैतत् क्षम्यतेऽस्माभिः सूतात्मज सुदुर्मते ।

दर्पमुत्सिक्तमेतत् ते फाल्गुनो नाशयिष्यति ॥ १८ ॥

कृपाचार्यने कहा – दुर्बुद्धि सूतपुत्र! हमलोग तो तेरे इस अपराधको क्षमा कर देते हैं; परंतु अर्जुन तेरे इस बढ़े हुए घमंडका अवश्य नाश करेंगे ॥ १८ ॥

संजय उवाच

ततस्ते पाण्डवा राजन् पञ्चालाश्च यशस्विनः ।

आजग्मुः सहिताः कर्णं तर्जयन्तः समन्ततः ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1175

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1175 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

संजय कहते हैं - राजन्! तदनन्तर वे यशस्वी पाण्डव और पांचाल एक साथ होकर गर्जन - तर्जन करते हुए चारों ओरसे कर्णपर चढ़ आये ॥ १ ९ ॥

कर्णोऽपि रथिनां श्रेष्ठश्चापमुद्यम्य वीर्यवान् ।

कौरवाग्रयैः परिवृतः शक्रो देवगणैरिव ॥ २० ॥

पर्यतिष्ठत तेजस्वी स्वबाहुबलमाश्रितः । रथियोंमें श्रेष्ठ, पराक्रमी एवं तेजस्वी वीर कर्ण भी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके समान प्रधान कौरववीरोंसे घिरकर अपने बाहुबलका भरोसा करके धनुष उठाकर युद्धके लिये खड़ा हो गया ॥ २० ॥

ततः प्रववृते युद्धं कर्णस्य सह पाण्डवैः ॥ २१ ॥

भीषणं सुमहाराज सिंहनादविराजितम् । महाराज! तदनन्तर कर्णका पाण्डवोंके साथ भीषण युद्ध आरम्भ हुआ, जो सिंहनादसे सुशोभित हो रहा था ॥ ततस्ते पाण्डवा राजन् पञ्चालाश्च यशस्विनः ॥ २२ ॥

दृष्ट्वा कर्णं महाबाहुमुच्चैः शब्दमथानदन् । राजन्! यशस्वी पाण्डव और पांचालोंने महाबाहु कर्णको देखकर उच्चस्वरसे इस प्रकार कहना आस्मभ किया ॥ २२३ ॥

अयं कर्णः कुतः कर्णस्तिष्ठ कर्ण महारणे ॥ २३ ॥

युध्यस्व सहितोऽस्माभिर्दुरात्मन् पुरुषाधम । ‘ कहाँ कर्ण है? यह कर्ण है । दुरात्मन् नराधम कर्ण! इस महायुद्धमें खड़ा रह और हमारे साथ युद्ध कर ' ॥ २३३ ॥

अन्ये तु दृष्ट्वा राधेयं क्रोधरक्तेक्षणाऽब्रुवन् ॥ २४ ॥

हन्यतामयमुत्सिक्तः सूतपुत्रोऽल्पचेतनः ।

सर्वैः पार्थिवशार्दूलैर्नानेनार्थोऽस्ति जीवता ॥ २५ ॥

अत्यन्तवैरी पार्थानां सततं पापपूरुषः ।

एष मूलमनर्थानां दुर्योधनमते स्थितः ॥ २६ ॥

घ्नतैनमिति जल्पन्तः क्षत्रियाः समुपाद्रवन् ।

महता शरवर्षेण च्छादयन्तो महारथाः ॥ २७ ॥

वधार्थं सूतपुत्रस्य पाण्डवेयेन चोदिताः ।

पृष्ठ 1176

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1176 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दूसरे लोगोंने राधापुत्र कर्णको देखकर क्रोधसे लाल आँखें करके कहा — ‘ समस्त श्रेष्ठ राजा मिलकर इस घमंडी और मूर्ख सूतपुत्रको मार डालें । इसके जीनेसे कोई लाभ नहीं है । यह पापात्मा पुरुष सदा कुन्तीकुमारोंके साथ अत्यन्त वैर रखता आया है । दुर्योधनकी रायमें रहकर यही सारे अनर्थोंकी जड़ बना हुआ है । अतः इसे मार डालो । ' ऐसा कहते हुए समस्त क्षत्रिय महारथी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे सूतपुत्रके वधके लिये प्रेरित हो बाणोंकी बड़ी भारी वर्षाद्वारा उसे आच्छादित करते हुए उसपर टूट पड़े ॥ २४–२७३ ॥ तांस्तु सर्वांस्तथा दृष्ट्वा धावमानान् महारथान् ॥ २८ ॥

न विव्यथे सूतपुत्रो न च त्रासमगच्छत । उन समस्त महारथियोंको इस प्रकार धावा करते देख सूतपुत्रके मनमें न तो व्यथा हुई और न त्रास ही हुआ ॥ २८३ ॥

दृष्ट्वा संहारकल्पं तमुद्भूतं सैन्यसागरम् ॥ २ ९ ॥

पिप्रीषुस्तव पुत्राणां संग्रामेष्वपराजितः ।

सायकौघेन बलवान् क्षिप्रकारी महाबलः ॥ ३० ॥

वारयामास तत् सैन्यं समन्ताद् भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! प्रलयकालके समान उस सैन्यसागरको उमड़ा हुआ देख संग्राममें पराजित न होनेवाले बलवान्, शीघ्रकारी और महान् शक्तिशाली कर्णने आपके पुत्रोंको प्रसन्न करनेकी इच्छासे बाणसमूहकी वर्षा करके सब ओरसे शत्रुओंकी उस सेनाको रोक दिया ॥ २ ९ -३० ॥ ततस्तु शरवर्षेण पार्थिवास्तमवारयन् ॥ ३१ ॥

धनूंषि ते विधुन्वानाः शतशोऽथ सहस्रशः ।

अयोधयन्त राधेयं शक्रं दैत्यगणा इव ॥ ३२ ॥

तदनन्तर सैकड़ों और सहस्रों नरेशोंने अपने धनुषोंको कम्पित करते हुए बाणक वर्षासे कर्णकी भी प्रगति रोक दी । जैसे दैत्योंने इन्द्रके साथ संग्राम किया था, उसी प्रकार वे राजालोग राधापुत्र कर्णके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३१-३२ ॥

शरवर्षं तु तत् कर्णः पार्थिवैः समुदीरितम् ।

शरवर्षेण महता समन्ताद् व्यकिरत् प्रभो ॥ ३३ ॥

प्रभो! राजाओंद्वारा की हुई उस बाण- वर्षाको कर्णने बाणोंकी बड़ी भारी वृष्टि करके सब ओर बिखेर दिया ॥ ३३ ॥

तद् युद्धमभवत् तेषां कृतप्रतिकृतैषिणाम् ।

यथा देवासुरे युद्धे शक्रस्य सह दानवैः ॥ ३४ ॥

जैसे देवासुर संग्राममें दानवोंके साथ इन्द्रका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार घात-प्रतिघातकी इच्छावाले राजाओं तथा कर्णका वह युद्ध बड़ा भयंकर हो रहा था ॥ तत्राद्भुतमपश्याम सूतपुत्रस्य लाघवम् ।

पृष्ठ 1177

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1177 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यदेनं सर्वतो यत्ता नाप्नुवन्ति परे युधि ॥ ३५ ॥

वहाँ हमने सूतपुत्र कर्णकी अद्भुत फुर्ती देखी, जिससे सब ओरसे प्रयत्न करनेपर भी शत्रुपक्षीय योद्धा उस युद्धस्थलमें कर्णको काबूमें नहीं कर पा रहे थे ॥

निवार्य च शरौघांस्तान् पार्थिवानां महारथः ।

युगेष्वीषासु च्छत्रेषु ध्वजेषु च हयेषु च ॥ ३६ ॥

आत्मनामाङ्कितान् घोरान् राधेयः प्राहिणोच्छरान् । राजाओंके उन बाणसमूहोंका निवारण करके महारथी राधापुत्र कर्णने उनके रथके जुओं, ईषादण्डों, छत्रों, ध्वजाओं तथा घोड़ोंपर अपने नाम खुदे हुए भयंकर बाणोंका प्रहार किया ॥ ३६ ॥

ततस्ते व्याकुलीभूता राजानः कर्णपीडिताः ॥ ३७ ॥

बभ्रमुस्तत्र तत्रैव गावः शीतार्दिता इव । तत्पश्चात् कर्णके बाणोंसे पीड़ित और व्याकुल हुए राजालोग सर्दीसे कष्ट पानेवाली गायोंके समान इधर- उधर चक्कर काटने लगे ॥ ३७३ ॥

हयानां वध्यमानानां गजानां रथिनां तथा ॥ ३८ ॥

तत्र तत्राभ्यवेक्षाम संघान् कर्णेन ताडितान् । कर्णके बाणोंकी चोट खाकर मरनेवाले घोड़ों, हाथियों और रथियोंके झुंड- के - झुंड हमने वहाँ देखे थे ॥ शिरोभिः पतितै राजन् बाहुभिश्च समन्ततः ॥ ३ ९ ॥ आस्तीर्णा वसुधा सर्वा शूराणामनिवर्तिनाम् । राजन्! युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीरोंके कट- कटकर गिरे हुए मस्तकों और भुजाओंसे वहाँकी सारी भूमि सब ओरसे पट गयी थी ॥ ३ ९ ॥ हतैश्च हन्यमानैश्च निष्टनद्भिश्च सर्वशः ॥ ४० ॥

बभूवायोधनं रौद्रं वैवस्वतपुरोपमम् । कुछ लोग मारे गये थे, कुछ मारे जा रहे थे और कुछ लोग सब ओर पीड़ासे कराह रहे थे । इससे वह युद्धस्थल यमपुरीके समान भयंकर प्रतीत होता था ॥ ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ॥ ४१ ॥

अश्वत्थामानमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह । उस समय राजा दुर्योधनने कर्णका पराक्रम देख अश्वत्थामाके पास पहुँचकर यह बात कही— ॥ ४१ ॥

युध्यतेऽसौ रणे कर्णो दंशितः सर्वपार्थिवैः ॥ ४२ ॥

पश्यैतां द्रवतीं सेनां कर्णसायकपीडिताम् ।

कार्तिकेयेन विध्यस्तामासुरीं पृतनामिव ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 1178

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1178 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ रणभूमिमें वह कवचधारी कर्ण समस्त राजाओंके साथ अकेला ही युद्ध कर रहा है । देखो, कर्णके बाणोंसे पीड़ित हुई यह पाण्डव-सेना कार्तिकेयके द्वारा नष्ट की हुई असुरवाहिनीके समान भागी जा रही है ॥ ४२-४३ ॥

दृष्ट्वैतां निर्जितां सेनां रणे कर्णेन धीमता ।

अभियात्येष बीभत्सुः सूतपुत्रजिघांसया ॥ ४४ ॥

‘ बुद्धिमान् कर्णके द्वारा रणभूमिमें पराजित हुई इस सेनाको देखकर सूतपुत्रका वध करनेकी इच्छासे ये अर्जुन आगे बढ़े जा रहे हैं ॥ ४४ ॥

तद् यथा प्रेक्षमाणानां सूतपुत्रं महारथम् ।

न हन्यात् पाण्डवः संख्ये तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ४५ ॥

‘ अतः हमलोगोंके देखते - देखते युद्धमें पाण्डुपुत्र अर्जुन - जैसे भी महारथी सूतपुत्रको न मार सकें, वैसी नीतिसे काम लो ' ॥ ४५ ॥

ततो दौणिः कृपः शल्यो हार्दिक्यश्च महारथः ।

प्रत्युद्ययुस्तदा पार्थं सुतपुत्रपरीप्सया ॥ ४६ ॥

आयान्तं वीक्ष्य कौन्तेयं शक्रं दैत्यचमूमिव । तब दैत्य - सेनापर आक्रमण करनेवाले इन्द्रके समान अर्जुनको कौरव सेनाकी ओर आते देख अश्वत्थामा, कृपाचार्य शल्य और महारथी कृतवर्मा सूतपुत्रकी रक्षा करनेकी इच्छासे अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ४६३ ॥

बीभत्सुरपि राजेन्द्र पञ्चालैरभिसंवृतः ॥ ४७ ॥

प्रत्युद्ययौ तदा कर्णं यथा वृत्रं शतक्रतुः । राजेन्द्र! उस समय वृत्रासुरपर चढ़ाई करनेवाले इन्द्रके समान पांचालोंसे घिरे हुए अर्जुनने भी कर्णपर धावा किया ॥ ४७ ॥

धृतराष्ट्रउवाच संरब्धं फाल्गुनं दृष्ट्वा कालान्तकयमोपमम् ॥ ४८ ॥

कर्णो वैकर्तनः सूत प्रत्यपद्यत् किमुत्तरम् । धृतराष्ट्रने पूछा – सूत! काल, अन्तक और यमके समान क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको देखकर वैकर्तन कर्णने उन्हें किस प्रकार उत्तर दिया? ( कैसे उनका सामना किया) ॥ ४८३ || यो ह्यस्पर्धत पार्थेन नित्यमेव महारथः ॥ ४ ९ ॥ आशंसते च बीभत्सुं युद्धे जेतुं सुदारुणम् । महारथी कर्ण सदा ही अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता था और युद्धमें अत्यन्त भयंकर अर्जुनको पराजित करनेका विश्वास प्रकट करता था ॥ ४ ९ ३ ॥ स तु तं सहसा प्राप्तं नित्यमत्यन्तवैरिणम् ॥ ५० ॥

पृष्ठ 1179

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1179 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कर्णो वैकर्तनः सूत किमुत्तरमपद्यत । संजय! उस समय अपने सदाके अत्यन्त वैरी अर्जुनको सहसा सामने पाकर सूर्यपुत्र कर्णने उन्हें किस प्रकार उत्तर देनेका निश्चय किया? ॥ ५० ॥

संजय उवाच आयान्तं पाण्डवं दृष्ट्वा गजं प्रतिगजो यथा ॥ ५१ ॥

असम्भ्रान्तो रणे कर्णः प्रत्युदीयाद् धनंजयम् । संजयने कहा— राजन्! जैसे एक हाथीको आते देख दूसरा हाथी उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े, उसी प्रकार पाण्डुपुत्र धनंजयको आते देख कर्ण बिना किसी घबराहटके युद्धमें उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा ॥ ५१३ ॥

तमापतन्तं वेगेन वैकर्तनमजिह्मगैः ॥ ५२ ॥

छादयामास पार्थोऽथ कर्णस्तु विजयं शरैः । वेगसे आते हुए वैकर्तन कर्णको अर्जुनने अपने सीधे जानेवाले बाणोंसे आच्छादित कर दिया और कर्णने भी अर्जुनको अपने बाणोंसे ढक दिया ॥ ५२ ॥

स कर्णं शरजालेन च्छादयामास पाण्डवः ॥ ५३ ॥

ततः कर्णः सुसंरब्धः शरैस्त्रिभिरविध्यत । पाण्डुपुत्र अर्जुनने पुनः अपने बाणोंके जालसे कर्णको आच्छादित कर दिया । तब क्रोधमें भरे हुए कर्णने तीन बाणोंसे अर्जुनको बींध डाला ॥ ५३ ॥

तस्य तल्लाघवं पार्थो नामृष्यत महाबलः ॥ ५४ ॥

तस्मै बाणान् शिलाधौतान् प्रसन्नाग्रानजिह्मगान् ।

प्राहिणोत् सूतपुत्राय त्रिशतं शत्रुतापनः ॥ ५५ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली अर्जुन कर्णकी इस फुर्तीको न सह सके । उन्होंने सूतपुत्र कर्णको शिलापर तेज किये हुए स्वच्छ अग्रभागवाले तीन सौ बाण मारे ॥ ५४-५५ । |

विव्याध चैनं संरब्धो बाणेनैकेन वीर्यवान् ।

सव्ये भुजाग्रे बलवान् नाराचेन हसन्निव ॥ ५६ ॥

इसके सिवा कुपित हुए पराक्रमी एवं बलवान् अर्जुनने हँसते हुए - से एक नाराच नामक बाणके द्वारा कर्णकी बायीं भुजाके अग्रभागमें चोट पहुँचायी ॥ ५६ ॥

तस्य विद्धस्य बाणेन कराच्चापं पपात ह ।

पुनरादाय तच्चापं निमेषार्धान्महाबलः ॥ ५७ ॥

छादयामास बाणौघैः फाल्गुनं कृतहस्तवत् ।

पृष्ठ 1180

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1180 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उस बाणसे घायल हुए कर्णके हाथसे धनुष छूटकर गिर पड़ा । फिर आधे निमेषमें ही उस महाबली वीरने पुनः वह धनुष लेकर सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति बाणसमूहोंकी वर्षा करके अर्जुनको ढक दिया ॥ ५७३ ॥

शरवृष्टिं तु तां मुक्तां सूतपुत्रेण भारत ॥ ५८ ॥

व्यधमच्छरवर्षेण स्मयन्निव धनंजयः । भारत! सूतपुत्रद्वारा की हुई उस बाण- वर्षाको अर्जुनने मुसकराते हुए -से बाणोंकी वृष्टि करके नष्ट कर दिया || तौ परस्परमासाद्य शरवर्षेण पार्थिव ॥ ५ ९ ॥ छादयेतां महेष्वासौ कृतप्रतिकृतैषिणौ । राजन्! वे दोनों महाधनुर्धर वीर आघातका प्रतिघात करनेकी इच्छासे परस्पर बाणोंकी वर्षा करके एक- दूसरेको आच्छादित करने लगे ॥ ५ ९ ३ ॥ तदद्भुतं महद् युद्धं कर्णपाण्डवयोर्मृधे ॥ ६० ॥

क्रुद्धयोर्वासिताहेतोर्वन्ययोर्गजयोरिव । जैसे दो जंगली हाथी किसी हथिनीके लिये क्रोधपूर्वक लड़ रहे हों, उसी प्रकार उस युद्धस्थलमें कर्ण और अर्जुनका वह संग्राम महान् एवं अद्भुत था ॥ ततः पार्थो महेष्वासो दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ॥ ६१ ॥

मुष्टिदेशे धनुस्तस्य चिच्छेद त्वरयान्वितः । तदनन्तर महाधनुर्धर अर्जुनने कर्णका पराक्रम देखकर उसके धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे शीघ्रतापूर्वक काट दिया ॥ ६१३ ॥

अश्वांश्च चतुरो भल्लैरनयद् यमसादनम् ॥ ६२ ॥

सारथेश्च शिरः कायादहरच्छत्रुतापनः । साथ ही उसके चारों घोड़ोंको चार भल्लोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया । फिर शत्रुसंतापी अर्जुनने उसके सारथिका सिर धड़ से अलग कर दिया ॥ ६२३ ॥

अथैनं छिन्नधन्वानं हताश्वं हतसारथिम् ॥ ६३ ॥

विव्याध सायकैः पार्थश्चतुर्भिः पाण्डुनन्दनः । धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथिके मारे जानेपर कर्णको पाण्डुनन्दन अर्जुनने चार बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ६३३ ॥

हताश्वात् तु रथात् तूर्णमवप्लुत्य नरर्षभः ॥ ६४ ॥

आरुरोह रथं तूर्णं कृपस्य शरपीडितः । जिसके घोड़े मारे गये थे, उस रथसे तुरंत उतरकर बाणपीड़ित कर्ण शीघ्रतापूर्वक कृपाचार्यके रथपर चढ़ गया ॥ ६४३ ॥

स नुन्नोऽर्जुनबाणौघैराचितः शल्यको यथा ॥ ६५ ॥