04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1211–1220

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1211–1220

पृष्ठ 1211

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व्यायच्छतां तत्र तदा विरेजुः ॥ २२ ॥

राजन्! छत्र, चँवर, खड्ग, प्रज्वलित विशाल उल्काएँ तथा वहाँ युद्ध करते हुए वीरोंकी हिलती हुई सुवर्णमालाएँ उस समय प्रदीपोंके प्रकाशसे बड़ी शोभा पा रही थीं ॥ २२ ॥

शस्त्रप्रभाभिश्च विराजमानं

दीपप्रभाभिश्च तदा बलं तत् ।

प्रकाशितं चाभरणप्रभाभि- र्भृशं प्रकाशं नृपते बभूव ॥ २३ ॥

नरेश्वर! उस समय चमकीले अस्त्रों, प्रदीपों तथा आभूषणोंकी प्रभाओंसे प्रकाशित एवं सुशोभित आपकी सेना अत्यन्त प्रकाशसे उद्भासित होने लगी ॥ २३ ॥

पीतानि शस्त्राण्यसृगुक्षितानि वीरावधूतानि तनुच्छदानि । दीप्तां प्रभां प्राजनयन्त तत्र तपात्यये विद्युदिवान्तरिक्षे ॥ २४ ॥

पानीदार एवं खूनसे रँगे हुए शस्त्र तथा वीरोंद्वारा कँपाये हुए कवच वहाँ प्रदीपोंके प्रतिबिम्ब ग्रहण करके वर्षाकालके आकाशमें चमकनेवाली बिजलीकी भाँति अत्यन्त उज्ज्वल प्रभा बिखेर रहे थे ॥ २४ ॥

प्रकम्पितानामभिघातवेगै- रभिघ्नतां चापततां जवेन । वक्त्राण्यकाशन्त तदा नराणां वाय्वीरितानीव महाम्बुजानि ॥ २५ ॥

आघातके वेगसे कम्पित, आघात करनेवाले तथा वेगपूर्वक शत्रुकी ओर झपटनेवाले वीर मनुष्योंके मुख -मण्डल उस समय वायुसे हिलाये हुए बड़े-बड़े कमलोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ २५ ॥

महावने दारुमये प्रदीप्ते यथा प्रभा भास्करस्यापि नश्येत् । तथा तदाऽऽसीद् ध्वजिनी प्रदीप्ता महाभया भारत भीमरूपा ॥ २६ ॥

भरतनन्दन! जैसे सूखे काठके विशाल वनमें आग लग जानेपर वहाँ सूर्यकी भी प्रभा फीकी पड़ जाती है, उसी प्रकार उस समय अधिक प्रकाशसे प्रज्वलित होती हुई - सी आपकी भयानक सेना महान् भय उत्पन्न करनेवाली प्रतीत होती थी ॥ २६ ॥

तत् सम्प्रदीप्तं बलमस्मदीयं निशम्य पार्थास्त्वरितास्तथैव । सर्वेषु सैन्येषु पदातिसंघा-

पृष्ठ 1212

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नचोदयंस्तेऽपि चक्रुः प्रदीपान् ॥ २७ ॥

हमारी सेनाको मशालोंके प्रकाशसे प्रकाशित देख कुन्तीके पुत्रोंने भी तुरंत ही सारी सेनाके पैदल सैनिकोंको मशाल जलानेकी आज्ञा दी, अतः उन्होंने भी मशालें जला लीं ॥ २७ ॥

गजे गजे सप्त कृताः प्रदीपा रथे रथे चैव दश प्रदीपाः । द्वावश्वपृष्ठे परिपार्श्वतोऽन्ये ध्वजेषु चान्ये जघनेघु चान्ये ॥ २८ ॥

उनके एक- एक हाथीके लिये सात- सात और एक- एक रथके लिये दस - दस प्रदीपोंकी व्यवस्था की गयी । घोड़ोंके पृष्ठभागमें दो प्रदीप थे । अगल- बगलमें, ध्वजाओंके समीप तथा रथके पिछले भागोंमें अन्यान्य दीपकोंकी व्यवस्था की गयी थी ॥ २८ ॥

सेनासु सर्वासु च पार्श्वतोऽन्ये पश्चात् पुरस्ताच्च समन्ततश्च । मध्ये तथान्ये ज्वलिताग्निहस्ता व्यदीपयन् पाण्डुसुतस्य सेनाम् ॥ २ ९ ॥ सारी सेनाओंके पार्श्वभागमें, आगे, पीछे, बीचमें एवं चारों ओर भिन्न-भिन्न सैनिक चलती हुई मशालें हाथमें लेकर पाण्डुपुत्रकी सेनाको प्रकाशित करने लगे ॥ मध्ये तथान्ये ज्वलिताग्निहस्ताः सेनाद्वयेऽपि स्म नरा विचेरुः । सर्वेषु सैन्येषु पदातिसङ्घा विमिश्रिता हस्तिरथाश्ववृन्दैः ॥ ३० ॥

व्यदीपयंस्ते ध्वजिनीं प्रदीप्तां तथा बलं पाण्डवेयाभिगुप्तम् । दोनों ही सेनाओंके अन्यान्य पैदल सैनिक हाथोंमें प्रदीप धारण किये दोनों ही सेनाओंके भीतर विचरण करने लगे । सारी सेनाओंके पैदलसमूह हाथी, रथ और अश्वसमूहोंके साथ मिलकर आपकी सेनाको तथा पाण्डवोंद्वारा सुरक्षित वाहिनीको भी अत्यन्त प्रकाशित करने लगे ॥ ३० ॥

तेन प्रदीप्तेन तथा प्रदीप्तं बलं तवासीद् बलवद् बलेन ॥ ३१ ॥

भाः कुर्वता भानुमता ग्रहेण दिवाकरेणाग्निरिवाभिगुप्तः ।

पृष्ठ 1213

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जैसे किरणोंद्वारा सुशोभित और अपनी प्रभा बिखेरनेवाले सूर्यग्रहके द्वारा सुरक्षित अग्निदेव और भी प्रकाशित हो उठते हैं, उसी प्रकार प्रदीपोंकी प्रभासे अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले उस पाण्डव सैन्यके द्वारा आपकी सेनाका प्रकाश और भी बढ़ गया ॥ ३१३ ॥

तयोः प्रभाः पृथिवीमन्तरिक्षं सर्वा व्यतिक्रम्य दिशश्च वृद्धाः ॥ ३२ ॥

तेन प्रकाशेन भृशं प्रकाशं बभूव तेषां तव चैव सैन्यम् । उन दोनों सेनाओंका बढ़ा हुआ प्रकाश पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंको लाँघकर चारों ओर फैल गया । प्रदीपोंके उस प्रकाशसे आपकी तथा पाण्डवोंकी सेना भी अधिक प्रकाशित हो उठी थी ॥ ३२३ ॥

तेन प्रकाशेन दिवं गतेन सम्बोधिता देवगणाश्च राजन् ॥ ३३ ॥

गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः समागमन्नप्सरसश्च सर्वाः । राजन्! स्वर्गलोकतक फैले हुए उस प्रकाशसे उद्बोधित होकर देवता, गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धोंके समुदाय तथा सम्पूर्ण अप्सराएँ भी युद्ध देखनेके लिये वहाँ आ पहुँचीं ॥ ३३ ॥

तद् देवगन्धर्वसमाकुलं च यक्षासुरेन्द्राप्सरसां गणैश्च ॥ ३४ ॥

हतैश्च शूरैर्दिवमारुहद्भि- रायोधनं दिव्यकल्पं बभूव । देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, असुरेन्द्रों और अप्सराओंके समुदायसे भरा हुआ वह युद्धस्थल वहाँ मारे जाकर स्वर्गलोकपर आरूढ़ होनेवाले शूरवीरोंके द्वारा दिव्यलोक- सा जान पड़ता था ॥ ३४ ॥

रथाश्वनागाकुलदीपदीप्तं संरब्धयोधं हतविद्रुताश्वम् ॥ ३५ ॥

महद् बलं व्यूढरथाश्वनागं सुरासुरव्यूहसमं बभूव । रथ, घोड़े और हाथियोंसे परिपूर्ण, प्रदीपोंकी प्रभासे प्रकाशित, रोषमें भरे हुए योद्धाओंसे युक्त, घायल होकर भागनेवाले घोड़ोंसे उपलक्षित तथा व्यूहबद्ध रथ, घोड़े एवं हाथियोंसे सम्पन्न दोनों पक्षोंका वह महान् सैन्यसमूह देवताओं और असुरोंके सैन्यव्यूहके समान जान पड़ता था ॥ ३५३ ॥

पृष्ठ 1214

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तच्छक्तिसंघाकुलचण्डवातं महारथाभ्रं गजवाजिघोषम् ॥ ३६ ॥

शस्त्रौघवर्षं रुधिराम्बुधारं निशि प्रवृत्तं रणदुर्दिनं तत् । रातमें होनेवाला वह युद्ध मेघोंकी घटासे आच्छादित दिनके समान प्रतीत होता था । उस समय शक्तियोंका समूह प्रचण्डवायुके समान चल रहा था । विशाल रथ मेघसमूहके समान दिखायी देते थे । हाथियों और घोड़ोंके हींसने और चिग्घाड़नेका शब्द ही मानो मेघोंका गम्भीर गर्जन था । अस्त्रसमूहोंकी वर्षा ही जलकी वृष्टि थी तथा रक्तकी धारा ही जलधाराके समान जान पड़ती थी ॥ ३६३ ॥

तस्मिन् महाग्निप्रतिमो महात्मा संतापयन् पाण्डवान् विप्रमुख्यः ॥ ३७ ॥

गभस्तिभिर्मध्यगतो यथार्को वर्षात्यये तद्वदभून्नरेन्द्र ॥ ३८ ॥

नरेन्द्र! जैसे शरत्कालमें मध्याह्नका सूर्य अपनी प्रखर किरणोंसे भारी संताप देता है, उसी प्रकार उस युद्धस्थलमें महान् अग्निके समान तेजस्वी महामना विप्रवर द्रोणाचार्य पाण्डवोंके लिये संतापकारी हो रहे थे ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे दीपोद्योतने त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके अवसरपर प्रदीपोंका प्रकाशविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥

पृष्ठ 1215

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चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः दोनों सेनाओंका घमासान युद्ध और दुर्योधनका द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये सैनिकोंको आदेश संजय उवाच

प्रकाशिते तदा लोके रजसा तमसाऽऽवृते ।

समाजग्मुरथो वीराः परस्परवधैषिणः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! उस समय धूल और अन्धकारसे ढकी हुई रणभूमिमें इस प्रकार उजेला होनेपर एक- दूसरेके वधकी इच्छावाले वीर सैनिक आपसमें भिड़ गये ॥ १ ॥

ते समेत्य रणे राजन् शस्त्रप्रासासिधारिणः ।

परस्परमुदैक्षन्त परस्परकृतागसः ॥ २ ॥

महाराज! समरांगणमें परस्पर भिड़कर वे नाना प्रकारके शस्त्र, प्रास और खड्ग आदि धारण करनेवाले योद्धा, जो परस्पर अपराधी थे, एक- दूसरेकी ओर देखने लगे ॥ २ ॥

प्रदीपानां सहस्रैश्च दीप्यमानैः समन्ततः ।

रत्नाचितैः स्वर्णदण्डैर्गन्धतैलावसिञ्चितैः ॥ ३ ॥

चारों ओर हजारों मशालें जल रही थीं । उनके डंडे सोनेके बने हुए थे और उनमें रत्न जड़े हुए थे । उन मशालोंपर सुगन्धित तेल डाला जाता था ॥ ३ ॥

देवगन्धर्वदीपाद्यैः प्रभाभिरधिकोज्ज्वलैः ।

विरराज तदा भूमिर्ग्रहैर्द्यौरिव भारत ॥ ४ ॥

भारत! उन्हींमें देवताओं और गन्धर्वोंके भी दीप आदि जल रहे थे, जो अपनी विशेष प्रभाके कारण अधिक प्रकाशित हो रहे थे । उनके द्वारा उस समय रणभूमि नक्षत्रोंसे आकाशकी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥ ४ ॥

उल्काशतैः प्रज्वलितै रणभूमिर्व्यराजत ।

दह्यमानेव लोकानामभावे च वसुंधरा ॥ ५ ॥

सैकड़ों प्रज्वलित उल्काओं (मशालों) से वह रणभूमि ऐसी शोभा पा रही थी, मानो प्रलयकालमें यह सारी पृथ्वी दग्ध हो रही हो ॥ ५ ॥

व्यदीप्यन्त दिशः सर्वाः प्रदीपैस्तैः समन्ततः ।

वर्षाप्रदोषे खद्योतैर्वृता वृक्षा इवाबभुः ॥ ६ ॥

उन प्रदीपोंसे सब ओर सारी दिशाएँ ऐसी प्रदीप्त हो उठीं, मानो वर्षाके सायंकालमें जुगनुओंसे घिरे हुए वृक्ष जगमगा रहे हों ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1216

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असज्जन्त ततो वीरा वीरेष्वेव पृथक् पृथक् ।

नागा नागैः समाजग्मुस्तुरगा हयसादिभिः ॥ ७ ॥

उस समय वीरगण विपक्षी वीरोंके साथ पृथक् - पृथक् भिड़ गये । हाथी हाथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझने लगे ॥ ७ ॥

रथा रथवरैरेव समाजग्मुर्मुदा युताः ।

तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ८ ॥

चतुरङ्गस्य सैन्यस्य सम्पातश्च महानभूत् । इसी प्रकार रथी श्रेष्ठ रथियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करने लगे । उस भयंकर प्रदोषकालमें आपके पुत्रकी आज्ञासे वहाँ चतुरंगिणी सेनामें भारी मारकाट मच गयी ॥ ततोऽर्जुनो महाराज कौरवाणामनीकिनीम् ॥ ९ ॥

व्यधमत् त्वरया युक्तः क्षपयन् सर्वपार्थिवान् । महाराज! तदनन्तर अर्जुन बड़ी उतावलीके साथ समस्त राजाओंका संहार करते हुए कौरव - सेनाका विनाश करने लगे ॥ ९ ३ ॥ धृतराष्ट्रउवाच तस्मिन् प्रविष्टे संरब्धे मम पुत्रस्य वाहिनीम् ॥ १० ॥

अमृष्यमाणे दुर्धर्षे कथमासीन्मनो हि वः । धृतराष्ट्रने पूछा — संजय! क्रोध और अमर्षमें भरे हुए दुर्धर्ष वीर अर्जुन जब मेरे पुत्रकी सेनामें प्रविष्ट हुए, उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥ किमकुर्वत सैन्यानि प्रविष्टे परपीडने ॥ ११ ॥

दुर्योधनश्च किं कृत्यं प्राप्तकालममन्यत । शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले अर्जुनके प्रवेश करनेपर मेरी सेनाओंने क्या किया? तथा दुर्योधनने उस समयके अनुरूप कौन - सा कार्य उचित माना? ॥ ११३ ॥

के चैनं समरे वीरं प्रत्युद्ययुररिंदमाः ॥ १२ ॥

द्रोणं च के व्यरक्षन्त प्रविष्टे श्वेतवाहने । समरांगणमें शत्रुओंका दमन करनेवाले कौन- कौन से योद्धा वीर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े । श्वेतवाहन अर्जुनके कौरव सेनाके भीतर घुस आनेपर किन लोगोंने द्रोणाचार्यकी रक्षा की ॥ १२ ॥

केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं के च द्रोणस्य सव्यतः ॥ १३ ॥

के पृष्ठतश्चाप्यभवन् वीरा वीरान् विनिघ्नतः ।

के पुरस्तादगच्छन्त निघ्नन्तः शात्रवान् रणे ॥ १४ ॥

कौन - कौन - से योद्धा द्रोणाचार्यके रथके दाहिने पहियेकी रक्षा करते थे और कौन - कौन-से बायें पहियेकी? कौन- कौन - से वीर वीरोंका वध करनेवाले द्रोणाचार्यके पृष्ठभागके रक्षक

पृष्ठ 1217

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थे और रणमें शत्रुसैनिकोंका संहार करनेवाले कौन- कौन से योद्धा आचार्यके आगे - आगे चलते थे? ॥ १३-१४ ॥

यत् प्राविशन्महेष्वासः पञ्चालानपराजितः ।

नृत्यन्निव नरव्याघ्रो रथमार्गेषु वीर्यवान् ॥ १५ ॥

महाधनुर्धर, पराक्रमी एवं किसीसे पराजित न होनेवाले पुरुषसिंह द्रोणाचार्यने रथके मार्गोंपर नृत्य- सा करते हुए वहाँ पांचालोंकी सेनामें प्रवेश किया था ॥ १५ ॥

यो ददाह शरैर्द्रोणः पञ्चालानां रथव्रजान् ।

धूमकेतुरिव क्रुद्धः कथं मृत्युमुपेयिवान् ॥ १६ ॥

जिन आचार्य द्रोणने क्रोधमें भरे हुए अग्निदेवके समान अपने बाणोंकी ज्वालासे पांचाल महारथियोंके समुदायोंको जलाकर भस्म कर दिया था, वे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? ॥ १६ ॥

अव्यग्रानेव हि परान् कथयस्यपराजितान् ।

हृष्टानुदीर्णान् संग्रामे न तथा सूत मामकान् ॥ १७ ॥

सूत! तुम मेरे शत्रुओंको तो व्यग्रतारहित, अपराजित, हर्ष और उत्साहसे युक्त तथा संग्राममें वेगपूर्वक आगे बढ़नेवाले ही बता रहे हो; परंतु मेरे पुत्रोंकी ऐसी अवस्था नहीं बताते ॥ १७ ॥

हतांश्चैव विदीर्णांश्च विप्रकीर्णांश्च शंससि ।

रथिनो विरथांश्चैव कृतान् युद्धेषु मामकान् ॥ १८ ॥

सभी युद्धोंमें मेरे पक्षके रथियोंको तुम हताहत, छिन्न - भिन्न, तितर- बितर तथा रथहीन हुआ ही बता रहे हो ॥ १८ ॥

संजय उवाच

द्रोणस्य मतमाज्ञाय योद्धुकामस्य तां निशाम् ।

दुर्योधनो महाराज वश्यान् भ्रातॄनुवाच ह ॥ १ ९ ॥

कर्णं च वृषसेनं च मद्रराजं च कौरव ।

दुर्धर्षं दीर्घबाहुं च ये च तेषां पदानुगाः ॥ २० ॥

संजय कहते हैं— कुरुनन्दन महाराज! युद्धकी इच्छावाले द्रोणाचार्यका मत जानकर दुर्योधनने उस रातमें अपने वशवर्ती भाइयोंसे तथा कर्ण, वृषसेन, मद्रराज शल्य, दुर्धर्ष, - दीर्घबाहु तथा जो -जो उनके पीछे चलनेवाले थे, उन सबसे इस प्रकार कहा– ॥

द्रोणं यत्ताः पराक्रान्ताः सर्वे रक्षन्तु पृष्ठतः ।

हार्दिक्यो दक्षिणं चक्रं शल्यश्चैवोत्तरं तथा ॥ २१ ॥

'तुम सब लोग सावधान रहकर पराक्रमपूर्वक पीछे की ओरसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करो ।

कृतवर्मा उनके दाहिने पहियेकी और राजा शल्य बायें पहियेकी रक्षा करें ' ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1218

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त्रिगर्तानां च ये शूरा हतशिष्टा महारथाः ।

तांश्चैव पुरतः सर्वान् पुत्रस्ते समचोदयत् ॥ २२ ॥

राजन्! त्रिगर्तोंके जो शूरवीर महारथी मरनेसे शेष रह गये थे, उन सबको आपके पुत्रने द्रोणाचार्यके आगे - आगे चलनेकी आज्ञा देते हुए कहा— ॥ २२ ॥

आचार्यो हि सुसंयत्तो भृशं यत्ताश्च पाण्डवाः ।

तं रक्षत सुसंयत्ता निघ्नन्तं शात्रवान् रणे ॥ २३ ॥

‘ आचार्य पूर्णतः सावधान हैं, पाण्डव भी विजयके लिये विशेष यत्नशील एवं सावधान हैं। तुमलोग रणभूमिमें शत्रु- सैनिकोंका संहार करते हुए आचार्यकी पूरी सावधानीके साथ रक्षा करो ॥ २३ ॥

द्रोणो हि बलवान् युद्धे क्षिप्रहस्तः प्रतापवान् ।

निर्जयेत् त्रिदशान् युद्धे किमु पार्थान् ससोमकान् ॥ २४ ॥

क्योंकि द्रोणाचार्य बलवान्, प्रतापी और युद्धमें शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले हैं । वे संग्राममें देवताओंको भी परास्त कर सकते हैं; फिर कुन्तीके पुत्रों और सोमकोंकी तो बात ही क्या है? ॥ २४ ॥

ते यूयं सहिताः सर्वे भृशं यत्ता महारथाः ।

द्रोणं रक्षत पाञ्चालाद् धृष्टद्युम्नान्महारथात् ॥ २५ ॥

‘ इसलिये तुम सब महारथी एक साथ होकर पूर्णतः प्रयत्नशील रहते हुए पांचाल महारथी धृष्टद्युम्नसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करो ॥ २५ ॥

पाण्डवीयेषु सैन्येषु न तं पश्याम कञ्चन ।

यो योधयेद् रणे द्रोणं धृष्टद्युम्नादृते नृपः ॥ २६ ॥

‘ हम पाण्डवोंकी सेनाओंमें धृष्टद्युम्नके सिवा ऐसे किसी वीर नरेशको नहीं देखते, जो रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यके साथ युद्ध कर सके ॥ २६ ॥

तस्मात् सर्वात्मना मन्ये भारद्वाजस्य रक्षणम् ।

सुगुप्तः पाण्डवान् हन्यात् सृञ्जयांश्च ससोमकान् ॥ २७ ॥

‘ अतः मैं सब प्रकारसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करना ही इस समय आवश्यक कर्तव्य मानता हूँ । वे सुरक्षित रहें तो पाण्डवों, सृजयों और सोमकोंका भी संहार कर सकते हैं ॥

सृञ्जयेष्वथ सर्वेषु निहतेषु चमूमुखे ।

धृष्टद्युम्नं रणे द्रौणिर्हनिष्यति न संशयः ॥ २८ ॥

' युद्धके मुहानेपर सारे सृजयोंके मारे जानेपर अश्वत्थामा रणभूमिमें धृष्टद्युम्नको भी मार डालेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २८ ॥

तथार्जुनं च राधेयो हनिष्यति महारथः ।

भीमसेनमहं चापि युद्धे जेष्यामि दीक्षितः ॥ २९ ॥

शेषांश्च पाण्डवान् योधाः प्रसभं हीनतेजसः ।

पृष्ठ 1219

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‘ योद्धाओ! इसी प्रकार महारथी कर्ण अर्जुनका वध कर डालेगा तथा रणयज्ञकी दीक्षा लेकर युद्ध करनेवाला मैं भीमसेनको और तेजोहीन हुए दूसरे पाण्डवोंको भी बलपूर्वक जीत लूँगा ॥ २ ९ ३ ॥

सोऽयं मम जयो व्यक्तो दीर्घकालं भविष्यति ।

तस्माद् रक्षत संग्रामे द्रोणमेव महारथम् ॥ ३० ॥

‘ इस प्रकार अवश्य ही मेरी यह विजय चिरस्थायिनी होगी, अतः तुम सब लोग मिलकर संग्राममें महारथी द्रोणकी ही रक्षा करो ' ॥ ३० ॥

इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव ।

व्यादिदेश तथा सैन्यं तस्मिंस्तमसि दारुणे ॥ ३१ ॥

भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर आपके पुत्र दुर्योधनने उस भयंकर अन्धकारमें अपनी सेनाको युद्धके लिये आज्ञा दे दी ॥ ३१ ॥

ततः प्रववृते युद्धं रात्रौ भरतसत्तम ।

उभयोः सेनयोर्घोरं परस्परजिगीषया ॥ ३२ ॥

भरतसत्तम! फिर तो रात्रिके समय दोनों सेनाओंमें एक- दूसरेको जीतनेकी इच्छासे घोर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ३२ ॥

अर्जुनः कौरवं सैन्यमर्जुनं चापि कौरवाः ।

नानाशस्त्रसमावायैरन्योन्यं समपीडयन् ॥ ३३ ॥

अर्जुन कौरव - सेनापर और कौरव - सैनिक अर्जुनपर नाना प्रकारके शस्त्र- समूहोंकी वर्षा करते हुए एक- दूसरेको पीड़ा देने लगे ॥ ३३ ॥

द्रौणिः पाञ्चालराजं च भारद्वाजश्च संजयान् ।

छादयांचक्रतुः संख्ये शरैः संनतपर्वभिः ॥ ३४ ॥

अश्वत्थामाने पांचालराज द्रुपदको और द्रोणाचार्यने सृजयोंको युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ ३४ ॥

पाण्डुपाञ्चालसैन्यानां कौरवाणां च भारत ।

आसीन्निष्टानको घोरो निघ्नतामितरेतरम् ॥ ३५ ॥

भारत! एक ओरसे पाण्डव और पांचाल- सैनिकोंका और दूसरी ओरसे कौरव योद्धाओंका, जो एक- दूसरेपर गहरी चोट कर रहे थे, घोर आर्तनाद सुनायी पड़ता था ॥ ३५ ॥

नैवास्माभिस्तथा पूर्वैर्दृष्टपूर्वं तथाविधम् ।

श्रुतं वा यादृशं युद्धमासीद् रौद्रं भयानकम् ॥ ३६ ॥

हमने तथा पूर्ववर्ती लोगोंने भी वैसा रौद्र एवं भयानक युद्ध न तो पहले कभी देखा था और न सुना ही था, जैसा कि वह युद्ध हो रहा था ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 1220

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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥