04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1231–1240

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1231–1240

पृष्ठ 1231

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1231 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए घटोत्कचने युद्धस्थलमें कालाग्निके समान दस तेजस्वी बाणोंद्वारा अश्वत्थामाकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३० ॥

स तैरभ्यायतैर्विद्धो राक्षसेन महाबलः ॥ ३१ ॥

चचाल समरे द्रौणिर्वातनुन्न इव द्रुमः ।

स मोहमनुसम्प्राप्तो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ॥ ३२ ॥

राक्षसद्वारा चलाये हुए उन विशाल बाणोंसे घायल हो महाबली अश्वत्थामा समरांगणमें आँधीके हिलाये हुए वृक्षके समान काँपने लगा । वह ध्वजदण्डका सहारा ले मूर्च्छित हो गया ॥ ३१-३२ ॥

ततो हाहाकृतं सैन्यं तव सर्वं जनाधिप ।

हतं स्म मेनिरे सर्वे तावकास्तं विशाम्पते ॥ ३३ ॥

नरेश्वर! फिर तो आपकी सारी सेनामें हाहाकार मच गया । प्रजानाथ! आपके समस्त योद्धाओंने यह मान लिया कि अश्वत्थामा मारा गया ॥ ३३ ॥

तं तु दृष्ट्वा तथावस्थमश्वत्थामानमाहवे ।

पञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे ॥ ३४ ॥

रणभूमिमें अश्वत्थामाकी वैसी अवस्था देख पांचाल और सृजय योद्धा सिंहनाद करने लगे ॥ ३४ ॥

प्रतिलभ्य ततः संज्ञामश्वत्थामा महाबलः ।

धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः ॥ ३५ ॥

मुमोचाकर्णपूर्णेन धनुषा शरमुत्तमम् ।

यमदण्डोपमं घोरमुद्दिश्याशु घटोत्कचम् ॥ ३६ ॥

तदनन्तर सचेत हो महाबली शत्रुसूदन अश्वत्थामाने बायें हाथसे धनुषको दबाकर कानतक खींचे हुए धनुषसे घटोत्कचको लक्ष्य करके यमदण्डके समान एक भयंकर एवं उत्तम बाण शीघ्र छोड़ दिया ॥ ३५-३६ ॥

स भित्त्वा हृदयं तस्य राक्षसस्य शरोत्तमः ।

विवेश वसुधामुग्रः सपुङ्खः पृथिवीपते ॥ ३७ ॥

पृथ्वीपते! वह उत्तम एवं भयंकर बाण उस राक्षसकी छाती छेदकर पंखसहित पृथ्वीमें समा गया ॥

सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् ।

राक्षसेन्द्रः सुबलवान् द्रौणिना रणशालिना ॥ ३८ ॥

महाराज! युद्धमें शोभा पानेवाले अश्वत्थामाद्वारा अत्यन्त घायल हुआ महाबली राक्षसराज घटोत्कच रथके पिछले भागमें बैठ गया ॥ ३८ ॥

दृष्ट्वा विमूढं हैडिम्बं सारथिस्तु रणाजिरात् ।

द्रौणेः सकाशात् सम्भ्रान्तस्त्वपनिन्ये त्वरान्वितः ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 1232

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1232 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हिडिम्बाकुमारको मूर्च्छित देख उसका सारथि घबरा गया और तुरंत ही उसे समरांगणसे, विशेषतः अश्वत्थामाके निकटसे दूर हटा ले गया ॥ ३ ९ ॥

तथा तु समरे विद्ध्वा राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् ।

ननाद सुमहानादं द्रोणपुत्रो महारथः ॥ ४० ॥

इस प्रकार समरभूमिमें राक्षसराज घटोत्कचको घायल करके महारथी द्रोणपुत्रने बड़े जोरसे गर्जना की ॥

पूजितस्तव पुत्रैश्च सर्वयोधैश्च भारत ।

वपुषातिप्रजज्वाल मध्याह्न इव भास्करः ॥ ४१ ॥

भरतनन्दन! उस समय सम्पूर्ण योद्धाओं तथा आपके पुत्रोंद्वारा पूजित हुआ अश्वत्थामा अपने शरीरसे मध्याह्न - कालके सूर्यकी भाँति अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था ॥ ४१ ॥

भीमसेनं तु युध्यन्तं भारद्वाजरथं प्रति ।

स्वयं दुर्योधनो राजा प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः ॥ ४२ ॥

द्रोणाचार्यके रथकी ओर आते हुए युद्धपरायण भीमसेनको स्वयं राजा दुर्योधनने पैने बाणोंसे बींध डाला ॥

तं भीमसेनो दशभिः शरैर्विव्याध मारिष ।

दुर्योधनोऽपि विंशत्या शराणां प्रत्यविध्यत ॥ ४३ ॥

माननीय नरेश! तब भीमसेनने भी दुर्योधनको दस बाणोंसे घायल किया । फिर दुर्योधनने भी उन्हें बीस बाण मारे ॥ ४३ ॥

तौ सायकैरवच्छिन्नावदृश्येतां रणाजिरे ।

मेघजालसमाच्छन्नौ नभसीवेन्दुभास्करौ ॥ ४४ ॥

जैसे कभी- कभी चन्द्रमा और सूर्य आकाशमें मेघोंके समूहसे आच्छादित हुए देखे जाते हैं, उसी प्रकार समरांगणमें वे दोनों वीर सायकसमूहोंसे आच्छन्न दिखायी देते थे ॥ ४४ ॥

अथ दुर्योधनो राजा भीमं विव्याध पत्रिभिः ।

पञ्चभिर्भरतश्रेष्ठ तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ४५ ॥

भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्योधनने भीमसेनको पाँच बाणोंसे घायल कर दिया और कहा —'खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ ४५ ॥

तस्य भीमो धनुश्छित्त्वा ध्वजं च दशभिः शरैः ।

विव्याध कौरवश्रेष्ठं नवत्या नतपर्वणाम् ॥ ४६ ॥

तब भीमसेनने दस बाण मारकर उसके धनुष और ध्वज काट डाले और झुकी हुई गाँठवाले नब्बे बाणोंसे कौरवश्रेष्ठ दुर्योधनको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४६ ॥

ततो दुर्योधनः क्रुद्धो धनुरन्यन्महत्तरम् ।

गृहीत्वा भरतश्रेष्ठो भीमसेनं शितैः शरैः ॥ ४७ ॥

अपीडयद् रणमुखे पश्यतां सर्वधन्विनाम् ।

पृष्ठ 1233

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1233 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तत्पश्चात् भरतश्रेष्ठ दुर्योधनने कुपित हो दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर युद्धके मुहाने पर सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते- देखते पैने बाणोंद्वारा भीमसेनको पीड़ा देनी आरम्भ की ॥ ४७ ॥

तान् निहत्य शरान् भीमो दुर्योधनधनुश्च्युतान् ॥ ४८ ॥

कौरवं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् । दुर्योधनके धनुषसे छूटे हुए उन सभी बाणोंको नष्ट करके भीमसेनने उस कौरव-नरेशको पचीस बाण मारे ॥ ४८ ॥

दुर्योधनस्तु संक्रुद्धो भीमसेनस्य मारिष ॥ ४ ९ ॥ क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा दशभिः प्रत्यविध्यत । आर्य! इससे दुर्योधन अत्यन्त कुपित हो उठा और उसने एक क्षुरप्रसे भीमसेनका धनुष काटकर उन्हें दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ४ ९ ३ ॥ अथान्यद् धनुरादाय भीमसेनो महाबलः ॥ ५० ॥

विव्याध नृपतिं तूर्णं सप्तभिर्निशितैः शरैः । तब महाबली भीमसेनने दूसरा धनुष हाथमें लेकर तुरंत ही कौरवनरेशको सात तीखे बाणोंसे बींध डाला ॥ तदप्यस्य धनुः क्षिप्रं चिच्छेद लघुहस्तवत् ॥ ५१ ॥

द्वितीयं च तृतीयं च चतुर्थं पञ्चमं तथा ।

आत्तमात्तं महाराज भीमस्य धनुराच्छिनत् ॥ ५२ ॥

तव पुत्रो महाराज जितकाशी मदोत्कटः । दुर्योधनने शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले कुशल योद्धाकी भाँति भीमसेनके उस धनुषको भी शीघ्र ही काट दिया । महाराज! भीमसेनके हाथमें लिये हुए दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें धनुषको भी विजयसे उल्लसित होनेवाले आपके मदोन्मत्त पुत्रने काट डाला ॥ ५१-५२ ॥ स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः ॥ ५३ ॥

शक्तिं चिक्षेप समरे सर्वपारशवीं शुभाम् ।

मृत्योरिव स्वसारं हि दीप्तां वह्निशिखामिव ॥ ५४ ॥

इस प्रकार जब बारंबार धनुष काटे जाने लगे, तब भीमसेनने समरभूमिमें सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई एक सुन्दर शक्ति चलायी, जो मौतकी सगी बहिनके समान जान पड़ती थी । वह आगकी ज्वालाके समान प्रकाशित हो रही थी ॥ ५३-५४ ॥

सीमन्तमिव कुर्वन्तीं नभसोऽग्निसमप्रभाम् ।

अप्राप्तामेव तां शक्तिं त्रिधा चिच्छेद कौरवः ॥ ५५ ॥

पश्यतः सर्वलोकस्य भीमस्य च महात्मनः ।

पृष्ठ 1234

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1234 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आकाशमें सीमन्तकी रेखा-सी बनाती हुई अग्निके समान देदीप्यमान होनेवाली उस शक्तिके अपने पास आनेसे पहले ही कौरवनरेशने तीन टुकड़े कर दिये । सम्पूर्ण योद्धाओं तथा महामना भीमसेनके देखते - देखते यह कार्य हो गया ॥ ५५३ ॥

ततो भीमो महाराज गदां गुर्वीं महाप्रभाम् ॥ ५६ ॥

चिक्षेपाविध्य वेगेन दुर्योधनरथं प्रति । महाराज! तब भीमसेनने अपनी अत्यन्त तेजस्विनी गदाको बड़े वेगसे घुमाकर दुर्योधनके रथपर दे मारा ॥ ततः सा सहसा वाहांस्तव पुत्रस्य संयुगे ॥ ५७ ॥

सारथिं च गदा गुर्वी ममर्दास्य रथं पुनः । युद्धस्थलमें उस भारी गदाने सहसा आपके पुत्रके चारों घोड़ों, सारथि और रथका भी मर्दन कर दिया ॥ ५७३ ॥

पुत्रस्तु तव राजेन्द्र भीमाद् भीतः प्रणश्य च ॥ ५८ ॥

आरुरोह रथं चान्यं नन्दकस्य महात्मनः । राजेन्द्र! उस समय आपका पुत्र भीमसेनसे भयभीत हो पहले ही भागकर महामना नन्दकके रथपर जा बैठा था ॥ ५८३ ॥

ततो भीमो हतं मत्वा तव पुत्रं महारथम् ॥ ५ ९ ॥ सिंहनादं महच्चक्रे तर्जयन् निशि कौरवान् । उस समय भीमसेनने आपके महारथी पुत्रको मारा गया मानकर रातके समय कौरवोंको डाँट बताते हुए बड़े जोर- जोरसे सिंहनाद किया ॥ ५ ९ ३ ॥

तावकाः सैनिकाश्चापि मेनिरे निहतं नृपम् ।

ततोऽतिचुक्रुशुः सर्वे ते हाहेति समन्ततः ॥ ६० ॥

आपके सैनिकोंने भी राजा दुर्योधनको मरा हुआ ही मान लिया था; अतः वे सब ओर जोर - जोरसे हाहाकार करने लगे ॥ ६० ॥

तेषां तु निनदं श्रुत्वा त्रस्तानां सर्वयोधिनाम् ।

भीमसेनस्य नादं च श्रुत्वा राजन् महात्मनः ॥ ६१ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा सुयोधनम् ।

अभ्यवर्तत वेगेन यत्र पार्थो वृकोदरः ॥ ६२ ॥

राजन्! उन भयभीत हुए सम्पूर्ण योद्धाओंका आर्तनाद तथा महामनस्वी भीमसेनकी गर्जना सुनकर दुर्योधनको मरा हुआ मान राजा युधिष्ठिर बड़े वेगसे उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ कुन्तीकुमार भीमसेन दहाड़ रहे थे ॥ ६१-६२ ॥

पञ्चालाः केकया मत्स्याः सृञ्जयाश्च विशाम्पते ।

सर्वोद्योगेनाभिजग्मुद्रणमेव युयुत्सया ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1235

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1235 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रजानाथ! फिर तो पांचाल, मत्स्य, केकय और संजय योद्धा युद्धकी इच्छासे पूर्ण उद्योग करके द्रोणाचार्यपर ही टूट पड़े ॥ ६३ ॥

तत्रासीत् सुमहद् युद्धं द्रोणस्याथ परैः सह ।

घोरे तमसि मग्नानां निघ्नतामितरेतरम् ॥ ६४ ॥

वहाँ शत्रुओंके साथ द्रोणाचार्यका बड़ा भारी संग्राम हुआ । सब लोग घोर अन्धकारमें डूबकर एक- दूसरेपर घातक प्रहार कर रहे थे ॥ ६४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे दुर्योधनापयाने षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें दुर्योधनका पलायनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६६ ॥

पृष्ठ 1236

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1236 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः कर्णके द्वारा सहदेवकी पराजय, शल्यके द्वारा विराटके भाई शतानीकका वध और विराटकी पराजय तथा अर्जुनसे पराजित होकर अलम्बुषका पलायन संजय उवाच

सहदेवमथायान्तं द्रोणप्रेप्सुं विशाम्पते ।

कर्णो वैकर्तनो युद्धे वारयामास भारत ॥ १ ॥

संजय कहते हैं -प्रजानाथ! भरतनन्दन! द्रोणाचार्यकी लक्ष्य करके आते हुए सहदेवको युद्धस्थलमें वैकर्तन कर्णने रोका ॥ १ ॥

सहदेवस्तु राधेयं विद्ध्वा नवभिराशुगैः ।

पुनर्विव्याध दशभिर्विशिखैर्नतपर्वभिः ॥ २ ॥

सहदेवने राधापुत्र कर्णको नौ बाणोंसे बींधकर झुकी हुई गाँठवाले दस बाणोंद्वारा पुनः घायल कर दिया ॥

तं कर्णः प्रतिविव्याध शतेन नतपर्वणाम् ।

सज्यं चास्य धनुः शीघ्रं चिच्छेद लघुहस्तवत् ॥ ३ ॥

कर्णने बदलेमें झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण मारे और शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले वीर योद्धाकी भाँति उसने उनके प्रत्यंचासहित धनुषको भी शीघ्र ही काट दिया ॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय माद्रीपुत्रः प्रतापवान् ।

कर्णं विव्याध विंशत्या तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४ ॥

तदनन्तर प्रतापी माद्रीकुमार सहदेवने दूसरा धनुष हाथमें लेकर कर्णको बीस बाणोंसे घायल कर दिया । वह अद्भुत- सा कार्य हुआ ॥ ४ ॥

तस्य कर्णो हयान् हत्वा शरैः संनतपर्वभिः ।

सारथिं चास्य भल्लेन द्रुतं निन्ये यमक्षयम् ॥ ५ ॥

तब कर्णने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे सहदेवके घोड़ोंको मारकर एक भल्लका प्रहार करके उनके सारथिको भी शीघ्र ही यमलोक पहुँचा दिया ॥ ५ ॥

विरथः सहदेवस्तु खड्गं चर्म समाददे ।

तदप्यस्य शरैः कर्णो व्यधमत् प्रहसन्निव ॥ ६ ॥

रथहीन हो जानेपर सहदेवने ढाल और तलवार हाथमें ले ली; परंतु कर्णने हँसते हुए -से बाण मारकर उनकी उस तलवारके भी टुकड़े -टुकड़े कर डाले ॥ ६ ॥

अथ गुर्वीं महाघोरां हेमचित्रां महागदाम् ।

पृष्ठ 1237

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1237 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रेषयामास संक्रुद्धो वैकर्तनरथं प्रति ॥ ७ ॥

तब सहदेवने अत्यन्त कुपित होकर एक सुवर्णजटित अत्यन्त भयंकर विशाल गदा सूर्यपुत्र कर्णके रथपर दे मारी ॥

तामापतन्तीं सहसा सहदेवप्रचोदिताम् ।

व्यष्टम्भयच्छरैः कर्णो भूमौ चैनामपातयत् ॥ ८ ॥

सहदेवके द्वारा चलायी हुई उस गदाको सहसा अपने ऊपर आती देख कर्णने बहुत- से बाणोंद्वारा उसे स्तम्भित कर दिया और पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ८ ॥

गदां विनिहतां दृष्ट्वा सहदेवस्त्वरान्वितः ।

शक्तिं चिक्षेप कर्णाय तामप्यस्याच्छिनच्छरैः ॥ ९ ॥

अपनी गदाको असफल होकर गिरी हुई देख सहदेवने बड़ी उतावलीके साथ कर्णपर शक्ति चलायी; किंतु उसने बाणोंद्वारा उस शक्तिको भी काट डाला ॥ ९ ॥

ससम्भ्रमं ततस्तूर्णमवप्लुत्य रथोत्तमात् ।

सहदेवो महाराज दृष्ट्वा कर्णं व्यवस्थितम् ॥ १० ॥

रथचक्रं प्रगृह्याजी मुमोचाधिरथिं प्रति । महाराज! तब सहदेव अपने उस उत्तम रथसे शीघ्र ही वेगपूर्वक कूद पड़े और युद्धस्थलमें अधिरथपुत्र कर्णको सामने खड़ा देख रथका एक चक्का लेकर उसके ऊपर चला दिया ॥ १०३ ॥

तदापतद् वै सहसा कालचक्रमिवोद्यतम् ॥ ११ ॥

शरैरनेकसाहस्रैराच्छिनत् सूतनन्दनः । उठे हुए कालचक्रके समान सहसा अपने ऊपर गिरते हुए उस रथचक्रको सूतनन्दन कर्णने कई हजार बाणोंसे काट गिराया ॥ ११ ॥

तस्मिंस्तु निहते चक्रे सूतजेन महात्मना ॥ १२ ॥

ईषादण्डकयोक्त्रांश्च युगानि विविधानि च ।

हस्त्यङ्गानि तथाश्वांश्च मृतांश्च पुरुषान् बहुन् ॥ १३ ॥

चिक्षेप कर्णमुद्दिश्य कर्णस्तान् व्यधमच्छरैः । महामनस्वी सूतपुत्र कर्णके द्वारा उस रथचक्रके नष्ट कर दिये जानेपर ईषादण्ड, जोते, नाना प्रकारके जूए, हाथीके कटे हुए अंग, मरे घोड़े और बहुत-सी मृत मनुष्योंकी लाशें कर्णको लक्ष्य करके चलायीं; परंतु कर्णने अपने बाणोंद्वारा उन सबकी धज्जियाँ उड़ा दीं ॥ स निरायुधमात्मानं ज्ञात्वा माद्रवतीसुतः ॥ १४ ॥

वार्यमाणस्तु विशिखैः सहदेवो रणं जहौ । तत्पश्चात् माद्रीकुमार सहदेवने अपने - आपको आयुधोंसे रहित समझकर कर्णके बाणोंसे अवरुद्ध हो उस रणभूमिको त्याग दिया ॥ १४३ ॥

तमभिद्रुत्य राधेयो मुहूर्ताद् भरतर्षभ ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1238

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1238 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अब्रवीत् प्रहसन् वाक्यं सहदेवं विशाम्पते । भरतश्रेष्ठ! प्रजानाथ! तदनन्तर राधापुत्र कर्णने दो घड़ीतक सहदेवका पीछा करके उनसे हँसते हुए इस प्रकार कहा- ॥ १५३ ॥

मा युध्यस्व रणेऽधीर विशिष्टै रथिभिः सह ॥ १६ ॥

सदृशैर्युध्य माद्रेय वचो मे मा विशङ्किथाः । ‘ओ अधीर बालक! तू युद्धस्थलमें विशिष्ट रथियोंके साथ संग्राम न करना । माद्रीकुमार! अपने समान योद्धाओंके साथ युद्ध किया कर। मेरी इस बातपर संदेह न करना' ॥ १६ ॥

अथैनं धनुषोऽग्रेण तुदन् भूयोऽब्रवीद् वचः ॥ १७ ॥

एषोऽर्जुनो रणे तूर्ण युध्यते कुरुभिः सह ।

तत्र गच्छस्व माद्रेय गृहं वा यदि मन्यसे ॥ १८ ॥

तदनन्तर धनुषकी नोकसे उन्हें पीड़ा देते हुए कर्णने पुनः इस प्रकार कहा — ' माद्रीपुत्र! ये अर्जुन कौरवोंके साथ रणभूमिमें शीघ्रतापूर्वक युद्ध कर रहे हैं । तू उन्हींके पास चला जा अथवा तेरा मन हो तो घरको लौट जा ' ॥

एवमुक्त्वा तु तं कर्णो रथेन रथिनां वरः ।

प्रायात् पाञ्चालपाण्डूनां सैन्यानि प्रदहन्निव ॥ १ ९ ॥

सहदेवसे ऐसा कहकर रथियोंमें श्रेष्ठ कर्ण पांचालों और पाण्डवोंकी सेनाओंको दग्ध करता हुआ - सा रथके द्वारा उनकी ओर वेगपूर्वक चल दिया ॥ १ ९ ॥

वधं प्राप्तं तु माद्रेयं नावधीत् समरेऽरिहा ।

कुन्त्याः स्मृत्वा वचो राजन् सत्यसंधो महायशाः ॥ २० ॥

यद्यपि सहदेव उस समय वध करने योग्य अवस्थामें पहुँच गये थे, तो भी कुन्तीको दिये हुए वचनको याद करके समरांगणमें शत्रुसूदन सत्यप्रतिज्ञ एवं महायशस्वी कर्णने उनका वध नहीं किया ॥ २० ॥

सहदेवस्ततो राजन् विमनाः शरपीडितः ।

कर्णवाक्छरतप्तश्च जीवितान्निरविद्यत ॥ २१ ॥

राजन्! तदनन्तर सहदेव कर्णके बाणोंसे पीड़ित और उसके वचनरूपी बाणोंसे संतप्त एवं खिन्नचित्त हो अपने जीवनसे विरक्त हो गये ॥ २१ ॥

आरुरोह रथं चापि पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ।

जनमेजयस्य समरे त्वरायुक्तो महारथः ॥ २२ ॥

फिर वे महारथी सहदेव बड़ी उतावलीके साथ महामना पांचालराजकुमार जनमेजयके रथपर आरूढ़ हो गये ॥

विराटं सहसेनं तु द्रोणं वै द्रुतमागतम् ।

मद्रराजः शरौघेण च्छादयामास धन्विनम् ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1239

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1239 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्रोणाचार्यपर वेगपूर्वक आक्रमण करनेवाले सेनासहित धनुर्धर राजा विराटको मद्रराज शल्यने अपने बाणसमूहोंसे आच्छादित कर दिया ॥ २३ ॥

तयोः समभवद् युद्धं समरे दृढधन्विनोः ।

यादृशं ह्यभवद् राजन् जम्भवासवयोः पुरा ॥ २४ ॥

राजन्! फिर तो समरांगणमें उन दोनों सुदृढ़ धनुर्धर योद्धाओंमें वैसा ही घोर युद्ध होने लगा, जैसा कि पूर्वकालमें इन्द्र और जम्भासुरमें हुआ था ॥ २४ ॥

मद्रराजो महाराज विराटं वाहिनीपतिम् ।

आजघ्ने त्वरितस्तूर्णं शतेन नतपर्वणाम् ॥ २५ ॥

महाराज! मद्रराज शल्यने सेनापति राजा विराटको बड़ी उतावलीके साथ झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण मारकर तुरंत घायल कर दिया ॥ २५ ॥

प्रतिविव्याध तं राजन् नवभिर्निशितैः शरैः ।

पुनश्चैनं त्रिसप्तत्या भूयश्चैव शतेन तु ॥ २६ ॥

राजन्! तब विराटने मद्रराजको पहले नौ, फिर तिहत्तर और पुनः सौ तीखे बाणोंसे घायल करके बदला चुकाया ॥

तस्य मद्राधिपो हत्वा चतुरो रथवाजिनः ।

सूतं ध्वजं च समरे शराभ्यां संन्यपातयत् ॥ २७ ॥

तदनन्तर मद्रराजने विराटके रथके चारों घोड़ोंको मारकर दो बाणोंसे समरांगणमें सारथि और ध्वजको भी काट गिराया ॥ २७ ॥

हताश्वात् तु रथात् तूर्णमवप्लुत्य महारथः ।

तस्थौ विस्फारयंश्चापं विमुञ्चंश्च शिताञ्छरान् ॥ २८ ॥

तब उस अश्वहीन रथसे तुरंत ही कूदकर महारथी राजा विराट धनुषकी टंकार करते और तीखे बाणोंको छोड़ते हुए भूमिपर खड़े हो गये ॥ २८ ॥

शतानीकस्ततो दृष्ट्वा भ्रातरं हतवाहनम् ।

रथेनाभ्यपतत् तूर्णं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ २९ ॥

तत्पश्चात् शतानीक अपने भाईके वाहनको नष्ट हुआ देख सब लोगोंके देखते - देखते शीघ्र ही रथके द्वारा उनके पास आ पहुँचे ॥ २९ ॥

शतानीकमथायान्तं मद्रराजो महामृधे ।

विशिखैर्बहुभिर्विद्ध्वा ततो निन्ये यमक्षयम् ॥ ३० ॥

उस महासमरमें वहाँ आते हुए शतानीकको बहुत- से बाणोंद्वारा घायल करके मद्रराज शल्यने उन्हें यमलोक पहुँचा दिया ॥ ३० ॥

तस्मिंस्तु निहते वीरे विराटो रथसत्तमः ।

आरुरोह रथं तूर्णं तमेव ध्वजमालिनम् ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1240

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1240 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वीर शतानीकके मारे जानेपर रथियोंमें श्रेष्ठ विराट तुरंत ही ध्वज-मालासे विभूषित उसी रथपर आरूढ़ हो गये ॥

ततो विस्फार्य नयने क्रोधाद् द्विगुणविक्रमः ।

मद्रराजरथं तूर्णं छादयामास पत्रिभिः ॥ ३२ ॥

तब क्रोधसे आँखें फाड़कर दूना पराक्रम दिखाते हुए विराटने अपने बाणोंद्वारा मद्रराजके रथको शीघ्र ही आच्छादित कर दिया ॥ ३२ ॥

ततो मद्राधिपः क्रुद्धः शरेणानतपर्वणा ।

आजघानोरसि दृढं विराटं वाहिनीपतिम् ॥ ३३ ॥

इससे कुपित हुए मद्रराज शल्यने झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे सेनापति विराटकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥

सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् ।

कश्मलं चाविशत् तीव्रं विराटो भरतर्षभ ॥ ३४ ॥

महाराज! भरतभूषण! राज विराट अत्यन्त घायल होकर रथके पिछले भागमें धम्म - से बैठ गये और उन्हें तीव्र मूर्च्छाने दबा लिया ॥ ३४ ॥

सारथिस्तमपोवाह समरे शरविक्षतम् ।

ततः सा महती सेना प्राद्रवन्निशि भारत ॥ ३५ ॥

वध्यमाना शरशतैः शल्येनाहवशोभिना । भरतनन्दन! समरांगणमें बाणोंसे क्षत- विक्षत हुए राजा विराटको उनका सारथि दूर हटा ले गया । तब संग्राममें शोभा पानेवाले शल्यके सैकड़ों सायकोंसे पीड़ित हुई वह विशाल सेना उस रात्रिके समय भाग खड़ी हुई ॥ ३५३ ॥

तां दृष्ट्वा विद्रुतां सेनां वासुदेवधनंजयौ ॥ ३६ ॥

प्रयातौ तत्र राजेन्द्र यत्र शल्यो व्यवस्थितः । राजेन्द्र! उस सेनाको भागती देख श्रीकृष्ण और अर्जुन उसी ओर चल दिये, जहाँ राजा शल्य खड़े थे ॥ तौ तु प्रत्युद्ययौ राजन् राक्षसेन्द्रो ह्यलम्बुषः ॥ ३७ ॥

अष्टचक्रसमायुक्तमास्थाय प्रवरं रथम् । राजन्! उस समय राक्षसराज अलम्बुष आठ पहियोंसे युक्त श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो उन दोनोंका सामना करनेके लिये आगे बढ़ आया ॥ ३७३ ॥

तुरङ्गममुखैर्युक्तं पिशाचैर्घोरदर्शनैः ॥ ३८ ॥

लोहितार्द्रपताकं तं रक्तमाल्यविभूषितम् ।

कार्ष्णायसमयं घोरमृक्षचर्मसमावृतम् ॥ ३ ९ ॥

उसके उस रथमें घोड़ोंके समान मुखवाले भयंकर पिशाच जुते हुए थे । उसपर लाल रंगकी आर्द्र पताका फहरा रही थी । उस रथको लाल रंगके फूलोंकी मालासे सजाया गया