04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1261–1270
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1261–1270
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वहाँ आते हुए महाधनुर्धर युद्धदुर्मद सात्यकिको राधापुत्र कर्णने सीधे जानेवाले दस बाणोंसे बींध डाला ॥
तं सात्यकिर्महाराज विव्याध दशभिः शरैः ।
पश्यतां सर्ववीराणां मा गास्तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ३१ ॥
महाराज! तब सात्यकिने भी समस्त वीरोंके देखते -देखते कर्णको दस बाणोंसे घायल कर दिया और कहा— ' खड़े रहो, भाग न जाना' ॥ ३१ ॥
स सात्यकेस्तु बलिनः कर्णस्य च महात्मनः ।
आसीत् समागमो राजन् बलिवासवयोरिव ॥ ३२ ॥
राजन्! उस समय बलवान् सात्यकि और महामनस्वी कर्णका वह संग्राम राजा बलि और इन्द्रके युद्ध- सा प्रतीत होता था ॥ ३२ ॥
त्रासयन् रथघोषेण क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः ।
राजीवलोचनं कर्णं सात्यकिः प्रत्यविध्यत ॥ ३३ ॥
अपने रथकी घर्घराहटसे क्षत्रियोंको भयभीत करते हुए क्षत्रियशिरोमणि सात्यकिने कमललोचन कर्णको अच्छी तरह घायल कर दिया ॥ ३३ ॥
कम्पयन्निव घोषेण धनुषो वसुधां बली ।
सूतपुत्रो महाराज सात्यकिं प्रत्ययोधयत् ॥ ३४ ॥
महाराज! बलवान् सूतपुत्र कर्ण भी अपने धनुषकी टंकारसे पृथ्वीको कम्पित करता हुआ - सा सात्यकिके साथ युद्ध करने लगा ॥ ३४ ॥
विपाठकर्णिनाराचैर्वत्सदन्तैः क्षुरैरपि ।
कर्णः शरशतैश्चापि शैनेयं प्रत्यविध्यत ॥ ३५ ॥
कर्णने शिनिपौत्र सात्यकिको विपाठ, कर्णी, नाराच, वत्सदन्त, क्षुर तथा सैकड़ों बाणों से क्षत - विक्षत कर दिया ॥
तथैव युद्ध्यमानोऽपि वृष्णीनां प्रवरो युधि ।
अभ्यवर्षच्छरैः कर्णं तद् युद्धमभवत् समम् ॥ ३६ ॥
इसी प्रकार रणभूमिमें वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर सात्यकि भी युद्ध-तत्पर हो कर्णपर
बाणोंकी वर्षा करने लगे । उन दोनोंका वह युद्ध समानरूपसे चलने लगा ॥
तावकाश्च महाराज कर्णपुत्रश्च दंशितः ।
सात्यकिं विव्यधुस्तूर्णं समन्तान्निशितैः शरैः ॥ ३७ ॥
महाराज! आपके अन्य योद्धा तथा कर्णका पुत्र कवचधारी वृषसेन – ये सब - के - सब चारों ओरसे तीखे बाणोंद्वारा सात्यकिको बींधने लगे ॥ ३७ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां कर्णस्य वा विभो ।
अविद्ध्यत् सात्यकिः क्रुद्धो वृषसेनं स्तनान्तरे ॥ ३८ ॥
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प्रभो! इससे कुपित हुए सात्यकिने उन सब योद्धाओं तथा कर्णके अस्त्रोंका अस्त्रोंद्वारा निवारण करके वृषसेनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३८ ॥
तेन बाणेन निर्विद्धो वृषसेनो विशाम्पते ।
न्यपतत् स रथे मूढो धनुरुत्सृज्य वीर्यवान् ॥ ३ ९ ॥
प्रजानाथ! सात्यकिके बाणसे घायल हो बलवान् वृषसेन धनुष छोड़कर मूर्च्छित हो रथपर गिर पड़ा ॥ ३ ९ ॥
ततः कर्णो हतं मत्वा वृषसेनं महारथम् ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तः सात्यकिं प्रत्यपीडयत् ॥ ४० ॥
तब महारथी वृषसेनको मारा गया मानकर कर्ण पुत्रशोकसे संतप्त हो सात्यकिको पीड़ा देने लगा ॥ ४० ॥
पीड्यमानस्तु कर्णेन युयुधानो महारथः ।
विव्याध बहुभिः कर्णं त्वरमाणः पुनः पुनः ॥ ४१ ॥
कर्णसे पीड़ित होते हुए महारथी युयुधान बड़ी उतावलीके साथ कर्णको अपने बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बारंबार बींधने लगे ॥ ४१ ॥
स कर्णं दशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं च सप्तभिः ।
स हस्तावापधनुषी तयोश्चिच्छेद सात्वतः ॥ ४२ ॥
सात्वतवंशी सात्यकिने कर्णको दस और वृषसेनको सात बाणोंसे घायल करके उन दोनोंके दस्ताने और धनुष काट दिये ॥ ४२ ॥
तावन्ये धनुषी सज्ये कृत्वा शत्रुभयंकरे ।
युयुधानमविध्येतां समन्तान्निशितैः शरैः ॥ ४३ ॥
तब उन दोनोंने दूसरे शत्रु- भयंकर धनुषोंपर प्रत्यंचा चढ़ाकर सब ओरसे तीखे बाणोंद्वारा युयुधानको बींधना आरम्भ किया ॥ ४३ ॥
वर्तमाने तु संग्रामे तस्मिन् वीरवरक्षये ।
अतीव शुश्रुवे राजन् गाण्डीवस्य महास्वनः ॥ ४४ ॥
राजन्! जब बड़े - बड़े वीरोंका विनाश करनेवाला वह संग्राम चल रहा था, उसी समय वहाँ गाण्डीव धनुषकी गम्भीर टंकार - ध्वनि बड़े जोर - जोरसे सुनायी देने लगी ॥
श्रुत्वा तु रथनिर्घोषं गाण्डीवस्य च निःस्वनम् ।
सूतपुत्रोऽब्रवीद् राजन् दुर्योधनमिदं वचः ॥ ४५ ॥
नरेश्वर! अर्जुनके रथका गम्भीर घोष और गाण्डीव धनुषकी टंकार सुनकर सूतपुत्र कर्णने दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ४५ ॥
एष सर्वां चमूं हत्वा मुख्यांश्चैव नरर्षभान् ।
पौरवांश्च महेष्वासो विक्षिपन्नुत्तमं धनुः ॥ ४६ ॥
पार्थो विजयते तत्र गाण्डीवनिनदो महान् ।
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श्रूयते रथघोषश्च वासवस्येव नर्दतः ॥ ४७ ॥
‘ राजन्! ये महाधनुर्धर कुन्तीकुमार अर्जुन हमारी सारी सेनाका संहार और मुख्य -मुख्य कुरुवंशी श्रेष्ठ पुरुषोंका वध करके अपने उत्तम धनुषकी टंकार करते हुए विजयी हो रहे हैं । उधर गाण्डीव धनुषका महान् घोष तथा गरजते हुए मेघके समान पार्थके रथकी घोर घर्घराहट सुनायी दे रही है ॥ ४६-४७ ॥
करोति पाण्डवो व्यक्तं कर्मोंपयिकमात्मनः ।
एषा विदार्यते राजन् बहुधा भारती चमूः ॥ ४८ ॥
‘ इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि अर्जुन वहाँ अपने अनुरूप पुरुषार्थ कर रहे हैं । राजन्! भरतवंशियोंकी इस सेनाको वे अनेक भागोंमें विदीर्ण ( विभक्त ) किये देते हैं ॥ ४८ ॥
विप्रकीर्णान्यनेकानि न हि तिष्ठन्ति कर्हिचित् ।
वातेनेव समुद्धूतमभ्रजालं विदीर्यते ॥ ४ ९ ॥
सव्यसाचिनमासाद्य भिन्ना नौरिव सागरे । 'उनके द्वारा तितर - बितर किये हुए हमारे बहुत- से सैन्यदल कहीं भी ठहर नहीं पाते हैं । जैसे हवा घिरे हुए बादलोंको छिन्न - भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनके सामने पड़कर अपनी सारी सेना अनेक टुकड़ियोंमें बँटकर भागने लगी है । उसकी अवस्था समुद्रमें फटी हुई नौकाके समान हो रही है ॥ ४ ९ ॥ द्रवतां योधमुख्यानां गाण्डीवप्रेषितैः शरैः ॥ ५० ॥
विद्धानां शतशो राजन् श्रूयते निःस्वनो महान् । ' राजन्! गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा बिद्ध होकर भागते हुए सैकड़ों मुख्य-मुख्य योद्धाओंका वह महान् आर्तनाद सुनायी पड़ता है ॥ ५० ॥
शृणु दुन्दुभिनिर्घोषमर्जुनस्य रथं प्रति ॥ ५१ ॥
निशीथे राजशार्दूल स्तनयित्नोरिवाम्बरे । ' नृपश्रेष्ठ! इस रात्रिके समय आकाशमें मेघकी गर्जनाके समान जो अर्जुनके रथके समीप नगाड़ोंकी ध्वनि हो रही है, उसे सुनो ॥ ५१ ॥
हाहाकाररवांश्चैव सिंहनादांश्च पुष्कलान् ॥ ५२ ॥
शृणु शब्दान् बहुविधानर्जुनस्य रथं प्रति । ‘ अर्जुनके रथके आसपास जो भाँति- भाँतिके हाहाकार, बारंबार सिंहनाद तथा अनेक प्रकारके और भी बहुत- से शब्द हो रहे हैं, उनको भी श्रवण करो ॥ अयं मध्ये स्थितोऽस्माकं सात्यकिः सात्वतां वरः ॥ ५३ ॥
इह चेल्लभ्यते लक्ष्यं कृत्स्नान् जेष्यामहे परान् । ‘ ये सात्वतशिरोमणि सात्यकि इस समय हमलोगोंके बीचमें खड़े हैं । यदि यहाँ इन्हें हम अपने बाणोंका निशाना बना सकें तो निश्चय ही सम्पूर्ण शत्रुओंपर विजय पा सकेंगे ॥ ५३३ ||
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एष पाञ्चालराजस्य पुत्रो द्रोणेन संगतः ॥ ५४ ॥
सर्वतः संवृतो योधैः शूरैश्च रथसत्तमैः । ' ये पांचालराज द्रुपदके पुत्र धृष्टद्युम्न, जो आचार्य द्रोणके साथ जूझ रहे हैं, हमारे रथियोंमें श्रेष्ठतम शूरवीर योद्धाओंद्वारा चारों ओरसे घिर गये हैं ॥ ५४३ ॥
सात्यकिं यदि हन्याम धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ॥ ५५ ॥
असंशयं महाराज ध्रुवो नो विजयो भवेत् । ‘ महाराज! यदि हम सात्यकि तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको मार डालें तो हमारी स्थायी विजय होगी, इसमें संदेह नहीं है ॥ ५५३ ॥
सौभद्रवदिमौ वीरौ परिवार्य महारथौ ॥ ५६ ॥
प्रयतामो महाराज निहन्तुं वृष्णिपार्षतौ । ‘ राजेन्द्र! अतः हमलोग सुभद्राकुमार अभिमन्युके समान वृष्णिवंश तथा पार्षतकुलके इन दोनों महारथी वीरोंको सब ओरसे घेरकर मार डालनेका प्रयत्न करें ॥ सव्यसाची पुरोऽभ्येति द्रोणानीकाय भारत ॥ ५७ ॥
संसक्तं सात्यकिं ज्ञात्वा बहुभिः कुरुपुङ्गवैः । ‘ भारत! सात्यकिको बहुत से प्रधान कौरववीरोंके साथ उलझा हुआ जानकर सव्यसाची अर्जुन सामनेसे द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर आ रहे हैं ॥ ५७ ॥
तत्र गच्छन्तु बहवः प्रवरा रथसत्तमाः ॥ ५८ ॥
यावत् पार्थो न जानाति सात्यकिं बहुभिर्वृतम् ।
ते त्वरध्वं तथा शूराः शराणां मोक्षणे भृशम् ॥ ५ ९ ॥
' अतः बहुत- से श्रेष्ठ महारथी वहाँ उनका सामना करनेके लिये जायँ । जबतक अर्जुन यह नहीं जानते कि सात्यकि बहुसंख्यक योद्धाओंसे घिर गये हैं, तभीतक तुम सभी शूरवीर बाणोंका प्रहार करनेमें अधिकाधिक शीघ्रता करो ॥ ५८-५९ ॥
यथा त्विह व्रजत्येष परलोकाय माधवः ।
तथा कुरु महाराज सुनीत्या सुप्रयुक्तया ॥ ६० ॥
‘ महाराज! जिस उपायसे भी यहाँ ये मधुवंशी सात्यकि परलोकगामी हो जायँ, अच्छी तरह प्रयोगमें लायी हुई सुन्दर नीतिके द्वारा वैसा ही प्रयत्न करो ' ॥ ६० ॥
कर्णस्य मतमास्थाय पुत्रस्ते प्राह सौबलम् ।
यथेन्द्रः समरे राजन् प्राह विष्णुं यशस्विनम् ॥ ६१ ॥
राजन्! जैसे इन्द्र समरांगणमें परम यशस्वी भगवान् विष्णुसे कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार आपके पुत्र दुर्योधनने कर्णकी सलाह मानकर सुबलपुत्र शकुनिसे इस प्रकार कहा - ॥ ६१ ॥
वृतः सहस्रैर्दशभिर्गजानामनिवर्तिनाम् ।
रथैश्च दशसाहस्रैस्तूर्णं याहि धनंजयम् ॥ ६२ ॥
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' मामा! तुम युद्धसे पीछे न हटनेवाले दस हजार हाथियों और उतने ही रथोंके साथ तुरंत ही अर्जुनका सामना करनेके लिये जाओ ॥ ६२ ॥
दुःशासनो दुर्विषहः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः ।
एते त्वामनुयास्यन्ति पत्तिभिर्बहुभिर्वृताः ॥ ६३ ॥
'दुःशासन, दुर्विषह, सुबाहु और दुष्प्रधर्षण- ये ( महारथी ) बहुत से पैदल सैनिकोंको साथ लेकर तुम्हारे पीछे - पीछे जायँगे ॥ ६३ ॥
जहि कृष्णौ महाबाहो धर्मराजं च मातुल ।
नकुलं सहदेवं च भीमसेनं तथैव च ॥ ६४ ॥
' मेरे महाबाहु मामा! तुम श्रीकृष्ण, अर्जुन, धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा भीमसेनको भी मार डालो ॥ ६४ ॥
देवानामिव देवेन्द्रे जयाशा त्वयि मे स्थिता ।
जहि मातुल कौन्तेयानसुरानिव पावकिः ॥ ६५ ॥
‘ मामा! जैसे देवताओंकी आशा देवराज इन्द्रपर लगी रहती है, उसी प्रकार मेरी विजयकी आशा तुमपर अवलम्बित है । जैसे अग्निकुमार स्कन्दने असुरोंका संहार किया था, उसी प्रकार तुम भी कुन्तीकुमारोंका वध करो ' ॥ ६५ ॥
एवमुक्तो ययौ पार्थान् पुत्रेण तव सौबलः ।
महत्या सेनया सार्धं सह पुत्रैश्च ते विभो ॥ ६६ ॥
प्रभो! आपके पुत्र दुर्योधनके ऐसा कहनेपर शकुनि विशाल सेना और आपके अन्य पुत्रोंके साथ कुन्तीकुमारोंका सामना करनेके लिये गया ॥ ६६ ॥
प्रियार्थं तव पुत्राणां दिधक्षुः पाण्डुनन्दनान् ।
ततः प्रववृते युद्धं तावकानां परैः सह ॥ ६७ ॥
वह आपके पुत्रोंका प्रिय करनेके लिये पाण्डवोंको भस्म कर देना चाहता था । फिर तो आपके योद्धाओंका शत्रुओंके साथ घोर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ६७ ॥
प्रयाते सौबले राजन् पाण्डवानामनीकिनीम् ।
बलेन महता युक्तः सूतपुत्रस्तु सात्वतम् ॥ ६८ ॥
अभ्ययात् त्वरितो युद्धे किरन् शरशतान् बहून् ।
तथैव पार्थिवाः सर्वे सात्यकिं पर्यवारयन् ॥ ६ ९ ॥
राजन्! जब शकुनि पाण्डव - सेनाकी ओर चला गया, तब विशाल सेनाके साथ सूतपुत्र कर्णने युद्धस्थलमें कई सौ बाणोंकी वर्षा करते हुए तुरंत ही सात्यकिपर आक्रमण किया । इसी प्रकार अन्य सब राजाओंने भी सात्यकिको घेर लिया ॥ ६८-६९ ॥ भारद्वाजस्ततो गत्वा धृष्टद्युम्नरथं प्रति ।
महद् युद्धं तदाऽऽसीत् तु द्रोणस्य निशि भारत ।
धृष्टद्युम्नेन वीरेण पञ्चालैश्च सहाद्भुतम् ॥ ७० ॥
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भारत! तदनन्तर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नके रथपर आक्रमण किया । उस रात्रिके समय वीर धृष्टद्युम्न और पांचालोंके साथ द्रोणाचार्यका महान् एवं अद्भुत युद्ध हुआ ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७० ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके अवसरपर संकुलयुद्धविषयक एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १७० ॥
* दुर्योधन, दुःशासन, द्रोण, कर्ण, शल्य और शकुनि – ये ही छः श्रेष्ठ रथी यहाँ ग्रहण किये गये हैं ।
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एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः सात्यकिसे दुर्योधनकी, अर्जुनसे शकुनि और उलूककी तथा धृष्टद्युम्नसे कौरव सेनाकी पराजय संजय उवाच
ततस्ते प्राद्रवन् सर्वे त्वरिता युद्धदुर्मदाः ।
अमृष्यमाणाः संरब्धा युयुधानरथं प्रति ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! तत्पश्चात् वे समस्त रणदुर्मद योद्धा बड़ी उतावलीके साथ अमर्ष और क्रोधमें भरकर युयुधानके रथकी ओर दौड़े ॥ १ ॥
ते रथैः कल्पितै राजन् हेमरूप्यविभूषितैः ।
सादिभिश्च गजैश्चैव परिवव्रुः समन्ततः ॥ २ ॥
नरेश्वर! उन्होंने सोने - चाँदीसे विभूषित एवं सुसज्जित रथों, घुड़सवारों और हाथियोंके द्वारा चारों ओरसे सात्यकिको घेर लिया ॥ २ ॥
अथैनं कोष्ठकीकृत्य सर्वतस्ते महारथाः ।
सिंहनादांस्ततश्चक्रुस्तर्जयन्ति स्म सात्यकिम् ॥ ३ ॥
इस प्रकार सब ओरसे सात्यकिको कोष्ठबद्ध -सा करके वे महारथी योद्धा सिंहनाद करने और उन्हें डाँट बताने लगे ॥ ३ ॥
तेऽभ्यवर्षञ्छरैस्तीक्ष्णैः सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।
त्वरमाणा महावीरा माधवस्य वधैषिणः ॥ ४ ॥
इतना ही नहीं, मधुवंशी सात्यकिका वध करनेकी इच्छासे उतावले हो वे महावीर सैनिक उन सत्यपराक्रमी सात्यकिपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४ ॥
तान् दृष्ट्वा पततस्तूर्णं शैनेयः परवीरहा ।
प्रत्यगृह्णान्महाबाहुः प्रमुञ्चन् विशिखान् बहून् ॥ ५ ॥
तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबाहु शिनिपौत्र सात्यकिने उन लोगोंको अपनेपर धावा करते देख स्वयं भी तुरंत ही बहुत- से बाणोंका प्रहार करते हुए उनका स्वागत किया ॥ ५ ॥
तत्र वीरो महेष्वासः सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ।
निचकर्त शिरांस्युग्रैः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ६ ॥
वहाँ महाधनुर्धर रणदुर्मद वीर सात्यकिने झुकी हुई गाँठवाले भयंकर बाणोंद्वारा बहुतेरे शत्रु - योद्धाओंके मस्तक काट डाले ॥ ६ ॥
हस्तिहस्तान् हयग्रीवा बाहूनपि च सायुधान् ।
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क्षुरप्रैः शातयामास तावकानां स माधवः ॥ ७ ॥
उन मधुवंशी वीरने आपकी सेनाके हाथियोंके शुण्डदण्डों, घोड़ोंकी गर्दनों तथा योद्धाओंकी आयुधोंसहित भुजाओंको भी क्षुरप्रोंद्वारा काट डाला ॥ ७ ॥
पतितैश्चामरैश्चैव श्वेतच्छत्रैश्च भारत ।
बभूव धरणी पूर्णा नक्षत्रैद्यरिव प्रभो ॥ ८ ॥
भरतनन्दन! प्रभो! वहाँ गिरे हुए चामरों और श्वेत छत्रोंसे भरी हुई भूमि नक्षत्रोंसे युक्त आकाशके समान जान पड़ती थी ॥ ८ ॥
एतेषां युयुधानेन युध्यतां युधि भारत ।
बभूव तुमुलः शब्दः प्रेतानां क्रन्दतामिव ॥ ९ ॥
भारत! युद्धस्थलमें युयुधानके साथ जूझते हुए इन योद्धाओंका भयंकर आर्तनाद प्रेतोंके करुण- क्रन्दन- सा प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
तेन शब्देन महता पूरिताभूद् वसुन्धरा ।
रात्रिः समभवच्चैव तीव्ररूपा भयावहा ॥ १० ॥
उस महान् कोलाहलसे भरी हुई वह रणभूमि और रात्रि अत्यन्त उग्र एवं भयंकर जान पड़ती थी ॥ १० ॥
दीर्यमाणं बलं दृष्ट्वा युयुधानशराहतम् ।
श्रुत्वा च विपुलं नादं निशीथे लोमहर्षणे ॥ ११ ॥
सुतस्तवाब्रवीद् राजन् सारथिं रथिनां वरः ।
यत्रैष शब्दस्तत्राश्वांश्चोदयेति पुनः पुनः ॥ १२ ॥
राजन्! युयुधानके बाणोंसे आहत हुई अपनी सेनामें भगदड़ पड़ी देख और उस रोमांचकारी निशीथकालमें वह महान् कोलाहल सुनकर रथियोंमें श्रेष्ठ आपके पुत्र दुर्योधनने अपने सारथिसे बारंबार कहा - 'जहाँ यह कोलाहल हो रहा है, वहाँ मेरे घोड़ोंको हाँक ले चलो ' ॥ ११-१२ ॥
तेन संचोद्यमानस्तु ततस्तांस्तुरगोत्तमान् ।
सूतः संचोदयामास युयुधानरथं प्रति ॥ १३ ॥
उसका आदेश पाकर सारथिने उन श्रेष्ठ घोड़ोंको सात्यकिके रथकी ओर हाँक दिया ॥ १३ ॥
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो दृढधन्वा जितक्लमः ।
शीघ्रहस्तश्चित्रयोधी युयुधानमुपाद्रवत् ॥ १४ ॥
तदनन्तर दृढ़ धनुर्धर, श्रमविजयी, शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले और विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले दुर्योधनने क्रोधमें भरकर सात्यकिपर धावा किया । १४ ॥
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैः शोणितभोजनैः ।
दुर्योधनं द्वादशभिर्माधवः प्रत्यविध्यत ॥ १५ ॥
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तब मधुवंशी युयुधानने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बारह रक्तभोजी बाणोंद्वारा दुर्योधनको घायल कर दिया ॥ १५ ॥
दुर्योधनस्तेन तथा पूर्वमेवार्दितः शरैः ।
शैनेयं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यदमर्षितः ॥ १६ ॥
सात्यकिने जब पहले ही अपने बाणोंसे दुर्योधनको पीड़ित कर दिया, तब उसने भी अमर्षमें भरकर उन्हें दस बाण मारे ॥ १६ ॥
ततः समभवद् युद्धं तुमुलं भरतर्षभ ।
पञ्चालानां च सर्वेषां भरतानां च दारुणम् ॥ १७ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर समस्त पांचालों और भरतवंशियोंका वहाँ भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १७ ॥
शैनेयस्तु रणे क्रुद्धस्तव पुत्रं महारथम् ।
सायकानामशीत्या तु विव्याधोरसि भारत ॥ १८ ॥
भारत! रणभूमिमें कुपित हुए सात्यकिने आपके महारथी पुत्रकी छातीमें अस्सी सायकोंद्वारा प्रहार किया ॥
ततोऽस्य वाहान् समरे शरैर्निन्ये यमक्षयम् ।
सारथिं च रथात् तूर्णं पातयामास पत्रिणा ॥ १ ९ ॥
फिर समरांगणमें अपने बाणोंद्वारा घायल करके उसके घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया और एक पंखयुक्त बाणसे मारकर उसके सारथिको भी तुरंत ही रथसे नीचे गिरा दिया ॥ १ ९ ॥
हताश्वे तु रथे तिष्ठन् पुत्रस्तव विशाम्पते ।
मुमोच निशितान् बाणान् शैनेयस्य रथं प्रति ॥ २० ॥
प्रजानाथ! तब आपका पुत्र उस अश्वहीन रथपर खड़ा हो सात्यकिके रथकी ओर पैने बाण छोड़ने लगा ॥
शरान् पञ्चाशतस्तांस्तु शैनेयः कृतहस्तवत् ।
चिच्छेद समरे राजन् प्रेषितांस्तनयेन ते ॥ २१ ॥
राजन्! परंतु आपके पुत्रद्वारा छोड़े गये पचास बाणोंको समरांगणमें सात्यकिने एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति काट डाला ॥ २१ ॥
अथापरेण भल्लेन मुष्टिदेशे महद् धनुः ।
चिच्छेद तरसा युद्धे तव पुत्रस्य माधवः ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् उन मधुवंशी वीरने एक- दूसरे भल्लसे युद्धभूमिमें आपके पुत्रके विशाल धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे वेगपूर्वक काट दिया ॥ २२ ॥
विरथो विधनुष्कश्च सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।
आरुरोह रथं तूर्णं भास्वरं कृतवर्मणः ॥ २३ ॥
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तब सम्पूर्ण जगत्का स्वामी शक्तिशाली वीर दुर्योधन धनुष और रथसे हीन होकर तुरंत ही कृतवर्माके तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो गया ॥ २३ ॥
दुर्योधने परावृत्ते शैनेयस्तव वाहिनीम् ।
द्रावयामास विशिखैर्निशामध्ये विशाम्पते ॥ २४ ॥
प्रजानाथ! उस आधीरातके समय दुर्योधनके पराङ्मुख हो जानेपर सात्यकिने आपकी सेनाको अपने बाणोंद्वारा खदेड़ना आरम्भ किया ॥ २४ ॥
शकुनिश्चार्जुनं राजन् परिवार्य समन्ततः ।
रथैरनेकसाहस्रैर्गजैश्चापि सहस्रशः ॥ २५ ॥
तथा हयसहस्रैश्च नानाशस्त्रैरवाकिरत् । राजन्! उधर शकुनिने कई हजार रथों, सहस्रों हाथियों और सहस्रों घोड़ोंद्वारा अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर उनपर नाना प्रकारके शस्त्रोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ २५३ || ते महास्त्राणि सर्वाणि विकिरन्तोऽर्जुनं प्रति ॥ २६ ॥
अर्जुनं योधयन्ति स्म क्षत्रियाः कालचोदिताः । वे कालप्रेरित क्षत्रिय अर्जुनपर बड़े - बड़े अस्त्रोंकी वर्षा करते हुए उनके साथ युद्ध करने लगे ॥ २६ ॥
तान्यर्जुनः सहस्राणि रथवारणवाजिनाम् ॥ २७ ॥
प्रत्यवारयदायस्तः प्रकुर्वन् विपुलं क्षयम् । यद्यपि अर्जुन कौरव - सेनाका महान् संहार करते - करते थक गये थे, तो भी उन्होंने उन सहस्रों रथों, हाथियों और घुड़सवारोंकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ २७ ॥
ततस्तु समरे शूरः शकुनिः सीबलस्तदा ॥ २८ ॥
विव्याध निशितैर्बाणैरर्जुनं प्रहसन्निव ।
पुनश्चैव शतेनास्य संरुरोध महारथम् ॥ २ ९ ॥
उस समय समरभूमिमें सुबलकुमार शूरवीर शकुनिने हँसते हुए-से तीखे बाणोंद्वारा अर्जुनको बींध डाला । फिर सौ बाण मारकर उनके विशाल रथको अवरुद्ध कर दिया ॥
तमर्जुनस्तु विंशत्या विव्याध युधि भारत ।
अथेतरान् महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरविध्यत ॥ ३० ॥
भारत! उस युद्धके मैदानमें अर्जुनने शकुनिको बीस बाण मारे और अन्य महाधनुर्धरोंको तीन- तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३० ॥
निवार्य तान् बाणगणैर्युधि राजन् धनंजयः ।
जघान तावकान् योधान् वज्रपाणिरिवासुरान् ॥ ३१ ॥
राजन्! युद्धस्थलमें अर्जुनने अपने बाण- समूहोंद्वारा आपके उन योद्धाओंको रोककर जैसे वज्रपाणि इन्द्र असुरोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार उन सबका वध कर