04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1301–1310

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1301–1310

पृष्ठ 1301

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जीभ और ओठ ताँबेके समान लाल और लम्बे थे, भौंहें बड़ी - बड़ी, नाक मोटी, शरीरका रंग काला, गर्दन लाल और शरीर पर्वताकार था । वह देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ ६ ॥

महाकायो महाबाहुर्महाशीर्षो महाबलः ।

विकृतः परुषस्पर्शो विकटोवृद्धपिण्डकः ॥ ७ ॥

उसकी देह, भुजा और मस्तक सभी विशाल थे । उसका बल भी महान् था । आकृति

बेडौल थी । उसका स्पर्श कठोर था । उसकी पिंडलियाँ विकट एवं सुदृढ़ थीं ॥ ७ ॥

स्थूलस्फिग्गूढनाभिश्च शिथिलोपचयो महान् ।

तथैव हस्ताभरणी महामायोऽङ्गदी तथा ॥ ८ ॥

उसके नितम्बभाग स्थूल थे । उसकी नाभि छोटी होनेके कारण छिपी हुई थी । उसके

शरीरकी बढ़ती रुक गयी थी। वह लंबे कदका था । उसने हाथोंमें आभूषण पहन रखे थे ।

भुजाओंमें बाजूबन्द धारण कर रखे थे। वह बड़ी - बड़ी मायाओंका जानकार था ॥ ८ ॥

उरसा धारयन् निष्कमग्निमालां यथाचलः ।

तस्य हेममयं चित्रं बहुरूपाङ्गशोभितम् ॥ ९ ॥

तोरणप्रतिमं शुभ्रं किरीटं मूर्ध्यशोभत ।

पृष्ठ 1302

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वह अपनी छातीपर सुवर्णमय निष्क ( पदक ) पहनकर अग्निकी माला धारण किये पर्वतके समान प्रतीत होता था । उसके मस्तकपर सोनेका बना हुआ विचित्र उज्ज्वल मुकुट तोरणके समान सुशोभित हो रहा था । उस मुकुटकी विविध अंगोंसे बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ९ ३ ॥ कुण्डले बालसूर्याभे मालां हेममयीं शुभाम् ॥ १० ॥

धारयन् विपुलं कांस्यं कवचं च महाप्रभम् । वह प्रभातकालके सूर्यकी भाँति कान्तिमान् दो कुण्डल, सोनेकी सुन्दर माला और काँसीका विशाल एवं चमकीला कवच धारण किये हुए था ॥ १०३ ॥

किंकिणीशतनिर्घोषं रक्तध्वजपताकिनम् ॥ ११ ॥

ऋक्षचर्मावनद्धाङ्गं नल्वमात्रं महारथम् । उसके रथमें सैकड़ों क्षुद्र घण्टिकाओंका मधुर घोष होता था । उसपर लाल रंगकी ध्वजा- पताका फहरा रही थी । उस रथके सम्पूर्ण अंगोंपर रीछकी खाल मढ़ी गयी थी । वह विशाल रथ चारों ओरसे चार सौ हाथ लंबा था ॥ ११ ॥

सर्वायुधवरोपेतमास्थितो ध्वजशालिनम् ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1303

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अष्टचक्रसमायुक्तं मेघगम्भीरनिःनैःस्वनम् । उसपर सभी प्रकारके श्रेष्ठ आयुध रखे गये थे । उसमें आठ पहिये लगे थे और चलते समय उस रथसे मेघ गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि होती थी । विशाल ध्वज उस रथकी

शोभा बढ़ा रहा था । उसीपर घटोत्कच आरूढ़ था ॥ १२३ ॥

मत्तमातङ्गसंकाशा लोहिताक्षा विभीषणाः ॥ १३ ॥

कामवर्णजवा युक्ता बलवन्तः शतं हयाः । मतवाले हाथीके समान प्रतीत होनेवाले सौ बलवान् एवं भयंकर घोड़े उस रथमें जुते हुए थे । जिनकी आँखें लाल थीं तथा जो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और मनचाहे वेगसे चलनेवाले थे ॥ १३३ ॥

वहन्तो राक्षसं घोरं वालवन्तो जितश्रमाः ॥ १४ ॥

विपुलाभिः सटाभिस्ते द्वेषमाणा मुहुर्मुहुः । उन घोड़ोंके कंधोंपर लंबे - लंबे बाल थे । वे परिश्रमको जीत चुके थे । वे सभी अपने विशाल केसरों ( गर्दनके लंबे बालों ) से सुशोभित थे और उस भयानक राक्षसका भार वहन करते हुए वे बारंबार हिनहिना रहे थे ॥ १४ ॥

राक्षसोऽस्य विरूपाक्षः सूतो दीप्तास्यकुण्डलः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1304

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रश्मिभिः सूर्यरश्म्याभैः संजग्राह हयान् रणे ।

स तेन सहितस्तस्थावरुणेन यथा रविः ॥ १६ ॥

दीप्तिमान् मुख और कुण्डलोंसे युक्त विरूपाक्ष नामक राक्षस घटोत्कचका सारथि था, जो रणभूमिमें सूर्यकी किरणोंके समान चमकीली बागडोर पकड़कर उन घोड़ोंको काबूमें रखता था । उसके साथ रथपर बैठा हुआ घटोत्कच ऐसा जान पड़ता था, मानो अरुण नामक सारथिके साथ सूर्यदेव अपने रथपर विराजमान हों ॥ १५-१६ ॥

संसक्त इव चाभ्रेण यथाद्रिर्महता महान् ।

दिवःस्पृक् सुमहान् केतुः स्यन्दनेऽस्य समुच्छ्रितः ॥ १७ ॥

रक्तोत्तमाङ्गः क्रव्यादो गृध्रः परमभीषणः । जैसे महान् पर्वत किसी महामेघसे संयुक्त हो जाय, उसी प्रकार अपने सारथिके साथ बैठे हुए घटोत्कचकी शोभा हो रही थी । उसके रथपर बहुत ऊँची गगन -चुम्बिनी पताका फहरा रही थी, जिसपर एक लाल सिरवाला अत्यन्त भयंकर मांसभोजी गीध दिखायी देता था ॥ १७ ॥

वासवाशनिनिर्घोषं दृढज्यमतिविक्षिपन् ॥ १८ ॥

व्यक्तं किष्कुपरीणाहं द्वादशारत्निकार्मुकम् ।

रथाक्षमात्रैरिषुभिः सर्वाः प्रच्छादयन् दिशः ॥ १ ९ ॥

तस्यां वीरापहारिण्यां निशायां कर्णमभ्ययात् । वीरोंका संहार करनेवाली उस रात्रिमें इन्द्रके वज्रकी भाँति भयानक टंकार करनेवाले और सुदृढ़ प्रत्यंचावाले एक हाथ चौड़े एवं बारह अरत्नि लंबे धनुषको खींचता और रथके धुरेके समान मोटे बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करता हुआ घटोत्कच ( पूर्वोक्त रथपर आरूढ़ हो) कर्णकी ओर चला ॥ १८-१९ ३ ॥ तस्य विक्षिपतश्चापं रथे विष्टभ्य तिष्ठतः ॥ २० ॥

अश्रूयत धनुर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः । रथपर स्थिरतापूर्वक खड़े हो जब वह अपने धनुषको खींच रहा था, उस समय उसकी टंकार वज्रकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देती थी ॥ २०६३ ॥

तेन वित्रास्यमानानि तव सैन्यानि भारत ॥ २१ ॥

समकम्पन्त सर्वाणि सिन्धोरिव महोर्मयः । भारत! उस घोर शब्दसे डरायी हुई आपकी सारी सेनाएँ समुद्रकी बड़ी - बड़ी लहरोंके समान काँपने लगीं ॥ २१ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य विरूपाक्षं विभीषणम् ॥ २२ ॥

उत्स्मयन्निव राधेयस्त्वरमाणोऽभ्यवारयत् ।

पृष्ठ 1305

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विकराल नेत्रोंवाले उस भयानक राक्षसको आते देख राधापुत्र कर्णने मुसकराते हुए - से शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़कर उसे रोका ॥ २२ ॥

ततः कर्णोऽभ्ययादेनमस्यन्नस्यन्तमन्तिकात् ॥ २३ ॥

मातङ्ग इव मातङ्गं यूथर्षभमिवर्षभः । जैसे एक यूथपति गजराजका सामना करनेके लिये दूसरे यूथका अधिपति गजराज चढ़ आता है, उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा करते हुए घटोत्कचपर बाणोंकी बौछार करते हुए कर्णने उसके ऊपर निकटसे आक्रमण किया ॥ २३ ॥

स संनिपातस्तुमुलस्तयोरासीद् विशाम्पते ॥ २४ ॥

कर्णराक्षसयो राजन्निन्द्रशम्बरयोरिव । प्रजानाथ! राजन्! पूर्वकालमें जैसे इन्द्र और शम्बरासुरमें युद्ध हुआ था, उसी प्रकार कर्ण और राक्षसका वह संग्राम बड़ा भयंकर हुआ ॥ २४३ ॥

तौ प्रगृह्य महावेगे धनुषी भीमनिःस्वने ॥ २५ ॥

प्राच्छादयेतामन्योन्यं तक्षमाणौ महेषुभिः । वे दोनों भयंकर टंकार करनेवाले अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर बड़े - बड़े बाणोंद्वारा एक- दूसरेको क्षत - विक्षत करते हुए आच्छादित करने लगे ॥ २५३ ॥

ततः पूर्णायतोत्सृष्टैरिषुभिर्नतपर्वभिः ॥ २६ ॥

न्यवारयेतामन्योन्यं कांस्ये निर्भिद्य वर्मणी । तदनन्तर वे दोनों वीर धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा परस्पर कांस्यनिर्मित कवचोंको छिन्न-भिन्न करके एक- दूसरेको रोकने लगे ॥ २६ ॥

तौ नखैरिव शार्दूलौ दन्तैरिव महाद्विपौ ॥ २७ ॥

रथशक्तिभिरन्योन्यं विशिखैश्च ततक्षतुः । जैसे दो सिंह नखोंसे और दो महान् गजराज दाँतोंसे परस्पर प्रहार करते हैं, उसी प्रकार वे दोनों योद्धा रथशक्तियों और बाणोंद्वारा एक - दूसरेको घायल करने लगे ॥ २७३ ॥

संछिन्दन्तौ च गात्राणि संदधानौ च सायकान् ॥ २८ ॥

दहन्तौ च शरोल्काभिर्दुष्प्रेक्ष्यौ च बभूवतुः । वे सायकोंका संधान करके एक- दूसरेके अंगोंको छेदते और बाणमयी उल्काओंसे दग्ध करते थे । उससे उन दोनोंकी ओर देखना अत्यन्त कठिन हो रहा था ॥ २८३ ॥

तौ तु विक्षतसर्वाङ्गौ रुधिरौघपरिप्लुतौ ॥ २ ९ ॥ व्यभ्राजेतां यथा वारि स्रवन्तौ गैरिकाचलौ । उन दोनोंके सारे अंग घावोंसे भर गये थे और दोनों ही खूनसे लथपथ हो गये थे । उस समय वे जलका स्रोत बहाते हुए गेरूके दो पर्वतोंके समान शोभा पा रहे भे ॥ २ ९ ३ ॥

पृष्ठ 1306

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तौ शराग्रविनुन्नाङ्गौ निर्भिन्दन्तौ परस्परम् ॥ ३० ॥

नाकम्पयेतामन्योन्यं यतमानौ महाद्युती । दोनोंके अंग बाणोंके अग्रभागसे छिदकर छलनी हो रहे थे । दोनों ही एक- दूसरेको विदीर्ण कर रहे थे, तो भी वे महातेजस्वी वीर परस्पर विजयके प्रयत्नमें लगे रहे और एक-दूसरेको कम्पित न कर सके ॥ ३०३ ॥

तत् प्रवृत्तं निशायुद्धं चिरं सममिवाभवत् ॥ ३१ ॥

प्राणयोर्दीव्यतो राजन् कर्णराक्षसयोर्मृधे । राजन्! युद्धके जूएमें प्राणोंकी बाजी लगाकर खेलते हुए कर्ण और राक्षसका वह रात्रियुद्ध दीर्घकालतक समानरूपमें ही चलता रहा ॥ ३१३ ॥

तस्य संदधतस्तीक्ष्णान् शरांश्चासक्तमस्यतः ॥ ३२ ॥

धनुर्घोषेण वित्रस्ताः स्वे परे च तदाभवन् । घटोत्कच तीखे बाणोंका संधान करके उन्हें इस प्रकार छोड़ता कि वे एक - दूसरेसे सटे हुए निकलते थे । उसके धनुषकी टंकारसे अपने और शत्रुपक्षके योद्धा भी भयसे थर्रा उठते थे ॥ ३२ ॥

घटोत्कचं यदा कर्णो विशेषयति नो नृप ॥ ३३ ॥

ततः प्रादुष्करोद् दिव्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः । नरेश्वर! जब कर्ण घटोत्कचसे बढ़ न सका, तब उस अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वीरने दिव्यास्त्र प्रकट किया ॥ कर्णेन संधितं दृष्ट्वा दिव्यमस्त्रं घटोत्कचः ॥ ३४ ॥

प्रादुश्चक्रे महामायां राक्षसीं पाण्डुनन्दनः । कर्णको दिव्यास्त्रका संधान करते देख पाण्डवनन्दन घटोत्कचने अपनी राक्षसी महामाया प्रकट की ॥ ३४ ॥

शूलमुद्गरधारिण्या शैलपादपहस्तया ॥ ३५ ॥

रक्षसां घोररूपाणां महत्या सेनया वृतः । वह तत्काल ही शूल, मुद्गर, शिलाखण्ड और वृक्ष हाथमें लिये हुए घोररूपधारी राक्षसोंकी विशाल सेनासे घिर गया ॥ ३५३ ॥

तमुद्यतमहाचापं दृष्ट्वा ते व्यथिता नृपाः ॥ ३६ ॥

भूतान्तकमिवायान्तं कालदण्डोग्रधारिणम् । भयानक कालदण्ड धारण किये, समस्त भूतोंके प्राणहन्ता यमराजके समान उसे विशाल धनुष उठाये आते देख वहाँ उपस्थित हुए वे सभी नरेश व्यथित हो उठे ॥ ३६३ ॥

घटोत्कचप्रयुक्तेन सिंहनादेन भीषिताः ॥ ३७ ॥

प्रसुस्रुवुर्गजा मूत्रं विव्यथुश्च नरा भृशम् ।

पृष्ठ 1307

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घटोत्कचके सिंहनादसे भयभीत हो हाथियोंके पेशाब झरने लगे और मनुष्य भी अत्यन्त व्यथित हो गये ॥ ३७३ ॥

ततोऽश्मवृष्टिरत्युग्रा महत्यासीत् समन्ततः ॥ ३८ ॥

अर्धरात्रेऽधिकबलैर्विमुक्ता रक्षसां बलैः । तदनन्तर चारों ओरसे पत्थरोंकी अत्यन्त भयंकर एवं भारी वर्षा होने लगी । आधी रातके समय अधिक बलशाली हुए राक्षसोंके समुदाय वह प्रस्तर-वर्षा कर रहे थे ॥ ३८ || आयसानि च चक्राणि भुशुण्ड्यः शक्तितोमराः ॥ ३ ९ ॥ पतन्त्यविरलाः शूलाः शतघ्न्यः पट्टिशास्तथा । लोहेके चक्र, भुशुण्डी, शक्ति, तोमर, शूल, शतघ्नी और पट्टिश आदि अस्त्र- शस्त्रोंकी अविरल धाराएँ गिर रही थीं ॥ ३ ९ ॥ तदुग्रमतिरौद्रं च दृष्ट्वा युद्धं नराधिप ॥ ४० ॥

पुत्राश्च तव योधाश्च व्यथिता विप्रदुद्रुवुः । नरेश्वर! उस अत्यन्त भयंकर और उग्र संग्रामको देखकर आपके पुत्र और योद्धा भयभीत होकर भाग चले ॥ ४० ॥

तत्रैकोऽस्त्रबलश्लाघी कर्णो मानी न विव्यथे ॥ ४१ ॥

व्यधमच्च शरैर्मायां तां घटोत्कचनिर्मिताम् । अपने अस्त्रबलकी प्रशंसा करनेवाला एकमात्र अभिमानी कर्ण ही वहाँ खड़ा रहा । उसके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई । उसने अपने बाणोंसे घटोत्कचद्वारा निर्मित मायाको नष्ट कर दिया ॥ ४१३ ॥

मायायां तु प्रहीणायाममर्षाच्च घटोत्कचः ॥ ४२ ॥

विससर्ज शरान् घोरान् सूतपुत्रं त आविशन् । उस मायाके नष्ट हो जानेपर घटोत्कचने अमर्षमें भरकर भयंकर बाण छोड़े, जो सूतपुत्रके शरीरमें समा गये ॥ ततस्ते रुधिराभ्यक्ता भित्त्वा कर्णं महाहवे ॥ ४३ ॥

विविशुर्धरणीं बाणाः संक्रुद्धा इव पन्नगाः । तदनन्तर वे रुधिरसे रँगे हुए बाण उस महासमरमें कर्णको छेदकर कुपित हुए सर्पोंके समान धरतीमें समा गये ॥ ४३३ ॥

सूतपुत्रस्तु संक्रुद्धो लघुहस्तः प्रतापवान् ॥ ४४ ॥

घटोत्कचमतिक्रम्य बिभेद दशभिः शरैः । इससे शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाला प्रतापी वीर सूतपुत्र कर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा । उसने घटोत्कचका उल्लंघन करके उसे दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ४४३ ॥

पृष्ठ 1308

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घटोत्कचो विनिर्भिन्नः सूतपुत्रेण मर्मसु ॥ ४५ ॥

चक्रं दिव्यं सहस्रारमगृह्णाद् व्यथितो भृशम् । सूतपुत्रके द्वारा मर्मस्थानोंमें विदीर्ण होकर अत्यन्त व्यथित हुए घटोत्कचने दिव्य सहस्रार चक्र हाथमें लिया ॥ क्षुरान्तं बालसूर्याभं मणिरत्नविभूषितम् ॥ ४६ ॥

चिक्षेपाधिरथेः क्रुद्धो भैमसेनिर्जिघांसया । उस चक्रके किनारे - किनारे छुरे लगे हुए थे । मणि एवं रत्नोंसे विभूषित हुआ वह चक्र प्रातःकालीन सूर्यके समान प्रतीत होता था । क्रोधमें भरे हुए भीमसेनकुमार घटोत्कचने अधिरथपुत्र कर्णको मार डालनेकी इच्छासे उस चक्रको चला दिया ॥ ४६३ ॥

प्रविद्धमतिवेगेन विक्षिप्तं कर्णसायकैः ॥ ४७ ॥

अभाग्यस्येव संकल्पस्तन्मोघमपतद् भुवि । परंतु अत्यन्त वेगसे फेंका गया वह घूमता हुआ चक्र कर्णके बाणोंद्वारा आहत हो भाग्यहीनके संकल्पकी भाँति व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४७१३ ॥

घटोत्कचस्तु संक्रुद्धो दृष्ट्वा चक्रं निपातितम् ॥ ४८ ॥

कर्णं प्राच्छादयद् बाणैः स्वर्भानुरिव भास्करम् । चक्रको गिराया हुआ देख क्रोधमें भरे हुए घटोत्कचने अपने बाणोंद्वारा कर्णको उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे राहु सूर्यको ढक देता है ॥ ४८३ ॥

सूतपुत्रस्त्वसम्भ्रान्तो रुद्रोपेन्द्रेन्द्रविक्रमः ॥ ४ ९ ॥ घटोत्कचरथं तूर्णं छादयामास पत्रिभिः परंतु रुद्र, विष्णु और इन्द्रके समान पराक्रमी सूतपुत्र कर्णको इससे तनिक भी घबराहट नहीं हुई । उसने तुरंत ही पंखदार बाणोंसे घटोत्कचके रथको आच्छादित कर दिया ॥ ४ ९ ॥ घटोत्कचेन क्रुद्धेन गदा हेमाङ्गदा तदा ॥ ५० ॥

क्षिप्ताऽऽभ्राम्य शरैः सापि कर्णेनाभ्याहतापतत् । तब कुपित हुए घटोत्कचने सोनेके कड़ेसे विभूषित गदा घुमाकर चलायी, किंतु कर्णके बाणोंसे आहत होकर वह भी नीचे गिर पड़ी ॥ ५० ॥

ततोऽन्तरिक्षमुत्पत्य कालमेघ इवोन्नदन् ॥ ५१ ॥

प्रववर्ष महाकायो द्रुमवर्षं नभस्तलात् । तदनन्तर अन्तरिक्षमें उछलकर वह विशालकाय राक्षस प्रलयकालके मेघकी भाँति गर्जना करता हुआ आकाशसे वृक्षोंकी वर्षा करने लगा ॥ ५१३ ॥

ततो मायाविनं कर्णो भीमसेनसुतं दिवि ॥ ५२ ॥

मार्गणैरभिविव्याध घनं सूर्य इवांशुभिः ।

पृष्ठ 1309

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तब कर्ण भीमसेनके मायावी पुत्रको अपने बाणोंद्वारा आकाशमें उसी प्रकार बींधने लगा, जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा मेघोंको विद्ध कर देते हैं ॥ ५२ ॥

तस्य सर्वान् हयान् हत्वा संछिद्य शतधा रथम् ॥ ५३ ॥

अभ्यवर्षच्छरैः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् । उसके सारे घोड़ोंको मारकर और रथके सैकड़ों टुकड़े करके कर्णने वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी ॥ ५३३ ॥

न चास्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्वयङ्गुलमन्तरम् ॥ ५४ ॥

सोऽदृश्यत मुहूर्तेन श्वाविच्छललितो यथा । घटोत्कचके शरीरमें दो अंगुल भी ऐसा स्थान नहीं बचा था, जो बाणोंसे विदीर्ण न हो गया हो । वह दो ही घड़ीमें काँटोंसे युक्त साहीके समान दिखायी देने लगा ॥ न हयान्न रथं तस्य न ध्वजं न घटोत्कचम् ॥ ५५ ॥

दृष्टवन्तः स्म समरे शरौघैरभिसंवृतम् । समरांगणमें बाणोंके समूहसे घिरे हुए घटोत्कचको, उसके घोड़ोंको, रथको तथा ध्वजको भी कोई नहीं देख पाते थे ॥ ५५३ ॥

स तु कर्णस्य तद् दिव्यमस्त्रमस्त्रेण शातयन् ॥ ५६ ॥

मायायुद्धेन मायावी सूतपुत्रमयोधयत् । वह मायावी राक्षस कर्णके दिव्यास्त्रको अपने अस्त्रद्वारा काटते हुए वहाँ सूतपुत्रके साथ मायामय युद्ध करने लगा ॥ ५३ ॥

सोऽयोधयत् तदा कर्णं मायया लाघवेन च ॥ ५७ ॥

अलक्ष्यमाणानि दिवि शरजालानि चापतन् । उस समय माया तथा शीघ्रकारिताके द्वारा वह कर्णको लड़ा रहा था । आकाशसे कर्णपर अलक्षित बाणसमूहोंकी वर्षा हो रही थी ॥ ५७३३ ॥

भैमसेनिर्महामायो मायया कुरुसत्तम ॥ ५८ ॥

विचचार महाकायो मोहयन्निव भारत । कुरुश्रेष्ठ! भरतनन्दन! वह विशालकाय महामायावी भीमसेनकुमार घटोत्कच मायासे सबको मोहित करता हुआ- सा सब ओर विचरने लगा ॥ ५८३ ॥

स तु कृत्वा विरूपाणि वदनान्यशुभानि च ॥ ५ ९ ॥ अग्रसत् सूतपुत्रस्य दिव्यान्यस्त्राणि मायया । उसने मायाद्वारा बहुत-से विकराल एवं अमंगल-सूचक मुख बनाकर सूतपुत्रके दिव्यास्त्रोंको अपना ग्रास बना लिया ॥ ५ ९ ३ ॥ पुनश्चापि महाकायः संछिन्नः शतधा रणे ॥ ६० ॥

गतसत्त्वो निरुत्साहः पतितः खाद्धयदृश्यत ।

पृष्ठ 1310

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फिर वह महाकाय राक्षस धैर्यहीन एवं उत्साहशून्य- सा होकर रणभूमिमें आकाशसे सैकड़ों टुकड़ोंमें कटकर गिरा हुआ दिखायी दिया ॥ ६० ॥

तं हतं मन्यमानाः स्म प्राणदन् कुरुपुङ्गवाः ॥ ६१ ॥

अथ देहैर्नवैरन्यैर्दिक्षु सर्वास्वदृश्यत । उस समय उसे मरा हुआ मानकर कौरव- दलके प्रमुख वीर जोर- जोरसे गर्जना करने लगे । इतनेहीमें वह दूसरे बहुत- से नये- नये शरीर धारण करके सम्पूर्ण दिशाओंमें दिखायी देने लगा ॥ ६१३ ॥

पुनश्चापि महाकायः शतशीर्षः शतोदरः ॥ ६२ ॥

व्यदृश्यत महाबाहुर्मैनाक इव पर्वतः । फिर वह बड़ी- बड़ी बाँहोंवाला एक ही विशालकाय रूप धारण करके मैनाक पर्वतके समान दृष्टिगोचर हुआ । उस समय उसके सौ मस्तक तथा सौ पेट हो गये थे ॥ ६२३ ॥

अङ्गुष्ठमात्रो भूत्वा च पुनरेव स राक्षसः ॥ ६३ ॥

सागरोर्मिरिवोद्भूतस्तिर्यगूर्ध्वमवर्तत । तत्पश्चात् वह राक्षस अँगूठेके बराबर होकर उछलती हुई समुद्रकी लहरके समान कभी ऊपर और कभी इधर- उधर होने लगा ॥ ६३ ॥

वसुधां दारयित्वा च पुनरप्सु न्यमज्जत ॥ ६४ ॥

अदृश्यत तदा तत्र पुनरुन्मज्जितोऽन्यतः । फिर पृथ्वीको फाड़कर वह पानीमें डूब गया और दूसरी जगह पुनः जलसे ऊपर आकर दिखायी देने लगा ॥ ६४३ ॥

सोऽवतीर्य पुनस्तस्थौ रथे हेमपरिष्कृते ॥ ६५ ॥

क्षितिं खं च दिशश्चैव माययाभ्येत्य दंशितः ।

गत्वा कर्णरथाभ्याशं व्यचरत् कुण्डलाननः ॥ ६६ ॥

इसके बाद आकाशसे उतरकर वह पुनः अपने सुवर्णमण्डित रथपर स्थित हो गया और मायासे ही पृथ्वी, आकाश एवं सम्पूर्ण दिशाओंमें घूमता हुआ कवचसे सुसज्जित हो कर्णके रथके समीप जाकर विचरने लगा । उस समय उसका मुख कुण्डलोंसे सुशोभित हो रहा था ॥ ६५-६६ ॥

प्राह वाक्यमसम्भ्रान्तः सूतपुत्रं विशाम्पते ।

तिष्ठेदानीं क्व मे जीवन् सूतपुत्र गमिष्यसि ॥ ६७ ॥

युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे । प्रजानाथ! अब घटोत्कच सम्भ्रमरहित हो सूतपुत्र कर्णसे बोला — ‘ सारथिके बेटे! खड़ा रह । अब तू मुझसे जीवित बचकर कहाँ जायगा? आज मैं समरांगणमें तेरा युद्धका हौसला मिटा दूँगा' ॥ ६७३ ॥