04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1381–1390

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1381–1390

पृष्ठ 1381

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सहस्रयामप्रतिमा बभूव प्राणहारिणी । यह तीन पहरकी रात उनके लिये सहस्रों प्रहरोंकी रात्रिके समान घोर, भयानक एवं प्राणहारिणी प्रतीत होती थी ॥ १४३ ॥

वध्यतां च तथा तेषां क्षतानां च विशेषतः ॥ १५ ॥

अर्धरात्रिः समाजज्ञे निद्रान्धानां विशेषतः । वहाँ बाणोंकी चोट सहते और विशेषतः क्षत -विक्षत होते हुए निद्रान्ध सैनिकोंकी आधी रात बीत गयी ॥ १५३ ॥

सर्वे ह्यासन् निरुत्साहाः क्षत्रिया दीनचेतसः ॥ १६ ॥

तव चैव परेषां च गतास्त्रा विगतेषवः । उस समय आपकी और शत्रुओंकी सेनाके समस्त क्षत्रिय उत्साहहीन एवं दीनचित्त हो गये थे; उनके हाथोंसे अस्त्र और बाण गिर गये थे ॥ १६३ ॥

ते तदापारयन्तश्च ह्रीमन्तश्च विशेषतः ॥ १७ ॥

स्वधर्ममनुपश्यन्तो न जहुः स्वामनीकिनीम् । वे उस समय अच्छी तरह युद्ध नहीं कर पा रहे थे, तो भी विशेषतः लज्जाशील होनेके कारण अपने धर्मपर दृष्टि रखते हुए अपनी सेना छोड़कर जा न सके ॥ १७ ॥

अस्त्राण्यन्ये समुत्सृज्य निद्रान्धाः शेरते जनाः ॥ १८ ॥

रथेष्वन्ये गजेष्वन्ये हयेष्वन्ये च भारत । भारत! दूसरे बहुत - से सैनिक अपने अस्त्र- शस्त्र छोड़कर नींदसे अन्धे होकर सो रहे थे । कुछ लोग रथोंपर, कुछ हाथियोंपर और कुछ लोग घोड़ोंपर ही सो गये थे ॥ १८६३ ॥

निद्रान्धा नो बुबुधिरे काञ्चिच्चेष्टां नराधिप ॥ १९ ॥

तानन्ये समरे योधाः प्रेषयन्तो यमक्षयम् । नरेश्वर! नींदसे बेसुध होनेके कारण वे किसी भी चेष्टाको समझ नहीं पाते थे और उन्हें दूसरे योद्धा समरांगणमें यमलोक भेज देते थे ॥ १ ९ ३ ॥ स्वप्नायमानांस्त्वपरे परानतिविचेतसः ॥ २० ॥

आत्मानं समरे जघ्नुः स्वानेव च परानपि ।

नानावाचो विमुञ्चन्तो निद्रान्धास्ते महारणे ॥ २१ ॥

दूसरे सैनिक शत्रुओंको स्वप्नमें पड़कर अत्यन्त वेसुध हुए देख उन्हें मार बैठते थे । कुछ लोग उस महासमरमें निद्रान्ध होकर नाना प्रकारकी बातें कहते हुए कभी अपने - आपपर ही प्रहार कर बैठते थे, कभी अपने पक्षके ही लोगोंको मार डालते थे और कभी शत्रुओंका भी वध करते थे ॥ २०-२१ ॥

अस्माकं च महाराज परेभ्यो बहवो जनाः ।

योद्धव्यमिति तिष्ठन्तो निद्रासंरक्तलोचनाः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1382

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महाराज! हमारे पक्षके भी बहुत- से सैनिक शत्रुओंके साथ युद्ध करना है, ऐसा समझकर खड़े थे, परंतु नींदसे उनकी आँखें लाल हो गयी थीं ॥ २२ ॥

संसर्पन्तो रणे केचिन्निद्रान्धास्ते तथा परान् ।

जघ्नुः शूरा रणे शूरांस्तस्मिंस्तमसि दारुणे ॥ २३ ॥

कुछ शूरवीर निद्रान्ध होकर भी रणभूमिमें विचरते थे और उस दारुण अन्धकारमें शत्रुपक्षके शूरवीरोंका वध कर डालते थे ॥ २३ ॥

हन्यमानमथात्मानं परेभ्यो बहवो जनाः ।

नाभ्यजानन्त समरे निद्रया मोहिता भृशम् ॥ २४ ॥

बहुत - से मनुष्य निद्रासे अत्यन्त मोहित हो जानेके कारण शत्रुओंकी ओरसे समरभूमिमें अपनेको जो मारनेकी चेष्टा होती थी, उसे समझ ही नहीं पाते थे ॥ २४ ॥

तेषामेतादृशीं चेष्टां विज्ञाय पुरुषर्षभः ।

उवाच वाक्यं बीभत्सुरुच्चैः संनादयन् दिशः ॥ २५ ॥

उनकी ऐसी अवस्था जानकर पुरुषप्रवर अर्जुनने सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए उच्चस्वरसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ ॥

श्रान्ता भवन्तो निद्रान्धाः सर्व एव सवाहनाः ।

तमसा च वृते सैन्ये रजसा बहुलेन च ॥ २६ ॥

ते यूयं यदि मन्यध्वमुपारमत सैनिकाः ।

निमीलयत चात्रैव रणभूमौ मुहूर्तकम् ॥ २७ ॥

' सैनिको! तुम सब लोग अपने वाहनोंसहित थक गये हो और नींदसे अन्धे हो रहे हो । इधर यह सारी सेना घोर अन्धकार और बहुत - सी धूलसे ढक गयी है । अतः यदि तुम ठीक समझो तो युद्ध बंद कर दो और दो घड़ीतक इस रणभूमिमें ही सो लो ॥ २६-२७ ॥

ततो विनिद्रा विश्रान्ताश्चन्द्रमस्युदिते पुनः ।

संसाधयिष्यथान्योन्यं संग्रामं कुरुपाण्डवाः ॥ २८ ॥

‘ तत्पश्चात् चन्द्रोदय होनेपर विश्राम करनेके अनन्तर निद्रारहित हो तुम समस्त कौरव-पाण्डव योद्धा परस्पर पूर्ववत् संग्राम आरम्भ कर देना ' ॥ २८ ॥

तद् वचः सर्वधर्मज्ञा धार्मिकस्य विशाम्पते ।

अरोचयन्त सैन्यानि तथा चान्योन्यमब्रुवन् ॥ २९ ॥

प्रजानाथ! धर्मात्मा अर्जुनका यह वचन समस्त धर्मज्ञोंको ठीक लगा । सारी सेनाओंने उसे पसंद किया और सब लोग परस्पर यही बात कहने लगे ॥ २ ९ ॥

चुक्रुशुः कर्ण कर्णेति तथा दुर्योधनेति च ।

उपारमत पाण्डूनां विरता हि वरूथिनी ॥ ३० ॥

कौरव सैनिक ‘ हे कर्ण! हे कर्ण! हे राजा दुर्योधन! ' इस प्रकार पुकारते हुए उच्चस्वरसे बोले — ‘ आपलोग युद्ध बंद कर दें; क्योंकि पाण्डव - सेना युद्धसे विरत हो गयी है ' ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1383

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तथा विक्रोशमानस्य फाल्गुनस्य ततस्ततः ।

उपारमत पाण्डूनां सेना तव च भारत ॥ ३१ ॥

भारत! जब अर्जुनने सब ओर इधर- उधर उच्चस्वरसे पूर्वोक्त प्रस्ताव उपस्थित किया, तब पाण्डवोंकी तथा आपकी सेना भी युद्ध से निवृत्त हो गयी ॥ ३१ ॥

तामस्य वाचं देवाश्च ऋषयश्च महात्मनः ।

सर्वसैन्यानि चाक्षुद्रां प्रहृष्टाः प्रत्यपूजयन् ॥ ३२ ॥

महात्मा अर्जुनके इस श्रेष्ठ वचनका सम्पूर्ण देवताओं, ऋषियों और समस्त सैनिकोंने बड़े हर्षके साथ स्वागत किया ॥ ३२ ॥

तत् सम्पूज्य वचोऽक्रूरं सर्वसैन्यानि भारत ।

मुहूर्तमस्वपन् राजञ्श्रान्तानि भरतर्षभ ॥ ३३ ॥

भरतवंशी नरेश! भरतकुलभूषण! अर्जुनके उस क्रूरताशून्य वचनका आदर करके थकी हुई सारी सेनाएँ दो घड़ीतक सोती रहीं ॥ ३३ ॥

सा तु सम्प्राप्य विश्रामं ध्वजिनी तव भारत ।

सुखमाप्तवती वीरमर्जुनं प्रत्यपूजयत् ॥ ३४ ॥

भारत! आपकी सेना विश्रामका अवसर पाकर सुखका अनुभव करने लगी । उसने वीर अर्जुनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करते हुए कहा- ॥ ३४ ॥

त्वयि वेदास्तथास्त्राणि त्वयि बुद्धिपराक्रमौ ।

धर्मस्त्वयि महाबाहो दया भूतेषु चानघ ॥ ३५ ॥

‘ महाबाहु निष्पाप अर्जुन! तुममें वेद तथा अस्त्रोंका ज्ञान है । तुममें बुद्धि और पराक्रम है तथा तुममें धर्म एवं सम्पूर्ण भूतोंके प्रति दया है ॥ ३५ ॥

यच्चाश्वस्तास्तवेच्छामः शर्म पार्थ तदस्तु ते ।

मनसश्च प्रियानर्थान् वीर क्षिप्रमवाप्नुहि ॥ ३६ ॥

' कुन्तीनन्दन! हमलोग तुम्हारी प्रेरणासे सुस्ताकर सुखी हुए हैं; इसलिये तुम्हारा कल्याण चाहते हैं । तुम्हें सुख प्राप्त हो । वीर! तुम शीघ्र ही अपने मनको प्रिय लगनेवाले पदार्थ प्राप्त करो ' ॥ ३६ ॥

इति ते तं नरव्याघ्रं प्रशंसन्तो महारथाः ।

निद्रया समवाक्षिप्तास्तूष्णीमासन् विशाम्पते ॥ ३७ ॥

प्रजानाथ! इस प्रकार आपके महारथी नरश्रेष्ठ अर्जुनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करते हुए निद्राके वशीभूत हो मौन हो गये ॥ ३७ ॥

अश्वपृष्ठेषु चाप्यन्ये रथनीडेषु चापरे ।

गजस्कन्धगताश्चान्ये शेरते चापरे क्षितौ ॥ ३८ ॥

सायुधाः सगदाश्चैव सखड्गाः सपरश्वधाः ।

सप्रासकवचाश्चान्ये नराः सुप्ताः पृथक् पृथक् ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 1384

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कुछ लोग घोड़ोंकी पीठोंपर, दूसरे रथोंकी बैठकोंमें, कुछ अन्य योद्धा हाथियोंपर तथा दूसरे बहुत - से सैनिक पृथ्वीपर ही सो रहे । कुछ लोग सभी प्रकारके आयुध लिये हुए थे । किन्हींके हाथोंमें गदाएँ थीं । कुछ लोग तलवार और फरसे लिये हुए थे तथा दूसरे बहुत--से

मनुष्य प्रास और कवचसे सुशोभित थे । वे सभी अलग- अलग सो रहे थे ॥ ३८-३९ ॥

गजास्ते पन्नगाभोगैर्हस्ते भूरेणुगुण्ठितैः ।

निद्रान्धा वसुधां चक्रुर्प्राणनिःश्वासशीतलाम् ॥ ४० ॥

नींदसे अंधे हुए हाथी सर्पोंके समान धूलमें सनी हुई सूँड़ोंसे लंबी - लंबी साँसें छोड़कर इस वसुधाको शीतल करने लगे ॥ ४० ॥

सुप्ताः शुशुभिरे तत्र निःश्वसन्तो महीतले ।

विकीर्णा गिरयो यद्वन्निःश्वसद्भिर्महोरगैः ॥ ४१ ॥

धरतीपर सोकर निःश्वास खींचते हुए गजराज ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो पर्वत विखरे पड़े हों और उनमें रहनेवाले बड़े - बड़े सर्प लंबी साँसें छोड़ रहे हों ॥ ४१ ॥

समां च विषमां चक्रुः खुराग्रैर्विकृतां महीम् ।

हयाः काञ्चनयोक्त्रास्ते केसरालम्बिभिर्युगैः ॥ ४२ ॥

सोनेकी बागडोरमें बँधे हुए घोड़े अपने गर्दनके बालोंपर रथके जूए लिये टापोंसे खोद-खोदकर समतल भूमिको भी विषम बना रहे थे ॥ ४२ ॥

सुषुपुस्तत्र राजेन्द्र युक्ता वाहेषु सर्वशः ।

एवं हयाश्च नागाश्च योधाश्च भरतर्षभ ।

युद्धाद् विरम्य सुषुपुः श्रमेण महतान्विता ॥ ४३ ॥

राजेन्द्र! वे रथोंमें जुते हुए ही चारों ओर सो गये । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार घोड़े, हाथी और सैनिक भारी थकावटसे युक्त होनेके कारण युद्धसे विरत हो सो गये ॥

तत् तथा निद्रया भग्नमबोधं प्रास्वपद् भृशम् ।

कुशलैः शिल्पिभिर्न्यस्तं पटे चित्रमिवाद्भुतम् ॥ ४४ ॥

इस प्रकार निद्रासे वेसुध हुआ वह सैन्यसमूह गहरी नींदमें सो रहा था। वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था, मानो किन्हीं कुशल कलाकारोंने पटपर अद्भुत चित्र अंकित कर दिया हो ॥ ४४ ॥

ते क्षत्रियाः कुण्डलिनो युवानः परस्परं सायकविक्षताङ्गाः । कुम्भेषु लीनाः सुषुपुर्गजानां कुचेषु लग्ना इव कामिनीनाम् ॥ ४५ ॥

वे कुण्डलधारी तरुण क्षत्रिय परस्पर सायकोंकी मारसे सम्पूर्ण अंगोंमें क्षत -विक्षत हो हाथियोंके कुम्भस्थलोंसे सटकर ऐसे सो रहे थे, मानो कामिनियोंके कुचोंका आलिंगन करके सोये हों ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 1385

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ततः कुमुदनाथेन कामिनीगण्डपाण्डुना ।

नेत्रानन्देन चन्द्रेण माहेन्द्री दिगलङ्कृता ॥ ४६ ॥

तत्पश्चात् कामिनियोंके कपोलोंके समान श्वेत - पीतवर्णवाले नयनानन्ददायी कुमुदनाथ चन्द्रमाने पूर्व दिशाको सुशोभित किया ॥ ४६ ॥

दशशताक्षककुब्दरिनिःसृतः किरणकेसरभासुरपिञ्जरः । तिमिरवारणयूथविदारणः समुदियादुदयाचलकेसरी ॥ ४७ ॥

उदयाचलके शिखरपर चन्द्रमारूपी सिंहका उदय हुआ, जो पूर्व दिशारूपी कन्दरासे निकला था । वह किरणरूपी केसरोंसे प्रकाशित एवं पिंगलवर्णका था और अन्धकाररूपी गजराजोंके यूथको विदीर्ण कर रहा था ॥ ४७ ॥

हरवृषोत्तमगात्रसमद्युतिः स्मरशरासनपूर्णसमप्रभः । नववधूस्मितचारुमनोहरः प्रविसृतः कुमुदाकरबान्धवः ॥ ४८ ॥

भगवान् शंकरके वृषभ नन्दिकेश्वरके उत्तम अंगोंके समान जिसकी श्वेत कान्ति है, जो कामदेवके श्वेत पुष्पमय धनुषके समान पूर्णतः उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित होता है और नववधूकी मन्द मुसकानके सदृश सुन्दर एवं मनोहर जान पड़ता है; वह कुमुदकुल- बान्धव चन्द्रमा क्रमशः ऊपर उठकर आकाशमें अपनी चाँदनी छिटकाने लगा ॥ ४८ ॥

ततो मुहूर्ताद् भगवान् पुरस्ताच्छशलक्षणः ।

अरुणं दर्शयामास ग्रसन् ज्योतिःप्रभाः प्रभुः ॥ ४ ९ ॥

उस समय दो घड़ीके बाद शशचिह्नसे सुशोभित प्रभावशाली भगवान् चन्द्रमाने अपनी ज्योत्स्नासे नक्षत्रोंकी प्रभाको क्षीण करते हुए पहले अरुण कान्तिका दर्शन कराया ॥ ४ ९ ॥

अरुणस्य तु तस्यानु जातरूपसमप्रभम् ।

रश्मिजालं महच्चन्द्रो मन्दं मन्दमवासृजत् ॥ ५० ॥

अरुण कान्तिके पश्चात् चन्द्रदेवने धीरे- धीरे सुवर्णके समान प्रभावाले विशाल किरण-जालका प्रसार आरम्भ किया ॥ ५० ॥

उत्सारयन्तः प्रभया तमस्ते चन्द्ररश्मयः ।

पर्यगच्छन् शनैः सर्वा दिशः खं च क्षितिं तथा ॥ ५१ ॥

फिर वे चन्द्रमाकी किरणें अपनी प्रभासे अन्धकारका निवारण करती हुई शनैः - शनैः सम्पूर्ण दिशाओं, आकाश और भूमण्डलमें फैलने लगीं ॥ ५१ ॥

ततो मुहूर्ताद् भुवनं ज्योतिर्भूतमिवाभवत् ।

पृष्ठ 1386

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अप्रख्यमप्रकाशं च जगामाशु तमस्तथा ॥ ५२ ॥

तदनन्तर एक ही मुहूर्तमें समस्त संसार ज्योतिर्मय - सा हो गया । अन्धकारका कहीं नाम भी नहीं रह गया । वह अदृश्यभावसे तत्काल कहीं चला गया ॥ ५२ ॥

प्रतिप्रकाशिते लोके दिवाभूते निशाकरे ।

विचेरुर्न विचेरुश्च राजन् नक्तञ्चरास्ततः ॥ ५३ ॥

चन्द्रदेवके पूर्णतः प्रकाशित होनेपर जगत्में दिनका - सा उजाला हो गया । राजन्! उस समय रात्रिमें विचरनेवाले कुछ प्राणी विचरण करने लगे और कुछ जहाँ -के - तहाँ पड़े रहे ॥ ५३ ॥

बोध्यमानं तु तत् सैन्यं राजंश्चन्द्रस्य रश्मिभिः ।

बुबुधे शतपत्राणां वनं सूर्यांशुभिर्यथा ॥ ५४ ॥

नरेश्वर! चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे सारी सेना उसी प्रकार जाग उठी, जैसे सूर्यरश्मियोंका स्पर्श पाकर कमलोंका समूह खिल उठता है ॥ ५४ ॥

यथा चन्द्रोदयोद्भूतः क्षुभितः सागरोऽभवत् ।

तथा चन्द्रोदयोद्भूतः स बभूव बलार्णवः ॥ ५५ ॥

जैसे पूर्णिमाके चन्द्रमाका उदय होनेपर उससे प्रभावित होनेवाले महासागरमें ज्वार उठने लगता है, उसी प्रकार उस समय चन्द्रोदय होनेसे उस सारे सैन्य- समुद्रमें खलबली मच गयी ॥ ५५ ॥

ततः प्रववृते युद्धं पुनरेव विशाम्पते ।

लोके लोकविनाशाय परं लोकमभीप्सताम् ॥ ५६ ॥

प्रजानाथ! तदनन्तर इस जगत्में महान् जनसंहारके लिये परलोककी इच्छा रखनेवाले योद्धाओंका वह युद्ध पुनः आरम्भ हो गया ॥ ५६ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि रात्रियुद्धे सैन्यनिद्रायां चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतद्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय सेनाका निद्राविषयक एक सौचौरासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८४ ॥

पृष्ठ 1387

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पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः दुर्योधनका उपालम्भ और द्रोणाचार्यका व्यंगपूर्ण उत्तर संजय उवाच

ततो दुर्योधनो द्रोणमभिगम्याब्रवीदिदम् ।

अमर्षवशमापन्नो जनयन् हर्षतेजसी ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! तदनन्तर अमर्षमें भरे हुए दुर्योधनने द्रोणाचार्यके पास जाकर उनमें हर्षोत्साह और उत्तेजना पैदा करते हुए इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

दुर्योधन उवाच

मर्षणीयाः संग्रामे विश्रमन्तः श्रमान्विताः ।

सपत्ना ग्लानमनसो लब्धलक्ष्या विशेषतः ॥ २ ॥

दुर्योधन बोला- आचार्य! युद्धमें विशेषतः वे शत्रु, जो लक्ष्य बेधनेमें कभी चूकते न हों, यदि थककर विश्राम ले रहे हों और मनमें ग्लानि भरी होनेसे युद्धविषयक उत्साह खो बैठे हों, उनके प्रति कभी क्षमा नहीं दिखानी चाहिये ॥ २ ॥

पृष्ठ 1388

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यत् तु मर्षितमस्माभिर्भवतः प्रियकाम्यया ।

त एते परिविश्रान्ताः पाण्डवा बलवत्तराः ॥ ३ ॥

इस समय जो हमने क्षमा की है— सोते समय शत्रुओंपर प्रहार नहीं किया है, वह केवल आपका प्रिय करनेकी इच्छासे ही हुआ है । इसका फल यह हुआ कि ये पाण्डव- सैनिक पूर्णतः विश्राम करके पुनः अत्यन्त प्रबल हो गये हैं ॥ ३ ॥

सर्वथा परिहीनाः स्म तेजसा च बलेन च ।

भवता पाल्यमानास्ते विवर्धन्ते पुनः पुनः ॥ ४ ॥

हमलोग तेज और बलसे सर्वथा हीन हो गये हैं और वे पाण्डव आपसे सुरक्षित होनेके कारण बारंबार बढ़ते जा रहे हैं ॥ ४ ॥

दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि ब्राह्मादीनि च यानि ह ।

तानि सर्वाणि तिष्ठन्ति भवत्येव विशेषतः ॥ ५ ॥

ब्रह्मास्त्र आदि जितने भी दिव्यास्त्र हैं, वे सब - के - सब विशेषरूपसे आपहीमें प्रतिष्ठित हैं ॥ ५ ॥

न पाण्डवेया न वयं नान्ये लोके धनुर्धराः ।

युध्यमानस्य ते तुल्याः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ६ ॥

युद्ध करते समय आपकी समानता न तो पाण्डव, न हमलोग और न संसारके दूसरे धनुर्धर ही कर सकते हैं, यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ६ ॥

ससुरासुरगन्धर्वानिमाँल्लोकान् द्विजोत्तम ।

सर्वास्त्रविद् भवान् हन्याद् दिव्यैरस्त्रैर्न संशयः ॥ ७ ॥

द्विजश्रेष्ठ! आप सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता हैं । अतः चाहें तो अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा देवता, असुर और गन्धर्वोंसहित इन सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥

स भवान् मर्षयत्येतांस्त्वत्तो भीतान् विशेषतः ।

शिष्यत्वं वा पुरस्कृत्य मम वा मन्दभाग्यताम् ॥ ८ ॥

फिर भी आप इन पाण्डवोंको क्षमा करते जाते हैं । यद्यपि वे आपसे विशेष भयभीत रहते हैं, तो भी वे आपके शिष्य हैं, इस बातको सामने रखकर या मेरे दुर्भाग्यका विचार करके आप उनकी उपेक्षा करते हैं ॥ ८ ॥

संजय उवाच

एवमुद्धर्षितो द्रोणः कोपितश्च सुतेन ते ।

समन्युरब्रवीद् राजन् दुर्योधनमिदं वचः ॥ ९ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! जब इस प्रकार आपके पुत्रने द्रोणाचार्यको उत्साहित करते हुए उनका क्रोध बढ़ाया, तब वे कुपित होकर दुर्योधनसे इस प्रकार बोले- ॥ ९ ॥

पृष्ठ 1389

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स्थविरः सन् परं शक्त्या घटे दुर्योधनाहवे ।

अतः परं मया कार्यं क्षुद्रं विजयगृद्धिना ॥ १० ॥

'दुर्योधन! यद्यपि मैं बूढ़ा हो गया, तथापि युद्धस्थलमें अपनी पूरी शक्ति लगाकर तुम्हारी विजयके लिये चेष्टा करता हूँ, परंतु जान पड़ता है, अब तुम्हारी जीतकी इच्छासे मुझे नीच कार्य भी करना पड़ेगा ॥ १० ॥

अनस्त्रविदयं सर्वो हन्तव्योऽस्त्रविदा जनः ।

यद् भवान् मन्यते चापि शुभं वा यदि वाशुभम् ॥ ११ ॥

तद् वै कर्तास्मि कौरव्य वचनात् तव नान्यथा । ‘ ये सब लोग दिव्यास्त्रोंको नहीं जानते और मैं जानता हूँ, इसलिये मुझे उन्हीं अस्त्रोंद्वारा इन, सबको मारना पड़ेगा । कुरुनन्दन;! तुम शुभ या अशुभ जो कुछ भी कराना||उचित समझो वह तुम्हारे कहनेसे करूँगा उसके विपरीत कुछ नहीं करूँगा ॥ १ निहत्य सर्वपञ्चालान् युद्धे कृत्वा पराक्रमम् ॥ १२ ॥

विमोक्ष्ये कवचं राजन् सत्येनायुधमालभे । ‘ राजन्! मैं सत्यकी शपथ खाकर अपने धनुषको छूते हुए कहता हूँ कि ' युद्धमें पराक्रम करके समस्त पांचालोंका वध किये बिना कवच नहीं उतारूंगा' ॥ १२३ ॥

मन्यसे यच्च कौन्तेयमर्जुनं श्रान्तमाहवे ॥ १३ ॥

तस्य वीर्यं महाबाहो शृणु सत्येन कौरव । ' परंतु तुम जो कुन्तीकुमार अर्जुनको युद्धमें थका हुआ समझते हो, वह तुम्हारी भूल है । महाबाहु कुरुराज! मैं उनके पराक्रमका सचाईके साथ वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १३३ ॥

तं न देवा न गन्धर्वा न यक्षा न च राक्षसाः ॥ १४ ॥

उत्सहन्ते रणे जेतुं कुपितं सव्यसाचिनम् । ' युद्धमें कुपित हुए सव्यसाची अर्जुनको न देवता, न गन्धर्व, न यक्ष और न राक्षस ही जीत सकते हैं ॥ खाण्डवे येन भगवान् प्रत्युद्यातः सुरेश्वरः ॥ १५ ॥

सायकैर्वारितश्चापि वर्षमाणो महात्मना । ‘ उस महामनस्वी वीरने खाण्डववनमें वर्षा करते हुए भगवान् देवराज इन्द्रका सामना किया और अपने बाणोंद्वारा उन्हें रोक दिया ॥ १५३ ॥

यक्षा नागास्तथा दैत्या ये चान्ये बलगर्विताः ॥ १६ ॥

निहताः पुरुषेन्द्रेण तच्चापि विदितं तव । ' पुरुषश्रेष्ठ अर्जुनने उस समय यक्ष, नाग, दैत्य तथा दूसरे भी जो बलका घमंड

रखनेवाले वीर थे, उन सबको मार डाला था । यह बात तुम्हें मालूम ही है ॥

गन्धर्वा घोषयात्रायां चित्रसेनादयो जिताः ॥ १७ ॥

यूयं तैर्ह्रियमाणाश्च मोक्षिता दृढधन्वना ।

पृष्ठ 1390

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1390 का मूल पृष्ठ
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‘ घोषयात्राके समय जब चित्रसेन आदि गन्धर्व तुम्हें हरकर लिये जा रहे थे, उस समय सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने ही उन सबको परास्त किया और तुम्हें बन्धनसे छुड़ाया ॥ १७ ॥

निवातकवचाश्चापि देवानां शत्रवस्तथा ॥ १८ ॥

सुरैरवध्याः संग्रामे तेन वीरेण निर्जिताः । ‘ देवशत्रु निवातकवच नामक दानव, जिन्हें संग्राममें देवता भी नहीं मार सकते थे, उसी वीर अर्जुनसे पराजित हुए हैं ॥ १८६ ॥

दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् ॥ १९ ॥

विजिग्ये पुरुषव्याघ्रः स शक्यो मानुषैः कथम् । 'जिन पुरुषसिंह अर्जुनने हिरण्यपुरनिवासी सहस्रों दानवोंपर विजय पायी है, वे मनुष्योंद्वारा कैसे जीते जा सकते हैं? ॥ १ ९ ३ ॥ प्रत्यक्षं चैव ते सर्वं यथाबलमिदं तव ॥ २० ॥

क्षपितं पाण्डुपुत्रेण चेष्टतां नो विशाम्पते । ‘ प्रजानाथ! हमारे बहुत चेष्टा करनेपर भी पाण्डुपुत्र अर्जुनने जिस प्रकार तुम्हारी इस सेनाका संहार कर डाला है, यह सब तो तुम्हारी आँखोंके सामने ही है ' ॥ २० ॥

संजय उवाच तं तदाभिप्रशंसन्तमर्जुनं कुपितस्तदा ॥ २१ ॥

द्रोणं तव सुतो राजन् पुनरेवेदमब्रवीत् । संजय कहते हैं — राजन्! इस प्रकार अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए द्रोणाचार्यसे उस समय आपके पुत्रने कुपित होकर पुनः इस प्रकार कहा— ॥ २१३ ॥

अहं दुःशासनः कर्णः शकुनिर्मातुलश्च मे ॥ २२ ॥

हनिष्यामो ऽर्जुनं संख्ये द्विधा कृत्वाद्य भारतीम् । ( तिष्ठ स त्वं महाबाहो नित्यं शिष्यः प्रियस्तव ॥ ) ‘ आज मैं, दुःशासन, कर्ण और मेरे मामा शकुनि कौरव सेनाको दो भागोंमें बाँटकर युद्धमें अर्जुनको मार डालेंगे । महाबाहो! आप चुपचाप खड़े रहिये, क्योंकि अर्जुन सदासे ही आपके प्रिय शिष्य हैं ' ॥ २२ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भारद्वाजो हसन्निव ॥ २३ ॥

अन्ववर्तत राजानं स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रवीत् । दुर्योधनकी यह बात सुनकर द्रोणाचार्यने हँसते हुए - से उसकी बातका अनुमोदन किया और ‘ तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहकर वे राजा दुर्योधनसे पुनः इस प्रकार बोले— ॥ २३ ¾ ॥ को हि गाण्डीवधन्वानं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ २४ ॥